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त्रिपुरा का उनाकोटी मंदिर, जानिए क्यों है रहस्यों में लिपटा

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भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा जिसे सात बहनों का क्षेत्र कहा जाता है, अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। त्रिपुरा का उनाकोटी मंदिर इसी क्षेत्र का एक अनमोल रत्न है। यह मंदिर न केवल अपनी विशाल और रहस्यमयी पत्थर की मूर्तियों के लिए जाना जाता है बल्कि यह एक ऐसा स्थान भी है जो आस्था, इतिहास और कला का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। उनाकोटी जिसका अर्थ है करोड़ में एक कम, अपने नाम के अनुरूप ही रहस्यमयी और आकर्षक है यह मूर्तियों से गढ़ी शिलाएं हर किसी को आकर्षित करती हैं। उनाकोटी मंदिर: एक रहस्यमयी तीर्थस्थल उनाकोटी मंदिर त्रिपुरा के कैलाशहर के एक हिस्से में राजधानी अगरतला से लगभग 145 किलोमीटर दूर रघुनंदन पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसे पूर्वोत्तर भारत के सबसे बड़े रहस्यों में से एक माना जाता है। माना जाता है कि यहाँ 99 लाख 99 हजार 999 पत्थर की मूर्तियाँ हैं। जो इसे और भी खास बनाती हैं। इसीलिए इसका नाम “उनाकोटी” पड़ा, जिसका मतलब है करोड़ में एक कम। यह मंदिर घने जंगलों, तंग पगडंडियों और नदी के किनारे बसा हुआ है, जो इसे एक रहस्यमयी और शांत जगह बनाता है। यहाँ की विशाल मूर्तियाँ और शैलचित्र देखकर हर कोई हैरान हो जाता है। मंदिर का मुख्य आकर्षण भगवान शिव की 30 फीट ऊँची मूर्ति है, जिसे “उनाकोटेश्वर काल भैरव” के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा गणेश, दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी यहाँ की शोभा बढ़ाती हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों के लिए भी एक अनोखा स्थान है। उनाकोटी की खूबसूरती और रहस्य इसे एक ऐसी जगह बनाते हैं जहाँ हर कोई एक बार जरूर जाना चाहता है। इतिहास और किंवदंतियाँ के घेरे में उनाकोटी की रहस्यमयी कहानियाँ उनाकोटी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना और रोचक है। माना जाता है कि इसकी मूर्तियाँ सात वीं से नौ वीं शताब्दी के बीच बनाई गई थीं। जब पाल वंश का शासन था। कुछ स्रोतों के अनुसार यह मंदिर उससे भी पुराना हो सकता है। लेकिन इसके निर्माण के पीछे कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। जिसके कारण यह और भी रहस्यमयी बन जाता है। उनाकोटी के नाम और मूर्तियों के पीछे कई पौराणिक कहानियाँ प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार भगवान शिव अपने एक करोड़ अनुयायियों के साथ काशी जा रहे थे। रास्ते में रघुनंदन पहाड़ियों पर रात होने के कारण उन्होंने विश्राम किया। शिव ने सभी से कहा कि सूर्योदय से पहले उठकर यात्रा शुरू कर दें। लेकिन सुबह केवल शिव ही जागे बाकी सभी सोते रहे। क्रोधित होकर शिव ने सभी को शाप दिया और वे पत्थर की मूर्तियों में बदल गए। इसीलिए यहाँ एक करोड़ में एक कम यानी 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियाँ हैं और स्थान का नाम उनाकोटी पड़ा। एक दूसरी कहानी में बताया जाता है कि एक मूर्तिकार जिसका नाम कल्लू कुम्हार था, भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। उसने शिव से अपने साथ कैलाश चलने की प्रार्थना की। शिव ने शर्त रखी कि अगर वह एक रात में एक करोड़ मूर्तियाँ बना दे, तो वे उसे अपने साथ ले जाएँगे। कल्लू ने पूरी रात मेहनत की लेकिन वह एक मूर्ति कम बना पाया। इस कारण वह शिव के साथ नहीं जा सका और यह स्थान उनाकोटी कहलाया। यह कहानियाँ उनाकोटी को और भी रहस्यमयी और आकर्षक बनाती हैं। यहाँ की हर मूर्ति जैसे अपनी कहानी कहती हो जो हर आगंतुक को सोचने पर मजबूर कर देती है। पत्थरों पर उकेरी गई कला की खासियत उनाकोटी मंदिर की सबसे खास बात इसकी वास्तुकला और शैलचित्र हैं। यहाँ की मूर्तियाँ दो तरह की हैं कुछ पत्थरों को काटकर बनाई गई हैं और कुछ चट्टानों पर उकेरी गई हैं। इन मूर्तियों में भगवान शिव, गणेश, दुर्गा, विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की छवियाँ हैं। सबसे प्रभावशाली मूर्ति है “उनाकोटेश्वर काल भैरव की जो तीस फीट ऊँची है और इसके सिर पर दस फीट ऊँची जटाएँ उकेरी गई हैं। यह मूर्ति इतनी भव्य है कि इसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। भगवान गणेश की मूर्तियाँ भी यहाँ की खासियत हैं। इनमें से एक मूर्ति में गणेश की चार भुजाएँ और तीन दाँत दिखाए गए हैं जो बहुत दुर्लभ है। इसके अलावा चार दाँत और आठ भुजाओं वाली गणेश की दो अन्य मूर्तियाँ भी हैं। माता दुर्गा की शेर पर सवार मूर्ति और नंदी बैल की आधी उकेरी गई छवि भी यहाँ की शोभा बढ़ाती हैं। यहाँ की मूर्तियाँ पाल वंश की कला को दर्शाती हैं, जो सात वीं से नौ वीं शताब्दी की हैं। इनमें से कुछ मूर्तियों पर ग्यारह वीं और बारह वीं शताब्दी की बंगाली लिपि में लेख भी मिले हैं जो एक तीर्थयात्री श्री जयदेव का जिक्र करते हैं। मूर्तियों की नक्काशी इतनी बारीक और सुंदर है कि यह कारीगरों की कला और मेहनत को दिखाती है। जंगल के बीच बनी ये मूर्तियाँ प्रकृति और कला का एक अद्भुत मेल हैं जो इसे देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। इस स्थान का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व उनाकोटी मंदिर न केवल एक ऐतिहासिक स्थल है बल्कि यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र भी है। यह भगवान शिव को समर्पित है और इसे शैव तीर्थस्थल माना जाता है। यहाँ की मूर्तियाँ और शांत वातावरण इसे भक्तों के लिए एक पवित्र जगह बनाते हैं। लोग यहाँ आकर शिव, गणेश और अन्य देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और अपने मन की शांति पाते हैं। हर साल यहाँ अशोकाष्टमी मेले का आयोजन होता है, जिसमें हजारों भक्त और पर्यटक शामिल होते हैं। इस मेले में लोग मूर्तियों की पूजा करते हैं और स्थानीय संस्कृति का आनंद लेते हैं। यह मेला उनाकोटी की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को और बढ़ाता है। उनाकोटी को तांत्रिक गतिविधियों का केंद्र भी माना जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि यहाँ की मूर्तियाँ और वातावरण में एक खास आध्यात्मिक शक्ति है। स्थानीय लोग इसे “देवताओं का दूसरा घर” मानते हैं और इसे बहुत सम्मान देते हैं। यह मंदिर त्रिपुरा की संस्कृति और परंपराओं को भी दर्शाता है। यहाँ की मूर्तियाँ और कहानियाँ स्थानीय लोगों की आस्था और कला को