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सारनाथ जहां बुद्ध ने जगाई थी ज्ञान की ज्योति, संसार को दिया था एक नया विचार!

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सारनाथ शांति और ज्ञान की धरती वाराणसी से लगभग दस किलोमीटर की दूरी पर बसा सारनाथ भारत की आत्मा का वह पवित्र कोना है जहां बुद्ध ने पहली बार अपने उपदेशों की गूंज पूरे संसार में फैलायी थी। यह वही भूमि है जहां बुद्ध ने कहा था कि सच्चा सुख किसी वस्तु में नहीं, बल्कि आत्मबोध में छिपा है। यहां पहुंचते ही हर व्यक्ति के मन में एक अद्भुत शांति उतर आती है। सारनाथ का वातावरण कुछ ऐसा है मानो समय ठहर गया हो। प्राचीन पेड़, शांत विहार, मृगों की धीमी चाल और भिक्षुओं के मंत्र सब मिलकर इस स्थान को एक अलौकिक आभा देते हैं। यहां का हर कोना अध्यात्म की कहानी कहता है। वाराणसी की चहल-पहल से थोड़ी ही दूरी पर यह जगह मन को एकदम स्थिर कर देती है। जब सूरज की किरणें प्राचीन स्तूपों पर पड़ती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे स्वयं इतिहास मुस्कुरा रहा हो। सारनाथ का इतिहास बुद्ध से लेकर सम्राट अशोक तक सारनाथ का इतिहास गंगा की तरह प्राचीन और गहरा है। इसका मूल नाम ऋषिपत्तन या मृगदाव था, जिसका अर्थ है ऋषियों का निवास स्थान। परंपरा के अनुसार, जब सिद्धार्थ गौतम को बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ, तो वे यहां आए ताकि अपने पांच पूर्व साथियों को वह ज्ञान बांट सकें, जिन्होंने पहले उन्हें छोड़ दिया था। यही वह क्षण था जब बौद्ध धर्म की शुरुआत हुई। उन्होंने अपने पहले उपदेश में चार आर्य सत्य और अष्टांग मार्ग की शिक्षा दी। यह उपदेश केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय जीवन की दिशा बताने वाला सिद्धांत था। बुद्ध के निर्वाण के बाद सम्राट अशोक ने यहां आकर भव्य निर्माण करवाए। उन्होंने सारनाथ में धर्म राजिका स्तूप, अशोक स्तंभ और अनेक मठ बनवाए। यहीं उन्होंने बुद्ध के अवशेषों की पूजा की। अशोक द्वारा स्थापित स्तंभ पर बना चार सिंहों वाला शीर्ष आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है जो यह दर्शाता है कि भारत की पहचान शांति, धर्म और ज्ञान पर आधारित है। समय के साथ सारनाथ पर कई शासकों का प्रभाव पड़ा कुषाणों ने यहां बुद्ध की सुंदर मूर्तियां बनवाईं, गुप्तकाल में मंदिर बने, और बाद में मुगल काल में कुछ संरचनाएं नष्ट भी हुईं। फिर भी, सारनाथ की आत्मा कभी मरी नहीं; वह आज भी उतनी ही जीवित है जितनी बुद्ध के समय थी।(सारनाथ का इतिहास गंगा की तरह प्राचीन और गहरा है।) इतिहास के साक्षी पत्थर सारनाथ में प्रवेश करते ही आपको ऐसा लगेगा जैसे आप इतिहास की किसी जीवित पुस्तक में आ गए हैं। हर कोना, हर दीवार, हर मूर्ति बीते युग की गवाही देती है।यहां का सबसे प्रसिद्ध स्थल है- धमेक स्तूप– जहाँ बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। यह 43.6 मीटर ऊंचा और लगभग 28 मीटर चौड़ा है। इसकी बाहरी दीवारों पर की गई नक्काशी बौद्ध कला का अद्भुत उदाहरण है। चौखंडी स्तूप– जहां बुद्ध ने अपने पांच साथियों से पुनर्मिलन किया था। बाद में अकबर के शासनकाल में इस पर एक अष्टकोणीय मीनार बनवाई गई, जो आज भी खड़ी है। अशोक स्तंभ- भी देखने योग्य है। यह चमकदार बलुआ पत्थर से बना है और इसकी शिलालेख बुद्ध के उपदेशों की तरह ही सरल और स्पष्ट हैं। सारनाथ संग्रहालय- में जाकर आप बुद्ध की अद्भुत मूर्तियां देख सकते हैं। यहां वह मूर्ति रखी है जिसमें बुद्ध धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में बैठे हैं, जो बौद्ध कला का सबसे प्रसिद्ध रूप मानी जाती है। मुलगंध कुटी विहार- का वातावरण इतना शांत है कि लगता है जैसे समय धीमा हो गया हो। दीवारों पर बुद्ध के जीवन की घटनाओं को दर्शाते हुए रंगीन भित्ति चित्र बनाए गए हैं, जिनकी सुंदरता देखते ही बनती है। धर्मचक्र प्रवर्तन का महत्व ज्ञान की प्रथम किरण सारनाथ की सबसे बड़ी पहचान है धर्मचक्र प्रवर्तन। यह वह क्षण था जब बुद्ध ने अपने भीतर के ज्ञान को संसार के साथ साझा किया। उन्होंने सिखाया कि जीवन दुख मय है, लेकिन दुख का कारण और उसका अंत दोनों संभव हैं। उन्होंने मध्यम मार्ग का उपदेश दिया न अत्यधिक विलासिता और न कठोर तपस्या।उनकी शिक्षाओं में चार आर्य सत्य और अष्टांग मार्ग वह दीपक हैं जो आज भी संसार का मार्ग प्रकाशित कर रहे हैं। सारनाथ का यह संदेश केवल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो शांति की तलाश में है। यहां आने वाला हर यात्री यह अनुभव करता है कि बुद्ध के विचार केवल किसी युग के लिए नहीं, बल्कि हर समय के लिए हैं। जब आप धमेक स्तूप के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और हवा में गूंजते मंत्र सुनते हैं, तो लगता है जैसे स्वयं बुद्ध आपके भीतर से कह रहे हों “प्रदीपो भव” यानी स्वयं प्रकाश बनो। सारनाथ वैश्विक श्रद्धा का केंद्र आज का सारनाथ केवल भारत का नहीं, बल्कि पूरे विश्व का तीर्थस्थल बन चुका है। यहां जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार, चीन और कोरिया जैसे देशों से हर साल हजारों लोग आते हैं। हर देश ने यहां अपने-अपने मंदिर और विहार बनाए हैं, जो उनकी संस्कृति और आस्था को दर्शाते हैं। तिब्बती मठों में भिक्षु अपने पारंपरिक वस्त्रों में घूमते दिखाई देते हैं। शाम के समय जब घंटियों की मधुर ध्वनि वातावरण में गूंजती है और “बुद्धं शरणं गच्छामि” का जाप होता है, तो ऐसा लगता है जैसे पूरा ब्रह्मांड शांति में डूब गया हो। सारनाथ में हर वर्ष बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर विशाल उत्सव होता है। देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु यहां आते हैं, दीप जलाते हैं, ध्यान करते हैं और बुद्ध की शिक्षाओं का स्मरण करते हैं। यहां अब आधुनिक ध्यान केंद्र और पुस्तकालय भी हैं जहां लोग बुद्ध दर्शन, योग और आत्मचिंतन पर अध्ययन करते हैं। यह स्थान आज भी आत्मा को उसी तरह शांत करता है जैसे दो हजार साल पहले करता था। सारनाथ की यात्रा पहुंचते का आसान और सुखद मार्ग सारनाथ की यात्रा अपने आप में एक अनुभव है। यह वाराणसी से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसे टैक्सी या ऑटो से आसानी से तय किया जा सकता है। हवाई मार्ग- निकटतम हवाई अड्डा है लाल बहादुर शास्त्रीअंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डावाराणसी, जहाँ से सारनाथ तक लगभग 40 मिनट का सफर है। रेल मार्ग- वाराणसी जंक्शन और मुगल सराय अब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन दोनों से सारनाथ

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हिमाचल की एक ऐसी प्रथा जिसमें दो गुट मिलकर एक दूसरे पर फेंकते हैं पत्थर, खून लगने पर माना जाता है शुभ!

