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Lodhi Garden Delhi

Lodhi Garden: लोधी गार्डन- मकबरों और बागों का स्वर्ग

हम दिल्ली वालों के लिए बारिश किसी वरदान से कम नहीं है। खासतौर पर तब जब हद से ज्यादा गर्मी पड़ रही हो। जून हो या जुलाई, दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी घर से बाहर निकलने नहीं देती। ऐसे में बारिश का सुहावना मौसम बन जाए तो फिर दिल्ली दर्शन की बात ही क्या। समझ लीजिए आनंद के सागर में डुबकी लगा ली। पिछले दो दिनों से लगातार हो रही बारिश अब थम चुकी थी। मौसम को देखते हुए योजना बनी लोधी गार्डन घूमने की।(Lodhi Garden)

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अब आप सोचेंगे इसमें ऐसा क्या खास है तो बता दें ये केवल एक गार्डन नहीं बल्कि मकबरों से सुसज्जित एक परिसर है, जिसे पर्यटन के लिहाज से गार्डन का नाम दे दिया गया है। प्रकृति प्रेमी बंधुओं के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं। इसकी खूबसूरती और इतिहास इतना खास है जिसे जानने के बाद आप खुद को इस जगह जाने से रोक नहीं पाएंगे

कैसे पहुंचे लोधी गार्डन

लोधी गार्डन मेन लोधी रोड, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के पास स्थित है। लोधी गार्डन जेएनएल मेट्रो स्टेशन से चंद कदम की दूरी पर ही है। खास बात ये कि लोधी गार्डन की एंट्री बिलकुल फ्री है।

बड़ा गुबंद

जैसे ही हमनें गार्डन में प्रवेश किया अंदर जाते हुए केवल पेड़ पौधे ही नजर आ रहे थे। कुछ कदम आगे बढ़ते ही एक बेहद आकर्षक इमारत दिखी। ये था बड़ा गुबंद। सबसे जरूरी बात ये पूरा परिसर लोधियों के अंतर्गत हुआ करता था। आज इस परिसर में लोधी वंश से सम्बन्ध रखने वालों की कब्रें हैं जिनपर मकबरे बने हुए हैं। ये मकबरे ही आज यहाँ आने वाले सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें लोधी वंशज सुल्तानों के राज्यकाल (1454-1526) में दो प्रकार के मकबरों का निर्माण हुआ एक चौकोर और दूसरा अठपहलू। बड़ा गुबंद चौकोर मकबरे का उदाहरण है। इस मकबरे के बिल्कुल साथ में एक मस्जिद बनी हुई है जिसे बड़ा गुबंद मस्जिद कहा जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं बड़ा गुबंद मकबरा इस मस्जिद का प्रवेश द्वार है परंतु ये एक अलग मकबरा ही है। इस मकबरे में दफनाये गए व्यक्ति की पहचान नहीं कि जा सकी है पर माना जाता है ये व्यक्ति सिकन्दर लोधी के राज्य में किसी विशिष्ट पद पर रहा होगा।

बगल में ही बड़ा गुबंद नाम की मस्जिद भी है जो मेहराबों जैसे आकार की है। स्तम्भों पर स्थित ये मस्जिद सन 1494 के आस पास की है। इसके अंदर की खूबसूरती देखकर कोई भी दंग रह जायेगा। सफेद चूना पत्थर और लाल बलुआ पत्थरों से बनी ये मस्जिद अद्भुत वास्तुशैली की मिसाल है। एक बार जो इसे देख ले उसका मुंह खुला का खुला रह जाए। अरबी शैली में बनी ये मस्जिद पूरी तरह से कुरान की आयतों और रंगीन बेलबूटों से सजी हुई है। हम तो पूरी तरह इसकी सुंदरता के कायल हो गए।

शीश गुबंद

मस्जिद के सामने खड़े होने पर सामने ही एक और अनोखा मकबरा नजर आ रहा था। ये था शीश गुबंद। हम सुंदर बाग और फूलों की महक लेते हुए सामने के मकबरे यानी शीश गुबंद पहुँचे।

