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रामनगर जाओ तो एक बार चख ज़रूर लेना! दुनिया भर में और कहीं नहीं मिलती सिंघाड़े की कचरी, जान लीजिए!

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क्या आपने कभी सुना है सिंघाड़े की कचरी के बारे में, एक खास और अलग तरीके से बनाई जाने वाली एकमात्र डिश जो रामनगर के अलावा और कहीं नहीं मिलेगी। क्या खासियत है इसमें? आखिर इसे लोग इतना क्यों पसंद कर रहे हैं? नहीं खाई है तो क्यों खाना चाहिए? रामनगर में कहां मिलती है यह सिंघाड़े की कचरी? इसे कैसे बनाया जाता है? सब कुछ आज आप जानेंगे फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल की इस पेशकश में। क्या है पूरा माजरा, इसे तैयार करने का? सिंघाड़े की कचरी स्वाद में तो बेमिसाल है ही, इसके अलावा इसे बनाने का तरीका और भी शानदार और लाजवाब है। सबसे पहले तो लकड़ी की आग चाहिए। क्योंकि गैस पर बनाने में वो स्वाद नहीं आता, जो लकड़ी पर पकाने में बनता है। इसलिए सबसे पहले जिसकी जरूरत होती है, वह है लकड़ी का चूल्हा। जहां का जिक्र मैं कर रहा हूँ, वह रामनगर के एकमात्र कचरी वाले की रेडी है। उन्होंने अलग और खास तरीके से लकड़ी के चूल्हे को बनाकर रेडी में ही लगा रखा है। अद्भुत तरीके से सेट किया गया था। रेडी के नीचे आग के लिए जगह थी, जहां बार-बार लकड़ियां डालकर चूल्हे को ताव दिया जा रहा था। रेडी के ऊपर मिट्टी से एक बढ़िया चूल्हा बना रखा था। उसके ऊपर तांबे जैसा कढ़ाही जैसा पैन रखा गया था, जो बेहद खास था।( रामनगर में कहां मिलती है यह सिंघाड़े की कचरी?) कैसे बनती है सिंघाड़े की कचरी? सबसे पहले तो पैन में प्याज और मिर्च को बढ़िया से बटर के साथ तलना पड़ता है। इसके बाद उसमें पहले से पीस कर रखे हुए सिंघाड़े को अच्छे से बटर के साथ मिक्स करना होता है। एक लंबे समय तक चम्मच से उसे घिसते रहना है ताकि सिंघाड़े का बढ़िया-पेस्ट बन जाए और बटर की सुगंध अच्छे से उसमें घुल-मिल जाए। आग सामान्य होनी चाहिए, क्योंकि यदि आग थोड़ी सी भी तेज़ हुई तो कचरी का स्वाद बिगड़ सकता है। इसलिए इसे पकाते समय सावधानी रखी जाती है। ग्राहक, यानी कचरी स्वाद के मुरीद, रेडी के सामने ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे होते हैं। यह बिलकुल आँखों देखा हाल है! वास्तव में इस स्पेशल कचरी को इतना पसंद किया जाता है कि शाम होते ही यहाँ कचरी के स्वाद के मुरीदों की लंबी कतार देखी जा सकती है। जब बढ़िया से सिंघाड़े को बटर के साथ घिस लिया जाता है, उसके बाद उसमें छोटे-छोटे पीस में कटे हुए टमाटर, धनिया और प्याज डाली जाती है। अब आपकी सिंघाड़े की कचरी बिल्कुल तैयार है, लेकिन एक चीज़ अभी भी बाकी है — वह है हिमालयन नींबू! जब हिमालयन नींबू इसमें निचोड़ा जाता है, तो कचरी के स्वाद में मानो चार-चाँद लग जाते हों। इससे स्वाद में एक खास खट्टापन मिल जाता है, जो इसे बहुत ही स्वादिष्ट बनाता है। इसे परोसने का तरीका भी मजेदार और विशेष है क्योंकि सिंघाड़े की कचरी को कागज़ की प्लेटों में नहीं, न ही स्टील की प्लेट में, बल्कि पत्तों पर परोसकर दिया जाता है — एक देसी और अपनेपन के साथ! क्या खासियत है इस सिंघाड़े की कचरी में? अनौखापन तो इसमें यही है कि यह सिर्फ और सिर्फ आपको रामनगर में मिलेगी और कहीं नहीं। दूसरी बात — इसे बनाने का तरीका कोई और नहीं जानता! लगभग तीस साल से यह रेडी रामनगर के बीच बाजार में लगती है। यकीन मानिए आप एक बार इसे चखेंगे तो बार-बार कचरी की डिमांड करेंगे। इसका पत्तों पर परोसकर देना और अपनी परंपरा व संस्कृति को उजागर करना — अलग ही बात है। रामनगर के लोग बड़े ही हसमुख और दिलेर हैं, और रेडी के जो मालिक हैं उनका व्यवहार भी बेमिसाल है जी! आपसे ज़्यादा क्या ही कहा जाए; बस यही कहा जा सकता है कि इसकी खासियत देखी नहीं जा सकती — महसूस की जा सकती है। इसलिए आप जब भी रामनगर जाएँ तो सिंघाड़े की कचरी ज़रूर आज़माएँ। आखिर इसे लोग इतना क्यों पसंद कर रहे हैं? कचरी का नमकीन स्वाद इतना जबरदस्त है कि यह मुंह में रखते ही घुल जाती है। “जीत आपकी” पुस्तक के लेखक शिव खेड़ा का कहना है कि जीतने वाले कोई अलग काम नहीं करते, बल्कि वे हर काम को अलग ढंग से करते हैं। बस यही इसको पसंद किए जाने के पीछे का सच है। जिसने इसे पहचान दी, उसने अलग ढंग से काम किया और स्वाद तगड़ा बन गया — जो सबको पसंद आ रहा है। यकीनन आपको भी यह पसंद आएगा। फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल की और से ज़रूरी यात्रा सुझाव नहीं खाई है तो क्यों खाना चाहिए। अगर आपने रामनगर के सिंघाड़े की कचरी नहीं खाई, तो मान लीजिए आपने असली देसी स्वाद मिस कर दिया है! सिंघाड़े के आटे से बनी ये कचरी बाहर से मुलायम, अंदर से नरम और सुगंध से भरी होती है। इसमें हल्के मसालों का ऐसा तड़का लगता है कि एक बार खाओ तो बार-बार मन करे। सर्दियों में तो इसकी मांग और बढ़ जाती है, क्योंकि यह पेट को गरम और ताकत से भर देती है। ऊपर से खट्टी-मीठी चटनी या दही के साथ इसका स्वाद बस लाजवाब हो जाता है। रामनगर की गलियों में ढलते सूरज की किरणों के साथ कचरी की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींच लाती है। सस्ती, स्वादिष्ट और सेहतमंद — यही है रामनगर की सिंघाड़े की कचरी की असली पहचान। तो जब भी रामनगर जाओ, ये स्वाद ज़रूर चखना; वरना सफर अधूरा रह जाएगा! कहने का मतलब यह है कि आप इस स्वाद से महरूम न रहें। रामनगर में कहां मिलती है यह सिंघाड़े की कचरी। रामनगर में सिंघाड़े की कचरी खाने का असली मज़ा तभी आता है जब आप इसे वहीं की मार्केट की गलियों में ताज़ा-ताज़ा बनने के बाद खाते हैं। यह स्वादिष्ट कचरी बस स्टैंड के पास और रामनगर कोतवाली के सामने से निकली पुराने बाजार की गली में मिलती है। शाम का वक्त होते ही जब सिंघाड़े की कचरी बनती है, तो उसकी खुशबू पूरे बाजार में फैल जाती है। कचरी के स्वाद में खोए हुए एक चाचा से हमने पूछा तो वह कहते हैं, “रामनगर आए और सिंघाड़े की कचरी ना खाई, तो

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“मांडू” प्रेम, इतिहास और पहाड़ों की गोद में बसा मध्यप्रदेश का अनौखा शहर! क्यों है आपके लिए खास?

