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जबसे मेरी विशेष रूचि भारत का इतिहास जानने में हुई खासकर बड़े-बड़े किलों और महलों का, तब से कुम्भलगढ़ की दीवार के बारे में खूब सुना था। चौदहवीं सदी में बना कुम्भलगढ़ परकोटा दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है। चीन की दीवार के बाद कुम्भलगढ़ के परकोटे की चौड़ाई सबसे अधिक है।(Kumbhalgarh Fort)

राजस्थान के राजसमन्द जिले में स्थित कुम्भलगढ़ के किले को इत्मीनान से देखने के लिए आपको पूरा एक दिन लग ही जाता है। अपने शेड्यूल के हिसाब से हम सुबह 11 बजे तक कुम्भलगढ़ पहुँच गए थे। पार्किंग से कुम्भलगढ़ किले तक जाने के दो तरीके हैं एक आप लगभग दो किलोमीटर चढ़ाई पैदल चलें, दूसरा वहां बहुत सारी जीप आपको मिल जाएँगी जिसमें सौ रुपए सवारी के हिसाब से वो किले तक पहुंचा देंगे। जहाँ से आपको टिकट लेना और अंदर प्रवेश करना है। अक्टूबर का महीना था इसलिए अभी 11 बजे तक इतनी खास गर्मी नहीं थी। पानी और कुछ खाने पीने का सामान अपने पास अवश्य रखें क्योंकि ये किला बहुत बड़ा है, ऊपर से पूरे किले में सिर्फ चढ़ाई ही चढ़ाई है जोकि अमूमन सभी किलों में होती ही है। लेकिन यहाँ आपको सीढियां भी बहुत चढ़नी पड़ेंगी इसलिए शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आप को मजबूत रखें।
वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। क्योंकि देखा जाए तो राजस्थान में साल भर गर्मी ही रहती है।

राजस्थान के किलों का अपना एक अलग समृद्ध इतिहास है, जो इसे देसी-विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनाता है। यहां के किले व महल अपनी बनावट के कारण अनजाने ही लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। वैसे राजस्थान के लगभग सभी किले चाहे वो जैसलमेर का सोनार किला हो या जयपुर का आमेर या जयगढ़ का किला सभी सैलानियों में अच्छे खासे प्रसिद्ध हैं, लेकिन फिर भी कुंभलगढ़ का किला अपना एक अलग महत्व रखता है। वो इसलिए कि इस किले की खासियत है उसकी दीवार, जिस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं।(Kumbhalgarh Fort)

दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक चीन की दीवार के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन यहाँ आपको बता दें कुंभलगढ़ को भी ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया कहा जाता है। चित्तौड़गढ़ किले के बाद कुंभलगढ़ किला राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा किला माना जाता है। यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज घोषित यह किला मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप का जन्मस्थान है। इस किले को युद्ध में कभी भी जीता नहीं गया। कहते हैं हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी किले में रहे।

बता दें किसी समय कुम्भलगढ़ किला परिसर में छोटे-बड़े लगभग 400 मंदिर होते थे। कुछ एक मंदिरों को छोड़कर बाकी अब नष्ट हो गए हैं। किले के मुख्य दरवाजे से जैसे ही प्रवेश करते हैं वैसे ही सामने दाहिने हाथ की तरफ नीलकंठ महादेव जी का एक भव्य मंदिर दिखाई देता है। मुख्य दरवाजे से अंदर जाते ही मंदिर की तरफ छोटा-सा बाजार बना हुआ है जहाँ आप खाने-पीने से लेकर हल्की-फुल्की खरीददारी कर सकते हैं। आपकी चढ़ाई इस किले के सबसे ऊपरी हिस्से में बादल महल व कुम्भा महल में जाकर समाप्त होती है, बदल महल से आप दूर-दूर तक फैली हुई अरावली श्रंखला की ख़ूबसूरती निहार सकते हैं। हमनें वहां से आसपास के खूबसूरत नज़ारों को कैमरे में कैद किया। किले में कई जगह ऐसी हैं जहाँ से आप कुम्भलगढ़ की दीवार को भी देख सकते हैं जिससे इस किले की विशालता का सहज ही अनुमान हो जाता है।
अबुल फजल किले की ऊंचाई के विषय में लिखते हैं “यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।“
सच कहूं तो इस ऐतिहासिक किले का अनुभव बेहद शानदार रहा। यहाँ से लौटने के बाद मन सोचने पर विवश हो जाता है कि किस तरह इंसान जीवन के किस्से लिखता है और साम्राज्यों की कहानियां भी। और भले ही इन किलों की गर्वीली कहानियां कितनी ही पुरानी क्यों न हो जाये लेकिन फिर भी सदियों तक दोहराई जाती रहेंगी। (Kumbhalgarh Fort)
Written by Pardeep Kumar
Glimpse of Kumbhalgarh Fort….










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