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असीगढ़ किला- हरियाणा की धरोहर जिसके रहस्य जान आप रह जाएंगे दंग!

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हरियाणा की धरती अपने इतिहास और वीरता के लिए जानी जाती है, और इन्हीं विरासतों में असीगढ़ किला सबसे चमकता नाम है। यह किला हिसार जिले में स्थित है और इसे ‘किलों का किला’ कहा जाता है। इसकी खासियत सिर्फ इसकी विशालता नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपे सदियों पुराने इतिहास की परतें हैं। माना जाता है कि इस किले का निर्माण 14वीं शताब्दी में फिरोज शाह तुगलक ने करवाया था। उस समय यह न सिर्फ एक सैन्य ठिकाना था, बल्कि एक रणनीतिक केंद्र भी था। दिल्ली से लेकर पश्चिमी भारत तक की रक्षा व्यवस्था में इसका योगदान अहम था। इसकी ऊंची-ऊंची दीवारें द्वार और चौकसी के लिए बने बुर्ज इसकी शक्ति और सामरिक महत्ता को दर्शाते हैं। क्या कहते हैं लोकल के वोकल? यहां के लोकल (स्थानीय लोग) बताते हैं कि इस किले पर कई बार आक्रमण हुए हैं। मुगलों, मराठों और यहां तक कि अंग्रेजों ने भी इसे अपनी सत्ता के लिए महत्वपूर्ण माना। किला बदलते शासकों की इच्छाओं और संघर्षों का साक्षी रहा है। कई युद्धों और राजनीतिक उठा-पटक के बावजूद यह आज भी मजबूती से खड़ा है, मानो इतिहास को अपने भीतर समेटे यात्रियों से कह रहा हो “आओ, मेरी दीवारों पर बीते वक्त की कहानियां सुनो।” इस किले को ‘असीगढ़’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह असंख्य सैनिकों को समाने की क्षमता रखता था। कहा जाता है कि हजारों सैनिक इस किले में रह सकते थे। यही कारण है कि यह उत्तर भारत के सबसे बड़े किलों में गिना जाता है। आज भी जब आप इसकी विशाल दीवारों और आंगन में घूमते हैं, तो बीते युग की सैन्य गहमागहमी की झलक को आसानी से महसूस कर सकते हैं। इसे क्यों माना जाता है शक्ति और सौंदर्य का अद्भुत नमूना? असीगढ़ किला न केवल इतिहास का गवाह है, बल्कि भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण भी है। इसकी संरचना को देखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि उस समय इंजीनियरिंग और वास्तुकला कितनी उन्नत रही होगी। किले की दीवारें लाल बलुआ पत्थर और ईंटों से बनी हैं, जो इसे मजबूत और टिकाऊ बनाती हैं। इसकी ऊंचाई और चौड़ाई इतनी है कि शत्रु सेना के लिए इसे भेद पाना लगभग असंभव था। चारों दिशाओं में बने विशाल दरवाजे न केवल आवागमन के लिए, बल्कि सुरक्षा के लिए भी सहायक थे। दरवाजों पर लोहे की कीलें और सजावट उस समय के शिल्प कौशल को दर्शाती हैं। किले के भीतर मस्जिद, बावड़ी और कई आवासीय कक्ष बने हुए हैं। मस्जिद का निर्माण मुगलकालीन शैली में हुआ है, जिसमें मेहराबदार दरवाजे और जटिल नक्काशी देखने लायक है। किले की बावड़ियां न सिर्फ जल संरक्षण का साधन थीं, बल्कि वास्तुकला की दृष्टि से भी अद्वितीय हैं। सबसे खास है, किले का केंद्रीय आंगन, जहां सैनिकों की परेड और शाही समारोह हुआ करते होंगे। किले की ऊंचाई से देखने पर आसपास का नज़ारा मन मोह लेता है। हरे-भरे खेत और दूर तक फैली