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मांडू शहर के पत्थरों में बसी मोहब्बत की सांसें मांडू शहर मध्यप्रदेश के दिल में बसा एक ऐसा शहर है जो इतिहास, कला और प्रेम की कहानी कहता है। इस शहर का हर पत्थर किसी किस्से से जुड़ा है। इसे वैसे तो मांडवगढ़ भी कहा जाता है और यह मालवा पठार पर स्थित है। चारों ओर हरियाली, घाटियां और पुराने किलों के अवशेष इस जगह को रहस्यमय और खूबसूरत बनाते हैं। यहां का वातावरण शांत है, हवा में पुरानी सभ्यता की खुशबू घुली है। सर्दियों में जब कोहरा इन प्राचीन महलों को ढक लेता है, तो मांडू किसी चित्र में सजे स्वप्न जैसा लगता है। यह जगह न सिर्फ इतिहास प्रेमियों के लिए खास है बल्कि उन लोगों के लिए भी जो प्रकृति के बीच सुकून तलाशते हैं। मांडू में घूमते हुए ऐसा लगता है जैसे समय थम गया हो। यहां की हर दीवार, हर दरवाज़ा, हर झरोखा बीते जमाने की यादों से भरा है। यह शहर भारत के उन कुछ स्थानों में से है जहां रोमांस और इतिहास एक साथ सांस लेते हैं। इंदौर से मांडू तक हर मोड़ पर एक कहानी मांडू पहुंचने के लिए सबसे आसान रास्ता इंदौर से होकर जाता है। यह शहर इंदौर से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर है और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। आप टैक्सी, निजी वाहन या सरकारी बस से आराम से यहां पहुंच सकते हैं। अगर आप ट्रेन से यात्रा करना चाहते हैं, तो निकटतम रेलवे स्टेशन इंदौर और धर हैं। हवाई मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए इंदौर का देवी अहिल्या एयरपोर्ट सबसे नजदीक है। इंदौर से मांडू तक का सफर बेहद खूबसूरत है। रास्ते में हरियाली, पहाड़ और घुमावदार सड़कें आपको एक अलग ही अनुभव देती हैं। सर्दियों में जब हल्की धुंध रास्ते को ढक लेती है, तब यात्रा किसी फिल्मी सीन जैसी लगती है। रास्ते में छोटे-छोटे गांव, चाय की टपरियां और लोकल लोगों की मुस्कान इस सफर को यादगार बना देती हैं। मांडू पहुंचते ही पहला एहसास होता है जैसे किसी दूसरे युग में कदम रख दिया हो।(यह शहर भारत के उन कुछ स्थानों में से है जहां रोमांस और इतिहास एक साथ सांस लेते हैं।) मांडू बुलाता है जहां इतिहास गाता है प्रेमगीत मांडू जाने का असली कारण इसका वातावरण और इसकी कहानी है। यह शहर आपको सिर्फ देखने का नहीं, महसूस करने का मौका देता है। यहां की हवा में प्रेम की मिठास है और इतिहास की गहराई भी। रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेमकथा ने इस जगह को अमर बना दिया है। यह वही मांडू है जहां राजा बाज बहादुर ने अपनी रानी रूपमती के लिए गाने और कविताएं लिखीं, और रानी ने पहाड़ियों पर बैठकर नर्मदा नदी को निहारा। कहा जाता है, जब मुगलों ने मांडू पर हमला किया, तो रूपमती ने आत्मसमर्पण की बजाय मृत्यु को चुना। इस कहानी की गूंज आज भी रूपमती मंडप की हवा में सुनाई देती है। मांडू आने वाले यात्रियों को यहां की शांति, पहाड़ियों का सौंदर्य और इतिहास का रोमांच एक साथ मिलता है। यहां के जहाज महल से जब झील में सूरज की किरणें प्रतिबिंबित होती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे समय खुद ठहर गया हो। मांडू में हर मौसम खास है, लेकिन सर्दियां इसे और भी मनमोहक बना देती हैं। मांडू का सुनहरा इतिहास जैसे समय ठहर गया हो मांडू का इतिहास हजारों साल पुराना है। माना जाता है कि इसकी नींव छठी शताब्दी में पड़ी थी। पहले यह परमार वंश के अधीन था, फिर दिल्ली सल्तनत और मुगलों ने इस पर शासन किया। लेकिन मांडू का सबसे यादगार काल वह था जब यहां बाज बहादुर और रानी रूपमती का शासन था। यह समय कला, संगीत और प्रेम का स्वर्ण युग माना जाता है। उस दौर में मांडू में कई सुंदर इमारतें बनीं जहाज महल, हिंडोला महल, रानी रूपमती मंडप और जामी मस्जिद जैसी रचनाएं आज भी वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण हैं। जहाज महल दो झीलों के बीच बना है और सचमुच एक तैरते जहाज जैसा दिखता है। वहीं रूपमती मंडप से नर्मदा नदी का दृश्य इतना सुंदर है कि शब्द कम पड़ जाएं। मांडू का हर पत्थर उस दौर की कला और प्रेम का प्रमाण है। यहां घूमते हुए आप सिर्फ इतिहास नहीं देखते, उसे जीते हैं। स्वाद जो याद रह जाए, मांडू की थाली से मोहब्बत तक मांडू की यात्रा अधूरी है अगर आपने यहां का लोकल खाना नहीं चखा। यहां का मालवी फ्लेवर हर व्यंजन में झलकता है। सर्दियों में गरमागरम भुट्टे का कीस, दाल-बाफला और देसी घी से बनी रबड़ी-जलेबी का स्वाद भूलना मुश्किल है। मांडू के छोटे ढाबों और लोकल होटलों में देसी तड़के की खुशबू हर यात्री को खींच लाती है। शाम के वक्त जब आप रूपमती मंडप के पास बैठकर गुड़ की चाय पीते हैं, तो हवा में ठंडक और इतिहास का जादू एक साथ महसूस होता है। यहां के लोग मेहमानों के साथ दिल खोलकर पेश आते हैं। कुछ ढाबों में लोकल संगीत भी चलता है जो अनुभव को और खास बना देता है। खाने के साथ-साथ यहां की मिठाइयां भी प्रसिद्ध हैं। खासकर मांडू का मालपुआ और रबड़ी, जो स्थानीय त्यौहारों में जरूर बनती हैं। हर निवाले में मालवा की मिट्टी की खुशबू महसूस होती है। फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल की और से जरुरी यात्रा सुझाव सुबह जल्दी निकलें- रूपमती मंडप से सूर्योदय देखने का अनुभव शानदार होता है।सर्दियों में जाएं- अक्टूबर से मार्च तक मांडू का मौसम सबसे सुहाना रहता है।लोकल गाइड लें- गाइड आपको मांडू की अनसुनी प्रेमकथाएँ और ऐतिहासिक रहस्य बताएगा। लोकल खाना ज़रूर चखें- भुट्टे का कीस, दाल-बाफला और मालवा की मिठाई यह सब यात्रा को खास बना देंगे। शाम को रुकें- झील किनारे बैठकर सूर्यास्त देखें, वहीं मांडू का असली जादू महसूस होगा। वो एहसास जो एक बार नहीं, बार-बार बुलाए मांडू की सैर के लिए सर्दी का मौसम सबसे अच्छा है। अक्टूबर से मार्च तक का समय यहां घूमने के लिए आदर्श माना जाता है। इस दौरान मौसम ठंडा और आसमान साफ़ रहता है। तापमान करीब दस से बीस डिग्री के बीच रहता है, जो यात्रा को आरामदायक बनाता है। सुबह की हल्की धुंध में जब महलों की आकृतियां उभरती हैं, तो

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नैनीताल के पास ही खुरपाताल झील, जो बदलती है अपना रंग! जानें क्या है असली वजह?

