भारत में राष्ट्रीय उद्यानों का ज़िक्र आते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग़ में जंगल, पहाड़ या नदियों से घिरे इलाक़े आते हैं, लेकिन देश का एकमात्र ऐसा राष्ट्रीय उद्यान भी है जो पूरी तरह रेगिस्तान के बीच बसा हुआ है। पश्चिमी भारत का राज्य राजस्थान अपनी विरासत और थार मरुस्थल के लिए जाना जाता है, और इसी मरुस्थलीय क्षेत्र में स्थित जैसलमेर और बाड़मेर ज़िलों के बीच फैला Desert National Park भारत का इकलौता रेगिस्तानी राष्ट्रीय उद्यान है।
साल 1980 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया था और करीब 3,000 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा क्षेत्र में फैला यह पार्क थार मरुस्थल की नाज़ुक प्राकृतिक व्यवस्था को बचाने के मकसद से बनाया गया था। यहां रेत के टीले, पथरीली ज़मीन और कम बारिश के बावजूद ज़िंदा रहने वाला वन्य जीवन यह दिखाता है कि रेगिस्तान भी अपनी अलग पहचान और प्राकृतिक संतुलन रखता है।

कैसा है Desert National Park का भूगोल?
Desert National Park का इलाक़ा थार रेगिस्तान की वही तस्वीर पेश करता है, जैसी लोग आम तौर पर किताबों या तस्वीरों में देखते आए हैं। कहीं दूर तक फैले रेत के टीले हैं, तो कहीं कंकरीली और पथरीली ज़मीन, बीच-बीच में नमक जमी हुई सपाट धरती और सूखी झाड़ियाँ नज़र आती हैं। यहां बारिश साल में गिनी-चुनी ही होती है, और गर्मियों में तापमान अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है। सर्दियों में यही इलाक़ा ठंडी हवाओं और हल्की ठिठुरन के साथ बिल्कुल अलग मिज़ाज में दिखता है। हालात कठिन ज़रूर हैं, लेकिन ज़िंदगी यहां रुकी नहीं है—कम पानी और सीमित साधनों के बीच यहां का वन्यजीव और वनस्पति खुद को हालात के मुताबिक ढालकर अपना वजूद बनाए हुए हैं।
यही है दुर्लभ पक्षी संरक्षण का बड़ा केंद्र
इस राष्ट्रीय उद्यान की सबसे बड़ी पहचान यहां पाया जाने वाला संकटग्रस्त पक्षी Great Indian Bustard है, जिसे स्थानीय लोग गोडावण कहते हैं। कभी राजस्थान, गुजरात और मध्य भारत के खुले मैदानों में आम तौर पर दिखाई देने वाला यह पक्षी आज गिनती के इलाक़ों में ही बचा है। इसकी घटती संख्या की बड़ी वजह घास के मैदानों का कम होना, अंडों और चूजों का सुरक्षित न रह पाना और बिजली की ऊँची लाइनों से टकराव मानी जाती है। ऐसे में Desert National Park को गोडावण के संरक्षण का सबसे अहम ठिकाना माना जाता है। वन विभाग यहां निगरानी, सुरक्षित प्रजनन और हैचरी जैसे कार्यक्रमों के ज़रिए इसकी संख्या बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, ताकि यह पक्षी पूरी तरह विलुप्त होने से बच सके।

