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रक्श से लेकर राज तक,विवादों से भरा था कुदसिया बाग की बेगम कुदसिया का सफर

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क्या कहता है इतिहास?(What is the history of Qudsia Bagh?)इतिहासकारों और दिल्ली सरकार के डिपार्मेंट ऑफ़ आर्कियोलॉजी (Department of archaeology) के हिसाब से इस बगीचे का निर्माण 1748 में करवाया गया था। बताया जाता है कि कुदसिया बेगम एक नर्तकी थीं जो मुगल बादशाह (Mughal Emperror) मोहम्मद शाह के दरबार में रक्श पेश किया करती थीं। उनकी खूबसूरती और नृत्य कला से मुगल बादशाह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कुदसिया बेगम से निकाह कर लिया। बताया जाता है कि कुदसिया बेगम लाल किले के चहल पहल वाली जिंदगी से दूर सुकून से रहना चाहती थीं और उनकी इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए उनके बेटे अहमद शाह ने इस बाग का निर्माण करवाया था। यह बाग कश्मीरी गेट के पास सिविल लाइंस के इलाके में पड़ता है। जहां उस समय यमुना नदी की धारा बहती थी। इस बगीचे में एक प्रवेश द्वार, एक मस्जिद और एक बावड़ी के अतिरिक्त कई सारी मेहराबें हैं। इतिहासकारों के मुताबिक यहां कई सारी इमारतें थी जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम के समय अंग्रेजों द्वारा ध्वस्त किया कर दिया गया था। यहां के मस्जिदों में आज भी नियमित तौर पर नमाज अदा किया जाता है। अब इस पार्क का नाम बदल कर महाराणा प्रताप वाटिका(Maharana Pratap Vatiika) रख दिया गया है। कुदसिया बेगम का व्यक्तिगत जीवन : अगर बात करें कुदसिया बेगम के व्यक्तिगत जीवन के बारे में तो बताया जाता है कि उनका जन्म मूल रूप से एक हिंदू परिवार में हुआ था और उनका नाम उधम बाई था। कुदसिया बेगम को अपने जीवन काल में बाई-जू साहिबा, नवाब कुदसिया, साहिबा-उज़-ज़मानी और मुमताज महल जैसे कई प्रकार के उपनामों से भी नवाजा गया था। हालांकि कुदसिया बेगम का जीवन बहुत विवादित माना जाता है, क्योंकि बताया जाता है कि उनका संबंध उन्हीं के हरम के प्रबंधक जावेद खान नवाब बहादुर के साथ था जो एक किन्नर था। उनके इस संबंध के बारे में यह भी कहा जाता है कि जब 1752 में जावेद खान नवाब बहादुर को सफदर जंग ने मार दिया तो कुदसिया बेगम ने उनकी हत्या पर न सिर्फ शोक जताया बल्कि अपने गहनों को भी त्याग दिया और सफेद वस्त्र को धारण कर लिया।कुदसिया बेगम बहुत हीं खर्चीली और उदार किस्म की व्यक्ति थीं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब महल में सैनिकों के तनख्वाह के बकाया को भुगतान करने के लिए दो लाख रुपए भी इकट्ठा नहीं किए जा सके, तब उन्होंने सिर्फ अपना जन्मदिन मनाने के लिए दो करोड़ रुपए खर्च कर दिए। 26 मई 1754 को मल्हार राव होल्कर ने अहमद शाह बहादुर को हरा दिया था। इसके बाद कुदसिया बेगम सिकंदराबाद छोड़कर दिल्ली भाग कर आ गईं। लेकिन मल्हार राव होलकर ने दिल्ली तक उनका पीछा किया और अहमद शाह बहादुर के साथ-साथ कुदसिया बेगम की भी आंखें निकलवा दी। क्या है इस बाग की खासियत?(What is the specialty of this garden?) अगर बात करें इस बाग के खासियतों के बारे में तो आपको इस बाग में न सिर्फ मुगल इतिहास देखने को मिलेगा, बल्कि पारसी स्थापत्य कला के नमूने भी देखने को मिल जाएंगे। इस बाग में एक बारहद्वार वाला महल है जो इसका सबसे मुख्य आकर्षण माना जाता है। इसके अतिरिक्त इस बाग में एक मस्जिद भी है जहां प्रतिदिन नियमित तौर पर नमाज अदा किया जाता है। यहां के मस्जिद में नमाज की टाइम टेबल भी लगाई गई है। हालांकि अंग्रेजी सरकार के बमबारियों के कारण इस मस्जिद का काफी नुकसान हो चुका है, लेकिन अभी भी आप यहां उस समय के स्थापत्य कला के नमूने देख सकते हैं। यहां की मेहराबों पर की गई महीन नक्काशियां लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम हैं।इस बाग के दरवाजे इतने बड़े-बड़े हैं कि उनमें से हाथी भी गुजर सकते हैं। बताया जाता है कि इन दरवाजों को हाथियों के गुजरने के लिए हीं बनाया गया था। आपको इस बाग में एक ऐसा स्थान भी देखने को मिलेगा, जहां पर हाथियों को बांधा जाता था।इस बाग में एक ओपन जिम भी है। जहां पर आप एक्सरसाइज कर सकते हैं। साथ हीं इस बाग में बच्चों के लिए एक छोटे से पार्क की व्यवस्था भी है। जहां बहुत से अलग-अलग प्रकार के झूले लगाए गए हैं। यहां बैठने की भी बहुत ही अच्छी व्यवस्था की गई है और इस पार्क के साफ-सफाई का भी बहुत हीं अच्छे से ध्यान रखा जाता है। क्या है कुदसिया बाग की टाइमिंग?(What is the timing of Qudsiya Bagh?) जहां अधिकतर हॉन्टेड जगहों की टाइमिंग फिक्स होती है और वहां 5:00 के बाद लोगों को जाने नहीं दिया जाता है, वहीं कुदसिया बाग उन सभी हॉन्टेड जगहों से थोड़ा अलग है।अगर बात करें कुदसिया बाग के टाइमिंग (Qudsia Bagh timings) की तो यह चौबीसो घंटे खुला रहता है। यानी कि यहां पर आप कभी भी आ जा सकते हैं। इस बाग में आने जाने की कोई पाबंदी नहीं है और ना हीं आपको इस बाग में आने के लिए किसी भी प्रकार के टिकट (Qudsia Bagh ticket price) की आवश्यकता होगी। कैसे पहुंचे कुदसिया बाग?(How to reach Qudsia Bagh?)अगर आप कुदसिया बाग आना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे पहले कश्मीरी गेट पहुंचना होगा। आप अपनी इच्छा अनुसार बस या फिर मेट्रो से कश्मीरी गेट (Which metro station is near to Qudsiya Bagh) पहुंच सकते हैं। कश्मीरी गेट पहुंचने के बाद आप वहां से 700 मीटर पैदल चलकर इस बाग तक पहुंच जाएंगे। आप चाहे तो कश्मीरी गेट से ई-रिक्शा भी ले सकते हैं। आपको इस बाग में अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। यहां पार्किंग की बहुत अच्छी व्यवस्था की गई है। जब हमने इस बाग को एक्सप्लोर किया और पूरी तरह से छानबीन की तो हमें इस बाग में ऐसा कुछ हाउंटेड नहीं दिखा। बल्कि हमें इस बाग में आकर बहुत हीं सुकून का अनुभव हुआ और हमारे हिसाब से आप भी बिना डरे इस बाग में घूमने जा सकते हैं। यकीनन आपको भी यहां पर बहुत हीं अच्छा महसूस होगा।

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इस होली में ग्वालों पर लट्ठ बरसाती हैं बरसाने की गोपियाँ