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नैनीताल और नैनीझील तो सब ही घूमते हैं, पर क्या आपको पता है, उत्तराखंड के नैनीताल से महज 12 किलोमीटर दूर, नैनीताल-कालाढूंगी मार्ग पर स्थित है खुरपाताल झील, जो कि चारों ओर से प्राकृतिक सौंदर्य, खेत-खलिहान, ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से परिपूर्ण है। यह झील समुद्र तल से लगभग 3,900 फीट (1,635 मीटर) की ऊँचाई पर स्थित है। खुर ‘घोड़े के पैर के तलवे’ को कहा जाता है और यह झील घोड़े के पैर के तलवे यानी खुर के आकार की है, जिस कारण इसे खुरपाताल कहा जाता है।  खुरपाताल गांव में ही है खुरपाताल झील! जी हां, खुरपाताल न केवल एक झील है बल्कि यह एक गांव भी है और इसी गांव में है खुरपाताल झील। यह गांव चारों तरफ से देवदार और पाइन के पेड़ों से घिरा हुआ है, जो कि इस गांव की विशेषता है। साथ ही इस गांव का मुख्य आकर्षण यहां के फल व सब्जियों के सीढ़ीनुमा खेत हैं, जो न केवल यहां की सुंदरता को बढ़ाते हैं बल्कि यहां रहने वाले लोगों की जरूरतों को भी पूरा करते हैं। यह गांव जैविक खेतों के लिए भी जाना जाता है। यहां के सर्पिल आकार के रास्ते इस जगह की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं।(यह झील समुद्र तल से लगभग 3,900 फीट (1,635 मीटर) की ऊँचाई पर स्थित है।)  रंग बदलने वाली झील खुरपा झील क्या आप जानते हैं, आधा किलोमीटर व्यास वाली खुरपा झील, जिसका रंग हल्का हरा है, वह साल में एक बार अपना रंग बदलती है। इसकी वजह है यहां पाए जाने वाले शैवाल। इस झील में कुल 40 प्रकार के शैवाल पाए जाते हैं और जब भी इनके बीज बनते हैं तो यह झील बीज के रंगों की हो जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार, झील के पानी का रंग कभी लाल, कभी नीला तो कभी हरा दिखाई देता है। इस झील की एक और खास बात यह है कि इसका पानी हमेशा हल्का गर्म रहता है यहां तक कि सर्दियों में भी आपको इस झील के पानी में थोड़ी गर्माहट देखने को मिलेगी।  अंग्रेज शासकों की पसंदीदा जगह रही ‘खुरपाताल’ यूं तो नैनीताल के आसपास कई पर्यटन स्थल हैं, जैसे भीमताल, भवाली, नौकुचियाताल, रानीखेत, मुक्तेश्वर, पर फिर भी यह जगह अपने आप में ही अलग और अद्भुत है। यह जगह आज से ही नहीं बल्कि अंग्रेज शासकों के समय से मशहूर है। अंग्रेज शासकों की यह पसंदीदा जगहों में से एक थी वे अक्सर यहां समय बिताने और मछलियां पकड़ने आया करते थे। माना जाता है कि 19वीं शताब्दी में यहां बड़े पैमाने पर लोहे के औजार बनाए जाते थे, जिन्हें खरीदने लोग दूर-दूर से खुरपाताल आया करते थे। परंतु समय के साथ यह औजार बनना बंद हो गए और अब यह जगह यहां की सीढ़ीनुमा खेती के लिए प्रसिद्ध है।  मछली पकड़ने के शौकीन लोग यहां आकर कर सकते हैं अपना शौक पूरा अगर आप भी मछली पकड़ने के शौकीन हैं तो यहां आप अपना यह शौक पूरा कर सकते हैं। इस झील में कई प्रकार की मछलियां पाई जाती हैं। क्योंकि यह जगह मछली पकड़ने की एक परफेक्ट डेस्टिनेशन में से एक है। यहां कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है और नौकायन का भी कोई साधन नहीं है, इसलिए लोग अक्सर इसे ऊपर पहाड़ी से ही देख लिया करते हैं। लोग ज्यादातर मंशा देवी मंदिर के पास से ही इसे देखा करते हैं। ऊपर से इस झील का नज़ारा और भी खूबसूरत नजर आता है चारों तरफ हरी-भरी पहाड़ियां और बीच में खुरपाताल झील, जो मन को एक अलग ही प्रकार का सुकून देती है।  खुरपाताल क्षेत्र में उत्तराखंड के उच्च न्यायालय का आदेश नवंबर 2016 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कई झीलों को इको सेंसिटिव जोन घोषित करने का आदेश दिया था। न्यायालय के आदेश अनुसार, कुछ झीलों के 2 से 5 किलोमीटर त्रिज्या के क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई नहीं की जा सकती है और न ही कोई निर्माण कार्य किया जा सकता है। खुरपाताल भी उन्हीं झीलों में से एक है, जिस कारण यहां की हरियाली आज भी पहले जैसी ही है।  खुरपाताल घूमने का सही समय खुरपाताल में घूमने का सबसे सही समय अक्टूबर से नवंबर के बीच का है क्योंकि इस समय मौसम न तो अधिक गर्म होता है और न ठंडा। साथ ही इस समय पर्यटकों की भीड़ न के बराबर होती है, जिससे आप यहां अकेले घंटों बैठकर प्रकृति को महसूस कर सकते हैं। साथ ही आसपास के सीढ़ीनुमा खेतों में उगाई सब्जियों, फलों और फूलों की कई नस्लों को देख सकते हैं। क्योंकि यह ऑफबीट डेस्टिनेशन है, इस कारण आपको यहां लोग कम और सुकून ज्यादा मिलेगा।  कुछ सुझाव यहां कई होटल और रिसॉर्ट भी हैं। तो अगर आप नैनीताल के आसपास कोई ऐसी जगह ढूंढ रहे हैं जो प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण और साथ ही बहुत सी डेस्टिनेशन के करीब हो, तो यह जगह आपके लिए सबसे अच्छी रहेगी। तो यहां आने से पहले होटल बुक करना मत भूलिएगा। क्योंकि यह जगह खुद एक डेस्टिनेशन है, तो यहां तस्वीरें लेना बिल्कुल भी मत भूलना।  क्यों आएं खुरपाताल झील • अगर आप भी अपनी तनाव भरी जिंदगी छोड़ सुकून से भरे दो पल बिताना चाहते हैं, तो आएं खुरपाताल। • जहां आप हरी-भरी सब्जियों, फलों और फूलों से लदे पेड़-पौधों और सीढ़ीनुमा खेतों को देखेंगे। • साथ ही आप खुरपाताल के किनारे बैठकर हल्का संगीत चलाकर मछलियां पकड़ने का आनंद भी ले सकते हैं। • यहां आपको पक्षियों की आवाज अपने आप में ही एक संगीत बनाती दिखाई देगी। • तो यहां जरूर आएं हंसने, मुस्कुराने और सुकून के कुछ पलों को जीने के लिए।  खुरपाताल कैसे पहुंचे यह नैनीताल-कालाढूंगी मार्ग पर स्थित है। यह नैनीताल से कुल 12 किलोमीटर और दिल्ली से लगभग 313.9 किलोमीटर दूर है। खुरपाताल का निकटतम रेलवे स्टेशन हल्द्वानी-काठगोदाम रेलवे स्टेशन है। स्टेशन से खुरपाताल की दूरी लगभग 33 किलोमीटर है। स्टेशन से आप यहां बस, टैक्सी या प्राइवेट वाहन से जा सकते हैं। आपको प्राइवेट वाहन रेलवे स्टेशन पर ही मिल जाएंगे। खुरपाताल का निकटतम हवाई अड्डा पंतनगर में स्थित है। पंतनगर हवाई अड्डे से खुरपाताल की दूरी लगभग 71.5 किलोमीटर है। आप हवाई अड्डे से टैक्सी, बस या प्राइवेट वाहन के द्वारा पहुंच सकते

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हिमालय की गोद में आत्मा को छू जाने वाला अनुभव लीजिए, एक बार तो लद्दाख की सैर कीजिए!

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पुरातन नजरिए में लद्दाख क्या है? जब आप लद्दाख की शुष्क वादी और पर्वतों से भरी धरती पर कदम रखेंगे, तो महसूस होगा कि यह स्थान सिर्फ एक टुरिज़म डेस्टिनेशन नहीं बल्कि सदियों पुरानी कहानियों और व्यापार-मार्गों का अंग है। लद्दाख को हिमालय की ऊंची रेगिस्तान वादी भी कहा जाता है, क्योंकि यहां पर्वत-चट्टानों के बीच रेगिस्तानी जैसा माहौल है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र तिब्बत, कश्मीर, भारत और मध्य एशिया को जोड़ने वाले मार्गों पर था। लेह शहर, जो आज लद्दाख का केंद्र है, वास्तव में उस समय एक रियासत और व्यापारिक केंद्र था। वहीं धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी लद्दाख बहुत समृद्ध है। यहां के गुम्बा यानी बौद्ध मठ-मठान, चर्थन और पुरानी विश्व-स्मारक इस भूगोल की शांति-गहराई को दिखाते हैं। उदाहरण के लिए, लमयूरु मोनेस्ट्री 10वीं-11वीं शताब्दी की कलाकृति लिए हुए है। तो जब आप आज लद्दाख की खामोश चट्टानों और पत्थर-रास्तों को देखें, याद रखें कि वो राहें सिर्फ दृश्य नहीं बल्कि इतिहास की गाथा कह रही हैं। यहां तक पहुंचने का तरीका लद्दाख पहुंचने के लिए दो मुख्य मार्ग हैं! हवा मार्ग और सड़क मार्ग। आराम-सफर के लिए हवाई विकल्प सबसे सहज है। जैसे इसके लिए, लेह में कुशोक बकुला रिम्पोछे हवाई अड्डा है, जहां से कई विमान दिल्ली, जम्मू, सरीनगर आदि जगहों से आते-जाते हैं। सड़क मार्ग से भी रोमांच है और चुनौती भी। जैसे की खारदुंग ला पास, जो दुनिया के ऊंचे मोटरमार्गों में से एक है। लेकिन सावधानी भी ज़रूरी है क्योंकि ऊंचाई, मौसम और सड़क-स्थिति पर निर्भरता होती है।( याद रखें कि वो राहें सिर्फ दृश्य नहीं बल्कि इतिहास की गाथा कह रही हैं।) यात्रा करते समय एक महत्वपूर्ण बात जूंकि लद्दाख ऊंचाई पर है, यहां पहुंचते ही कम से कम 48 घंटे के लिए शरीर को अक्लिमेटाइज होने देना सेहत के लिए बेहतर माना गया है। अगर आप सड़क मार्ग से जा रहे हैं, तो ध्यान रहे कि मौसम के कारण कुछ मार्ग बंद हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, लेह-मनाली या श्रीनगर-लेह हाईवे केवल उन महीने में खुलते हैं जब बर्फ-पतन कम होता है। इस तरह, लद्दाख की यात्रा शुरू करने से पहले कैसे पहुंचें का पक्का प्लान बनाना बहुत महत्वपूर्ण है। आपका अनुभव इसे निर्भर करता है। सबसे अच्छा समय कब है यात्रा का? जब आप लद्दाख ट्रैवल गाइड टाइप गूगल में सर्च करेंगे, एक प्रमुख सुझाव यह मिलेगा कि जून से अक्टूबर का समय सबसे उपयुक्त है। इस अवधि में मौसम सुहावना होता है, सड़कें खुली होती हैं, और बाहरी एक्टिविटीज जैसे ट्रेकिंग, बाइकिंग या झील-पर्यटन करना आसान होता है। हां, अगर आप शीतकालीन माह या बहुत ऊंची चढ़ाई वाली सड़कों पर जाने की सोच रहे हैं, तो बहुत सावधानी आवश्यक है क्योंकि बर्फबारी, बंद मार्ग और ऊंचाई का असर हो सकता है। इसलिए यदि आप पहली बार लद्दाख जा रहे हैं, तो जून-अक्टूबर के बीच का समय चुनना समझदारी होगी। इसके अलावा, ऐसे माह में आप ज्यादातर खुली एक्टिविटीज कर सकते हैं जैसे बाइकिस्टों के लिए लेह-खारदुंग ला-नुब्रा वैली रूट लोकप्रिय होता है। यहां के लोग और उनकी संस्कृति लद्दाख सिर्फ पर्वत और रास्तों की कहानी नहीं, बल्कि यहां के लोगों, उनकी संस्कृति और जीवनशैली की कहानी भी है जो आपके यात्रा अनुभव को पूरा करती है। लद्दाख में मुख्यत तिब्बती-भाषी समुदाय रहते हैं, जिनका धर्म बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव रखता है। लेह शहर में बौद्ध धर्म का प्रभाव सबसे ज़्यादा दिखता है। ये लोग ऊंचाई, कठोर मौसम और सीमित संसाधनों में सदियों से अनुकूलित होकर जीवन जीते आए हैं। इसलिए उनकी संस्कृति में स्थिरता, प्रकृति-सम्मान और समुदाय-भावना की झलक मिलती है। मठों में चाम्स (मास्क नृत्य), उत्सव, पहाड़ी-जीविता, बुढ़ापे की कहानियां हर-पल सामने आती हैं। जैसे, हेमिस मोनेस्ट्री में मास्क डांस बहुत प्रसिद्ध है। यात्रा करते समय जब आप गांव-झोपड़ियों, स्थानीय बिस्तर-हॉमस्टे या होटल के बाहर लोगों से मिलेंगे, तो वह खुलापन, सरलता और हिमालय-भाव का अनुभव होगा यही लद्दाख को खास बनाता है। इसके अलावा, यहां एक यात्रा-रवैया देखने को मिलेगा जहां लोग पर्यटक को अपनापन देते हैं, लेकिन साथ ही अपनी संस्कृति-परंपराओं का भी सम्मान करते हैं। इसलिए वहां जाते समय हमें यह समझकर चलना है कि हम सिर्फ देखें नहीं बल्कि सांझा अनुभव करें, और खासतौर पर उनके दिलों में उतरें। स्थानीय भोजन और शहरी गांवों का रवैया लद्दाख की मिट्टी, हवा और ऊंचाई ने यहां के भोजन और लोगों के रस्म-रिवाज दोनों को एक अलग अंदाज दिया है। गूगल में जब आप “food in ladakh must try” लिखेंगे तो आपको कई दिलचस्प नाम मिलेंगे जैसे थुक्पा, स्क्यू, खम्बिर। दरअसल, थुक्पा एक तरह का नूडल-सूप है, जिसे सब्जियों, मांस या दुध से तैयार किया जाता है। स्क्यू में गेंहू के आटे से बने छोटे प्याले-आकार के गोले उबाले जाते हैं, फिर मांस और जड़-तरकारी के साथ पकाए जाते हैं। खम्बिर, एक तरह की खमीर वाला स्थानीय ब्रेड है, जिसे तपते हुए पत्थर पर या आग के ऊपर सेंका जाता है यह ऊर्जा-पूरक और ऊंचाई वाले क्षेत्र के लिए उपयुक्त है। जब आप लद्दाख में गांवों या लेह-बाजार में बैठे होंगे, वहां के लोग आपको इस भोजन के पीछे की कहानी बताएंगे जैसे यह मासिक उत्सव में कैसे बनता है, या ऊंचाई ठंड में किस तरह से यह गर्माहट देता है। यह सिर्फ स्वाद नहीं, यात्रा-अनुभव का हिस्सा है। शहरी गांवों का रवैया भी यहां खुला-सुलभ है, हॉमस्टे में यदि आपने खाना लिया है, तो अक्सर मेजबान परिवार आपको अपने घर की छोटी-सी रसोई, अपनी आदतें, अपने खाने-पीने की बैकग्राउंड बताएंगे। यह रवैया यात्रा को मानवीय अनुभव में बदल देता है। आवास और यात्रा के टिप्स लद्दाख में आवास ओप्सन की कमी नहीं है, चाहे बजट ट्रैवलर हों या लग्ज़री-शौकीन, यहां दोनों के लिए विकल्प मिलते हैं। जैसे लेह में कई होटलों की सूची एवं होमस्टे की जानकारी उपलब्ध है। होमस्टे में रहने का अनुभव विशेष होता है क्योंकि वहां आपको स्थानीय जीवन-शैली के करीब रहने का मौका मिलता है। कुछ टिप्स जो मेरी यात्रा-अनुभव का हिस्सा हैं- लद्दाख का सफर पहाड़ों की ऊंचाई, नीरव घाटियां आकाश­स्पर्शी रास्ते, मिट्टी-सुगंध, यहां के लोगों की मृदुता और उनके निवास-स्थान का आमंत्रण सब मिलकर एक मानव-कहानी बनाते हैं। जब आप वहां खड़े होंगे, तो सिर्फ मैं यहां हुं नहीं कहेंगे, बल्कि यह कहेंगे, मैं