गोडावण के अलावा यह इलाक़ा कई दूसरे वन्यजीवों का भी घर है। खुले मैदानों में चिंकारा अक्सर छोटे झुंडों में दिखाई दे जाता है, जबकि रेगिस्तानी लोमड़ी और रेगिस्तानी बिल्ली जैसे जीव कम नज़र आते हैं लेकिन यहां की जीवन-श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं। सरीसृपों में विभिन्न प्रकार की छिपकलियां और सांप भी इस सूखे माहौल में खुद को ढालकर जीते हैं। सर्दियों के मौसम में जब दूर-दराज़ इलाक़ों से प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं, तो यह शांत सा दिखने वाला रेगिस्तान अचानक चहचहाहट से भर उठता है। यही वजह है कि यह क्षेत्र पक्षी प्रेमियों, फोटोग्राफरों और वन्यजीव शोधकर्ताओं के लिए खास मायने रखता है, क्योंकि यहां उन्हें रेगिस्तानी जीवन को करीब से समझने का मौका मिलता है।
नाजुक पारिस्थितिकी और बढ़ती चुनौतियाँ
थार मरुस्थल का पारिस्थितिकी तंत्र बाहर से जितना सादा दिखाई देता है, अंदर से उतना ही नाज़ुक है। यहां उगने वाली छोटी-छोटी झाड़ियाँ, घास और कांटेदार पौधे सिर्फ हरियाली नहीं हैं, बल्कि यही मिट्टी को तेज़ हवाओं में उड़ने से रोकते हैं और रेगिस्तान के जानवरों के लिए भोजन व छांव का सहारा बनते हैं। इसी सीमित वनस्पति पर पूरा जीवन तंत्र टिका हुआ है। जानकारों का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में पवन ऊर्जा परियोजनाओं का बढ़ना, बिजली की ऊँची हाई-टेंशन लाइनें और इंसानी गतिविधियों का विस्तार इस संतुलन को प्रभावित कर रहा है।

खास तौर पर गोडावण जैसे भारी और कम ऊँचाई पर उड़ने वाले पक्षी बिजली की लाइनों से टकराकर घायल होते हैं या मारे जाते हैं, जिससे उनकी संख्या पर सीधा असर पड़ता है। यही वजह है कि इस इलाके में विकास कार्यों को लेकर लगातार यह सवाल उठता रहा है कि तरक़्क़ी ज़रूरी है, लेकिन अगर वह प्रकृति की कीमत पर हुई तो रेगिस्तान का यह नाज़ुक जीवन तंत्र लंबे समय तक टिक नहीं पाएगा।
पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर
जैसलमेर आने वाले पर्यटकों के लिए Desert National Park अब सिर्फ एक घूमने की जगह नहीं, बल्कि अलग तरह का तजुर्बा बन चुका है। यहां सफारी की व्यवस्था सीमित और तय दायरे में रखी गई है, ताकि वन्यजीवों और नाज़ुक रेगिस्तानी माहौल पर बेवजह दबाव न पड़े। पर्यटक जीप सफारी के ज़रिए तय रूट पर घूमते हैं, जहां उन्हें रेत के फैले टीले, खुले मैदान और कभी-कभार दिख जाने वाले चिंकारा या रेगिस्तानी लोमड़ी जैसे जानवर देखने का मौका मिलता है। सर्दियों में आने वाले प्रवासी पक्षी इस इलाके को और भी दिलचस्प बना देते हैं, इसलिए बर्ड वॉचिंग के शौकीन लोग खास तौर पर यहां आते हैं।

सुबह सूरज निकलते वक्त जब हल्की सुनहरी रोशनी रेत पर गिरती है, तो पूरा इलाका जैसे चमक उठता है, और शाम को ढलते सूरज के साथ यही रेत नारंगी और लाल रंग में रंगी दिखाई देती है। यह नज़ारा पर्यटकों को देर तक वहीं ठहरने पर मजबूर कर देता है। दूसरी तरफ स्थानीय लोगों के लिए भी यह पार्क अहम बन गया है। सफारी गाइड, ड्राइवर, छोटे होटल और होम-स्टे चलाने वाले परिवार—कई लोग सीधे तौर पर पर्यटन से जुड़कर रोज़गार कमा रहे हैं। यानी यह राष्ट्रीय उद्यान जहां एक तरफ प्रकृति को बचाने की कोशिश है, वहीं दूसरी तरफ आसपास के गांवों की अर्थव्यवस्था को भी सहारा देता है।
रेगिस्तान में जीवन की अनोखी मिसाल
Desert National Park यह दिखाता है कि भारत में जीवन सिर्फ हरे-भरे जंगलों तक सीमित नहीं है। कठोर जलवायु, कम पानी और रेतीली जमीन के बावजूद यहाँ जैव विविधता मौजूद है। भारत का यह एकमात्र रेगिस्तानी राष्ट्रीय उद्यान न केवल प्राकृतिक विरासत की रक्षा कर रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह समझाने का काम भी कर रहा है कि रेगिस्तान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कोई घना जंगल।

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