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Eco Tourism क्या है इको-टूरिज़्म? होमस्टे और ग्रामीण पर्यटन!

अगर आप शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और शोर से परेशान हो चुके हैं और आपका मन शहर से दूर कहीं शांत, हरी-भरी जगह पर जाने का करता है जहां आपको शहर के अशांत माहौल के मुकाबले थोड़ा सुकून मिल सके। तो इको-टूरिज़्म आपके लिए बिल्कुल सही चीज़ है। इको-टूरिज़्म का मतलब सिर्फ घूमना नहीं, बल्कि उन जगहों पर जाना है जहाँ आप एनवायरनमेंट को बिना नुकसान पहुँचाए मज़ा लेते हैं और साथ ही गाँव के लोगों की रोज़ी-रोटी बढ़ाने में भी मदद करते हैं। यह ऐसा तरीका है जिससे नेचर भी बची रहती है और गाँव वाले भी कमाई कर लेते हैं जिससे दोनों का फायदा होता है। Eco Tourism

इको-टूरिज़्म का सीधा सा मतलब है नेचर के बीच घूमना, पर इस यात्रा के दौरान कुछ बातों का खास ध्यान रखना होता है जैसे जंगल, पहाड़, झरने या किसी भी गाँव में जाएँ तो वहाँ गंदगी न करें, कचरा इधर-उधर न फेंकें, पानी-बिजली बेवजह खराब न करें और जो भी स्थानीय नियम हों, उन्हें मानें। इसके साथ गाँव वालों की संस्कृति, उनका खाना-पीना, पहनावा और रीति-रिवाज़ को भी सम्मान दें। ऐसी यात्राओं में न केवल आपको शहर के अशांत माहौल से छुटकारा मिलेगा बल्कि गांव वालों को भी रोजगार मिलेगा।

साफ हवा, शांति, नेचर का मजा यही तो इन गांवों की खासियत होती है। गांव वालों होमस्टे चला कर, गाइड बनकर, लोकल खाना खिलाकर या अपने हाथ के बनाए सामान को बेचकर ये लोग अपनी कमाई करते है। इसलिए इको-टूरिज़्म नेचर को भी बचाता है और गाँव वालों की जेब भी मजबूत करता है। मतलब मज़ा भी पूरा और भलाई भी पूरी।

उत्तराखंड का होमस्टे मॉडल सच में एक ऐसी कहानी है जहाँ गाँव की महिलाएँ अपनी ज़िंदगी खुद बदल रही हैं। मुनस्यारी के पास सरमोली गाँव में 2004 में मल्लिका विर्दी ने हिमालयन आर्क होमस्टे कार्यक्रम शुरू किया, और खास बात ये है कि पूरा होमस्टे सिस्टम गाँव की महिलाएँ ही संभालती हैं। यहाँ आने वाले मेहमान मडुआ की रोटी, पहाड़ी राजमा जैसे बिल्कुल देसी और स्वादिष्ट खाने का मज़ा लेते हैं, खेतों में मदद करते हैं और गाँव की असली ज़िंदगी को करीब से महसूस करते हैं। इस मॉडल से सरमोली की महिलाएँ साल में करीब 1.5 लाख रुपये तक कमा लेती हैं, जो उनके लिए बहुत बड़ी बात है और इससे उनकी पहचान और आत्मविश्वास दोनों बढ़े हैं।

Eco Tourism

राज्य सरकार ने भी ‘दीनदयाल उपाध्याय होमस्टे योजना’ के ज़रिए पुराने पहाड़ी घरों को लकड़ी और पत्थर से बने सुंदर, पारंपरिक होमस्टे में बदलने में मदद की है। सरकार ट्रेनिंग, लोन और मार्केटिंग का पूरा सपोर्ट देती है, और आज लगभग 5,000 घर इस योजना से जुड़ चुके हैं। इससे गाँव में रोजगार बढ़ा है और लोग शहरों की ओर कम जा रहे हैं, क्योंकि अब उन्हें अपने ही गाँव में अच्छी कमाई का मौका मिल रहा है।