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कच्छ का रन उत्सव सफेद मरुस्थल में रंगों का समंदर! कब जाएं, कहां रुकें और क्या देखें?

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भारत की विविधता और सांस्कृतिक धरोहर का सबसे सुंदर प्रतीक अगर किसी उत्सव में दिखाई देता है, तो वह है कच्छ का रन उत्सव (Rann Utsav)। यह केवल एक त्यौहार नहीं बल्कि एक अनुभव है जहां रेगिस्तान की सफेद धरती पर रंगों, संगीत, लोकनृत्य, हस्तशिल्प और परंपराओं की अनोखी छटा बिखर जाती है। गुजरात सरकार द्वारा आयोजित यह उत्सव भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सैलानियों को आकर्षित करता है। चलिए जानते हैं इस उत्सव की पूरी कहानी इसकी उत्पत्ति से लेकर इसकी संस्कृति, परंपरा और रोमांचक अनुभवों तक। रन उत्सव की शुरुआत कैसे हुई? कच्छ का रन उत्सव पहली बार वर्ष 2005 में गुजरात टूरिज्म विभाग की पहल पर शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य था कच्छ क्षेत्र की संस्कृति, कला और हस्तशिल्प को विश्व पटल पर लाना। पहले यह आयोजन केवल कुछ दिनों के लिए होता था, लेकिन आज यह चार महीने तक चलता है नवंबर से लेकर फरवरी तक। इस दौरान पूरे कच्छ में उत्सव का माहौल बन जाता है और हजारों पर्यटक यहां पहुंचते हैं। रन शब्द का अर्थ है नमक का रेगिस्तान। यह ग्रेट रन ऑफ कच्छ भारत का सबसे बड़ा नमक का मैदान है, जो अरब सागर के तट से जुड़ा हुआ है। पूर्णिमा की रात में जब चांदनी इस सफेद नमक पर गिरती है, तो पूरा रन मानो चांदी की परत से ढका लगता है। यही दृश्य देखने के लिए लोग दुनिया भर से यहां आते हैं। कहां और कब मनाया जाता है रन उत्सव? रन उत्सव का आयोजन गुजरात के कच्छ जिले के धोरडो गांव में होता है। यह भुज शहर से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह भारत-पाकिस्तान सीमा के बेहद करीब है, इसलिए यहां आना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव होता है। हर साल नवंबर से फरवरी के बीच यह उत्सव मनाया जाता है। सर्दियों के इस मौसम में यहां का तापमान सुहावना रहता है और पर्यटक बिना किसी परेशानी के इस उत्सव का आनंद ले सकते हैं। खासकर पूर्णिमा की रातें Full Moon Nights in Rann Utsav यहां के अनुभव को दोगुना कर देती हैं।(कच्छ का रन उत्सव पहली बार वर्ष 2005 में गुजरात टूरिज्म विभाग की पहल पर शुरू हुआ था।) कैसे बनता है ‘रन उत्सव’ तैयारी और टेंट सिटी की कहानी रन उत्सव की तैयारी किसी भव्य फिल्म की शूटिंग से कम नहीं होती। धोरडो गांव के पास अरबों रुपये की लागत से एक विशाल टेंट सिटी Tent City Dhordo बनाई जाती है, जो हर साल नए सिरे से खड़ी की जाती है। यह टेंट सिटी 5 लाख वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में फैली होती है और इसमें 350 से ज्यादा शानदार टेंट बनाए जाते हैं। इनमें से कुछ टेंट लक्ज़री होटल के कमरों की तरह होते हैं जिनमें एयर कंडीशनर, हीटर, निजी बाथरूम और फर्निश्ड इंटीरियर होता है। इस टेंट सिटी को डिजाइन करने में स्थानीय कारीगरों का बड़ा योगदान होता है। कच्छ के लोग मिट्टी, बांस, लकड़ी और रंगीन कपड़ों से इसे सजाते हैं। यहां की हर झोपड़ी, हर दीवार, हर सजावट कच्छ की पारंपरिक कला का प्रतीक होती है। कच्छ की संस्कृति और परंपरा का रोमांच रन उत्सव केवल एक पर्यटन आयोजन नहीं है, यह कच्छ की आत्मा का उत्सव है। यहां की लोकसंस्कृति, पहनावा, गीत-संगीत, नृत्य और हस्तशिल्प सब मिलकर इस क्षेत्र की जीवंत परंपराओं को दर्शाते हैं। कच्छ के गांवों में लोग आज भी पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं महिलाएं मिरर वर्क और कढ़ाई वाले चोली-घाघरा पहनती हैं, जबकि पुरुष कच्छी पगड़ी और कुर्ता। उत्सव के दौरान लोक नर्तक गर्भा, ढोल नगाड़े और सिद्दी डांस जैसे लोकनृत्यों से वातावरण को ऊर्जा से भर देते हैं। यहां के हस्तशिल्प उत्पाद जैसे कि बंधनी Bandhani, अज्रख प्रिंट, मिरर वर्क, लेदर वर्क, और बेल मेटल आर्ट दुनिया भर में मशहूर हैं। पर्यटक इन चीजों को खरीदकर कच्छ की यादें अपने साथ ले जाते हैं। रन उत्सव में देखने और करने लायक आकर्षण रन उत्सव में सिर्फ घूमना ही नहीं, बल्कि यहां का हर अनुभव यादगार होता है। यहां हर दिन नई क्रीएटिवटी होती हैं, सुबह ऊंट सफारी, दोपहर में हेंड़ी क्राफ्ट बाजार की सैर, शाम को लोक संगीत और रात में सांस्कृतिक प्रदर्शन। यहां का खानपान भी बेहद लजीज होता है। ढोकला, थेपला, कढ़ी-खिचड़ी, खमन और गुजराती थाली यहां के स्वाद को अनोखा बना देते हैं। कच्छ रन उत्सव में पर्यटन रन उत्सव ने न सिर्फ गुजरात बल्कि पूरे भारत के पर्यटन को नई ऊंचाई दी है। पहले जो कच्छ केवल सूखा और वीरान इलाका माना जाता था, अब वह दुनिया के प्रमुख टूरिज्म डेस्टिनेशनों में शामिल हो चुका है। इस उत्सव ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के हजारों अवसर पैदा किए हैं, चाहे वह टेंट बनाने वाले मजदूर हों, हस्तशिल्प कलाकार, लोकनर्तक या होटल संचालक। महिलाओं के लिए यह उत्सव आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया है। गुजरात सरकार भी पर्यावरण संरक्षण पर खास ध्यान देती है। नमक के रेगिस्तान की प्राकृतिक सुंदरता को बनाए रखने के लिए यहां प्लास्टिक पर रोक लगाई गई है और सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। कच्छ का रन भारत की आत्मा का उत्सव है रन उत्सव सिर्फ एक यात्रा नहीं, यह भारत की आत्मा का उत्सव है। यहां का हर रंग, हर धुन और हर मुस्कान एक संदेश देती है भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। सफेद रेगिस्तान में जब रात ढलती है और चांदनी में चमकते नमक के मैदान पर लोकगीतों की आवाज़ गूंजती है, तब महसूस होता है कि इस धरती पर कुछ अनुभव शब्दों में नहीं बयां किए जा सकते। अगर आप भारत की संस्कृति, कला, परंपरा और प्राकृतिक सुंदरता को एक साथ अनुभव करना चाहते हैं, तो कच्छ का रन उत्सव आपका अगला सफर जरूर होना चाहिए। सफेद रण में रहने की व्यवस्था कच्छ रण उत्सव में ठहरने का अनुभव किसी शाही सपने से कम नहीं होता। धोरडो की टेंट सिटी में बनी सैकड़ों लग्ज़री टेंट्स आधुनिक सुविधाओं से लैस होती हैं जैसे एयर-कंडीशनर, हीटर, आरामदायक बेड, प्राइवेट वॉशरूम और 24 घंटे सुरक्षा व्यवस्था। यहां हर टेंट को पारंपरिक गुजराती अंदाज में सजाया जाता है, ताकि सैलानी संस्कृति की गर्मजोशी महसूस कर सकें। इसके अलावा, प्रिमियम टेंट, डीलक्स टेंट और सुपरियर टेंट जैसी

