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Dilli Haat, जानिए क्या है इनमें ख़ास 

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हां, बेशक ही आपने दिल्ली हाट के बारे में तो सुना ही होगा, पर क्या आपको पता है दिल्ली के “तीन” हाट हैं। दिल्ली हाट सुनते ही सबके दिमाग में आने लगता है दिल्ली का सबसे लोकप्रिय हाट आई.एन.ए , पर इसके अलावा भी दिल्ली में दो हाट और मौजूद हैं, जनकपुरी और पीतमपुरा। आज के फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे क्यों मशहूर हैं दिल्ली हाट और क्या है इसमें ख़ास। सबसे पहले बात करते हैं दिल्ली के सबसे मशहूर और लोकप्रिय हाट आई.एन.ए की। दिल्ली हाट आई.एन.ए तीनों हाटों में सबसे लोकप्रिय है आई.एन.ए, जहां आपको भारत की अलग-अलग कलाकृतियों की शानदार झलक देखने को मिलेगी। यहां पर आपको चंद मिनटों में पूरे भारत के दर्शन करने को मिलने वाले है इसके अलावा यहां पर भारत के विभिन्न छेत्रों की कलाओं से बने हैंडमेड आइटम्स को प्रदर्शित करती दुकानें आपको दिखाई देंगी। शॉपिंग आइटम्स की बात करें तो पुलकारी दुपट्टा, कश्मीरी शॉल्स, होम डेकॉर आइटम्स, ज्वेलरी, जुत्ति और भी लगभग सभी दुकानें, काफी वैरायटी में यहाँ आपको आसानी से मिल जाएंगी। इसके अलावा आपको बता दें कि आई.एन.ए मार्केट अलग-अलग फ़ूड वेरायटीज के लिए भी काफी मशहूर है। दिल्ली हाट में मिलने वाला स्वादिष्ट खान-पान ‘दिल्ली हाट’ को ख़ास बनाता है। भारत के कोने -कोने से स्वाद का पिटारा लिए व्यंजनों की दुकानें यहाँ लगी हुई हैं।  पंजाब के ‘मक्के दी रोटी सरसों दा साग’ हो, बंगाल के ‘माछेर-झोल’ और दक्षिण भारत के ‘इडली डोसा’ हो या फिर बिहार के मशहूर लिट्टी-चोखा यहाँ सब कुछ अलग-अलग संस्कृतियों के स्वाद के साथ मौजूद है। आई.एन.ए मार्केट में समय-समय पर काफी प्रोग्रम्म्स डांस और म्यूजिक जैसे कार्यक्रम भी लगे रहते हैं। एंट्री फीस – आई.एन.ए में एडल्ट्स के लिए टिकट 30 रुप्पे, और बच्चों की टिकट 20 रुप्पे है। टाइमिंग – सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक हफ्ते में सातों दिन यह मार्केट खुली रहती है। नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन (यल्लो लाइन) दिल्ली हाट आई.एन.ए  है। 2. जनकपुरी – अगर आप दिल्ली हाट बाजार को एक्स्प्लोर करने जा रहे हैं तो यहां पर आप हैंडमेड क्राफ्ट्स, कपडे, होमडेकोर आइटम्स और स्वादिष्ट खाने का अनुभव ले सकते हैं, पर दिल्ली हाट जनकपुरी अब समय के साथ इसके बिलकुल विप्रीत हो चूका है। ये पहले जितना मशहूर था अब उतना ही खाली पड़ा है, अब ना तो यहां पहले जितनी दुकानें हैं और ना ही खान-पान की वैराइटी तो लाज़िम है ज्यादा भीड़ की कोई गुंजाइश ही नहीं। पर आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 24 दिसंबर से यहां शानदार विंटर कार्निवल का आयोजन होने जा रहा है। इस विंटर कार्निवल में आपको काफी कुछ देखने को मिलने वाला है, तब आपको यहां सही मायने में दिल्ली हाट की खूबसूरती देखने को मिलेगी। ऐंट्री फीस : यहां 20 रुप्पे एडल्ट्स के लिए और 10 रुप्पे बच्चों के लिए है। नियरेस्ट मेट्रो स्टेशन : जनकपुरी वेस्ट। 3. दिल्ली हाट पीतमपुरा : दिल्ली हाट पीतमपुरा, नेताजी सुभाष प्लेस में स्थित है जब यहां कोई इवेंट्स होते हैं तो दिल्ली हाट में आपको सौ से भी ज्यादा क्राफ्ट स्टाल्स लगे दिखाई देंगे जहां आपको हैंडमेड और हैंडलूम आइटम्स आदि मिल जाएंगे और आपकी जानकारी के लिए बता दें की समय-समय पर यहां इवेंट्स भी होते रहते हैं। इसके अलावा यहां आपको ज्यादा भीड़ देखने को नहीं मिलेगी। यहां भी एंट्री टिकट और टाइम और हाटों के जैसे ही हैं। रोजाना बेसिस में सिर्फ दिल्ली हाट आई.एन.ए में ही आपको दिल्ली हाट की खूबसूरती दिखाई पड़ेगी। बाकि औरों में सिर्फ इवेंट के टाइम ही दुकानें और खान पान की वैरायटी मिलती है।

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Naukuchia Taal-नैनीताल मसूरी को भूल कर इस शांत और खूबसूरत जगह का ट्रेवल प्लान बनाईए

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उत्तराखंड के नैनीताल जिले में स्थित नौकुचियाताल, जिसे ‘नौ कोनों वाली झील’ भी कहा जाता है, प्रकृति, अध्यात्म और वैज्ञानिक जिज्ञासा का एक अनूठा संगम है। समुद्र तल से 1220 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह झील न केवल अपनी मनोरम सुंदरता के लिए, बल्कि नैनीताल क्षेत्र की सबसे गहरी झील (40.3 मीटर या लगभग 175 फीट) होने के कारण भी शोध का विषय रही है। यह ब्लॉग नौकुचियाताल के पौराणिक रहस्यों, इसकी वैज्ञानिक पारिस्थितिकी और यहाँ के साहसिक पर्यटन पर एक विस्तृत शोधपरक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। Naukuchia Taal Naukuchia Taal-क्या है इस जगह का पौराणिक संदर्भ और नौ कोनों का रहस्य नौकुचियाताल का नाम इसके अनूठे नौ कोनों के कारण पड़ा है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस झील का निर्माण भगवान ब्रह्मा की कठिन तपस्या के फलस्वरूप उनके आशीर्वाद के रूप में हुआ था। झील के पास ही भगवान ब्रह्मा को समर्पित एक छोटा मंदिर स्थित है, और माना जाता है कि झील की ‘परिक्रमा’ करना सौभाग्य लाता है। झील से जुड़ी सबसे रोमांचक किंवदंती यह है कि कोई भी व्यक्ति धरातल पर खड़े होकर इसकेसभी नौ कोनों को एक साथ नहीं देख सकता। स्थानीय मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति एक ही समय में सभी नौ कोनों को देखने में सफल हो जाता है, तो वह या तो मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त कर लेता है या उसकी मृत्यु हो जाती है। बोटिंग यकीन मानिए अगर आपने नौकुचियाताल में नाव की सवारी नहीं की तो आपने यहाँ की सबसे शानदार चीज मिस कर दी है। मैं उन लोगों में से हूँ जिन्हें पानी से बहुत दूर लगता है लेकिन उसके बावजूद इस झील में बोटिंग करने से मैं अपने आप को रोक नहीं पाई। अगर आप भी नौकुचियाताल का भरपूर मजा उठाना चाहते हैं तो आपको बोटिंग जरूर करनी चाहिए। एडवेंचर और बर्ड वाचिंग नौकुचियाताल साहसिक खेलों, विशेषकर पैराग्लाइडिंग के लिए उत्तर भारत के सबसे प्रमुख केंद्रों में से एक के रूप में उभरा है। पैराग्लाइडिंग का अनुभव: भीमताल की तुलना में यहाँ की उड़ानें अधिक लंबी (15 से 30 मिनट) और ऊँची होती हैं, जहाँ से नौ कोनों वाली झील का विहंगम दृश्य और साफ मौसम में हिमालय की चोटियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। पक्षी दर्शन (Bird Watching): झील के शांत वातावरण और आसपास के घने ओक व पाइन के जंगलों के कारण यहाँ पक्षियों की विविध प्रजातियां पाई जाती हैं। यहाँ एंग्लिंग (Angling), नौकायन (Rowing) और पैडलिंग की भी पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध हैं। फोटोग्राफी करने का शौक रखने वालों को ये जगह किसी जन्नत से कम नहीं लगेगी। ये जगह इतने सारे खूबसूरत नजारों का समागम है कि ये आसानी से किसी भी विदेशी शहर को पछाड़ सकती है। अगर आपके पास बढ़िया कैमरा और लेंस नहीं भी है तब भी आप यहाँ बेहतरीन तस्वीरें खींच सकते हैं। कैसे पहुंचे नौकुचियाताल नैनीताल से 26 किमी और भीमताल से मात्र 4 किमी की दूरी पर स्थित यह झील दिल्ली जैसे बड़े शहरों से लगभग 320 किमी की दूरी पर है। रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम (44 किमी) है, जहाँ से निजी या साझा टैक्सियाँ उपलब्ध रहती हैं। वायु मार्ग: सबसे पास का हवाई अड्डा पंतनगर (74 किमी) है। यहाँ की यात्रा का परफेक्ट समय: पक्षी दर्शन और शांत वातावरण के लिए वसंत (मार्च-मई) और शरद ऋतु (सितंबर-नवंबर) का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। नौकुचियाताल केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण जल संचय इकाई है। जबकि नैनीताल और भीमताल जैसी झीलें मानवीय दबाव का सामना कर रही हैं, नौकुचियाताल का जल स्तर पूरे वर्ष स्थिर रहता है, जो इसे और भी रहस्यमयी बनाता है। यहाँ का विकास स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल होना अनिवार्य है ताकि इसकी ‘वर्जिन ब्यूटी’ और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रहे। नौकुचियाताल हिमालय के चेहरे पर एक ऐसी गहरी और नीली आँख की तरह है, जिसकी गहराई में सदियों पुराने रहस्य छिपे हैं और जो ऊपर से आकाश की शांति को अपने नौ कोनों में समेटे हुए है।

