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गरियाहाट मार्केट कोलकाता: कैसे पहुंचें गरियाहाट मार्केट और क्या-क्या खरीदें? खाना, रूकना पूरी यात्रा गाइड!

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गरियाहाट मार्केट कोलकाता का वह बाजार है, जहां संस्कृति की खुशबू हवा में घुली रहती है और भीड़ की आवाज़ें मानो किसी संगीत की तरह सुनाई देती हैं। अगर आप बंगाल की असली पहचान, उसकी सादगी, उसकी कलात्मकता और उसकी रोज़मर्रा की ऊर्जा को महसूस करना चाहते हैं, तो गरियाहाट से बेहतर जगह शायद ही कोई हो। दक्षिण कोलकाता में स्थित यह मार्केट सिर्फ खरीदारी का स्थान नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जो आपको बंगाल के जीवन, लोगों, कला, फैशन और स्वाद के बेहद करीब ले आता है। सुबह से रात तक यहां का नज़ारा बदलता रहता है। कभी यह जगह घर-परिवार के लोगों की हल्की-फुल्की खरीदारी से रंगती है तो कभी शाम को यह युवाओं, फोटोग्राफरों और साड़ी प्रेमियों से भर जाती है। इसका आकर्षण ऐसा है कि पहली बार आने वाला व्यक्ति भी बिना थके घंटों घूम सकता है और फिर भी महसूस करेगा कि अभी बहुत कुछ देखना बाकी है। गरियाहाट मार्केट की पहचान यह मार्केट सबसे ज़्यादा पारंपरिक बंगाली साड़ियों के लिए जाना जाता है। यही इसकी खास बात है। यहां की दुकानों में रेशम, तसर, कांथा, बालूचरी, ढाकाई, गरद, कोरा, ताप, और सूती टांट साड़ियां हर रंग, डिज़ाइन और बजट में उपलब्ध होती हैं। हर साड़ी की बहुत ही खूबसूरत और अद्भुत दिखती है कहीं कारीगरों की महीनों की मेहनत छुपी होती है, तो कहीं पारंपरिक लोक कथाओं और मंदिर कला से प्रेरित डिज़ाइन। जिन महिलाओं को साड़ियों का शौक है, उनके लिए गरियाहाट स्वर्ग जैसा लगता है, क्योंकि यहां आपको डिजाइनर बुटीक्स से लेकर स्ट्रीट शॉप तक सब कुछ एक साथ मिल जाता है। कई दुकानों में हाथ से काम की गई कांथा स्टिच साड़ियां और जामदानी इतने खूबसूरत पैटर्न में मिलती हैं कि उन्हें देखते ही देखने वाले का मन जीत लेती हैं। यह जगह दुल्हन की शॉपिंग के लिए भी बहुत फेमस है, इसलिए त्योहारों, दुर्गा पूजा और शादी के मौसम में यहां पैर रखने की जगह भी मुश्किल हो जाती है। गरियाहाट का इतिहास जानते हैं! यह बाजार करीब सौ साल से भी ज्यादा समय से दक्षिण कोलकाता के ट्रेड और कल्चर का मुख्य केंद्र रहा है। पुराने समय में यह जगह छोटे-छोटे दुकानदारों और बंगाली समाज के पारंपरिक व्यापारियों का एक साधारण बाजार था। समय के साथ यह कोलकाता का सबसे सक्रिय और प्रतिष्ठित बाजार बन गया। यहां खरीदारी करना सिर्फ एक व्यापारिक काम नहीं रहा बल्कि लोगों के लिए एक सामाजिक अनुभव भी बन गया। जहां दुकानें सिर्फ खरीदने-बेचने का स्थान नहीं, बल्कि बातचीत, हंसी और मानवीय रिश्तों की गर्माहट का हिस्सा हैं। कई दुकानों के मालिक पीढ़ियों से इस बाजार से जुड़े हुए हैं और उनकी पहचान आज भी उनके ग्राहकों के परिवारों से वर्षों पुराने रिश्तों की तरह मजबूत है। यही कारण है कि यहां की पुरानी दुकानों में ग्राहकों का विश्वास और स्नेह वैसा ही बना रहता है जैसा परिवार में होता है।(त्योहारों, दुर्गा पूजा और शादी के मौसम में यहां पैर रखने की जगह भी मुश्किल हो जाती है।) क्या यहां केवल साड़ियां ही मिलती है? गरियाहाट मार्केट सिर्फ साड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि हस्तशिल्प, ज्वेलरी, होम डेकोर, हैंडमेड आइटम्स और दैनिक उपयोग की चीज़ों के लिए भी बेहद लोकप्रिय है। सड़क के दोनों ओर लगी स्टॉल्स पर बांस-कला, जूट बैग, टेराकोटा, शोपीस, पारंपरिक खिलौने, कोलकाता थीम्ड स्मृति चिन्ह, डरपोक कलर बैग, हाथ से बने कान के झुमके और चूड़ियां आंखों को चकाचौंध कर देती हैं। इन स्टॉल्स पर होने वाली मोलभाव की बातचीत इस मार्केट के मज़े का अहम हिस्सा है। यहां हर खरीद मोल-भाव के साथ ही पूरी होती है और यही असली ‘कोलकाता मार्केट कल्चर’ है। यही नहीं, यहां आधुनिक डिजाइनर स्टूडियोज, रेडीमेड गारमेंट्स, फुटवियर, इलेक्ट्रॉनिक एक्सेसरीज़ और ब्यूटी उत्पाद भी बड़ी संख्या में मिलते हैं। यानी यह बाजार परिवार के हर सदस्य के लिए कुछ खास लेकर तैयार है। मार्केट में खाना-पीना किसी भी बाजार की पहचान उसके खाने-पीने से होती है और गरियाहाट इस मामले में पूरी तरह unbeatable है। यहां स्ट्रीट फूड की खुशबू हर आगंतुक को रोक लेती है। कोलकाता का मशहूर फिश फ्राई, एग रोल, चाउमीन, फुचका, घुगनी, कटलेट, मोमोज, चाय और रसगुल्ला सब कुछ यहां शानदार स्वाद में मिलता है। कई लोग सिर्फ ‘गरियाहाट वाले एग रोल’ और ‘कटलेट’ खाने के लिए खास तौर पर यहां आते हैं। शाम को जब गलियों में रोशनी जलती है, सड़क किनारे खाने के स्टॉल चमक उठते हैं और भीड़ चाय के गिलासों की खनक और बातचीत की आवाज़ों में घुल जाती है, तब यह जगह और भी खूबसूरत हो जाती है। कई स्थानीय लोग कहते हैं कि “गरियाहाट में खरीदारी हो या न हो, खाना ज़रूर होना चाहिए! और सच मानिए, यह बात 100% सच लगती है। अब बात करते हैं कैसे पहुंचें? तो गरियाहाट पहुंचना काफी आसान है। कोलकाता एयरपोर्ट से टैक्सी या कैब के जरिए लगभग 50-60 मिनट में आप यहां आ सकते हैं। निकटतम मेट्रो स्टेशन कालीघाट और जादवपुर हैं, जहां से आप ऑटो या रिक्शा लेकर आसानी से गरियाहाट मार्केट पहुंच सकते हैं। कोलकाता की आइकॉनिक ट्राम सेवा का भी अनुभव पास में मिल जाता है, जो यहां की यात्रा में एक पुरानी यादों जैसा स्पर्श देती है। यहां पार्किंग की सुविधा सीमित होने के कारण लोकल ऑटो, बस या कैब से आना बेहतर माना जाता है। अगर आप पहली बार आ रहे हैं, तो शाम 5 से 9 बजे के बीच का समय सबसे अच्छा है ना ज्यादा गर्मी, ना ज्यादा भीड़, बल्कि त्योहार जैसा जीवंत माहौल। क्यों आना चाहिए गरियाहाट मार्केट? इस मार्केट में परंपरा और आधुनिकता एक ही राह पर साथ चलते हुई दिखाई देते हैं। यहां की साड़ियों में कारीगरों की कला जीवित होती है, यहां के खाने में प्रेम और अपनापन मिलता है, यहां की भीड़ में जीवन की चमक दिखाई देती है और यहां की दुकानों में इतिहास के पन्ने छिपे रहते हैं। जो परत दर परत खुलता हुआ नजर आता है। जब आप यहां से निकलते हैं, तो अपने साथ सिर्फ सामान या स्मृति चिन्ह नहीं, बल्कि यादें, खुशियां और बंगाली संस्कृति की यादें समेट कर जाते हैं। यकीन मानिए, जो व्यक्ति एक बार गरियाहाट आता है, उसे यह जगह हमेशा याद रहती है और

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“Bishnupur” West Bengal: का समृद्ध इतिहास और टेराकोटा कारीगरी की अनसुनी दास्तान!