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दोस्तों फाल्गुन मास की शुरुआत हो चुकी है और देश भर में होली के गानों की गूंज सुनाई देने लगी है। ऐसे में आप सब ने खबरों में जरूर देखा होगा कि मथुरा वृंदावन में किसी दिन लठमार होली मनाई जा रही है, तो किसी दिन बनारस में मसान होली खेली जा रही है। ऐसे में आपके जहन में यह सवाल जरूर आया होगा कि होली तो होली होती है, इसके इतने प्रकार कैसे हैं और क्यों हैं?आज के फाइव फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने जा रहे हैं पूरे भारतवर्ष में मनाए जाने वाले अलग-अलग होली के प्रकारों के बारे में। होली का मथुरा वृंदावन से बहुत हीं गहरा रिश्ता है। इसीलिए जब भी होली का नाम आता है हमारे दिल और दिमाग में सबसे पहले रंग, गुलाल के साथ-साथ मथुरा और वृंदावन का ख्याल आता है। आज का हमारा यह ब्लॉग भी मथुरा और वृंदावन में मनाए जाने वाले एक खास प्रकार की होली – लट्ठमार होली के बारे में है। आज के फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल(Five colors of travel) के होली सीरीज में हम आपको मथुरा वृंदावन के लठमार होली के बारे में कुछ खास बात बताने वाले हैं– (Latthmaar Holi of Barsana) क्या है लट्ठमार होली?(What is Latthmaar holi?) हम जब भी होली के बारे में सोचते हैं हमारे ध्यान में सबसे पहले श्री कृष्ण का बाल रूप आता है। यमुना के तट पर राधा और गोपियों के साथ श्री कृष्ण की होली मनाने की लीलाएँ तो आप सब ने सुनी होगी। लट्ठमार होली भी श्री कृष्ण की लीलाओं से ही जुड़ी हुई है। लट्ठमार होली देखने के लिए आपको बरसाना या नंदगांव जाना पड़ेगा। खासकर बरसाना में आपको इस होली की झलक बहुत हीं अच्छे से देखने को मिल जाएगी। यह एक ऐसी होली है जिसमें जब लड़के लड़कियों को रंग लगाने की कोशिश करते हैं तो लड़कियां उन पर लट्ठ बरसाती हैं। क्या है इस होली की कहानी?(Story behind this holi) बताया जाता है कि होली के दिन श्री कृष्ण अपने ग्वालों के साथ बरसाना गए थे और वहां राधा रानी और गोपियों को उन्होंने बहुत परेशान किया। कान्हा और ग्वालों की शैतानियों से परेशान होकर गोपियों और राधा रानी मिलकर उन्हें भगाने के लिए उन पर लट्ठ से वार किया था और उसी दिन से यह परंपरा आज तक चली आ रही है। लठमार होली के दिन बरसाने की महिलाएं उन्हें रंग लगाने आने वाले पुरुषों पर लाठी से वार करती हैं और पुरुषों को इससे बचना होता है। टेसू के फूलों से बनते हैं रंग (Colors are made from Tesu flowers): बरसाने की यह होली अपनी खास और अतरंगी के अंदाज की वजह से पूरे भारतवर्ष में जानी जाती है। इतना हीं नहीं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से भी लोग इस दिन बरसाना आना चाहते हैं और होली खेलना चाहते हैं। लेकिन सिर्फ यहां की होली ही खास नहीं है, बल्कि यहां के रंगों की कहानी भी बहुत हीं खास है। क्योंकि यहां जो होली के रंग बरसाए जाते हैं वह कोई साधारण रंग या गुलाल नहीं होता बल्कि पूरी तरह से शुद्ध हर्बल रंग (Best and pure color) होता है। जिसे बरसाना के लोग खुद ही तैयार करते हैं। कई दिनों पहले से ही शुरू हो जाती है रंग बनाने की प्रक्रिया (The process of making of this pure color starts several days in advance) बरसाने की होली की तैयारी वसंत ऋतु के आगमन के साथ हीं होने लगती है। जैसे ही वसंत ऋतु का आगमन होता है टेसू के वृक्ष में लाल रंग के फूल खिलने लगते हैं और इन्हीं फूलों से तैयार होता है हमारे बरसाने की होली के लिए हर्बल रंग! सबसे पहले इन टेसू के फूलों को बड़े-बड़े कंटेनर में इकट्ठा कर लिया जाता है।क्योंकि बरसाने आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बहुत अधिक होती है इसलिए रंग बनाने के लिए राज्य के अलग-अलग हिस्सों से टेसू के फूल इकट्ठा किए जाते हैं। फिर इन फूलों को पानी में डालकर रात भर भींगने के लिए छोड़ दिया जाता है। अगले दिन इन फूलों को बड़े से कढ़ाई में पानी में डालकर उबाल लिया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान एक व्यक्ति होता है जो उस कढ़ाई को हमेशा चलता रहता है। जब ये फूल कढ़ाई में अपना रंग छोड़ देते हैं तो फिर एक बड़े से कंटेनर के ऊपर सूती कपड़ा रखकर उसमें उबले हुए रंगीन पानी को छान लिया जाता है। अब इस छाने हुए पानी में इत्र, चंदन, गुलाबजल आदि मिलाया जाता है। कहीं-कहीं देखा गया है कि इसमें हल्दी और चुना भी मिलाया जाता है। चुना मिलाने से पानी का रंग और भी ज्यादा निखर जाता है। यह रंग पूरी तरह से हर्बल होता है और हमारे त्वचा के लिए भी अच्छा होता है। जो फूल छान कर बच जाते हैं उन्हें फिर से दूसरे फूलों के साथ पानी में भीगने के लिए डाल दिया जाता है। रंगों के कंटेनर से रंगों को फिर बड़े-बड़े तांबे के बर्तन में निकाल लिया जाता है। जिसे राधा रानी के मंदिर और बाकी के मंदिरों में भक्तों पर उछाला जाता है। यहां आने वाले भक्त भी इस होली को बहुत इंजॉय करते हैं। क्योंकि उनको पता होता है कि यह रंग उनके लिए किसी भी प्रकार का खतरा नहीं बनेगा और ना ही उन्हें इस रंग से कोई साइड इफेक्ट होगा। इसलिए यहाँ आने वाले श्रद्धालु दिल खोलकर होली खेल पाते हैं। कैसे पहुंचे वृंदावन? (How to reach Vrindavan?) मथुरा वृंदावन पहुंचना बहुत हीं आसान है अगर आप दिल्ली रहते हैं तो आपको मथुरा वृंदावन पहुंचने के लिए ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप ट्रेन से भी दो से ढाई घंटे में मथुरा वृंदावन पहुंच सकते हैं। मथुरा जंक्शन भारत के अलग-अलग रेलवे स्टेशनों से बहुत ही अच्छे तरीके से कनेक्ट है। मथुरा जंक्शन पहुंचकर आप वहीं आसपास किसी होटल में स्टे ले सकते हैं या फिर आप किसी धर्मशाला की तलाश करने के लिए जा सकते हैं। मथुरा पहुंचकर आप वहां से ऑटो या कब के जरिए वृंदावन पहुंच सकते हैं।बाय रोड भी मथुरा वृंदावन की कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है। आप अपनी गाड़ी से मथुरा वृंदावन बहुत ही आसानी से जा सकते हैं।

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एक होली ऐसी भी : चिता के भस्म से खेली जाती है यहाँ होली