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Kathgodam: Gateway of Kumaon

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उत्तराखंड के नैनीताल जिले में हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी पर बसा काठगोदाम केवल एक रेलवे स्टेशन या छोटा शहर नहीं है, बल्कि यह पूरे कुमाऊं क्षेत्र की आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय गतिविधियों का मुख्य केंद्र है। इसे “कुमाऊं का प्रवेश द्वार” (Gateway to Kumaon) कहा जाता है, क्योंकि यहाँ से पहाड़ों की वास्तविक यात्रा शुरू होती है। (Kathgodam: Gateway of Kumaon) फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम काठगोदाम के इतिहास, इसकी भौगोलिक महत्ता, गौला नदी के साथ इसके गहरे जुड़ाव के बारे में बताएँगे….. क्या है इसके नाम का रहस्य और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काठगोदाम” शब्द दो शब्दों के मेल से बना है – ‘काठ’ (लकड़ी) और ‘गोदाम’ (डिपो)। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, 20वीं शताब्दी की शुरुआत में यह लकड़ी के व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। वर्ष 1901 में यह मात्र 375 निवासियों वाला एक छोटा सा गाँव था। काठगोदाम के इतिहास में दान सिंह बिष्ट ‘मालदार‘ (Dan Singh Bisht) का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्हें ब्रिटिश भारत में ‘टिम्बर किंग’ (Timber King of India) के रूप में जाना जाता था। मालदार परिवार ने इस क्षेत्र के आर्थिक विकास में बड़ी भूमिका निभाई थी। यहाँ तक कि नैनीताल के प्रसिद्ध डी.एस.बी. कॉलेज (DSB College) की स्थापना के लिए उन्होंने 12 एकड़ जमीन और 5 लाख रुपये दान दिए थे, जिसकी सराहना तत्कालीन भारत सरकार ने भी की थी। कैसे पहुंचे काठगोदाम (Kathgodam) काठगोदाम की पहचान इसके रेलवे टर्मिनल से जुड़ी है। यह भारतीय रेलवे की पूर्वोत्तर रेलवे लाइन का अंतिम स्टेशन है। प्रमुख ट्रेनें: यहाँ से हावड़ा (बाघ एक्सप्रेस), पुरानी दिल्ली (उत्तराखंड संपर्क क्रांति और रानीखेत एक्सप्रेस) और देहरादून जैसी जगहों के लिए नियमित ट्रेनें उपलब्ध हैं। सड़क मार्ग: काठगोदाम से नैनीताल की दूरी मात्र 34 किलोमीटर है, जिसे टैक्सी या बस से लगभग 1.5 से 2 घंटे में तय किया जा सकता है। गौला नदी: Kathgodam की खूबसूरत जीवनरेखा काठगोदाम गौला (या गोला) नदी के तट पर स्थित है। गौला नदी पहाड़पानी गाँव के पास से निकलती है और लगभग 103 से 500 किमी की दूरी तय कर रामगंगा में मिल जाती है। गौला बैराज (Gaula Barrage): काठगोदाम में 1984 में गौला बैराज बनाया गया था, जो हल्द्वानी शहर के लिए पीने के पानी और भाभर क्षेत्र के खेतों के लिए सिंचाई का मुख्य स्रोत है। यह बैराज स्थानीय लोगों के लिए एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है। पर्यटन और संस्कृति: केवल एक ट्रांजिट पॉइंट नहीं अक्सर लोग काठगोदाम को केवल पहाड़ों पर जाने का पड़ाव मानते हैं, लेकिन इसके आसपास कई ‘हिडन जेम्स’ (Hidden Gems) मौजूद हैं: शीतला देवी और कालीचौड़ मंदिर: ये धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। मां शीतला मंदिर, एक धार्मिक स्थल है जो काठगोदाम में शीर्ष पर्यटक आकर्षणों में से एक है। देवी शीतला को समर्पित, इस मंदिर में स्थानीय लोगों और पर्यटकों दोनों का आना-जाना लगा रहता है। एक बार जब आप मंदिर में पहुँच जाते हैं, तो सबसे पहली चीज़ जो आपको नज़र आएगी, वह है इसकी वास्तुकला। अन्य मंदिरों के विपरीत, माँ शीतला मंदिर में कोई असाधारण वास्तुशिल्प डिज़ाइन नहीं हैं। इसके बावजूद, मंदिर अपने पर्यटकों को एक विशेष अनुभव प्रदान करता है। जब आप मंदिर में होते हैं, तो आप देवी की प्रार्थना कर सकते हैं और शांतिपूर्ण परिवेश का भी पता लगा सकते हैं। हालांकि, इस स्थान पर जाने का सबसे अच्छा समय नवरात्रि उत्सव के दौरान होता है, जब मंदिर को सुंदर रोशनी और फूलों से सजाया जाता है। एक और मंदिर जो आपकी काठगोदाम पर्यटन स्थलों की सूची में होना चाहिए, वह कालीचौड़ या काली चौर हिंदू मंदिर हैं। देवी काली को समर्पित, यह मंदिर हिंदू भक्तों के लिए बहुत महत्व रखता है। पूरे उपनगर से लोग आशीर्वाद लेने और देवी काली की पूजा करने के लिए मंदिर में आते हैं। मंदिर अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा और जीवंतता के लिए जाना जाता है। जब आप मंदिर में जाएंगे, तो आप देखेंगे कि पूरा स्थान हरियाली से घिरा हुआ है। यह एक शांत वातावरण बनाता है, जो शांति चाहने वाले लोगों के लिए एकदम सही है। हाइकिंग और ट्रैकिंग: भुजियाघाट (काठगोदाम के पास) से सातताल तक की 12 किमी की पैदल यात्रा प्रकृति प्रेमियों के लिए एक बेहतरीन अनुभव है। गौला बैराज अगर आप काठगोदाम में हरियाली वाली जगहों की तलाश कर रहे हैं, तो गौला बैराज एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। उपनगर में एक शानदार जगह के रूप में, गौला बैराज आपको गौला नदी के तट पर एक शांत वातावरण का आनंद लेने की अनुमति देता है। भले ही संरचना का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण उद्देश्यों के लिए किया जाता है, फिर भी आप क्वालिटी टाइम बिताने के लिए बैराज पर जा सकते हैं। एक बार जब आप मौके पर पहुंच जाते हैं, तो आप या तो हरे-भरे परिवेश में आराम कर सकते हैं या जगह की खूबसूरती को कैद कर सकते हैं। आप चाहें तो अपने परिवार के साथ पिकनिक का आयोजन भी कर सकते हैं। भीमताल और सातताल: काठगोदाम से मात्र 22 किमी की दूरी पर शांत झीलें और घने जंगलों का आनंद लिया जा सकता है। काठगोदाम जाने का सबसे अच्छा समय: काठगोदाम जाने का सबसे अच्छा समय मार्च से जून और सितंबर से दिसंबर के बीच है। यहाँ की स्थानीय ‘बाल मिठाई’ और ‘कुमाऊंनी रायता’ का स्वाद लेना कोई भी पर्यटक नहीं भूलता

