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नवंबर में घूमने के लिए भारत के 5 ऑफबीट डेस्टिनेशन भीड़ से दूर और सुकून के बेहद करीब..

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क्यों नवंबर ऑफबीट ट्रैवल के लिए सबसे बेहतरीन महीना है? नवंबर का महीना भारत में यात्रा करने के लिए किसी वरदान से कम नहीं होता। मौसम एकदम सुहावना, हवा में हल्की ठंडक, और आकाश बिल्कुल साफ। ये तीन चीजें हर यात्री को पहाड़ों, घाटियों और अनजाने कोनों में खींच ले जाती हैं। इस समय न ज्यादा गर्मी है, न भारी सर्दी न ही बरसात की परेशानी और न ही भीड़ की मारामारी। यही वजह है कि नवंबर उन यात्रियों के लिए सबसे सही महीना है, जिनका मन भीड़ से दूर कहीं शांत, सुंदर और अनोखी जगहों पर जाने का होता है। भारत में कई ऐसे ऑफबीट डेस्टिनेशन हैं जो अभी तक आम पर्यटकों की नज़र से बचे हुए हैं, लेकिन अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, सांस्कृतिक गहराई और शांत वातावरण के कारण आज के समय में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे हैं। माजुली, असम दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप अगर आप सच में एक अनोखी जगह देखना चाहते हैं, तो ब्रह्मपुत्र नदी में बसे माजुली द्वीप से बेहतर विकल्प नहीं। यह दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप है और नवंबर में इसका मौसम बिलकुल परफेक्ट होता है। धूप हल्की रहती है, हवा में ठंडक होती है और नदी के किनारे फैला हरा-भरा मैदान मन को तृप्त कर देता है। माजुली सिर्फ एक प्राकृतिक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित संस्कृति का घर है। यहां सत्र कहलाने वाले वैष्णव मठ हैं, जहां असम की लोक कला, नृत्य, संगीत और हस्तशिल्प आज भी अपनी असली पहचान के साथ जीवित हैं। द्वीप के लोग बेहद सरल, मिलनसार और प्रकृति से जुड़े हुए हैं। उनकी जीवनशैली आपको एक नए नजरिए से जीना सिखाती है। नवंबर में ब्रह्मपुत्र नदी शांत रहती है और नाव की यात्रा बेहद रोमांचक हो सकती है। धान के खेत, गांव की कच्ची पगडंडियां, बांस के घर और शाम को जलते चूल्हों की महक एक सुखद अनुभव देती है। अगर आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं, तो माजुली आपके लिए बहुत अच्छी जगह है। जुक्तिन, पश्चिम बंगाल हिमालय की गोद में छिपा एक ठिकाना दार्जिलिंग और कलिम्पोंग की भीड़ से दूर एक छोटी-सी, खूबसूरत और बेहद शांत जगह है जुक्तिन। यह पश्चिम बंगाल का ऐसा ऑफबीट डेस्टिनेशनहै। जहां पहुंचकर आपको ऐसा महसूस होगा कि आप किसी शांत हिमालयी गांव में खो गए हैं। जुक्तिन के आसपास चीड़ के जंगल, धुंध से ढकी पहाड़ियां, छोटी-छोटी नदियां और लकड़ी के घर एक अलग ही दुनिया रचते हैं। नवंबर में यहां से कंचनजंगा का नज़ारा एकदम साफ दिखाई देता है। सुबह जैसे ही सूरज की पहली किरण पहाड़ियों पर पड़ती है, पूरा आसमान सुनहरे रंग में चमक उठता है। यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है शांति। न शोर, न भीड़, न ट्रैफिक। सिर्फ हवा की आवाज़ और प्रकृति का संगीत।(अगर आप सच में एक अनोखी जगह देखना चाहते हैं, तो ब्रह्मपुत्र नदी में बसे माजुली द्वीप से बेहतर विकल्प नहीं।) बेमटी, उत्तराखंड बादलों के देश में बसा एक स्वर्ग अगर आप ऐसी जगह की तलाश में हैं जहां पहाड़ आपकी खिड़की तक आकर झांकते हों, और जहां बादल आपके गालों को छूकर निकल जाते हों, तो उत्तराखंड का बेमटी सबसे शानदार जगह है। यह अभी भी आम यात्रियों की नजरों से दूर है और इसलिए इसका असली रूप सुरक्षित है। नवंबर में बेमटी की घाटियां हरे-भरे घास के मैदानों में बदल जाती हैं और हवा में हल्की सी ठंड सुकून देती है। यहां की सबसे बड़ी खूबसूरती है रात का आसमान। बेमटी को भारत के सबसे अच्छे स्टारगेज़िंग डेस्टिनेशन में गिना जाता है। साफ आसमान में अनगिनत तारे, आकाशगंगा का हॉलीवुड जैसा दृश्य और चारों तरफ सन्नाटा यह अनुभव किसी फिल्म से कम नहीं लगता। सूर्योदय के समय बेमटी की पहाड़ियों पर पड़ने वाली सुनहरी रोशनी देखने लायक होती है। यहां गांव के लोग प्राकृतिक खेती करते हैं और ताज़ा भोजन इतना स्वादिष्ट होता है कि आपको लगता है कि आप प्रकृति का शुद्ध स्वाद चख रहे हैं। थेकाड़ी, केरल जंगल, मसाले और रोमांच का परफेक्ट ठिकाना अगर आप पहाड़ों और जंगल दोनों का आनंद लेना चाहते हैं, तो केरल का थेकाड़ी नवंबर में सबसे खूबसूरत हो जाता है। पेरीयार टाइगर रिज़र्व यहां का मुख्य आकर्षण है, जहां हाथी, हिरण, बाइसन और कई दुर्लभ पक्षी भी देखने को मिलते हैं। नवंबर में जंगल की हरियाली अपने चरम पर रहती है, और पेरीयार झील में बोट सफारी एक अच्छा अनुभव बन जाती है। झील के बीच से जाते हुए अचानक किनारे खड़े हाथियों का झुंड दिखाई दे जाना किसी डॉक्यूमेंट्री जैसा लगता है। थेकाड़ी अपने मसालों के बागानों के लिए भी मशहूर है इलायची, काली मिर्च, दालचीनी और जायफल की खुशबू हवा में हमेशा घुली रहती है। तवांग, अरुणाचल प्रदेश बादलों का शहर अगर आप नवंबर में बर्फ की हल्की परत देखना चाहते हैं और एक ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहां बादल जमीन को छूते हों, तो तवांग आपका स्वागत करने के लिए तैयार है। यह नॉर्थ ईस्ट की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। तवांग का मठ भारत के सबसे पुराने बौद्ध मठों में से है और इसकी शांति आत्मा को छू जाती है। नवंबर में यहां का मौसम साफ-सुथरा होता है और बर्फ की हल्की परत पहाड़ियों को और मनमोहक बना देती है। सेला पास, बुमला पास, झीलें और तवांग शहर का रंगीन बाज़ार ये सब मिलकर यात्रा को खास बना देते हैं। यहां की तिब्बती संस्कृति, भोजन और लोक कला बहुत ही अनोखी और देखने लायक है। नवंबर में ऑफबीट यात्रा क्यों जरूरी है? नवंबर में ऑफबीट जगहों पर जाना सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि एक अंदरूनी सफर भी होता है। यहां के शांत पहाड़, अनछुई झीलें, सुंदर गांव और धीमी रफ्तार वाला जीवन तनाव को मिटा देता है। आप खुद को शहर की भागदौड़ से बाहर, प्रकृति की गोद में पाते हैं। ऑफबीट डेस्टिनेशन न सिर्फ सस्ते होते हैं, बल्कि आपको एक अलग तरह की आज़ादी देते हैं अपना समय खुद तय करने की, सुकून से टहलने की, और एक पवित्र तरह से सांस लेने की। नवंबर का मौसम इस अनुभव को और भी सुंदर बना देता है। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ़ से 5 यात्रा सुझाव 1 भीड़ से बचने के लिए सुबह-सुबह यात्रा शुरू करें। 2 ऑफबीट जगहों पर

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शालीमार बाग़ कश्मीर की धरती पर मुगल मोहब्बत का बेशकीमती नग़मा