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दोस्तों जैसा कि फाल्गुन के महीने की शुरुआत हो चुकी है और देश भर में होली (Holi) के गानों की गूंज सुनाई देने लगी है। ऐसे में आप सब ने खबरों में जरूर देखा होगा कि मथुरा वृंदावन में किसी दिन लठमार होली मनाई जा रही है, तो किसी दिन बनारस में मसान होली खेली जा रही है। ऐसे में आपके जहन में यह सवाल जरूर आया होगा कि होली तो होली होती है, इसके इतने प्रकार कैसे हैं और क्यों हैं?आज के फाइव फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने जा रहे हैं पूरे भारतवर्ष में मनाए जाने वाले अलग-अलग होली के प्रकारों के बारे में।होली का रंगों से बहुत हीं गहरा रिश्ता है। इसीलिए जब भी होली का नाम आता है हमारे दिल और दिमाग में सबसे पहले रंग, गुलाल और पिचकारी का ख्याल आता है। लेकिन क्या आपको पता है एक होली ऐसी भी होती है जहां ये रंग नहीं होते हैं, जहां पिचकरिया नहीं होती हैं, जहां गुलाल नहीं होते हैं बल्कि वहां चिता की भस्म होती है। जी हाँ आपने बिल्कुल सही समझा है हम बात कर रहे हैं बनारस के मणिकर्णिका घाट की मसान होली (Masan Holi of Banaras) के बारे में। क्या है इतिहास? मणिकर्णिका घाट बनारस के सबसे प्रसिद्ध घाटों में से एक घाट है, जो पूरे भारतवर्ष में मोक्ष स्थल के नाम से जाना जाता है। महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इस शमशान का निर्माण करवाया था। कहते हैं जो काशी में मरता है वह मोक्ष को प्राप्त करता है और इसी काशी के गंगा घाटों में से एक है यह मणिकर्णिका घाट जहां बाकी के गंगा घाट अपनी गंगा आरती, पूजा अर्चना और सैर सपाटा के लिए प्रसिद्ध है, वहीं मणिकर्णिका घाट जीवन के अंतिम यात्रा की गवाही देता है। हिंदू धर्म में विश्वास रखने वाले लोगों की यह ख्वाहिश होती है कि उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर किया जाए। लेकिन ऐसा क्यों है? क्यों यह घाट इतनी पवित्र है कि यहां के चिता के भस्म से होली खेली जाती है? यह होली सिर्फ यहां के स्थानीय लोग नहीं खेलते, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां लोग इस होली में भाग लेने आते हैं। क्यों है इतना खास? मणिकर्णिका घाट के मसान होली को समझने के लिए आपको पहले जानना होगा कि मणिकर्णिका घाट इतना प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण क्यों है?दरअसल मणिकर्णिका देश के गिने चुने महाशमशानों में से एक है। बताया जाता है कि यह यहां चिता की अग्नि कभी ठंडी नहीं पड़ती है और यह शमशान कभी शांत नहीं होता है। चाहे कोई भी परिस्थिति हो, कोई भी मौसम हो, कोई भी दिन हो यहां चिताएं जलती रहती हैं। कहा जाता है कि जब से इस शमशान का निर्माण हुआ है तब से लेकर आज तक यह शमशान कभी शांत नहीं हुआ। यहाँ एक चिता की आग बुझने वाली होती है तो दूसरे को आग दे दी जाती है और यह प्रक्रिया सतत चलता रहती है। कैसे पड़ा मणिकर्णिका नाम? मणिकर्णिका घाट के बारे में बहुत सारी किंवदंतियाँ सामने आती हैं। लेकिन सबसे प्रसिद्ध लोक कथा के अनुसार माता पार्वती महादेव के व्यस्तताओं के कारण बहुत हीं परेशान थी। तो उन्होंने महादेव के साथ समय व्यतीत करने के लिए एक उपाय ढूंढा। उन्होंने अपने कर्णफूल को यहीं गिरा दिया और महादेव को ढूंढने के लिए कहा। महादेव उस कर्णफूल को नहीं ढूंढ पाए और मान्यता है कि यहां आने वाली प्रत्येक अर्थी के कान में महादेव स्वयं पूछते हैं कि वह कर्णफूल कहां है? साथ हीं साथ उन्हें तारक मंत्र का उपदेश देकर मोक्ष भी दिलाते हैं। क्यों मनाई जाती है मसान होली? पुराणों के अनुसार मसान होली मनाने के पीछे का कारण स्वयं भूतनाथ महादेव हैं। उन्होंने हीं सबसे पहले मसान होली मनाना आरंभ किया था। बताया जाता है कि जब महादेव और पार्वती जी का विवाह हुआ तो वह कुछ दिनों के लिए काशी घूमने आए थे। उस दिन रंगभरी एकादशी का दिन था। महादेव ने पार्वती माता को गुलाल लगाकर होली मनाई । लेकिन उनके भक्तगण में अधिकतर भूत पिशाच हीं थे। जो उन्हें दूर से देखकर हीं खुश हो रहे थे लेकिन खुद होली नहीं मना पा रहे थे। उनकी दुविधा को देखते हुए महादेव ने रंगभरी एकादशी के अगले दिन अपने उन भक्तों के साथ मणिकर्णिका के शमशान में होली खेली थी। उन्होंने चिता के भस्म को अपने शरीर पर मलकर अपने गणों के साथ नृत्य किया था। उसी दिन से यह प्रथा चली जा रही है कि हर साल रंगभरी एकादशी के अगले दिन यहां साधु संत और अघोर पंथ को मानने वाले लोग यहां आकर मसान होली खेलते हैं और जीवन के साथ-साथ मृत्यु का उत्सव मनाते हैं। कब मनाई जाती है मसान होली? यहाँ हर साल रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन चिता के भस्म से होली खेली जाती है, जिसे मसान होली या भस्म होली के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है की महादेव स्वयं अपने गणों के साथ उस दिन होली खेलते हैं। अघोर पंथ को मानने वाले लोग इस होली में हिस्सा लेना पसंद करते हैं। क्योंकि यह होली संसार के मोह माया को त्यागने के लिए लोगों को प्रेरित करती है।

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प्रहलाद के साथ मथुरा वृंदावन से भी जुड़े हैं होली के तार

