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विजयनगर साम्राज्य से आपको होना चाहिए वाकिफ़, जानें इतिहास

विजयनगर साम्राज्य भारत के इतिहास में एक ऐसी कहानी है जो सुनने में किसी परीकथा से कम नहीं लगती। यह दक्षिण भारत का वह साम्राज्य था जिसने चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक अपनी शक्ति, संस्कृति और समृद्धि से पूरे विश्व को चकित कर दिया। इसकी राजधानी हम्पी आज भी अपने खंडहरों के जरिए उस गौरवशाली दौर की कहानी सुनाती है। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की इस नई पेशकश में आप विजयनगर साम्राज्य के उदय, शासन, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और पतन की कहानी को सरल और रोचक तरीके से जानेंगे। आईए हम आपको आज के समय में आंखों देखा बताते हैं।

जब हमारी टीम विजयनगर पहुंची तो हमने सबसे पहले इतिहास के नजरिए से शहर को समझा। जिसमें हमें पता चला की इस महान साम्राज्य की नींव 1336 में दो भाइयों, हरिहर और बुक्का ने रखी थी। ये दोनों भाई उस समय के काकतीय राजवंश से जुड़े थे और बाद में दिल्ली सल्तनत के अधीन काम करने लगे। लेकिन दक्षिण भारत में मुस्लिम आक्रमणों से हिंदू संस्कृति को खतरा महसूस हुआ। इस मुश्किल समय में संत विद्यारण्य ने हरिहर और बुक्का को प्रेरित किया कि वे एक नया साम्राज्य बनाएं, जो हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा कर सके। तब इन दोनों भाइयों ने तुंगभद्रा नदी के किनारे अनेगुंडी में अपनी राजधानी बनाई, जिसे बाद में विजयनगर कहा गया।

विजयनगर साम्राज्य

इस शहर का नाम “विजय का नगर” यानी जीत का शहर रखा गया। शुरुआत में यह साम्राज्य छोटा था, लेकिन हरिहर और बुक्का की सूझबूझ और साहस ने इसे धीरे-धीरे दक्षिण भारत की सबसे बड़ी शक्ति बना दिया। उन्होंने होयसल और मदुरै सल्तनत जैसे पड़ोसी राज्यों को हराकर अपने साम्राज्य का विस्तार भी बड़ी कुशलता से किया। इस तरह, विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिण भारत में एक नया अध्याय शुरू किया था।

हरिहर और बुक्का की जोड़ी ने न सिर्फ सैन्य शक्ति बढ़ाई, बल्कि अपने प्रशासन को भी मजबूत किया। उनके शासन में हिंदू धर्म को बढ़ावा मिला, लेकिन अन्य धर्मों के प्रति भी पूरी तरह सहिष्णुता बरती गई। यह साम्राज्य धीरे-धीरे दक्षिण भारत का एक ऐसा केंद्र बन गया, जहां लोग व्यापार, कला और संस्कृति के लिए दूर-दूर से आते थे।

इसके बाद हमने कुशल शासन व्यवस्था का राज जाने का प्रयास किया जिसमें हमने खोजा की विजयनगर साम्राज्य की सबसे बड़ी खासियत थी, उसकी शानदार प्रशासनिक व्यवस्था। यह साम्राज्य चार राजवंशों जिसमें संगम, सालुव, तुलुव और अरविडु के अधीन रहा। हर राजवंश ने अपने तरीके से साम्राज्य को और मजबूत किया। राजा को “राय” कहा जाता था और वह शासन का केंद्र था। राजा के पास एक मंत्रिपरिषद होती थी, जिसमें प्रधानमंत्री, सेनापति और कोषाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण लोग शामिल हुआ करते थे। विजयनगर साम्राज्य को कई प्रांतों में बांटा गया था, जिन्हें “नाडु” कहा जाता था। इन प्रांतों का प्रबंधन नायब या प्रांतीय गवर्नर करते थे। स्थानीय स्तर पर गांवों का प्रबंधन “आयंगर” व्यवस्था के तहत होता था। इस व्यवस्था में गांव के बड़े-बुजुर्ग और स्थानीय नेता मिलकर फैसले लिया करते थे।

विजयनगर की एक खास बात थी “अमर नायक” प्रणाली। इसमें सैन्य कमांडरों को कुछ क्षेत्र दिए जाते थे, जहां वे कर वसूलते थे और बदले में राजा को सैन्य सहायता देते थे। ये नायक राजा के प्रति वफादार रहते थे और युद्ध के समय अपनी सेना के साथ राजा की मदद किया करते थे। इस प्रणाली ने साम्राज्य को सैन्य और आर्थिक दोनों रूप से मजबूत बनाया गया था। साम्राज्य की कर व्यवस्था भी बहुत व्यवस्थित थी। भूमि से होने वाली आय का छठा हिस्सा कर के रूप में लिया जाता था। इसके अलावा व्यापार और विवाह जैसे अवसरों पर भी कर वसूला जाता था। लेकिन विधवाओं के पुनर्विवाह पर कर माफ था, जो उस समय की सामाजिक सहिष्णुता को दिखाता है।

