सतयुग दर्शन वसुंधरा के सातों दरवाजों में छिपा है जीवन का सार!
किसी ने क्या खूब लिखा है “मुड़कर पीछे न देखना जो छूट गया वह तेरा था ही नहीं”। कहने का तात्पर्य है, जो हो गया, उसे तुरंत प्रभाव से उतार फेंको इस मन से, इस तन से! कोई चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हम ऐसा ही करते हैं, हम एक जगह जाकर ठहरते नहीं हैं। हमने नदिया की तरह बहना सीखा है। सूरज में तपना सीखा है! हवाओं को छूते हुए गुजरने का एहसास किया है। यही है हमारी पहचान, फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल, जहां हर कदम पर हो नया वेलकम। स्वागत है इस नई पेशकश में। एक और विशेष स्थान के साथ हाजिर है एक नया अनुभव। जहां इन्जॉय के साथ, मन की शांति का रास्ता भी उपलब्ध है। हां, सतयुग दर्शन वसुंधरा कुछ ऐसा ही है।
मन की शांति और आत्मज्ञान के लिए आइए सतयुग दर्शन वसुंधरा
जिसका उद्देश्य ही मानवता, चेतना, बंधुत्व और आपसी प्रेम भाव को बढ़ाना है। यकीनन यह कहा जा सकता है की आधुनिक भारत का यह एक मात्र संस्थान है जो शिक्षा के क्षेत्र में नेक काम कर रहा है। जहां विद्यार्थी भौतिक ज्ञान के साथ, आंतरिक ज्ञान पर भी काम करते हैं। यही सुनकर हमने अपना बसता कसा और चार पहियों पर चल पढे। दिल्ली से महज 40 मिनिट का रास्ता है, कोई ज्यादा दूर नहीं है! जीवन की ऊहापोह और भागमभाग में उलझे रहे तो क्या जिया। इसलिए जीने के लिए शांति से भरी जगह की तलाश में निकल पढे सतयुग दर्शन।

सतयुग दर्शन वसुंधरा का मतलब, एक ऐसे युग से है, जो सत्य की भावना से प्रेरित हो। जैसा की किताबों में हमें पढ़ने को मिला की सतयुग सबसे पवित्र युग माना जाता है, जहां सत्य, धर्म, शांति और न्याय का पूर्ण पालन होता था। इसे सत्य का युग भी कहते हैं। हूबहू उसी भावना को संभाले हुए है यह अद्भुत स्थान है।
मस्ती में जाएंगे तो 40 मिनट चार मिनट के जैसे लगेंगे!
दोपहर का समय लगभग बारह या एक बजे हमने दस्तक दी सतयुग दर्शन वसुंधरा के दरवाजे पर। दिल्ली से पूरे रास्ते भर हमने मस्ती की क्योंकि दिल्ली से सतयुग दर्शन जाने पर बीच में बहुत सारे खेत खलिहान मिलते हैं। और खेत खलिहान और हरियाली से रंगारंग माहौल हर किसी को पसंद आता है। हम भी खूब मौज करते हुए यहां पहुंचे। यहां सबसे पहले हमने पहुंचने पर देखा एक अद्भुत गांव भूपानी जिस गांव में यह शानदार जगह है। यह गांव हरियाणा के फरीदवाद जिले में आता है।
गांव की हरयाली और चलपहल से मन गदगद हो गया। गांव के इस मनोरम दृश्य से ने हमें सतयुग दर्शन वसुंधरा पहुंचने के लिए और उत्सुक कर दिया। हम लमसम आधे-पोने एक घंटे का सफर तय कर पहुंचें बसुंधरा। सबसे पहले हमने एंट्री की फिर हम अंदर गए। जहां आपको दिखेंगे सात दरवाजे। इन सात दरवाजों का अपना अलग महत्व है। कोई दरवाजा परोपकार को बयां करता है, कोई दरवाजा शिष्टाचार को। सबकी अपनी-अपनी अहमियत है।
हर एक दरवाजा हमने बारीकी से देखा और उसके बारे में जाना। सतयुग दर्शन वसुंधरा के अपने गाइड से जानकारी ली। उन्होंने हमें बड़ी ही शालीनता से हमें उन सातों दरवाजों के बारे में बताया। दरवाजों को पार करते ही सबसे पहले हमने अपने जूते उतारे, अध्यात्म जगह पर इन सभी चीजों को ध्यान में रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। हमारा बढ़िया सलीके से सत्कार और स्वागत किया गया। शीतल जल से हमारी प्यास बुझाई गई। बस इसी प्रेम भाव से रास्ते की सारी थकान पल भर में उड़ गई।
इसकी बनावट में ही छिपा है, इसके महत्व का राज