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Bishnupur: देश की भीड़-भाड़ और भागदौड़ से थोड़ी दूर, पश्चिम बंगाल के बांकुरा ज़िले में बसा बिष्णुपुर एक ऐसा शहर है जो इतिहास, संस्कृति, कला और भक्ति को एक साथ समेटे हुए है। इसे टेराकोटा मंदिरों की भूमि कहा जाता है और यह उपाधि यूं ही नहीं मिली। यहां के मंदिरों की लाल-पकी मिट्टी से बनी नक्काशी, युद्ध, प्रेम और धर्म की कहानियों को पत्थर पर नहीं बल्कि मिट्टी पर उकेरने की अनोखी कला को दिखाती है। बिष्णुपुर के मंदिर सिर्फ पूजा की जगह नहीं, बल्कि समय के पन्नों पर उकेरी गई अद्भुत धरोहर की निशानी हैं। बिष्णुपुर कहां है और क्यों मशहूर है? बिष्णुपुर पश्चिम बंगाल West Bengal की राजधानी कोलकाता kolkata से लगभग 200 किलोमीटर दूर है और बांकुरा ज़िले का एक प्रमुख शहर माना जाता है। आज भले ही इसे शांत और साधारण शहर के रूप में देखा जाता है, लेकिन 17वीं और 18वीं शताब्दी में यह मल्ल राजाओं की राजधानी हुआ करता था। मल्ल वंश के राजाओं ने कला, संगीत, हस्तशिल्प और मंदिर संस्कृति को इतना बढ़ावा दिया कि बिष्णुपुर पूरे भारत में पहचान बनाने लगा। ये वही मल्ल राजा थे जिन्होंने टेराकोटा वास्तुकला की अनोखी शैली को जन्म दिया। जहां मिट्टी, गोंद और खास तरह की वनस्पतियों को पका कर हजारों साल टिकने वाला पत्थर जैसा मजबूत पदार्थ बनाया जाता था। बिष्णुपुर की प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण यही टेराकोटा मंदिर हैं, जो आज भी लगभग 400 साल बाद उसी शान के साथ खड़े हैं। कब और कैसे शुरू हुई यह परंपरा टेराकोटा वास्तुकला Terracotta Art का विकास मल्ल राजाओं के शासन में हुआ, खासकर राजा वीर हंबीर और राजा रघुनाथ सिंह के समय में। जब मुगल शैली और बंगाल की पारंपरिक कला का मेल हुआ। तब एक अद्भुत निर्माण कला पैदा हुई। इस समय लोग भक्ति आंदोलन से बेहद प्रभावित थे, इसलिए राधा-कृष्ण, रामायण, महाभारत और भगवान विष्णु से जुड़ी कथाओं को मंदिर की दीवारों पर उकेरना कला और श्रद्धा दोनों का मिश्रण बन गया। मंदिरों की दीवारों में युद्ध के दृश्य, महाभारत और रामायण के प्रसंग, रासलीला, लोकनृत्य, सैनिकों के युद्ध उपकरण, घोड़े, हाथी और आम जन जीवन को तफ़सील से दिखाया गया है। इन नक्काशियों को देखते हुए ऐसा लगता है जैसे मिट्टी बोल रही हो और इंसान सिर्फ सुन रहा हो। टेराकोटा कला की खासियत यह है कि इसमें ना तो कोई रंग और ना ही किसी बहुमूल्य धातु का इस्तेमाल होता है सिर्फ मिट्टी और मेहनत का समावेश है। बिष्णुपुर में क्या-क्या देखें? बिष्णुपुर में घूमने के लिए कई ऐतिहासिक स्थल हैं लेकिन कुछ मंदिर ऐसे हैं जिन्हें देखे बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। बिष्णुपुर क्यों जाएं? आज जब पर्यटन मनोरंजन और शोर में बदल रहा है, बिष्णुपुर आपको शांति, रोमांच और सभ्यता की गहराई महसूस कराता है। यहां कोई भीड़-भाड़ वाली सड़कें नहीं, ना ही बेवजह चमक-दमक। यह जगह इतिहास और संस्कृति को जानने वालों के लिए एक खजाना है। फोटोग्राफर्स, इतिहास प्रेमियों, कलाकारों, विद्यार्थियों और सोलो ट्रैवलर्स के लिए यह एक तरह से प्रेरणा का स्रोत है। शांत वातावरण में घंटियों की मीठी आवाज़ और मिट्टी की खुशबू दिल को छू जाती है। यहां बिताया हुआ हर पल यादगार बन जाता है।(बिष्णुपुर की प्रसिद्धि का सबसे बड़ा कारण यही टेराकोटा मंदिर हैं, ) यह भी पढ़ें- West Bengal: भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025 की रिपोर्ट में महाराष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर! कैसे पहुंचें और कब जाएं? बिष्णुपुर पहुंचना आसान है। बिष्णुपुर में क्या खरीदें और कहां ठहरें? यहां की यात्रा बिना शॉपिंग के अधूरी है। सबसे पहले नाम आता है बिष्णुपुर की प्रसिद्ध बालुचरी साड़ी का, जो रेशम से बनी होती है और उसकी बॉर्डर पर रामायण तथा महाभारत की कथाएं बुनी जाती हैं। इसके अलावा टेराकोटा ज्वेलरी, मिट्टी की मूर्तियां, लोक वाद्य यंत्र और पारंपरिक सजावटी वस्तुएं बेहद खूबसूरत मिलती हैं। रहने की सुविधा के लिए कई अच्छे होटल, लॉज और वेस्ट बंगाल टूरिज्म के गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं जो बजट और प्रीमियम दोनों विकल्प देते हैं। यह भी पढ़ें- AJMER ELECTRIC CRUISE:अब आनासागर झील पर मिलेगा लग्जरी इलेक्ट्रिक क्रूज का मज़ा! मामूली खर्च में लीजिए गोवा जैसा आनंद! बिष्णुपुर यात्रा से संस्कृति संजोना सीखिए बिष्णुपुर सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक शानदार एहसास है। यहां की मिट्टी में इतिहास का बास होता है, मंदिरों में कला बोलती है और हवा में भक्ति की शांति घुली रहती है। जब आप रसमान्चा के सामने खड़े होकर लाल मिट्टी की खुशबू महसूस करते हैं या मंदिरों की दीवारों पर उकेरी कहानियों को देखते हैं, तब लगता है जैसे सैकड़ों साल पीछे चले गए हैं। आज जब दुनिया तेज़ भाग रही है, बिष्णुपुर आपको रुककर सोचना सिखाता है कि सभ्यता सिर्फ इमारतों से नहीं बल्कि संस्कृति से बनती है। यहां की यात्रा जीवन भर याद रहती है और मन फिर लौट आने का वादा कर लेता है।

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Hanukkah 4-12 December: यहूदियों का वह त्यौहार जो विश्वास, रौशनी और उम्मीद की लौ का प्रतीक है!

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दिसंबर का महीना वैसे ही दुनिया का सबसे खूबसूरत महीना माना जाता है। सर्दी की हल्की-हल्की ठंड, शहरों में जगमगाती रोशनियां, क्रिसमस की तैयारी, साल का आखिरी पड़ाव और बीच में एक ऐसा त्यौहार जो रोशनी का असली मतलब समझाता है Hanukkah। जिसे यहूदी भाषा में ‘चानूका’ भी कहा जाता है। हर साल की तरह इस बार भी Hanukkah 4 दिसंबर से शुरू होकर 12 दिसंबर की रात को खत्म होगा। ये पूरे आठ दिनों तक चलने वाला ऐसा उत्सव है जो सिर्फ मोमबत्तियां जलाने भर का समारोह नहीं है, बल्कि हजारों साल पुरानी बहादुरी, संघर्ष, धर्म-स्वतंत्रता और चमत्कार की कहानी को याद करता है। यह त्यौहार आपको सिखाता है कि कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों, जीत रोशनी की ही होती है। अगर जिंदगी में उम्मीद बची है, भरोसा जिंदा है, तो कोई भी अंधेरा हमेशा नहीं रहता। शायद इसी वजह से आज ना सिर्फ यहूदी समुदाय बल्कि दुनिया भर के यात्री और संस्कृति प्रेमी भी Hanukkah को देखने और उसमें शामिल होने के लिए यात्रा करते हैं।(बल्कि हजारों साल पुरानी बहादुरी, संघर्ष, धर्म-स्वतंत्रता और चमत्कार की कहानी को याद करता है। ) कब से शुरू हुआ हनुक्काह? इस त्यौहार की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसे जानना बेहद जरूरी है क्योंकि बिना इतिहास के कोई भी सांस्कृतिक अनुभव अधूरा है। करीब 2000 साल पहले का समय था, जब इज़राइल पर ग्रीक-सीरियन साम्राज्य का कब्ज़ा था। यहूदी लोगों के धार्मिक अधिकार छीन लिए गए थे। उनकी परंपराओं पर रोक लगा दी गई थी और Jerusalem का पवित्र मंदिर भी अपमानित कर दिया गया था। लेकिन तभी एक छोटा-सा समूह जिसे Maccabees कहा जाता है आगे आया और उन्होंने अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी संख्या बहुत कम थी, साधन कम थे, लेकिन हिम्मत और विश्वास बड़ा था। इससे जुड़ी कहानी लंबी जंग के बाद आखिरकार यहूदी लोगों ने अपनी धरती वापस हासिल की और मंदिर को फिर से शुद्ध करके धार्मिक जीवन शुरू किया। जब तेज़ी से साफ-सफाई करके पूजा करने का समय आया, तो वहां सिर्फ थोड़ा-सा पवित्र तेल बचा था, जो केवल एक दिन के लिए काफ़ी था। लेकिन चमत्कार हुआ वो तेल लगातार आठ दिनों तक जलता रहा। इसी चमत्कार की याद में हर साल Hanukkah मनाया जाता है। हर दिन एक नई मोमबत्ती जलाई जाती है ताकि आठवीं रात तक पूरा दीपक जगमगा उठे। यही तेल का चमत्कार इस त्यौहार की आत्मा है छोटा सा भरोसा भी बड़े से बड़े अंधेरे को मात दे सकता है। कैसे मनाया जाता है? Hanukkah के समारोह में एक खास स्थान होता है Menorah का जिसे Hanukkiah भी कहा जाता है। यह एक दीपक नुमा स्टैंड होता है जिसमें कुल नौ शाखाएं होती हैं। आठ मोमबत्तियों के लिए और एक Shamash के लिए, जो अन्य मोमबत्तियों को जलाने के काम आता है। हर शाम परिवार और समुदाय इकट्ठा होते हैं, प्रार्थना करते हैं, गीत गाते हैं और menorah की मोमबत्तियां जलाते हैं। यह दृश्य देखने में इतना शांत, पवित्र और भावुक होता है कि दिल छू जाता है। लोग यह मानते हैं कि हर मोमबत्ती सिर्फ रोशनी नहीं बल्कि उम्मीद, आज़ादी, यादों और संस्कृति की लौ है। त्यौहार में तेल में बनी चीज़ों को खाना खास परंपरा है, क्योंकि यह चमत्कार तेल से जुड़ा हुआ है। Latkes आलू के पैनकेक, Sufganiyot जेली भरे गोल-गप्पे जैसे मीठे, अलग-अलग फ्राइड स्नैक्स, घर-घरेलू पकवान पूरे त्यौहार में प्रमुख होते हैं। साथ ही बच्चे और परिवार gelt यानी चॉकलेट के सिक्के या असली पैसे भी उपहार में पाते हैं। Dreidel नामक एक घूमने वाला टॉप-खेल भी खेला जाता है, जिसमें हर अक्षर का अलग अर्थ है और जो युद्ध के दिनों में एक प्रतीक माना जाता है। कहां कहां मनाया जाता है? अगर बात करें कि यह त्यौहार कहां सबसे ज़्यादा धूम-धाम से मनाया जाता है, तो पहला नाम आता है Jerusalem का वह पवित्र शहर जहां इस चमत्कार की शुरुआत हुई थी। Hanukkah के दौरान Jerusalem की गलियां, बाज़ार, मंदिर, पहाड़ियों का दृश्य और रात में हजारों menorah की रौशनियां यह सब मिलकर एक स्वप्न जैसा अनुभव देते हैं। Western Wall पर होने वाली सार्वजनिक menorah lighting दुनिया भर से आने वाले यात्रियों को आकर्षित करती है। वहां की प्रार्थना-धुन और माहौल ऐसा होता है कि आपके भीतर एक अद्भुत शांति उतर आती है। इसके अलावा Tel Aviv में Hanukkah एक मॉडर्न और बेहद खास अंदाज़ में मनाया जाता है। भारत में भी मुंबई, पुणे और कोलकाता में सीमित स्तर पर यह समारोह देखा जा सकता है, जहां यहूदी समुदाय Baghdadi और Bene Israel परिवारों के साथ इसका आयोजन करता है। मनाने का तरीका, व्यंजन और परंपरा Hanukkah के दौरान हर कोई कुछ न कुछ अनुभव कर सकता है प्रत्येक के लिए यह त्यौहार बिल्कुल परफेक्ट है क्योंकि इसमें हर भावना शामिल है इतिहास, सांस्कृतिक पहचान, स्वादिष्ट खाना, लोक संगीत, कला, आध्यात्म और रोमांच। वहीं Tel Aviv में समुद्र किनारे चलना, त्यौहार की रौशनी में कैफ़े बाज़ार घूमना, तेल में बनी मिठाइयां चखना और street celebrations देखना बिलकुल फिल्मी एहसास देता है। सबसे मजेदार बात यह है कि Hanukkah ऐसा त्यौहार है जिसमें बाहरी लोगों और यात्रियों का स्वागत किया जाता है और उन्हें समारोह का हिस्सा बनने में कोई हिचक नहीं होती। लोग आपको अपने घर, अपनी मेज और अपनी संस्कृति में शामिल करते हैं। हनुक्काह क्यों इतना अहम है? इस त्यौहार का सबसे गहरा अर्थ क्यों में छुपा है। आखिर Hanukkah क्यों इतना अहम है? यह त्यौहार सिर्फ इतिहास नहीं बताता, यह आज की दुनिया के लिए भी एक संदेश है कि बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अच्छे लोग अगर हिम्मत नहीं हारते तो जीत उनकी होती है। एक छोटा-सा दीपक भी आठ दिनों तक जल सकता है मतलब छोटी सी उम्मीद भी बड़ा चमत्कार कर सकती है। इसी वजह से Hanukkah को Festival of Lights या रोशनी का पर्व कहा जाता है। आज दुनिया भर में जब भी लोग मुश्किल परिस्थितियों में जीते हैं, संघर्ष करते हैं, या पहचान बचाने की लड़ाई लड़ते हैं Hanukkah उन्हें प्रेरित करता है कि वे हार न मानें। क्या हर कोई इसे मना सकता है? अब सवाल यह है कि Hanukkah कौन मनाता है? या कौन मना सकता है? तो

