भारत में होली को अक्सर केवल रंगों और गुलाल का त्योहार समझ लिया जाता है, लेकिन सच यह है कि अगर आप भारत की आत्मा को महसूस करना चाहते हैं, तो होली के विविध रूपों को करीब से देखना बेहद ज़रूरी है। यह पर्व सिर्फ रंग खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रेम, शरारत, शौर्य, भक्ति, लोककथाएँ और सांस्कृतिक परंपराओं की गहरी झलक मिलती है। कहीं होली राधा-कृष्ण की रासलीलाओं से जुड़ी भावनाओं को जीवंत करती है, तो कहीं यह वीरता और परंपरागत गौरव का प्रतीक बन जाती है। (Unique Holi Celebrations)

कई राज्यों में यह संगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक रस्मों के साथ मनाई जाती है, जो हर क्षेत्र को एक अलग पहचान देती हैं। यह ट्रैवल आर्टिकल आपको भारत के उन 6 खास राज्यों की सैर कराएगा, जहाँ होली अपने बिल्कुल अनोखे और अलग अंदाज़ में मनाई जाती है, और हर जगह आपको एक नई कहानी और नया अनुभव देती है।
उत्तर प्रदेश- बरसाना की लट्ठमार होली
उत्तर प्रदेश के बरसाना की लट्ठमार होली पूरी दुनिया में अपनी अनोखी और जीवंत परंपरा के लिए मशहूर है, जो भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के दिव्य प्रेम और उनकी रासलीला से जुड़ी हुई है. इस उत्सव के दौरान, नंदगाँव के पुरुष (होरियारे) बरसाना आते हैं, जहाँ महिलाएँ (हुरियारिन) उन्हें बड़े ही उत्साह और हास्य-विनोद के साथ लाठियों (लट्ठ) से मारती हैं और पुरुष ढालों के ज़रिए अपना बचाव करते हैं।

यह परंपरा उस पौराणिक कथा पर आधारित है जिसमें कृष्ण अपने मित्रों के साथ बरसाना आकर राधा और उनकी सखियों को चिढ़ाते थे और जवाब में महिलाएँ उन्हें लाठियों से भगाती थीं. बरसाना के श्री राधा रानी मंदिर के प्रांगण में होने वाला यह आयोजन अबीर-गुलाल की बौछार, ढोल की थाप और पारंपरिक भजनों से गूँज उठता है, जिसे देखने के लिए हर साल हज़ारों की संख्या में विदेशी और भारतीय पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं.
राजस्थान- शाही होली और एलीफेंट फेस्टिवल
राजस्थान में होली का त्योहार अपनी शाही विरासत और अनूठी परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। उदयपुर में इसे ‘शाही होली’ के रूप में मनाया जाता है, जहाँ सिटी पैलेस में मेवाड़ के शाही परिवार द्वारा ‘होलिका दहन’ की रस्म निभाई जाती है और पारंपरिक व्यंजनों के साथ उत्सव का आगाज़ होता है। इसके साथ ही, जयपुर में होली की पूर्व संध्या पर ‘एलीफेंट फेस्टिवल’ (हाथी उत्सव) आयोजित किया जाता है, जो राजस्थान के राजसी इतिहास में हाथियों के महत्व को दर्शाता है।

इस मौके पर हाथियों को ‘गज श्रृंगार’ के तहत रंगों, मखमल के कपड़ों और गहनों से बेहद खूबसूरती से सजाया जाता है और उनकी भव्य परेड निकाली जाती है। हालांकि अब पशु कल्याण के कारण इसके स्वरूप में कुछ बदलाव आए हैं, लेकिन आज भी यहाँ का सांस्कृतिक वैभव, घूमर और कालबेलिया जैसे लोक नृत्य और रंगों का मेल सैलानियों को एक जादुई अनुभव प्रदान करता है।
महाराष्ट्र- रंग पंचमी और मटकी फोड़
महाराष्ट्र में रंग पंचमी और मटकी फोड़ (दही हांडी) के त्यौहार बहुत ही उमंग और जोश के साथ मनाए जाते हैं। रंग पंचमी होली के पाँच दिन बाद मनाई जाती है, जिसे ‘शिमगा’ भी कहा जाता है और यह बसंत ऋतु के आगमन व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन लोग एक-दूसरे पर गुलाल और रंगीन पानी डालते हैं, और नासिक जैसे शहरों में ‘रहाड़’ (रंगीन पानी के बड़े टैंक) में डुबकी लगाने की ३०० साल पुरानी अनोखी परंपरा आज भी मशहूर है। इस खास मौके पर ‘पुरण पोली’ जैसे पकवान बनाए जाते हैं और मछुआरा समुदाय (कोली) इसे अपने खास अंदाज़ में नाच-गाकर मनाता है।