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होरी खेले रघुवीरा अवध मेंहोरी खेले रघुवीरा,,,,, जैसे हीं फाल्गुन मास की शुरुआत होती है हमें नुक्कड़ों और चौराहों पर यह गाना अक्सर सुनने को मिल जाता है। इस गाने के बोल से हीं आपको पता चल गया होगा कि आज हम होली (Holi) के बारे में आपको बताने वाले हैं। होली पूरे भारतवर्ष में मनाया जाने वाला एक ऐसा त्यौहार (Festivals) जो न सिर्फ उत्साह और उमंग का प्रतीक है, बल्कि बुराई पर अच्छाई की जीत को भी दर्शाता है। जब भी हम होली का नाम सुनते हैं, हमारे जहन में चारों ओर उड़ते रंग-गुलाल (Colors) और साथ में नाचते गाते लोगों का एक काल्पनिक चित्र कौंधता है। ऐसा होना स्वभाविक भी है क्योंकि ये रंग हीं तो होली की पहचान हैं। लेकिन होली के इन रंगों की कहानी बड़ी पुरानी है। अगर हिंदू धर्म ग्रंथों (Hindu scriptures) की माने तो होली की कहानी भगवान विष्णु और उनके भक्त प्रहलाद से जुड़ी हुई है। आज के फाइव कलर्स आफ ट्रैवल (Five colors of travel) के इस ब्लॉग में हम आपको इस कहानी के बारे में पूरे विस्तार से बताएंगे। (why is holi celebrated) साथ हीं साथ हम आपको होली के बारे में कुछ रोचक तथ्यों (Interesting facts about Holi) से भी अवगत करवाएंगे। क्या है खास? (What’s special?) जैसे ही भारतवर्ष में वसंत ऋतु (spring season) का आगमन होता है चारों ओर जोरों शोरों से होली की तैयारियाँ होने लगती है। लोगों के मन में यह सुगबुगाहट होने लगती है कि बहुत हीं जल्द होली आने वाला है और हमें अपने परिवार जनों के साथ होली मनाना है। होली मनाने के लिए लोगों में इतना उत्साह होना लाजिमी भी है, क्योंकि यह एक ऐसा त्यौहार है जो हर आयु वर्ग के लोगों को पसंद आता है। चाहे वह बच्चे हो या बड़े, सब होली के रंग में रंग जाना चाहते हैं। जैसे ही मार्च (March) के महीने की शुरुआत होती है बच्चे अपने घर में पिचकारियों की खरीदारी के लिए घर वालों को मानने लगते हैं। हर साल उन्हें नया पिचकारी जो चाहिए होता है! वही घर की महिलाएं होली के दिन कौन से पुए पकवान बनवाएंगी इस बात का प्रबंधन देखने लगती हैं। घर के पुरुष होली में उपयोग में आने वाले सामान जैसे पिचकारी, रंग, गुलाल के साथ-साथ पुए पकवानों (sweets and deserts) के लिए उपयोग में आने वाले राशन के समान लाने की तैयारी में लग जाते हैं। वसंत ऋतु की शुरुआत ही उत्साह (excitement) के साथ होती है। यह मौसम सभी को नवीनता का एक एहसास देता है। इसलिए इस मौसम में लोगों में उत्साह अपने चरम पर होता है। जिसके कारण यह त्यौहार और भी ज्यादा जोरों शोरों से मनाया जाता है। होली कब और क्यों मनाई जाती है? (When and why is Holi celebrated?) होली का त्योहार दो दिनों का होता है। जिसमें फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी के दिन रात को होलिका दहन (Holika Dahan) होता है और अगले दिन सब एक दूसरे को रंग गुलाल लगाते हुए होली का उत्सव मनाते हैं। होलिका दहन होली के त्यौहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिसके पीछे की कहानी बहुत पुरानी है, जो रामायण के युग यानी सतयुग से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार असुर राज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। असुर कुल में जन्म लेने के बाद भी वह श्री हरि के नाम का जाप किया करता था। जब हिरण्यकश्यप को यह पता लगा तो उसने प्रहलाद को भगवान विष्णु की भक्ति करने से मना किया। लेकिन प्रहलाद ने उसका कहना नहीं माना। जिससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपने हीं पुत्र को मरवाना चाहा। उसने प्रहलाद को मारने के लिए बहुत प्रयत्न किया। लेकिन हर बार उसका प्रयास असफल हो जाता था। क्योंकि श्री नारायण किसी न किसी रूप में प्रहलाद की रक्षा कर दिया करते थे। ऐसे में एक दिन हिरण्यकश्यप की बहन होलिका हिरण्यकश्यप से मिलने आई।उसको ब्रह्मा जी ने वरदान दिया था कि अग्नि उसे कभी जला नहीं पाएगी। उसने हिरण्यकश्यप से कहा कि उसको वरदान प्राप्त है कि वह अगर जलती अग्नि में प्रवेश कर जाएगी तो भी उसे कुछ नहीं होगा। इसलिए वह प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि की जलती चिता में बैठ जाएगी और प्रहलाद मारा जाएगा। हिरण्यकश्यप ने उसे इसकी अनुमति दे दी। अगले दिन हिरण्यकश्यप ने एक बड़ी सी चिता का निर्माण करवाया। होलिका प्रहलाद को लेकर उस चिता पर बैठ गई। जब चिता में आग लगाया गया तो धीरे-धीरे होलिका को अग्नि का ताप महसूस होने लगा। तब उसने ब्रह्मा जी को स्मरण करते हुए उनसे पूछा कि आखिर उनका दिया हुआ वरदान काम क्यों नहीं कर रहा है? तो ब्रह्मा जी ने उसको कहा कि यह वरदान देते वक्त उन्होंने उससे कहा था कि इस वरदान का उपयोग वह सिर्फ लोगों की भलाई और अपनी सुरक्षा के लिए कर सकती है। लेकिन उसने एक अबोध बालक को मारने के लिए इस वरदान का उपयोग किया है इसलिए यह वरदान एक मिथ्या गया है। इसके बाद ब्रह्मा जी अंतर ध्यान हो गए। आग की लपटें तेज हो चुकी थी और धीरे-धीरे होलिका पूरी तरह से जल गई। लेकिन प्रहलाद को कुछ भी नहीं हो रहा था। क्योंकि प्रहलाद की सुरक्षा स्वयं श्री हरि नारायण कर रहे थे। उसी दिन से फाल्गुन मास की पूर्णमासी के दिन होलिका दहन का त्यौहार मनाया जाता है और उसके अगले दिन लोग रंग गुलाल के साथ बुराई पर अच्छाई के जीत का उत्सव मनाते हैं। इस दिन लोग आपसी बैर भाव को भूलकर एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस तरह से यह त्योहार खुशियों और संपन्नता के साथ-साथ लोगों में सामाजिक संवेदनाओं और चेतना को भी बढ़ता है। क्यों खास है मथुरा, वृंदावन और काशी की होली? (Why is Holi of Mathura, Vrindavan and Kashi special?) अब अगर होली की बात की जाए और मथुरा, वृंदावन तथा काशी का नाम ना आए तो फिर किस बात की होली? ये तीन शहर भारत के ऐसे प्रमुख शहर हैं जो अपने होली के त्यौहार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। अगर होली के दिन आप न्यूज़ चैनल खोलकर बैठेंगे तो आपको हर न्यूज़ चैनल पर मथुरा, वृंदावन

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पिकनिक और इफ्तार पार्टी दोनों के लिए बेस्ट है सुंदर नर्सरी

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जैसे ही वसंत के मौसम की शुरुआत होती है दिल्ली शहर की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। इस मौसम में दिल्ली के पार्कों की खूबसूरती भी देखने लायक होती है, क्योंकि इस समय पेड़ पौधों में नए कोंपल आ जाते हैं और चारों ओर फूल हीं फूल देखने को मिलते हैं। यहीं वजह है कि वसंत के समय दिल्ली में पिकनिक के लिए पार्क में जाने वाले लोगों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। अगर आप भी दिल्ली एनसीआर के इलाके में रहते हैं और पिकनिक मनाने के लिए कोई बेहतरीन स्पॉट की तलाश कर रहे हैं तो आज के फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रैवल (Five colors of travel) के इस कड़ी में हम आपको एक ऐसे खूबसूरत पार्क के बारे में बताने वाले हैं जो आपके लिए एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है। इस पार्क का नाम है- सुंदर नर्सरी (Sundar Nursery) क्या है खास? दिल्ली एनसीआर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिससे सुंदर नर्सरी के बारे में पता ना हो, या फिर जिसने सुंदर नर्सरी का नाम नहीं सुना हो। यह नर्सरी दिल्ली के सबसे फेमस पिकनिक स्पॉट में से एक है और हर साल यहां हजारों की संख्या में पर्यटक पिकनिक मनाने आते हैं।अब आप पूछेंगे कि ऐसा क्या है इस नर्सरी में जो यहां हर साल इतनी भारी संख्या में पर्यटकों की भीड़ इकट्ठा होती है? इस नर्सरी की सबसे खास बात यह है कि आप अपनी जिंदगी के किसी भी पड़ाव में है इस बात से फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि यह नर्सरी हर आयु वर्ग के लोगों को पसंद आती है। जहाँ वयस्क लोगों को यहां की शांति पसंद आती है, वहीं छोटे बच्चों को यहां के झूले और झील अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ,,,,और अगर आप वसंत के मौसम में यहां आएंगे तब तो क्या हीं कहने! यह आपके लिए सोने पर सुहागा जैसा अवसर होगा। क्योंकि वसंत के मौसम में इस पार्क की खूबसूरती भी कई गुना ज्यादा निखर जाती है। यहां लगे पेड़ पौधे हरे भरे नजर आते हैं। पेड़ों की नई कोंपलें नवीनता का एहसास दिलाती हैं और एक नई शुरुआत की प्रेरणा देती हैं। दिल्ली के पॉल्यूशन और भागदौड़ भरी जिंदगी से आप कुछ पल अपने और अपनों लिए चुरा कर, इस पार्क में आकर अपने आप को रिफ्रेश कर सकते हैं। यकीन मानिए जब आप यहां से इंजॉय करके लौटेंगे तो आप अपने आप को बहुत हीं तरो ताजा महसूस करेंगे। इंजॉय करने के अनूठे तरीके : सुंदर नर्सरी में कई सारे पेड़ ऐसे हैं जिन पर आप चढ़ भी सकते हैं। ऐसे पेड़ पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यहां आने वाले हर बच्चे की ख्वाहिश होती है कि वह इन पेडों पर चढ़े। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो फोटोग्राफी के लिए इन पेड़ों पर चढ़ते हैं। ऐसे पेड़ सुंदर नर्सरी में आपको जहां-तहां दिख जाएंगे। हालांकि इनपर फिसलन है। आपको समझदारी से और सावधानी से इन पेड़ों पर चढ़ाना होगा। लेकिन यकीन मानिए अगर आप इसे ट्राई करेंगे तो आपको यह किसी एडवेंचर एक्टिविटी से काम नहीं लगेगा। यह वाकई में बहुत हीं रिफ्रेशिंग होता है और बहुत मजेदार भी! पर्यटकों को भाता है खूबसूरत झीलों का ठहराव : सुंदर नर्सरी में आपको बहुत सारे झील देखने को मिल जाएंगे। इन शांत झीलों का ठहराव तो अपने आप में हीं मन को और आंखों को सुकून देने वाला होता है। पर्यटक झील के किनारे बैठकर शांति से समय बिताना और सनसेट एंजॉय करना पसंद करते हैं। अगर आप भी यहां आएंगे तो आपका भी मन करेगा कि आप यहां थोड़ी देर झील के किनारे बैठकर शांति से अपने आप से बातें करें, अपने लिए जिएं और अपने साथ समय बिताएं। झीलों में लगे फव्वारे इनकी खूबसूरती को और ज्यादा निखार देते हैं।अगर आप फोटोग्राफी को पसंद करते हैं तो आपको यह जगह काफी पसंद आने वाला है। क्योंकि यहां पर बहुत सारे ऐसे स्पॉट हैं जहां आप बहुत हीं खूबसूरत फोटोग्राफी कर सकते हैं। साथ हीं अगर आप मॉडल हैं और फोटोशूट करवाना चाहते हैं तो भी यह जगह आपके लिए बहुत हीं अच्छी है। यहाँ बहुत सारे सेल्फी पॉइंट्स और फोटोग्राफी पॉइंट्स हैं जहां बहुत हीं खूबसूरत खूबसूरत फोटोज क्लिक करवा सकते हैं। इफ्तार के लिए यह जगह है बेस्ट : जैसा कि हम सभी जानते हैं कि अभी रमजान का महीना चल रहा है और बहुत सारे लोग रोजा रख रहे हैं। ऐसे में अगर आप भी रोजा रख रहे हैं और इफ्तार के लिए कहीं आउटडोर इफ्तार पार्टी करना चाहते हैं तो यहां आप शाम के समय आकर आराम से अपने दोस्तों के साथ इफ्तार का मजा ले सकते हैं। आप चाहे तो आप अपने घर से भी खाना लेकर आ सकते हैं या फिर आप यहां ऑर्डर भी करवा सकते हैं। टी पॉइंट हैं खास : अब भारत जैसे देश में चाय के शौकीन लोगों की कमी नहीं है। अगर कोई व्यक्ति चाय नहीं पीता है तो कॉफी जरूर पीता है। ऐसे में अगर आप भी चाय या कॉफी के शौकीन इंसान हैं तो यहां आपको टी स्टॉल और फैब कैफ़े भी दिख जाएंगे। जहां आप चाय या फिर कॉफी इंजॉय कर सकते हैं।