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West Bengal: भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025 की रिपोर्ट में महाराष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर!

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West Bengal: ये नाम लेते ही आंखों के सामने किसी चित्र-कला की तरह रंग बिखर जाते हैं। कहीं चाय-बागानों से लिपटा धुंध-भरा दार्जिलिंग दिखाई देता है, कहीं सागर-किनारे की ठंडी हवा में डोलता दीघा, कहीं साहस और सन्नाटे की तहों में छिपा सुंदरबन, और कहीं कोलकाता की गलियों में बसा संस्कृति कला संगीत का अनूठा संसार, जिसे देखकर हर यात्री की Travel Diaries एक नई कहानी लिखती है। यह राज्य भोजन की मिठास का ठिकाना है सच में Mountains to Sea का एक अद्भुत रूप है। भारत के नक़्शे में अगर कोई जगह अपनी विशिष्ट पहचान और अनोखे व्यक्तित्व के साथ मौजूद है तो वह है पश्चिम बंगाल, जहां की संस्कृति और विरासत Heritage and Culture के सबसे खूबसूरत नमूनों में गिनी जाती है। यहां आने वाला हर इंसान महसूस करता है कि यह यात्रा सिर्फ सफ़र नहीं बल्कि आत्मा का अनुभव है। बंगाल की हवा में सादगी है, बोली में अपनापन है, संगीत में मिठास है और खान-पान में भावनाओं का स्वाद है यही वजह है कि Bengal Tourism हर साल लाखों पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है, और Incredible India की चमक में एक महत्वपूर्ण योगदान देता है। इसलिए भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025 के अनुसार, पश्चिम बंगाल भारत का दूसरा सबसे ज़्यादा पर्यटकों का आकर्षण रहा है।(West Bengal: ये नाम लेते ही आंखों के सामने किसी चित्र-कला की तरह रंग बिखर जाते हैं। ) आइए कोलकाता के इतिहास को जी लीजिए! पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता, जिसे किसी वक़्त कलकत्ता कहा जाता था, अपने आप में एक संग्रहालय है। यहां की गलियों की दीवारों पर इतिहास लिखा हुआ है, और गंगाजी की शांत लहरों में सदियों की कहानियां बहती हैं। विक्टोरिया मेमोरियल की सफ़ेद संगमरमर की इमारत, हावड़ा ब्रिज का विशाल संघर्ष-प्रतीक रूप, पार्क स्ट्रीट की रोशनी, और कॉलेज स्ट्रीट की किताबों की बस्ती सब कोलकाता को एक ऐसा रूप देते हैं, जो कहीं और देखने को नहीं मिलता। दुर्गा पूजा के दिनों में पूरा शहर एक विराट उत्सव में बदल जाता है। पंडालों की कलाकारी और मां दुर्गा की मूर्तियों की कला इतनी जीवन्त होती है कि देखते ही मन श्रद्धा से झुक जाता है। सड़कों पर कुम्हारों की बस्ती, कुमर्तुली में कलाकार मिट्टी में सांसे डालते नज़र आते हैं और उसी मिट्टी से संस्कृति की सांसे भी सजीव होती हैं। कोलकाता के चौराहों पर बैठकर चाय की केतली से निकली भाप में गप्पें उड़ाना, हाथ में मिष्टी दूई का ठंडा कटोरा और रात में रसगुल्ले का मीठा स्वाद यही कोलकाता है, यहां जीवन की रफ़्तार तेज़ भी है और दिल की धड़कनें धीमी और रोमांच से भरी भी। यह भी पढ़ें- Zurich: स्विट्ज़रलैंड के इस शहर में घूमने के लिए दस वे जगहें जो खूबसूरती की मिसाल हैं! ऐतिहासिक कोलकाता विशेष रोमांच इस पुराने लेकिन जीवंत शहर की खासियत है कि यहां हर मोड़ पर आपको Historic Kolkata की झड़ी मिलेगी, जहां इतिहास अपनी गाथा सुनाता है। जब आप Kolkata Diaries में इन गलियों का चक्कर लगाते हैं, तो टूटती ज़मीन और बदलते दौर की कहानी खुद आपके सामने खुल जाती है। पार्क-स्ट्रीट की चमक-दमक, कॉलेज-स्ट्रीट की किताबों की भीड़, और हावड़ा ब्रिज का संग सब मिलकर Authentic Bengal Experience देते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान, आपको कोलकाता की जीवंत संस्कृति, भक्ति, लोक-कला और त्योहारों का असली रंग देखने को मिलेगा यही Festive Kolkata Vibes हैं। और जब आप शाम को चाय-कप हाथ में लेकर किसी पुरानी किताब की दुकान के बाहर खड़े हों या मिठाई की दुकान से भाप-भरी मिष्टी दूई लेकर निकलें, तो समझ जाइए कि आप सिर्फ शहर नहीं, एक जिंदा इतिहास और संस्कृति के साथ जुड़ चुके हैं। यह भी पढ़ें – Jogini Waterfall: हिमाचल की बर्फीली वादियों में इतना सुंदर झरना, जो नहीं देखा तो क्या देखा! दार्जिलिंग में चाय की चुसकियां कौन लेगा? बंगाल का सबसे खूबसूरत पहाड़ी ठिकाना दार्जिलिंग, अपने चाय-बागानों, ठंडी हवा, बादलों की धुंध और हिमालय की गोद में बसे अद्भुत नज़ारों की वजह से क्वीन ऑफ़ हिल्स कहलाता है। सुबह-सुबह टाइगर हिल से सोने-सा चमकता सूरज जब पहाड़ों को रोशन करता है, तो पूरा आसमान जैसे किसी इंद्रधनुषी रोशनी में नहा जाता है। यहां की टॉय ट्रेन, जिसे यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित कर चुका है, पहाड़ों को चीरती हुई धीरे-धीरे आगे बढ़ती है, और हर मोड़ पर दिल खुश हो उठता है। दार्जिलिंग की संस्कृति में नेपाली तिब्बती लिम्बू लेप्चा समुदायों की आवाज़ें, गीत-संगीत, परंपराएं और जीवन-शैली आज भी ख़ूब जीवित हैं। यहां का खाना भी उतना ही शानदार है। बांस के भाप में पकते मोमोज, थुक्पा की स्टीम भरी कटोरी और कड़क दार्जिलिंग टी बस मानो पूरा सफ़र स्वाद की यात्रा में बदल जाता है। पहाड़ों का सुकून, हरियाली की शांत आवाज़ और वहां के लोगों का अपनापन दार्जिलिंग को हर यात्री की आत्मा से जोड़ देता है। सुंदरबन जंगल सफारी तो बनती है अगर बंगाल की धरती को प्रकृति की सबसे अद्भुत देन कहा जाए, तो वह सुंदरबन है दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल, जहां नदियां एक-दूसरे का रास्ता काटती हैं और हर मोड़ पर पानी, हवा और धरती एक अनोखा चित्र रचते हैं। यहां नावों में तैरते-तैरते जब चारों तरफ घना जंगल दिखाई देता है और पानी की सतह पर हल्की धूप नाचती है, तो मन में एक हल्का रोमांच और शांत भय दोनों पैदा होते हैं। सुंदरबन का सबसे बड़ा आकर्षण है शाही रॉयल बंगाल टाइगर, जिसे देखने भर के लिए हर साल दुनिया भर से लोग यहां आते हैं। जंगल की खामोशी में अचानक किसी अज्ञात आवाज़ का गूंजना, नदी की सतह पर मचलती मछलियां और नाव के नीचे गहरे पानी का अंतहीन विस्तार यह अनुभव किसी भी सफ़र से अलग है। यहां का जीवन भी कठिन और अद्भुत है स्थानीय लोग नदी के उतार-चढ़ाव और जंगल के नियमों के साथ चलते हैं। खाने में ताज़ी मछलियां, झींगा और इमली-मसालों की ख़ुशबू वाला समुद्री खाना सुंदरबन के स्वाद और समुद्र की पहचान दोनों को ज़िंदा रखता है। यह यात्रा सिखाती है कि प्रकृति सिर्फ सुंदर नहीं, बल्कि बेहद शक्तिशाली भी है। समुंदर की लहरें का आनंद लीजिए दीघा में जब भी मन समुद्र की लहरों के साथ खुलकर सांस लेना चाहता है, तब दीघा का नाम अपने-आप याद आ जाता