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हिमाचल का धामी मेला- भारत त्यौहारों की भूमि है जहां हर उत्सव में संस्कृति, विश्वास और लोक जीवन का गहरा रंग दिखाई देता है। लेकिन अगर बात करें किसी ऐसे मेले की जो रोमांच, श्रद्धा और साहस की अद्भुत मिसाल पेश करता हो, तो हिमाचल प्रदेश का धामी पत्थर मेला उस सूची में सबसे ऊपर आता है। यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह मानिए हिमाचली समाज की परंपरा, एकता और बहादुरी का प्रतीक है। हिमाचल की धरती पर खूबसूरत धामी गांव की कहानी शिमला से लमसम 15 किलोमीटर दूर स्थित धामी गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। कभी यह धामी रियासत का हिस्सा माना जाता था, जहां राजा राणा दलिप सिंह का शासन था। धामी की घाटियां देवदार और चीड़ के पेड़ों से ढकी हुई हैं, और यहां की जलवायु हर मौसम में मन मोह लेती है। परंतु इस जगह की असली पहचान उसके अनोखे मेले “पत्थर मेला” से है, जो हर साल गुरु पूर्णिमा के अगले दिन आयोजित होता है।(मेले का आयोजन किसी मंदिर परिसर में नहीं बल्कि खुले मैदान में होता है,) एक परंपरा जो सदियों से जीवित है धामी पत्थर मेला का इतिहास लगभग 200 साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि पुराने समय में राजा ने गांव के दो समूहों खालियों और जोहड़ों के बीच एक धार्मिक अनुष्ठान के माध्यम से विवाद निपटाने की परंपरा शुरू की थी। इस अनुष्ठान में पत्थरों से एक-दूसरे पर प्रहार किया जाता था, ताकि देवता के सामने न्याय स्थापित हो सके। समय के साथ यह परंपरा एक लोक मेला के रूप में बदल गई, जिसे आज पूरा प्रदेश श्रद्धा, उत्साह और हर्ष के साथ मनाता है। मेला कब और कहां लगता है? हर साल गुरु पूर्णिमा के अगले दिन, शिमला के पास धामी गांव में यह अनोखा मेला आयोजित होता है। यह दिन खास होता है क्योंकि लोग इसे देवताओं के आशीर्वाद और न्याय का प्रतीक मानते हैं। सुबह-सुबह पूरे गांव में पूजा, झांकियां और परंपरागत नृत्य-गान होते हैं। दोपहर तक लोग खुली जगह पर इकट्ठा होते हैं जहाँ “पत्थर युद्ध” की शुरुआत होती है। मेले का आयोजन किसी मंदिर परिसर में नहीं बल्कि खुले मैदान में होता है, ताकि हजारों लोग इस दृश्य का हिस्सा बन सकें। चारों ओर ढोल, नगाड़े, और देव वाद्य बजते हैं। माहौल एक धार्मिक उत्सव की तरह बन जाता है जहां श्रद्धा और साहस एक साथ दिखाई पड़ते हैं। पत्थर युद्ध एक अनकही कहानी मेले की सबसे खास और रोमांचक रस्म है पत्थर युद्ध। इसमें दो टीमें होती हैं खालियों और जोहड़ों की। ये दोनों दल एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं, लेकिन यह कोई हिंसा नहीं मानी जाती। बल्कि इसे देवताओं को प्रसन्न करने और पुराने अनुष्ठान को निभाने का तरीका समझा जाता है। लोग पत्थरों को जमीन से उठाकर एक लय में उछालते हैं। यह नजारा बहुत रोमांचक होता है चारों ओर जय-जयकार के नारे, ढोल की थाप और उत्साह से भरे चेहरे। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह युद्ध नियंत्रित होता है। स्थानीय प्रशासन, पुलिस और आयोजन समिति सुरक्षा का पूरा ध्यान रखती है। जब कोई प्रतिभागी घायल हो जाता है, तो तुरंत उसे बाहर निकालकर प्राथमिक उपचार दिया जाता है। परंपरा के अनुसार, अगर खून निकल आता है तो उसे शुभ संकेत माना जाता है, क्योंकि इसे देवता की कृपा का प्रतीक समझा जाता है। मेले में उमड़ती भीड़ और सांस्कृतिक रंग धामी पत्थर मेले में सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि देश-विदेश से पर्यटक भी बड़ी संख्या में आते हैं। हजारों की भीड़ इस अनोखे आयोजन को देखने पहुंचती है। महिलाओं के पारंपरिक वस्त्र, बच्चों की खिलखिलाहट, बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं की ऊर्जा सब मिलकर मेले को एक विचित्र रूप देते हैं। यहां विभिन्न हिमाचली लोकनृत्य और गीत भी प्रस्तुत किए जाते हैं। किन्नौरी नाटी, धामी धुन, और देव आराधना गीत माहौल को और भी पवित्र बना देते हैं। ग्रामीण हस्तशिल्प, खाने के स्टॉल, और पारंपरिक वस्त्रों की दुकानें मेले की शोभा बढ़ाती हैं। लोकल लोग कहते हैं कि धामी का पत्थर मेला केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि यह उनके सालभरकी भावनाओं और श्रद्धा का उत्सव है। क्या आज धामी की प्रासंगिकता कम हुई है? समय के साथ धामी पत्थर मेले में कई बदलाव आए हैं। पहले यह पत्थर युद्ध काफी तीव्र होता था और कई लोग घायल हो जाते थे, लेकिन अब प्रशासन और स्थानीय समिति ने इसे सुरक्षित और प्रतीकात्मक रूप दे दिया है। अब छोटे पत्थरों का उपयोग किया जाता है और लोगों को सुरक्षात्मक उपकरण भी दिए जाते हैं। सरकार और पर्यटन विभाग भी अब इस मेले को सांस्कृतिक विरासत के रूप में बढ़ावा दे रहे हैं। यह आयोजन अब “एथनिक फेस्टिवल” के रूप में पहचान बना रहा है। युवा पीढ़ी इसे अपनी परंपरा से जोड़कर देखती है और गर्व महसूस करती है कि उनके क्षेत्र की यह अनोखी परंपरा दुनिया में जानी जा रही है। आस्था, साहस और एकता का संदेश धामी का पत्थर मेला यह सिखाता है कि परंपराएं केवल रीति-रिवाज नहीं होतीं वे समाज की आत्मा होती हैं। इस मेले में पत्थर युद्ध भले ही एक संघर्ष जैसा लगे, लेकिन इसके पीछे एकता, श्रद्धा और साहस की गहरी भावना छिपी है। लोग अपने देवता “देवता घोड़ा नाथ जी” की आराधना करते हैं और मानते हैं कि यह आयोजन बुराइयों को दूर करके समाज में सद्भाव और न्याय लाता है। मेले के अंत में दोनों दल एक-दूसरे को गले लगाते हैं और एक साथ भोजन करते हैं यही इस उत्सव का असली संदेश है कि मतभेद के बाद भी मेल-मिलाप ही जीवन का सार है। धामी मेला हिमाचल की एक बेहद विचित्र प्रथा धामी का पत्थर मेला केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि यह हिमाचल की धड़कन है। इसमें लोगों का साहस, धार्मिक आस्था और सामुदायिक एकता झलकती है। यह मेला हमें याद दिलाता है कि भारत की विविधता में कितनी अनोखी कहानियां छिपी हैं जहां हर पर्व सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवन का पाठ पढ़ाता है। धामी का पत्थर मेला हर उस व्यक्ति के लिए एक अनुभव है जो भारत की जड़ों, लोक परंपराओं और लोगों की निष्ठा को समझना चाहता है। यह मेला सचमुच

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यमुना घाट पर आरती की बेला, आपका दिल जीतने के लिए काफी है!

