सागर जिले के गौरीदंत में कई रहस्यमई गाथाएं एवं अद्भुत प्राकृतिक रहस्यों का समागम देखने का रोमांच
गौरीदंत का परिचय
गौरीदंत विविध धर्मों के अनुयायियों के साथ-साथ प्रकृति की गोद में अद्भुत रहस्यों को अपने में संरक्षित किए हुए है। हिंदूओं के मतानुसार यहां की ऐसी मान्यता है कि जब मां पार्वती सती हुई थीं, तो भगवान शिव शंकर दुख में डूब कर मां पार्वती के पार्थिव शरीर को लेकर घूम रहे थे। तभी कृष्ण जी ने सोचा कि भगवान शिव का इस प्रकार दुख में डूबा रहना, सृष्टि के लिए उचित नहीं है। तब उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र चलाया और मां पार्वती का शव नष्ट हुआ तो उनका एक दांत इस स्थल पर जा गिरा। जिसकी बजह से इस जगह का नाम गौरीदंत पड़ा।
गौरीदंत का इतिहास

गोरी दंत का इतिहास बहुत ही पुराना है। यहां पर सभी धर्मों के साक्ष्य देखने को मिलते हैं। ऐसा माना जाता है की अंग्रेजों के शासनकाल में गौरीदन्त में मिलिट्री कैंप लगाया जाता था। पुराने जमाने में उनको प्रशिक्षण देने के लिए लगाए जाने वाले यह कैंप आज बहुत ही रोचक दृश्यों का गढ़ है। साथ ही एक ऐसी भी किवदंती है कि यहां पर मार्कंडेय ऋषि ने तपस्या की थी। गौरीदन्त में आपको बौद्ध दर्शन से संबंधित स्तूप एवं पाली लिपि में बौद्ध धर्म की शिक्षा से संबंधित अनेक चीजें पत्थर पर गढ़ी मिलेंगीं। साथ ही एक बड़े से पत्थर पर पुराने समय के लोगों ने भारत का नक्शा एक बड़े से पत्थर पर बहुत ही आकर्षक तरीके से बनाया हुआ है।

उस नक्शे में भारत से लगने वाले देशों की सीमा और यह तक दर्शाया गया है की कौन सी नदी कहां से गुजरती है। यह सब इसमें देखा जा सकता है। भारत चिन्ह भी इस नक्शे के एक बगल में बनाया गया है। जिसमें तीन शेर दिखाई पढ़ते हैं। गौरीदन्त की सबसे ऊंची पहाड़ी पर पहुंचने पर मां पार्वती के मंदिर से लगभग 30 से 35 फुट की दूरी पर रतिनाथ जी का मंदिर भी स्थापित है। यहां पर आपको एक अद्भुत नजारा देखने को मिलता है क्योंकि आपके लिए शहर के शोर शराबे से दूर एकांत माहौल एवं अलौकिक चीजें देखने को मिलतीं हैं।(भारत का नक्शा एक बड़े से पत्थर पर बहुत ही आकर्षक तरीके से उत्पन्न किया हुआ है।)

मेरा स्वयं का अनुभव
ऊपर वर्णित किए गए लेखन से शायद आपको समझ में आ गया होगा की, गौरीदन्त का इतिहास जितना अधिक पुराना है, उससे अधिक रोचक भी है। यह एक ऐसा नाम है जहां पर आप अपने जीवन के अनुभव में एक बहुत ही अच्छा अध्याय जोड़ सकते हैं। यहां की स्थिति में कई अद्भुत दृश्य एवं नजारे संरक्षित हैं। जो की एक पर्यटक को आकर्षित करते हैं। यहां का एकांत वातावरण लोगों को बहुत ही पसंद आता है। स्थानीय लोग गौरीदन्त के बारे में यह भी बताते हैं कि यहां गुफा में महावीर जी की प्रतिमा स्थापित है। जिसके दर्शन के लिए आपको साहस की जरूरत पड़ती है क्योंकि कई लोग गुफा तक नहीं पहुंच पाते हैं!

महावीर जी की प्रतिमा के बाद एक और लोहे की सकरी गुफा में जाने का रास्ता दिखाई देता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां इसके अंदर जो भी गया है, वह कभी भी लौट के वापस नहीं आ सका। इस दर्शनीय स्थल में वैसे तो सभी जगह बहुत ही देखने योग्य हैं लेकिन मेरा जो स्वयं का अनुभव है, वह सबसे अच्छा हवा महल है क्योंकि जब आप एक लंबी पहाड़ी की चढ़ाई चढ़ते हैं तो बहुत थकान हो जाती है। इस थकान को दूर करने के लिए आप हवा महल तक पहुंच कर अच्छे से अपनी थकान को दूर कर सकते हैं। यह हवा महल दो पहाड़ियों से कटकर या कहें कि अलग होकर प्रकृति की गोद में निर्मित हुआ है। यहां पर कई लोग अपना फोटो भी शूट करवाते हैं। जो की इस जगह की खास बात है।

मेरे सहयोगियों का योगदान
इस जगह पर पहुंचने के लिए आप कभी भी अकेले जाने का साहस न करें क्योंकि एक तो यह गांव से दूर एकांत में स्थित है। साथ में ही एक प्रकार की पहाड़ी पर स्थित है। यहां पर जाने के लिए आप दो-तीन लोगों के ग्रुप के साथ यहां का लुत्फ उठा सकते हैं। साथ ही पहाड़ी चढ़ने से पहले खाने-पीने की सामग्री इकट्ठी कर लें क्योंकि यहां पर आपके लिए कोई भी दुकान नहीं है।

न ही पहाड़ी के ऊपर पानी की व्यवस्था उपलब्ध है। यह दर्शनीय स्थल मेरे सहयोगी साथी रहे प्रदीप कुमार पुरी एवं प्रखर वर्मा के द्वारा सुझाया गया था। जिसे मैं अपने जीवन में एक अनोखा अध्याय इस यात्रा के द्वारा जोड़ सका। गौरीदन्त ने अनेक प्रकार के इतिहास को अपने आप में संरक्षित तो किया ही है, साथ ही यह प्रकृति की गोद में एक अद्वितीय एवं दर्शनीय स्थल का केंद्र है। यहां का वातावरण आपको सांसारिक दुनिया से बहुत दूर ले जाता है।

गौरीदंत पहुंचने का रास्ता
मध्यप्रदेश के सागर शहर से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर गौरीदंत पहुंचने के लिए आपको रास्तों के भटकाव का कई बार सामना करना पड़ सकता है। साथी ही दुर्गम रास्तों का! क्योंकि जब हम हवाई पट्टी ढाना से निकलते हैं, तो वहां की गांव देहात की संकरी-संकरी गलियां पर्यटक को भटका देती है। लेकिन आपको इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि स्थानीय लोगों के द्वारा आपके लिए गौरीदंत के रास्ते एवं दिशा एवं मार्गदर्शन का बोध करा दिया जाता है। फिर आप गौरीदंत पहुंचकर, अपने वाहन को पहाड़ी के नीचे रखें।

फिर आपको 35 से 40 मिनट की पहाड़ी चढ़नी पड़ती है, पहाड़ी चढ़ते ही शुरुआत में आपको एक बड़े से पत्थर पर मयूर राष्ट्रीय पक्षी को संरक्षित करने का लोगों को संदेश दिया गया है। साथ ही पत्थर पर उसकी विशेषताएं और प्रकृति के लिए यह कितने लाभकारी हैं यह सब बताया गया है।

लेखक –
गजेन्द्र अहिरवार ( शिक्षा शास्त्र व्याख्याता)