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शालीमार बाग़ क्या है? कश्मीर को धरती की जन्नत कहा जाता है, और इस जन्नत का सबसे खूबसूरत मोती है शालीमार बाग़। श्रीनगर के डल झील किनारे बसा यह बाग़ मुगल बादशाह जहांगीर ने 1619 में अपनी बेगम नूरजहां को खुश करने के लिए बनवाया था। कहते हैं कि जहांगीर और नूरजहां के प्रेम की असली खुशबू इसी बाग़ में बसती है। यहां घूमते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि आप किसी फिल्मी दुनिया में चल रहे हों। हल्की हवा, लाल चिनार के पेड़, बहते पानी की मधुर आवाज़ और दूर खड़े पहाड़ जो धुंध में लिपटे रहते हैं, आपकी हैरत का कारण बन सकते हैं। क्योंकि यह पहली बार होगा जब आप कोई इतनी खूबसूरत जगह का दीदार कर रहे होंगे। शालीमार बाग़ सिर्फ एक गार्डन नहीं है, बल्कि मुगल इंजीनियरिंग और कश्मीर की प्रकृति का नायाब संगम है। इस बाग़ का हर कोना जैसे कोई कहानी सुनाता है, यकीन मानिए आप एक बार आने के बाद, बार-बार आने की जिद करोगे! पहाड़ियों का सुकून, फूलों की खुशबू और फव्वारों की ताल एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो दिल को बिल्कुल शिथिल कर देता है। करीब 31 एकड़ में फैला यह बाग़ श्रीनगर पर्यटन का सबसे खास तोहफा है। मुगल काल की मोहब्बत, कला और शान की दास्तान शालीमार बाग़ का इतिहास बहुत ही दिलचस्प है। यह बाग़ शुरुआत में कश्मीर के राजा प्रवरसेन ने तीसरी शताब्दी में बनाया था, जिसे बाद में मुगल बादशाह जहांगीर ने अपने अंदाज़ में बदलकर नया रूप दिया। जहांगीर और नूरजहां अक्सर कश्मीर आते थे और कहते हैं कि यह बाग़ उनका पसंदीदा ठिकाना था, एक ऐसी जगह जहां बादशाह अपनी सारी चिंताएं भूलकर बस प्रकृति का आनंद लेते थे। वैसे तो बाग़ तीन हिस्सों में बांटा गया था! जिनमें आम जनता के लिए, खास मेहमानों के लिए, और सबसे ऊपर दीवान-ए-खास जो सिर्फ बादशाह और बेगम के लिए था। यह ऊपरी हिस्सा वह जगह थी जहां जहांगीर अक्सर बैठकर कश्मीर की वादियों को निहारते थे। यहां बहने वाले फव्वारों का पानी उस समय के प्राकृतिक गुरुत्वाकर्षण सिस्टम से चलता था, जिसे मुगल इंजीनियरिंग का सबसे कमाल का उदाहरण माना जाता है। पतझड़ के मौसम में जब चिनार के पत्ते सुर्ख लाल हो जाते हैं, तो पूरा बाग़ ऐसा लगता है जैसे किसी ने लाल मखमल की चादर ओढ़ा दी हो। शालीमार का इतिहास केवल राजाओं का इतिहास नहीं है, यह कला, प्रेम, संस्कृति और प्रकृति की अनूठी विरासत की कहानी है। शालीमार बाग़ में क्या खास है? शालीमार बाग़ की खूबसूरती इसकी बनावट में छिपी है। यह एक तीन स्तरीय मुगल गार्डन है। नीचे से ऊपर जाते हुए हर स्तर का रंग और रूप बदल जाता है। बीच से बहती पानी की नहरें और दोनों ओर फव्वारे पूरे बाग़ को एक संगीत में बदल देते हैं। पानी की आवाज़ और पेड़ों की सरसराहट मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि आपको खुद में एक अजीब-सी शांति महसूस होती है। चिनार के पेड़ यह बाग़ की सबसे बड़ी पहचान हैं। ये ऊंचे-ऊंचे पेड़ पतझड़ में लाल और सुनहरी रोशनी से चमकते हैं और गर्मियों में गहरी छांह देते हैं। जैसा की मैनें पहले बताया दीवान-ए-खास बाग़ का सबसे ऊपरी और सबसे खूबसूरत हिस्सा है। जहां से डल झील, पहाड़ और श्रीनगर की वादियों का नज़ारा एक साथ दिखाई देता है जो आपको रोमांच से भर देता है। लंबे वॉकवे और मुगल शैली के मेहराब ये इस बाग़ को एक शाही अंदाज़ देते हैं। एक और बात बारिश के बाद बाग़ का हर पत्थर चमकने लगता है और पानी में बने प्रतिबिंब किसी सपने जैसे दिखते हैं। शालीमार बाग़ कहां है और कैसे पहुंचे? शालीमार बाग़, श्रीनगर के डल झील के पूर्वी किनारे पर स्थित है। यह शहर के सेंटर से लगभग 15 किमी की दूरी पर है। श्रीनगर एयरपोर्ट से टैक्सी आसानी से मिल जाती है जो सीधे बाग़ तक ले आती है। डल झील के आसपास रुकने वाले लोगों के लिए शालीमार तक पहुंचना और आसान हो जाता है ऑटो, टैक्सी और यहां तक कि लोकल कैब भी बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। बहुत से यात्री पहले डल झील की शिकारा राइड करते हैं और फिर सड़क से शालीमार बाग़ पहुंचते हैं। यह सफर इतना खूबसूरत होता है कि रास्ता भी एक यादगार अनुभव बन जाता है। खैर जाएंगे तो अनुभव भी पाएंगे! तो बैग पैक कीजिए और आइए इन खूबसूरत वादियों में आपका स्वागत है।(कश्मीर को धरती की जन्नत कहा जाता है,) आयें तो कहां रुके? शालीमार बाग़ घूमने के लिए आए हैं तो जान लीजिए! सबसे अच्छे ठहरने की जगहें हैं डल झील के हाउस बोट्स। ये हाउसबोट्स सिर्फ होटल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव हैं। लकड़ी की नक्काशी, जगमगाती लाइटें, शांत पानी और पहाड़ों का नज़ारा। जैसे आप सुबह आंख खोलते हैं और पानी पर चमकती धूप देखते हैं तो इससे बेहतर अनुभव शायद आप कहीं और ले पाएं। सच में यह अनुभव आपको किसी जादू जैसा लगेगा। इसके अलावा शालीमार रोड, निशात बाग़ और बुलवार्ड रोड पर कई बजट और लक्ज़री होटल हैं। दरअसल, श्रीनगर में रहने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप अपनी सुबह झील के किनारे चाय से शुरू कर सकते हैं और शामें मुगल गार्डन में टहलते हुए बिता सकते हैं। खैर, फैसला तो आपके हाथों में ही है। आसपास घूमने की जगहें सबसे पहले तो बता दूं! शालीमार बाग़ के आसपास घूमने के लिए बहुत कुछ है। निशात बाग़ शालीमार से कुछ ही दूरी पर है, यह गार्डन ऑफ़ ब्लिस के नाम से मशहूर भी है। यहां आप घूमने आ सकते हैं अच्छी जगह है मन को मोहित करने वाली है, चश्मे-शाही यहां का प्राकृतिक झरना पीने में बेहद हल्का और स्वादिष्ट होता है, चाहें तो आप इसका भी दीदार कर सकते हैं। हरि पर्वत एक ऐतिहासिक किला और मंदिरों का अद्भुत संगम है जो आपकी यात्रा में चार चांद लगाने का काम करता है। इसके अलावा आप आ सकते हैं डल झील, कश्मीर का दिल, जहां शिकारा की सवारी हर यात्री का सपना होती है। आखिर में कहूंगा की आप परी महल देखिए जो पहाड़ पर बना सात-स्तरीय बाग़ है, और यही सूरज ढलने का सबसे खूबसूरत पॉइंट होता है।

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हजारीबाग – झारखंड की शांत वादियों, झीलों और जंगलों से भरे एक खूबसूरत शहर का सफर