शीश-गुबंद अन्य इमारतों से कुछ अलग लगा। इसके ऊपरी भाग पर नीले रंग की टाइलें इसे अलग ही चमक दे रही थी। इस्लामिक शैली से बना ये मकबरा आज भी खूबसूरती में किसी से कम नहीं। यह मकबरा प्रथम लोधी बादशाह बहलोल लोधी का है। मकबरे की छत पर उकेरी गई कलाकृतियां और डिज़ाइन अद्भुत थे। बारीक कारीगरी देखकर नजरें हटने का नाम नहीं ले रही थीं।

अठपुला

दूर-दूर तक देखने पर बाग में बस हरियाली ही हरियाली नजर आ रही थी पर वहां लगा परिसर का नक्शा आगे बहुत कुछ होने की सूचना दे रहा था। कुछ दूरी पर एक मानवनिर्मित झील दिखी जिस पर एक पुल बना हुआ है जिसे अठपुला कहा जाता है। सिकंदर लोधी के मकबरे से थोड़ी ही दूर सात मेहरावों वाला एक पुल है जिसे नाले पर बनाया गया है। सूचना बोर्ड की जानकारी कह रही थी यह मेहराबी पुल अकबर के शासन काल में बनवाया गया जो कि नाले के पानी को यमुना नदी तक पहुँचाने का काम करता था।

सिकन्दर लोधी का मकबरा

लोधी गार्डन की खास बात यही है कि ये पूरा परिसर ही सुंदरता लिए हुए है आप जितना आगे चलते जायेंगे आपको यहाँ उतना ही अच्छा फील होगा। आगे चलते हुए हमें दिखाई दी यहाँ की मुख्य इमारत यानी सिकन्दर लोधी का मकबरा। अठपहलू शैली का ये मकबरा अन्य सब मकबरों से अलग भी था और भव्य भी। सिकन्दर लोधी, लोधी वंश का द्वितीय शासक था। मकबरा ऊंचाई पर बनाया गया है जिसमें मकबरे का एक अलग बाग भी है। यहाँ जितने भी मकबरें दिखाई दिए उन सबकी संरचना एक जैसी ही थी। इसकी खासियत ये है ये मकबरा पूरे परिसर के बीचों-बीच है। ये मकबरा अष्टभुजाकार है जो चारों ओर से देखने पर एक समान दिखता है।

लोधी गार्डन ऐसी जगह है जहाँ आप घंटों प्रकृति का आनंद ले सकते हैं। ज़िंदगी की भागम-भाग से दूर किसी अपने के साथ यहाँ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं। सब कुछ है यहाँ पुरानी इमारतें, मकबरें और पानी की झीलें भी।

मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा

अब वक्त हो चला था घर लौटने का, बस बाहर निकलने के लिए चले ही थे कि अचानक बारिश अपने पूरे शबाब के साथ बरसने लगी, मानो बादलों का सारा गुस्सा आज ही फूट पड़ा हो।

निकलते हुए लोधी गार्डन का एक आखिरी मकबरा जो हमसे छूट रहा था सामने नजर आया। बारिश से बचने के लिए हम भागे मकबरे की ओर। ये था मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा। ये गोलाकार मकबरा दूर से किसी महल के बैठकघर जैसा लगता है। अगर मुझसे पूछा जाए तो पूरे परिसर में सबसे अनोखा मकबरा यही लगा। बारिश से बचते कई लोग इस मकबरे की सीढ़ियों पर बारिश का सुखद आनंद लेते दिखे। और मुझे याद आया क़तील शिफ़ाई का एक मशहूर शेर-

दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया था

इस तरह बरसात का मौसम कभी आया था

बारिश के ऐसे सफर की यादें उम्रभर साथ रहती हैं। सफर तो खत्म हो गया पर चेहरे की मुस्कान साथ चलती रही। अगले सफर में फिर हम किसी नायाब जगह का रुख करेंगे। बस आप बने रहिये हमारे साथ इस सफ़रनामें में….

 

Research – Nikki Rai

Written & Edited by Pardeep Kumar

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