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राजस्थान की संस्कृति को वैश्विक पटल पर रखता है घूमर

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घूमर सिर्फ एक नृत्य नहीं बल्कि समर्पण का एहसास है। यह नृत्य की एक ऐसी विद्या है जो वर्षों से राजस्थान में पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित होती चली आ रही है। राजस्थान हमेशा से ही अपने सांस्कृतिक विविधताओं और राजसी ठाठ बाट के लिए दुनिया भर में जाना जाता रहा है। यहां के ऐतिहासिक इमारत, पहनावे, रहन-सहन, बोलचाल और नृत्य के कारण यह राज्य भारत के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों वाला राज्य माना जाता है। राजस्थान का इतिहास इसलिए भी इतना खास है क्योंकि यहां निभाई जाने वाली परंपराओं का इतिहास बेहद हीं समृद्ध रहा है। यह सांस्कृतिक विरासत हीं है जो राजस्थान को पूरे भारत में सबसे अनोखा बनाता है और इसी सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा है यहां का सबसे प्रमुख लोकनृत्य “घूमर” (Ghoomar Dance) आज के ब्लॉग में हम आपको बताने जा रहे हैं राजस्थानी नृत्य घूमर के इतिहास के बारे में और इससे जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में। भारी भरकम घेर वाला घाघरा पहनकर और माथे पर घूंघट डालकर किया जाने वाला यह नृत्य आज के समय में दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गया है।इस नृत्य में महिलाएं बड़ा घेरा बनाकर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इस नृत्य के दौरान पहने जाने वाले पोशाक इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। हालांकि राजस्थान के अलग-अलग भागों में घूमर नृत्य की शैली तथा इस नृत्य के दौरान पहने जाने वाले पहनावे में थोड़ा बहुत अंतर देखने को मिलता है, लेकिन इस नृत्य को प्रस्तुत करने वाले लोगों के भावनाओं में कोई अंतर नहीं होता।आपको बता दें कि घूमर राजस्थान का राजकीय नृत्य है और राजस्थान में होने वाले सामाजिक कार्यक्रमों में आपको इसकी झलक देखने को मिल जाएगी। ट्रेड फेयर जैसे मौके पर भी घूमर नृत्य की झलकियां देखने को मिल जाती हैं। घूमर नृत्य की शुरुआत राजस्थान के भील जनजातियों के द्वारा किया गया था। भील जनजाति के लोग माता सरस्वती की आराधना में यह नृत्य प्रस्तुत किया करते थे। राजा-रजवाड़ों के समय यह नृत्य बहुत ही प्रसिद्ध हो गया। जिसके बाद राज्यसभाओं में इस नृत्य की प्रस्तुति होने लगी और वहीं परंपरा आज तक चली आ रही है। आज भी राजस्थान में अक्सर किसी भी शुभ अवसर पर घूमर की झलकी देखने को मिल जाती है। घूमर सिर्फ नृत्य नहीं राजस्थान की संस्कृति का एक अमूल्य धरोहर है। अक्सर नर्तकों द्वारा नृत्य के सभी विधाओं में घूमर को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इतना हीं नहीं आपको यह जानकर हैरानी होगी कि घूमर राजस्थान का सबसे प्राचीनतम लोक नृत्य है और सिर्फ महिलाओं के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। घूमर सिर्फ एक नृत्य नहीं एक परंपरा है, जिसे वर्षों से राजस्थान में निभाया जाता रहा है। जब भी राजस्थान में कोई नव विवाहिता अपने ससुराल आती है तो वह घूमर नृत्य करके अपने वैवाहिक जीवन में कदम रखती है।इसके अलावा शादियों, त्योहारों और अलग-अलग सामाजिक तथा धार्मिक अवसरों पर घूमर नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। इतना हीं नहीं समय-समय पर इस नृत्य की झलकियां फिल्मों में भी हमें देखने को मिलती रहती है।राजस्थान सरकार भी इस नृत्य को बढ़ावा देने का प्रयास करती रहती है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले जैसे जगहों पर भी इस नृत्य की प्रस्तुति हमें देखने को मिलती है।

