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Gorakhnath Temple: गोरखपुर के गोरखनाथ बाबा का प्रसिद्ध मंदिर -जहाँ मिलता हैं हर दिल को सुकून

भारत ऋषि-मुनियों और साधु-संतों का देश है। यही कारण है कि भारत को विदेशों में आज विश्व गुरु के नाम से भी जानते हैं। देश योग गुरू बनने की ओर भी अग्रसर है। बाबा रामदेव का नाम आज योग की दुनिया में सबसे पहले लिया जाता है।  फाइव क्लर्स आफ ट्रैवल की टीम आज आपको एक ऐसे योग साधक से रूबरू करवाएगी, जिसका इतिहास 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। ऐसा भी कहा जाता है कि भारत में योग की शुरुआत इन्ही से शुरू हुई थी। (Gorakhpur Temple)

गोरखनाथ बाबा के बारे में कौन नहीं जानता है। गोरखनाथ बाबा नाथ संप्रदाय के प्रमुख प्रचारक थे यानी कि नाथ संप्रदाय को जो प्रसिद्धि हासिल हुई थी, उसमें गोरखनाथ बाबा का बहुत बड़ा श्रेय है। नाथ संप्रदाय का सबसे प्रमुख चेहरा गोरखनाथ बाबा को ही माना जाता है।

गोरखनाथ मंदिर शहर के बीचो-बीच स्थित है और यह मंदिर लगभग 52 एकड़ जमीन पर फैला हुआ है। गोरखनाथ मंदिर जाने की शुरुआत खिचड़ी (मकर सक्रांति) के दिनों में होती है। यह मेला खिचडी से शुरू होता है और फरवरी के अंत तक रहता है, क्योंकि यहां पर जाने का ज्यादा फायदा इन्हीं दिनों में होता है। खिचड़ी के दिन से ही यहां पर भव्य मेला लगता है। रोज कई हजारों की संख्या में लोग यहां पर घूमने के लिए आते हैं। (Gorakhpur Temple)

पार्किंग की सुविधा

वैसे तो इस मंदिर के कई गेट हैं। अगर आप साधारण दिनों में आते हैं तो आप अपनी गाड़ी मंदिर के बाहर खड़ी कर सकते हैं। अगर आप मेले के दिनों में आते हैं तो आपको बहुत दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि इस तरह गाड़ी मंदिर के बाहर खड़ी करना आपको भारी भी पड़ सकता है। मुख्य द्वार से कुछ दूरी पर ही एक पार्किंग स्थल है। जहाँ आप अपनी गाड़ी पार्क कर बेफिक्र होकर मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं।

मेले के दिनों में अगर आप मंदिर में एंट्री करना चाहते हैं तो आपको मुख्य द्वार से ही एंट्री करनी होगी है। क्योंकि मेले में लोगों की संख्या और सुरक्षा कारणों को देखते हुए मुख्य द्वार से ही एंट्री दी जाती है।

खिचडी चढ़ाने की परंपरा

मंदिर में मकर सक्रांति के समय प्रसाद के तोर पर खिचड़ी चढ़ाई जाती है। यूपी, बिहार, नेपाल सहित अन्य राज्य से लाखों भक्त खिचड़ी चढ़ाने आते हैं। गोरखनाथ में पहली खिचड़ी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चढ़ाते हैं। खिचड़ी चढ़ाने की ये परंपरा काफी पुरानी है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक त्रेता युग में गुरु गोरखनाथ हिमाचल के कांगड़ा में स्थित ज्वाला देवी मंदिर गए थे। यहां देवी ने उन्हें दर्शन देते हुए भोज पर आमंत्रित किया। कई प्रकार के व्यंजन देखकर गोरखनाथ ने ज्वाला देवी से कहा कि वह भिक्षा में मिले दाल चावल ही खाते हैं। इसलिए उनके लिए दाल चावल ही लाएं, तब ज्वाला जी ने गोरखनाथ को खिचड़ी बनाकर खिलाई थी। इसके बाद गोरखनाथ भिक्षाटन करते हुए बाबा गोरखनाथ राप्ती नदी के पास पहुंचे और यहां साधना में लीन हो गए। लोग उनके पात्र में चावल और दाल डालते थे, लेकिन उनका पात्र नहीं भरता था। तब से गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा है।