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हजारीबाग का इतिहास–बगीचों, संस्कृति और वीरता की धरती हजारीबाग का इतिहास प्रकृति, संस्कृति और संघर्ष की कहानियों से पूरी तरह भरा हुआ है। इस क्षेत्र का नाम हजारीबाग दो शब्दों से मिलकर बना है हज़ार और बाग़, यानी हजारों बाग-बगीचों की धरती। प्राचीन काल में यह इलाका मगध साम्राज्य और बाद में नागवंशी राजाओं के नियंत्रण में रहा है। घने जंगल और ऊंची पहाड़ियां इसे हमेशा से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते रहे। ब्रिटिश काल में हजारीबाग एक प्रमुख सैन्य छावनी और प्रशासनिक केंद्र बना, जहां से चुटूपालू घाटी और आसपास के जनजातीय क्षेत्रों पर नियंत्रण रखा जाता था। आजादी के आंदोलन में भी हजारीबाग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यहां कई स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष भी किया। समय के साथ हजारीबाग एक शांत, प्राकृतिक और सांस्कृतिक स्थल के रूप में विकसित हुआ। यहां की झीलें, म्यूरल पेंटिंग, जंगल और आदिवासी कला इस इतिहास को आज भी ज़िंदा रखती हैं। हजारीबाग की पहली झलक में मोहित हो जाएंगे आप! झारखंड का हजारीबाग एक ऐसी जगह है जिसे देखने के बाद हर यात्री को लगता है कि वह किसी छुपे हुए समुद्री टापू पर पहुंच गया है। यहां की हवा में एक अलग ही फ़ील है। हरे-भरे जंगल, साफ-सुथरा मौसम, शांत झीलें और पहाड़ों से घिरी घाटियां इस जगह को बेहद खास बनाती हैं। हजारीबाग की खासियत यह है कि यह न तो ज़्यादा भीड़ वाला है और न ही बहुत बिज़ी। यह उन यात्रियों के लिए परफेक्ट प्लेस है, जो शहर के शोर से दूर कुछ समय प्रकृति के बीच बिताना चाहते हैं। जैसे ही आप यहां पहुंचते हैं, सबसे पहले महसूस होता है कि हवा कितनी साफ है और आसमान कितना नीला। सड़कें पेड़ों से घिरी हुई हैं और दोनों तरफ हरियाली देखकर दिल खुश हो जाता है। हजारीबाग में घूमते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि यह शहर नहीं, बल्कि एक मां की गोद है! जहां आपको आराम भी मिलता है, प्यार भी।   हजारीबाग नेशनल पार्क जंगल और जीवन की झलक अगर आप नेचर और वाइल्ड लाइफ प्रेमी हैं, तो हजारीबाग नेशनल पार्क आपकी ट्रैवल लिस्ट में सबसे ऊपर होना चाहिए। यह पार्क हजारीबाग की शान है। यहां का जंगल घना और गहरा है, जहां सूरज की किरणें भी पत्तों के बीच से छनकर जमीन पर पड़ती हैं। पार्क में घुसते ही एक अलग ही सन्नाटा मिलता है पक्षियों की आवाजें, हवा की सरसराहट और दूर से आती किसी जानवर की गर्जना मन को रोमांच से भर देती है। यहां टाइगर, सांभर, नीलगाय, भालू, लकड़बग्घा और कई तरह के दुर्लभ पक्षी मिलते हैं। हालांकि यह पार्क अब “हजारीबाग वाइल्ड लाइफ सेंचुरी” के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसकी खूबसूरती बिल्कुल वैसी ही है। सुबह-सुबह सफारी पर निकलना एक अनोखा अनुभव देता है। हवा ठंडी होती है, पेड़ों पर ओस जमी होती है और चारों तरफ धुंध का हल्का पर्दा फैलता है, जिससे जंगल किसी रहस्यमयी फिल्म जैसा लगता है।(यहां कई स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष भी किया।) कैनारी हिल की ऊंचाइयों से हजारीबाग का खूबसूरत नज़ारा हजारीबाग आने वाले हर यात्री को कैनारी हिल जरूर जाना चाहिए। यहां ऊपर पहुंचने पर जो नज़ारा मिलता है, वह पूरे सफर की थकान मिटा देता है। सड़क थोड़ी घुमावदार है लेकिन बेहद खूबसूरत। दोनों तरफ पेड़ों की कतारें हैं और जैसे-जैसे आप ऊपर बढ़ते जाते हैं, हवाएं ठंडी होती जाती हैं। कैनारी हिल टॉप पर पहुंचकर ऐसा लगता है जैसे पूरा हजारीबाग आपकी आंखों के सामने खुला पड़ा हो। पहाड़ों की रेखाएं, दूर-दूर तक फैली हरियाली, शहर की छोटी-छोटी इमारतें और खुला आसमान यह सब मिलकर तस्वीर जैसा खूबसूरत दृश्य बनाते हैं। यहां खड़े होकर फोटो खींचना हर यात्री का फेवरेट काम होता है। पहाड़ की चोटी पर बैठकर कुछ देर हवा में सांस लेना खुद को रीसेट करने जैसा है। यह जगह ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए भी शानदार है। यहां का शांत माहौल मन को पूरी तरह से रिलैक्स कर देता है और यही वजह है कि हजारीबाग का नाम आते ही लोग कैनारी हिल को जरूर याद करते हैं। झील की शाम, ठंडी हवा और पानी के किनारे का आनंद हजारीबाग झील यहां की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। शहर के बीच में बनी यह झील हर किसी को अपनी तरफ खींच लेती है। दिन हो या शाम यहां का माहौल हमेशा सुहाना रहता है। झील के किनारे पत्थर की बेंचें बनी हैं, जहां बैठकर लोग धूप का मजा लेते हैं। शाम ढलते ही यहां काफ़ी भीड़ जम जाती है। जोड़े हाथ में हाथ डालकर टहलते हैं, बच्चे दौड़ते-फिरते हैं, और बुज़ुर्ग शांतिपूर्वक हवा का आनंद लेते हैं। झील में बोटिंग करना भी हजारीबाग की सबसे पसंदीदा एक्सपीरियंस में से एक है। पानी में नाव की धीमी-धीमी आवाज और आसमान में उड़ते पक्षी एक खूबसूरत माहौल बना देते हैं। झील के आसपास बने छोटे-छोटे चाय के स्टॉल और कॉर्न बेचने वाले दुकानदार इस शाम को और भी खास बना देते हैं। गरम चाय हाथ में लेकर झील के किनारे बैठना और दूर तक फैले पानी को देखना यह एक ऐसा शांत अनुभव है जिसे शब्दों में पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता। हजारीबाग की संस्कृति में छिपे हैं जीवन के राज! हजारीबाग सिर्फ प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति और लोगों की सादगी के लिए भी जाना जाता है। यह शहर कई आदिवासी परंपराओं और लोक संगीत से भरा है। यहां के लोग बेहद दिलदार और सरल होते हैं। यहां की बोली में एक अलग मिठास है धीमी, सहज और अपनेपन से भरी हुई। हजारीबाग की कुटुम्ब कला tribal art और यहां की पारंपरिक पेंटिंग “सोहराय” दुनिया भर में मशहूर है। दीवारों पर बने इन चित्रों में प्रकृति, जानवर, खेती और लोकजीवन का सुंदर वर्णन मिलता है। भोजन की बात करें तो यहां की देसी थाली में चावल, दाल, साग, ढेंकिया, तिल का खाना, माड़ और थोड़ा-सा लाल मिर्च का स्वाद एकदम घर जैसा एहसास देता है। सफर की यादें जो बरसों दिल में रहती हैं हजारीबाग का सफर ऐसा होता है जिसे भूलना मुश्किल है। चाहे आप सोलो ट्रैवलर हों, फैमिली के साथ आए हों या दोस्तों के साथ। यह जगह हर किसी को अपना बना लेती है।

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नवंबर में पहाड़ों की सैर हल्की बर्फबारी और ट्रेकिंग का असली मज़ा तभी ले पाएंगे! जब जान लेंगे यह ट्रैवल टिप्स..

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नवंबर का महीना और बर्फ का शुरुआती दस्तूर नवंबर भारत में पहाड़ों की सैर के लिए सबसे बेहतरीन महीनों में से एक माना जाता है। इस वक्त गर्मी पूरी तरह खत्म हो जाती है और हल्की सर्दी हवा में ताजगी ले आती है। दिन में कोमल धूप मिलती है और सुबह–शाम हल्की ठंड शरीर और दिमाग को रिलैक्स कर देती है। नवंबर में पहाड़ों पर धुंध तैरती है, आसमान साफ रहता है और कई जगहों पर शुरुआती बर्फ की हल्की परत भी दिखने लगती है। इस महीने में हिल स्टेशनों की भीड़ भी कम होती है, जिससे यात्रा आरामदायक बनती है। पर्यटक बिना जल्दबाज़ी के घूम सकते हैं, फोटोग्राफी कर सकते हैं और नेचर के असली रंगों को महसूस कर सकते हैं। कैफे, छोटे गेस्टहाउस, लोकल ढाबे और गांव की सादगी सब मिलकर नवंबर का महीना खास बना देते हैं। पहाड़ों की सुगंध और ठंडी हवा मिलकर ऐसा माहौल बनाती है कि कोई भी यहां कुछ दिन बिताकर खुद को तरोताज़ा कर सकता है। नवंबर में पहाड़ क्यों मोहते हैं? नवंबर का असली जादू उसके मौसम में छुपा है। बारिश पूरी तरह खत्म हो जाती है, जिससे रास्ते साफ हो जाते हैं और हवा में नमी कम हो जाती है। तापमान 5°C से 15°C के बीच रहता है, जो घूमने और ट्रेकिंग के लिए परफेक्ट माना जाता है। पहाड़ों पर धूप हल्की और सुकून देने वाली होती है। यह न तेज होती है और न जलन वाली। सुबह की धुंध और शाम की गुलाबी ठंड मन को बेहद खुश कर देती है। नवंबर में पहाड़ों के पेड़ अपने असली हरे रंग में दिखते हैं। साफ आसमान के कारण दूर की चोटियां भी आसानी से दिखाई देती हैं। यह महीना नेचर फोटोग्राफी के लिए भी सबसे अच्छा माना जाता है। कम भीड़ होने की वजह से सुनसान वादियां, शांत सड़कें और धीमी–धीमी चलती हवा एक अनोखा अनुभव देती है। ट्रैवलर्स को यहां शोर-शराबे से दूर असली सुकून मिलता है। यही वजह है कि नवंबर पहाड़ प्रेमियों का पसंदीदा महीना बन गया है।(कैफे, छोटे गेस्टहाउस, लोकल ढाबे और गांव की सादगी सब मिलकर नवंबर का महीना खास बना देते हैं।) हल्की बर्फबारी का आनंद लें नवंबर का सबसे खूबसूरत हिस्सा है हल्की बर्फबारी का अनुभव। यह न तो बहुत भारी होती है और न ही खतरनाक। शुरुआती बर्फबारी बेहद रोमांटिक और सुकून देने वाली होती है। मनाली की सोलंग वैली, अटल टनल के बाद के इलाके, औली, गुलमर्ग, सोनमर्ग, उत्तर सिक्किम के लाचुंग–युमथांग–जीरो पॉइंट और उत्तराखंड के केदारकांठा बेस कैंप में नवंबर से बर्फ गिरना शुरू हो जाता है। पहाड़ों की चोटियों पर सफेद परत, पेड़ों पर हल्की बर्फ और जमीन पर चमकते बर्फ के कण एक सपनों जैसा दृश्य बनाते हैं। इस समय ली गई तस्वीरें बेहद शानदार आती हैं। बर्फ गिरते हुए पहाड़ी गांवों में बैठकर अदरक वाली चाय पीने का मजा ही कुछ और है। ट्रेकिंग करते हुए जब इंसान पहली बार बर्फ को हाथ में पकड़ता है तो वह पल हमेशा दिल में बस जाता है। शुरुआती बर्फबारी ठंड तो देती है, लेकिन खतरनाक बर्फीले तूफान वाला वातावरण नहीं बनाती, इसलिए परिवार, कपल और नए ट्रैवलर भी इसे आराम से एंजॉय कर सकते हैं। नवंबर में ट्रेकिंग सबसे आरामदायक और रोमांचक लम्हे इस महीने ट्रेकिंग का मज़ा दोगुना हो जाता है। ट्रेल्स पर फिसलन नहीं होती, गर्मी से थकान नहीं होती और भारी बर्फ रास्ता नहीं रोकती। हवा ताजी होती है और शरीर जल्दी थकता नहीं। इसलिए नवंबर को ट्रेकिंग सीज़न का राजा कहा जाता है। उत्तराखंड का केदारकांठा ट्रेक, नाग टिब्बा, दयारा बुग्याल, हिमाचल का त्रियुंड, कारेरी लेक, कुंजर–तोश ट्रेक और सिक्किम का संडकफू ट्रेक इस समय सबसे बेहतरीन होते हैं। इन ट्रेल्स पर नवंबर में घास सुनहरी दिखती है, रास्तों से बादल गुजरते नजर आते हैं और पहाड़ों की चोटियां बेहद साफ दिखती हैं। कैम्पिंग का मजा भी नवंबर में सबसे खास होता है। रात के समय अलाव जलाकर बैठना, तारों भरे आसमान को निहारना, गर्म सूप पीते हुए कहानी सुनना ऐसा अनुभव इंसान सालों तक भूल नहीं पाता। ट्रेकिंग शुरुआती लोगों के लिए भी आसान रहती है, और बजट में फिट भी हो जाती है। नवंबर यात्रा के लिए कुछ ट्रैवल टिप्स ठंड की शुरुआत होने की वजह से नवंबर में पहाड़ों की यात्रा करते समय कुछ एहतियात जरूरी हैं। सबसे पहले गर्म कपड़े पैक करें थर्मल, जैकैट, टोपी, वूलन मोज़े और ग्लव्स जरूर रखें। ट्रेकिंग कर रहे हैं तो अच्छे ग्रिप वाले जूते बहुत जरूरी हैं। धूप को हल्के में न लें सनस्क्रीन और सनग्लासेस साथ रखें। ठंड में पानी पीने की आदत कम हो जाती है, लेकिन शरीर को हाइड्रेट रखना जरूरी है। पावर बैंक, टॉर्च और थोड़ा कैश जरूर रखें क्योंकि कई पहाड़ी गांवों में नेटवर्क और ऑनलाइन पेमेंट की दिक्कत आती है। बर्फबारी वाले इलाकों में सड़कें फिसलन भरी हो सकती हैं, इसलिए गाड़ी धीरे चलाएं। अगर आप ट्रेकिंग कर रहे हैं तो अपनी यात्रा की जानकारी किसी दोस्त या परिवार वाले को जरूर बताएं। मौसम में अचानक बदलाव की संभावना होती है, इसलिए मौसम अपडेट देखते रहें। इन छोटी–छोटी बातों का ध्यान रखने से आपकी यात्रा आरामदायक, सुरक्षित और बेहद यादगार बन जाएगी। पहाड़ों की यादें जो दिल में हमेशा बस जाएंगी नवंबर में पहाड़ों की यात्रा सिर्फ एक ट्रिप नहीं, बल्कि एक खूबसूरत एहसास होता है। जब सुबह की ठंडी हवा चेहरे को छूती है, जब पहाड़ों पर पहली बर्फ गिरती है, जब जंगलों से धुंध उठने लगती है और जब सूरज की रोशनी सुनहरी हो जाती है तब इंसान खुद को नेचर के और करीब महसूस करता है। हिमाचल के छोटे गांव हों, उत्तराखंड के शांत मंदिर, कश्मीर की वादियां हों या सिक्किम की रंगीन पहाड़ियां हर जगह नवंबर में एक अलग चमक दिखती है। यह मौसम न सिर्फ ट्रैकिंग के लिए अच्छा है, बल्कि रिलैक्स करने, खुद को तलाशने और लाइफ की हलचल से ब्रेक लेने के लिए भी परफेक्ट है। पहाड़ सर्दियों की शुरुआत में शांत और स्वागत करने वाले लगते हैं। कैफे में धीमे संगीत के साथ बैठना, पहाड़ के मोड़ पर गरम चाय पीना, बर्फ के बीच फोटो खींचना और रात में तारों के नीचे चुपचाप बैठना ये सभी पल इंसान के दिल