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गढ़वाल की मंडवे की रोटी क्यों है दुनिया की सबसे हेल्दी पारंपरिक डिश?

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मंडवे की रोटी गढ़वाल की मिट्टी में पला स्वाद उत्तराखंड का गढ़वाल क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और समृद्ध संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां की रसोई में जो स्वाद बसता है, वह पहाड़ की मिट्टी, मौसम और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है। इन्हीं पारंपरिक व्यंजनों में से एक है गढ़वाली मंडवे की रोटी जो केवल एक भोजन नहीं बल्कि गढ़वाली जीवनशैली का प्रतीक है। मंडवा, जिसे अंग्रेज़ी में Finger Millet या रागी कहा जाता है, पहाड़ों की ढलानों पर उगने वाला एक पौष्टिक अनाज है। यह कठोर जलवायु और कम पानी में भी अच्छी पैदावार देता है, इसलिए इसे पहाड़ों का ‘अनमोल अनाज’ कहा जाता है। गढ़वाली लोग सदियों से मंडवे की खेती कर रहे हैं, और इसकी रोटी हर घर में एक परंपरा की तरह बनाई जाती है। कैसे बनती है मंडवे की रोटी, पहाड़ के स्वाद का सरल सफर गढ़वाल में मंडवे की रोटी बनाना एक कला की तरह माना जाता है। इसे बनाना थोड़ा मेहनत का काम है, क्योंकि मंडवे के आटे में ग्लूटेन नहीं होता, जिससे इसे बेलना और पकाना थोड़ा मुश्किल होता है। पहले गांव की महिलाएं मंडवे का आटा हाथों से चक्की में पीसती थीं। आजकल यह बाजार में भी आसानी से मिल जाता है। बनाने की प्रक्रिया में मंडवे के आटे को गुनगुने पानी से गूंथा जाता है। गूंधते वक्त आटे में थोड़ा सा गेहूं मिलाने से रोटी मुलायम बनती ह, इसलिए थोड़ा सा आप इसमें गेहूं का आता मिला सकते हैं। फिर इसे गोल आकार देकर हाथ से थपथपा कर तवे पर सेंका जाता है। जब रोटी आधी सिक जाती है, तो उसे पलटकर दूसरी ओर पकाया जाता है और आखिर में धीमी आंच पर फुलाया जाता है। ताजे मक्खन या गढ़वाली घी के साथ गर्मागर्म मंडवे की रोटी का स्वाद ऐसा होता है कि हर बाइट में मन आनंदित हो उठता है।(मंडवा, जिसे अंग्रेज़ी में Finger Millet या रागी कहा जाता है) मंडवे की रोटी पुरातन समय से मंडवे की रोटी का इतिहास उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से जुड़ा है, खासकर गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों से। प्राचीन समय में जब खेती के लिए संसाधन सीमित थे, तब पहाड़ों की ढलानों पर मंडवा यानी रागी उगाया जाता था क्योंकि यह कम पानी में भी आसानी से पनप जाता था। धीरे-धीरे मंडवा स्थानीय लोगों का मुख्य भोजन बन गया। इसकी रोटी को ऊर्जा देने वाली और ठंड से बचाने वाली मानी जाती थी। पुराने जमाने में गांव की महिलाएं चक्की में मंडवे को पीसकर उसका आटा बनाती थीं और लकड़ी के चूल्हे पर उसे सेकती थीं। मंडवे की रोटी सिर्फ खाने का साधन नहीं, बल्कि गढ़वाली संस्कृति का हिस्सा बन गई। आज भी यह रोटी त्योहारों, पारंपरिक भोज और सर्दियों में खास तौर पर बनाई जाती है। इसका स्वाद और पोषण दोनों ही गढ़वाल की मिट्टी की सादगी को दर्शाते हैं। कहां इसे ज्यादा बनाया और खाया जाता है? गढ़वाल के लगभग हर गांव में मंडवे की रोटी रोजाना के भोजन का हिस्सा है। खासकर चमोली, टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जिलों में इसे बहुत प्यार से बनाया जाता है। सर्दियों में जब ठंडी हवाएं पहाड़ों को ढक लेती हैं, तब मंडवे की गरम रोटी शरीर में ऊर्जा और गर्मी दोनों भर देती है। यह रोटी अक्सर भांग की चटनी, गहत दाल, अलू के ठेचे और भी स्थानीय सब्जियों के साथ खाई जाती है। गढ़वाल के अलावा कुमाऊं क्षेत्र में भी मंडवे की रोटी का महत्व समान रूप से है। वहां इसे “मंडुवा” कहा जाता है और शादी या त्योहारों पर इसे खास तौर पर परोसा जाता है। परंपरा और संस्कृति से जुड़ी मंडवे की रोटी गढ़वाली संस्कृति में भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। मंडवे की रोटी इस बात का प्रमाण है कि पहाड़ के लोग अपने भोजन में भी प्रकृति का सम्मान करते हैं। पहले के समय में जब गांव में अनाज का अभाव होता था, तब मंडवा ही जीवन दाता बनता था। यह सस्ता, टिकाऊ और पौष्टिक अनाज था। आज भी बुजुर्ग महिलाएं कहती हैं कि मंडवे की रोटी खा लो, ठंड में भी सर्दी नहीं लगती। शादी-ब्याह, त्योहारों और मेलों में जब पारंपरिक भोजन परोसा जाता है, तो मंडवे की रोटी उसके केंद्र में होती है। यह सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि गढ़वाली अस्मिता का हिस्सा है। मंडवे की रोटी में पोषण और सेहत मंडवे की रोटी केवल पारंपरिक नहीं, बल्कि आज के समय की सुपरफ़ूड है। इसमें कैल्शियम, फाइबर, आयरन और प्रोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है। जो लोग डायबिटीज़, मोटापे या ब्लड प्रेशर की समस्या से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह बेहद फायदेमंद मानी जाती है। गढ़वाली लोग इसे कहते हैं मंडवा खाओ, तन और मन दोनों मजबूत रहो। आज जब लोग फिटनेस और हेल्दी लाइफस्टाइल की ओर बढ़ रहे हैं, तब यह रोटी शहरी लोगों की थाली में भी जगह बना रही है। देहरादून, ऋषिकेश और मसूरी जैसे शहरों के कई कैफे और होटलों में अब “Mandua Roti with Organic Ghee” को खास Traditional Garhwali Dish के रूप में परोसा जा रहा है। यात्रा में मंडवे की रोटी का स्वाद जरूर चखें अगर आप उत्तराखंड यात्रा पर जा रहे हैं, तो स्थानीय स्वाद चखना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव है। पहाड़ों के गांवों में जब धुएं से महकती रसोई में मंडवे की रोटी तवे पर सिकती है, तो उस खुशबू में पूरा गढ़वाल समा जाता है।चाहे आप कैंपिंग कर रहे हों या ट्रेकिंग, स्थानीय घरों में बनी मंडवे की रोटी से बेहतर कुछ नहीं। आप इसे कौड़ियाला, श्रीनगर गढ़वाल, कर्णप्रयाग या जोशीमठ जैसे छोटे शहरों के ढाबों में भी पा सकते हैं। गढ़वाल की यात्रा केवल पहाड़ों को देखने की नहीं, बल्कि वहां की मिट्टी, स्वाद और संस्कृति को महसूस करने की है। और मंडवे की रोटी इस अनुभव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक रोटी की सुगंश में समाया पूरा गढ़वाल गढ़वाली मंडवे की रोटी सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि गढ़वाल की जीवनशैली, इतिहास और संघर्ष की कहानी है। यह बताती है कि कैसे सीमित संसाधनों में भी लोग प्रकृति से संतुलन बनाकर जीना जानते हैं। आज जब फास्ट फूड की संस्कृति तेजी से बढ़ रही है, तब मंडवे की रोटी

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सर्दियों में घूम आइए राजस्थान! जयपुर से जैसलमेर तक इन 5 जगहों की खूबसूरती आपका दिल जीत लेगी!