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राजस्थानी आत्मसम्मान का प्रतीक है साफा

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जब भी कभी साफा का जिक्र होता है हमारे ध्यान में सबसे पहले राजस्थान का नाम आता है। और आए भी क्यों ना साफा का इतिहास कहीं न कहीं राजस्थान से हीं जुड़ा हुआ है। सर पर बड़े-बड़े पगड़ी बांधे राजस्थानी लोग अपने राजसी संस्कृति को पूरे विश्व के सामने प्रस्तुत करते हैं। यह साफा न सिर्फ उनके लिए एक श्रृंगार है बल्कि उनका आत्मसम्मान भी है। राजस्थान में साफ़ा का बहुत हीं ऐतिहासिक और नैतिक महत्व है। लोग इसे आत्म सम्मान से जोड़कर देखते हैं।आपको बता दें की राजस्थान के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग तरीके से साफा बांधने का प्रचलन रहा है। इतना हीं नहीं सफा के रंग में भी एक कहानी छुपी हुई होती है जो साफा के मूल्य से हमें अवगत करवाती है। जैसे सफेद साफा का राजस्थान में अपना ही एक महत्व है, वहीं केसरिया साफा के पीछे एक अलग ही कहानी छुपी हुई होती है। अगर रंगों के आधार पर साफा को विभाजित किया जाए तो वह विभाजन कुछ इस प्रकार का होगा। :- केसरिया साफा :यह सफा शौर्य और वीरता की निशानी है। यह सफा एक राजस्थानी तब अपने सिर पर बांधता है जब वह युद्ध के लिए अग्रसर होता है। अक्सर जब राजा महाराजा युद्ध के लिए जाया करते थे तो वह अपने सिर पर केसरिया साफा बांधकर जाते थे। क्योंकि केसरिया रंग का अर्थ शौर्य और वीरता से परिपूर्ण होता है। अधिकतर राजपूतानराजपूतानों में केसरिया रंग के साफा को बांधने का प्रचलन था। सफेद साफा :राजस्थान में सफेद रंग के साफे का अर्थ होता है शोक! अगर आपको कोई भी राजस्थानी व्यक्ति सफेद रंग का साफा पहना दिख जाए तो इसका मतलब है कि वह शोक में है। हालांकि राजस्थान में कुछ ऐसे समुदाय भी हैं जहां सफेद रंग का साफा आम दिनों में भी पहना जाता है। ऐसे समुदाय में बिश्नोई समुदाय का नाम सबसे पहले आता है बिश्नोई समुराई के लोग सामान्य दिनों में भी सिर पर सफेद साफा बांधा करते हैं। लेकिन अधिकतर जगहों पर सफेद रंग के साफे को शोक से जोड़कर देखा जाता है। खाकी साफा :खाकी साफा राजस्थान में अक्सर बुजुर्ग लोगों द्वारा बांधा जाता है। आम दिनों में राजस्थानी बुजुर्ग खाकी शाखा बांधा करते हैं। आप आम दिनों में कभी भी राजस्थान में ऐसे बुजुर्गों को देख लेंगे जो अपने सिर पर खाकी साफा बांधकर घूमते हैं। नीला और मरून साफा :राजस्थान में साफा के रंगों का बहुत हीं महत्व होता है। अगर कोई राजस्थानी व्यक्ति किसी के प्रति सहानुभूति व्यक्त करने जाता है तो वह नीले या फिर मेहरून रंग के साफ़ा को पहन कर जाता है। इसलिए नीला और मेहरून रंगों के साफों को सहानुभूति सभा से जोड़कर देखा जाता है। बहुरंगा साफा :बहुरंगे साफों का उपयोग अधिकतर अलग-अलग समारोहों में किया जाता है। हालांकि कुछ समुदाय ऐसे भी हैं जो बहुरंगे साफे को सामान्य दिनों में भी पहनते हैं, लेकिन अधिकतर इसका उपयोग किसी कार्यक्रम में ही किया जाता है। क्यों पहना जाता है साफा (Why is Safa worn)? अगर राजस्थान के जलवायु के बारे में बात की जाए तो यह भारत का सबसे गर्म प्रदेश है और यहां लगभग 9 महीने तक गर्मी पड़ती है। ऐसे में लंबे समय तक यहां लू की आंधी चलती रहती है। साफा का इतिहास भी कहीं ना कहीं गर्मी और लू से जुड़ा हुआ है। राजस्थानी लोग अपने आप को लू के थपेड़ों से बचाने के लिए कई परतों वाला साफा अपने सिर पर बांधते हैं। यह साफा लोगों को डिहाइड्रेशन से बचता है। इसके अलावा राजस्थान