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Eco Tourism क्या है इको-टूरिज़्म? होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन!

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अगर आप शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और शोर से परेशान हो चुके हैं और आपका मन शहर से दूर कहीं शांत, हरी-भरी जगह पर जाने का करता है जहां आपको शहर के अशांत माहौल के मुकाबले थोड़ा सुकून मिल सके। तो इको-टूरिज़्म आपके लिए बिल्कुल सही चीज़ है। इको-टूरिज़्म का मतलब सिर्फ घूमना नहीं, बल्कि उन जगहों पर जाना है जहाँ आप एनवायरनमेंट को बिना नुकसान पहुँचाए मज़ा लेते हैं और साथ ही गाँव के लोगों की रोज़ी-रोटी बढ़ाने में भी मदद करते हैं। यह ऐसा तरीका है जिससे नेचर भी बची रहती है और गाँव वाले भी कमाई कर लेते हैं जिससे दोनों का फायदा होता है। Eco Tourism गाँव की संस्कृति- Eco Tourism इको-टूरिज़्म का सीधा सा मतलब है नेचर के बीच घूमना, पर इस यात्रा के दौरान कुछ बातों का खास ध्यान रखना होता है जैसे जंगल, पहाड़, झरने या किसी भी गाँव में जाएँ तो वहाँ गंदगी न करें, कचरा इधर-उधर न फेंकें, पानी-बिजली बेवजह खराब न करें और जो भी स्थानीय नियम हों, उन्हें मानें। इसके साथ गाँव वालों की संस्कृति, उनका खाना-पीना, पहनावा और रीति-रिवाज़ को भी सम्मान दें। ऐसी यात्राओं में न केवल आपको शहर के अशांत माहौल से छुटकारा मिलेगा बल्कि गांव वालों को भी रोजगार मिलेगा। साफ हवा, शांति, नेचर का मजा यही तो इन गांवों की खासियत होती है। गांव वालों होमस्टे चला कर, गाइड बनकर, लोकल खाना खिलाकर या अपने हाथ के बनाए सामान को बेचकर ये लोग अपनी कमाई करते है। इसलिए इको-टूरिज़्म नेचर को भी बचाता है और गाँव वालों की जेब भी मजबूत करता है। मतलब मज़ा भी पूरा और भलाई भी पूरी। उत्तराखंड का होमस्टे मॉडल: महिलाएँ बदल रहीं अपनी दुनिया उत्तराखंड का होमस्टे मॉडल सच में एक ऐसी कहानी है जहाँ गाँव की महिलाएँ अपनी ज़िंदगी खुद बदल रही हैं। मुनस्यारी के पास सरमोली गाँव में 2004 में मल्लिका विर्दी ने हिमालयन आर्क होमस्टे कार्यक्रम शुरू किया, और खास बात ये है कि पूरा होमस्टे सिस्टम गाँव की महिलाएँ ही संभालती हैं। यहाँ आने वाले मेहमान मडुआ की रोटी, पहाड़ी राजमा जैसे बिल्कुल देसी और स्वादिष्ट खाने का मज़ा लेते हैं, खेतों में मदद करते हैं और गाँव की असली ज़िंदगी को करीब से महसूस करते हैं। इस मॉडल से सरमोली की महिलाएँ साल में करीब 1.5 लाख रुपये तक कमा लेती हैं, जो उनके लिए बहुत बड़ी बात है और इससे उनकी पहचान और आत्मविश्वास दोनों बढ़े हैं। राज्य सरकार ने भी ‘दीनदयाल उपाध्याय होमस्टे योजना’ के ज़रिए पुराने पहाड़ी घरों को लकड़ी और पत्थर से बने सुंदर, पारंपरिक होमस्टे में बदलने में मदद की है। सरकार ट्रेनिंग, लोन और मार्केटिंग का पूरा सपोर्ट देती है, और आज लगभग 5,000 घर इस योजना से जुड़ चुके हैं। इससे गाँव में रोजगार बढ़ा है और लोग शहरों की ओर कम जा रहे हैं, क्योंकि अब उन्हें अपने ही गाँव में अच्छी कमाई का मौका मिल रहा है। इको-स्टे: नेचर के बीच एक ‘ग्रीन’ ठहराव Eco Tourism इको-स्टे असल में ऐसे ठहरने की जगह होती हैं, जहाँ आप नेचर के बीच आराम से रहते हैं और साथ ही पर्यावरण का ख्याल भी रखते है। यहाँ ज़्यादातर बिजली सोलर से आती है, बारिश का पानी इकट्ठा करके इस्तेमाल किया जाता है, और घर भी मिट्टी, लकड़ी या दूसरे इको-फ्रेंडली तरीक़े से बनाए जाते हैं। कचरा अलग करके कम्पोस्ट बनाया जाता है, पानी दोबारा इस्तेमाल में लाया जाता है मतलब हर काम सोच-समझकर किया जाता है। जैसे जिम कॉर्बेट के पास क्यारी गाँव में बने इको-स्टे बिल्कुल पुराने पहाड़ी घरों की तरह दिखते हैं। यहाँ रहने पर आप शांत माहौल का मज़ा लेते हैं, जंगल सफारी और एडवेंचर एक्टिविटी भी कर सकते हैं। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है जैसे आप नेचर की गोद में आराम कर रहे हों। क्यारी गाँव की चुनौती: इको-टूरिज़्म और बाघों का संघर्ष क्यारी गाँव का इलाका अपनी खूबसूरती की वजह से और भी खास बन जाता है। क्योंकि जिम कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व बिलकुल पास में होने से यहाँ का जंगल घना है, हवा बिल्कुल ताज़ा लगती है और वाइल्डलाइफ़ का असली मज़ा मिलता है। यहाँ बाघों की अच्छी-खासी संख्या मिलती है, जो ये दिखाता है कि जंगल कितना हेल्दी और समृद्ध है। इसी वजह से क्यारी और उसके आस-पास का इलाका नेचर और वाइल्डलाइफ़ पसंद करने वालों के लिए एकदम परफेक्ट जगह है। यहाँ कई बढ़िया इको-स्टे और रिसॉर्ट भी बने हुए हैं, जो जिम कॉर्बेट के नेचर वाइब से मैच करते हैं लकड़ी और पत्थर के कमरे, चारों तरफ हरियाली, पंछियों की आवाज़ें और पूरा शांत माहौल सब मिलकर स्टे का अनुभव और भी खास बना देते हैं। गाँव वाले इको-टूरिज़्म को पूरी तरह सपोर्ट करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें होमस्टे, लोकल गाइड, खेती और कारीगरी जैसे कामों में अच्छी कमाई मिलती है। लोग चाहते हैं कि इको-टूरिज़्म बढ़े, लेकिन ऐसे कि जंगल भी सुरक्षित रहे और गाँव वालों की खुशी और रोज़गार भी बना रहें। राष्ट्रीय रणनीति: ग्रामीण होमस्टे को बढ़ावा भारत सरकार भी अब ग्रामीण इको-टूरिज़्म को बढ़ावा देने में लगी है। कोशिश ये है कि गाँवों में बने होमस्टे भी पर्यटन का बड़ा हिस्सा बनें और वहाँ के लोगों को अच्छा रोज़गार मिले। सरकार चाहती है कि होमस्टे चलाने वालों को बिजली-पानी की वही दरें मिलें जो सामान्य घरों को मिलती हैं, ताकि उनका खर्च कम हो सके। NIDHI पोर्टल के ज़रिए हर होमस्टे की एक डिजिटल पहचान बनाई जा रही है, जिससे ऑनलाइन बुकिंग भी आसान हो जाएगी। आखिर में बात यही है कि इको-टूरिज़्म तभी सफल है जब तीनों चीज़ें एक साथ खुश रहें प्रकृति सुरक्षित रहे, गाँव वालों की कमाई और रोजगार बढ़े और पर्यटकों को अच्छा अनुभव मिले। क्यारी गाँव जैसी जगहें यही दिखाती हैं कि इको-टूरिज़्म सिर्फ कमाई का ज़रिया नहीं, बल्कि एक संतुलन है जहाँ नेचर, लोग और टूरिज़्म तीनों को बराबर महत्व दिया जाता है। अगर ये बैलेंस बना रहे, तो ग्रामीण भारत में इको-टूरिज़्म सच में कमाल कर सकता है।