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सर्दियों का मौसम शुरू होते ही घूमने-फिरने वालों की भीड़ राजस्थान की ओर बढ़ने लगती है। गुलाबी शहर जयपुर से लेकर स्वर्ण नगरी जैसलमेर तक, राजस्थान की धरती सर्दियों में और भी रंगीन और जीवंत हो जाती है। यहां का तापमान नवंबर से फरवरी के बीच 8°C से 25°C तक रहता है, जो पर्यटन के लिए एकदम अनुकूल माना जाता है। अगर आप इस सर्दी में किसी शानदार ट्रिप की योजना बना रहे हैं, तो राजस्थान की ये 5 जगहें आपके सफर को यादगार बना देंगी। जयपुर गुलाबी शहर की शाही झलक राजस्थान की राजधानी जयपुर सर्दियों में बेहद मनमोहक हो जाती है। आमेर किला, सिटी पैलेस, हवा महल और जंतर-मंतर जैसी ऐतिहासिक जगहें यहां की पहचान हैं। सर्दियों में यहां पर्यटक ऊंट सवारी, हॉट एयर बलून राइड और राजस्थानी व्यंजन का आनंद लेते हैं। जनवरी में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल देश-विदेश के साहित्य प्रेमियों को आकर्षित करता है।(गुलाबी शहर जयपुर से लेकर स्वर्ण नगरी जैसलमेर तक, ) पुष्कर आध्यात्म और रोमांच का संगम जयपुर से लगभग 150 किमी दूर स्थित पुष्कर अपने ब्रह्मा मंदिर और खूबसूरत झील के लिए प्रसिद्ध है। नवंबर-दिसंबर में यहां का मौसम बेहद सुखद रहता है और ऊंट मेला भी देखने लायक होता है। इस समय आप यहां मेले का आनंद भी ले सकते हैं। यह भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहां भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। सर्दियों में पुष्कर की गलियां विदेशी पर्यटकों से गुलजार रहती हैं। अजमेर सूफी दरगाह की शांति पुष्कर के पास स्थित अजमेर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिए प्रसिद्ध है। सर्दियों में यहां की हवाएं ठंडी और वातावरण बेहद शांत रहता है। दरगाह शरीफ के अलावा तारागढ़ किला और आना सागर झील भी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र हैं। उदयपुर झीलों का शहर अगर आप सर्दियों में एक रोमांटिक आनंद चाहते हैं, तो उदयपुर आपके लिए परफेक्ट जगह है। पिछोला झील, फतेह सागर झील, सिटी पैलेस और मानसून पैलेस यहां की खूबसूरती को चार चांद लगाते हैं। दिसंबर-जनवरी में यहां का तापमान 10°C के करीब रहता है, जो नौका विहार और पैलेस टूर के लिए बिल्कुल सही समय है। जैसलमेर थार रेगिस्तान की सुनहरी रेत गोल्डन सिटी जैसलमेर सर्दियों में अपनी असली चमक दिखाता है। यहां का जैसलमेर किला, सम सैंड ड्यून्स और डेजर्ट सफारी सैलानियों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। जनवरी-फरवरी में आयोजित डेजर्ट फेस्टिवल में लोक संगीत, ऊंट दौड़ और राजस्थानी संस्कृति का शानदार मिश्रण देखने को मिलता है। सर्दियों में राजस्थान का हर कोना रंग, संस्कृति और इतिहास से सराबोर होता है। चाहे आप शाही महलों की भव्यता देखना चाहें, रेगिस्तान की रेत में एडवेंचर करना चाहें या झीलों के किनारे सुकून पाना राजस्थान सब कुछ एक साथ पेश करता है। तो इस सर्दी बैग पैक कीजिए और जयपुर से जैसलमेर तक का सफर तय कर लीजिए, क्योंकि यहां की खूबसूरती से आपकी नजरें सच में नहीं हटेंगी!

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लखनऊ, नवाबों का शहर बना ‘यूनेस्को क्रिएटिव सिटी’, जानिए क्यों मिला यह सम्मान और क्या होगा असर?

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लखनऊ की रचनात्मक विरासत, जहां तहज़ीब और कला मिलकर रचते हैं इतिहास लखनऊ, जिसे प्यार से ‘नवाबों का शहर’ कहा जाता है, हमेशा से अपनी तहज़ीब, अदब, कला और स्वाद के लिए प्रसिद्ध रहा है। यह शहर केवल इमारतों या व्यंजनों से नहीं, बल्कि अपनी आत्मा में बसी उस संस्कृति से पहचाना जाता है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती गई है। लखनऊ की गलियों में गूंजती शायरी, चौक की चिकन कारी, और महफिलों की गायकी आज भी इसकी जीवंत संस्कृति का प्रमाण हैं। लखनऊ की पहचान उसकी चिकन कारी कढ़ाई, ज़री-ज़रदोज़ी, पत्थर की नक्काशी और अवधी खानपान में झलकती है। यहां की कला केवल शिल्प नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा है। यही रचनात्मकता, यही सांस्कृतिक गहराई आज लखनऊ को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिला चुकी है। यूनेस्को की क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होकर लखनऊ ने यह साबित कर दिया है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम ही असली रचनात्मकता है। यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क क्या है और इसमें लखनऊ क्यों चुना गया? यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क (UNESCO Creative Cities Network – UCCN) एक वैश्विक पहल है जो दुनिया के उन शहरों को जोड़ती है जो कला, संस्कृति, नवाचार और रचनात्मकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट हैं। यह नेटवर्क 2004 में स्थापित हुआ था ताकि दुनिया भर के शहर अपनी रचनात्मक पहचान को साझा कर सकें और एक-दूसरे से सीख सकें। लखनऊ को इस नेटवर्क में Crafts and Folk Art श्रेणी में शामिल किया गया है। इस श्रेणी में वही शहर आते हैं जिनके पास विशिष्ट हस्तशिल्प, पारंपरिक कलाएं और लोक विरासत मौजूद होती है। लखनऊ की चिकन कारी, ज़री कढ़ाई और लोक संगीत ने इसे इस उपाधि के योग्य बनाया। यूनेस्को ने माना कि लखनऊ वह शहर है जिसने अपनी कला को न केवल सहेजा बल्कि आधुनिक दृष्टिकोण से पुनर्जीवित भी किया है। यह सम्मान न सिर्फ लखनऊ की सांस्कृतिक विविधता का, बल्कि भारत की पारंपरिक रचनात्मकता का भी उत्सव है।(यूनेस्को की क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होकर लखनऊ) चिकनकारी, ज़री और अवधी स्वाद लखनऊ को खास बनाती हैं ये परंपराएं लखनऊ की पहचान उसकी चिकन कारी के बिना अधूरी है। यह सुई-धागे की वह जादूगरी है जिसने दुनिया भर में अपनी नफासत से पहचान बनाई है। एक-एक टांका जैसे कला की कहानी कहता है। आज भी चौक और अमीनाबाद की गलियों में महिलाएं अपनी उंगलियों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। इसी तरह लखनऊ की ज़री-ज़रदोज़ी कला भी नवाबी काल से चली आ रही है। यह कढ़ाई शाही परिधान और शाही शान का प्रतीक रही है। और फिर आता है लखनऊ का खाना टुंडे कबाबी, गालौटी कबाब, निहारी, शीरमाल और मखमली कुल्फ़ी जैसी डिशेज़ दुनिया भर में लोगों की पसंद हैं। यह खाना केवल स्वाद नहीं बल्कि नवाबी संस्कृति का विस्तार है। इन्हीं रचनात्मक परंपराओं के कारण लखनऊ को ‘क्रिएटिव सिटी’ का दर्जा मिला है। यह शहर दिखाता है कि कैसे कला और भोजन एक साथ संस्कृति की आत्मा को जीवित रखते हैं। क्रिएटिव सिटी बनने से पर्यटन को मिलेगा नया आयाम लखनऊ का यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होना केवल सम्मान नहीं बल्कि पर्यटन के लिए बड़ा अवसर भी है। अब लखनऊ क्रिएटिव और कल्चरल टूरिज़्म का केंद्र बनेगा। दुनिया भर के पर्यटक अब केवल इमारतें देखने नहीं बल्कि यहां की लोककला, हस्तशिल्प और स्वाद का अनुभव करने आएंगे। चिकनकारी वर्कशॉप्स, अवधी फूड फेस्टिवल्स, शायरी की महफिलें और क्राफ्ट मार्केट्स लखनऊ के पर्यटन को नई दिशा देंगे। सरकार और पर्यटन विभाग अब ऐसे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं जो स्थानीय कारीगरों को वैश्विक बाजार से जोड़ेंगे। इससे न केवल शहर की आर्थिक स्थिति सुधरेगी, बल्कि विदेशी निवेश और रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। लखनऊ अब ‘हेरिटेज टूरिज़्म’ से आगे बढ़कर ‘क्रिएटिव टूरिज़्म’ का नया चेहरा बनने की राह पर है। स्थानीय कलाकारों और अर्थव्यवस्था को मिलेगा वैश्विक मंच यूनेस्को की यह पहचान लखनऊ के कलाकारों और कारीगरों के लिए वरदान साबित होगी। अब उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने हुनर को दिखाने का मौका मिलेगा। चिकनकारी, ज़री, लकड़ी की नक्काशी, मिट्टी के बर्तन, और लोक कला से जुड़े शिल्पकारों को विश्व स्तर पर पहचान मिलेगी। सरकार की नई योजनाओं के तहत क्राफ्ट हब, आर्ट क्लस्टर और हेरिटेज मार्केट्स विकसित किए जाएंगे, जिससे स्थानीय रोजगार में बढ़ोतरी होगी। इससे लखनऊ की लोकल इकॉनमी (Local Economy) को नई ऊर्जा मिलेगी और शहर में युवाओं के लिए रचनात्मक रोजगार के अवसर खुलेंगे। यह पहल न केवल संस्कृति को सहेजने का काम करेगी बल्कि यह साबित करेगी कि कला भी आर्थिक विकास का एक अहम जरिया बन सकती है। पर्यटन पर पड़ेगा बड़ा असर दुनिया भरेगी लखनऊ की सैर भारत के कई शहर पहले ही यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं जयपुर (क्राफ्ट्स एंड फोक आर्ट), वाराणसी (म्यूज़िक), चेन्नई (म्यूज़िक), मुंबई (फिल्म), हैदराबाद (गैस्ट्रोनॉमी), ग्वालियर (म्यूज़िक) और सूरत (डिज़ाइन)। अब लखनऊ का नाम इस सूची में जुड़ गया है और इसकी चमक सबसे अलग है क्योंकि यह शहर केवल कला या संगीत से नहीं बल्कि अपनी संस्कृति, स्वाद, भाषा और तहज़ीब से लोगों के दिलों में बसता है। भविष्य में लखनऊ में अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सवों, कला प्रदर्शनियों और ग्लोबल फूड फेस्टिवल्स का आयोजन किया जा सकेगा। इससे यह शहर न केवल पर्यटकों बल्कि निवेशकों का भी पसंदीदा जगह बनेगी। लखनऊ की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगी कि परंपरा को संभालते हुए आधुनिकता से कैसे जुड़ा जा सकता है। यह शहर अब केवल भारत की पहचान नहीं बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय कला और संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। लखनऊ का यूनेस्को क्रिएटिव सिटी नेटवर्क में शामिल होना सिर्फ एक सम्मान नहीं, बल्कि यह उस विरासत की स्वीकृति है जो सदियों से इस शहर की आत्मा में बसती है। अब लखनऊ अपनी कला, तहज़ीब और स्वाद से पूरी दुनिया को यह बताने जा रहा है कि रचनात्मकता जब परंपरा से मिलती है, तो इतिहास बनता है।