दूसरी ओर, मटकी फोड़ का आयोजन कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर होता है, जहाँ ‘गोविंदा पाठक’ नाम की टोलियां कई स्तरों वाला मानव पिरामिड बनाकर ऊँचाई पर बँधी दही-मक्खन की मटकी फोड़ने की कोशिश करती हैं। यह परंपरा भगवान कृष्ण के बचपन में पड़ोसियों के घरों से मक्खन चुराने की कहानियों पर आधारित है। आजकल इसे ‘प्रो गोविंदा लीग’ जैसे पेशेवर खेल का रूप भी दिया गया है, जिसमें सुरक्षा के लिए हेलमेट और बीमा जैसे कड़े नियमों का पालन किया जाता है।
पश्चिम बंगाल- डोल जात्रा और बसंत उत्सव
पश्चिम बंगाल में डोल जात्रा और बसंत उत्सव बहुत ही उमंग और रंगों के साथ मनाए जाते हैं। डोल जात्रा, जिसे डोल पूर्णिमा भी कहते हैं, मुख्य रूप से भगवान राधा-कृष्ण के प्रेम को समर्पित है, जहाँ उनकी मूर्तियों को एक सजे हुए झूले (डोल) पर रखकर पूजा की जाती है और शहर में शोभा-यात्रा निकाली जाती है। इस दिन महिलाएँ अक्सर पारंपरिक सफ़ेद साड़ी और लाल किनारी पहनकर शंख बजाती हैं और पूजा-अर्चना करती हैं।

दूसरी ओर, बसंत उत्सव की शुरुआत नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन के विश्वभारती में की थी, जिसका मकसद बसंत ऋतु का स्वागत करना और भाईचारे को बढ़ावा देना है। इसमें छात्र और शिक्षक पीले वस्त्र पहनकर ‘प्रभात फेरी’ निकालते हैं और टैगोर के मशहूर गीतों पर नृत्य व सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करते हैं। ये दोनों त्यौहार बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का अटूट हिस्सा हैं, जहाँ अबीर और गुलाल के साथ खुशियाँ मनाई जाती हैं।
पंजाब- होला मोहल्ला
गटका एक प्राचीन भारतीय युद्ध कला है जिसे मुख्य रूप से सिखों द्वारा अभ्यास किया जाता है और इसे उनके गुरुओं द्वारा शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति विकसित करने के लिए सिखाया गया था। होला मोहल्ला एक प्रमुख सिख त्योहार है जिसे दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1701 में आनंदपुर साहिब में वीरता, अनुशासन और एकता की भावना जगाने के लिए शुरू किया था। होली के अगले दिन मनाए जाने वाले इस तीन-दिवसीय त्योहार में निहंग सिख गटका का शानदार प्रदर्शन करते हैं, नकली लड़ाइयाँ (mock battles) लड़ते हैं और सैन्य शैली में बड़े जुलूस निकालते हैं।

गटका में सीखने की शुरुआत मुख्य रूप से लकड़ी की छड़ी (सोटी) और ढाल (फारी) से होती है, लेकिन इसके अनुभवी अभ्यासी तलवार, बरछा, खंडा और चक्र जैसे कई अन्य पारंपरिक हथियारों का भी कुशलता से प्रयोग करते हैं
तमिलनाडु- काम दहनम
तमिलनाडु में होली को ‘काम दहनम’ (Kama Dahanam), ‘कामन पंडिगई’ (Kaman Pandigai) या ‘कामविलास’ के नाम से मनाया जाता है, जो मुख्य रूप से प्रेम के देवता कामदेव की कुर्बानी और उनके पुनर्जन्म की याद में समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब कामदेव ने भगवान शिव की गहरी तपस्या को भंग करने के लिए उन पर प्रेम-बाण चलाया, तो शिव ने क्रोधित होकर अपनी तीसरी आँख खोली और कामदेव को भस्म कर दिया। हालांकि, बाद में कामदेव की पत्नी रति की करुण पुकार और प्रार्थना पर शिव ने कामदेव को दोबारा जीवित कर दिया।

इस त्योहार के दौरान कामदेव का पुतला जलाया जाता है, जो इंसानी मन की वासना (lust) और बुरी इच्छाओं के खात्मे का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर रति के शोक को दर्शाने वाले भावुक गीत गाए जाते हैं और कामदेव की जलन को कम करने के लिए उन्हें चंदन (sandalwood) अर्पित किया जाता है। अंत में, लोग एक-दूसरे को राख और रंगों का गुलाल लगाते हैं, जो आत्मिक शुद्धिकरण और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न होता है
एक त्योहार, अनगिनत रंग
भारत की होली केवल रंगों और गुलाल का त्योहार नहीं है, बल्कि यह लोककथाओं, इतिहास, भक्ति, शौर्य और समृद्ध संस्कृति का जीवंत उत्सव है। देश के अलग-अलग हिस्सों में मनाई जाने वाली होली अपने आप में एक अलग कहानी, अलग परंपरा और अलग अंदाज़ समेटे होती है। कहीं यह राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी भक्ति का रूप लेती है, तो कहीं वीरता और लोकगाथाओं की याद दिलाती है। कई जगहों पर पारंपरिक संगीत, नृत्य और विशेष पकवान इस पर्व को और भी खास बना देते हैं।

अगर आप सच में एक जिज्ञासु और सच्चे ट्रैवलर हैं, तो इन अनोखी होलियों को अपनी ट्रैवल लिस्ट में जरूर शामिल करें। क्योंकि भारत में हर राज्य की होली आपको एक नई कहानी सुनाती है, नई परंपराओं से रूबरू कराती है और विविधता में एकता का असली अर्थ समझाती है। यही रंग, यही परंपराएँ और यही विविधता भारत की असली खूबसूरती को दुनिया के सामने पेश करती हैं।

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