राजा रजवाड़ों का गढ़ रहा है। ऐसे में वहां अक्सर युद्ध जैसी परिस्थितियों आती रहतीं थी। सफा युद्ध के समय पर सिर पर किए गए अकस्मात आघात से योद्धाओं को बचता था। आज साफा राजस्थान के संस्कृति का एक अहम हिस्सा बन चुका है। रंग है अलग-अलग समुदाय की निशानी (Color is a symbol of different communities): पूरे राजस्थान में अलग-अलग समुदाय के लोग अलग-अलग तरह के साफा का उपयोग करते हैं। राजस्थान के लोगों के साफा के रंग और उसे बांधने के स्टाइल को देखकर काफी हद तक आप उनके समुदाय का पता लगा सकते हैं। जैसे बिश्नोई समुदाय के लोग हमेशा सफेद साफा बांधते हैं। वहीं रेवाड़ी और राईका समुदाय के लोग लाल रंग का साफा बांधते हैं। कलबेलिया, लंगा- मांगणियार लोग रंग बिरंगे छापों वाला साफा बांधते हैं, जबकि व्यापारी समुदाय गुलाबी केसरिया और लाल रंग का पगड़ी बांधते हैं।

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Top 5 National Parks of Rajasthan

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बरसात का सीजन खत्म हो गया है और धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगा है, ऐसे में नेशनल पार्क्स भी जंगल सफारी और टूर के लिए खुल गए हैं। अगर आप अभी किसी अच्छे से वीकेंड टूर की प्लानिंग कर रहे हैं तो जंगल सफारी और टूर आपके लिए एक बेहतर ऑप्शन हो सकता है। आज के फाइव कलर्स आफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं राजस्थान के नेशनल पार्क्स (National Parks of Rajasthan) के बारे में, जहां आप अच्छे से बायोडायवर्सिटी को एक्सप्लोर कर सकते हैं और अपना वीकेंड एंजॉय कर सकते हैं। 1. रणथम्भोर नेशनल पार्क (Ranthambore National Park) रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान के सवाई माधोपुर ज़िला में अवस्थित है। यह नेशनल पार्क लगभग 1334 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सर्वप्रथम रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान को 1955 में सवाई माधोपुर खेल अभयारण्य के रूप में जाना जाता था। इसके पश्चात 1973 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। 1 नवंबर 1980 को इस टाइगर रिजर्व को राष्ट्रीय उद्यान बना दिया गया। रणथम्भोर नेशनल पार्क में कई प्रकार के वन्य जीव निवास करते है जिनमे बाघ (Tiger), सांभर हिरण (Sambhar Deer), नर मोर (Male Peacock) और चित्तीदार हिरण (Spotted Deer) शामिल है। इसके अलावा यहाँ तेंदुए (Leopards) भी पाए जाते है। कैसे पहुंचे रणथम्भोर राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Ranthambore National Park)? 2. मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान (Mukundara Hills National Park) मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान जिसे दर्राह नेशनल पार्क भी कहा जाता है राजस्थान के कोटा जिले के पास स्थित है। मुकुंदरा हिल्स नेशनल पार्क लगभग 760 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी स्थापना 2004 में हुई थी। इस नेशनल पार्क में तीन वन्य जीव अभ्यारण्य सम्मलित हैं दर्रा वन्यजीव अभयारण्य, राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य। इस राष्ट्रीय उद्यान में जंगलों का बहुत बड़ा भाग शामिल है जो पहले राजाओं का शिकारगाहों का हिस्सा था। यह नेशनल पार्क राजस्थान का तीसरा टाइगर रिजर्व है। एक समय इस राष्ट्रीय उद्यान को एशियाई शेर के पुनः उत्पादन के लिए माना जाता था। मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना (Fauna) निवास करते है जिनमे बंगाल टाइगर, भारतीय भेड़िया, भारतीय तेंदुआ, स्लॉथ भालू, सांभर, चिंकारा, हिरण, चीतल, नीलगाय और जंगली सूअर शामिल हैं। इसके अलावा यहाँ मगरमच्छ और घड़ियाल भी पाए जाते हैं । कैसे पहुंचे मुकुंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Mukundra Hills National Park)? 3. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Keoladeo National Park) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान भारत के वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स की सूची में शामिल, एक प्रसिद्ध बर्ड अभयारण्य है। इस नेशनल पार्क की प्रसिद्धि का कारण है सर्दियों के दौरान यहाँ आने वाले साइबेरियन सारस। यह नेशनल पार्क राजस्थान के भरतपुर में स्थित है जिसके कारण इस उद्यान को भरतपुर पक्षी विहार भी कहा जाता है। इस पक्षी विहार में हजारों की संख्या में लुप्तप्राय और दुर्लभ पक्षी पाए जाते है। केवलादेव नेशनल पार्क लगभग 28 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस राष्ट्रीय उद्यान को 1982 में नेशनल पार्क का दर्जा दे दिया गया। गंभीर और बाणगंगा नदी इस पार्क में बहती है। यह पक्षी विहार पर्यटकों को काफी आकर्षित करता है। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना निवास करते है जिनमे पक्षियों की 350 से अधिक प्रजातियां, स्तनधारियों की कुल 36 प्रजातियां और मछलियों की 43 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है। कैसे पहुंचे केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Keoladeo National Park)? 4. अलवर सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान (Alwar Sariska National Park) दिल्ली के नजदीक स्थित अलवर सरिस्का सफारी अन्य जंगल सफारियों से काफी अलग है। क्योंकि आप यहां मानसून में भी जंगल सफारी का आनंद उठा सकते हैं। सरिस्का जंगल सफारी दिल्ली से मात्र ढाई घंटे की दूरी पर स्थित है और नेचर को एक्सप्लोर करने के लिए एक बेहतरीन जगह है। सरिस्का जंगल सफारी के पास हीं स्थित है, अलवर फोर्ट और बाला फोर्ट बफर जोन (buffer zone)। आप इन दोनों जगह पर जाकर भी घूम सकते हैं। अलवर के किले पर खड़े होकर आप पूरे सरिस्का नेशनल पार्क को देख सकते हैं। चारों ओर बड़े-बड़े पेड़, घना जंगल और जंगलों में बिना डरे चहल कदमी कर रहे हिरन आपका मन मोह लेंगे। खड़े होकर आसपास के सीनरी को निहारना भी सुकून दायक होता है। कैसे पहुंचे अलवर सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Alwar Sariska National Park)? 5. डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान (Desert National Park) डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान में एक नेशनल पार्क है जो, जैसलमेर और बाड़मेर जिले के पास स्थित है। डेजर्ट नेशनल पार्क लगभग 3162 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी स्थापना 1981 में हुई थी। यह नेशनल पार्क भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। यह नेशनल पार्क यहाँ पाए जाने वाले ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (Great Indian Bustard) के कारण प्रसिद्ध है जो इस उद्यान में अच्छी-खासी संख्या में पाया जाता है। इस उद्यान में डायनासोर के अवशेष भी प्राप्त हुए है। डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना (Fauna) निवास करते है जिनमे रेगिस्तानी लोमड़ी, भेड़िया, बंगाल लोमड़ी, स्पाइनी-टेल्ड छिपकली, मॉनिटर छिपकली, चिंकारा, हाथी, छोटे पंजे वाले ईगल, टैनी ईगल और रेगिस्तानी बिल्ली शामिल है। कैसे पहुंचे डेजर्ट राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Desert National Park)?