इको-स्टे असल में ऐसे ठहरने की जगह होती हैं, जहाँ आप नेचर के बीच आराम से रहते हैं और साथ ही पर्यावरण का ख्याल भी रखते है। यहाँ ज़्यादातर बिजली सोलर से आती है, बारिश का पानी इकट्ठा करके इस्तेमाल किया जाता है, और घर भी मिट्टी, लकड़ी या दूसरे इको-फ्रेंडली तरीक़े से बनाए जाते हैं। कचरा अलग करके कम्पोस्ट बनाया जाता है, पानी दोबारा इस्तेमाल में लाया जाता है मतलब हर काम सोच-समझकर किया जाता है।

जैसे जिम कॉर्बेट के पास क्यारी गाँव में बने इको-स्टे बिल्कुल पुराने पहाड़ी घरों की तरह दिखते हैं। यहाँ रहने पर आप शांत माहौल का मज़ा लेते हैं, जंगल सफारी और एडवेंचर एक्टिविटी भी कर सकते हैं। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है जैसे आप नेचर की गोद में आराम कर रहे हों।

क्यारी गाँव का इलाका अपनी खूबसूरती की वजह से और भी खास बन जाता है। क्योंकि जिम कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व बिलकुल पास में होने से यहाँ का जंगल घना है, हवा बिल्कुल ताज़ा लगती है और वाइल्डलाइफ़ का असली मज़ा मिलता है। यहाँ बाघों की अच्छी-खासी संख्या मिलती है, जो ये दिखाता है कि जंगल कितना हेल्दी और समृद्ध है। इसी वजह से क्यारी और उसके आस-पास का इलाका नेचर और वाइल्डलाइफ़ पसंद करने वालों के लिए एकदम परफेक्ट जगह है। यहाँ कई बढ़िया इको-स्टे और रिसॉर्ट भी बने हुए हैं, जो जिम कॉर्बेट के नेचर वाइब से मैच करते हैं लकड़ी और पत्थर के कमरे, चारों तरफ हरियाली, पंछियों की आवाज़ें और पूरा शांत माहौल सब मिलकर स्टे का अनुभव और भी खास बना देते हैं।

Eco Tourism

गाँव वाले इको-टूरिज़्म को पूरी तरह सपोर्ट करते हैं, क्योंकि इससे उन्हें होमस्टे, लोकल गाइड, खेती और कारीगरी जैसे कामों में अच्छी कमाई मिलती है। लोग चाहते हैं कि इको-टूरिज़्म बढ़े, लेकिन ऐसे कि जंगल भी सुरक्षित रहे और गाँव वालों की खुशी और रोज़गार भी बना रहें।

भारत सरकार भी अब ग्रामीण इको-टूरिज़्म को बढ़ावा देने में लगी है। कोशिश ये है कि गाँवों में बने होमस्टे भी पर्यटन का बड़ा हिस्सा बनें और वहाँ के लोगों को अच्छा रोज़गार मिले। सरकार चाहती है कि होमस्टे चलाने वालों को बिजली-पानी की वही दरें मिलें जो सामान्य घरों को मिलती हैं, ताकि उनका खर्च कम हो सके। NIDHI पोर्टल के ज़रिए हर होमस्टे की एक डिजिटल पहचान बनाई जा रही है, जिससे ऑनलाइन बुकिंग भी आसान हो जाएगी।

आखिर में बात यही है कि इको-टूरिज़्म तभी सफल है जब तीनों चीज़ें एक साथ खुश रहें प्रकृति सुरक्षित रहे, गाँव वालों की कमाई और रोजगार बढ़े और पर्यटकों को अच्छा अनुभव मिले।

क्यारी गाँव जैसी जगहें यही दिखाती हैं कि इको-टूरिज़्म सिर्फ कमाई का ज़रिया नहीं, बल्कि एक संतुलन है जहाँ नेचर, लोग और टूरिज़्म तीनों को बराबर महत्व दिया जाता है। अगर ये बैलेंस बना रहे, तो ग्रामीण भारत में इको-टूरिज़्म सच में कमाल कर सकता है

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