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जहाँ आस्था मिलती है आज़ादी से वही तो है -Gurdwara Data Bandi Chor Sahib – Gwalior

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ग्वालियर मध्य प्रदेश के दिल में बसा यह शहर जितना आधुनिक है, उतना ही प्राचीन कथाओं, राजसी गाथाओं और अनगिनत आध्यात्मिक अनुभवों से भरा हुआ हैं। लेकिन इस शहर का सबसे चमत्कारी रत्न है ग्वालियर का किला, जो ग्वालियर की एक ऊँची चट्टान पर शान से खड़ा है और यही तो वो किला है जिसे मुगल सम्राट बाबर ने “हिन्द के किलों में मोती” कहा था। किले की घुमावदार चढ़ाई, हवा का तेज़ बहाव, और ऊपर पहुँचकर खुलते विशाल आसमान का दृश्य यह सब मिलकर आपको किसी और समय में ले जाता है। और जब इन्हीं किले की दीवारों के बीच अचानक आपको सफेद संगमरमर से दमकता गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़ साहिब नज़र आता है, तो लगता है जैसे पूरी यात्रा किसी पवित्र मोड़ पर आकर ठहर गई हो। यह सिर्फ गुरुद्वारा नहीं बल्कि यह तो मुक्ति की कहानी, न्याय की विजय, और करुणा की शक्ति का ऐसा प्रतीक है, जिसे महसूस किए बिना इस जगह को समझा नहीं जा सकता। (Gurdwara Data Bandi Chor Sahib – Gwalior) Gurdwara Data Bandi Chor Sahib – वीरता और मुक्ति की कथा गुरु हरगोबिंद साहिब जी को ‘दाता बन्दी छोड़’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपनी खुद की रिहाई से पहले ग्वालियर किले में बंद 52 राजाओं को आज़ाद करवाया था। उनके बड़े दिल, दया और समझदारी ने उन्हें “कैदियों का दाता” बना दिया। यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि इंसानियत और करुणा की ऐसी मिसाल है जिसे जानकर आज भी हर कोई प्रभावित हो जाता है। 1606 में अपने पिता गुरु अर्जन देव जी की शहादत के बाद वे बहुत छोटी उम्र में गुरु बने और उन्होंने ‘मीरी-पीरी’ यानी धर्म और शक्ति दोनों को साथ लेकर चलने की परंपरा शुरू की। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से डरकर मुगल बादशाह जहाँगीर ने उन्हें ग्वालियर किले में कैद कर दिया, और गुरु जी ने इसे ईश्वर की परीक्षा मानकर शांति से स्वीकार कर लिया। गुरु जी कई सालों तक इसी किले में रहे| पर एक रोज जब जहांगीर की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई और वह मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगा, तो उसे इस हालत में देखकर उसकी पत्नी नूरजहां बहुत दुखी होने लगी। और तभी उसने एक फकीर से इसके पीछे का कारण पूछा। फकीर ने बताया कि जहांगीर ने सिखों के धर्मगुरु गुरु हरगोविंद जी को कैद कर रखा है, और अगर उन्हें जल्द रिहा नहीं किया गया तो बादशाह के पूरे कुल पर संकट आ सकता है। यह सुनकर नूरजहां डर गई और उसने सारी बात जाकर जहांगीर को बताई। जैसे ही जहांगीर को यह बात पता चली, उसने तुरंत गुरु हरगोविंद जी को रिहा करने का आदेश दे दिया। लेकिन जब यह संदेश गुरु जी तक पहुँचा, तो उन्होंने अकेले बाहर आने से साफ़ मना कर दिया। उन्होंने कहा—”मेरे साथ जो 52 राजा कैद हैं, अगर उन्हें आज़ाद किया जाए तभी मैं बाहर जाऊंगा।” जहांगीर ने गुरु की बात तो मान ली पर एक शर्त रख दी कि गुरु जी के साथ वही राजा बाहर जा सकेंगे, जो गुरु जी की चोला (पोशाक) के किसी एक छोर को पकड़ेंगे। यह सुनकर गुरु जी ने 52 छोरों वाला एक खास चोला बनवाया। हर एक राजा ने एक छोर पकड़ा और इस तरह सभी 52 राजा गुरु जी के साथ जेल से बाहर निकल आए। यह घटना इस बात की मिसाल है कि कभी-कभी आज़ादी तलवार से नहीं, बल्कि बुद्धि, करुणा और सही सोच से मिलती है। Gurdwara Data Bandi Chor Sahib : एक पवित्र विरासत गुरुद्वारा दाता बन्दी छोड़ साहिब ग्वालियर किले की ऊँचाई पर बना ऐसा स्थान है, जहाँ पहुँचते ही मन खुद-ब-खुद शांत हो जाता है। पहले यह जगह सिर्फ एक साधारण संगमरमर का चबूतरा थी, लेकिन 1970–80 के दशक में इसे आज जैसा सुंदर गुरुद्वारा परिसर बनाया गया। चमकता हुआ सफेद संगमरमर, बड़ा सा शांत हॉल, भव्य दरबार साहिब और हवा में लगातार गूँजता कीर्तन—सब मिलकर इस जगह को बेहद खास बना देते हैं। ऊपर से पूरे ग्वालियर शहर का शानदार नज़ारा भी दिखाई देता है। किले की भीड़भाड़ से निकलकर जैसे ही आप गुरुद्वारे में कदम रखते हैं, तो ऐसा लगता है कि एकदम से माहौल बदल गया हवा भी धीमी हो जाती है और मन को एक अनोखी शांति महसूस होती है। बन्दी छोड़ दिवस- रोशनी और आज़ादी का त्योहार जब गुरु हरगोबिंद जी अमृतसर लौटे, तो लोगों ने दीयों से पूरा शहर सजा दिया और उनका ज़ोरदार स्वागत किया। तभी से इस दिन को “बन्दी छोड़ दिवस” कहा जाने लगा, जो ज़्यादातर दिवाली के दिन ही मनाया जाता है। ग्वालियर किले से जब हजारों दीये जलते दिखाई देते हैं और गुरुद्वारे में “सत नाम श्री वाहेगुरु” की आवाज गूंजती है, तो मन अपने आप ही हल्का हो जाता है जैसे अंदर की कोई पुरानी गाँठ खुल गई हो। यात्रा गाइड: कैसे पहुँचें?