अरावली की शृंखलाएं इस किले को प्राकृतिक सुंदरता भी प्रदान करती हैं। यह किला शक्ति और सौंदर्य का ऐसा अनूठा संगम है, जो यात्रियों को केवल इतिहास की झलक ही नहीं देता, बल्कि स्थापत्य कला की भव्यता का एहसास भी कराता है। वीरता और संघर्ष की कहानियां बनाती हैं इसे और भी खास! असीगढ़ किला, केवल पत्थरों और दीवारों का ढेर नहीं है, बल्कि यह वीरता और संघर्ष की कहानियों का जीवंत संग्रह है। इतिहास के पन्नों में कई ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जिनसे यह किला युद्धों और साहसिक गाथाओं का प्रतीक बन गया। कहा जाता है कि इस किले पर मराठों और मुगलों के बीच कई संघर्ष हुए। अंग्रेजों ने भी इसे अपने अधीन करने के लिए घेराबंदी की थी। हर बार इस किले की दीवारों ने गोलाबारी और तलवारों की चोटों को सहा, लेकिन हार नहीं मानी। सैनिकों की हुंकार, घोड़ों की टाप और तोपों की गर्जना की आवाज़ें मानो आज भी इसके पत्थरों में गूंजती हैं। स्थानीय कथाओं के अनुसार, किले की रक्षा में कई वीर योद्धाओं ने अपने प्राण न्यौछावर किए। उनकी बलिदान गाथाएं आज भी आसपास के गांव के लोकगीतों में सुनाई देती हैं। असीगढ़ किला इस तरह न केवल एक स्थापत्य धरोहर है, बल्कि शौर्य और देशभक्ति का प्रतीक भी है। यात्रियों के लिए यह अनुभव अद्भुत होता है कि वे जिस स्थान पर खड़े हैं, वहां कभी वीर सैनिक अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपनी भूमि और सम्मान की रक्षा कर रहे थे। यह एहसास किसी भी व्यक्ति के भीतर गर्व और रोमांच की लहर पैदा कर देता है। पर्यटन और आकर्षण केंद्र के रूप में असीगढ़ किला! आज असीगढ़ किला हरियाणा का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है। यहां हर साल हजारों पर्यटक आते हैं और इस ऐतिहासिक धरोहर की भव्यता को निहारते हैं। किले का मुख्य आकर्षण इसकी विशाल दीवारें और गगनचुंबी बुर्ज हैं, जहां खड़े होकर आप दूर-दूर तक का नज़ारा देख सकते हैं। फोटोग्राफी प्रेमियों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय किले से दिखाई देने वाला दृश्य इतना मनमोहक होता है कि कोई भी उसे कैमरे में कैद किए बिना नहीं रह सकता। इतिहास प्रेमियों के लिए यहां हर ईंट और पत्थर एक कहानी कहता है। स्थापत्य प्रेमियों के लिए मस्जिद, बावड़ी और दरवाजों की कलाकारी अद्भुत है। वहीं, आम पर्यटकों के लिए यह किला अपने आप में शांति और गर्व का अनुभव कराता है। स्थानीय प्रशासन समय-समय पर यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम और गाइडेड टूर भी आयोजित करता है। इससे पर्यटकों को किले की ऐतिहासिक महत्ता को समझने का अवसर मिलता है। इसके अलावा, आसपास के गांव और बाजारों में स्थानीय हस्तशिल्प और व्यंजन भी यात्रियों के अनुभव को और समृद्ध बना देते हैं। एक बार ही सही पर यहाँ जाएं जरूर! असीगढ़ किले की यात्रा किसी सामान्य पर्यटन स्थल की यात्रा नहीं है, बल्कि यह एक समय यात्रा है। जब आप इसकी विशाल दीवारों को छूते हैं, तो आपको लगता है मानो आप इतिहास को छू रहे हैं। जब आप इसके आंगन में खड़े होते हैं, तो ऐसा लगता है कि अतीत की कुछ कह रहा हो। अब भी यह किला ऐसा लगता है जैसे वह जिंदा हो उठा