सात दरवाजों के बाद आता है, बसुंधरा का मुख्य द्वार जिसको द्यान कक्ष के रूप में संबोधित किया जाता है। जिसके दोनों तरफ सतयुग की पहचान और मानवता के बारे में क्रमस: लिखा हुआ दिखेगा। जिसमें जीवन का सार रूपोश है। सर्वप्रथम आप देखिए इसकी बनावट, क्योंकि यदि हम सात दरवाजों को छोड़ दें, इसके बाद की बनावट देखें तो इसकी बनावट में थोड़ा ताजमहल का नूर दिखाई पड़ता है। दरअसल, मेरा ऐसा मानना इसलिए है क्योंकि एक तो इस जगह को सफेद मार्बल से बनाया गया है। और इसके बावजूद ध्यान कक्ष में मुख्य द्वार के बाद इसके आंगन में ताजमहल के जैसे चार खंबे बने हुए हैं। हालांकि ये चारों खंबे आधात्म रूप से अलग पहचान रखते हैं। किसी पर भगवान विष्णु का चक्र बना है, तो किसी पर बना है गदा तो किसी पर शंक और पद्म।

इस ध्यान कक्ष की रोचकता तब देखने में और बढ़ जाती है जब हम देखते हैं की इस ध्यान कक्ष को चारों तरफ से पानी से घेरा गया है। यह चारों तरफ भरा पानी इस ध्यान कक्ष को जीवंतता प्रदान करता है। देखने में आंखों को ठंडक देने बाला दृश्य बनाता है। यह नीला पानी नीले आसमान की भांति। यहां पहुंचे श्रद्धालुओं और पर्यटकों का ध्यान खींचता है। बनावट में एक अद्भुत कला का समावेश किया गया है, जो देखने लायक बनती है। ध्यान कक्ष के चारों तरफ से घेरा हुआ यह पानी असल में सागर का पर्याय है, और बीच में बना यह ध्यान कक्ष हम इंसानों की दुनिया।
यह विद्यालय होने के साथ-साथ मानवता की प्रयोगशाला है!
आत्मिक कक्ष
इसे आप ध्यान कक्ष का पहला हिस्सा मान सकते हैं। इसमें आए हुए श्रद्धालुओं को आत्मा के सत्य से परिचित कराया जाता है, सत्य और संतोष के अर्थ को कंटस्थ करना ही इस कक्ष का काम है, इसको इसी तरह से बनाया गया है। सेकड़ों लोग बैठकर यहां ध्यान कर सकते हैं, कुछ सीख सकते हैं। सफेद पत्थर से बना यह सात्विक कक्ष बहुत ही सुंदर और मनमोहक लगता है। आप एक बार यहां बैठेंगे तो आपका मन उठने का नहीं होगा। यही है खासियत इस इस सात्विक कक्ष की। सुबह शाम यहां कक्षाएं आयोजित होती हैं, जिसमें सभी ज्ञान रूपी दीपक जलाकर स्वयं की खोज करते हैं। इसके अलावा जो नेसर्गिक मानवीय विचार हैं उनको समझा जाता है।
सर्गुण कक्ष
अब हम बात करते हैं, सर्गुण कक्ष की, सर्गुण कक्ष में आत्मा के सत्य से बाकिफ़ किया जाता है, सही नियमों और मूल्यों का उपयोग कर आत्मा की गहराई को समझना और उसके मूल्य को समझना है। जो जीवन मिला है, उसको कैसे सतकाम से भरा जा सकता है, कैसे सज्जनता का लिबास ओढा जा सकता है। यह पूरा ध्यान कक्ष थके हारों के लिए और सबसे बेहतर है, जो मानसिक तनाव झेल रहे हैं! उनके लिए सबसे अच्छी जगह है। वे यहां आकार आत्मचिंतन कर सकते हैं। और अपने जीवन का सार खोज सकते हैं। जीवन का क्या अर्थ है, ऐसी ही शांत और अध्यात्म जगहों पर आकर ही पता चलता है। चारों तरफ से घिरा यह बसुंधरा ध्यान कक्ष सबसे खास इसीलिए है। हर कक्ष में कई तरह के विचार लिखे हुए हैं, जो कहीं न कहीं हमारी आत्मा से, हमारे शरीर से जुड़े हैं। जुड़े हुए हैं, आत्मा के उस छोर से जहां से हमारी शुरुआत होती है। शुरू और अंत तो बस उस परमब्रह्म की देंन है। आत्मा का निर्माण और, आत्मा का शरीर से त्याग यह सब परमब्रह्म के ही चमत्कार हैं। उसी ज्योति का प्रकाश है, जो ध्यान कक्ष के सबसे ऊपर विराजमान है।
निर्गुण कक्ष