इसके बाद हम इस साम्राज्य की संस्कृति से दो चार हुए। इसमें पाया की विजयनगर साम्राज्य को उसकी सांस्कृतिक उपलब्धियों के लिए आज भी याद किया जाता है। इस साम्राज्य ने कला, साहित्य और वास्तुकला के क्षेत्र में जो योगदान दिया, वह अद्वितीय है। हम्पी में बने मंदिर और इमारतें आज भी उस समय की शिल्पकला की कहानी कहती हैं। दरअसल, विजयनगर के मंदिर द्रविड़ शैली में बनाए गए थे, जिनमें ऊंचे-ऊंचे गोपुरम यानि प्रवेश द्वार होते थे। इन गोपुरमों पर रंग-बिरंगी नक्काशी होती थी, जो देखने में बहुत सुंदर लगती थी। विट्ठल मंदिर, विरुपाक्ष मंदिर और हजारा राम मंदिर इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं।

विजयनगर साम्राज्य

विट्ठल मंदिर के संगीतमय खंभे आज भी पर्यटकों को आश्चर्य में डालने वाले हैं। साहित्य के क्षेत्र में भी विजयनगर ने बहुत योगदान दिया। तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत में कई रचनाएं लिखी गईं। कृष्णदेव राय खुद एक कवि थे और उन्होंने “आमुक्तमाल्यद” जैसा तेलुगु ग्रंथ लिखा। जिसका आज भी साहित्य के संसार में लोहा माना जाता है। उनके दरबार में तेनालीराम जैसे विद्वान और कवि थे, जिनकी कहानियां आज भी मशहूर हैं। और आज यही कहानियां हम टीवी पर देखते सुनते हैं। विशेष तौर पर बच्चे इन कहानियों को खूब पसंद करते हैं। इस साम्राज्य में संगीत और नृत्य को भी खूब प्रोत्साहन मिला। कर्नाटक संगीत की नींव इसी दौर में पड़ी। मंदिरों में देवदासियां नृत्य करती थीं और उन्हें सम्मान के साथ जमीन और वेतन दिया जाता था। यह साम्राज्य सांस्कृतिक रूप से इतना समृद्ध था कि विदेशी यात्री जैसे अब्दुल रज्जाक और डोमिंगो पाइस इसकी तारीफ करते नहीं थकते थे।

हमने इन कहानियों को बड़ी रोचकता से समेटा, इसके बाद हमारा मन मजबूत अर्थव्यवस्था को लेकर कचोटने लगा। फिर हमने यही खोज शुरू की और हमें इस बारे में बहुत कुछ पता चला, जिसमें विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था बहुत मजबूत पाई गई जैसा हमने पहले भी बताया। यह कृषि, व्यापार और हस्तशिल्प पर आधारित थी। तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के किनारे की उपजाऊ जमीन पर चावल, कपास, बाजरा और मसाले खूब उगाए जाते थे। मसाले, कपास, रेशम और रत्न विदेशों में भेजे जाते थे। बदले में घोड़े, सोना और अन्य कीमती सामान आयात किए जाते थे।

विजयनगर साम्राज्य

सिंचाई के लिए नहरों और जलाशयों का निर्माण किया गया, जैसे कमलपुरम जलाशय और हिरिया नहर। व्यापार में विजयनगर का कोई जवाब नहीं था। यह साम्राज्य फारस, अरब, चीन और यूरोप के साथ व्यापार करता था।

उस समय गोआ का बंदरगाह इस व्यापार का मुख्य केंद्र था। किताबों में पढ़ा हुआ अधिकतर हमें वही सुनने को मिला। खैर, विजयनगर की मुद्रा को “पैगोडा” कहा जाता था, जो सोने, चांदी और तांबे की होती थी। बाजारों में चहल-पहल रहती थी और व्यापारी समुदाय, जैसे कुदिरई चेट्टी जो घोड़े के व्यापारी थे, उस समय बहुत सक्रिय थे। पुर्तगाली व्यापारियों के आने के बाद व्यापार और बढ़ गया। उनकी बंदूकें और सामरिक तकनीक ने विजयनगर को और ताकतवर बनाया। इस समृद्धि की वजह से विजयनगर का बाजार दुनिया भर में मशहूर था। विदेशी यात्री बताते हैं कि हम्पी के बाजारों में हीरे, मोती और मसाले इतने थे कि ऐसा लगता था जैसे कोई खजाना हो। इस आर्थिक ताकत ने साम्राज्य को सैन्य और सांस्कृतिक रूप से मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।

सबसे अंत में हमें जाना की पतन की क्या बजह थी? दरअसल, हर साम्राज्य का एक दिन ढलना तय होता है और विजयनगर भी इससे अछूता नहीं रहा। 1565 में तालिकोटा का युद्ध जिसे राक्षसी-तंगड़ी युद्ध भी कहते हैं इस साम्राज्य के पतन का सबसे बड़ा कारण बना। इस युद्ध में दक्कन की चार मुस्लिम सल्तनतों अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा और बीदर ने मिलकर विजयनगर पर हमला किया। विजयनगर की सेना का नेतृत्व उस समय राम राय कर रहे थे। लेकिन गठबंधन की ताकत और आंतरिक विश्वासघात के कारण विजयनगर की हार हुई।

युद्ध के बाद हम्पी को लूट लिया गया और शहर को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। मंदिर, महल और बाजार सब बर्बाद हो गए। इस हार के बाद साम्राज्य कभी अपनी पुरानी शक्ति हासिल नहीं कर पाया। हालांकि, अरविडु राजवंश ने पेनुकोंडा और चंद्रगिरी से शासन करने की कोशिश की, लेकिन साम्राज्य की चमक खत्म हो चुकी थी। धीरे-धीरे यह साम्राज्य छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गया और 17वीं शताब्दी तक पूरी तरह समाप्त हो गया। लेकिन हम्पी के खंडहर आज भी उस स्वर्णिम युग की याद दिलाते हैं

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