मेले में लोगों की इतनी अधिक भीड़ रहती है कि वहां पर पैर रखने तक की भी जगह नहीं मिलती। आपको मेले में कई तरह के झूले दिखाई देंगे। झूले का स्वाद लेने के लिए लोगों को पहले से ही लाइन में लगना पड़ता है, क्योंकि- झूले झूलने वालों की संख्या बहुत अधिक रहती है। इसलिए आप सोच सकते हैं कि यह मेला गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों के लिए कितना ज्यादा मायने रखता है। (Gorakhpur Temple)

मंदिर का इतिहास

गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर भारत के पुराने मंदिरों में से एक माना जाता है। यह मंदिर नाथपीठ का मुख्यालय भी है इस समय गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर सीएम योगी आदित्यनाथ हैं। साथ ही यह मंदिर नाथ योगियों का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां योग साधना और तपस्या सिखाई जाती है। मुगल काल के दौरान मंदिर को कई बार तोड़ा गया था। ऐसा माना जाता है कि मंदिर के वर्तमान ढांचे के निर्माण 19वीं सदी में दिग्विजय नाथ और अवेद्यनाथ ने करवाया था। मंदिर को लेकर ऐसी जनश्रुति है कि ज्वालामुखी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए गोरक्षनाथ ने राप्ती के तटवर्ती क्षेत्र में तपस्या की थी और यहां उसी स्थान पर अपनी दिव्य समाधि लगाई थी, जहां वर्तमान में श्री गोरक्षनाथ मंदिर स्थित है।

मंदिर के आसपास साज-सज्जा का विशेष ध्यान रखा गया है।

आप मंदिर के पास बने तलाब में बोटिंग का भी आनंद ले सकते हैं। बोटिंग का मूल्य बहुत अधिक नहीं है आप आसानी से 30 से 60 रुपए में यहाँ बोट में घूमने  का आनंद ले सकते हैं। तालाब में आपको सफ़ेद बत्तख भी तैरती दिखाई देती हैं जिससे तालाब की सुंदरता और अधिक बढ़ जाती है।

मंदिर के पास ही आपको एक छोटा सा और मंदिर मिल जाएगा। प्रवेश करेंगे तो आपको कई सारे योगियों की मूर्ति बने हुए मिल जाएगी। हालांकि यहां पर फोटो खींचने में वहां के कर्मचारियों द्वारा मनाही की जाती है मगर फिर भी चुपके से फोटो ले सकते हैं ऐसे भी मना ही नहीं थी।

महंत दिग्विजय नाथ स्मृति भवन

बाहर से देखने पर महंत दिग्विजय नाथ स्मृति भवन एक भव्य महल दिखाई देता है। जब आप अंदर प्रवेश करेंगे वहां आपको एक लाइन से सैकड़ों मूर्तियां बनी हुई दिखाई देंगी। इतनी बड़ी संख्या में एक साथ मूर्तियों का होना एक अलग किस्म का ही एहसास दिलाता है। गोरखपुर मंदिर के अंदर साज सज्जा और इसकी सजावट सच में बिल्कुल अद्भुत है।

मंदिर के पास  बाजार में आप खरीदारी भी अच्छी कर सकते हैं क्योंकि आमतौर पर यहाँ किफायती रेट पर ही सामान मिलता है। आप बिना तोलमोल किए भी कम रुपए में अच्छा सामान खरीद सकते हैं।

कैसे पहुंचे गोरखनाथ मंदिर

अगर आप गोरखपुर रेलवे स्टेशन से गोरखनाथ मंदिर जाते हैं तो मात्र 3 किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी। आप आसानी से कैब या ऑटो रिक्शा की सहायता से मंदिर पहुंच सकते हैं। अगर आप हवाई यात्रा से गोरखपुर पहुंचते हैं तो 10 किलोमीटर की दूरी तय कर आप ऑटो या कैब की सहायता से गोरखनाथ मंदिर पहुंच सकते हैं।

 

Story & Research by Pravesh Chauhan
Edited by Pardeep Kumar