Sakshi Joshi – Five Colors of Travel
पंजाब की लोहड़ी :
जी हां, साल की शुरुआत का पहला त्यौहार, जिसके बाद से भारत में त्यौहारों का तांता लगा रहता है। लोहड़ी हर साल 13 या 14 जनवरी को बड़े ही उल्लास और धूम-धाम से मनाई जाती है। वैसे तो यह पंजाबियों का एक ख़ास और सांस्कृतिक त्यौहार है, पर इसे उत्तर भारत का भी प्रमुख त्यौहार माना जाता है। पूरे उत्तर भारत के भी सभी लोग बड़ी ही प्रसन्नता के साथ लोहड़ी मनाते हैं, और वहीं इसके बाद मकर संक्रांति का त्यौहार भी पूरे देश भर में मनाया जाता है।

लोहड़ी के दिन सबसे पहले एक ऐसी जगह चुनी जाती है जहां ज्यादा-से-ज्यादा लोग एकत्रित होकर पूजा कर सकें। जिसमें बड़ी-बड़ी लकड़ियों को एक जगह लगाकर उसमें आग जलाई जाती है और तिल, गुड़, रेवड़ी और मूंगफली आदि चढ़ाई जाती है। और आग के चारों ओर चक्कर लगाकर सभी लोग सुखी और मंगलमयी जीवन की कामना करते हैं।
लोहड़ी क्यों मनाई जाती है ?
पारम्परिक तौर से लोहड़ी फसल की बुआई, और कटाई से जुड़ा एक विशेष त्यौहार है। जिसमें एक तरफ पंजाब में नई फसल की पूजा करने की परंपरा है वहीं दूसरी तरफ देश के कई हिस्सों में माना जाता है कि यह त्यौहार पूस की आखिरी रात और माघ की पहली सुबह की कड़कडाती ठण्ड के कम होने की आस में मनाया जाता है।

इस त्यौहार में लोग कई गीत संगीत गा कर बड़े हर्षोउल्लास से ढ़ोल नगाड़ों के साथ लोहड़ी मांगने जाते है। पंजाबी में लोग-
सुंदर मुंदरिये हो!
तेरा कौन विचारा हो!
दुल्ला भट्टी वाला हो!
दुल्ले धी व्याही हो!
इस गीत को गाकर दुल्ला भट्टी की कहानियां सुनाते हैं। लोहड़ी के दिन दुल्ला भट्टी की कहानियां सुनने का अपना एक खास महत्त्व है। कहते हैं, दुल्ला भट्टी मुग़ल काल के दौरान पंजाब का निवासी हुआ करता था। और दुल्ला भट्टी ने पंजाब की लड़कियों की उस वक्त रक्षा की थी जब लड़कियों को अमीर सौदागरों को बेचा जा रहा था। वहीं एक दिन दुल्ला भट्टी ने ही सौदागरों से लड़ कर उन लड़कियों को छुड़वाकर उनकी शादी हिन्दुओं से करवाई थी। और तभी से दुल्ला भट्टी को नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया। तभी से हर लोहड़ी में यह कहानी सुनाई जाने लगी। Lohri

लोहड़ी का त्यौहार यूं तो देश के कई हिस्सों में मनाया जाता है पर पंजाब में लोहड़ी को लेकर एक अलग ही नज़ारा देखने को मिलता है। यहां लोग कई दिनों पहले से ही लकड़ियां इकठ्ठा करना शुरू कर देते हैं। और बच्चे लोकगीत गाते हुए घर-घर जाकर लकड़ियां जुटाते हैं। इसके बाद लकड़ियों को खुले और बड़े स्थान में रखा जाता है। और रात को सभी लकड़ियों के चरों ओर इकठ्ठा होते हैं। फिर पारम्परिक तौर-तरीकों से लकड़ियों में आग लगाई जाती है। आग के चारों तरफ लोग नाचते गाते हुए मूंफली, रेवड़ी, मक्का चढ़ाते हैं। इस दौरान पारम्परिक गीतों को गाया जाता है और प्रषाद के तौर पर सबको रेवड़ी, मूम्फ़ली जैसी अन्य चीज़े दी जाती हैं। पंजाबी परंपरा के अनुसार किसी नवजात बच्चे और नए विवाहित जोड़े की पहली लोहड़ी बेहद ख़ास होती है। इस मौके पर पाटी और नवजात शिशु को कई तौफे दिए जाते है। इसलिए पंजाब की लोहड़ी और भी कई मायनों में ख़ास मानी जाती है।