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Hidden Gems- भारत के ये 4 पर्यटन स्थल आपको ज़रूर देखने चाहिए

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अगर आप भी घूमने-फिरने के बहुत शौकीन हैं, तो आपको ज़रूर जाना चाहिए इन चार हिडन जेम पर। यह प्रकृति, रहस्य और रोमांच से भरी हुई हैं। यहाँ की सुंदरता, खाना, पहनावा और लोगों का रहन-सहन आपके मन को एक अलग ही प्रकार का सुकून देगा। क्योंकि ये ऑफबीट डेस्टिनेशन में से एक हैं, तो आपको यहाँ भीड़भाड़ न के बराबर मिलेगी, पर मज़े और रोमांच फेमस डेस्टिनेशन से ज़्यादा मिलेंगे क्योंकि ये भारत के उन रत्नों में से एक हैं जो अभी तक छिपे हुए हैं। (Hidden Gems) मेचुका, अरुणाचल प्रदेश मेचुका अरुणाचल प्रदेश के सुदूर पूर्वी हिमालय की एक शांत घाटी है, जिसे एक “छिपा हुआ स्वर्ग” और “पोस्टकार्ड से बाहर निकली हुई घाटी” भी कहा जाता है। यह शहर की भागमभाग, व्यस्त जिंदगी से बहुत दूर एक शांतमय वातावरण में बर्फ से ढकी चोटियों, हरे-भरे जंगलों और शांत सियांग नदी से घिरा हुआ है। साथ ही यह तिब्बती एवं भारतीय संस्कृति का एक अनोखा मेल-मिलाव है, जिसे देखकर मानो हम दो संस्कृतियों को एक साथ ही देख लेते हों। इस घाटी की पहचान इसके 400 साल पुराने समतेन योंगचा मठ, पारंपरिक लकड़ी के घरों और स्थानीय लोगों के अच्छे बर्ताव से होती है, जो कि यात्रा प्रेमी लोगों के लिए एक शानदार जगह बन जाती है। “वेस्ट सियांग” क्षेत्र में स्थित मेचुका ट्रैक 6 से 7 दिनों का एक “सांस्कृतिक ओडिसी” ट्रैक है। हालांकि यह ट्रैक बहुत कठिन नहीं होता, पर इसे बहुत सरल मानने की गलती भी न करें। यह ट्रैक जनजातीय संस्कृति, बांस जंगलों और नदी घाटियों से होकर गुजरता है,जिसकी सुंदरता हमारे मन में ऐसे बस जाती है जैसे मानो हमने कोई स्वर्ग देख लिया हो। यहाँ जाने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से अप्रैल/मार्च के बीच का है। हालांकि ऊँचाई वाले स्थानों की तरह यहाँ भी बर्फ और जमा देने वाले तापमान के कारण सर्दियों में (दिसंबर से फरवरी) यह ट्रैक दुर्गम हो सकता है तथा इन महीनों में केवल अनुभवी यात्रियों को ही जाना चाहिए, जो कठोर परिस्थितियों के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। तीर्थन घाटी, हिमाचल प्रदेश तीर्थन घाटी हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की एक ऐसी मनमोहक जगह है, जिसे लोग “प्राचीन स्वर्ग” भी कहते हैं। यह मनाली या शिमला जैसे स्थलों से दूर, जहाँ अक्सर पर्यटकों की भीड़ होती है, प्रकृति की गोद में छुपा हुआ है। इस ऑफबीट डेस्टिनेशन का नाम “क्रिस्टल क्लियर तीर्थन नदी” के नाम पर रखा गया है, जो यहाँ के अद्भुत दृश्य, स्वच्छ नदियों और ऊँची-ऊँची हिमालय की पहाड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। यह घाटी केवल सुंदरता के लिए ही फेमस नहीं है, बल्कि यह “ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क का प्रवेश द्वार” भी है, जो कि यूनेस्को विश्व धरोहर भी है। इसी कारण यह नेचर लवर्स और एडवेंचर करने वाले लोगों के लिए एक आदर्श स्थान है। यहाँ चारों तरफ पेड़-पौधों से घिरे जंगलों में ट्रैकिंग करके दुर्लभ वन्यजीवों को देखा जा सकता है। इसके साथ-साथ यह स्थान मछली पकड़ने और सामान्य जानवरों को देखने के लिए भी बहुत अच्छा है। यहाँ की सबसे खास बात यह है कि आप यहाँ पर आरामदायक लकड़ी के कॉटेज में रहने का एक्सपीरियंस ले सकते हैं, साथ ही पंछियों और बहती नदियों की आवाज़ों का मज़ा ले सकते हैं। तीर्थन घाटी जाने का सही समय तीर्थन घाटी जाने का सबसे अच्छा समय मार्च से जून है, जब बसंत ऋतु दरवाजे पर दस्तक देती है और हर जगह हरियाली, फल, फूल खिले होते हैं और हल्की-हल्की गर्मियों की शुरुआत हो जाती है। इस समय यहाँ घूमने का एक अलग ही मज़ा है। साथ ही सितंबर से नवंबर, जब पतझड़ का समय होता है और सर्दियाँ मानो हमारे दरवाज़े पर दस्तक देने को खड़ी हों — यह समय भी यहाँ घूमने का सबसे बेस्ट होता है। वैसे तो यहाँ सर्दियों यानी दिसंबर से फरवरी में भी आराम से घूमा जा सकता है, लेकिन यहाँ आने वाली सड़कों पर बर्फ गिरने के कारण और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस समय यहाँ न आने की सलाह दी जाती है। चोपता, उत्तराखंड चोपता, उत्तराखंड में स्थित एक ऐसी जगह है जिसे भारत का मिनी स्विट्ज़रलैंड कहते हैं। ऊँची-ऊँची हिमालय की चोटियों से चारों ओर से घिरा हुआ एक हरा-भरा घास का मैदान, जिसे एक छोटा हिल स्टेशन भी कहा जाता है। यह ट्रैकिंग, कैंपिंग और प्रकृति की सैर के लिए एकदम सही जगह है। साथ ही इसकी सबसे खास बात यह है कि यहाँ अन्य हिल स्टेशनों के मुकाबले सबसे कम भीड़ होती है। अपनी ओर खींच लेने वाली सुंदरता होने के बावजूद चोपता भारत के सबसे अनदेखे स्थानों में से एक है। ट्रैकर्स और एकांत चाहने वालों के लिए यह एक शानदार जगह है। यहीं से तुंगनाथ मंदिर का ट्रैक शुरू होता है, जो दुनिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर माना जाता है। यहाँ से केवल तुंगनाथ मंदिर ही नहीं, बल्कि चंद्रशिला चोटी तक भी जाया जाता है, जहाँ बर्फ से ढके हिमालय के अद्भुत दृश्य दिखाई देते हैं, जो किसी चमत्कार से कम नहीं लगते।चोपता जाने का बेस्ट टाइम मार्च से मई तक का होता है क्योंकि इस दौरान तापमान 8 से 15 डिग्री सेल्सियस रहता है और इसी समय आपको आदर्श ट्रैकिंग की स्थितियाँ मिलती हैं। हालांकि अक्टूबर से फरवरी या दिसंबर से फरवरी के दौरान भी यहाँ जाया जा सकता है, पर इस समय ज्यादातर अनुभवी यात्रियों को ही जाने की सलाह दी जाती है क्योंकि इस समय बर्फबारी और कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। जालोर किला, राजस्थान जालोर किला, जो राजस्थान के जालोर शहर के बीचों-बीच स्थित है, आकर्षक रत्नों में से एक है। इस किले का निर्माण दसवीं शताब्दी में परमार राजवंश द्वारा किया गया था। यह किला 1200 फीट की ऊँचाई पर स्थित एक ऊँची पहाड़ी पर बना है। यह पहाड़ी इतनी ऊँची है कि आने वाले सभी पर्यटकों का ध्यान स्वतः ही इस पर चला जाता है। यह किला भारत की सबसे अद्भुत रचनाओं में से एक माना जाता है। इस किले की खासियत सिर्फ इसकी बनावट नहीं, बल्कि इसका इतिहास भी है। इस किले ने चौहानों, परमारों, पोपाबाई और अंत में मुसलमानों सहित कई विजेताओं को देखा है। इस किले की खास बात यह भी है कि