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हरियाणा के इस जिले में आज भी जिंदा है, दुनिया का सबसे पुराना भाप इंजन, गदर फिल्म की हुई थी शूटिंग

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बात हरियाणा के ऐतिहासिक शहरों की हो और इसमें रेवाड़ी का जिक्र ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है। रेवाड़ी का संबंध महाभारत काल से बताया जाता है। पहले यह शहर रेवत के नाम से जाना जाता था, उसके बाद इसका नाम रेवाड़ी पड़ा। बताते हैं कि महाभारत में राजा रेवत की बेटी रेवती के नाम पर शहर का नाम रखा गया था। राजकुमारी का विवाह भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम से हुआ था और राजा ने दहेज में यह नगर दिया था। राजा हेमचंद्र विक्रमादित्य उर्फ हेमू के कारण भी रेवाड़ी काफी प्रसिद्ध है। हेमू ने रेवाड़ी में पीतल की तोपें और हथियार बनाने का काम शुरू किया था, उसके बाद इसका नाम पीतल नगरी पड़ा। आज भी इसे पीतल नगरी के नाम से जाना जाता है। मौजूदा समय में रेवाड़ी पर्यटन का भी आकर्षण केंद्र रहा है, यहां पर पुराने भाप इंजनों का संग्रहालय है। 17वीं शताब्दी में बनाई हए सोलहाराही और बड़ा तालाब भी रेवाड़ी में स्थित है्, जोकि अपनी प्राचीन कलाकारी के लिए जानी जाती है। रेवाड़ी लोको शेड रेलवे स्टेशन के पास स्थित लोको शेड भारत में एकमात्र जीवित भाप लोको शेड है। दुनिया की सबसे पुरानी अभी भी कार्यात्मक 1855 में निर्मित स्टीम लोकोमोटिव फेयरी क्वीन आकर्षण का केंद्र है। यह रेलवे स्टेशन के प्रवेश द्वार के 400 मीटर उत्तर में स्थित है। लोको शेड सोमवार के दिन बंद रहता है। मंगलवार से लेकर रविवार तक लोको शेड खुला होता है। इसके खुलने का समय सुबह 10 से लेकर शाम 4 बजे तक का है। जहां पर भाप के इंजन रखे हुए हैं, वहां घूमने के लिए बड़ों का किराया 50 रुपये और बच्चों का किराया 25 रुपये रखा गया है। म्यूजियम में घूमने के लिए बड़ों का किराया 20 रुपये और बच्चों का किराया 10 रुपये है। फेयरी क्वीन इंजन खास मौकों पर ही चलता है, जब विदेशी पर्यटक यहां पर घूमने के लिए आते हैं। इसका किराया 3 हजार रुपये से अधिक है। यह ट्रेन रेवाड़ी और दिल्ली कैंट तक चलती है। ये भाप इंजन भी हैं आकर्षण का केंद्र इसके अलावा रेवाड़ी किंग, साइब, सुल्तान, सिंध, अंगद, अकबर, आजाद, शेर-ए-पंजाब, विराट और शक्तिमान नाम के भाप इंजन पर्यटकों के लिए संभाल कर रखे गए हैं। यहां पर एक डॉक्यूमेंट्री के जरिए रेलवे के अबतक के सफर को पर्यटकों को दिखाया जाता है। भारतीय भाप का इंजन अकबर, गदर एक प्रेम कथा, भाग मिल्खा भाग, गांधी माई फादर, गैंग्स ऑफ वासेपुर समेत कई बड़ी सुपरहिट फिल्मों में इस इंजन का उपयोग किया गया है। 