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‘जगमगाती रौशनी, लहरों पर पड़ती इस रौशनी की परछाई और कानों में गूंजती हुई घण्टों की ध्वनि’ सोचिए ये सब कितना खूबसूरत लगता होगा? कितना मनोरम होता है वो दृश्य जब ब्रजभूमि में यमुना घाट पर आरती की बेला होती है। यकीनन ये किसी साहित्यिक रचना की याद दिला देता है। जैसे फिर पढ़ रहे हों देवदास को या कोई निर्मल कविता चित्त में फिर उमड़ पड़ती हो। घण्टों की ध्वनि और आध्यात्मिक चेतना एक तरफ किसी पुराने सिनेमा जैसी, एक प्रतिमा रूप में खड़ी परछाई का अक्स उस शीतल जल में दिखाई देता है और अगले ही क्षण घण्टों की ध्वनि, मेरे ध्यान को पूरी तरह अपनी तरफ खींच लेती है। एक ऐसा एहसास होता कि वो क्षण, वो पल जब मैं वहाँ हूँ तब मैं केवल वहीं हूँ। सब कुछ भूलकर केवल एक आध्यात्मिक चेतना ध्यान में होती है जो मेरे इर्द गिर्द एक कवच बन गयी हो। यहाँ पूरा घाट भीड़ से भरा होने के बावजूद एक शांति है जो बनी रहती है। हमारे मन में, चित्त की शांति। एक सामूहिक चेतना उमड़ती है जो विस्तार की कामना करती है और कुछ कहे बिना ही परिपूर्ण हो जाती है। विश्राम घाट की गाथा ये सब कुछ इसलिए क्योंकि यमुना के इस तट पर मथुरा का विश्राम घाट है। जहाँ अनेक श्रद्धालु आते हैं और यमुना आरती के मनोरम दृश्य का अनुभव करते हैं। इसे विश्राम घाट इसलिए कहा जाता है क्योंकि मान्यताओं के अनुसार यह वही स्थान है जहाँ श्री कृष्ण ने कंस का वध करने के बाद विश्राम किया था।(हमारे मन में, चित्त की शांति।) ब्रज भूमि में यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित यह विश्राम घाट शाम होते होते ऐसा दृश्य में ढ़ल जाता जिसमें श्रद्धालु अवश्य संलग्न होना चाहते हैं। यमुना नदी की पूजा के समय तो सारा वातावरण एक अलौकिक दिव्यता से परिपूर्ण होता नजर आता है। यमुना, जो सूर्य की पुत्री और यम की बहन मानी जाती हैं, उनकी आराधना करने के उद्देश्य से की जाने वाली ये आरती मन को मोहित कर देती है। दीपदान और भविष्य की मंगलकामना पहले भक्त व्यक्तिगत तौर पर पूजा करते हैं जिसे दीपदान कहा जाता है। इस प्रसंग में वे एक पुजारी के साथ मंत्रोच्चारण करते हुए यमुना जी में दीप दान करते हैं। ऐसा करते हुए वे अपने पिछले कर्मों के लिए क्षमा प्रार्थना करते हैं और भविष्य की मंगल कामना करते हुए दीप को यमुना के जल में प्रवाहित कर देते हैं। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से अपितु आध्यात्मिक दृष्टि से भी आपको एक सौम्य अनुभव प्रदान कर सकता है। यहाँ है मंदिरों की कतार यदि आप गोवर्धन की परिक्रमा करने जाते हैं या फिर मथुरा-वृंदावन जाते हैं तो आपको यमुना घाट का दौरा जरूर करना चाहिए। जहां आप बोटिंग भी कर सकते हैं और यमुना आरती की इस मंगल बेला में भी शामिल हो सकते हैं। यहाँ केवल यही नहीं बल्कि और भी कई मन्दिर हैं जिनमें सबसे प्रमुख है द्वारकाधीश मन्दिर जिसे देखने और दर्शन करने दूर दूर से श्रद्धालु यहाँ आते हैं। इससे थोड़ी ही दूरी पर श्री कृष्ण जन्मभूमि भी है। आसपास और भी मन्दिर हैं, बल्कि पूरे मथुरा में थोड़ी-थोड़ी दूर पर कई मन्दिर हैं। लीजिए बोटिंग का आनंद यहां आप बोटिंग का आनंद भी ले सकते हैं। यमुना घाट पर कई नावचालक सुबह से शाम तक बोटिंग करवाने के लिए उपलब्ध रहते हैं। बोटिंग के लिए सबसे अच्छा वक्त वह हो सकता है जब सूरज ढलने को होता है। क्योंकि इस वक्त आकाश का रंग देखने लायक होता है। बोट में बैठे हुए हल्के हाथों से यमुना के जल पर हाथ फेरना असीम सुख की अनुभूति देता है। जैसे ढलता सूरज अपने साथ हमारे सारे दुखों को लेकर ढल गया हो। चाट- पकौड़ी और पायल की झनकार यूपी के खानपान में एक अलग ही स्वाद होता है और यहाँ के बाजारों में भी। यहाँ बाजारों की एक अलग ही रंगत होती है। वैसी ही अनोखी रंगत है इसके पास मौजूद बाजार की जहाँ पायल ही पायल की दुकानें हैं। एक दुकानदार ने बताया कि देशभर में, यहीं से चांदी की पायलों का निर्यात होता है। एक बार जाओगे तो कभी नहीं भूलोगे आप यहाँ एक बार जायेंगे तो शायद वापस आने का दिल ही नहीं करेगा। दिल होगा कि बस यहीं बैठे रहें और आरती यूँ ही चलती रहे। मन शांत होता होगा। शाम ढल चुकी होगी और सारी नकारात्मकता भी। जब भी मौका मिले इस आरती में ज़रूर शामिल हों।

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“मध्यप्रदेश का दिवारी लोकगीत, नृत्य और पोशाकों में झूमता ग्रामीण कल्चर”

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दिवारी पर्व की झलक खुशियों का अद्भुत उत्सव मध्यप्रदेश का दिवारी नृत्य – भारत त्यौहारों की भूमि है और मध्यप्रदेश की मिट्टी तो खासतौर पर लोक परंपराओं से भरी हुई है। इन्हीं परंपराओं में एक अनोखा और मनमोहक पर्व है “दिवारी”, जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली के ठीक बाद आता है और मुख्य रूप से बुंदेलखंड, मालवा, निमाड़, बघेलखंड और महाकौशल के गांवों में धूमधाम से मनाया जाता है। दीवारी सिर्फ एक त्यौहार नहीं, बल्कि यह कृषक जीवन, लोककला, लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक परिधान का एक अद्भुत संगम है। इस त्यौहार का सबसे बड़ा आकर्षण है दिवारी गीत, दिवारी नृत्यऔर दिवारी पोशाक, जो गांवों के हर चौपाल में रौनक भर देते हैं। खेतों में फसल लहलहाती है, लोग एक-दूसरे को दीवारी की शुभकामनाएं देते हैं और गांव के गलियारों में ‘दीवारी आई रे…’ की गूंज सुनाई देती है।(इस नृत्य को स्थानीय भाषा में कई जगह “दीवारी डांस” या “गौरैया नाच” कहा जाता है।) दीवारी गीत मिट्टी की खुशबू से सजे सुर दीवारी के गीतों में ग्रामीण जीवन की सच्ची तस्वीर झलकती है। इन गीतों को गाते समय किसी बड़े मंच या वाद्ययंत्र की जरूरत नहीं होती बल्कि यह गीत खेतों, चौपालों और मंदिरों में लोक वाद्यों जैसे ढोलक, मंजीरा, नगाड़ा और थाली की ताल पर गाए जाते हैं। इन गीतों के बोल बेहद सरल होते हैं, लेकिन इनमें आस्था, प्रेम,परिश्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की गहराई छिपी होती है। महिलाएं और पुरुष दोनों मिलकर ये गीत गाते हैं, जिनमें भगवान कृष्ण, बलराम, राम और स्थानीय देवी-देवताओं की स्तुति की जाती है। कुछ गीतों में कृषक जीवन की झलक होती है, तो कुछ में पशुधन की महत्ता को दर्शाया जाता है। एक लोकप्रिय दिवारी गीत कुछ इस प्रकार है “दीवारी आई रे, गौरा गइया सजाई रे, गोवर्धन धर्यो नंदलाल, धन्य भई अइंया री दीवारी रे…” इन गीतों में गांव की एकता, प्रेम और सहयोग की भावना झलकती है। हर सुर में मानो धरती की लय, हल की गूंज और बैलों की चाल बस जाती है। दीवारी नृत्य ऊर्जा और उल्लास का अद्भुत संगम यह दिवारी का सबसे मनोरम दृश्य होता है इसका नृत्य, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग इकट्ठा होते हैं। यह नृत्य मुख्यत पुरुषों द्वारा किया जाता है, और इसमें ढाल, तलवार और लकड़ी की छड़ी का प्रयोग किया जाता है। इस नृत्य को स्थानीय भाषा में कई जगह “दीवारी डांस” या “गौरैया नाच” कहा जाता है। नर्तक सिर पर रंग-बिरंगी पगड़ियां बांधते हैं और सफेद धोती-कुर्ता पहनकर समूह में गोलाकार होकर नाचते हैं। उनके कदमों की थाप ढोलक की लय के साथ तालमेल बिठाती है। दीवारी नृत्य में वीरता, उत्साह और पारंपरिक अनुशासन झलकता है। एक दूसरे के डंडे से डंडा पीटा जाता है और इस तरह एक ले में की देखते ही रहो ।यह नृत्य उस समय की याद दिलाता है जब गांवों में युद्धक प्रशिक्षण के रूप में भी ऐसे नृत्य किए जाते थे। इस नृत्य में समूह एक साथ चलकर ढाल और तलवारटकराते हुए ताल बनाते हैं, जिससे पूरा वातावरण झंकार से भर जाता है। कभी-कभी इसमें ढाल नृत्य, भाला नृत्य और दांडी नृत्य जैसी शैलियां भी सम्मिलित की जाती हैं। दिवारी पारंपरिक पोशाक और रंगों का त्यौहार मध्यप्रदेश की दीवारी सिर्फ संगीत और नृत्य तक सीमित नहीं है; बल्कि इसमें पहने जाने वाले पारंपरिक वस्त्र और आभूषण भी इस पर्व को विशेष बनाते हैं। पुरुषों के पहनावे में सफेद धोती, अंगरखा, लाल या केसरिया पगड़ी, और कमर में कच्चापटका शामिल होता है। कुछ जगहों पर वे कमर में घंटियाँ भी बांधते हैं ताकि नृत्य के दौरान मधुर ध्वनि गूंजे। महिलाएं इस अवसर पर लाल, हरे, पीले रंग की चिरई या लुगड़ा पहनती हैं, और अपने सिर को ओढ़नी से ढकती हैं। हाथों में चूड़ियां, पैरों में पायल, माथे पर बिंदी और गले में पारंपरिक हार उनकी सुंदरता को और बढ़ा देते हैं। इन पोशाकों के रंग ग्रामीण जीवन की सादगी के साथ-साथ प्रकृति के रंगों से मेल खाते हैं। यही वजह है कि दीवारी का हर दृश्य मानो एक जीवंत पेंटिंग बन जाता है। दिवारी का सांस्कृतिक महत्व क्या है? दीवारी का सबसे बड़ा संदेश है परिश्रम, सहयोग और कृतज्ञता। किसान जब अपनी फसल काट लेता है और गोवंश की सेवा करता है, तो वह यह पर्व मनाकर भगवान का धन्यवाद करता है। यह त्यौहार ग्रामीण समाज में एकता और भाईचारे को मजबूत करता है। दिवारी गीत और नृत्य, केवल मनोरंजन के साधन नहीं बल्कि यह लोक संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। इनसे नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों की परंपरा औरजीवन दर्शन का ज्ञान मिलता है। मध्यप्रदेश के कई जिलों जैसे सागर, दमोह,छतरपुर, टीकमगढ़, रीवा, सतना और खंडवा में दिवारी आज भी पूरे हर्षोल्लास से मनाई जाती है। यह पर्व लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ता है, और ग्रामीण संस्कृति को जीवित रखता है। दीवारी में लोक वाद्यों की भूमिका दिवारी गीत और नृत्य को जीवंत बनाने में लोक वाद्य यंत्रों की अहम भूमिका होती है। इनमें मुख्य रूप से ढोलक, नगाड़ा, मंजीरा, थाली, ढपली, बांसुरी और बीन का प्रयोग किया जाता है। ढोलक की थाप पर नर्तक अपने कदम मिलाते हैं, मंजीरे की झंकार लय बनाती है, और नगाड़े की गूंज पूरे गांव में उत्सव का माहौल पैदा करती है। मुख्य रूप से इस नृत्य में लठठ यानी बांस के डंडों का उपयोग किया जाता है। वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकार कोई पेशेवर नहीं होते, बल्कि गांव के ही किसान,चरवाहे या कारीगर होते हैं। यही इस कला की सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें हर कोई कलाकार बन जाता है। आधुनिक समय में दिवारी की पहचान और संरक्षण आज जब आधुनिकता और शहरों की भागदौड़ ने लोक परंपराओं को धीरे-धीरे पीछे धकेल दिया है, ऐसे में दीवारी जैसा पर्व हमारी लोक धरोहर का जीवंत प्रमाण है।राज्य सरकार और स्थानीय सांस्कृतिक संगठन अब इस पर्व को बढ़ावा देने के लिए लोक उत्सवों और मेलों का आयोजन करते हैं, ताकि नई पीढ़ी इसकी सुंदरता और महत्व को समझ सके। टीवी चैनल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी दिवारी नृत्य और गीतों के वीडियो लाखों लोग देखते हैं, जिससे इसकी लोकप्रियता बढ़ रहीहै। युवा कलाकार अब इसे अपने फ्यूजन म्यूजिक और फोक डांस