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ठेकुआ चुरा लेगा आपका जी! देसीपन में लिपटी मिठास, ठेकुआ का स्वाद कभी नहीं भूलेंगे आप!

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ठेकुआ बिहार की वो मिठास जो छठ पूजा से दिलों तक पहुंचती है! ठेकुआ की मिठास आह-हा-हा! अभी अभी हम अपना महापर्व छठ मना लौटे हैं, और साथ में घर से कुछ मिठाइयां भी थैले में रखकर लाए होंगे। इन मिठाइयों में एक चीज जरूर होगी ठेकुआ! दरअसल, बिहार की परंपराएं जितनी पुरानी हैं, उतनी ही गहराई उनमें स्वाद और भावनाओं की भी है। इन्हीं परंपराओं में एक नाम आता है ठेकुआ का। यह केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और स्वाद का संगम है। जब भी बिहार का नाम लिया जाता है तो छठ पूजा की रौनक और ठेकुआ की खुशबू मन में बस जाती है। यह पारंपरिक व्यंजन सदियों से बिहार की रसोई का हिस्सा रहा है। हर साल जब छठ पूजा आती है, तब हर घर की रसोई से घी, गुड़ और गेहूं के आटे की महक दूर-दूर तक फैल जाती है। यह वही समय होता है जब ठेकुआ बनाया जाता है एक ऐसा प्रसाद जो न केवल देवता को अर्पित होता है, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरा का प्रतीक भी बन जाता है। आज जब लोग बिहार ठेकुआ रेसिपी या छठ पूजा प्रसाद ठेकुआ गूगल पर खोजते हैं, तो यह केवल स्वाद की नहीं बल्कि उस भावनात्मक विरासत की तलाश होती है, जो हर बिहारी के दिल में बसी है। ठेकुआ की खासियत इसकी सादगी में है। यह न तो ज्यादा सजावट मांगता है, न किसी आधुनिक उपकरण की जरूरत होती है, बस थोड़ी श्रद्धा, धैर्य और मेहनत से यह स्वादिष्ट मिठाई बन जाती है। क्यों हर छठ पूजा ठेकुआ के बिना अधूरी लगती है? छठ पूजा बिहार का सबसे पवित्र पर्व माना जाता है, और इस पूजा का मुख्य प्रसाद है ठेकुआ। यह प्रसाद सूर्य देव और छठी मैया को अर्पित किया जाता है, और इसी वजह से इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है। व्रती महिलाएं इस प्रसाद को बहुत श्रद्धा और सादगी से तैयार करती हैं। ठेकुआ का बनना अपने आप में एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है, क्योंकि इसे बनाते समय किसी तरह की मिलावट या दिखावा नहीं होता। हर सामग्री गेहूं का आटा, गुड़, नारियल और घी पवित्र मानी जाती है और पूरी विधि नियमपूर्वक की जाती है। इसीलिए कहा जाता है कि छठ पूजा प्रसाद ठेकुआ सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि आस्था का रूप है। बिहार की संस्कृति में यह प्रसाद घर की एकता, भक्ति और मातृत्व का प्रतीक भी है। पूजा से पहले ठेकुआ को बनाया जाता है और पूजा के बाद परिवार और समुदाय के लोगों में बांटा जाता है। यह बांटना सिर्फ प्रसाद बांटना नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और अपनापन बांटना होता है। यही कारण है कि जब लोग ठेकुआ कैसे बनाएं या गुड़ का ठेकुआ सर्च करते हैं, तो वे सिर्फ रेसिपी नहीं बल्कि एक परंपरा से जुड़ाव खोज रहे होते हैं।(छठ पूजा बिहार का सबसे पवित्र पर्व माना जाता है) लोककथाओं में ठेकुआ ठेकुआ का इतिहास बिहार के ग्रामीण जीवन जितना ही पुराना है। जब बाजारों और मिठाई की दुकानों का अस्तित्व नहीं था, तब घरों में त्यौहारों और पूजा-पाठ के लिए मिठाइयां खुद बनती थीं। उन दिनों ठेकुआ को त्यौहारों का मुख्य व्यंजन माना जाता था, खासकर छठ पूजा के समय। माना जाता है कि ठेकुआ का नाम ठेकना शब्द से आया है, जिसका अर्थ होता है दबाना क्योंकि इसे हाथों या सांचे से दबाकर आकार दिया जाता है। पुराने समय में ठेकुआ को मिट्टी के चूल्हे पर तलने की परंपरा थी, और उस समय घी से तले गए ठेकुआ की सुगंध पूरे गांव को महका देती थी। यह व्यंजन केवल बिहार ही नहीं बल्कि झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी प्रसिद्ध है। आज भी गांवों में छठ पूजा से कुछ दिन पहले महिलाएं सामूहिक रूप से ठेकुआ बनाती हैं, और यह दृश्य इतना सुंदर होता है कि वह पूरे पर्व का आकर्षण बन जाता है। बिहार का पारंपरिक स्वीट ठेकुआ अब समय के साथ न सिर्फ धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक पहचान बन गया है। यह भोजन और भक्ति का ऐसा संगम है जो पीढ़ियों से बिहार की आत्मा को जीवंत रखे हुए है। ठेकुआ बनाने की प्रक्रिया और पारंपरिक रेसिपी अगर आप जानना चाहते हैं कि ठेकुआ कैसे बनाएं तो यह जानना जरूरी है कि इसे बनाने का हर कदम प्रेम और धैर्य से जुड़ा होता है। सबसे पहले गुड़ को पानी में घोलकर उसका शीरा तैयार किया जाता है। इस शीरे में कोई मिलावट नहीं होती क्योंकि यह व्रत के अनुकूल होना चाहिए। फिर गेहूं का आटा, घी, नारियल का बुरादा और इलायची पाउडर मिलाकर सख्त आटा गूंथा जाता है। यही आटा ठेकुआ की आत्मा है। इस आटे से छोटी-छोटी लोइयां बनाकर हाथ से या लकड़ी के सांचे से दबाया जाता है। फिर इन्हें धीमी आंच पर घी या तेल में तला जाता है। जब यह सुनहरे भूरे रंग के हो जाते हैं, तो ठेकुआ तैयार माना जाता है। यही वह क्षण होता है जब रसोई में पूजा की भावना और स्वाद दोनों एक साथ जीवंत हो जाते हैं। पारंपरिक रूप से कहा जाता है कि गुड़ का ठेकुआ सबसे शुभ माना जाता है क्योंकि गुड़ को शुद्धता और ऊर्जा का प्रतीक समझा जाता है। ठेकुआ तलने की यह विधि जितनी सरल है, उतनी ही पवित्र भी, और यही कारण है कि यह रेसिपी आज लोगों की जबान पर रहती है। ठेकुआ के स्वाद और बनावट का राज ठेकुआ की असली पहचान उसके खस्तेपन और मीठेपन में है। जब इसे सही तापमान पर तल दिया जाता है, तो इसका स्वाद ऐसा बनता है कि खाने वाला हर बार इसकी तारीफ करता है। खस्ता ठेकुआ रेसिपी आज इसलिए इतनी लोकप्रिय है क्योंकि हर कोई उस परफेक्ट कुरकुरेपन को पाना चाहता है। इसमें न ज्यादा घी डालना चाहिए, न बहुत कम। मध्यम आंच पर धीरे-धीरे तला गया ठेकुआ बाहर से खस्ता और अंदर से नरम रहता है। गुड़ के कारण इसमें हल्की-सी कारमेलाइज्ड मिठास आती है जो इसे अलग पहचान देती है। इसकी बनावट ऐसी होती है कि इसे कई दिनों तक रखा जा सकता है और स्वाद वैसा ही बना रहता है। यही कारण है कि इसे यात्रा में ले जाना आसान होता है। बिहार के लोग इसे अपने रिश्तेदारों के घर उपहार के रूप में