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ये हैं भारत में सस्टेनेबल ट्रैवल के आसान और सबसे सस्ते तरीके- Sustainable Travel

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आज के समय में जब हम पर्यावरण को लेकर जागरूक हैं, तो यात्रा करना अक्सर एक नैतिक दुविधा बन जाता है, खासकर जब हम लंबी दूरी की यात्रा करते हैं। लेकिन अच्छी खबर यह है कि भारत में टिकाऊ यात्रा यानी सस्टेनेबल ट्रैवल (Sustainable Travel) करना आपकी सोच से कहीं ज्यादा आसान है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट के मामले में भारत दुनिया में सबसे नीचे है। इसलिए अगर आप भी लोकल लोगों की तरह यात्रा करते हैं, तो आपकी यात्रा स्वाभाविक रूप से सस्ती और पर्यावरण को बिना नुकसान पहुँचाए की जा सकती है। आज हम इस पेशकश से जानेंगे कि कैसे हम अपनी यात्रा को सस्ता और सस्टेनेबल बना सकते हैं। परिवहन का देसी मंत्र ट्रेन और बस Sustainable Travel हम अक्सर सुनते हैं कि पूरे देश में प्रदूषण दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है, जिसका एक कारण यात्रा के दौरान प्रयोग होने वाले परिवहन से भी है। इसलिए आप परिवहन का सबसे सस्ता और टिकाऊ विकल्प चुनकर न केवल अपने खर्च को, बल्कि पर्यावरण को दूषित होने से भी बचा सकते हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक होने का दावा करता है, जो मुख्य रूप से लोगों को ले जाने के लिए बना है। भारत में ट्रेन को अक्सर यात्रा का सबसे सस्ता तरीका माना जाता है। यदि आप नॉन एसी क्लास चुनते हैं, तो आप संभवतः सबसे टिकाऊ परिवहन मोड का इस्तेमाल कर रहे होंगे, और ट्रेन का किराया लंबी दूरी की बसों से भी कम होता है। साथ ही जिन रास्तों पर ट्रेन नहीं होती, जैसे कि पहाड़ों में वहाँ लोकल बसें, प्राइवेट टैक्सी या रिक्शे का उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा शहरों के भीतर पैदल चलना या साइकिल चलाना पर्यावरण और बजट दोनों को लाभ पहुँचाता है। साथ ही इस उपाय से आप लोकल लोगों से भी घुल-मिल पाएंगे, जो आपकी यात्रा में चार चाँद लगा देगा। ठहरने का जुगाड़ होमस्टे, हॉस्टल और धीमी यात्रा बड़े होटल और लक्ज़री रिसॉर्ट से बचना लागत को कम करने का एक शानदार तरीका है। इसके बजाय लोकल रूप में संचालित होमस्टे और हॉस्टल चुनें। ये होटल और रिसॉर्ट की तुलना में छोटे होते हैं। होमस्टे अक्सर एक भारतीय घर की तरह ही चलाए जाते हैं, जहाँ एसी सीमित रूप से उपयोग किया जाता है और पानी का भी समझदारी से इस्तेमाल होता है। यहाँ आपको घर जैसा खाना भी मिलेगा।हॉस्टल भी एक सस्ता और आरामदायक विकल्प है, जहाँ आपको 100 से 500 रुपये तक में बिस्तर मिल सकता है। #Sustainable Travel यदि आप किसी एक जगह पर लंबे समय तक ठहरते हैं यानी स्लो ट्रेवल करते हैं, तो यह परिवहन खर्च को कम करता है और लंबे समय के लिए बेहतर आवास सौदे मिल जाते हैं। आप कोउचसर्फिंग जैसे हॉस्पिटलिटी नेटवर्क का उपयोग करके मुफ्त आवास भी पा सकते हैं या वॉलंटियर करने के बदले में मुफ्त भोजन और ठहरने की सुविधा भी मिल सकती है। खान-पान: सस्ता, शाकाहारी और स्वादिष्ट पर्यावरण पर सबसे कम प्रभाव डालने वाला खाना- यानी शाकाहारी या कम मांस वाला भोजन भारत में अक्सर सबसे सस्ता विकल्प होता है। भारत उन लोगों के लिए स्वर्ग है जो मांस से बचना चाहते हैं, क्योंकि यहाँ अनगिनत किफायती विकल्प मौजूद हैं। बाहर से मंगाए गए पैकेज्ड फूड और फास्ट फूड चेन के बजाय लोकल मार्केट और स्ट्रीट फूड का चयन करना सस्ता और टिकाऊ होता है, क्योंकि इसमें पैकेजिंग कम होती है। आपको 100 रुपये से भी कम में स्वादिष्ट और पेट भरने वाला भोजन मिल सकता है। वाराणसी, ऋषिकेश, पुष्कर जैसे स्थान न सिर्फ़ सस्ते ठहरने के लिए बेहतर हैं, बल्कि यहाँ शुद्ध शाकाहारी और सस्ता खाना भी आसानी से उपलब्ध होता है जो टिकाऊ बजट यात्रा के लिए आदर्श है। जिम्मेदार यात्री बनें छोटे-छोटे स्मार्ट फैसले बजट-अनुकूल और टिकाऊ यात्रा के लिए छोटे लेकिन समझदारी भरे फैसले लेना जरूरी है। सबसे पहले अपने साथ रीफिलेबल पानी की बोतल दोबारा उपयोग होने वाला शॉपिंग बैग, टिफिन बॉक्स, जैसी चीजें पैक करें। ऐसा करने से आप बोतलबंद पानी या पैकेज्ड स्नैक्स खरीदने से बचते हैं जिससे पैसे बचते हैं और प्लास्टिक कचरा भी कम होता है। इसके अलावा यात्रा के लिए नवंबर से फरवरी के अंत तक का समय बेहतर रहता है, क्योंकि मौसम आरामदायक होता है और आप एसी का उपयोग करने से बच सकते हैं। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की ओर से पाँच सुझाव

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आगरा किले का दीवान-ए-आम: यहाँ ही सुनी जाती थी जनता की फरियाद