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इन 6 देशों में भारतीय रुपया दिखाता है रईसी का जलवा, रुपया बढ़ाता है रुतबा और बचाता है खर्चा!

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भारतीय रुपया के साथ भारतीय इन 6 देशों में जाकर बन जाते हैं अमीर! आज इस नई पेशकश में जानिए कहां बरसता है रुपया! दरअसल, त्यौहारों पर लोग सोना-चांदी, बर्तन और नई वस्तुएं खरीदना पसंद करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ देश ऐसे भी हैं जहां भारतीय रुपया मूल्य इतना अधिक है कि कोई भी भारतीय वहां जाकर खुद को “रईस” महसूस करता है? आज हम जानेंगे भारत के रुपया वाले देश यानी ऐसे 6 देश जहां रुपये की कीमत विदेश में ज़्यादा है और भारतीयों के लिए वहां घूमना बेहद सस्ता पड़ता है। वियतनाम जहां भारतीय मुद्रा बन जाती है लाखों में दक्षिण-पूर्व एशिया का सुंदर देश वियतनाम अपने पहाड़ों, प्राचीन मंदिरों और स्वादिष्ट भोजन के लिए प्रसिद्ध है। यहां की मुद्रा है वियतनामी डोंग। 1 भारतीय रुपया लगभग 300 वियतनामी डोंग होता है! यानी कि अगर आपके पास सिर्फ ₹10,000 हैं तो आप वहां लगभग 30 लाख डोंग लेकर जा सकते हैं। इसीलिए वियतनाम को भारत के लिए सस्ते देश की श्रेणी में रखा जाता है। यहां वियतनाम में भारतीय मुद्रा की ताकत देखनी हो तो बस किसी बाजार में जाइए, आपके ₹500 में ही वहां एक दिन का शानदार खाना और होटल दोनों मिल जाएंगे। किसी भी मौके पर अगर आप किसी देश में अमीर बनने का अनुभव लेना चाहते हैं, तो वियतनाम जरूर जाएं।(1 भारतीय रुपया लगभग 300 वियतनामी डोंग होता है!) इंडोनेशिया यहां रुपया से बन जाते हैं मिलियनेयर इंडोनेशिया में रुपया का जलवा कम नहीं है। यहां की मुद्रा है इंडोनेशियाई रुपया और 1 भारतीय रुपया लगभग 190 इंडोनेशियाई रुपया के बराबर होता है। इसका मतलब यह हुआ कि ₹5000 के भारतीय रुपये वहां लगभग 9.5 लाख रुपया बन जाते हैं। इतनी बड़ी राशि से वहां आप शानदार बीच रिज़ॉर्ट में ठहर सकते हैं, पारंपरिक खाना खा सकते हैं और भी अनाद और सेवाएं ले सकते हैं। इंडोनेशिया को एशिया सस्तेट्रैवल देश में गिना जाता है। बाली जैसे टूरिस्ट स्थानों पर भारतीय पर्यटक आसानी से घूम सकते हैं और उन्हें हर जगह “अमीर पर्यटक” की तरह सम्मान भी मिलता है। यात्रा के लिए इंडोनेशिया एक स्वर्ग समान गंतव्य है, जहां भारतीय रुपया मजबूत है, और यहां इसका असली उदाहरण देखने को मिलता है। कंबोडिया छोटे खर्च में रॉयल लाइफ जीने का मौका कंबोडिया में आपको इतिहास और शांति दोनों मिलते हैं। यहां की मुद्रा है कंबोडियन रियल। यहां 1 भारतीय रुपया लगभग 50 रियल के बराबर होता है। यहां जीवन-यापन का खर्च बहुत कम है। आप ₹20,000 में यहां लग्जरी होटल में रह सकते हैं, ऐतिहासिक अंगकोरवाट मंदिर घूम सकते हैं और स्वादिष्ट स्ट्रीट फूड का मज़ा ले सकते हैं। कंबोडिया उन विदेश यात्रा सस्ते देश में से एक है, जहां भारतीय रुपया राजा बन जाता है। अगर आप सोच रहे हैं कि भारतीय मुद्रा कहां चलती है और कहाँ आप अमीर महसूस कर सकते हैं, तो कंबोडिया आपका जवाब है। श्रीलंका पड़ोसी देश में रुपया का रुतबा भारत का नज़दीकी पड़ोसी देश श्रीलंका अपनी प्राकृतिक सुंदरता, मंदिरों और बीच के लिए प्रसिद्ध है। यहां की मुद्रा है श्रीलंकाई रुपया। 1 भारतीय रुपया लगभग 4 श्रीलंकाई रुपये के बराबर होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि ₹25,000 भारत में जो खर्च है, वही रकम श्रीलंका में आपको 1 लाख श्रीलंकाई रुपये देती है। श्रीलंका में रुपये की वैल्यू इतनी अच्छी है कि आप लग्जरी रिज़ॉर्ट में रुक सकते हैं, तटीय भोजन का आनंद ले सकते हैं और शॉपिंग भी जमकर कर सकते हैं। यात्रा के लिए श्रीलंका एक आध्यात्मिक और सस्ता अनुभव दोनों देता है। यहां भारतीय पर्यटकों के लिए मंदिरों और त्यौहारों में भाग लेना किसी आशीर्वाद से कम नहीं लगता। नेपाल जहां भारतीय रुपया का जलवा आपको हैरान कर दे अगर आप पूछें कि भारतीय मुद्रा कहां चलती है, तो पहला नाम आता है नेपाल।यह भारत का सबसे करीबी दोस्ताना देश है और यहां की मुद्रा है नेपाली रुपया। 1 भारतीय रुपया लगभग 1.6 नेपाली रुपये के बराबर है। यहां भारतीय रुपये सीधे चल जाते हैं कई दुकानदार भारतीय मुद्रा को बिना एक्सचेंज के स्वीकार करते हैं। नेपाल रुपया तुलना में भारतीय रुपया थोड़ा मजबूत है, इसलिए यहां घूमना बहुत सस्ता पड़ता है। काठमांडू, पोखरा, लुंबिनी जैसे शहर भारतीय यात्रियों के लिए बेहद लोकप्रिय हैं। भारत से सस्ते देश घूमने वालों की सूची में नेपाल शीर्ष पर आता है क्योंकि यहां धार्मिकता, प्राकृतिक सौंदर्य और सस्तापन तीनों एक साथ मिलते हैं। पाराग्वे दक्षिण अमेरिका में रुपये की खूबी अब ज़रा दक्षिण अमेरिका की ओर चलते हैं। पाराग्वे एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत देश है जहां की मुद्रा है गुआरानी। जहां 1 भारतीय रुपया लगभग 89 गुआरानी के बराबर है। यहां रुपया एक्सचेंज रेट इतना अनुकूल है कि ₹15,000 लेकर जाने वाला कोई भी भारतीय आराम से एक सप्ताह शानदार गुजार सकता है। सस्ते होटल, स्वादिष्ट खाना और लोक संस्कृति का अनुभव यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। यह उन अमीर देश भारत से सस्ते देशों में से एक है, जहां भारतीय अपने रुपये से कई गुना अधिक चीजें खरीद सकते हैं। यहां का वातावरण शांति से भरा है और लोगों का व्यवहार बेहद मिलनसार। क्यों इन देशों में भारतीय रुपया इतना मजबूत है? अब सवाल उठता है कि आखिर भारतीय रुपया कहां मजबूत है और क्यों? असल में इन देशों की अर्थव्यवस्था भारत की तुलना में छोटी और अस्थिर है। भारत की GDP बड़ी है, विदेशी निवेश अधिक है और मुद्रा अपेक्षाकृत स्थिर है। इन देशों में रुपया एक्सचेंज रेट भारत के पक्ष में जाता है क्योंकि  मुद्रास्फीति (Inflation) ज्यादा है, विदेशी व्यापार सीमित है और मुद्रा का मूल्य नियंत्रित नहीं रहता। इस वजह से जब भारतीय रुपये का मूल्य वहां की मुद्रा से तुलना करते हैं, तो रुपया कहीं अधिक शक्तिशाली निकलता है। यही कारण है कि वियतनाम, इंडोनेशिया, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल और पाराग्वे जैसे देश भारत के रुपया वाले देश कहलाते हैं, जहां भारतीय मुद्रा का रुतबा आसमान छूता है। स्पेशल यात्रा, जहां आप खूब मस्ती कर सकते हैं।   कई युवा सर्दियों की शुरुआत में ही विदेश यात्रा सस्ते देश की योजना बनाते हैं, ताकि वे कुछ नया मजा और रोमांच का अनुभव ले सकें। अगर आप भी इस मौके  पर विदेश जाने का सोच रहे

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त्यौहारों और आभूषणों का एक अद्भुत रिश्ता, आभूषणों के बगैर क्यों लगते हैं त्यौहार फीके?