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Famous Beaches of India

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गर्मियों की शुरुआत होने लगी है और धीरे-धीरे लोग अपनी रजाई से निकाल ऐसी जगह घूमने जाने की प्लानिंग कर रहे हैं जहां हल्की धूप का आनंद उठाया जा सके और जब भी धूप को इंजॉय करने की बात आती है तो बीच इसके लिए सबसे परफेक्ट माने जाते हैं और खास करके ऐसे मौसम में जब धूप हल्की नरम हो तो बीच लोगों के लिए पसंदीदा टूरिस्ट डेस्टिनेशन बन जाता है और यह समय भी कुछ ऐसा ही है अभी-अभी सर्दी खत्म हुई है और लोग अपने रजाई से बाहर आ चुके हैं और अब किसी ऐसी जगह जाने की प्लानिंग कर रहे हैं जहां उन्हें हल्की सी धूप में महसूस हो और वह बिना किसी ठंड के अपने ट्रिप को इंजॉय कर सके।आज का फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल का यह ब्लॉग हमारे उन पाठकों के लिए है जो बीच पर जाना पसंद करते हैं और जिन्हें बीच में जाने की प्लानिंग करनी है अगर आप भी बीच में जाने के बारे में सोच रहे हैं तो आज के इस ब्लॉक में हम आपको बताने वाले हैं भारत के कुछ ऐसे बीचों (Famous Beaches of India) के बारें में जो आपके ट्रिप के लिए सबसे परफेक्ट हो सकते हैं 1. मरीना बीच (Marina Beach) मरीना बीच के नाम से आप सभी वाकिफ होंगे। यह बीच विश्व का दूसरा सबसे लम्बा बीच है और एशिया में यह पहले पायदान पर आता है। यह बीच तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में स्थित है। मरीना बीच की कुल लंबाई 13 किलोमीटर है। 2. चांदीपुर बीच (Chandipur Beach) चांदीपुर बीच एक अजीबोगरीब बीच है जो उड़ीसा के बालासोर जिले में है। यह एक ऐसा इंटरेस्टिंग बीच है जो जहां उच्च ज्वार के समय पानी पुरे किनारे पर फैल जाता है और भाटा के समय पानी समुद्र में बहुत अंदर तक चला जाता है। 3. कैलंगुट बीच (Calangute Beach) कैलंगुट बीच गोवा राज्य के उत्तरी गोवा जिले में स्थित है। यह बीच उत्तरी गोवा जिले का सबसे लम्बा तथा प्रमुख बीच है। कैलंगुट बीच पर वाटर स्पोर्ट्स (Water Sports) की सुविधा उपलब्ध है। आप यहाँ बनाना राइड (Banana Ride), जेट स्कीइंग (Jet Skiing), वाटर सर्फिंग (Water Surfing), पारासेलिंग (Parasailing) आदि का लुफ्त उठा सकते है। कैलंगुट बीच की कुल लंबाई 7 किलोमीटर है। 4. कैंडोलिम बीच (Candolim Beach) कैंडोलिम बीच गोवा राज्य के उत्तरी गोवा जिले में स्थित भारत का एक सुप्रसिद्ध बीच है जहाँ साल भर पर्यटक छुट्टियाँ मनाने आते है। यह बीच अपने आस-पास के खूबसूरती और रेस्टॉरेंट्स के लिए जाना जाता है। कैंडोलिम बीच की कुल लंबाई 5 किलोमीटर है। 5. राधानगर बीच (Radhanagar Beach) राधानगर बीच एक बहुत ही मशहूर बीच है। इस बीच को दुनिया का सातवाँ सबसे खूबसूरत बीच माना जाता है। यह बीच इतना खूबसूरत है कि यहाँ दुनिया के कोने-कोने से लोग छुट्टियाँ मनाने और यहाँ की खूबसूरती का लुफ्त उठाने आते है। यह बीच अंडमान निकोबार द्वीप समूह के हैवलॉक आइलैंड पर स्थित है। राधानगर बीच की कुल लंबाई 2 किलोमीटर है। 6. शिवराजपुर बीच (Shivrajpur Beach) यह बीच गुजरात राज्य के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित है। इस बीच को पर्यावरण शिक्षा फाउंडेशन (Foundation of Environmental Education) के तरफ से ब्लू फ्लैग बीच का दर्जा मिल चुका है। इस बीच को बहुत ज्यादा ही स्वच्छ होने की संज्ञा दी जाती है। इस बीच की लम्बाई 4 किलोमीटर है।

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रंग-बिरंगे फूलों से सजा डीयू का नॉर्थ कैंपस, जानिए इस बार के फ्लावर शो की खास बातें