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सर्दियों में घूमने के लिए 5 बजट फ्रेंडली हिल स्टेशन, ठंड का मज़ा और जेब पर बोझ नहीं!

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सर्दियों की सैर ठंड में घूमने का सबसे सही वक्त सर्दियां भारत में ऐसी ऋतु है जब हर किसी का मन पहाड़ों की ओर भागता है। बर्फ से ढके पहाड़, धुंध से लिपटी सुबहें, गरम चाय की चुस्की और सर्द हवा का स्पर्श इन सब में दिल मचल जाता है। यह माना जाए की इस मौसम में घूमने का मज़ा दोगुना हो जाता है तो ज्यादा नहीं होगा। लेकिन बहुत लोग सोचते हैं कि हिल स्टेशन की ट्रिप जेब पर भारी पड़ती है। जबकि सच्चाई यह है कि अगर आप थोड़ी समझदारी से ट्रिप प्लान करें, तो सर्दियों की खूबसूरत ट्रिप बेहद सस्ते में हो सकती है। भारत में कई ऐसे हिल स्टेशन हैं जो खूबसूरती के साथ-साथ बजट में भी फिट बैठते हैं। यहां आप न सिर्फ नेचर का असली रंग देख सकते हैं, बल्कि लोकल लोगों की संस्कृति, खानपान और सादगी का आनंद भी उठा सकते हैं। सर्दियों की ठंड में पहाड़ों पर घूमना शरीर को तरोताजा कर देता है। ऐसे में अगर आप सर्दियों की छुट्टियों में कम खर्च में यादगार ट्रिप का मज़ा लेना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए ये 5 बजट फ्रेंडली हिल स्टेशन आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर होने चाहिए। कसौली, शांति और सादगी का ठिकाना हिमाचल प्रदेश की गोद में बसा कसौली एक छोटा लेकिन बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है। यह उन लोगों के लिए परफेक्ट जगह है जो शोर-शराबे से दूर, शांति में कुछ दिन बिताना चाहते हैं। सर्दियों में कसौली का तापमान 5 से 10 डिग्री के बीच रहता है, जिससे यहां की ठंड रोमांचक लगती है। सुबह की धुंध और शाम की ठंडी हवा यहां के माहौल को एकदम जादुई बना देती है। कसौली में घूमने के लिए बहुत कुछ है जैसे गिल्बर्ट ट्रेल, क्राइस्ट चर्च, मंकी पॉइंट, और सनसेट व्यू पॉइंट जैसी जगहें यहां की पहचान हैं। इन जगहों पर जाने के लिए किसी बड़े खर्च की जरूरत नहीं पड़ती। लोकल बस से या पैदल घूमना ही यहां का असली आनंद है। अगर बात बजट की करें तो कसौली में ₹700 से ₹1000 तक के अच्छे गेस्टहाउस या छोटे होटल आसानी से मिल जाते हैं। खाना भी काफी सस्ता और स्वादिष्ट है। लोकल ढाबों में राजमा-चावल, परांठे और गरम सूप का स्वाद आपकी ठंड को और मीठा बना देता है। दिल्ली या चंडीगढ़ से बस लेकर कुछ घंटों में यहां पहुंचा जा सकता है। सर्दियों की ठंड में कसौली के पहाड़ों पर टहलना और धुंध के बीच खो जाना, जिंदगी की सबसे सुकून भरी यादों में से एक हो सकती है।(5 बजट फ्रेंडली हिल स्टेशन आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर होने चाहिए।) लैंसडाउन, सस्ता, शांत और बेहद खूबसूरत अगर आप भीड़भाड़ से दूर, नेचर की गोद में कुछ दिन बसना चाहते हैं, तो लैंसडाउन आपके लिए सबसे सही जगह है। यह उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में बसा छोटा हिल स्टेशन है, जिसे ब्रिटिश काल में बनाया गया था। यहां की हवा में सादगी है और पहाड़ों में अपनापन। सर्दियों में लैंसडाउन का तापमान 3 से 8 डिग्री के बीच रहता है। कभी-कभी हल्की बर्फबारी भी होती है जो इस जगह को और मनमोहक बना देती है। घूमने के लिए यहां भुल्ला झील, टिप-इन-टॉप व्यू पॉइंट, सेंट मेरी चर्च, और गढ़वाल रेजीमेंट म्यूजियम हैं।₹800 से ₹1200 के बजट में यहां बढ़िया होटल और होमस्टे मिल जाते हैं। यहां का लोकल खाना बहुत स्वादिष्ट और सस्ता होता है। ₹100 से ₹150 में आप पेटभर पहाड़ी खाना खा सकते हैं। दिल्ली से यह जगह सिर्फ 250 किलोमीटर दूर है और बस या कार से पहुंचना बहुत आसान है। लैंसडाउन उन यात्रियों के लिए परफेक्ट है जो शांत जगह पर बैठकर पहाड़ों की ठंडी हवा के साथ अपने विचारों में खो जाना चाहते हैं। माउंट आबू, राजस्थान की ठंडी गोद में एक अनोखी सैर राजस्थान अपने रेगिस्तानों और गर्म मौसम के लिए मशहूर है, लेकिन माउंट आबू इस सोच को पूरी तरह बदल देता है। अरावली की पहाड़ियों में बसा यह हिल स्टेशन सर्दियों में बेहद खूबसूरत हो जाता है। यहां दिन में हल्की धूप और रात में ठंडी हवाएं सर्दियों का असली एहसास कराती हैं। घूमने के लिए नक्की लेक, दिलवाड़ामंदिर, टॉड रॉक, और सूर्यास्त पॉइंट देखने लायक हैं। झील के किनारे शाम को टहलना या बोटिंग करना बहुत सुकून देता है। दिसंबर से फरवरी तक यहां का तापमान 8 से 15 डिग्री तक रहता है। ₹900 से ₹1300 तक के होटल आराम से मिल जाते हैं। अगर आप ग्रुप में जाते हैं, तो होमस्टे या हॉस्टल में रुकना और सस्ता पड़ सकता है। लोकल फूड बहुत ही स्वादिष्ट और जेब पर हल्का है। राजस्थान की पारंपरिक डिशेज़ जैसे दाल-बाटी और मिर्ची वड़ा यहां के ढाबों में खूब मिलते हैं। माउंट आबू रोड स्टेशन तक ट्रेन से पहुंचना आसान है, वहां से टैक्सी या बस लेकर 30 मिनट में आप इस खूबसूरत जगह पर पहुंच सकते हैं। यकीनन सर्दियों में माउंट आबू आपको ठंड के साथ-साथ गर्मजोशी का अनुभव भी कराएगा। बर्फ, बौद्ध और बजट ट्रैवल का संगम, मैकलोडगंज हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला के पास बसा मैकलोडगंज एक ऐसा हिल स्टेशन है जहां संस्कृति और नेचर को एक साथ लुत्फ उठाया जा सकता है। इसे लिटिल ल्हासा भी कहा जाता है क्योंकि यहां तिब्बती संस्कृति का असर हर कोने में है। सर्दियों में यहां का तापमान 2 से 8 डिग्री तक रहता है। दिसंबर और जनवरी में बर्फबारी से पूरा शहर सफेद चादर में ढक जाता है। घूमने के लिए नामग्याल मठ, भागसू वाटरफॉल, तिब्बतन मार्केट, और दलाई लामा मंदिर हैं। ₹600 से ₹1000 के बजट में होटल और होमस्टे आसानी से मिल जाते हैं। खाने के लिए यहां तिब्बती व्यंजन जैसे मोमोज, थुकपा और बटर टी का स्वाद लाजवाब होता है। लोकल कैफे और छोटी दुकानों में खाना बहुत सस्ता और स्वादिष्ट मिलता है। दिल्ली या चंडीगढ़ से धर्मशाला तक बसें और वहां से टैक्सी या लोकल बस लेकर मैकलोडगंज पहुंच सकते हैं। यहां के लोग बहुत मेहमाननवाज़ हैं और जगह का माहौल दिल को शांति देता है। अगर आप ठंड में बर्फ का मज़ा लेना चाहते हैं तो यह जगह एकदम परफेक्ट है। येरकौड, दक्षिण भारत का ठंडा और सस्ता हिल स्टेशन अगर आप साउथ इंडिया में

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सर्दियों में गर्म रहने के लिए पिएं ये 5 सूप! इनसे बनता है सेहत, स्वाद और सुकून का एक खट्टा मीठा लम्हा!