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Best Places to Visit in Mount Abu

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Mount Abu- राजस्थान का एक मात्र हिल स्टेशन Five Colors of Travel जब भी हमारे जेहन में राजस्‍थान का नाम आता है तो स्वतः ही दूर-दूर तक फैले रेत के धोरे, तेज गर्म हवाएं, कीकर के झाड़, भव्य हवेलियां या गर्वीले इतिहास की विरासत को अपने अंदर संजोए  रजवाड़ों के किले और महल तैरने लगते हैं या फिर राजपूताना शान के प्रतीक अनेक रंगों को अपनी पहचान बनाए यहाँ के शहर लेकिन अलग-अलग रंगों को अपने में संजोए इस राजस्‍थान का एक खूबसूरत रंग ऐसा भी है जिसकी पहचान एक शानदार हिल स्टेशन के तौर पर दुनिया भर में है और वो है माउंट आबू। यह खूबसूरत जगह किसी जमाने में राजस्थान की जबरदस्त गरमी से बदहाल राजघरानों के शाही लोगो का ‘समर-रिज़ॉर्ट’ हुआ करता था। (Mount Abu) धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में क्योंकि इस शहर के साथ अनेक धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं इसलिए भी माउंट आबू धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में भी अच्छा खासा प्रसिद्ध है। यहां की चटटानों एवं जंगलों में ऋषियों, मुनियों और साधकों की आज भी अनेकों गुफाएं आसानी से देखने को मिल जाती हैं जो प्राचीन भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की याद को तरोताजा कर देती हैं। बेइंतहा तेजी से भागती-दौड़ती जिन्दगी में सुकून के पलों की तलाश करते आदमी को सच्चे सुख और अदद शान्ति का अहसास कराने में सक्षम है राजस्थान के कश्मीर के रूप में प्रसिद्ध- माउंट आबू। कैसे पहुंचे माउन्ट आबू आप यहाँ सड़क मार्ग के अलावा रेल मार्ग से भी यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं। माउन्ट आबू के पास में आबू रोड रेलवे स्टेशन है जो लगभग सभी बड़े शहरों से कनेक्ट है। हवाई मार्ग द्वारा माउंट आबू पहुँचने के लिए आप उदयपुर की उड़ान ले सकते हैं जो माउंट आबू का निकटतम हवाई अड्डा है। उदयपुर हवाई अड्डा इस शहर से लगभग 185 किमी. की दूरी पर स्थित है। मेरी ये दूसरी माउन्ट आबू यात्रा थी। हम देर रात यहाँ पहुंचे थे, होटल पहले से बुक था। आबू रोड से माउंट आबू तक पहुँचने के लिए लगभग 30 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। अरावली शृंखला के सर्पीले रास्तों से गुजरते हुए जब आप चढ़ाई चढ़ते हैं तब थोड़ी थकान लाज़िमी है, लेकिन ऐसी यात्रायें रोमांचक भी होती हैं अगर वो दिन में हो। रात का सफर अक्सर थका देता है, सो होटल पहुंचे, डिनर किया और बिस्तर पर लेटते ही कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।  अगले दिन सुबह नाश्ता किया और निकल पड़े माउंट आबू की हृदयस्थली नक्की झील की और। माउंट आबू बाजार और गुजराती टच चारों और पहाड़ों से घिरी इस झील की ख़ूबसूरती ही यही है कि यहां आने वाले पर्यटक झील में बोटिंग किए बिना वापसी का रूख नहीं करते। झील के पास स्थित बाजार में आपको  गुजराती संस्कृति का ज्यादा बोलबाला दिखाई देगा वजह शायद यही कि यह जगह बिलकुल गुजरात की सीमा से सटी हुई है। आपको यहाँ के खाने में मीठेपन के साथ ही गुजराती टच का अहसास हो जायेगा। इस बाजार में  