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आगरा किला मुगल शासनकाल का एक ऐसा किला है जिसे मुगलों की शान माना जाता है। यह मुगल काल का सबसे बड़ा किला कहा जाता है और यही एकमात्र किला था जिसे मुगल बादशाहों ने अपने रहने के लिए बनवाया था। मुगल काल में बादशाह अकबर ने आगरा को अपनी राजधानी बनाया था, इसी कारण आगरा का किला उस समय का सबसे महत्वपूर्ण और विशाल किला माना जाता है। इस किले के भीतर कई महल और कुछ अनोखी बनावटें हैं, जिनमें सबसे खास दीवान-ए-आम है। फाइव क्लास ऑफ ट्रैवल ब्लॉग में आपने आमेर किले का दीवान-ए-आम तो देखा होगा, लेकिन आज हम आपको आगरा किले के दीवान-ए-आम के बारे में बताएँगे, जो आमेर किले से कई गुना बड़ा और अधिक भव्य है। दीवान-ए-आम की बनावट और खूबसूरती दीवान-ए-आम एक बहुत बड़ा और खुला सा हॉल होता है जो चारों तरफ बड़े-बड़े खभों से गिरा होता है। जैसे ही आप इसके अंदर कदम रखते हैं, सबसे पहले आपकी नज़र इसकी ऊँची-ऊँची खूबसूरत खंभों और मेहराबों पर जाती है, जो इसे बेहद शाही लुक देती हैं। हॉल के ठीक बीच में संगमरमर से बना एक ऊँचा सा झरोखा है, जिसे तख्त-ए-मुरस्सा कहा जाता है। इसी जगह पर बैठकर मुगल बादशाह दरबार लगाते थे और लोगों की बातें सुनते थे। बादशाह की सीट से थोड़ा नीचे एक छोटी सी संगमरमर की बैठक बनी हुई है, जहाँ वज़ीर बैठता था। आम लोग अपनी शिकायतें और अर्ज़ियाँ वज़ीर को बताते थे और वज़ीर वही बातें आगे बादशाह तक पहुँचाता था। आज भी दीवाने आम का पूरा माहौल ऐसा लगता है जैसे आज भी वहाँ बादशाह आम जनता के फैसले सुना रहे हो। दीवाने आम में कैसे होता था इंसाफ? इस जगह का सबसे बड़ा और खास काम था लोगों को इंसाफ दिलाना। दूर-दूर के इलाकों से लोग अपनी परेशानी और शिकायतें लेकर यहाँ आते थे। बादशाह खुद सबकी बातें ध्यान से सुनते थे और फिर जो सही लगता था, उसका फैसला सुनाते थे। अगर कोई बहुत वफादार होता या किसी ने अच्छा काम किया, तो उसे यहीं सबके सामने इनाम दे के सम्मानित किया जाता था। दरबार के काफ़ी सख्त नियम होते थे हर अधिकारी अपनी हैसियत और ओहदे के हिसाब से तय जगह पर ही खड़ा होता था। बादशाह के पास कोई भी यूँ ही नहीं जा सकता था, इसलिए उनके और दरबारियों के बीच सोने की परत वाली एक रेलिंग लगी होती थी। पूरा माहौल बहुत अनुशासित और रुतबे वाला लगता होगा, जिससे साफ़ पता चलता था कि यहाँ कानून और व्यवस्था को कितनी अहमियत दी जाती थी। रानियों के लिए बनाया गया पर्दे के पीछे आम दरबार एक और दिलचस्प बात ये है कि बादशाह के सिंहासन के ठीक पीछे संगमरमर की जाली वाली खिड़कियाँ बनी हुई थीं। इन जालियों के पीछे से महल की शाही महिलाएँ बिना किसी की नज़र में आए पूरे दरबार को देख सकती थीं। उन्हें सब कुछ साफ़ दिखाई देता था, लेकिन बाहर खड़े लोगों को पता भी नहीं चलता था कि पीछे कोई मौजूद है। इससे साफ़ समझ आता है कि उस ज़माने में पर्दे और परंपराओं का कितना ध्यान रखा जाता था। साथ ही सुरक्षा का भी पूरा इंतज़ाम किया जाता था, ताकि शाही परिवार सुरक्षित रहे और दरबार की गरिमा बनी रहे। क्यों देखें दीवान-ए-आम? दीवान-ए-आम सिर्फ एक इमारत नहीं है, बल्कि यह मुगल शासन के दौर को साफ़ तौर पर दिखाता है, जहाँ बादशाह खुद को अपनी जनता का रक्षक मानते थे और उनकी बातें सीधे सुनते थे। आज की आसान भाषा में कहें तो यह उस ज़माने का Public Grievance Cell था, जहाँ राजा और आम लोगों के बीच बिना किसी रुकावट के सीधा संवाद होता था। इसलिए जब भी आप आगरा किला घूमने जाएँ, तो दीवान-ए-आम में थोड़ा समय ज़रूर बिताइए, कुछ पल रुककर आँखें बंद कीजिए और सोचिए कि कभी इसी जगह दरबार लगा करता था, लोग अपनी फरियाद लेकर आते थे और इतिहास के बड़े-बड़े फैसले लिए जाते थे। Five Colors of Travel की ओर से 5 सुझाव-

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Jim Corbett, Kaladhungi जिम कॉर्बेट- जीवन, म्यूज़ियम, इतिहास

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रामनगर से मात्र 30 किलोमीटर दूर हरे-भरे कालाढूंगी गांव में स्थित है एक ऐसा संग्रहालय, जो एक समय पर जिम कॉर्बेट (Jim Corbett) घर हुआ करता था। जी हाँ, वही जिम कॉर्बेट जिसके नाम पर भारत का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान बनाया गया है। यह केवल एक संग्रहालय नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक शिकारी से संरक्षणवादी बने जिम कॉर्बेट के जीवन और उपलब्धियों को श्रद्धांजलि है। इस संग्रहालय को छोटी हल्द्वानी भी कहते हैं। चारों तरफ हरियाली से घिरा यह संग्रहालय अपने आप में ही एक अद्भुत संरचना प्रतीत होती है। कौन थे जिम कॉर्बेट? एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट, जिन्हें दुनिया जिम कॉर्बेट के नाम से जानती है इनका जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षा नैनीताल से ही ग्रहण की। वे पिता क्रिस्टोफर और माता मेरी जेन की आठवीं संतान थे। वे हमेशा अपनी सर्दियाँ कालाढूंगी में तथा गर्मियाँ नैनीताल में बिताते थे। दो खूबसूरत जगहों पर रहने की वजह से उन्हें वनों और वन्यजीवों से गहरा लगाव हो गया। उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने रेल विभाग में और उसके बाद सेना में कार्य किया। वे प्रकृति प्रेमी होने के साथ-साथ एक अच्छे लेखक, शिकारी और प्रकृतिविद भी थे। माना जाता है कि उन्होंने 40 से अधिक आदमखोर बाघों को मारकर गांव वालों की रक्षा की। गांव वालों द्वारा जिम कॉर्बेट को लिखे गए पत्र आज भी जिम कॉर्बेट संग्रहालय में मौजूद हैं। उन्होंने विवाह नहीं किया था और उन्होंने अपना ज्यादातर समय अपनी बहन मैरी के साथ बिताया। सन् 1947 में जिम कॉर्बेट ने अपनी बहन के साथ केन्या बसने का निर्णय लिया। जिम कॉर्बेट की अधिकतर किताबें केन्या प्रवास के दौरान ही प्रकाशित हुईं। जिम कॉर्बेट का प्रकृति प्रेम जिम कॉर्बेट न केवल शिकारी और लेखक थे बल्कि एक प्रकृति प्रेमी भी थे। उन्होंने नैनीताल नगर पालिका सदस्य के रूप में कार्य किया, जिसके दौरान उन्होंने नैनीताल में एक पक्षी विहार बनाने का प्रस्ताव रखा। साथ ही उन्होंने मछलियों के संरक्षण के लिए भी कार्य किया और कई कानून एवं निर्देश पारित करवाए। यहां तक कि नैनीताल की सार्वजनिक निर्माण समिति की अध्यक्षता करते हुए कॉर्बेट ने वनों की कटाई पर नियंत्रण किया और बकरियों द्वारा चराई के कारण वनों को होने वाली क्षति को भी रोका। क्या है जिम कॉर्बेट संग्रहालय संग्रहालय में जाकर आप जिम कॉर्बेट की निजी वस्तुएँ और उनके द्वारा प्रयोग की जाने वाली चीज़ों को देख सकते हैं। इनमें उनकी बंदूक, टोपी, थैला, पत्र, तस्वीरें और पांडुलिपियाँ शामिल हैं। ये वस्तुएँ आपको जिम कॉर्बेट के रहन-सहन, पहनावे और उनके जीवन के बारे में सामान्य जानकारी प्रदान करती हैं। बहुत से लोग यह बात नहीं जानते कि जिम कॉर्बेट ने दोनों विश्वयुद्धों में भाग लिया था। कॉर्बेट संग्रहालय जिम कॉर्बेट के जीवन की प्रमुख घटनाओं से आपको रूबरू कराता है। जिम कॉर्बेट जाने का सही समय जिम कॉर्बेट जाने का सबसे अच्छा समय नवंबर से मार्च तक माना जाता है। इस समय मौसम सामान्य रूप से ठंडा, सुहावना और घूमने के लिए बिल्कुल उपयुक्त होता है। सर्दियों के दौरान नमी कम होती है और आसमान साफ रहता है, जिससे जंगल के भीतर दूर तक देखने में आसानी होती है और फोटो खींचने का अनुभव भी बहुत अच्छा होता है। इस समय तापमान कम होने की वजह से आप बिना किसी परेशानी के लंबे समय तक संग्रहालय और आसपास की प्राकृतिक जगहों का आनंद ले सकते हैं। नवंबर से मार्च का मौसम वन्यजीवों की गतिविधियों को देखने के लिए भी उपयुक्त माना जाता है। इसके अलावा इस समय पर्यटकों की आवाजाही भी संतुलित रहती है, इसलिए आप शांति के साथ यहां की प्रकृति को महसूस कर सकते हैं और संग्रहालय में मौजूद प्रदर्शनों को आराम से देख सकते हैं। कुछ सुझाव यहाँ जिम कॉर्बेट संग्रहालय के अलावा और भी कई पर्यटन स्थल हैं। यदि आप जिम कॉर्बेट आने का प्लान कर रहे हैं, तो इन नज़दीकी जगहों पर ज़रूर जाएँ- कॉर्बेट फॉल्स, हनुमान धाम और जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान। यहाँ कैसे पहुँचें कॉर्बेट संग्रहालय कालाढूंगी से 3 किमी दूर रामनगर रोड पर स्थित है। रामनगर से कालाढूंगी के लिए नियमित टैक्सी और बसें उपलब्ध हैं। निकटतम रेल संपर्क रामनगर रेलवे स्टेशन (30 किमी) है। पंतनगर हवाई अड्डा या दिल्ली IGI हवाई अड्डे के माध्यम से भी यहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है। मनोरंजन के लिए क्या-क्या करें?