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ज्वेलरी-भारत में त्यौहार केवल खुशियों का अवसर नहीं होते, बल्कि ये अपने आप में संस्कृति, परंपरा और सौंदर्य का उत्सव भी होते हैं। जब भी कोई बड़ा त्यौहार आता है चाहे वह दिवाली हो, नवरात्रि, करवा चौथ या ईद लोग अपने पहनावे, सजावट और आभूषणों में नई चमक भर देते हैं। ज्वेलरी यानी गहनों का त्यौहारों से एक गहरा रिश्ता है। यह न सिर्फ हमारी सुंदरता को निखारती है, बल्कि हर गहना एक भावना, एक परंपरा और एक गाथा भी कहता है। त्यौहार और ज्वेलरी का गहरा संबंध भारत में त्यौहारों की शुरुआत धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता से जुड़ी है। हर त्यौहार का अपना एक रंग, एक माहौल और एक पारंपरिक पहनावा होता है। इन्हीं के साथ गहनों का प्रयोग हमारी संस्कृति में हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। सोना, चांदी, मोती या हीरे हर धातु का अपना महत्व है। उदाहरण के लिए, दिवाली पर लोग सोना खरीदना शुभ मानते हैं क्योंकि यह लक्ष्मी जी का प्रतीक है। वहीं नवरात्रि में महिलाएं रंग-बिरंगे आभूषण पहनती हैं, जो उनके देवी स्वरूप का उत्सव मनाते हैं। इस तरह ज्वेलरी त्यौहारों में सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में शामिल है।(भारत में त्यौहार केवल खुशियों का अवसर नहीं होते, बल्कि ये अपने आप में संस्कृति, परंपरा और सौंदर्य का उत्सव भी होते हैं।) पारंपरिक आभूषणों की चमक आज भी कायम है समय भले ही आधुनिक हो गया हो, लेकिन पारंपरिक ज्वेलरी का आकर्षण आज भी उतना ही है। चाहे दक्षिण भारत की कुंदन ज्वेलरी हो, राजस्थान की पोल्की डिजाइन, गुजरात की मेनाक्षी वर्क ज्वेलरी या बंगाल की गोल्ड फिलिग्री कला हर क्षेत्र की अपनी पहचान है। त्यौहारों पर महिलाएं इन पारंपरिक गहनों को पहनकर न सिर्फ अपने लुक को खास बनाती हैं, बल्कि अपनी जड़ों से भी जुड़ी रहती हैं। पारंपरिक हार, झुमके, पायल, चूड़ियां और मांगटीका जैसे आभूषण हर त्यौहार के लुक को संपूर्ण बनाते हैं। ये गहने पीढ़ियों से पीढ़ियों तक सौंदर्य और परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। आधुनिक ज्वेलरी ट्रेंड्स परंपरा में आधुनिकता का मेल आज के दौर में ज्वेलरी डिज़ाइनों में आधुनिकता का असर साफ दिखता है। अब महिलाएं केवल भारी भरकम सोने के गहनों तक सीमित नहीं रहीं। मिनिमलिस्ट डिज़ाइन, रोज़गोल्ड, ऑक्सीडाइज्ड सिल्वर और फ्यूज़न ज्वेलरी का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। त्यौहारों में लोग अब अपनी पोशाक के अनुसार हल्के लेकिन आकर्षक गहने पहनना पसंद करते हैं। युवा पीढ़ी डायमंड या स्टोन बेस्ड ज्वेलरी को फैशन स्टेटमेंट के रूप में देखती है। पारंपरिक और आधुनिक डिज़ाइनों का यह मेल त्यौहारों को और भी स्टाइलिश बना देता है। त्यौहारों में ज्वेलरी खरीदने का शुभ महत्व भारत में यह माना जाता है कि त्यौहारों पर ज्वेलरी खरीदना बेहद शुभ होता है। खासकर धनतेरस, अक्षय तृतीया और दीवाली जैसे अवसरों पर सोना या चांदी खरीदना मां लक्ष्मी की कृपा का प्रतीक माना जाता है। लोग इन दिनों नई ज्वेलरी खरीदकर घर में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। आजकल ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म और ब्रांड्स इस मौके पर खास ऑफर, कलेक्शन और डिस्काउंट्स लेकर आते हैं, जिससे लोगों की खरीददारी और भी आसान हो जाती है। ज्वेलरी की यह परंपरा केवल धन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है। उपहार के रूप में ज्वेलरी एक तरह से प्यार का प्रतीक त्यौहारों में उपहार देना एक खूबसूरत परंपरा है। जब हम किसी को गहना उपहार में देते हैं, तो यह केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि हमारी भावना और अपनापन दर्शाता है। आजकल पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन और दोस्त भी त्यौहारों में एक-दूसरे को ज्वेलरी गिफ्ट करते हैं। यह उपहार रिश्तों में मजबूती लाता है। उदाहरण के लिए, रक्षाबंधन पर भाई बहन को सोने की चेन या झुमके देते हैं, जबकि करवा चौथ पर पति अपनी पत्नी को मंगलसूत्र या डायमंड रिंग गिफ्ट करता है। इस तरह त्यौहारों पर ज्वेलरी सिर्फ सुंदरता नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन जाती है। ज्वेलरी का चयन हर त्यौहार के लिए खास अंदाज़ हर त्यौहार की अपनी एक खास थीम होती है और उसी के अनुसार ज्वेलरी का चयन भी किया जाता है। नवरात्रि में रंग-बिरंगी ऑक्सीडाइज्ड ज्वेलरी का ट्रेंड छाया रहता है, जबकि दिवाली पर गोल्ड और डायमंड का जलवा देखने को मिलता है। ईद पर महिलाएं ज़रीदार कपड़ों के साथ गोल्ड इयररिंग्स और झुमर पहनती हैं। वहीं क्रिसमस जैसे त्यौहारों में सिल्वर या रोज़गोल्ड ज्वेलरी का चलन है। आज के समय में महिलाएं आउटफिट और ज्वेलरी को मैच करके अपना लुक तैयार करती हैं, जिससे त्यौहारों का जादू और भी बढ़ जाता है। पर्यावरण और बजट फ्रेंडली ज्वेलरी की ओर रुझान हाल के वर्षों में लोगों की सोच में बदलाव आया है। अब लोग इको-फ्रेंडली और बजट फ्रेंडली ज्वेलरी की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं। कृत्रिम या imitation ज्वेलरी का चलन तेजी से बढ़ रहा है, जो देखने में असली जैसी लगती है, पर किफायती होती है। इन ज्वेलरी में मेटल, बीड्स, लकड़ी, और फैब्रिक का प्रयोग किया जाता है। इससे न केवल खर्च कम होता है, बल्कि पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचता। आजकल कई ब्रांड्स recycled materials से ज्वेलरी बना रहे हैं, जो फैशनेबल और टिकाऊ दोनों होती हैं। त्यौहारों में इस तरह की ज्वेलरी पहनना एक नया ट्रेंड बन गया है, जो जागरूकता और स्टाइल दोनों का मेल है। त्यौहार की रौनक में ज्वेलरी की चमक जरूरी है त्यौहार हमारे जीवन की खुशियों को और उज्जवल बना देते हैं। इन उत्सवों में ज्वेलरी सिर्फ सजावट का साधन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, पहचान और परंपरा का प्रतीक है। चाहे वह दादी की पुरानी चूड़ियां हों या नई डिजाइन की डायमंड रिंग हर गहना एक कहानी कहता है। समय के साथ ज्वेलरी का रूप बदला है, पर उसकी अहमियत नहीं। यह आज भी हर त्यौहारों को खास बनाने की सबसे सुंदर कला है।

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सागर जिले के गौरीदंत में कई रहस्यमई गाथाएं एवं अद्भुत प्राकृतिक रहस्यों का समागम देखने का रोमांच