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INDORE: के यह 5 बाजार हैं शॉपिंग के लिए सबसे परफेक्ट, जहां एक बार तो जाना बनता है!

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INDORE: इंदौर बस साफ–सफाई में नंबर वन नहीं है, खरीदारी के लिए भी हिंदुस्तान के सबसे सुंदर और मोहक शहरों में से एक माना जाता है। यहां की गलियों में घूमते हुए जो अपनापन, ताज़गी और खुशबू महसूस होती है, वह शायद ही कहीं और मिले। इंदौर अपने बेहतरीन खान–पान, शानदार कपड़ा मंडियों, आकर्षक कॉस्मेटिक शॉप्स, किताबों की महक और रंग–बिरंगी साड़ियों के लिए मशहूर है। अगर कोई शख्स इंदौर घूमने आए और यहां की मार्केट की रौनक न देखे, तो समझिए सफर अधूरा है। शहर के कुछ खास बाज़ार जिसमें छप्पन दुकान, एमटी कपड़ा बाज़ार, अटाला बाज़ार, खजूरी बाज़ार और शीतलामाता बाजार न सिर्फ खरीदारी का केंद्र हैं, बल्कि यहां की संस्कृति, लोगों की गर्मजोशी और इंदौरी अंदाज़ को खुलकर बयां करती है। हर गली में एक नया रंग बिखरा हुआ हो और दुकानदारों की मुस्कुराहटों में अपनापन महसूस होता है। यही वजह है कि इंदौर की मार्केट्स पूरे देश में चर्चित हैं और यहां का माहौल पर्यटकों को हमेशा बांधकर रखता है। छप्पन दुकान मार्केट (Chappan Dukan Market) सबसे पहले बात करते हैं छप्पन दुकान की जिसे इंदौर का मिनी फूड पैराडाइज़ कहा जाता है। नाम छप्पन दुकान इसलिए पड़ा क्योंकि शुरुआत में यहां सिर्फ 56 दुकानें थीं और हर दुकान किसी न किसी खास व्यंजन के लिए फेमस थी। आज भी यह जगह इंदौर का दिल मानी जाती है जहां सुबह से रात तक भीड़ लगी रहती है। पोहा, जलेबी, भुट्टे का किस, दही वड़ा, गराड़ू, मकई, फलूदा, पान, मोमोज़, पिज़्ज़ा, सब कुछ यहां मिलता है। खाने के साथ–साथ यहां स्ट्रीट शॉपिंग भी काफी मज़ेदार है। परिवार, दोस्त, कपल, सभी कभी न कभी यहां जरूर आते हैं। छप्पन दुकान में स्वाद की खुशी और इंदौर की मेहमाननवाज़ी का असली मज़ा मिलता है। शाम के समय मार्केट लाइट्स, म्यूजिक और भीड़ का जो माहौल बनता है, वह अपने आप में त्यौहार जैसा लगता है। यह जगह बताती है कि भोजन सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं बल्कि शहर की पहचान और संस्कृति का प्रतीक है और सच कहें तो यहां खाए गए व्यंजनों का स्वाद ज़िंदगी भर याद रहता है। कहां है और कैसे पहुंचे? छप्पन दुकान इंदौर के न्यू पलासिया में स्थित है, शहर के बीचों बीच। इंदौर रेलवे स्टेशन से यह लगभग 3 किलोमीटर और देवी अहिल्या एयरपोर्ट से करीब 10 किलोमीटर दूर है। यहां ऑटो, कैब या सिटी बस से आसानी से पहुंचा जा सकता है। पार्किंग और बैठने की अच्छी सुविधा भी उपलब्ध है।(यही वजह है कि इंदौर की मार्केट्स पूरे देश में चर्चित हैं और यहां का माहौल पर्यटकों को हमेशा बांधकर रखता है।) एमटी कपड़ा मार्केट (MT Kapda Market) अब ज़िक्र करते हैं एमटी कपड़ा बाज़ार का जो इंदौर ही नहीं बल्कि पूरे मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी कपड़ा मंडी मानी जाती है। यहां थोक का कारोबार इतना बड़ा है कि पूरे देश से व्यापारी कपड़े खरीदने आते हैं। शादी–विवाह हो या त्यौहार हर मौके के लिए यहां शानदार वैराइटी मिलती है सूट–सलवार, कुर्ती, ब्लाउज़ डिजाइन, लहंगे, पुरुषों के शेरवानी, जोधपुरी सेट्स, बच्चों के गारमेंट्स और होम टेक्सटाइल की भी बेहतरीन रेंज उपलब्ध है। यहां कपड़े इतने किफायती दाम पर मिलते हैं कि लोग आसपास के शहरों से स्पेशल खरीदारी करने आते हैं। पूरे बाज़ार में दौड़ती–भागती गाड़ियां, कपड़े ले जाते मज़दूर, दुकानों में लगी भीड़ और सौदेबाज़ी का माहौल दिलचस्प लगता है। अगर किसी को फैशन बिज़नेस शुरू करना हो तो एमटी कपड़ा बाज़ार उसके लिए सोने की खान साबित हो सकता है। इतने विशाल स्तर पर व्यापार होने के बाद भी दुकानदारों की विनम्रता और व्यवहार दिल जीत लेते हैं। यह बाज़ार शहर की आर्थिक ताकत का बड़ा स्तंभ माना जाता है। यह भी पढे – Hidimba Devi Temple: हिमाचल के मनाली में एकमात्र भीम की पत्नी हिडिंबा को समर्पित महाभारत युगीन मंदिर!  कहां है और कैसे पहुंचे? एमटी कपड़ा बाज़ार इंदौर के उषा नगर / सांताक्रूज़ Santa Cruz क्षेत्र में स्थित है। यह शहर का प्रमुख थोक कपड़ा हब है। इंदौर रेलवे स्टेशन से लगभग 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर है। टैक्सी, ऑटो या बस से आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है। अटाला मार्केट इंदौर (Atala Market Indore) इसी अंदाज़ में चलते हैं अटाला बाज़ार, जो युवाओं और महिलाओं की मनपसंद जगहों में गिना जाता है। यहां पर ट्रेंडी कपड़े, कॉस्मेटिक्स, ज्वेलरी, बैग्स और फैशन एक्सेसरीज़ की इतनी विशाल रेंज मिलती है कि समझ नहीं आता पहले क्या खरीदें और छोड़ें क्या। छोटे–छोटे स्टॉल हों या बड़े शोरूम हर दुकान पर विकल्पों की दुनिया सजी मिलती है। कॉलेज जाने वाली लड़कियों से लेकर शादी में तैयार होने वाली महिलाओं तक के लिए यह मार्केट एक परफेक्ट डेस्टिनेशन है। सस्ते दाम, न्यू ट्रेंड और मनमाफिक चयन यही इसकी पहचान है। खास बात यह है कि यहां के दुकानदार इतने फ्रेंडली होते हैं कि bargaining करना भी मज़ेदार लगता है। अगर किसी को आधुनिक फैशन से अपडेट रहना हो, तो अटाला बाज़ार जरूर जाना चाहिए। शाम के वक्त यहां की चहल–पहल और रंगीन रोशनी माहौल को और भी खूबसूरत बना देती है। कहां है और कैसे पहुंचे? अटाला बाज़ार इंदौर के राजवाड़ा क्षेत्र के पास स्थित है। शहर के पुराने और सबसे व्यस्त बाजारों में से एक। यहां पहुंचना बेहद आसान है। इंदौर रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किलोमीटर दूर। ऑटो, ई-रिक्शा, सिटी बस या पैदल भी आराम से पहुंचा जा सकता है। यह भी पढे – TERE ISHQ MEIN: दिल्ली की दिलकश गलियों में शूट हुई धनुष की नई फिल्म, सोशल मीडिया पर जमकर वायरल! खजूरी मार्केट इंदौर (Khajuri Market Indore) अब बात करते हैं खजूरी बाज़ार की, जिसे इंदौर का ज्ञान–केंद्र कहा जा सकता है। यह बाज़ार किताबों के प्रेमियों के लिए किसी खज़ाने से कम नहीं। स्कूल–कॉलेज की किताबें हों, कॉम्पिटीशन की तैयारी के लिए स्टडी मटीरियल, साहित्यिक किताबें, बेस्टसेलर नॉवेल, धार्मिक–आध्यात्मिक ग्रंथ, स्टेशनरी, आर्ट–क्राफ्ट सामान—सबकुछ यहां मिलता है। छात्रों, प्रोफेसरों और बुक–लवर्स की लगातार भीड़ यहां की पहचान है। कई लोग कहते हैं कि खजूरी बाज़ार की महक में पुरानी किताबों की सुगंध घुली होती है जो मन को आनंदित करती हैं। यहां किताब खरीदने का अनुभव किसी जश्न से कम नहीं लगता जैसे ज्ञान की एक नई खिड़की खुल रही हो। स्टेशनरी की दुकानों

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Zurich: स्विट्ज़रलैंड के इस शहर में घूमने के लिए दस वे जगहें जो खूबसूरती की मिसाल हैं!