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सर्दियों का मौसम और सूप का रिश्ता सर्दियों में ठंडी हवाएं चलती हैं, सुबह देर तक धुंध रहती है, और शरीर सुस्त पड़ जाता है। ऐसे मौसम में गरम चीजें खाने-पीने का मज़ा ही कुछ और होता है। सूप इस मौसम का सबसे बढ़िया साथी है। यह शरीर को गरमाहट देता है, भूख बढ़ाता है और ताकत भी। चाय या कॉफी कुछ देर के लिए राहत देती हैं, लेकिन सूप अंदर तक गर्मी पहुंचाता है। सूप की सबसे खास बात यह है कि इसे हर कोई अपने स्वाद और पसंद के हिसाब से बना सकता है। सब्जियों का सूप, दाल का सूप, या चिकन सूप हर तरह का स्वाद इसमें समा सकता है। ठंड में जब हाथ ठिठुरने लगते हैं और पैर बर्फ जैसे लगते हैं, तब एक कटोरी सूप शरीर में नई गर्माहट भर देता है। इसमें मौजूद विटामिन, मिनरल और फाइबर हमें सर्दियों की बीमारियों से भी बचाते हैं। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की इस पेशकश में हम बात करेंगे पांच ऐसे सूपस् की, जो न सिर्फ स्वादिष्ट हैं बल्कि सेहत के लिए भी बहुत फायदेमंद हैं। हर सूप का अपना एक अलग स्वाद और फायदा है चलिए, एक-एक कर जान लेते हैं। टमाटर सूप सर्दी का सदाबहार स्वाद टमाटर सूप हर घर में सर्दियों का पहला पसंदीदा सूप होता है। इसका खट्टा-मीठा स्वाद किसी को भी भा जाता है। टमाटर में विटामिन C भरपूर होता है जो इम्यूनिटी बढ़ाता है और त्वचा को ताज़गी देता है। यह सूप शरीर में गरमाहट बनाए रखता है और पाचन भी ठीक करता है। इसे बनाना बहुत आसान है पके हुए टमाटर को उबाल लीजिए, फिर थोड़ा अदरक, लहसुन और काली मिर्च डालिए। इसे मिक्सर में पीसकर छलनी से छान लीजिए। अब थोड़ा बटर डालकर दो मिनट उबालिए और तैयार है गरमागरम टमाटर सूप। अगर चाहें तो ऊपर से ब्रेड क्राउटन डाल सकते हैं। इसका स्वाद और भी निखर जाता है। सर्द शामों में जब ठंड बढ़ जाती है, तो टमाटर सूप एक राहत का प्याला बन जाता है। बच्चे हों या बुज़ुर्ग, सब इसे पसंद करते हैं।(सूप इस मौसम का सबसे बढ़िया साथी है।) मिक्स वेजिटेबल सूप जब बात हेल्दी खाने की आती है, तो सब्जियों से बेहतर कुछ नहीं सूझता। और जब वही सब्जियां सूप में मिल जाएं, तो स्वाद भी बढ़ता है और सेहत भी। मिक्स वेजिटेबल सूप में गाजर, बीन्स, गोभी, मटर, शिमला मिर्च, पालक जैसी सब्जियों का मेल होता है। हर सब्जी अपने-अपने पोषक तत्व देती है। इसे बनाने के लिए सभी सब्जियों को छोटे टुकड़ों में काटकर थोड़ा घी या ऑलिव ऑयल में भून लीजिए। फिर पानी डालकर थोड़ा नमक, काली मिर्च और अदरक डालें। 10-12 मिनट तक धीमी आंच पर पकाइए। जब सब्जियां मुलायम हो जाएं, तब गैस बंद कर दीजिए। यह सूप शरीर में फाइबर की कमी पूरी करता है, पाचन दुरुस्त रखता है और डिटॉक्स भी करता है। इसमें कैलोरी बहुत कम होती है, इसलिए यह वजन घटाने वालों के लिए भी बेस्ट है। ठंडी शामों में एक कटोरी मिक्स वेजिटेबल सूप पीना मतलब सेहत और सुकून दोनों पाने जैसा है। स्वीट कॉर्न सूप बच्चों और बड़ों का चहेता स्वाद स्वीट कॉर्न सूप का नाम सुनते ही ठंड में गरमाहट का अहसास हो जाता है। इसका हल्का मीठा और क्रीमी स्वाद हर किसी को पसंद आता है। कॉर्न यानी मकई में फाइबर, विटामिन B और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो शरीर को एनर्जी देते हैं और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाते हैं। इसे बनाने के लिए मकई के दाने उबाल लें और थोड़ी गाजर, बीन्स, पत्तागोभी डालें। थोड़ा कॉर्नफ्लोर मिलाकर गाढ़ा कर सकते हैं। ऊपर से नमक, काली मिर्च और थोड़ी सी सोया सॉस डालिए। यह सूप खासतौर पर बच्चों के लिए अच्छा है क्योंकि इसका स्वाद हल्का होता है और इसमें पोषण भी भरपूर है। ठंडी रातों में एक प्याला स्वीट कॉर्न सूप थकान मिटा देता है और मन को ताज़गी देता है। मशरूम सूप सर्दी में सेहत का पावर ड्रिंक मशरूम सूप सुनकर कुछ लोग सोचते हैं कि इसका स्वाद अजीब होगा, लेकिन एक बार पीने के बाद यह लत लग जाती है। मशरूम में प्रोटीन, आयरन और विटामिन di होता है, जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। इसे बनाने के लिए ताज़े मशरूम को बारीक काटकर थोड़ा मक्खन में भून लें। फिर इसमें थोड़ा दूध, काली मिर्च, नमक और अदरक डालिए। 10 मिनट तक पकाइए और गरमागरम परोसिए। यह सूप न सिर्फ शरीर को गरम रखता है, बल्कि हड्डियों और त्वचा के लिए भी फायदेमंद है। सर्दियों में रोज़ एक बार मशरूम सूप पीने से आप दिनभर एक्टिव महसूस करेंगे। जो लोग ऑफिस या पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं, उनके लिए यह झटपट बनने वाला एनर्जी सूप है। अदरक-लहसुन सूप ठंड भगाने का रामबाण नुस्खा अदरक और लहसुन दोनों ही सर्दियों के लिए वरदान हैं। इन दोनों में ऐसे तत्व होते हैं जो सर्दी-जुकाम, खांसी और थकान से बचाते हैं। अदरक शरीर को गरम रखता है और लहसुन इम्यूनिटी बढ़ाता है। इसे बनाने के लिए थोड़ा घी या मक्खन गर्म करें, उसमें अदरक और लहसुन बारीक काटकर भूनें। फिर पानी, थोड़ा नमक, नींबू रस और काली मिर्च डालिए। कुछ मिनट तक उबालिए और बस, तैयार है आपका गरम और तीखा अदरक-लहसुन सूप। सर्द रातों में यह सूप गले को राहत देता है और ठंड को दूर भगाता है। यह उन लोगों के लिए बहुत फायदेमंद है जो बार-बार सर्दी-जुकाम से परेशान रहते हैं। सूप के साथ अपनाइए सर्दी से लड़ने के आसान तरीके सूप के अलावा कुछ छोटी आदतें सर्दी में आपको और भी स्वस्थ रख सकती हैं। जैसे सुबह धूप में 15 मिनट बैठना, गरम पानी पीना, शरीर को ढककर रखना और रात में जल्दी सोना। दिन में एक बार गरम सूप ज़रूर लीजिए चाहे लंच में या डिनर में। अगर सूप में थोड़ा नींबू, अदरक या हल्दी डाल दें, तो उसका असर और बढ़ जाता है। ये प्राकृतिक तत्व शरीर को वायरस और संक्रमण से बचाते हैं। सर्दियों का मौसम खूबसूरत होता है, बस ज़रूरत है सही खानपान और देखभाल की। सूप इसका सबसे आसान और स्वादिष्ट तरीका है। तो इस ठंड में जब भी ठिठुरन बढ़े, गैस ऑन कीजिए, अपनी पसंद का सूप बनाइए और

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“महेश्वरी साड़ी मध्य प्रदेश की शाही कढ़ाई और सांस्कृतिक सौंदर्य की जीवंत मिसाल”