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अगर कोई आपसे पूछे कि, वो कौन सा मौसम है, जिस मौसम में आपका दिल जी भर के जीने को करता है तो, आप में से अधिकतर लोगों का जवाब होगा वसंत! और यह जवाब लाजमी भी है। जिस तरह मनुष्य के जीवन का सबसे खूबसूरत पड़ाव यौवन होता है उसी तरह वसंत ऋतु प्रकृति का यौवन है। यह वह समय होता है जब प्रकृति खूबसूरत फूलों की चादर ओढ़ लेती है। यह वह खूबसूरत मौसम होता है जब चारों ओर फूल हीं फूल देखने को मिलते हैं। इस साल भी वसंत का आगमन हो चुका है और पूरे भारत वर्ष में वसंत के आगमन पर अलग-अलग त्यौहार मनाए जा रहे हैं, ऐसे में हमारी राजधानी दिल्ली कैसे पीछे रह सकती है? राजधानी दिल्ली में भी वसंत ऋतु के आते हीं कई जगह फ्लावर एग्जिबिशंस लगने शुरू हो जाते हैं। और ऐसी ही एक प्रदर्शनी होती है दिल्ली यूनिवर्सिटी का फ्लावर शो (Flower Show of Delhi University)! आज के फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम दिल्ली यूनिवर्सिटी के इस फ्लावर एग्जिबिशन को एक्सप्लोर करेंगे और आपको दिखाएंगे इस फ्लावर एग्जिबिशन के कुछ खूबसूरत नजारे! यकीनन आप इन खूबसूरत तस्वीरों को इग्नोर तो बिल्कुल भी नहीं कर पायेंगे। क्या है दिल्ली यूनिवर्सिटी का फ्लावर शो (What is the flower show of Delhi University)? हर साल दिल्ली विश्वविद्यालय में वसंत के आगमन पर इस फ्लावर शो का आयोजन किया जाता है, जो यूनिवर्सिटी के बच्चों के लिए काफी एक्साइटिंग होता है। इस साल यह फ्लावर एग्जिबिशन 1 मार्च से लग रहा है और इस साल के दिल्ली यूनिवर्सिटी के फ्लावर शो की थीम है Women Nurturing Nature – A Celebration of Synergy and Sustainability इस फ्लावर एग्जिबिशन में आपको डेकोरेटिव प्लांट्स और फूलों की 100 से भी अधिक वैराइटीज देखने को मिलेंगी। डियू के नॉर्थ केंपस के बुद्धा गार्डन में लगने वाला यह फ्लावर एग्जिबिशन हर साल हजारों की संख्या में विजिटर्स को अपनी ओर आकर्षित करता है। क्या है इन फ्लावर्स की खासियत (What is the specialty of these flowers)? यहां की सबसे खास बात यह है कि इन प्लांट्स को दिल्ली यूनिवर्सिटी के विभिन्न विभागों और कॉलेजो द्वारा हीं उगाया जाता है। इस फ्लावर शो के जरिए अलग-अलग कॉलेज को प्लेटफार्म दिया जाता है जहां वह अपने गार्डनिंग के स्किल्स को दिखाकर बेस्ट गार्डनिंग का खिताब जीत सकते हैं। क्या है इस फ्लावर शो का मकसद (What is the purpose of this flower show)? इस फ्लावर शो के जरिए दिल्ली यूनिवर्सिटी विद्यार्थियों के भीतर पर्यावरण के प्रति प्रेम और संरक्षण का भाव जगाने का प्रयास करती है। इस फ्लावर शो की सबसे अच्छी बात यह है कि आप इन प्लांट्स को खरीद भी सकते हैं। यहां आपको बहुत हीं सस्ते में डेकोरेटिव प्लांट्स और फ्लोरल प्लांट्स मिल जाएंगे। विजिटर्स के लिए है ढे़रों ऑप्शंस (There are many options for visitors) इस फ्लावर एग्जिबिशन में प्लांट्स के अतिरिक्त होम डेकोर के भी स्टॉल्स लगाए जाते हैं, जहां से आप अलग-अलग डेकोरेटिव आइटम्स भी खरीद सकते हैं।अगर इस खूबसूरत से गार्डन में घूमते घूमते आपको भूख लग जाए तो उसके लिए भी आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यहां आने वाले विजिटर्स के लिए फूड स्टॉल्स की भी व्यवस्था की जाती है। हमने यहां लगे ऐसे ही एक स्टॉल की ऑनर से भी बातें की और उनसे उनके इस एग्जीबिशन के अनुभव के बारे में जाना। कई तरह के प्रतियोगिताओं का होता है आयोजन (Many types of competitions are organized) इस फ्लावर एग्जिबिशन में पोस्टर मेकिंग, फोटोग्राफी, श्लोगन लेखन जैसे और भी कई तरह के कंपटीशंस आयोजित करवाए जाते हैं। अगर आप भी दिल्ली एनसीआर के आसपास रह रहे हैं तो आप भी इस फ्लावर शो को एक बार एक्सप्लोरर जरूर कीजिए। यह फ्लावर शो बहुत ही खूबसूरत और मनभावन है। आपको यहां आकर जरूर हीं बहुत अच्छा लगेगा।

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Bangle Market: जानिए क्यों देश विदेश के पर्यटकों की पहली पसंद है जयपुर की लाख की चूड़ी मार्किट

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“कुछ शहर खूबसूरत होते हैं और कुछ सुन्दर बनने की चाहत रखते हैं। लेकिन राजस्थान का जयपुर शहर तो शायद सुंदरता के लिए बनाया गया है जिसका नाम जेहन में आते ही मन गुलाबी हो उठता है। चाहे दिन का समय हो या रात का, इस शहर की चमक और बनावट मन से उतरती ही नहीं। चारों और अरावली की पहाडयों से घिरा, चौड़ी और साफ़ सुथरी सड़कों और अपने चमकीले और सैकड़ों साल पुराने बाज़ारों के कारण यह शहर किसी भी पर्यटक के मन को खुश करने में पूरी तरह सक्षम हैं। जयपुर अपने पर्यटन स्थलों के वजह से तो दुनिया भर में मशहूर है ही, इसके साथ ही यह शहर लाख की चूड़ियों (Lac Bangle Market Jaipur) के लिए भी काफी मशहूर है। यहां आने वाले पर्यटक अपने या अपने लव्ड वन्स लिए लाख की चूड़ियाँ जरूर बनवाते हैं। आज के इस ब्लॉग में हम आपको इन्हीं लाख की चूड़ियों के बारे में बताने वाले हैं।” क्यों खास है जयपुर के लाख की चूड़ियाँ ? जयपुर का बाजार लाख की चूड़ियों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहां हर तरह की लाख की चूड़ियाँ बनवायी जाती है। आप यहां अपनी आंखों के सामने लाख की चूड़ियों को बनते हुए देख सकते हैं। चूड़ियां महिलाओं की खास पसंद होती है। इंडियन कल्चर को मानने वाली हर विवाहित महिला अपने हाथों में चूड़ियाँ पहनती हैं। …और सिर्फ विवाहित हीं नहीं अविवाहित लड़कियां भी अपने हाथ में चूड़ियाँ पहनना पसंद करती हैं। और अगर यह चूड़ियाँ उन्हें उपहार में दे दी जाए तो इससे बेहतर गिफ्ट उनके लिए और कुछ हो ही नहीं सकता है। सामने बनाई जाती हैं चूड़ियाँ अगर आपको भी अलग-अलग रंगों की चूड़ियाँ पहनना पसंद है तो आप जयपुर के चूड़ी मार्केट का रुख सकती हैं। जहां आप रंग बिरंगी चमचमाती चूड़ियाँ कस्टमाइज्ड करवा सकते हैं और अपने सामने इन चूड़ियों को बनता हुआ देख सकते हैं। यहां पर लाख की चूड़ियाँ बनाने वाले कलाकार आने वाले पर्यटकों के सामने चूड़ी बनाकर उन्हें दिखाते हैं। यह आपको काफी फैशिनेटिंग लगेगा। दूर से देखने पर लाख की चूड़ियाँ बनाना आसान काम लगता है। लेकिन इन कलाकारों से पूछने पर पता चलता है कि गर्म लाख को चूड़ी के खांचे में डालना एक चैलेंजिंग काम होता है। ये कलाकार बताते हैं कि इन लाख की चूड़ियों को बनाने के लिए सही तकनीक आना काफी जरूरी है। कोई भी व्यक्ति ऐसे ही फिनिशिंग के साथ चूड़ियों को नहीं बना पाएगा अगर उसे वह तकनीक पता ना हो। कलाकार बताते हैं कि लाख की चूड़ियाँ बनाने का यह तकनीक सिखाई नहीं जाती बल्कि अनुभव से आती है। करवा सकते हैं कस्टमाइज पर्यटक अपने हिसाब से इन लाख की चूड़ियों को डिजाइन करवा सकते हैं। अगर आप भी लाख की चूड़ियाँ बनवाना चाहते हैं तो आप अपने हिसाब से इन लाख की चूड़ियों के रंग, डिजाइन आदि को कस्टमाइज करवा सकते हैं। यहां आने वाले पर्यटक अपनी डिमांड्स चूड़ी निर्माता के सामने रखते हैं और चूड़ी बनाने वाले कारीगर उनकी डिमांड्स के अनुसार उनके सामने हीं चूड़ी बनाकर उन्हें पहना देते हैं। सबसे खास है नाम वाली चूड़ियाँ आप कस्टमाइज्ड नाम वाले चूड़ियों का भी यहां ऑर्डर दे सकते हैं। लाख की चूड़ियों पर नग से लोगों के नाम को उकेर कर यह खास चूड़ियाँ तैयार की जाती है। यह चूड़ियाँ अक्सर नव विवाहिताओं के लिए डिजाइन करवाई जाती है। जिसमें उस नव विवाहिता के साथ उसके पति का नाम उसकी चूड़ी में लिखा गया होता है। लाख की ऐसी चूड़ियों की डिमांड काफी दूर-दूर से आती है।