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अगर आप Switzerland की यात्रा का सपना देखते हैं, तो Zurich जरूर शामिल कीजिए। यह एक बड़ा शहर तो है ही, साथ ही यूरोप की वह खास जगह है जो हर यात्री को अपनी सुंदरता, साफ़-सुथरे माहौल, झीलों और पहाड़ों से मोह लेता है। यहां आधुनिकता और प्रकृति का ऐसा अनोखा नजारा देखने को मिलता है। जिसे देखकर मन खुश हो जाता है। five colors of travel की इस पेशकश में जानें ज़्यूरिख में घूमने के 10 सबसे खूबसूरत और मशहूर स्थान, जिन्हें देखकर आपकी यात्रा अनफ़ॉरगेटेबल बन जाएगी। 1. ज़्यूरिख लेक Lake Zurich ज़्यूरिख लेक इस शहर की जान कहा जाए तो गलत नहीं होगा। नीले चमकते पानी के बीच दूर-दूर तक फैले पहाड़, किनारे बने वॉकवे और झील पर चलने वाली बोट सब कुछ इतना सुंदर लगता है कि दिल वहीं रुक जाने का मन करता है। यहां लोग सुबह–शाम टहलते, साइकलिंग करते और हंसते-खेलते नजर आते हैं। आप चाहें तो बोट क्रूज़ लेकर झील के शानदार नज़ारे करीब से देख सकते हैं।(five colors of travel की इस पेशकश में जानें ज़्यूरिख में घूमने के 10 सबसे खूबसूरत और मशहूर स्थान, जिन्हें देखकर आपकी यात्रा अनफ़ॉरगेटेबल बन जाएगी।) 2. ओल्ड टाउन Old Town Altstadt पुराने ज़्यूरिख की गलियां इतिहास की महक से भरी हैं। संकरी पत्थरों वाली सड़कों पर रंग–बिरंगी इमारतें, कैफे, पुरानी दुकानें और चर्च सब कुछ बेहद खूबसूरत है। यहां घूमते हुए ऐसा लगता है जैसे वक़्त कुछ देर के लिए रुक गया हो। यह जगह फोटोग्राफी के लिए भी बेस्ट है। 3. बॉनहोफस्ट्रासे Bahnhofstrasse दुनिया की सबसे फेमस और लग्ज़री शॉपिंग स्ट्रीट में Bahnhofstrasse का नाम ऊपर आता है। लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबी इस सड़क पर बड़ी-बड़ी ब्रांड्स, शो–रूम, खूबसूरत कैफे और आकर्षक स्टोर्स हैं। भले ही आप शॉपिंग न करना चाहें, फिर भी यहां टहलना एक शानदार एहसास देता है। 4. यूएटलीबर्ग पर्वत Uetliberg Mountain अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं, तो ज़्यूरिख का पूरा नज़ारा ऊपर से देखने के लिए Uetliberg पर्वत जरूर जाएं। यहां तक ट्रेन से आराम से पहुंच सकते हैं। ऊपर से पूरा शहर, झील और दूर तक दिखने वाली Alps की बर्फीली पहाड़ियां देखने लायक नज़ारा है। यहां ट्रील वॉक और ट्रैकिंग का मज़ा भी लिया जा सकता है। 5. स्विस नेशनल म्यूज़ियम Swiss National Museum स्विट्ज़रलैंड के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को करीब से जानना हो तो यह म्यूज़ियम बेहतरीन जगह है। यहां प्राचीन हथियार, कलाकृतियां, पुराने कपड़े, सिक्के और कला के शानदार प्रदर्शन देखने को मिलते हैं। यह जगह बच्चों और स्टूडेंट्स के लिए बेहद जानकारीपूर्ण मानी जा सकती है। 6. लिन्डेनहोफ़ हिल Lindenhof Hill Old Town के बीच स्थित यह छोटी सी पहाड़ी शहर का शांत और खूबसूरत व्यू पॉइंट है। यहां बैठकर लोग शांति महसूस करते हैं और सामने दिखती ऐतिहासिक इमारतें मन को सुकून देती हैं। पिकनिक के लिए यह एक बढ़िया स्थान माना जाता है। 7. ज़ू ज़्यूरिख Zoo Zurich परिवार, बच्चों या वाइल्डलाइफ प्रेमियों के लिए Zurich Zoo एक शानदार जगह है। यहां 300 से अधिक प्रजातियों के जानवर देखने को मिलते हैं, जिनके लिए प्राकृतिक जैसा ही वातावरण बनाया गया है। खासकर Masoala Rainforest Hall बहुत प्रसिद्ध है, जहां खुद को असली जंगल जैसा महसूस होता है। 8. कुंस्टहाउस ज़्यूरिख Kunsthaus Zurich Art Museum कला और पेंटिंग के शौकीन लोगों के लिए यह जगह किसी खजाने से कम नहीं। यहां यूरोप के मशहूर कलाकारों की हजारों पेंटिंग्स और आर्टवर्क मौजूद हैं। यह म्यूज़ियम शांत और सुकून देने वाला वातावरण प्रदान करता है। 9. सेंट पीटर चर्च St. Peter’s Church यह चर्च अपनी सुंदरता और दुनिया की सबसे बड़ी क्लॉक फेस घड़ी के लिए प्रसिद्ध है। यहां की वास्तुकला बेहद आकर्षक है और लोग यहां आकर प्रार्थना और शांति दोनों का आनंद लेते हैं। यह ज़्यूरिख के पुराने हिस्से की पहचान है। 10. ऑपेरा हाउस ज़्यूरिख Zurich Opera House अगर आपको म्यूज़िक, डांस, थिएटर और ओपेरा पसंद है, तो यह जगह मिस न करें। यहां अंतरराष्ट्रीय स्तर के शानदार शो और कला प्रस्तुति होती है। बाहर का आर्किटेक्चर भी इतना सुंदर है कि हर पर्यटक रुककर फोटो खींचना पसंद करता है। 11. लोकल स्विस फूड और कैफे कल्चर ज़्यूरिख का स्वाद भी इसकी खूबसूरती जितना ही मशहूर है। यहां की गलियों में छोटे–छोटे कैफे, चॉकलेट की दुकानें और स्थानीय व्यंजन जैसे स्विस फोंड्यू और रॉस्टी ज़रूर चखिए। यहां की चॉकलेट दुनिया भर में प्रसिद्ध है और इसे चखना यात्रा की सबसे मीठी याद बन जाती है। ज़्यूरिख सिर्फ घूमने की जगह नहीं, बल्कि एक अनुभव है। यहां का हर कोना रंगों, खुशबू, सुकून, कला और प्राकृतिक सुंदरता से भरा है। चाहे आप रोमांच के शौकीन हों, प्रकृति प्रेमी, संस्कृति जानने वाले या शांति चाहने वाले ज़्यूरिख हर किसी को खुश कर देता है। अगर आप यूरोप जा रहे हैं, तो ज़रूर अपने ट्रेवल प्लान में इस खूबसूरत शहर को शामिल करें।

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Mumbai: के 5 ऑफबीट डेस्टिनेशन, एक बार आओगे तो यहां की खूबसूरती को भुला नहीं पाओगे!