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महेश्वरी साड़ी – भारत की हर मिट्टी की अपनी खुशबू होती है, और हर इलाके की अपनी अनोखी कला। मध्य प्रदेश के महेश्वर शहर से निकलने वाली महेश्वरी साड़ी उस कला और परंपरा का एक शानदार उदाहरण है, जो समय के साथ और भी निखरती गई है। यह साड़ी मात्र एक कपड़ा नहीं, बल्कि एक संस्कृति की पहचान है जिसमें इतिहास, कारीगरी, नारी शक्ति और भारतीय सौंदर्य का अद्भुत समागम है। जब कोई महिला महेश्वरी साड़ी पहनती है, तो वह अपने तन के साथ-साथ परंपरा की गरिमा को भी ओढ़ लेती है। यह साड़ी आज भी मध्य प्रदेश की पहचान है, जिसकी नाजुक बुनाई और आकर्षक डिजाइन हर किसी को अपनी ओर खींच लेते हैं। हल्की, चमकीली और रुचिकर यही है महेश्वरी साड़ी की असली खूबी। महेश्वरी साड़ी का इतिहास महेश्वरी साड़ी की कहानी 18वीं सदी से शुरू होती है, जब रानी अहिल्याबाई होलकर ने महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया था। रानी अहिल्याबाई न सिर्फ एक कुशल शासक थीं, बल्कि कला, संस्कृति और शिल्प की संरक्षक भी थीं। उन्होंने बनारस से कुशल बुनकरों को बुलवाया और उनसे एक ऐसी साड़ी बनाने को कहा जो महेश्वर की गरिमा को दर्शाए। उनकी प्रेरणा और संरक्षण से ही महेश्वरी साड़ी का जन्म हुआ था। पहले यह साड़ियां पूरी तरह से सूती होती थीं, जो स्थानीय जलवायु के लिए उपयुक्त थीं। धीरे-धीरे इसमें रेशम के धागों का उपयोग शुरू हुआ, जिससे इसका रूप और निखर गया। कहा जाता है कि रानी अहिल्याबाई खुद इस साड़ी को पहनती थीं और इसे अपने दरबार में आने वाले मेहमानों को भेंट करती थीं। यह साड़ी धीरे-धीरे पूरे भारत में प्रसिद्ध हुई और समय के साथ यह मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान बन गई।(हल्की, चमकीली और रुचिकर यही है महेश्वरी साड़ी की असली खूबी।) महेश्वरी साड़ी की खासियत महेश्वरी साड़ी की सबसे बड़ी खूबी इसकी हैंडलूम बुनाई है। इसे पूरी तरह से हाथ से चलने वाले करघे, जिसे ‘पिटलूम’ कहा जाता है, पर बुना जाता है। इसमें कोई मशीनरी नहीं होती, इसलिए हर साड़ी में बुनकर की कला और मेहनत झलकती है। एक साड़ी तैयार करने में कई दिन, कभी-कभी हफ्ते लग जाते हैं। इसके डिजाइन की प्रेरणा महेश्वर किले की दीवारों और वहां की स्थापत्य कला से ली जाती है। साड़ी के बॉर्डर पर त्रिकोण, वर्ग, हीरे, लहर और फूलों जैसी आकृतियां बनाई जाती हैं। इन्हें स्थानीय भाषा में रुईफूल, चंद्ररेखा और बुग्गी कहा जाता है। महेश्वरी साड़ी की खासियत उसका रिवर्सिबल बॉर्डर है यानी यह साड़ी दोनों तरफ से पहनी जा सकती है। इस अनोखी तकनीक के कारण यह देश की सबसे विशिष्ट साड़ियों में गिनी जाती है। इसके हर एक धागे में सादगी और शाहीपन का मेल होता है। बुनाई और निर्माण महेश्वरी साड़ी का रंग-संसार बेहद समृद्ध है। इसमें लाल, बैंगनी, पीला, हरा, सुनहरा, गुलाबी और नीला जैसे चमकीले रंगों का उपयोग किया जाता है। पारंपरिक तौर पर यह रंग प्राकृतिक स्रोतों जैसे फूलों, पत्तियों, और खनिजों से बनाए जाते थे। आज भी कई बुनकर इन पारंपरिक रंगों का ही इस्तेमाल करते हैं ताकि पर्यावरण को कोई नुकसान न पहुंचे। महेश्वरी साड़ी की खास बात यह है कि इसमें दो या तीन रंगों का मेल होता है, जिससे इसका रूप बेहद आकर्षक लगता है। इसके पल्लू और बॉर्डर का रंग अक्सर अलग होता है, जो इसे बाकी साड़ियों से अलग पहचान देता है। रानी अहिल्याबाई के समय में साड़ियों के रंग मौसम और त्यौहारों के हिसाब से चुने जाते थे। जैसे गर्मियों में हल्के पीले या हरे रंग, और सर्दियों में गहरे लाल या बैंगनी। आज भी यह परंपरा कई कारीगरों के बीच जीवित है। इसीलिए महेश्वरी साड़ी पहनते ही एक पारंपरिक और आधुनिक दोनों भावनाएं एक साथ महसूस होती हैं। महेश्वरी साड़ी का सांस्कृतिक महत्व महेश्वरी साड़ी की असली पहचान उसके कारीगरों की मेहनत में है। यह साड़ी महेश्वर और आसपास के गांवों में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के लिए आजीविका का साधन है। हर साड़ी में एक परिवार की कहानी छिपी होती है कोई रंग तैयार करता है, कोई धागा बुनता है, और कोई डिजाइन में जान डालता है। महेश्वर में कई पारंपरिक बुनकर परिवार पीढ़ियों से इस काम में लगे हैं। बच्चे अपने माता-पिता से यह हुनर सीखते हैं और आगे बढ़ाते हैं। एक साधारण साड़ी बनाने में लगभग 5 से 10 दिन लगते हैं, जबकि जटिल डिजाइन वाली साड़ी में 20 दिन से ज्यादा समय लगता है। इस कला को संरक्षित रखने के लिए “रीवा सोसायटी” जैसी संस्थाएं काम कर रही हैं, जो बुनकरों को आर्थिक मदद और मार्केटिंग में सहयोग देती हैं। यह न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करती हैं, बल्कि इस पारंपरिक कला को भविष्य तक पहुंचाने में भी मददगार हैं। महेश्वरी साड़ी पहनने का अनुभव महेश्वरी साड़ी सिर्फ पहनने का परिधान नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। यह साड़ी उस परंपरा को जीवित रखती है जो कला, शिल्प और स्त्री-सशक्तिकरण से जुड़ी है। रानी अहिल्याबाई होलकर की तरह, आज भी मध्य प्रदेश की महिलाएं इसे गर्व से पहनती हैं। यह साड़ी धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों में सबसे पहले पसंद की जाती है। चाहे शादी हो, त्यौहार या सांस्कृतिक मंच महेश्वरी साड़ी हर मौके पर गरिमा और परंपरा का संदेश देती है। इसके अलावा, यह साड़ी अब इको-फ्रेंडली फैशन का हिस्सा बन चुकी है क्योंकि इसमें प्राकृतिक धागों और रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए यह न केवल परंपरा की, बल्कि पर्यावरण-संरक्षण की दूत भी है। आज का महेश्वरी साड़ी बाजार आज के दौर में महेश्वरी साड़ी ने अपनी सीमाएं पार कर ली हैं। यह अब सिर्फ मध्य प्रदेश या भारत तक सीमित नहीं है। देश-विदेश के बाजारों में इसकी जबरदस्त मांग है। कई नामी डिजाइनर अब महेश्वरी साड़ी को आधुनिक रूप देकर अंतरराष्ट्रीय फैशन शो में पेश कर रहे हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर Handloom Heritage टैग के साथ यह साड़ी हजारों की संख्या में बिकती है। इसकी कीमत 1500 रुपये से शुरू होकर 10,000 रुपये या उससे भी अधिक तक जाती है। महेश्वर, इंदौर, भोपाल और दिल्ली जैसे शहरों में इसके विशेष बाजार हैं, जहां स्थानीय महिलाएं और पर्यटक इसे उत्साह से खरीदते हैं। इस तरह महेश्वरी साड़ी अब सिर्फ परिधान नहीं रही यह भारतीय शिल्प की ब्रांड पहचान

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सागौन के पेड़ों से घिरा कॉर्बेट झरना क्यों है.. इतना खास