Types of silk sarees Culture Lifestyle Review

हर नव वधू के वार्डरोब में शामिल होने चाहिए ये सिल्क की साड़ियां, जानिए इनकी खासियत और कीमत

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जब भी कभी भारतीय परिधानों की बात आती है तो साड़ियों का जिक्र सबसे पहले होता है। …और हो भी क्यों ना! साड़ी भारतीय महिलाओं के द्वारा पहने जाने वाला सबसे प्रमुख परिधान जो है। महिलाओं के बीच साड़ियां इतनी प्रसिद्ध हैं कि इनके भी कई वैराइटीज देखने को मिलते हैं। भारत विविधताओं का देश है इसलिए भारत के अलग-अलग भागों में अलग-अलग तरह की साड़ियों को पहनने और अलग-अलग तरह से साड़ियों को बांधने का चलन रहा है। जहां बंगाल में मोटे लाल बॉर्डर वाले सफेद साड़ियों का चलन है, वहीं महाराष्ट्र में हरे और चटख रंगों वाले सिल्क की साड़ियों को पहनने का चलन है। साड़ियों की जो वैरायटी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है वह है सिल्क! …..और सिल्क साड़ियों की भी अपनी ही अलग-अलग वैराइटीज होती हैं। सिल्क की साड़ियां समृद्धि और एलिगेंस की प्रतीक मानी जाती हैं। कई बॉलीवुड अभिनेत्रियाँ भी सिल्क की साड़ियां पहनना पसंद करती हैं। लेकिन जब भी सिल्क साड़ियों को खरीदने की बात आती है तो हमारे जहन में सबसे पहले आता है कि कौन सा सिल्क लिया जाए? किस टाइप के सिल्क की साड़ी सबसे बेहतरीन होती है?आज के फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं सिल्क की साड़ियों के अलग-अलग वैराइटीज (Types of silk sarees) के बारे में और उनकी खासियतों के बारे में। अगर मूल रूप से सिल्क की बात की जाए तो भारत में चार प्रकार के सिल्क के रेशे बनाए जाते हैं- शहतूत रेशम, ओक तसर सिल्क, एरी सिल्क और मुगा रेशम। अगर सिल्क की साड़ियों के बारे में बात की जाए तो सिल्क साड़ियों की कुछ प्रसिद्ध वैरायटी निम्नांकित हैं- बनारसी सिल्क साड़ियां : बनारसी सिल्क साड़ी भारत में सिल्क की सबसे प्रसिद्ध साड़ी मानी जाती है। बनारसी सिल्क साड़ी को बेहतरीन गुणवत्ता वाले सिल्क के धागों से तैयार किया जाता है। अगर बात करें बनारसी सिल्क साड़ियों के डिजाइन की तो इनमें अधिकतर फ्लोरल पेटर्न की डिजाइनिंग देखी जाती है। बनारसी सिल्क साड़ियां चटक रंग से लेकर धूसर रंग तक हर रंग में उपलब्ध होते हैं। ये खास अवसरों पर पहनी जाने वाली साड़ियां हैं और भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक बेहतरीन नमूना पेश करती हैं। कांजीवरम सिल्क साड़ियां : तमिलनाडु के एक छोटे से शहर कांचीपुरम में कांजीवरम साड़ी के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। यहीं वजह है कि इसे कांचीपुरम सिल्क साड़ी भी कहा जाता है।कांजीवरम सिल्क को प्योर मूलबेरी सिल्क के धागों से बनाया जाता है। इतना हीं नहीं कांजीवरम सिल्क की साड़ियों में सोने और चांदी के जरी के काम किए जाते हैं। जिसके कारण यह साड़ियां और महंगी हो जाती हैं। इन साड़ियों को अधिकांशतः शादी विवाह जैसे बड़े आयोजनों में पहना जाता है। कांचीपुरम सिल्क की साड़ियों की बुनावट भी कुछ खास होती है। इन साड़ियों में बॉर्डर, साड़ी तथा पल्लू तीनों भागों को अलग-अलग धागों से बुना जाता है। जिसके कारण ये साड़ियां और भी खास हो जाती हैं। अगर आप कांजीवरम सिल्क की साड़ियां खरीद रहे हैं तो उन्हें खरीदते वक्त आप यह स्योर करें कि आप असली कांजीवरम हीं खरीद रहे हैं। क्योंकि आजकल कांजीवरम साड़ियों के नाम पर धोखाधड़ी के भी मामले देखे जाते हैं। कांचीपुरम साड़ियों को पहचानने का सबसे आसान तरीका है कि असली कांजीवरम साड़ी के प्लेट्स को एक दूसरे से घिसने पर किसी भी प्रकार की आवाज नहीं आती है। चंदेरी सिल्क साड़ियां : चंदेरी सिल्क साड़ियों का निर्माण विंध्याचल के चंदेरी कस्बे से शुरू हुआ था। यह साड़ियां दिखने में शाईनी और वजन में बहुत हीं हल्की होती हैं। चंदेरी सिल्क साड़ियों की एक और खासियत यह है कि यह बाकी के सिल्क साड़ियों के तरह मोटे नहीं होते हैं। इनका फैब्रिक पारदर्शी होता है। यहीं वजह है कि चंदेरी सिल्क साड़ियां वजन में काफी लाइटवेट होती हैं। अगर रंगों के मिलावट की बात की जाए तो इसमें कंट्रास्ट कलर का इस्तेमाल देखने को मिलता है। हालांकि बदलते दौर के साथ अब पेस्टल कलर्स में भी चंदेरी सिल्क साड़ियां उपलब्ध होने लगी हैं। ये साड़ियां छूने में काफी मुलायम होती हैं। मुलायम होने की खासियत से ही इनके असली या फिर नकली होने का पहचान किया जा सकता है।अगर बात करें लागत की तो चंदेरी सिल्क की साड़ियां आपको ₹5000 की रेंज से मिलने शुरू हो जाएंगी। चंदेरी साड़ियों में गोल्ड सिल्वर या फिर कॉपर के धागों के वर्क भी देखने को मिल जाते हैं। बलूचरी सिल्क साड़ी : बलूचरी सिल्क साड़ियां अपने आंचल के वर्क के लिए जानी जाती हैं। बलूचरी साड़ियों के आंचल में खास तरह का वर्क किया गया होता है बलूचरी साड़ी के आंचल पर पौराणिक कथाओं के दृश्यों को उभारा जाता है। चटख लाल कलर की साड़ियों पर जब गोल्डन कलर के वर्क से पौराणिक कथाओं के दृश्यों को उभारा जाता है तो इस कलाकारी को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे ये अभी बोल पड़ेंगी। इसमें अधिकतर रामायण तथा महाभारत के दृश्यों का चित्रण किया जाता है। हालांकि मुगल काल में ऐसी साड़ियों में नवाबों के दिनचर्या को दिखाया जाता था और बेलबूटेदार डिजाइंस किए जाते। शुरुआती दौर में ये साड़ियां जमींदार घरानों की महिलाओं की पसंदीदा साड़ी हुआ करती थी। ब्रिटिश शासन काल में ब्रिटिश अफसर की बीवियां भी इस कारीगरी को पसंद किया करती थीं। आज के समय में ऐसी साड़ियां शादी विवाह जैसे बड़े आयोजनों के अवसर पर पहनी जाती हैं। बलूचरी साड़ी की एक खास वैरायटी होती है जिसमें सोने के धागों से साड़ी पर बुनावट की जाती है। ये साड़ियां स्वर्णचेरी साड़ियां कहलाती हैं। अधिकतर बलूचरी साड़ियां चटक रंगों में पसंद की जाती हैं। इनका निर्माण बंगाल के मुर्शिदाबाद में किया जाता है। पैठणी सिल्क साड़ियां : पैठणी सिल्क साड़ियां मराठी संस्कृति की पहचान हैं। अक्सर महाराष्ट्र में शुभ अवसरों पर त्योहार और शादी विवाह के मौके पर महिलाएं पैठाणी सिल्क साड़ियों को पहनती हैं। पैठनी साड़ी का निर्माण महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के पैठणी नमक शहर से शुरू हुआ था। यही वजह है कि इन साड़ियों को पैठनी साड़ी का नाम दे दिया गया। यह साड़ियां, लाल, हरे, नीले, गुलाबी और पीले रंगों में अवेलेबल होती हैं। इनकी बुनाई की तकनीक बहुत ही जटिल होती है। इन साड़ियों में एक

