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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या?
वैसे तो पुरानी दिल्ली की संकरी गलियां और लोगो के हुजूम से गुलज़ार चाँदनी चौक का हर कोना पुरानी दिल्ली को नायाब बनाता है, लेकिन इन भीड़भाड़ व शोरगुल भरे बाजारों के ठीक बीचो-बीच एक शांत-सी मनमोहक हवेली भी है जो कभी मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) का घर हुआ करती थी। जिन लोगों को शायरी पसंद है उन सभी के लिए ग़ालिब की इस हवेली का ज़र्रा-ज़र्रा जैसे मोहब्बत की चाशनी में घुला हुआ शरबत है। Mirza Ghalib Ki Haveli


मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है।
भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर घोषित ये हवेली किसी को भी ग़ालिब का दीवाना बना सकती है क्यूंकि हवेली की पूरी सजावट उनकी लिखी शायरियों से ही की गयी है। आपको बता दें मिर्ज़ा ग़ालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ां ग़ालिब है जिन्हें प्यार से “मिर्जा नीता” नाम से भी जाना जाता है। उनकी पत्नी का नाम उमराव था, विवाह के समय गालिब 13 वर्ष और उमराव 12 वर्ष की थी।
उत्तर प्रदेश के आगरा में जन्में मिर्जा ग़ालिब शादी के बाद दिल्ली आ गए थे। आगरा से लौटने के बाद गालिब ने 1860-1869 तक इसी हवेली में शरण ली थी और इसी हवेली में बैठकर ग़ालिब ने ऊर्दू और पारसी में ‘दीवान’ की रचना की थी। यही वो स्थान है जहाँ उन्होंने अपने अंतिम श्वास लिए थे। ग़ालिब की मौत के बाद साल 1999 तक इस हवेली में दुकानें बननी और बाजार लगना शुरू हो गया था। जिसके कारण हवेली की चमक फीकी पड़ती चली गई। यही कारण है कि 500 एकड़ में बनी ये हवेली अब बस 150 एकड़ की बची है।(Mirza Ghalib ki Haveli)

1999 में सरकार ने इस हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया। धरोहर घोषित करने के बाद ग़ालिब की हवेली का पुर्ननिर्माण किया गया, मुगल लखोरी, ब्रिक्स, सैंड स्टोन और लकड़ी के दरवाजों का इस्तेमाल कर हवेली को खूबसूरत लुक दिया गया।


मुगल वस्तुकला से बनी हवेली के लकड़ी के बड़े से दरवाजे को देखते ही आप ग़ालिब के समय में लौट जाएंगे। हवेली में अंदर घुसते ही सीधे हाथ पर एक बड़ा-सा कमरा है। कमरे में ग़ालिब का अचकन और उनकी बेगम के वस्त्र फ्रेम करके बेहद संजीदगी से लगाए गए हैं। बीचो-बीच ग़ालिब का स्टैच्यू दिखेगा जिसके दोनों तरफ गालिब की मोटी-मोटी पोथी रखी हुई हैं। आप जैसे-जैसे हवेली में आगे बढ़ेंगे आपको ग़ालिब द्वारा खेलें जाने वाले खेल चौसर, शतरंज की बिसातें, उनके बर्तन और पुरानी पुस्तकें देखने को मिलेंगी। Mirza Ghalib Ki Haveli


यहाँ आपको ग़ालिब के अलावा उनके समकालीन शायरों के चित्र भी दिखाई देंगे। हवेली में एक जगह हुक्के के साथ गालिब का एक बिलकुल जीवंत प्रतीत होता स्टैच्यू भी नजर आएगा जो शायद इस बात का प्रतीक है कि वो हुक्के के बेहद शौक़ीन थे। पूरी हवेली की तमाम दीवारों पर ग़ालिब और उनकी शायरी के पोट्रेट बड़े ही तहज़ीब और करीने से लगाए गए हैं। जिनकों देखकर पढ़कर ग़ालिब के तमाम शेर ज़ेहन में अनायास ही घूम जाते हैं….
“उग रहा दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ग़ालिब
हम बयावां में हैं और घर में बहार आई है”
जबसे ग़ालिब की हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है तबसे यह हवेली पुरानी दिल्ली का एक प्रमुख आकर्षण बन चुकी है। सुबह 11 से शाम 6 बजे तक आम दर्शकों के लिए खुलने वाली ये धरोहर हवेली सिर्फ सोमवार के दिन बंद रहती है। आप बिना किसी टिकट के यहाँ फ्री में एंट्री करिये। साथ में आप अपने कैमरे से हवेली की जी भर के तस्वीरें लीजिये। फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है।

ग़ालिब किसी इमारत या चारदीवारी के मोहताज नहीं हैं और न ही उन्हें इन तंग और सौ-डेढ़ सौ एकड़ की हवेलियों में समेटा जा सकता है। लेकिन फिर भी जिनको ग़ालिब से इश्क़ है, शेरो-शायरी पसंद है, जो कवितायेँ लिखते-पढ़ते हैं और जो ग़ालिब को समझना चाहते हैं उनको यहाँ अवश्य आना चाहिए।
क्यों जाएँ मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली ? Five Reasons to Visit Mirza Ghalib ki Haveli-
1. जिन लोगों को कविताएं -शायरी में दिलचस्पी है उन सभी के लिए ग़ालिब की यह हवेली एक अच्छा विकल्प है।
2. मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली दिल्ली के चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है, जहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है।
3. राष्ट्रीय धरोहर घोषित इस हवेली में मिर्ज़ा ग़ालिब की जिंदगी से संबंधित काफी पुरानी चीजें हैं, जो ग़ालिब के चाहने वालों के लिए यकीनन किसी तोहफे से कम नहीं।
4. यहाँ आप बिना किसी टिकट के फ्री में एंट्री कर सकते हैं। 5. फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है।
Research by Geetu Katyal
Written & Edited by Pardeep Kumar

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