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उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर शहर से लगभग 25 किलोमीटर और कालाढूंगी से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर रामनगर राजमार्ग पर स्थित है एक ऐसा झरना, जो चारों तरफ घने जंगल से घिरा हुआ है। सागौन पेड़ों के बीचो-बीच स्थित यह झरना मानो अपने शोर से सभी पर्यटकों को अपनी ओर बुला रहा हो। 66 फीट (22 मीटर) की ऊंचाई से गिरता कॉर्बेट झरना प्रकृति की एक ऐसी अनोखी देन लगता है, जिसे देखना और महसूस करना हर कोई चाहेगा। चारों तरफ पंछियों की मधुर आवाज मानो दिल और दिमाग दोनों को चिंता-मुक्त कर रही हो। झरने का कल-कल बहता पानी, जो पत्थरों से टकराकर मानो एक अलग ही प्रकार का संगीत बुन रहा हो और मन को एक अलग ही तरह की शांति पहुंचा रहा हो। साथ ही, वन विभाग की ओर से यहां हाइकिंग और कैंपिंग की व्यवस्था भी है, जिसे करके आप अपने बचपन को एक बार दोबारा जी सकते हैं। प्रकृति के इस मनमोहक दृश्य को देख (या सुन) कर जितने भी नेचर लवर हैं, वे खुद को यहां आने से रोक ही नहीं पाएंगे। झरने की मध्यम-मध्यम आवाज और आपके मन का शोर जिस प्रकार धीरे-धीरे शांत होता जाएगा और झरने की आवाज तेज होती जाएगी, मानो आपको एक अलग ही दुनिया में पहुंचा देगी।  कॉर्बेट झरना क्यों है इतना खास चारों तरफ वातावरण से घिरा यह कार्बेट झरना और यहां की शांति भंग करता पंछियों का संगीत, साथ ही जंगल से आने वाली ठंडी व शुद्ध हवा न केवल हमारे मस्तिष्क को, बल्कि हमारे मन को अपने वातावरण में ढाल रही हो। यही कारण है कि इस डेस्टिनेशन पर दिन-प्रतिदिन पर्यटकों की भीड़ बढ़ती जा रही है। ट्रेकिंग करते लोग, साइक्लिंग करते लोग, झरने के पास बैठकर प्रकृति की आवाज़ों को सुनकर अपने मन को शांति पहुँचाते हुए लोग — मानो यहां एक अनोखा अनुभव ले रहे हों। और क्योंकि यह रामनगर के होटलों व रिसॉर्ट्स से दूर है, इस कारण यहां आपको शहर की व्यस्तता का एहसास बिल्कुल भी नहीं होगा।  कॉर्बेट फॉल्स जाने का सबसे अच्छा समय हर तरफ हरियाली और पंछियों से भरा हुआ यह कार्बेट फॉल्स गर्मियों में भी उतना ही सुहाना लगता है जितना कि सर्दियों में। वैसे तो आप बारिश के मौसम को छोड़कर यहाँ कभी भी आ सकते हैं, पर मार्च से लेकर अप्रैल और अक्टूबर से लेकर दिसंबर तक का समय विज़िट करने का सबसे अच्छा समय माना जाता है।बारिश के मौसम में आप यहाँ इसलिए नहीं आ सकते क्योंकि यह उस समय बंद रहता है, और साथ ही आसपास के कई ऐसे टूरिस्ट प्लेस भी बारिश में बंद रहते हैं। इसका कारण यह है कि बारिश के समय लैंडस्लाइड होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है और बारिश के दौरान निकलने वाले जीव-जंतु, जो कि जहरीले भी हो सकते हैं, बाहर आ जाते हैं, जिनसे हमें खतरा भी हो सकता है। इसी कारण बारिश के मौसम में ज़्यादातर ऐसी जगहें बंद रहती है।  फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की ओर से पांच सुझाव • क्योंकि यह एरिया पेड़-पौधों से घिरा हुआ है, इसलिए यहां आपको छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े, मच्छर आदि मिलेंगे ही, तो आप अपनी पूरी तैयारी के साथ ही यहां जाएँ।• साथ ही, यहां ट्रैकिंग, कैंपिंग, साइक्लिंग जैसी एक्टिविटीज होती हैं, तो आप अपने कपड़े ट्रैक के अनुसार पहनकर या रखकर ले जाएँ।• यहां पार्किंग की भी सुविधा उपलब्ध है, तो अगर आप अपनी गाड़ी से यहां जा रहे हैं तो निश्चिंत होकर जाएँ।• कार्बेट फॉल्स के अलावा आप यहां कॉर्बेट पार्क, रामनगर, हनुमान धाम, गर्जिया देवी मंदिर, नैनीताल, भीमताल, भुजियाघाट, भवाली आदि भी जा सकते हैं।• कार्बेट फॉल्स की टिकट्स प्रति व्यक्ति 150 रुपए थी। साथ ही, अगर आप यहां फोटोज और वीडियो बनाना चाहते हैं तो आपको अलग से चार्ज देना होगा। कैसे पहुंचे कॉर्बेट फॉल्स • बाय रोड – दिल्ली से रामनगर की दूरी 253 किलोमीटर है) कॉर्बेट फाँल रामनगर से सिर्फ 25 किलोमीटर, कालाढुंगी से 4 किलोमीटर और हल्द्वानी से 27 किलोमीटर की दूरी पर है।• रामनगर से कॉर्बेट फाँल केवल 25 किलोमीटर दूर है। दिल्ली या किसी भी शहर से रामनगर तक ट्रेन से आया जा सकता है । उसके बाद बाय रोड टैक्सी या बस लेकर कॉर्बेट फाँल तक आराम से पहुंचा जा सकता है। सभी प्रमुख जगहों से रामनगर के लिए ट्रेन , प्राइवेट वाहन या बस हर वक्त उपलब्ध रहती हैं। आप हल्द्वानी या काठगोदाम रेलवे स्टेशन से भी बस या टैक्सी लेकर कॉर्बेट फाँल तक पहुँच सकते हैं।• किसी भी शहर से पंतनगर हवाई अड्डे तक हवाई मार्ग से आया जा सकता है । उसके बाय रोड टैक्सी या बस लेकर कॉर्बेट फाँल पहुंचा जा सकता है।  कार्बेट फॉल्स में करने के लिए एंटरटेनमेंट ट्रिप्स • आप यहाँ जाकर कैंपिंग कर सकते हैं, जिससे करने में आपको बहुत मज़ा आएगा।• साथ ही आप यहाँ घंटों शांति से बैठकर झरने और आसपास आ रही पंछियों की आवाज़ों को सुनकर अपने मन को शांत कर सकते हैं।• आप यहाँ पर ट्रैकिंग करने का मज़ा उठा सकते हैं। • साथ ही आप इस पूरे कॉर्बेट फॉल्स को साइक्लिंग से भी नाप सकते हैं। पथरीले ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर साइकिल चलाना खुद में ही एक एडवेंचर हो जाता है, जो आपकी ट्रिप में एक अलग ही जोश भर देगा।• आपको यहाँ एक छोटी-सी कैंटीन भी मिल जाएगी, जहाँ से आप स्नैक्स और खाने के कई व्यंजन लेकर खा सकते हैं।

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“दार्जिलिंग की वादियों में चाय की खुशबू और बादलों की रजा, एक सफर जो याद रह जाए”

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दार्जिलिंग जहां बादल ज़मीन को छूते हैं। जब भी कोई कहता है पहाड़ बुला रहे हैं, तो मन में सबसे पहले जो जगह आती है, वह है दार्जिलिंग। पूर्वी हिमालय की गोद में बसा ये छोटा-सा शहर पश्चिम बंगाल की शान है। चारों ओर फैली हरियाली, नीले-धूसर बादल, ठंडी हवा और लोगों की सादगी इसे किसी परीकथा जैसा बना देते हैं। सुबह की पहली किरण जब कंचनजंघा पर्वत की बर्फीली चोटियों पर पड़ती है, तो आसमान सुनहरे रंग में रंग जाता है। उस पल का एहसास ऐसा होता है जैसे प्रकृति खुद आपके सामने झुक गई हो। दार्जिलिंग का इतिहास भी उतना ही रोचक है। कभी यह जगह भूटिया राजाओं के अधीन थी, फिर अंग्रेज़ों ने इसे अपने समर हिल स्टेशन के रूप में बसाया। आज भी पुराने ब्रिटिश-युग की इमारतें, लकड़ी के बने बंगले और पत्थर की पगडंडियां उस दौर की झलक दिखाती हैं। यह शहर सिर्फ़ पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि आत्मा को सुकून देने वाली एक जगह है। टॉय ट्रेन की सीटी और बचपन की यादें दार्जिलिंग की टॉय ट्रेन यानी दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि एक रोमांच है। 1880 के दशक में बनी ये ट्रेन आज भी अपनी पहचान बरकरार रखे हुए है। यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर घोषित किया गया है। सुबह-सुबह जब छोटी सी यह ट्रेन सीटी बजाते हुए दार्जिलिंग की पहाड़ियों के बीच से गुजरती है, तो लगता है जैसे कोई पुराना गीत बज उठा हो। ट्रेन घूम, सोनादा और बाटाशिया लूप जैसे खूबसूरत स्थानों से होकर गुजरती है। बाटाशिया लूप पर ट्रेन जैसे ही गोल घूमती है, नीचे की घाटियां और दूर की पहाड़ियां ऐसे दिखाई देती हैं जैसे किसी चित्रकार ने कैनवास पर रंग बिखेर दिए हों। ट्रेन की खिड़की से झांकते हुए आपको लगेगा जैसे समय थम गया है हवा में मिट्टी और चाय की मिली-जुली खुशबू, और सामने मुस्कुराते बच्चे, यह सब मिलकर सफ़र को यादगार बना देते हैं। चाय बागानों की गोद में एक दिन दार्जिलिंग का नाम आते ही मन में सबसे पहले चाय की खुशबू आती है। यहां के चाय बागान सिर्फ़ खेती की जगह नहीं, बल्कि इस धरती की पहचान हैं। दुनिया भर में दार्जिलिंग टी को चाय की रानी कहा जाता है। अगर आप यहां आएं, तो हैप्पी वैली टी एस्टेट या रंगीत वैली ज़रूर जाएं। यहां आप देख सकते हैं कि कैसे औरतें झुककर कोमल पत्तियां तोड़ती हैं, कैसे उन्हें सुखाया और पैक किया जाता है। जब आप गर्मागरम चाय का कप हाथ में लेकर पहाड़ियों की ओर देखते हैं, तो लगता है कि हर घूंट में इस धरती की आत्मा घुली हुई है। इस चाय का स्वाद मिट्टी, बारिश और मेहनतकश लोगों की कहानी कहता है। दार्जिलिंग में सुबह-सुबह जब धुंध बागानों में उतरती है, तो लगता है जैसे पूरा संसार चाय की भाप में लिपट गया हो। मठों की घंटियां और संस्कृति की खुशबू दार्जिलिंग सिर्फ़ प्राकृतिक सौंदर्य का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति का भी ठिकाना है। यहां के बौद्ध मठ न केवल धर्मस्थल हैं, बल्कि यहां से आपको इस क्षेत्र की संस्कृति और दर्शन की झलक मिलती है। घूम मठ, भूटिया बस्ती मठ और योगाचेम मठ जैसे स्थानों में जब आप घंटियों की आवाज़ सुनते हैं, तो मन अपने आप शांत हो जाता है। इन मठों में बुद्ध की विशाल मूर्तियां, रंगीन प्रार्थना झंडियां और दीवारों पर बनी पेंटिंग्स आपको एक नई ऊर्जा देती हैं। दार्जिलिंग में लेपचा, भूटिया और नेपाली समुदायों का संगम है। इनके त्यौहार, नृत्य, परिधान और भोजन इस पहाड़ी शहर को जीवंत बनाते हैं। यह जगह बताती है कि भिन्नता में भी एकता कैसे खिल सकती है।(टाइगर हिल से सूर्योदय देखना सबसे अद्भुत अनुभवों में से एक है।) घूमने लायक जगहें जो दिल चुरा लें! दार्जिलिंग की हर गली, हर मोड़ पर कुछ नया है। टाइगर हिल से सूर्योदय देखना सबसे अद्भुत अनुभवों में से एक है। जब सूरज की पहली किरणें कंचनजंघा की चोटियों पर गिरती हैं, तो लगता है जैसे सोने का ताज चमक उठा हो। इसके अलावा पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क में आप रेड पांडा और स्नो लेपर्ड जैसे दुर्लभ जीव देख सकते हैं। रॉक गार्डन, मिरिक झील, पीस पगोडा, और दार्जिलिंग मॉल रोड पर घूमना अपने आप में आनंद है। शाम के समय मॉल रोड पर चाय की चुस्की के साथ ढलते सूरज को देखना मानो समय को थाम लेना है। यहां के तिब्बती बाज़ारों में रंग-बिरंगे शॉल, ऊनी टोपी और हस्तनिर्मित सजावटी चीज़ें खरीदना एक अलग ही आनंद है। मौसम, खाना और लोगों की गर्मजोशी दार्जिलिंग का मौसम हर पल बदलता है। कभी धूप, कभी धुंध, कभी बूंदाबांदी यहां का हर मौसम रोमांस से भरा है। सर्दियों में हल्की बर्फ़ और गर्मियों में ठंडी हवा इसे साल भर का गंतव्य बनाती है। यहां का खाना भी इस शहर की तरह विविधता से भरा है। मोमो, थुकपा, चुरपी, और दार्जिलिंग चाय हर जगह के मनपसंद स्वाद हैं। सड़क किनारे छोटी दुकानों में स्टीम से उठती मोमो की भाप और लाल चटनी की खुशबू भूख बढ़ा देती है। यहां के लोग बेहद नम्र और मेहमाननवाज़ हैं। उनकी मुस्कान में सच्चाई और अपनापन झलकता है। चाहे आप पर्यटक हों या पहली बार आए हों, आपको लगेगा जैसे आप घर पर ही हैं। एक एहसास जो लौट आने को कहे दार्जिलिंग सिर्फ एक जगह नहीं, यह एक एहसास है। जब आप यहां से लौटते हैं तो साथ ले जाते हैं बादलों का आलिंगन, चाय की खुशबू, पहाड़ियों की शांति और मुस्कुराते चेहरों की यादें। हर गली, हर सड़क, हर सुबह आपको फिर आने का निमंत्रण देती है। दार्जिलिंग हमें यह सिखाता है कि जिंदगी की असली खूबसूरती भागदौड़ में नहीं, बल्कि उन पलों में है जो सुकून देते हैं। चाहे आप रोमांच खोजने आए हों या शांति पाने दार्जिलिंग हर किसी को अपना बना लेता है। और यकीन मानिए, एक बार जो यहाँ आया, वो बार-बार लौटकर आता है। फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल की और से ज़रूरी यात्रा सुझाव कंचनजंघा पर्वत पर सूरज की पहली किरण देखना एक ऐसा अनुभव है जो ज़िंदगी में एक बार जरूर होना चाहिए। दार्जिलिंग की विरासत मानी जाने वाली टॉय ट्रेन में घूम से बाटाशिया लूप तक का सफ़र करें। दार्जिलिंग की पहचान उसकी