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गौरीदंत का परिचय गौरीदंत विविध धर्मों के अनुयायियों के साथ-साथ प्रकृति की गोद में अद्भुत रहस्यों को अपने में संरक्षित किए हुए है। हिंदूओं के मतानुसार यहां की ऐसी मान्यता है कि जब मां पार्वती सती हुई थीं, तो भगवान शिव शंकर दुख में डूब कर मां पार्वती के पार्थिव शरीर को लेकर घूम रहे थे। तभी कृष्ण जी ने सोचा कि भगवान शिव का इस प्रकार दुख में डूबा रहना, सृष्टि के लिए उचित नहीं है। तब उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र चलाया और मां पार्वती का शव नष्ट हुआ तो उनका एक दांत इस स्थल पर जा गिरा। जिसकी बजह से इस जगह का नाम गौरीदंत पड़ा। गौरीदंत का इतिहास गोरी दंत का इतिहास बहुत ही पुराना है। यहां पर सभी धर्मों के साक्ष्य देखने को मिलते हैं। ऐसा माना जाता है की अंग्रेजों के शासनकाल में गौरीदन्त में मिलिट्री कैंप लगाया जाता था। पुराने जमाने में उनको प्रशिक्षण देने के लिए लगाए जाने वाले यह कैंप आज बहुत ही रोचक दृश्यों का गढ़ है। साथ ही एक ऐसी भी किवदंती है कि यहां पर मार्कंडेय ऋषि ने तपस्या की थी। गौरीदन्त  में आपको बौद्ध दर्शन से संबंधित स्तूप एवं पाली लिपि में बौद्ध धर्म की शिक्षा से संबंधित अनेक चीजें पत्थर पर गढ़ी मिलेंगीं। साथ ही एक बड़े से पत्थर पर पुराने समय के लोगों ने भारत का नक्शा एक बड़े से पत्थर पर बहुत ही आकर्षक तरीके से बनाया हुआ है। उस नक्शे में भारत से लगने वाले देशों की सीमा और यह तक दर्शाया गया है की कौन सी नदी कहां से गुजरती है। यह सब इसमें देखा जा सकता है। भारत चिन्ह भी इस नक्शे के एक बगल में बनाया गया है। जिसमें तीन शेर दिखाई पढ़ते हैं। गौरीदन्त की सबसे ऊंची पहाड़ी पर पहुंचने पर मां पार्वती के मंदिर से लगभग 30 से 35 फुट की दूरी पर रतिनाथ जी का मंदिर भी स्थापित है। यहां पर आपको एक अद्भुत नजारा देखने को मिलता है क्योंकि आपके लिए शहर के शोर शराबे से दूर एकांत माहौल एवं अलौकिक चीजें देखने को मिलतीं हैं।(भारत का नक्शा एक बड़े से पत्थर पर बहुत ही आकर्षक तरीके से उत्पन्न किया हुआ है।) मेरा स्वयं का अनुभव ऊपर वर्णित किए गए लेखन से शायद आपको समझ में आ गया होगा की, गौरीदन्त का इतिहास जितना अधिक पुराना है, उससे अधिक रोचक भी है। यह एक ऐसा नाम है जहां पर आप अपने जीवन के अनुभव में एक बहुत ही अच्छा अध्याय जोड़ सकते हैं। यहां की स्थिति में कई अद्भुत दृश्य एवं नजारे संरक्षित हैं। जो की एक पर्यटक को आकर्षित करते हैं। यहां का एकांत वातावरण लोगों को बहुत ही पसंद आता है। स्थानीय लोग गौरीदन्त के बारे में यह भी बताते हैं कि यहां गुफा में महावीर जी की प्रतिमा स्थापित है। जिसके दर्शन के लिए आपको साहस की जरूरत पड़ती है क्योंकि कई लोग गुफा तक नहीं पहुंच पाते हैं! महावीर जी की प्रतिमा के बाद एक और लोहे की सकरी गुफा में जाने का रास्ता दिखाई देता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां इसके अंदर जो भी गया है, वह कभी भी लौट के वापस नहीं आ सका। इस दर्शनीय स्थल में वैसे तो सभी जगह बहुत ही देखने योग्य हैं लेकिन मेरा जो स्वयं का अनुभव है, वह सबसे अच्छा हवा महल है क्योंकि जब आप एक लंबी पहाड़ी की चढ़ाई चढ़ते हैं तो बहुत थकान हो जाती है। इस थकान को दूर करने के लिए आप हवा महल तक पहुंच कर अच्छे से अपनी थकान को दूर कर सकते हैं। यह हवा महल दो पहाड़ियों से कटकर या कहें कि अलग होकर प्रकृति की गोद में निर्मित हुआ है। यहां पर कई लोग अपना फोटो भी शूट करवाते हैं। जो की इस जगह की खास बात है। मेरे सहयोगियों का योगदान इस जगह पर पहुंचने के लिए आप कभी भी अकेले जाने का साहस न करें क्योंकि एक तो यह गांव से दूर एकांत में स्थित है। साथ में ही एक प्रकार की पहाड़ी पर स्थित है। यहां पर जाने के लिए आप दो-तीन लोगों के ग्रुप के साथ यहां का लुत्फ उठा सकते हैं। साथ ही पहाड़ी चढ़ने से पहले खाने-पीने की सामग्री इकट्ठी कर लें क्योंकि यहां पर आपके लिए कोई भी दुकान नहीं है। न ही पहाड़ी के ऊपर पानी की व्यवस्था उपलब्ध है। यह दर्शनीय स्थल मेरे सहयोगी साथी रहे प्रदीप कुमार पुरी एवं प्रखर वर्मा के द्वारा सुझाया गया था। जिसे मैं अपने जीवन में एक अनोखा अध्याय इस यात्रा के द्वारा जोड़ सका। गौरीदन्त ने अनेक प्रकार के इतिहास को अपने आप में संरक्षित तो किया ही है, साथ ही यह प्रकृति की गोद में एक अद्वितीय एवं दर्शनीय स्थल का केंद्र है। यहां का वातावरण आपको सांसारिक दुनिया से बहुत दूर ले जाता है। गौरीदंत पहुंचने का रास्ता मध्यप्रदेश के सागर शहर से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर गौरीदंत पहुंचने के लिए आपको रास्तों के भटकाव का कई बार सामना करना पड़ सकता है। साथी ही दुर्गम रास्तों का! क्योंकि जब हम हवाई पट्टी ढाना से निकलते हैं, तो वहां की गांव देहात की संकरी-संकरी गलियां पर्यटक को भटका देती है। लेकिन आपको इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि स्थानीय लोगों के द्वारा आपके लिए गौरीदंत के रास्ते एवं दिशा एवं मार्गदर्शन का बोध करा दिया जाता है। फिर आप गौरीदंत पहुंचकर, अपने वाहन को पहाड़ी के नीचे रखें। फिर आपको 35 से 40 मिनट की पहाड़ी चढ़नी पड़ती है, पहाड़ी चढ़ते ही शुरुआत में आपको एक बड़े से पत्थर पर मयूर राष्ट्रीय पक्षी को संरक्षित करने का लोगों को संदेश दिया गया है। साथ ही पत्थर पर उसकी विशेषताएं और प्रकृति के लिए यह कितने लाभकारी हैं यह सब बताया गया है। लेखक – गजेन्द्र अहिरवार ( शिक्षा शास्त्र व्याख्याता)

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दिवाली के 7 सबसे रोचक और अनसुने तथ्य: पौराणिक कथाओं से लेकर ग्लोबल फेस्टिवल तक, वह सब जो आप नहीं जानते!