800 मीटर का लगाया हुआ है टॉय ट्रेक लोको शेड इंचार्ज ओम प्रकाश मीणा ने बताया कि रेवाड़ी लोको शेड में एक म्यूजियम भी बनाया हुआ है, जहां भाप के इंजन की यादों को जिंदा रखा गया है, ताकि युवा पीढ़ी भारतीय रेल का शुरू से लेकर अब तक का सफर जान सकें। लोको शेड के भीतर ही पर्यटकों को लुभाने के लिए टॉय ट्रेन भी चलाई जाती है, जिसका 800 मीटर का ट्रैक लगाया हुआ है। इसके अलावा लोको शेड के अंदर ही एक ऐसी जगह बनाई गई है, जिसे देखकर आप यहीं से ही भारतीय रेल का मानचित्र देख सकते हैं कि कैसे-कैसे स्थानों पर भारतीय रेल सेवाएं दे रही है। यहां पर एक डॉक्यूमेंट्री के जरिए रेलवे के अब तक के सफर को पर्यटकों को दिखाया जाता है। बड़ा तालाब लोको शेड से 800 मीटर की दूरी पर बड़ा तालाब स्थित है। सर्कुलर रोड से होते हुए आसानी से तालाब देखने के लिए पहुंचा जा सकता है। यह तालाब 17वी् शताब्दी में बनाया गया था। रेवाड़ी के राजा राव राम सिंह ने पानी की किल्लत के कारण इस तालाब को बनवाना शुरू किया था, लेकिन उसी समय राजा माधव राव सिंधिया ने रेवाड़ी पर धावा बोल दिया और प्रजा हितैषी राजा राम सिंह शौर्य दिखाते हुए शहीद हो गए थे। इसके बाद तालाब निर्माण कार्य बंद हो गया। रेवाड़ी निवासी जब पानी की कमी से तंग होने लगे तो एक और राजा राव तेज सिंह ने अपने शासनकाल में तालाब निर्माण के रुके कार्य को वर्ष 1772 में शुरू करवाया जो 1776 में तैयार हुआ। इस तालाब की निर्माण कला और कारीगरी अद्भुत है। इसमें गऊ घाट, इमली घाट, प्राचीन हनुमान मंदिर व शिव मंदिर प्रतिष्ठित हैं। राजा राव तेज सिंह द्वारा इस तालाब को पूरा करवाने के कारण ही इसका नाम तेज सरोवर पड़ गया। सोलहाराही तालाब बड़ा तालाब से मात्र 500 मीटर की दूरी पर सोलहाराही तालाब स्थित है। बड़ा तालाब से सर्कुलर रोड को पार करके नेहरू पार्क के पास आसानी से पहुंचा जा सकता है।सोलहाराही तालाब शहर के सेक्टर में स्थित प्राचीनतम तालाब है। 17वीं व 18वीं सदी के मुगल साम्राज्य की दास्तान का मूक गवाह रहा यह तालाब जनता ने सामूहिक प्रयासों से चंदा इकट्ठा करके बनवाया था। समाजसेवी गंगाराम भगत की देखरेख में निर्माण कार्य हुआ था। उस समय सोलह मार्ग यहां आकर मिलते थे, इसलिए इसका नाम सोलह राही पड़ गया। शहर का पानी खारा था, इसलिए पहले लोग सोलह राही स्थित कुओं से पेयजल लाते थे। कुछ दंत कथाओं के अनुसार, रुद्र सिंह ने इस ऐतिहासिक तालाब का निर्माण कराया था। 16 रास्तों के मिलान पर ढलान में स्थापित इस सरोवर को सोलहराही से ही जाना जाता है। कैसे पहुंचे रेवाड़ी अगर आप रेवाड़ी में घूमने के लिए आते हैं तो रेवाड़ी रेलवे स्टेशन पर उतर सकते हैं। रेलवे स्टेशन से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी में सभी पर्यटन स्थल देखने को मिलेंगे। ऑटो टैक्सी का किराया भी ज्यादा नहीं है। ऑटो 24 घंटे यहां पर मिलते हैं, जिनका किराया 20 रुपये से लेकर 50 रुपये के आसपास का है। रेवाड़ी में बस स्टैंड भी है। रेवाड़ी से दिल्ली की दूरी करीब 80 किलोमीटर के आसपास की है। दिल्ली से ट्रेन और बस के माध्यम से रेवाड़ी आसानी से पहुंचा जा सकता है। सड़क माध्यम की बात करें तो दिल्ली जयपुर हाईवे 48 से मात्र 30 किलोमीटर की दूरी पर रेवाड़ी शहर बसा हुआ है। सबसे निकटतम बस अड्डा दिल्ली का आईजीआई एयरपोर्ट है। आईजीआई एयरपोर्ट के मुख्य मार्ग महिपालपुर के पास आपको सीधी बस सेवा रेवाड़ी के लिए मिल जाएगी।