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यूँ तो हमारे देश की पुरानी इमारतों और धरोहरों की अनगिनत खासियत हैं लेकिन एक चीज जो उन्हें बाकी सबसे अलग करती है वो है इनकी वास्तुकला। कितने शासक आये और कितने गए लेकिन कुछ नहीं गया तो वो है यहाँ की इमारतों की अनूठी वास्तुकला बनावट। आज आपको हम इस ब्लॉग में ऐसी एक इमारत की वास्तुकला के दर्शन कराएंगे, जिसका नाम है फतेहपुरी मस्जिद। यह मस्जिद भले ही देश की अन्य जानी-पहचानी और बड़ी मस्जिदों की तरह लाइम लाइट में न हो पर वक़्त के थपेड़े और बहुत से उतार-चढाव से गुजरी चाँदनी चौक की रौनक बढ़ाती फतेहपुरी मस्जिद अपने आप में लाजवाब निर्माण कला की मिसाल है। सड़क के एक छोर पर बना है लाल किला और पश्चिम छोर पर फतेहपुरी मस्जिद। भीड़भाड़ वाली सड़कें पार करके जैसे ही आप फतेहपुरी मस्जिद के सामने पहुंचेंगे आपको ऐसा आभास होगा मानो सारी भागमदौड़ और शोर कहीं पीछे छूट गया हो। 380 साल पुरानी मस्जिद अपने अंदर न जाने कितने शासकों का इतिहास समेटे हुए है जो इसे और भी अधिक दर्शनीय बनाता है।

चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन से 2 किलोमीटर दूर बनी फतेहपुरी मस्जिद का निर्माण 1650 में हुआ था। मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह की बेगम फतेहपुरी द्वारा करवाया गया था। इसलिए मस्जिद का नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। आपको बता दें मस्जिद के पास ही एशिया का सबसे बड़े मसालों का बाजार- खारी बावली भी है।
मस्जिद के इतिहास को लेकर विभिन्न कथाएँ हैं लेकिन माना जाता है कि 1857 में प्रथम भारतीय संग्राम के बाद अंग्रेजों ने मस्जिद को नीलाम कर दिया था। उस समय राय लाला चुन्नामल ने मस्जिद को मात्र 11000 रुपय में खरीदा था। जिनके वंशज आज भी चाँदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं। 1877 में लॉर्ड लिटन ने मस्जिद को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया और यही बोर्ड आज तक मस्जिद संभाल रहा है।

फतेहपुरी मस्जिद की खूबसूरती का मुख्य कारण है उसकी बनावट में इस्तेमाल लाल पत्थर। दिल्ली के लालकिला और जामा मस्जिद की तरह इसका निर्माण भी लाल पत्थरों से किया गया है। मस्जिद परंपरागत डिजाइन में है लेकिन इबादत हॉल की आकृति धनुषाकार है। मस्जिद के बड़े दरवाज़े से आप जैसे ही अंदर प्रवेश करेंगे विशाल परिसर आपका दिल जीत लेगा। परिसर के बीच इस्लामी विद्वानों की 20 से अधिक कब्र हैं। हजरत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद, मज़हर उल्लाह शाह, मौलाना मोहम्मद आदि की कब्र मस्जिद में मौजूद है।



आपको बता दें मस्जिद में तीन विशाल दरवाजे हैं, जिसमें से 2 दरवाजे उत्तर में हैं और एक दक्षिण में। आगे बढ़ते ही आपकी नजर सफेद संगमरमर से बने एक पानी के कुंड पर जाएगी। मस्जिद के दोनों तरफ लाल पत्थर से बने स्तंभों की कतारें हैं जो बिल्कुल बराबर संतुलन में बनी हुई हैं। दो मंजिला मस्जिद में सात विशाल मेहराब बने हैं और यह दिल्ली की अकेली एकल गुंबददार मस्जिद है। इस्लाम धर्म के अनुयायी और लोग आज भी अपने दो प्रमुख त्योहारों ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा ने बड़ी संख्या में फतेहपुरी मस्जिद पहुंचते हैं।

मस्जिद में बैठे एक मौलवी ने बताया की मस्जिद की बहुत मान्यता है, जिन लोगों पर अल्लाह का मेहरबानी होती है वही इस मस्जिद में प्रवेश कर पाते हैं और जो प्रवेश करता है अल्लाह उसे सारे दुखों से दूर रखते हैं। लेकिन अगर मस्जिद के रख रखाव की और थोड़ा विशेष ध्यान दिया जाए तो यह और भी सुन्दर दिखाई दे।

लगभग 380 साल पुरानी धरोहर होने के बावजूद भी फतेहपुरी मस्जिद आज भी उतनी दमदार है जितनी अपनी शुरुवाती दौर में रही होगी। मस्जिद के अंदर हर दीवार पर उर्दू में अलग-अलग कलमें लिखें हुए हैं। और कुरान की करीब 100 प्रतियाँ रखी हुई हैं।

मस्जिद तो पुरानी दिल्ली की शान दुगनी करती ही है लेकिन मस्जिद आये लोगों के लिए बोनस है मस्जिद के बाहर मिलने वाला बढ़िया समान और स्वादिष्ट भोजन। क्योंकि देश के सबसे पुराने और प्रसिद्ध बाज़ारों में से एक में यह मस्जिद स्थित है।
यहाँ आने के लिए निकटतम मेट्रो स्टेशन चांदनी चौक है।
धर्म और मज़हब से ऊपर उठ कर अगर आप एक शानदार शांतचित और अपनी बनावट और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध ईमारत का दीदार करना चाहते हैं तो आपके लिए फतेहपुरी मस्जिद परफेक्ट है।
Research by Geetu Katyal
Edited by Pardeep Kumar

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