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दीपावली, भारत का सबसे बड़ा और सबसे खास त्योहार है, जो बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश, और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। जब भी दिवाली की बात होती है, तो भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटने और माता लक्ष्मी के पूजन की कहानी सबसे पहले याद आती है।(दिवाली के 7 सबसे रोचक और अनसुने तथ्य) लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह त्योहार सिर्फ हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं है? फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल का यह ब्लॉग आपको दिवाली से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने और रोचक तथ्यों (Interesting Facts) से रूबरू कराएगा जो इस त्योहार को बेहद खास बनाते हैं… 1. जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण दिवस: भगवान महावीर का निर्वाणोत्सव दिवाली का पर्व जैन धर्म के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जहां इसे ‘महावीर स्वामी निर्वाणोत्सव’ या ‘वीर निर्वाण दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन, कार्तिक अमावस्या को, जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर, भगवान महावीर को पावापुरी में मोक्ष (निर्वाण या अंतिम मुक्ति) की प्राप्ति हुई थी। जैन मान्यताओं के अनुसार, महावीर के ज्ञान की ज्योति बुझने के बाद, 16 गण-राजाओं, 9 मल्ल और 9 लिच्छवी राजाओं ने “ज्ञान की ज्योति जाने पर, हम द्रव्य की ज्योति करेंगे” (गये से भवुज्जोये, दव्वुज्जोयं करिस्समो) कहते हुए दीये जलाए थे। दिवाली की अगली सुबह, जैन मंदिरों में भगवान महावीर को प्रार्थना करने के बाद निर्वाण लड्डू चढ़ाया जाता है। खास बात यह कि अहिंसा (non-violence) के सिद्धांत के कारण, जैन समुदाय दिवाली पर आतिशबाजी से परहेज करता है क्योंकि इससे जीवित जीवों को नुकसान पहुँच सकता है। 2. बंदी छोड़ दिवस: सिखों की आस्था का प्रकाश पर्व सिख धर्म में दिवाली को बंदी छोड़ दिवस के रूप में भी जाना जाता है। 1619 में कार्तिक अमावस्या के दिन, सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद सिंह जी, को कई हिंदू राजाओं के साथ मुगल शासक जहांगीर की कैद से ग्वालियर के किले से रिहा किया गया था। गुरु की रिहाई की खुशी में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर (Golden Temple) को दीपों और आतिशबाजी से जगमगाया गया था। इसके अलावा, अमृतसर के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास भी दीपावली के दिन ही हुआ था। 3. ‘दीपालिकया‘ (Dipalikaya) – दिवाली का प्राचीनतम उल्लेख ‘दिवाली’ शब्द संस्कृत के ‘दीप’ और ‘आवली’ (पंक्ति) से बना है। लेकिन इसका एक प्राचीनतम उल्लेख भी मिलता है: दिवाली का सबसे पुराना संदर्भ दालिकया (Dipalikaya) नामक शब्द में मिलता है, जो आचार्य जिनसेन द्वारा रचित हरिवंश पुराण में वर्णित है। दालिकया का मोटा-मोटा अनुवाद “शरीर से प्रकाश का जाना” या “दीपों का शानदार प्रकाश” होता है। 7वीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागानंद में राजा हर्ष ने इस त्योहार को दीपप्रतिपादुत्सव: कहा है। 4वीं शताब्दी ईसा पूर्व में रचित कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी कार्तिक अमावस्या को मंदिरों और घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाने का उल्लेख है। 4. दिवाली को क्यों माना जाता है ‘नया साल‘? दिवाली को सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि नए साल के आरंभ के रूप में भी मनाया जाता है। हिंदू धर्म के व्यापारी वर्ग इसे नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत मानते हुए नए बही-खाते खोलते हैं। यह परंपरा चौथी शताब्दी ईस्वी में गुप्त साम्राज्य के समय से मानी जाती है। जैन व्यापारी भी पारंपरिक रूप से दिवाली से अपना लेखा वर्ष (Accounting Year) शुरू करते हैं। दिवाली के अगले दिन प्रतिपदा से जैन कैलेंडर, जिसे वीर निर्वाण संवत् कहते हैं, शुरू होता है। एक अन्य रोचक तथ्य यह है कि सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक भी दीपावली के दिन ही हुआ था। 5. पहली दिवाली का दिव्य दृश्य: 1 करोड़ दीपों का अनुमान जब भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे, तो वह दिन अमावस्या का था। इसी अंधकार को मिटाने के लिए पूरी नगरी को दीपों से जगमगाया गया था। पौराणिक आख्यानों और इतिहासकारों के अनुसार, अयोध्या में उस रात लगभग 1 करोड़ से अधिक दीपक जलाए गए थे। यह संख्या प्रतीकात्मक है, लेकिन पुराणों में अनगिनत दीयों का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि सरयू नदी के घाटों पर इतने लाखों दीप जलाए गए थे कि नदी का पानी भी सुनहरी रोशनी से चमक उठा था। और इस साल 2025 में अयोध्या में एक साथ दो वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाये गए जिसमें पहला ये कि सरयू नदी पर 9वें दीपोत्सव के दौरान 26 लाख 17 हज़ार 215 दिए जलाए गए. और दूसरा 2128 बटुकों ने एक साथ माँ सरयू की आरती कर नया विश्व कीर्तिमान बनाया. दोनों रिकॉर्ड गिनीज बुक में दर्ज किये गए. 6. विदेश में भी जलती है दिवाली की ज्योति दिवाली सिर्फ भारत का त्योहार नहीं है, बल्कि इसकी रोशनी वैश्विक स्तर पर फैल चुकी है। भारत के अलावा, यह त्योहार इंडोनेशिया, मलेशिया, फिजी, कनाडा और मॉरीशस जैसे देशों में भी मनाया जाता है। मॉरीशस, फिजी, और त्रिनिदाद में तो इसे राष्ट्रीय त्यौहार का दर्जा प्राप्त है। यूनाइटेड किंगडम (UK) का शहर लीसेस्टर (Leicester) भारत के बाहर सबसे बड़े दिवाली समारोहों में से एक की मेजबानी करता है। नेपाल में इसे तिहार के नाम से जाना जाता है, जहां कौए, कुत्ते, और गाय की पूजा बड़े पारंपरिक तरीके से की जाती है। 7. अलग-अलग राज्यों में दिवाली के अलग रंग हालांकि राम की वापसी और लक्ष्मी पूजन मुख्य हैं, भारत के विभिन्न हिस्सों में दिवाली का महत्व और उत्सव मनाने का तरीका एकदम अलग है। पश्चिम बंगाल: अधिकांश राज्य माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात बुराई को नष्ट करने वाली काली मां की भव्य पूजा की जाती है। दक्षिण भारत: यहां दिवाली मुख्य रूप से भगवान कृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर का वध करने की जीत के रूप में मनाई जाती है। खास बात यह कि तमिलनाडु में दीवाली पूरे देश से एक दिन पहले तमिल कैलेंडर के अनुसार मनाई जाती है। गोवा: नरकासुर की बड़ी-बड़ी (25 फुट तक की) प्रतिमाएं बनाकर उन्हें पटाखों से भरकर जलाया जाता है। हिमाचल प्रदेश: आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां दो बार दिवाली मनाई जाती है – एक आम दिवाली और दूसरी बुद्धी दिवाली, जो एक चंद्र मास बाद मनाई जाती है और इसमें देवदार या चीड़ की छाल से बनी विशाल

Uttarakhand

राजाजी नेशनल पार्क का अद्भुत रोमांच कर देगा आपको हैरान

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राजाजी नेशनल पार्क की खूबसूरती राजाजी नेशनल पार्क उत्तराखंड के देहरादून में ऋषिकेश से 6 किमी की दूरी पर स्थित है और यह नेशनल पार्क लगभग 830 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी स्थापना 1983 में मोती चूर सैंक्चुअरी, चिल्ला सैंक्चुअरी और राजाजी सैंक्चुअरी मिलाकर की गई है। यह नेशनल पार्क चारों और से पहाड़ों वादियों और नदी से घिरा हुआ है। इसका नाम एक स्वतंत्रता सेनानी के नाम क्यों पड़ा? जिस कारण यहां की प्राकृतिक सुंदरता टूरिस्ट्स खासकर नेचर लवर्स को अपनी ओर खींच लाती है। इस पार्क का नाम प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी और आज़ाद भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नाम पर रखा गया है।(राजाजी नेशनल पार्क उत्तराखंड के देहरादून में ऋषिकेश से 6 किमी की दूरी पर स्थित है) अनेक पक्षियों की प्रजातियों का घर है यह शानदार पार्क आध्यात्मिक नगरी ऋषिकेश के बिलकुल करीब स्थित भारत के प्रमुख वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी में गिना जाना वाला यह पार्क पक्षियों की लगभग 315 प्रजातियों का घर है। एशियाई हाथी, हिरन,चीता, भालू, कोबरा, जंगली सुअर, साँभर, भारतीय खरगोश, जंगली बिल्ली जैसे जन्तु इस पार्क में पाये जाते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें चीता, सुस्त भालू, हिरण और भौंकने वाले हिरण भी इस पार्क में आसानी से देखे जा सकते हैं। इस पार्क की सबसे खास बात जो इसे पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाती है वो ये कि गंगा नदी इस पार्क में लगभग 24 किमी की दूरी तय करती है। नदी की सुंदरता चार चाँद लगा देती है पार्क में जब आप यहाँ जंगल सफारी करते हैं तो यकीनन इसमें से बहने वाली वाली नदी की छोटी छोटी धाराएं आपकी यात्रा को सुख़नुमा अहसास के साथ रोमांचक भी बनाती है। पार्क में साल, पश्चिमी गंगा के नमी वाले जंगल,उत्तरी शुष्क पतझड़ वाले वन और खैर-शीशम के जंगल पाये जाते हैं । पर्यटकों के लिये पार्क प्रतिवर्ष 15 नवम्बर से 15 जून के बीच खुला रहता है। कुछ स्पेशल सरकमस्टान्सेस में समय में बदलाव संभव है। पर्यटक अपने 34 किमी लम्बे जंगल सफारी के दौरान पहाड़ियों की सुन्दरता, घाटियों और नदियों के मनोरम दृश्य का आनन्द ले सकते हैं। जंगल सफारी बनाएगा आपकी यात्रा को मजेदार यहां पर आप जंगल सफारी का आनंद दिन में दो बार ले सकते हैं, एक सुबह छह बजे से 10 बजे तक और दूसरा शाम को तीन बजे से छह बजे तक। नेशनल पार्क में जीप सफारी के लिए आपको सभी तरह के टैक्स और एंट्री फी के साथ लगभग 3200 रुपए पे करने पड़ते हैं। यहाँ जंगल सफारी के लिए आप चीला रेंज जो की यहाँ का फेमस एरिया है के अलावा बफर जोन सफारी भी कर सकते हैं अगर आप यहाँ के जंगल को अच्छे से एक्स्प्लोर करना चाहते हैं तो बफर जोन एक अच्छा अल्टेरनेट हो सकता है। नेचर लवर्स के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं यह जगह जहाँ जंगल के बीचोबीच नदी के किनारे मैग्गी पॉइंट पर चाय, पकौड़े और गर्मा गर्म मैग्गी का आनंद लिया जा सकता है साथ ही यहाँ पर पहाड़ी की छोटी पर विंध्य वासिनी टेम्पल भी है जो यहाँ आने वाले नेचर लवर्स को अपनी और आकर्षित करता है। ठहरने के लिए आपको इस नेशनल पार्क में आपके बजट के अनुसार बहुत सारे होटल और रिसॉर्ट्स मिल जायेंगे। फिर भी सभी मील्स के साथ आप एक रिसोर्ट के लिए कम से कम चार-पांच हज़ार का बजट मान के चलिए। अगर आप नेशनल पार्क में घूमने के लिए या अपना क्वालिटी टाइम बिताने के लिए आना चाह रहे हैं तो होटल की बजाय रिसोर्ट में रुकना ज्यादा बेहतर रहता है। कैसे पहुँचें राजाजी नेशनल पार्क? यहाँ सब कुछ आपके बजट पर डिपेंड करता है। राजाजी नेशनल पार्क आने के लिए अगर आप प्लेन से आ रहे हैं तो जॉली ग्रांट देहरादून हवाई अड्डा, यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा है जो यहाँ से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से आपको टैक्सी या कैब आसानी से उपलब्ध हो जायेगी। ट्रेन द्वारा और अगर आप ट्रेन से अनचाहे तो निकटतम रेलवे स्टेशन हरिद्वार है जो भारत के प्रमुख शहरों के साथ रेलवे नेटवर्क द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। यहां से आपको आसानी से सभी बड़े शहरों के लिए ट्रेन मिल जायेंगी। सड़क के द्वारा अगर आप अपनी कार से या ब स से यहाँ आना चाहें तो दिल्ली से मेरठ एक्सप्रेसवे और हरिद्वार से होते हुए आप आसानी से यहाँ पहुंच सकते हैं। दिल्ली से लगभग 239 किलो मीटर की दूरी पर हरिद्वार स्थित है।