यह जगह वास्तव में विद्यार्थियों की जो आंतरिक ऊर्जा है, उसके बारे में जागरूक करता है। यही इस जगह को खास बनाता है। अब मुख्य तौर पर हम बात करते हैं ध्यान कक्ष की जो इस पूरे सतयुग दर्शन वसुंधरा का नायाब नगीना है आप कह सकते हैं। क्योंकि मुख्य स्थान यही है जहां से बहुत कुछ आप सीख सकते हैं। जैसे की इस ध्यान कक्ष को तीन स्तरों में डिजाइन किया है। तीनों की अपनी भूमिका है जैसे सबसे ऊपर का जो हिस्सा है, उसमें आज ज्योति के जरिए आप अपनी आत्म ज्योति को परख सकते हैं। यहां बैठकर आप आत्मचिंतन कर स्व को जान सकते हैं। इस भाग में आप देखेंगे की चारों तरफ संदेश लिखे हैं। जो मानवता को उजागर करते हैं। सभी संदेशों में कुछ सीख है। जैसे एक कहावत है की ज्ञानी को नहीं बल्कि ज्ञान को आत्मसात करो। इन्ही सभी संदेशों से आप लाभान्वित हो सकते हैं।
इस कक्ष को इस तरह से बनाया गया है की आप कुछ भी बोलेंगे तो आप की आवाज पूरे कक्ष में गूँजेगी। यह सब खुद को या आत्मज्ञान को परखने के लिए इस तरह बनाया गया है। सबसे ऊपर आज ज्योत परमब्रह्म का प्रतीक है। कक्ष के अंदर ऊपर आप सूर्य का चित्र देखेंगे जो प्रतीक है, प्रकाश का। जो इस ब्रह्मनामी ज्योत को रोशनी दे रहा है। इस कक्ष को निर्गुण कक्ष कहा जाता है, अर्थात यह कक्ष इस चीज को संदर्भित करता है की हम मानव का इस पांच तत्वों से बने हुए शरीर, का कोई आकार नहीं यह सब ब्रह्म है।
साप्ताहिक और कीर्तन में है आखिरी सुख
जीवन में संगीत का होना बहुत जरूरी है, समय पर यहां कीर्तन और सत्संग होते रहते हैं, सत्संग यहां साप्ताहिक होते हैं, मतलब हर सप्ताह में सत्संग का आयोजन किया जाता है। और यह चीजें इसके निर्माण के साल से ही निर्धारित हैं। इसकी स्थापना 12 जुलाई 1995 में हुई थी। तभी से यह मानव कल्याण का काम करता आ रहा है, मानवता के हित में काम कर रहा है। लगभग 36 एकड़ में फेला यह स्थान वास्तव में इंसानियत के परम सिद्धांतों से दो चार कराता है।


खाने-पीने की उत्तम व्यवस्था से लेकर पार्किंग और अन्य चीजें
पूरे द्यान कक्ष भ्रमण करने के बाद हमें खूब जोरों से भूख लगी, तो वहां के गाइड से खाने के बारे में हमने पूछा। उन्होंने हमें बताया की चिंता की कोई बात नहीं एक तरफ कैन्टीन है, जहां आप हल्का-फुल्का खाना खा सकते हो! और दूसरे तरफ मेस है, जहां आप भर पेट भरकर खा सकते हो। कहने का तात्पर्य यह है की यह जगह सभी सुविधाओं से सम्पन्न है, लैस है।
सभी कुछ घूमने फिरने के बाद और सारी चीजों को समझने के उपरांत हमने अच्छे-अच्छे फ़ोटोज़ लिए, वीडियो बनाए। इतना रोमांचक दृश्य और फ़ोटो न हो ये बात बनी नहीं। हमने भरपूर मन भर फ़ोटोज़ लिए और फिर चल दिए हम कार के तरफ, जहां हमारी कार खड़ी थी। मैं यह बताना चाह रहा हूं की यहां पार्किंग की भी व्यवस्था शानदार है। खैर, कभी शांति और संतोष की तलाश हो, शहर के जीवन से थक चुके हो! तो घूमिए कभी सतयुग दर्शन बसुंधरा, आपको आत्मअनुभूति जरूर होगी। अच्छा लगेगा। गांव की हवा में सारा तनाव खत्म हो जाएगा। फीस बगैरह कुछ है नहीं, आराम से घूमिए और आनंदित हो जाइए।
सतयुग दर्शन पहुंचना कैसे है?
यह जगह हरियाणा के फरीदाबाद के एक छोटे से गांव भूपानी में है, गांव में होने के चलते इसके माएने कुछ अलग ही हैं। जो देखने में नायाब लगता है। खैर, दिल्ली से आपको मात्र 40 मिनट लगने वाले हैं। क्योंकि इसकी दूरी मात्र 37 से 38 किलोमीटर है। जो ज्यादा बहुत नहीं है। आप बाइक से भी जा सकते हैं। बाइक से 10 मिनट ज्यादा मान लीजिए। इससे ज्यादा क्या ही हो सकता है। केब के जरिए भी आप सतयुग दर्शन बसुंधरा जा सकते हैं। जो पांच सौ से हजार रुपया आपको पढ़ेगा, और आसानी से आपको यहां पहुंचा देगा।