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Gurudwara Sisganj Sahib- शीशगंज साहिब गुरुद्वारा, दिल्ली

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अगर आप लाल किला और चांदनी चौक घूमने आते हैं और आपको गुरुद्वारा जाना पसंद है तो, आप शीशगंज साहिब गुरुद्वारा (Gurudwara Sisganj Sahib) का रुख कर सकते हैं। रुमाल से ढके हुए सिर और चेहरे पर सुकून को देखकर ही कोई यह बता सकता है कि, यह व्यक्ति गुरुद्वारा से होकर आया है। गुरुद्वारा है ही ऐसा जगह! यहां आप ना सिर्फ भगवान की आराधना कर सकते हैं बल्कि पुण्य का काम भी कर सकते हैं। कुछ लोगों को गुरुद्वारा इसलिए जाना पसंद होता है क्योंकि वह अपने जीवन के सभी कष्टों को दूर करना चाहते हैं, तो कुछ वह सुकून की तलाश में गुरुद्वारा जाते हैं। कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो धन से परिपूर्ण होने के बाद भी वहां जाकर समाज सेवा करना चाहते हैं। वहीं कुछ लोग बस एक पर्यटक के तौर पर गुरुद्वारा जाते हैं। गुरुद्वारे जाने के सबके कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन गुरुद्वारे से बाहर निकलते वक्त सबके चेहरे पर चमक और सुकून एक जैसा ही होता है। दिल्ली में कुल 9 प्रमुख गुरुद्वारे हैं और उन्हीं में से एक है चांदनी चौक स्थित शीश गंज साहिब गुरुद्वारा। तो आइए फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताते हैं इस विशेष ऐतिहासिक महत्व वाले गुरुद्वारे के बारे में! Gurudwara Sisganj Sahib -इतिहास इस गुरुद्वारे का इतिहास बहुत ही मार्मिक रहा है। यह गुरुद्वारा उस जगह पर स्थित है जहां मुगल बादशाह औरंगजेब ने सिक्खों के नौंवे गुरु, गुरु तेग बहादुर सिंह का गला काट दिया था। बताया जाता है कि, गुरु तेग बहादुर सिंह के शहादत के बाद उनके सिर को भाई जैता जी आनंदपुर साहिब ले गए और उनके धड़ (पवित्र शरीर) को लक्खी शाह वणजारा ने अपने घर ले जाकर वहां उनका अंतिम संस्कार किया। जिस स्थान पर गुरु तेग बहादुर सिंह जी का अंतिम संस्कार किया गया उस स्थान को आज रक़ीब गंज साहिब के नाम से जाना जाता है। इस गुरुद्वारे का निर्माण श्री बघेल सिंह द्वारा 1783 में करवाया गया था। निर्माण के कुछ वर्षों पश्चात इसे सोने से मंडवाया भी गया। गुरु तेग बहादुर सिंह के शहादत की याद में बनाया गया यह गुरुद्वारा आज भी सिक्खों के आस्था का केंद्र है। गुरुद्वारे के सामने रोड के दूसरे ओर सती दास जी, मती दास जी और दयाला जी के याद में स्मारक बनाए गए हैं। बताया जाता है कि यहां मती दास जी को आरे से काट दिया गया था। सती दास जी को रुई में लपेटकर जला दिया गया और दयाला जी को उबलते देग में डाल कर उबाल दिया गया था। गुरुद्वारा के सामने औरा स्मारक के बगल में हीं मती दास म्यूजियम भी है जहां उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को गहराई से जाना जा सकता है। इस गुरुद्वारे को सेना भी करती है सलाम आपको यह जानकर हैरानी होगी कि, गणतंत्र दिवस की परेड में भारतीय सेना के सिक्ख रेजीमेंट के जवान राष्ट्रपति को सलामी देने के बाद गुरुद्वारा शीश गंज साहिब पर भी सलामी देते हैं। इस गुरुद्वारे को मिलने वाला यह सम्मान इसे अन्य गुरुद्वारों से अलग बनाती है। प्राचीन स्थापत्य कला की दिखती है यहां झलक: यह गुरुद्वारा हल्के केसरिया और सफेद रंग के पत्थरों से बना हुआ है। इसके गुंबदों को सोने से मंडवाया गया है। इस गुरुद्वारे में उस कुए को भी संरक्षित किया गया है जहां गुरु तेग बहादुर ने अंतिम बार स्नान किया था। भक्तगण यहां जाकर भी मत्था टेकते हैं। गुरुद्वारा दो मंजिलों में बँटा हुआ है। जिसमें निचली मंजिल में जूता घर, सामान घर, पैर हाथ धोने के जगह, पीने के पानी की व्यवस्था और पार्किंग है। वहीं पहली मंजिल पर मुख्य गुरुद्वारा और लंगर घर है। गुरुद्वारे के दीवारों पर हर जगह पंजाबी भाषा में उपदेश खुदवाए गए हैं। गुरुद्वारे के मुख्य भवन में तख्त के सामने का स्थान लोगों के बैठने के लिए है। मुख्य भवन के सामने वाले भवन में लंगर गृह है। जहां एक साथ 100 से भी अधिक लोगों को बिठा कर खिलाया जा सकता है। यहां लोग अपनी स्वेच्छा से सेवा भी कर सकते हैं और बर्तनों को साफ करने में मदद भी कर सकते हैं। लंगर और प्रसाद लोग तख्त के सामने मत्था टेकने के बाद वहां से निकलकर प्रसाद लेने जाते हैं। जहां शुद्ध घी और आटे की बनी हलवा प्रसाद में दी जाती है। इस हलवे के स्वाद की बराबरी दुनिया का कोई भी व्यंजन नहीं कर सकता, क्योंकि यह हलवा एक व्यंजन नहीं बल्कि भगवान का प्रसाद है जिसे आस्था और प्रेम भाव से तैयार किया जाता है। हलवा खाने के बाद लोग लंगर गृह में लंगर खाने जाते हैं। जहां आपको थाली देने से पहले वह आपसे वाहेगुरु जी की जय बोलने को कहेंगे। जिसके बाद लंगर के लिए लगी पंक्तियों में बैठकर लंगर का प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं। गुरुद्वारे में हो रही गुरबाणी की मधुर ध्वनि, आपके मन में सकारात्मकता का संचार करती है। गुरुद्वारे में जाकर मन तो शांत होता हीं है, साथ ही साथ यहां जाने से जीवन में एक तहजीब और अनुशासन आता है। उम्मीद है इस ब्लॉग में दी गई जानकारी आपके लिए हेल्पफुल होगी।