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गोवर्धन की प्राचीन गौशाला: एक आध्यात्मिक विरासत, जो आज भी जीवित है

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गोवर्धन जहां के कण-कण में श्री कृष्ण का वास है बहुत दिनों के बाद आज मैं और मेरी टीम निकल पड़े हैं एक और आध्यात्मिक  जगह जहां मन के सारे पाप धुल जाते हैं। जहां आप कर सकते हैं अहसास भगवान के अस्तित्व का। भगवान की लीलाओं का। जहां मिट्टी की सौंधी खुशबू आपका मन मोह लेगी। आपको अपना बनाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ेगी। मैं बात कर रहा हूँ, भारत की प्राचीन और सबसे पुरानी एवं आध्यात्मिक जगहों में से एक, माखन चोर की लीलाओं का गढ़ गोवर्धन की। जिस गोवर्धन को श्री कृष्ण ने इन्द्र देवता को सबक सिखाने के लिए अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठा लिया था। इसी पवित्र भूमि पर है, भारत की सबसे पुरानी गौशालाओं में एक भारत में गौसेवा की परंपरा गहरी और बहुत पुरानी है। इस परंपरा के केंद्र में ब्रज‑प्रदेश का गोवर्धन क्षेत्र आता है, जहाँ धार्मिक, सामाजिक और पशुपालन‑परंपराओं का एक अनूठा संगम मिला हुआ है। इस ब्लॉग में हम उन पहलुओं को शोध‑परक तरीके से देखेंगे, जो बताते हैं कि क्यों कहा जाता है कि गोवर्धन को “प्राचीनतम गौशाला” का आश्रय स्थल. आपको पूरे बृज क्षेत्र में सेंकडों गौशालाएं दिखाई देंगी लेकिन गोवर्धन में कुछ प्राचीन गौशालाएं भी हैं जो सदियों से आज भी अस्तित्त्व में हैं. (भारत की सबसे पुरानी गौशालाओं में एक) भारत की सबसे पुरानी गौ-शाला ब्रजभूमि की पवित्र धरती गोवर्धन में गौ‑सेवा केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित हुई जीवन‑शैली का हिस्सा रही है। गोवर्धन पहुँच कर जब हमने इस प्राचीन गौशाला में प्रवेश किया तो वहां हमें बरसों से रख रखाव कर रहे गौ-सेवक से बात की, उन्होंने हमें बताया की यह गौशाला 150 साल से भी पुरानी गौशाला है। गोवर्धन का क्षेत्र धार्मिक तीर्थस्थल होने के कारण बड़ी संख्या में पर्यटक/भक्त आते हैं जिनके दान और भक्तिभाव से यह गौशाला चल रही है — यह गौ‑सेवा को एक सामाजिक‑सांस्कृतिक आयाम देता है। । इस गौ-शाला के सेवक दीवान जी ने क्या कहा? दीवान जी ने हमें बताया की गाय की सेवा करना उसी समान है जैसे हम भगवान की सेवा कर रहे हैं। उनकी तीन पीढ़ियां इसी गौशाला में गाय सेवक के तौर पर सेवा कार्य करती रही हैं। क्योंकि गाय माता में भगवान का वास होता है। उन्होंने कहा कि गाय सेवा ही परम धर्म है। दीवान जी ने हमें बताया कि वह सुबह शाम सभी गायों को नहलाते हैं और उनकी खूब सेवा करते हैं। और शायद यह इसी सेवा का ही फल है कि आज तक उनके परिवार में किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं आई। सुबह से गायों को नहला-धुलाकर वह उन सभी गायों को चराने के लिए भी ले जाते हैं। और शाम को फिर उसी गौशाला में ले आते हैं। यही उनकी दिन चर्या है। क्यूं करनी चाहिए गाय की सेवा?   वैसे आपको बता दूं की गाय की सेवा भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र और पुण्य मानी गई है। गाय की सेवा करने से मन को शांति, संतोष और आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। सुबह गाय को चारा देना, उससे बात करना, उसके साथ समय बिताना — यह एक हीलिंग थैरेपी की तरह काम करता है। साथ ही गाय से दूध, दही, घी, मक्खन आदि पोषण‑समृद्ध आहार मिलते हैं। गाय की सेवा करने के लिए विज्ञान का क्या कहना है? दरअसल, केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी गौ-सेवा लाभकारी मानी जाती है। गाय के गोबर और मूत्र से बने उत्पाद पर्यावरण के लिए उपयोगी और की तरह के प्रदूषण से मुक्त होते हैं। गोबर से बनी खाद जमीन की उर्वरता को बढ़ाती है और जैविक खेती को प्रोत्साहन देती है। इसके अलावा, गाय की सेवा से मनुष्य के भीतर करुणा, विनम्रता और सकारात्मक ओज का विकास होता है। यह सेवा आत्मिक शांति और संतुलन का भी माध्यम बनती है। आज जब जीवन भागदौड़ और तनाव से भरा है, तब गाय की सेवा हमें प्रकृति और संस्कृति से जोड़ने का सरल मार्ग प्रदान करती है। इसलिए गाय की सेवा न केवल एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह मानवता, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का एक तरह से प्रतीक भी है। गौ-शाला कितनी पुरानी है, इसकी बनावट से पता चलता है कई सालों पुरानी इस गौ-शाला का पता इसकी पुरानी दीवारों से पता चलता है। यह दीवारें कई सालों की कहानियां कहती हैं। जो इस गौशाला की दीवारों पर नजर आती हैं। इसमें हर गाय के लिए अपनी अलग जगह है। इन दीवारों में छिपे हैं भगवान श्री कृष्ण के स्वर और उनकी मुरली की धुन। जब आप इस गौशाला में प्रवेश करते हैं तो देखते इसका दरवाजा वैसे से ही बना हुआ है जैसे आप उसी काल में पहुंचे हों। जब श्री कृष्ण अपनी मुरली की धुन से इन गायों को चराने के लिए ले जाते हैं। जैसे ही हम गौशाला के अंदर पहुंचे तो हमने देखा की सबसे पहले दरवाजे के बिल्कुल सामने ही भगवान श्री कृष्ण का मंदिर है। जिसमें श्री कृष्ण के साथ राधा जी भी दिखाई देती हैं। आप जैसे ही इस गौशाला के अंदर जाते हैं आप एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाते हैं। सच में आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप द्वापर युग में पहुंचे गए हों। कैसे पहुंचे इस गौशाला तक?    गोवर्धन शहर में एंट्री करते ही जब आप गोवर्धन की परिक्रमा शुरू करते हैं तब बाएं तरफ से सबसे पहले आपको इसी गौशाला के दर्शन करने को मिलेंगे। रास्ते में ही एक बहुत बड़ा दरवाजा मिलेगा। जो ऐसा प्रतीत होगा जैसे किसी बड़े से महल को आप देख रहे हों। मुख्य सड़क पर ही आपको यह प्राचीन गौशाला दिखाई देगी। गौशाला के अन्दर पहुँचते ही आपको सुकून तो अवश्य मिलेगा। इसमें कई सारी खोलियां आपको देखने के लिए मिलेंगी। जिनमें गाय बछड़ों को बांधा जाता है। वहीं उनके लिए चारा खिलाया जाता है। यदि आप यहां जाते हैं तो आपको गौमाता की सेवा करनी चाहिए। आप सेवा करेंगे तो आप खुद से यह एहसास करेंगे कि आप श्री कृष्ण की भक्ति कर रहे हों। कई एकड़ में फैली यह गौशाला आज के समय में बहुत प्रसांगिक है क्योंकि जिस तरह आज हम देखते हैं, किस तरह गाय माता