‘जगमगाती रौशनी, लहरों पर पड़ती इस रौशनी की परछाई और कानों में गूंजती हुई घण्टों की ध्वनि’ सोचिए ये सब कितना खूबसूरत लगता होगा? कितना मनोरम होता है वो दृश्य जब ब्रजभूमि में यमुना घाट पर आरती की बेला होती है। यकीनन ये किसी साहित्यिक रचना की याद दिला देता है। जैसे फिर पढ़ रहे हों देवदास को या कोई निर्मल कविता चित्त में फिर उमड़ पड़ती हो।

घण्टों की ध्वनि और आध्यात्मिक चेतना
एक तरफ किसी पुराने सिनेमा जैसी, एक प्रतिमा रूप में खड़ी परछाई का अक्स उस शीतल जल में दिखाई देता है और अगले ही क्षण घण्टों की ध्वनि, मेरे ध्यान को पूरी तरह अपनी तरफ खींच लेती है। एक ऐसा एहसास होता कि वो क्षण, वो पल जब मैं वहाँ हूँ तब मैं केवल वहीं हूँ। सब कुछ भूलकर केवल एक आध्यात्मिक चेतना ध्यान में होती है जो मेरे इर्द गिर्द एक कवच बन गयी हो। यहाँ पूरा घाट भीड़ से भरा होने के बावजूद एक शांति है जो बनी रहती है। हमारे मन में, चित्त की शांति। एक सामूहिक चेतना उमड़ती है जो विस्तार की कामना करती है और कुछ कहे बिना ही परिपूर्ण हो जाती है।

विश्राम घाट की गाथा
ये सब कुछ इसलिए क्योंकि यमुना के इस तट पर मथुरा का विश्राम घाट है। जहाँ अनेक श्रद्धालु आते हैं और यमुना आरती के मनोरम दृश्य का अनुभव करते हैं। इसे विश्राम घाट इसलिए कहा जाता है क्योंकि मान्यताओं के अनुसार यह वही स्थान है जहाँ श्री कृष्ण ने कंस का वध करने के बाद विश्राम किया था।(हमारे मन में, चित्त की शांति।)

ब्रज भूमि में यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित यह विश्राम घाट शाम होते होते ऐसा दृश्य में ढ़ल जाता जिसमें श्रद्धालु अवश्य संलग्न होना चाहते हैं। यमुना नदी की पूजा के समय तो सारा वातावरण एक अलौकिक दिव्यता से परिपूर्ण होता नजर आता है। यमुना, जो सूर्य की पुत्री और यम की बहन मानी जाती हैं, उनकी आराधना करने के उद्देश्य से की जाने वाली ये आरती मन को मोहित कर देती है।

दीपदान और भविष्य की मंगलकामना
पहले भक्त व्यक्तिगत तौर पर पूजा करते हैं जिसे दीपदान कहा जाता है। इस प्रसंग में वे एक पुजारी के साथ मंत्रोच्चारण करते हुए यमुना जी में दीप दान करते हैं। ऐसा करते हुए वे अपने पिछले कर्मों के लिए क्षमा प्रार्थना करते हैं और भविष्य की मंगल कामना करते हुए दीप को यमुना के जल में प्रवाहित कर देते हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से अपितु आध्यात्मिक दृष्टि से भी आपको एक सौम्य अनुभव प्रदान कर सकता है।

यहाँ है मंदिरों की कतार
यदि आप गोवर्धन की परिक्रमा करने जाते हैं या फिर मथुरा-वृंदावन जाते हैं तो आपको यमुना घाट का दौरा जरूर करना चाहिए। जहां आप बोटिंग भी कर सकते हैं और यमुना आरती की इस मंगल बेला में भी शामिल हो सकते हैं। यहाँ केवल यही नहीं बल्कि और भी कई मन्दिर हैं जिनमें सबसे प्रमुख है द्वारकाधीश मन्दिर जिसे देखने और दर्शन करने दूर दूर से श्रद्धालु यहाँ आते हैं। इससे थोड़ी ही दूरी पर श्री कृष्ण जन्मभूमि भी है। आसपास और भी मन्दिर हैं, बल्कि पूरे मथुरा में थोड़ी-थोड़ी दूर पर कई मन्दिर हैं।

लीजिए बोटिंग का आनंद
यहां आप बोटिंग का आनंद भी ले सकते हैं। यमुना घाट पर कई नावचालक सुबह से शाम तक बोटिंग करवाने के लिए उपलब्ध रहते हैं। बोटिंग के लिए सबसे अच्छा वक्त वह हो सकता है जब सूरज ढलने को होता है। क्योंकि इस वक्त आकाश का रंग देखने लायक होता है। बोट में बैठे हुए हल्के हाथों से यमुना के जल पर हाथ फेरना असीम सुख की अनुभूति देता है। जैसे ढलता सूरज अपने साथ हमारे सारे दुखों को लेकर ढल गया हो।

चाट- पकौड़ी और पायल की झनकार
यूपी के खानपान में एक अलग ही स्वाद होता है और यहाँ के बाजारों में भी। यहाँ बाजारों की एक अलग ही रंगत होती है। वैसी ही अनोखी रंगत है इसके पास मौजूद बाजार की जहाँ पायल ही पायल की दुकानें हैं। एक दुकानदार ने बताया कि देशभर में, यहीं से चांदी की पायलों का निर्यात होता है।

एक बार जाओगे तो कभी नहीं भूलोगे
आप यहाँ एक बार जायेंगे तो शायद वापस आने का दिल ही नहीं करेगा। दिल होगा कि बस यहीं बैठे रहें और आरती यूँ ही चलती रहे। मन शांत होता होगा। शाम ढल चुकी होगी और सारी नकारात्मकता भी। जब भी मौका मिले इस आरती में ज़रूर शामिल हों।

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