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Mumbai: सपनों का शहर “The City of Dreams” मुंबई नाम लेते ही चमक-दमक, बॉलीवुड, लोकल ट्रेन की रफ्तार, नाइटलाइफ और समंदर की लहरें दिमाग में एक साथ कौंध जाती हैं। यह शहर भारत का दिल भी है और धड़कन भी। लोग कहते हैं कि मुंबई सोती नहीं है और यह बात बिल्कुल सच लगती है जब आप इसकी सड़कों पर सुबह की ठंडी हवा से लेकर देर रात तक चलते हुए देखते हैं। लेकिन सिर्फ तेज़ जीवन, भीड़ और नियोन लाइट्स ही मुंबई की पहचान नहीं। इसके पास ऐसे अनगिनत आउटडोर डेस्टिनेशन भी हैं जो इंसान के भीतर शांति भर देते हैं। दिल में रोमांच की चिंगारी जगा देते हैं और जिंदगी को एक नई नज़र से देखने का मौका देते हैं। चाहे आप दिल्ली, भोपाल, जयपुर या कहीं से भी आए हों, मुंबई आपको खुली बाहों से अपनाती है और अपने खूबसूरत नज़ारों से मोह लेती है। मुंबई में घूमने की जगहों की कोई कमी नहीं पर यह पांच ऐसे प्रमुख स्थान हैं। जिनके बिना इस शहर की यात्रा अधूरी मानी जाती है। जिनमें एलीफेंटा केव्स, जुहू बीच, गेटवे ऑफ इंडिया, मरीन ड्राइव और लोनावाला। Elephanta Caves: पत्थरों में उकेरी गई इतिहास और अध्यात्म की गाथा! मुंबई हार्बर से लगभग 10 किलोमीटर दूर, अरब सागर के बीचों-बीच स्थित है एलीफेंटा आइलैंड, जहां मौजूद हैं हजारों साल पुराने पत्थर काटकर बनाए गए अद्भुत गुफा-समूह, जिन्हें हम एलीफेंटा केव्स के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि यह गुफाएं 5वीं से 8वीं शताब्दी के बीच निर्मित की गई थीं। यहां पहुंचना खुद में एक छोटा सा समुद्री रोमांच जैसा है। गेटवे ऑफ इंडिया से चलने वाली फ़ेरी में एक घंटे की यात्रा, समंदर की लहरों की ताल, किनारे से दूर होते हुए मुंबई के गगनचुंबी बिल्डिंग, और फिर सामने आती एक रहस्यपूर्ण पहाड़ी द्वीप, एक ऐसा लम्हा जिसे कोई भूल नहीं सकता। गुफाओं का सबसे बड़ा आकर्षण है भगवान शिव की त्रिमूर्ति, जो शिव के तीन स्वरूप। सृजनकर्ता, पालक और संहारकर्ता को दर्शाती है। इसे भारतीय शिल्पकला की सबसे उत्कृष्ट मूर्तियों में गिना जाता है। गुफाओं में घूमते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे इतिहास की सांसें अभी भी इन पत्थरों में कैद हों।( जिनमें एलीफेंटा केव्स, जुहू बीच, गेटवे ऑफ इंडिया, मरीन ड्राइव और लोनावाला।) Juhu Beach: इसके बारे में कौन नहीं जानता! मुंबई का सबसे लोकप्रिय बीच, जुहू बीच सिर्फ एक बीच नहीं, बल्कि मुंबई की रोजमर्रा की धड़कन का आईना है। सुबह लोग यहां जॉगिंग करते दिखते हैं, शाम को कपल्स और परिवार टहलते नज़र आते हैं और रात में समंदर की लहरों के साथ शहर की लाइटें ऐसे चमकती हैं जैसे आसमान ज़मीन पर उतर आया हो। यहां की ठंडी हवा में ऐसा जादू है कि थकान अपने आप उड़ जाती है। यहां खड़े होकर समंदर के सामने घंटों बैठने का मज़ा ही कुछ और है। कोई जल्दी नहीं, कोई शोर नहीं, सिर्फ लहरों की आवाज़ और दिल का सुकून। जुहू बीच का सबसे स्वादिष्ट हिस्सा है इसका स्ट्रीट फूड कॉर्नर, बेलपुरी, सेवपुरी, पानीपुरी, पावभाजी, पिज्जा डोसा, कुल्फी फ़ालूदा, आप जो भी खाइए, दिल जीत लेगा। अगर किस्मत साथ दे, तो आप यहां बॉलीवुड सितारों को भी देख सकते हैं क्योंकि इनके कई घर यहीं आसपास हैं। बच्चों के लिए ऊंट-घोड़ा राइड और यूथ के लिए फोटोग्राफी स्पॉट्स, ड्रोन शूट्स, और बीच स्पोर्ट्स सबकुछ मौजूद है। दुनिया के कई समुद्रतट सुंदर हो सकते हैं, पर जुहू बीच दिल से जुड़ जाने वाली जगह है । जहां पर इंसान एक बार फिर से जीना सीख लेता है। Gateway of India: भारत का प्राइड अरे, मुंबई आए और गेटवे ऑफ इंडिया नहीं देखा? यह तो ऐसे ही है जैसे दिल्ली आए पर इंडिया गेट न देखा हो! 1911 में किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी के स्वागत के लिए बनाया गया यह भव्य स्मारक आज मुंबई का सबसे प्रतिष्ठित लैंडमार्क है। चाहे दिन हो या रात, यहां की खूबसूरती दिल को छू जाती है। यूं लगता है जैसे यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि भारत की ताकत, गौरव और साहस का प्रतीक हो, जो हमेशा खड़ा है। समंदर के सामने, हवाओं के बीच, बिना हिले, बिना थके। गेटवे के सामने से उठती समुद्री हवा और चारों तरफ उड़ते कबूतरों का दृश्य, एक ऐसी शांति देता है जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है। यहीं से एलीफेंटा के लिए फ़ेरी चलती है, और रात में यहां का लाइटिंग शो देखना अपने आप में एक यादगार अनुभव है। पास में ताज होटल की ऐतिहासिक इमारत इसे और भी भव्य बना देती है। Marine Drive: जो है प्यार, दोस्ती और सबसे खूबसूरत किनारा अगर किसी ने कभी मुंबई की रूह महसूस की है, तो वह जानता होगा कि मरीन ड्राइव सिर्फ एक सड़क नहीं एक एहसास है। इसे लोग प्यार से क्वीन्स नेकलेस भी कहते हैं क्योंकि रात में इसकी स्ट्रीट लाइटें ऐसे चमकती हैं जैसे मोतियों की लड़ी हो। 3.6 किलोमीटर लंबा ये समुद्री किनारा लोगों के लिए तनाव से राहत, प्रेमियों के लिए रोमांस और यात्रियों के लिए एक शानदार दृश्य है। यहां की शामें अविस्मरणीय होती हैं। लहरों का शोर, हवा की ताजगी और आसमान का रंग बदलना यह सब जिंदगी को बेहद खूबसूरत बना देता है। मरीन ड्राइव पर बैठकर भविष्य की चिंता भूल जाती है और मन में सुकून की लहर दौड़ जाती है। यह वह जगह है जहां लोग रोते भी हैं, हंसते भी हैं, सपने भी देखते हैं और खुद को समझते भी हैं। Lonavala hills: झरने और बादल का सुंदर कॉम्बो अगर आप मुंबई के शोर से दूर थोड़ी राहत चाहते हैं, तो लोनावाला आपके इंतज़ार में है। मुंबई से करीब 2 घंटे की दूरी पर स्थित यह हिल स्टेशन मानसून के दिनों में स्वर्ग से कम नहीं लगता। रास्ते में मिलते हरे-भरे पहाड़, गहरी घाटियां बादलों से मिलते झरने और पहाड़ी हवा दिल को एक ऐसी खुशी देती है जो कहीं और मिलनी मुश्किल है। Tigers Point, Bhushi Dam, Rajmachi Point और Pawna Lake जैसे स्पॉट मन मोह लेते हैं। मानसून में सड़कें धुंध से ढक जाती हैं और सबकुछ ऐसा लगता है जैसे आप किसी फिल्म के सीन में हों। लोनावाला सिर्फ कपल्स और दोस्तों के लिए नहीं, बल्कि परिवारों और

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Hidimba Devi Temple: हिमाचल के मनाली में एकमात्र भीम की पत्नी हिडिंबा को समर्पित महाभारत युगीन मंदिर! 

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Hidimba Devi Temple: मनाली का नाम लेते ही अक्सर हमारी आंखों के सामने बर्फ़ से ढकी चोटियां, सेब के बागान और रोमांटिक हनीमून डेस्टिनेशन की तस्वीर उभर आती है। लेकिन इस पूरी तस्वीर के बीच एक जगह ऐसी भी है, जो सिर्फ़ टूरिस्ट स्पॉट नहीं, बल्कि लोक-आस्था, हिमाचली विरासत और प्रकृति का मिला-जुला शानदार स्पॉट है हिडिंबा देवी मंदिर। पुरानी मनाली के धुंगरी इलाके में, ऊंचे देवदार के पेड़ों के बीच बसा यह प्राचीन गुफ़ा-मंदिर 16वीं सदी का है और हिडिंबा देवी यानी भीम की पत्नी को समर्पित है। लकड़ी की चार मंज़िला पगोड़ा शैली की इमारत, काले-सफ़ेद पत्थरों से बनी नीची दीवारें, ऊपर से देवदार के पेड़ों की घनी छांव और मंदिर तक पहुंचने वाली पत्थरों की सीढ़ियां, यह सब ऐसा माहौल बना देती हैं कि लगता है जैसे आप किसी और ही जगह पहुंच गए हों। दिन में यहां दर्शन के लिए लंबी कतारें लगती हैं, लेकिन सुबह-सुबह या शाम के वक़्त जब हल्की-हल्की ठंडक, पेड़ों के बीच से छनकर आती रोशनी और घंटियों की आवाज़ मिलकर गूंजती है, तो इस जगह का जादू और भी बढ़ जाता है। कई लोग सिर्फ़ आध्यात्मिक वजह से नहीं, बल्कि यहां की वाइब, शांति और फ़ोटोग्राफ़ी के लिए भी बार-बार लौट कर आते हैं। हिडिंबा देवी मंदिर कहां है? हिडिंबा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले में बसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन मनाली में स्थित है। यह मनाली के प्रसिद्ध मॉल रोड से लगभग 2 से 3 किलोमीटर दूर धुंगरी वन क्षेत्र Dhungri Van Vihar के बीचों-बीच है, जिसे लोकल लोग धुंगरी मंदिर भी कहते हैं। मॉल रोड से आप पैदल भी आराम से यहां तक पहुंच सकते हैं। हल्का चढ़ाई वाला रास्ता है, लेकिन इतना कठिन नहीं कि सांस फूल जाए। (कई लोग सिर्फ़ आध्यात्मिक वजह से नहीं, बल्कि यहां की वाइब, शांति और फ़ोटोग्राफ़ी के लिए भी बार-बार लौट कर आते हैं।) रास्ते में छोटे-छोटे कैफ़े, ऊनी कपड़ों की दुकानें और लोकल फोटोग्राफर कैमरा लिए खड़े नज़र आते हैं, जो आपकी पारंपरिक हिमाचली ड्रेस में तस्वीरें खींचने का ऑफर देते रहते हैं। मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी अनोखी वास्तुकला है। यह पूरी तरह पारंपरिक हिमाचली शैली की पगोड़ा Pagoda शैली में बना है। ऊपर की तरफ़ जाते हुए छोटी होती चार परतों वाली लकड़ी की छत, जिसमें तीन मंज़िलों पर देवदार की लकड़ी की टाइलें और सबसे ऊपर पीतल का शंकु-नुमा कलश लगा है। नीचे पत्थर और मिट्टी से बनी मोटी दीवारें, अंदर एक विशाल चट्टान, जिसे देवी का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। हिडिंबा देवी का महाभारत यगीन इतिहास हिडिंबा देवी की कहानी सीधे महाभारत के समय से जुड़ती है। कथा के अनुसार, हिडिंबा और उसका भाई हिडिंब यहां के घने जंगलों में रहते थे। कहा जाता है कि हिडिंब बहुत शक्तिशाली और क्रूर था और उसकी शर्त थी कि जो भी उसे युद्ध में हराएगा, वही हिडिंबा का वर बनेगा। जब पांडव वनवास के दौरान इस क्षेत्र में पहुंचे तो हिडिंब ने उन पर हमला किया लेकिन भीम ने उसे परास्त कर दिया। हिडिंबा ने भीम की वीरता और नेक दिल स्वभाव से प्रभावित होकर उससे विवाह किया और उनसे घटोत्कच नाम के पराक्रमी पुत्र का जन्म हुआ। जिसने आगे चलकर कुरुक्षेत्र के युद्ध में अहम भूमिका निभाई। महाभारत के युद्ध के बाद जब पांडव आगे बढ़ गए, तो हिडिंबा ने मनाली में ही रहकर घोर तपस्या की। माना जाता है कि देवी ने वर्षों तक ध्यान लगाकर ऐसी आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त की कि धीरे-धीरे लोग उन्हें देवी स्वरूप मानने लगे। बाद में 1553 ईस्वी में कुल्लू घाटी के शासक महाराजा बहादुर सिंह ने इस गुफ़ा के ऊपर लकड़ी का यह भव्य मंदिर बनवाया, जो आज हिडिंबा देवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। खाना-पीना और रुकने की जगहें। अब बात करते हैं उस चीज़ की जो हर यात्री के दिल के बहुत करीब होती है अच्छा खाना और आरामदायक ठहरने की जगह। हिडिंबा देवी मंदिर के आसपास का इलाका पुराने मनाली Old Manali से भी जुड़ता है, जहां आपको बजट गेस्ट हाउस से लेकर कॉज़ी होमस्टे और मिड-रेंज बुटीक होटल तक हर तरह का स्टे ऑप्शन मिल जाएगा। धुंगरी मंदिर रोड और सियाल क्षेत्र में कई ऐसे होटल हैं, जो मंदिर से पैदल दूरी पर हैं। सुबह बालकनी से बैठकर पहाड़ों को निहारिए और थोड़ी ही देर में मंदिर के दर्शन के लिए निकल पड़िए। अगर आप शांत माहौल चाहते हैं तो पुराने मनाली के पुल के उस पार वाले होमस्टे चुन सकते हैं, जहां कैफ़े कल्चर भी है और पहाड़ी गांव वाली सादगी भी। खाने की बात करें तो मंदिर के आसपास छोटी-छोटी दुकानों से लेकर अच्छे रेस्टोरेंट तक मिलते हैं। कई दुकानों पर आलू-पराठा, छोले-भटूरे, समोसा, पकोड़े और गरम-गरम चाय मिलती है, जो ठंडे मौसम में जान डाल देती है। हिडिंबा मंदिर तक कैसे पहुंचें? मनाली पहुंचना आजकल काफी आसान हो गया है और शहर में आ जाने के बाद हिडिंबा देवी मंदिर तक पहुंचना तो और भी आसान। सबसे नज़दीकी एयरपोर्ट भुंतर कुल्लू-मनाली एयरपोर्ट है, जो मनाली से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। यहां से आप टैक्सी या बस लेकर लगभग डेढ़ दो घंटे में मनाली पहुंच जाते हैं। ट्रेन से आने पर नज़दीकी बड़ा रेलवे स्टेशन चंडीगढ़ है। वहां से मनाली के लिए लगातार वोल्वो, प्राइवेट और एचआरटीसी बसें उपलब्ध रहती हैं। रास्ता लंबा ज़रूर है, लेकिन व्यास नदी के साथ-साथ चलते घुमावदार पहाड़ी मार्ग, सुरंगें और बीच-बीच में छोटे कस्बे पूरे सफ़र को यादगार बना देते हैं। जब आप मनाली शहर में हों, तो मॉल रोड, सर्किट हाउस या पुराने मनाली के किसी भी हिस्से से हिडिंबा मंदिर तक टैक्सी, ऑटो या बाइक से आसानी से जा सकते हैं। मंदिर का टाइम आम तौर पर सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक बताया जाता है और प्रवेश पूरी तरह मुफ़्त है। बस पूजा या फोटोग्राफ़ी के लिए कहीं-कहीं छोटा-मोटा शुल्क लग सकता है।   मंदिर की सुंदरता और आसपास के आकर्षण हिडिंबा देवी मंदिर की असली खूबसूरती सिर्फ़ इसकी इमारत में नहीं बल्कि उसके माहौल में है। मंदिर के चारों ओर फैला घना देवदार वन ऐसा आभास देता है मानो आप किसी प्राचीन रहस्यमयी जंगल में हों। पेड़ों की ऊंचाई इतनी ज़्यादा है कि कई जगह धूप सीधे