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जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल कुमाऊं की गोद में बसा रोमांच और प्राकृतिक सौंदर्य का बेजोड़ मुजस्समा!

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जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल का परिचय जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल उत्तराखंड की हरी-भरी वादियों में स्थित किसी नायाब हीरे से कम नहीं! साथ ही प्रकृति प्रेमियों और एडवेंचर के शौकीनों के लिए वास्तव में किसी जन्नत से कम नहीं है। नैनीताल जिले के रामनगर क्षेत्र में स्थित यह झरना जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के पास बहता है। करीब 60 फीट ऊंचाई से गिरता यह झरना चारों ओर फैले सघन साल, सागौन और बांस के पेड़ों से घिरा हुआ है, जो इसे एक मनमोहक दृश्य प्रदान करता है। पानी का यह झरना न सिर्फ अपनी ऊंचाई और प्रवाह के कारण प्रसिद्ध है, बल्कि यहां की शांति, हरियाली और ताजगी भरी हवा से मन एकदम तरोताज़ा हो जाता है। मात्र 100 रुपए की टिकिट में आप देख पाएंगे एक बहुत ही बेहतरीन जगह को। दीदार कर पाएंगे प्रकृति के अद्भुत नमूने का। जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल को स्थानीय लोग कॉर्बेट फॉल के नाम से भी जानते हैं। यह जगह हर मौसम में सुंदर दिखाई देती है, परंतु मानसून और सर्दियों के समय यहां की सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है। बारिश के बाद जब आसपास की हरियाली और भी गहरी हो जाती है और झरने का पानी तेज़ी से गिरता है, तो यह दृश्य फोटोग्राफरों और नेचर लवर्स के लिए किसी सपने से कम नहीं लगता। यहां का माहौल बेहद शांतिपूर्ण है। पक्षियों की चहचहाहट, झरने की गूंज और ठंडी हवा मिलकर ऐसा प्यारा दृश्य बनाते हैं कि व्यक्ति खुद को प्रकृति की गोद में खोया हुआ महसूस करता है।(जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल को स्थानीय लोग कॉर्बेट फॉल के नाम से भी जानते हैं। ) यही कारण है कि यहां स्थानीय पर्यटकों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले सैलानियों की भी भीड़ देखने को मिलती है। यदि आप भी शोर-शराबे से दूर, कुछ पल प्रकृति के साथ बिताना चाहते हैं, तो जिम कॉर्बेट वॉटर फॉल आपके लिए एक आदर्श स्थान है। यहां आप झरने के पास बैठकर प्रकृति की ध्वनि को महसूस कर सकते हैं और कुछ देर के लिए शहर की भागदौड़ से खुद को मुक्त कर सकते हैं। जिम कॉर्बेट वॉटर फॉल तक कैसे पहुंचे? जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल तक पहुंचना उतना ही आसान है जितना कि इसे खोजने का आनंद। यह झरना रामनगर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के मुख्य द्वार से लगभग 3 किलोमीटर आगे है। अगर आप दिल्ली से यात्रा कर रहे हैं, तो यहां तक का सफर करीब 260 किलोमीटर का है, जिसे आप सड़क, रेल या निजी वाहन से तय कर सकते हैं। सड़क मार्ग से पहुंचने का तरीका दिल्ली से नैनीताल रोड के माध्यम से रामनगर पहुंचा जा सकता है। दिल्ली, गाजियाबाद, मुरादाबाद, काशीपुर और रामनगर का रास्ता सबसे आसान है। रामनगर से आगे कॉर्बेट फॉल की ओर जाने वाला मार्ग घने जंगलों से होकर गुजरता है। इस रास्ते में आपको हरियाली, शांत हवा और कभी-कभी जंगली जानवरों की झलक भी मिल सकती है। रेल मार्ग से यात्रा रामनगर रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी स्टेशन है, जहां से आपको टैक्सी या लोकल बस आसानी से मिल जाती है। दिल्ली, लखनऊ और हरिद्वार से रामनगर के लिए रोजाना ट्रेनें चलती हैं। हवाई जहाज से यात्रा यदि आप हवाई यात्रा करना चाहते हैं तो पंतनगर एयरपोर्ट निकटतम हवाई अड्डा है, जो लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर है। एयरपोर्ट से टैक्सी या बस के माध्यम से आप कॉर्बेट फॉल तक पहुंच सकते हैं। कॉर्बेट फॉल तक पहुंचने के लिए सड़क के अंत में लगभग 2 किलोमीटर का पैदल रास्ता तय करना होता है। यह रास्ता बेहद रोमांचक और खूबसूरत है घने जंगलों के बीच से गुजरता यह मार्ग आपको ट्रेकिंग का आनंद देता है। रास्ते में पक्षियों की आवाज़ें और ठंडी हवा का एहसास आपकी थकान मिटा देता है। यहां की प्राकृतिक खूबसूरती जिम कॉर्बेट वॉटर फॉल की सबसे बड़ी खूबी है इसका प्राकृतिक अंदाज। यहां हर तरफ हरियाली है ऊंचे साल के पेड़, लहराते बांस के झुरमुट और चारों ओर फैली अनेक वनस्पतियां इस जगह को जीवंत बना देती हैं। झरना एक पत्थरीली चट्टान से नीचे गिरता है और उसका पानी नीचे छोटे तालाब में इकट्ठा होता है, जहां सैलानी पैर डुबोकर घंटों बैठते हैं। सुबह के समय जब सूरज की पहली किरणें झरने की बूंदों पर पड़ती हैं, तो उनमें इंद्रधनुष जैसा दृश्य बन जाता है। यह नजारा किसी पोस्ट कार्ड की तस्वीर जैसा खूबसूरत लगता है। यहां का वातावरण इतना स्वच्छ है और मजेदार है कि आपको सिर्फ झरने की गूंज और पक्षियों की आवाज़ें ही सुनाई देती हैं। कॉर्बेट फॉल फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए भी स्वर्ग समान जगह है। यहां का हर कोना एक नया एंगल और एक नया फ्रेम प्रदान करता है। अगर आप प्रकृति के करीब रहना पसंद करते हैं, तो यहां कुछ घंटे बिताना आपके लिए यादगार साबित होगा। एडवेंचर और गतिविधियां जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल सिर्फ शांति का प्रतीक नहीं, बल्कि रोमांच का ठिकाना भी है। यहां आने वाले सैलानी ट्रेकिंग, बर्ड वॉचिंग, नेचर वॉक और पिकनिक जैसी कई एक्टिविटीज का आनंद ले सकते हैं। झरने तक पहुंचने का रास्ता खुद एक छोटा ट्रेक है, जो घने जंगलों से होकर गुजरता है। इस दौरान आपको विभिन्न प्रजातियों के पक्षी और कभी-कभी हिरण या बंदरों की झलक भी देखने को मिल सकती है। एडवेंचर प्रेमियों के लिए यहां की रात में कैम्पिंग का अनुभव बेहद खास होता है। तारों से सजा आसमान, ठंडी हवा और झरने की आवाज़ एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो आत्मा तक सुकून पहुंचाता है। हालांकि ध्यान रहे कि जंगल के नियमों के अनुसार ही कैम्पिंग करें और किसी भी तरह की हानि न पहुंचाएं। यहां आप स्थानीय गाइड की मदद से नेचर ट्रेल्स पर जा सकते हैं, जहां जानवरों की झलक और वनस्पतियों का ज्ञान मिलता है। अब सवाल यह है कि रुकें कहां? जिम कॉर्बेट वॉटरफॉल घूमने आने वाले सैलानियों के लिए रहने की कोई कमी नहीं है। यहां हर बजट के हिसाब से होटल, रिजोर्ट्स और होमस्टे उपलब्ध हैं। रामनगर में स्थित रिजोर्ट्स और कॉटेज में आप आराम से ठहर सकते हैं। यदि आप लक्ज़री अनुभव चाहते हैं, तो जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के आसपास कई प्रीमियम रिजोर्ट्स उपलब्ध हैं जो स्पा, पूल और जंगल सफारी जैसी सुविधाएं