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Best Places To Visit In Punjab

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शहीदों की भूमि कहे जाने वाले पंजाब में भारतीय इतिहास से जुड़े कई पर्यटन स्थल हैं जो लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। सिर्फ ऐतिहासिक हीं नहीं पंजाब में धार्मिक पर्यटन स्थलों की भी कमी नहीं है। चाहे वह मोहाली का फतेह बुर्ज हो या फिर अमृतसर का गुरुद्वारा! पंजाब में हर तरह के टेस्ट वाले पर्यटकों के लिए टूरिस्ट डेस्टिनेशंस मौजूद हैं। अगर आप भी पंजाब आ रहे हैं तो यह ब्लॉग आपके लिए हीं है। आज के फाइव कलर्स आफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले पंजाब के कुछ ऐसे शहरों के बारे में जहां जाना मस्ट विजिट है। पंजाब के टूर को तब तक पूरा नहीं माना जा सकता है जब तक इन शहरों तो अच्छे से एक्सप्लोर ना किया जाए। तो आईए जानते हैं पंजाब के बेस्ट टूरिस्ट प्लेसेस (places to visit in Punjab) के बारे में। 1. अमृतसर (Amritsar) इस शहर का नाम सुनते हीं हमारे मन में कई तरह की भावनाएं जन्म लेती हैं। इस शहर के मायने सभी के लिए अलग-अलग हैं। किसी के लिए यह सिख धर्म का सबसे पवित्र स्थान है, तो किसी के लिए यह स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का सबसे दर्दनाक आहुति देने वाला शहर है। नजरिया भले हीं अलग हो इस शहर के लिए सम्मान सभी के दिलों में एक बराबर हीं है। अमृतसर में घूमने के लिए ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों हीं तरह के पर्यटन स्थल मौजूद हैं। यही वजह है कि यह शहर हर तरह के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। अमृतसर में घूमने लायक जगहों में पार्टीशन म्यूजियम (Partition Museum), वाघा बॉर्डर (Wagah Border), जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh), स्वर्ण मंदिर (Golden Temple) और महाराजा रणजीत सिंह म्यूजियम (Maharaja Ranjit Singh Museum) शामिल है। अमृतसर कैसे पहुंचे? (How to reach Amritsar) अमृतसर पहुंचने के लिए आप अगर फ्लाइट से आना चाह रहे हैं तो आप श्री गुरु रामदास जी इंटरनेशनल हवाई अड्डा के लिए फ्लाइट ले सकते हैं। यह अमृतसर से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहीं अगर आप ट्रेन के जरिए अमृतसर जाना चाहते हैं तो अमृतसर जंक्शन देश के अन्य भागों से काफी अच्छे तरीके से जुड़ा हुआ है।सड़क मार्ग के द्वारा भी अमृतसर पहुंचा जा सकता है। आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट, या फिर कैब, या फिर अपनी गाड़ी का उपयोग करके अमृतसर पहुंच सकते हैं। 2. चंडीगढ़ (Chandigarh) पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ एक बहुत खूबसूरत शहर है। ये भारत के केंद्र शासित प्रदेशों में से भी एक है। चंडीगढ़ सिटी को बेहद खूबसूरती के साथ बसाया गया है जो अपनी कला और संस्कृति (art and culture) के लिए जाना जाता है। दोस्तों हम लोगों में अक्सर ये इच्छा रहती है कि सभी जगह के कल्चर को अच्छे से जाने, इसलिए अगर आप भी छुट्टियों के लिए हिमाचल प्रदेश की ओर जाने वाले हैं तो आप पंजाब और हरियाणा के कल्चर को ठीक से समझने के लिए चंडीगढ़ भी जरूर आए। हेरिटेज (Heritage) को अच्छे से समझने वालो के लिए और बाकी सबके लिए भी चंडीगढ़ एक बेस्ट डेस्टिनेशन (Best Destination) है क्योंकि यहां आपको हर दूसरे कदम पर कलाओं का भंडार (art store) मिलेगा। चंडीगढ़ अपने कई खूबसूरत पार्कों और बगीचों की वजह से ‘गार्डन सिटी’ (Garden City) के नाम से फेमस है। ये पार्क और बगीचे भी चंडीगढ़ में घूमने के लिए सबसे अच्छी जगहों में से एक हैं। चंडीगढ़ में ऐसे कई टूरिस्ट प्लेस हैं जहां आप न जाकर बड़ी गलती कर सकते हैं। चंडीगढ़ में आप जाकिर हुसैन रोज़ गार्डन (Zakir Hussain Rose Garden), इस्कॉन मंदिर (Iskcon temple), सुखना लेक (Sukhna lake), सेक्टर 17 मार्केट (Sector 17 Market), इंटरनेशनल डॉल म्यूजियम (International Doll Museum), रॉक गार्डन (Rock garden) और हॉप्स एन ग्रेन्स (Hops n Grains) जैसे जगहों पर घूमने जा सकते हैं। चंडीगढ़ कैसे पहुंचे? (How to reach Chandigarh) चंडीगढ़ पहुंचने के लिए आप फ्लाइट ट्रेन और सड़क मार्ग, हर तरह के यातायात के साधनों का उपयोग कर सकते हैं। चंडीगढ़ पहुंचने का सबसे आसान मार्ग है हवाई मार्ग। आप सीधा चंडीगढ़ इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट ले सकते हैं। चंडीगढ़ एयरपोर्ट देश के सभी महत्वपूर्ण हवाई अड्डों से अच्छे तरीके से कनेक्टेड है।अगर आप ट्रेन के जरिए चंडीगढ़ पहुंचाना चाहते हैं तो चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन के लिए ट्रेन ले सकते हैं। देश के अधिकतम शहरों से चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन के लिए ट्रेनें चलती हैं।अगर आप सड़क मार्ग के द्वारा चंडीगढ़ पहुंचाना चाहते हैं तो आसपास के शहरों से आपको बस की सुविधा उपलब्ध हो जाएगी। अगर आप अपनी गाड़ी से आना चाहते हैं तो यह भी एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। क्योंकि चंडीगढ़ सड़क मार्ग से भी देश के अन्य भागों से जुड़ा हुआ है। 3. मोहाली (Mohali) कहते हैं भारत क्रिकेट प्रेमियों का देश है। भारत में कोई भी ऐसा क्रिकेट प्रेमी नहीं होगा जिसे नहीं पता हो कि मोहाली कहां है। मोहाली शहर क्रिकेट प्रेमियों के दिल में एक खास स्थान रखने वाला शहर है। यह शहर चंडीगढ से सिर्फ सिर्फ 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अक्सर जब भी भारत का मैच मोहाली स्टेडियम में होता है तो दूर-दूर से लोग यहाँ मैच देखने आते हैं। क्रिकेट ने मोहाली शहर को एक अलग पहचान देने का काम किया है। अगर आप भी मोहाली में मैच देखने आए हैं और मोहाली को एक्सप्लोर करना चाहते हैं तो इस शहर में घूमने लायक काफी कुछ है।इस शहर में घूमने लायक जगहों में बाबा बंदा सिंह बहादुर वॉर मेमोरियल, गुरुद्वारा अंब साहिब, फतेह बुर्ज, पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन इन बिंद्रा स्टेडियम, रोज गार्डन और मनसा देवी टेंपल आदि का नाम प्रमुख है। मोहाली कैसे पहुंचे? (How to reach Mohali) मोहाली पहुंचने के लिए आप पहले चंडीगढ़ पहुंच सकते हैं। चंडीगढ़ से मोहाली सिर्फ 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और आसानी से पब्लिक ट्रांसपोर्ट या फिर कैब से मोहाली पहुंचा जा सकता है।