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Kolkata: यहां के बाजार, खाना, खूबसूरती और आस-पास के आकर्षण आपका दिल जीत लेंगे!

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Kolkata: का इतिहास कोलकाता, जिसे पहले कलकत्ता कहा जाता था, भारत का एक ऐसा शहर है जिसकी सांस्कृतिक जड़ें बेहद गहरी और ऐतिहासिक रूप से समृद्ध हैं। 1690 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के जॉब चैर्नॉक ने इस क्षेत्र में व्यापारिक केंद्र स्थापित किया और धीरे-धीरे तीन छोटे गांव सुतानुटी, कालिकाता और गोविंदपुर मिलकर कलकत्ता शहर का रूप लेने लगे। 1772 से 1911 तक यह ब्रिटिश भारत की राजधानी रहा और यहीं से आधुनिक भारतीय राजनीति, शिक्षा, साहित्य और समाज सुधार की शुरुआत होती है। राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस जैसे महानायक यहीं से निकले जिन्होंने भारत के विचार और संघर्ष की धार को तेज बनाया। यहां बंगाल पुनर्जागरण Bengal Renaissance ने भारतीय समाज को नई दिशा दी और साहित्य, कला तथा पत्रकारिता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। लम्बे समय तक यह शहर भारत का बौद्धिक केंद्र माना जाता रहा और आज भी किताबों, थिएटर, वाद-विवाद और सिनेमा का गढ़ माना जाता रहा है। यही वजह है कि कोलकाता को City of Joy तथा Cultural Capital of India कहा जाता है। घूमने के लिए प्रसिद्ध स्थान कोलकाता में घूमने के लिए इतने अनोखे स्थान हैं कि यात्रियों को यहां कई दिन बिताने पड़ते हैं। हुगली नदी के तट पर बना हावड़ा पुल इस शहर की पहचान है और इसकी इंजीनियरिंग दुनिया भर में मिसाल मानी जाती है। विक्टोरिया मेमोरियल सफेद संगमरमर से बना ब्रिटिश काल का स्मारक है, जिसके हरे-भरे बगीचे और संग्रहालय पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। दक्षिणेश्वर काली मंदिर और कालीघाट मंदिर धार्मिक आस्था के प्रमुख केंद्र हैं, जहां हजारों भक्त रोज़ दर्शन करने आते हैं। भारतीय संग्रहालय भारत का सबसे पुराना और सबसे बड़ा संग्रहालय है, जिसमें जीवाश्म, प्राचीन मूर्तियां, ममी और ऐतिहासिक धरोहरों का विशाल संग्रह है। विज्ञान नगरी, बिरला तारामंडल, नीको पार्क बच्चों के लिए बेहतरीन जगहें हैं। साहित्य और बुद्धिजीवियों के लिए कॉलेज स्ट्रीट और कॉफी हाउस तीर्थस्थल समान हैं। मार्बल पैलेस, मदर हाउस, सेंट पॉल कैथेड्रल, इको पार्क, अलीपुर पशु उद्यान भी शहर की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। हर दिशा में कला, इतिहास और आधुनिकता की झलक देखने को मिलती है।(यही वजह है कि कोलकाता को City of Joy तथा Cultural Capital of India कहा जाता है।) कोलकाता के मशहूर बाजार शॉपिंग के शौकीनों के लिए कोलकाता किसी रोमांचक स्थान से कम नहीं। न्यू मार्केट यानी सरोजिनी नायडू मार्केट शहर का सबसे पुराना और सबसे व्यस्त बाज़ार है, जहां कपड़े, साड़ियाँ, चमड़े के बैग, गहने और खाने-पीने की चीज़ें बेहतरीन दामों पर मिलती हैं। गरियाहाट मार्केट और हाटीबागान मार्केट बंगाली रेशम, कांथा-वर्क और पारंपरिक तांत तथा बलूचरी साड़ियों के लिए खास पहचान रखते हैं। कॉलेज स्ट्रीट किताब बाज़ार दुनिया का सबसे बड़ा सेकेंड-हैंड किताब बाज़ार है, जहां हर विषय की किताबें मिलती हैं। बड़ा बाज़ार थोक खरीदारी का दिल माना जाता है और यहां से होलसेल कपड़ों से लेकर सूखे मेवे तक, हर चीज़ मिल जाती है। कला प्रेमियों के लिए कुम्हारटुली एक ऐसी जगह है, जहां कारीगर अपने हाथों से देवी-देवताओं की अद्भुत मूर्तिययां बनाते हैं, विशेषकर दुर्गा पूजा के समय यहां का माहौल देखने लायक होता है। कोलकाता का प्रसिद्ध फूड कोलकाता का भोजन सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि भावनाओं का सुंदर सा मेल है। यहां की मिष्ठी, रसगुल्ला, संदेश, नोलान गुर दुनिया भर में मशहूर हैं। स्ट्रीट फूड में कोलकाता काठी रोल, घुगनी चाट, फुचका जोकि पानी पूरी का ही एक रूप है, झालमूड़ी, फिश फ्राई, कोचुरी, आलूर दम हर किसी को दीवाना बना देते हैं। बंगाली फिश करी, इलिश, चिंगड़ी मलाई करी, भेटकी पातुरी, सरसों माछ समुद्री खाने के शौकीनों के लिए खास अनुभव है। वेज पसंद करने वालों के लिए बंगाली थाली, लाबड़ा और शुक्तो बेहतरीन विकल्प हैं। यहां की चाय का अलग ही अंदाज़ है मिट्टी के कुल्हड़ में सुगंधित चाय पीने का मज़ा ही कुछ और है। यदि आप मिठाइयों के दीवाने हैं, तो के.सी. दास, बाला राम मुल्लिक और राधा रमण मुल्लिक, भिखारम चांदमल, और मिठाई ज़रूर जाएं। कैसे जाएं और कहां रुकें कोलकाता भारत के हर बड़े शहर से रेल, हवाई और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा शहर का मुख्य एयरपोर्ट है। हावड़ा जंक्शन और सीलदह दो प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं, जहां से देशभर की ट्रेनें मिलती हैं। शहर का स्थानीय परिवहन बेहद सुविधाजनक है। मेट्रो रेल, ट्राम, पीली टैक्सी, ओला, ऊबर, स्थानीय बस और फेरी सभी यहां उपलब्ध हैं। रहने के लिए हर बजट के विकल्प मिलते हैं। पार्क स्ट्रीट, एस्प्लेनेड, न्यू टाउन, सॉल्ट लेक और हावड़ा में अच्छे होटल, अतिथि गृह और होम-स्टे मिल जाएंगे। लग्ज़री रहने के लिए द ओबेरॉय ग्रैंड, ताज बंगाल, आईटीसी रॉयल बंगाल शानदार विकल्प हैं; जबकि कम बजट वाले यात्रियों के लिए जॉस्टल, बैकपैकर होस्टल और ओयो भी आसानी से मिल जाते हैं। कोलकाता की खूबसूरती कोलकाता की खूबसूरती सिर्फ इमारतों या रोशनी में नहीं बल्कि इसकी नजारों में बसती है। यहां के लोग बेहद सरल, भावनात्मक और बातचीत पसंद करने वाले होते हैं। बारिश की फुहारों में ट्राम की धीमी चाल, हुगली नदी किनारे नौका विहार, शाम की चाय और पार्क स्ट्रीट की चमक एक शानदार अनुभव बयां करते हैं। दुर्गा पूजा के दौरान शहर की सजावट, पंडाल कला, रोशनी और पारंपरिक ढाक की आवाज़ दिल को रोमांचित कर देती है। शहर की रातें शांत, सुरक्षित और मोहक होती हैं। पुरानी हवेलियों, पुराने बाज़ारों, पुराने ट्राम लाइनों की nostalgia यहां की पहचान है। यह शहर पुराना भी है और आधुनिक भी।  कोलकाता का कल्चर कोलकाता का सांस्कृतिक जीवन अपने आप में अनोखा है। यहां थिएटर, संगीत, कविता, नृत्य और कला को पूजा की तरह माना जाता है। Rabindra Sangeet, Nazrul Geeti, Baul Music, बंगाली थिएटर, लोक कला और फिल्में यहां की सांस्कृतिक धड़कन हैं। इस शहर ने सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, उत्तम कुमार, किशोर कुमार और रबीन्द्रनाथ टैगोर जैसी महान हस्तियां दी हैं। बुक फेयर, फिल्म फेस्टिवल, दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा, पोइसाखी जो कि बंगाली नववर्ष है। जैसे आयोजन शहर को उत्सवमय बना देते हैं। हर व्यक्ति में कला और संवाद की भूख है। लोग बहसें करते हैं, विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, किताबें पढ़ते हैं और नई सोच और समझ को जन्म देते हैं। यही वजह है कि कोलकाता सिर्फ एक शहर