हस्तकला निर्मित सामग्री जैसे- वस्त्र, चादरें, पर्स, गहने, चप्पलें, खिलौने आदि मिलते हैं। माउंट आबू का हार्ट – नक्की झील नक्की झील के बारे में हिन्दू पौराणिक मान्यता है कि इसे देवताओं द्वारा राक्षसों से बचाने के लिए अपने नाखूनों से खोदा गया था। पहले इसे नख की झील ही कहा जाता था, बाद में इसका नाम  नक्की झील पड़ गया। नक्की झील में आपको बोटिंग के अलावा कुछ वाटर स्पोर्ट्स एक्टिविटीज भी दिखाई देंगी जहाँ आप अपनी पसंद के अनुसार उन एक्टिविटीज का आनंद ले सकते हैं। झील के किनारे पर एक खूबसूरत रेस्तरां बना हुआ है जहाँ आप चाय कॉफी के साथ प्राकृतिक नज़ारों से घिरी झील की ख़ूबसूरती का रसपान कर सकते हैं। यहाँ पैडल और शिकारा बोट दोनों ही उपलब्ध हैं। हमने पहले बोटिंग की और फिर इत्मीनान से खाया-पिया। जहाँ हम बैठे कॉफी पी रहे थे वहीं से सामने झील के किनारे भारत माता का भव्य मंदिर भी दिखाई दे रहा था। इस तरह के मंदिर आपको कुछ चुनिंदा जगहों पर ही मिलेंगे। (Mount Abu) जब आप पार्किंग से झील की तरफ जाते हैं तब रास्ते में आपको घुड़सवारी और ऊंट सवारी  का विकल्प भी मिलता है। आपको आसानी से बच्चे और कुछ न्यू  मैरिड कपल वहां सवारी करते और फोटोग्राफी करते दिख जायेंगे। यह झील नेचर लवर्स और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए एक बेहद पॉपुलर जगह है। हमने यहाँ फुरसत से अच्छा-खासा समय बिताया। दिलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मंदिर और फिर शेड्यूल के अनुसार निकल पड़े अगले पड़ाव दिलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मंदिर की और। अगर कहें कि दिलवाड़ा जैन मंदिर जैनियों के सबसे सुंदर तीर्थ स्थलों में से एक है तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। इस मंदिर का निर्माण 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच चालुक्य राजाओं वास्तुपाल और तेजपाल द्वारा किया गया था। यह मंदिर अपनी अद्भुत नक्काशी और  संगमरमर से सजे होने के लिए प्रसिद्ध है। बाहर से देखने पर भले ही यह मंदिर सामान्य दिखाई दे लेकिन जैसे ही आप मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं आप यहाँ की छत, मेहराबों, दीवारों और स्तंभों पर करीने से बनाये गए डिजाइनों को देखकर हैरत में पड़ जायेंगे। क्योंकि मंदिर के अंदर फोटोग्राफी मना है इसलिए बहुत से लोग इसकी सुंदरता से महरूम हैं। लेकिन फिर भी गूगल करने पर आपको दिलवाड़ा मन्दिर की बहुत सारी फ़ोटोज़ मिल जाएँगी, जिसे देखकर आप इसकी अद्भुत नक्काशी और सुन्दरता का अंदाजा लगा सकते हैं। यहाँ की मूर्तियों पर पॉलिशिंग इतनी चमकदार है कि सैकड़ों वर्ष पुरानी होने के बाद भी बिलकुल नई-सी लगती है। यहाँ की सभी मूर्तियां संगमरमर की है और उन पर बेहद फाइन कारीगरी की गई है। बताते हैं ये मन्दिर बनाने में लगभग 1500 शिल्पकार और 1200 श्रमिकों की कड़ी मेहनत लगी है। अपनी महीन नक्काशी और बनावट के लिए दुनिया भर में फेमस दिलवाड़ा मन्दिर बनने में 14 साल लगे और करीब 18 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। जैन मंदिर जैन भक्तों के लिए सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है और अन्य धर्म के लोगो के लिए यह दोपहर 12 से शाम 6 बजे तक