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“IRCTC का धमाकेदार ऑफर! समंदर की गोद में सैर का मौका सिर्फ 7 दिन में अंडमान का पूरा मज़ा!”

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अगर आप भी ठंडी हवा, नीले पानी और सुनहरी रेत के बीच कुछ दिन गुज़ारना चाहते हैं, तो ये खबर आपके लिए है! भारतीय रेलवे यानी IRCTC लेकर आया है एक शानदार मौका अंडमान घूमने का गोल्डन टूर पैकेज, जो 12 नवंबर 2025 से 18 नवंबर 2025 तक चलेगा। यह टूर 7 दिन और 6 रातों का होगा, जिसमें आपको घूमने, खाने, ठहरने और ट्रांसपोर्ट की पूरी सुविधा मिलेगी। मतलब, पैकिंग कीजिए और निकल पड़िए धरती के इस स्वर्ग जैसे टापू की सैर पर! क्या है इस टूर की खासियत? IRCTC का ये अंडमान टूर सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि एक अनुभव है। इस पैकेज में यात्रियों को पोर्ट ब्लेयर, हैवलॉक और नील आइलैंड जैसे बेहतरीन जगहों पर ले जाया जाएगा। हर जगह की अपनी एक कहानी और सुंदरता है। चाहे आप इतिहास के दीवाने हों या समुद्र के नज़ारों के, यह टूर आपको सब कुछ देगा। पहले दिन आप पहुंचेंगे पोर्ट ब्लेयर, जहां आपको मिलेगा शानदार वेलकम और होटल में आरामदायक ठहराव। यहां आप देखेंगे सेल्यूलर जेल, जो आज भी आज़ादी की लड़ाई की गवाही देता है। शाम को जेल में होने वाला लाइट एंड साउंड शो आपकी आंखें नम कर देगा।(पैकिंग कीजिए और निकल पड़िए धरती के इस स्वर्ग जैसे टापू की सैर पर!) हैवलॉक आइलैंड की खूबसूरती दूसरे और तीसरे दिन का मज़ा मिलेगा हैवलॉक आइलैंड में। यहां का राधानगर बीच एशिया के सबसे सुंदर बीच में गिना जाता है। सफेद रेत, नीला आसमान और लहरों की मीठी आवाज़ सब कुछ इतना सुकून भरा कि वक्त रुक सा जाता है। यहां स्नॉर्कलिंग, स्कूबा डाइविंग जैसे एडवेंचर एक्टिविटीज भी हैं, जिनका मज़ा आपको ज़िंदगी भर याद रहेगा। नील आइलैंड शांति का ठिकाना! फिर बारी आती है नील आइलैंड की। यह जगह है नेचर लवर्स के लिए किसी सपने से कम नहीं। यहां का लक्ष्मणपुर बीच सूरज डूबते वक्त किसी पेंटिंग जैसा लगता है। कम भीड़ और ज़्यादा सुकून यही है इस जगह की खूबी। तो यहां भी एक बार हो आइए। खाने-पीने और ठहरने की पूरी व्यवस्था IRCTC ने इस पैकेज में यात्रियों के लिए ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर का इंतज़ाम किया है। होटल 3-स्टार श्रेणी के हैं और सभी यात्राओं में AC ट्रांसपोर्ट की सुविधा दी जाएगी। यानी पूरी ट्रिप में आपको किसी चीज़ की चिंता नहीं करनी होगी। यात्रा की शुरुआत कैसे होगी यह पैकेज दिल्ली से शुरू होगा। टूर की शुरुआत फ्लाइट के ज़रिए पोर्ट ब्लेयर से होगी और वापसी भी वहीं से होगी। 7 दिन की यह यात्रा पूरी तरह से IRCTC द्वारा गाइडेड होगी, यानी आपके साथ एक अनुभवी टूर मैनेजर रहेगा जो हर स्टेप पर मदद करेगा। कितना है किराया? सबसे दिलचस्प बात इस पूरे टूर पैकेज की कीमत है लगभग ₹63,000 प्रति व्यक्ति (डबल शेयरिंग के आधार पर)। इसमें एयरफेयर, होटल, भोजन, लोकल सैर, और ट्रांसफर सब शामिल हैं। मतलब, एक बार बुकिंग कीजिए और बाकी सारा इंतज़ाम रेलवे करेगा। बुकिंग कैसे करें? बुकिंग करना बेहद आसान है। आप IRCTC की वेबसाइट पर जाकर या नज़दीकी रेलवे टूरिज़्म ऑफिस से पैकेज बुक कर सकते हैं। सीटें सीमित हैं, इसलिए जल्दी बुक करना बेहतर रहेगा। क्यों खास है ये टूर? अंडमान सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक अहसास है। यहां के समुद्र, झरने, झीलें, झूलेदार पेड़ और लोकल मार्केट आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे। और जब यह सब कुछ रेलवे की भरोसेमंद सर्विस के साथ मिले, तो यात्रा और भी यादगार बन जाती है। तो अगर आप भी रोज़मर्रा की भागदौड़ से कुछ वक्त निकालकर समंदर के किनारे सुकून की तलाश में हैं, तो यह मौका बिल्कुल मत गंवाइए। IRCTC का ये अंडमान टूर पैकेज आपके साल 2025 की सबसे बेहतरीन याद बन सकता है! कब और कहां से शुरू होगी यात्रा? इस यात्रा की शुरुआत 12 नवंबर की रात 9:30 बजे लखनऊ एयरपोर्ट से होगी, जहां से यात्री इंडिगो की फ्लाइट (6E-6469) से कोलकाता के लिए रवाना होंगे। कोलकाता पहुंचने के बाद सभी यात्री रात वहीं बिताएंगे। अगले दिन यानी 13 नवंबर की सुबह 5:50 बजे, यात्रियों की अगली फ्लाइट (6E-2106) पोर्ट ब्लेयर के लिए उड़ान भरेगी। सुबह 8:05 बजे पोर्ट ब्लेयर पहुंचने के साथ ही शुरू होगी इस शानदार अंडमान यात्रा की असली कहानी, जहां समंदर की ठंडी हवा, नीला आसमान और रोमांच से भरे नज़ारे हर पल का अनुभव और भी खास बना देंगे। कब खत्म होगी यात्रा? वापसी की यात्रा 18 नवंबर की सुबह 9:45 बजे पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट से शुरू होगी। यात्री पहले कोलकाता पहुंचेंगे, जहां थोड़े आराम और ट्रांजिट के बाद आगे की उड़ान ली जाएगी। पूरे दिन के सफर के बाद यह यादगार अंडमान यात्रा रात 9:15 बजे लखनऊ एयरपोर्ट पर खत्म होगी, जब मुसाफिरों के चेहरों पर समंदर की लहरों जैसी मुस्कान और दिल में ढेरों खूबसूरत यादें होंगी।