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Chausath Yogini Temple: यह वही मंदिर है जिसकी थीम पर बना भारत का संसद भवन!

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Chausath Yogini Temple Chausath Yogini Temple: जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। अब आपका सवाल वाजिब है कि कैसे? तो आइए मैं बताता हूं कैसे? आज हम अपनी इस विशेष यात्रा में आपको ले चलते हैं, एक बेहद खास जगह। जो इतिहास का ऐसा उदाहरण है। जिसकी छवि आप भारत की पुरानी संसद भवन में देख सकते हैं। जी हां ग्वालियर शहर से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है एक ऐसी रहस्यमय जगह जिसको देखकर आप भी दंग रह जाएंगे। बिल्कुल हमारी तरह। क्योंकि हमने जब इस मंदिर की सैकड़ों सीढ़ियां चढ़ीं और इसके दर्शन किए तो हमारी वही प्रतिक्रिया थी, जो एक असमान्य चीज देख लेने से किसी की भी होती है। यहां की खूबसूरती यह इलाके आधुनिक चीजों से थोड़े पीछे हैं, पर यह जगह भारत की वास्तविक आत्मा को समझने के लिए सबसे बढ़िया हैं। यहां आप शुद्ध हवा का लुत्फ उठा सकते हैं और पक्षियों की आवाजें सुन सकते हैं। साथ ही सूर्य उदय और अस्त देख पाना सौभाग्य का पल होगा। यह समय यहां बिताना किसी सपने से कम से नहीं है, आपके पास समय हो तो एक बार यहां के गांव में घूमें और लोकल लोगों से बात करें। आपको नए नए अनुभव देखने और सुनने को मिल सकते हैं। यहां के लोग बहुत प्यारे हैं। उनका बोलना और बात करना बहुत अच्छा है। बहुत ही सम्मान के साथ आपसे बात करते हैं और आपसे भी वह यही उम्मीद करते हैं। (जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। ) कैसे बना यह चौंसठ योगनियों का मंदिर? लगभग 100 फीट की ऊंचाई पर बना यह मंदिर गूढ़ रहस्यों का स्थान तो है ही और कमाल की बात यह है कि बहुत ही पवित्र भी। क्योंकि अभी तक यह मंदिर भीड़ भाड़ से बचा हुआ है। इस खास जगह को कच्छप राजा देवपाल द्वारा लगभग 1383 में बनाया गया था। कुछ किंवदंतियों का मानना है की इस मंदिर को 9 वीं शताब्दी में भौम वंश की रानी हीरा देवी ने की थी। जो अभी तक उसी अंदाज में इतिहास की कहानियों को बयां करते हुए खड़ा है। यहां जाने के बाद जब हमने यहां के लोकल लोगों से पूछा तो एक और बात पता चली कि यह मंदिर तंत्र मंत्र विद्या के लिए जाना जाता है। हालांकि आज के समय में यह चौसठ योगनियों के मंदिर वैसे ही बने हैं। जैसे इनका निर्माण हुआ था। चौसठ योगनियों का मंदिर इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस मंदिर में चौसठ कमरे हैं जो आप आज भी वैसे ही देख सकते हैं।  जैसे निर्माण के वक्त थे। चौसठ कमरे चौसठ योगनियों को समर्पित हैं जो भगवान शिव की आराधना करती थीं। या तप करती थीं। इन चौसठ कमरों के बिलकुल बीच में बना है भगवान शिव का मंदिर। जिसमें लगभग 2 फीट ऊंची शिवलिंग विराजमान है। एक और प्राचीन शिवलिंग बीचों बीच इस मंदिर के चबूतरे पर रखी हुई है। जिसको देखने पर ऐसा लगता है जैसे यह शिवलिंग मंदिर से भी ज्यादा प्राचीन है। सैकड़ों साल से कई भूकंप और आंधियां आईं पर इस चौसठ योगनियों के पवित्र मंदिर की नींव हिला न सकीं। यही खासियत है इतिहास के इस बेजोड़ नमूने की। कहां है और कैसे पहुंचे? यह मंदिर मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में आता है और मुरैना से लगभग 34 किलोमीटर दूर मितावली गांव में स्थित यह मंदिर इतिहास प्रेमियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आपको ग्वालियर या मुरैना से यहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं मात्र 1 घंटा लग सकता है। जैसा कि इतनी ही दूरी ग्वालियर की है तो बिल्कुल इतना ही समय यहां से भी आपको देना पड़ सकता है। ट्रेन के जरिए ग्वालियर एक ऐसा जंक्शन है जहां से देश के किसी भी कोने में आप कहीं भी आ जा सकते हैं। इसके अलावा आप मुरैना से भी यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना में भी रेलवे स्टेशन मौजूद है। पर बात आती है मुरैना या ग्वालियर से यहां तक कैसे पहुंचे? तो आप यहां से टैक्सी या ऑटो बुक कर सकते हैं। बस से कैसे पहुंचे? बस से आप मुरैना और ग्वालियर होते हुए यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना और ग्वालियर तक आपको कहीं से भी बस मिल जाएगी। लेकिन यहां से आपको टैक्सी या ऑटो ही बुक करना पड़ सकता है। यदि आप अपने ही वाहन से हैं तब तो बात अलग ही है। आप आराम से यहां पहुंच सकते हैं। रास्ता बढ़िया है, गाड़ी सरपट दौड़ती है। आस पास के आकर्षण जब भी आप यहां जाने का प्लान बना रहे हैं तो यहां के कुछ अदभुत स्थान आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर शामिल होने चाहिए जिनमें- बटेश्वर धाम वास्तव में जब भी आप ग्वालियर, मुरैना या मितावली के चौसठ योगनियों के मंदिर जाने का सोच रहें हैं, तो बटेश्वर धाम जाना बिल्कुल न भूलें। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जहां आप जाते ही अपने आपको प्राचीन युग में पाएंगे। 100 मंदिरों का यह गढ़ आज भी अपनी जीवंतता बनाए हुए है। यहां के हर पत्थर में आपको कुछ न कुछ गढ़ा हुआ मिलेगा। इन सैकड़ों मंदिरों में आप देख पाएंगे दिव्य शिवलिंग। इन सैकड़ों छोटे बड़े मंदिरों की अद्भुत कहानी है जो अगली पेशकश में आप पढ़ पाएंगे। शनि मंदिर जब आप ग्वालियर से मितावली या गढ़मुक्तेश्वर जाते हैं तो रस्ते में ही आपको मिलेगा, प्राचीन और दिव्य शनि मंदिर। माना जाता है कि यह मंदिर उल्का पिंड के पत्थर से निर्मित है। इसपर कई मतभेद हैं। जो आप यहां आकर ही सुलझा सकते हैं। गड़ी पढ़ावली यात्रा के दौरान जब आप गढ़मुक्तेशर से मितावली जाते हैं तो रस्ते में ही आप पाएंगे। गड़ी पढ़ावली जहां पर एक प्राचीन किले का दीदार आप कर पाएंगे। जो बेहद खास जगह है इतिहास प्रेमियों के लिए। यहां आकर आप यहां की सुंदरता और ग्रामीण जीवन को समझ पाएंगे। और इतिहास के इन पन्नो को पलटकर इनमें छिपे रहस्य जान पाएंगे। रुकने और खाने पीने का इंतजाम मितावली, गड़ी पढ़ावली या बटेश्वर ये छोटे छोटे गांव व कस्बे हैं। यहां आपको ज्यादा सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाएंगी। इसलिए आप एक दो दिन के सफर पर निकले हैं तो ग्वालियर और मुरैना में आप