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BEST Places to Visit in Kurukshetra

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Kurukshetra: नवंबर के महीने में गीता जयंती उत्सव का लुत्फ़ उठाते हुए घूमिए कुरुक्षेत्र की ये खास जगह Five Colors Of Travel अधिकांश भारत में सर्दियों की शुरुआत नवंबर महीने से होती है। यह महीना देश भर में फेस्टिवल सीजन का महीना भी होता है। यात्रा के लिहाज से देश भर में मौसम और उत्सव नवंबर को आदर्श बनाते हैं, खासकर उन जगहों पर जहां विशेष पर्व, उत्सव और त्यौहार होते हैं, आप सच में उन रंगों, प्रेम और आनंद से भर जाते हैं। ऐसी ही एक जगह है जहाँ आस्था और श्रद्धा दोनों ही आपको बेशुमार मिलेगी, जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पावन धरती कुरुक्षेत्र की। जहाँ नवंबर महीने में धूमधाम से अंतर्राष्ट्रीय गीता जयंती उत्सव मनाया जाता है। तो आइये इस ऐतिहासिक शहर की कुछ खूबसूरत जगहों का अवलोकन करते हैं, शायद आपका मन कर जाए वहां जाने का। हम इस ब्लॉग में आपको कुरुक्षेत्र की कुछ बेहद खास जगह  के बारे में बता रहे हैं। कुरुक्षेत्र जा रहे हैं तो इन जगहों पर घूमना मत भूलना । ब्रह्म सरोवर का हमने विस्तारपूर्वक वर्णन पिछले ब्लॉग में किया था। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप इसे पढ़ सकते हैं। ब्रह्मसरोवर घूमने के बाद स्टेशन की ओर जब आप जाते हैं तो रास्ते में आपको छठी पातशाही गुरुद्वारा, सन्नहित सरोवर, श्री कृष्ण संग्रहालय, पैनोरमा विज्ञान केंद्र, यह सभी स्थान लगभग कुछ ही कदम की दूरी पर आपको मिल जाएंगे। सन्नहित सरोवर ब्रह्मसरोवर से 500 मीटर की दूरी पर  सन्नहित  सरोवर स्थित है। मात्र 5 मिनट पैदल चलने पर आसानी से सन्नहित सरोवर पहुंच जायेंगे। हालांकि ब्रह्मसरोवर और इस सरोवर में फर्क सिर्फ विशालता का है। जहां ब्रह्मसरोवर विशालता के लिए जाना जाता है। वही सन्नहित सरोवर अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है। सरोवर के मुख्य द्वार पर सामने की तरफ आपको छठी पातशाही गुरुद्वारा भी दिख जाएगा। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस सरोवर का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। सरोवर की गणना कुरुक्षेत्र के सबसे प्राचीन सरोवरों में की जाती है। इस सरोवर को ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का निवास स्थान भी कहा गया है। श्रीमद भगवत पुराण के अनुसार पूर्ण सूर्य ग्रहण के दिन श्री कृष्ण अपने सगे संबंधियों के साथ  इस सरोवर में स्नान करने आए थे। साथ ही महाभारत के युद्ध के बाद पांडव यहीं पर पिंडदान करने के लिए आए थे। सरोवर के तट पर सूर्य नारायण, लक्ष्मी नारायण, धुर्व नारायण के मंदिर स्थित हैं। सिख गुरु भी अपने समय पर यहां स्नान करने आए थे। अमावस्या के दिन और सूर्य ग्रहण के दिन यहां पर हजारों की संख्या में लोग स्नान करने के लिए आते हैं। छठी पातशाही गुरुद्वारा सन्नहित सरोवर के ठीक सामने छठी पातशाही गुरुद्वारा दिखाई देता है। सरोवर के मुख्य द्वार से 10 कदम की दूरी पर यह गुरुद्वारा स्थित है। सिख धर्म के अनुसार सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी अमावस वाले दिन कुरुक्षेत्र पधारे थे और सन्नहित सरोवर के सामने डेरा लगाया था। इस दौरान गुरु नानक देव जी ने हिंदुओं के प्रसिद्ध नियम जिसमे सूर्य ग्रहण के समय आग नहीं जलाने का नियम होता है, उस नियम को तोड़ते हुए गुरु का लंगर चालू किया। यहां पर सिखों के लगभग अधिकतर गुरु समय-समय पर आते जाते रहे हैं। गुरु श्री हरगोबिंद सिंह जी यहां पर दो बार पधारे थे। Kurukshetra गुरुद्वारे के अंदर मुंह हाथ धोने के बाद सर पर कपड़ा बांधे प्रवेश किया, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ  कि किसी भी गुरुद्वारे में बिना सर पर कपड़ा बांधे प्रवेश की  इजाजत नहीं मिलती है। सबसे पहले नजर सामने सरोवर पर पड़ी, सरोवर बिलकुल साफ सुथरा था, आसपास किसी भी तरह की गंदगी नहीं थी। फिलहाल गुरुद्वारे का मरम्मत का कार्य चल रहा है, मगर दर्शन करने के लिए कोई मनाही नहीं। श्री कृष्ण संग्रहालय और पैनोरमा विज्ञान केंद्र गुरुद्वारे से निकलने के मात्र कुछ कदम की दूरी पर ही आपको पैनोरमा विज्ञान केंद्र और श्री कृष्ण संग्रहालय दिख जाएगा। आप पैदल ही वहां पर आसानी से पहुंच सकते हैं। कुरुक्षेत्र में पैनोरमा और विज्ञान केंद्र की एक सुंदर बेलनाकार इमारत है, कुरुक्षेत्र पैनोरमा और विज्ञान केंद्र  दोनों में ही ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल पर बेलनाकार दीवारों के साथ दो अलग-अलग प्रकार के एक्ज़ीबिशन देखने को मिलेंगी। पैनोरमा में बहुत सी  वैज्ञानिक वस्तुओं को भी प्रदर्शित किया गया है। ग्राउंड फ्लोर पर लगी एक्ज़ीबिशन में  परमाणु संरचना, ज्यामिति, खगोल विज्ञान और सर्जरी की प्राचीन भारतीय अवधारणा पर अंकगणितीय नियम, काम और इंटरैक्टिव शामिल हैं। यहाँ आपको अधिकतर युवा खासकर स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी दिखाई देंगे। बाकि यहाँ सभी आयु वर्ग के लोग आते हैं। पैनोरमा के साथ ही एक और सुंदर  इमारत श्री कृष्ण संग्रहालय स्थित है, यहाँ प्रवेश करते ही आपको अपने सुरुचिपूर्ण वास्तुकला और वातावरण के साथ, केंद्र का मुख्य आकर्षण कुरुक्षेत्र के महाकाव्य युद्ध का सजीव चित्रण दिखाई देगा। यहाँ आपको पूरी महाभारत एक ही जगह दिखाई देगी।  जिसका साउंड सच में अद्भुत है और सच में पांडवों और कौरवों के बीच महाभारत का टकराव उनकी आंखों के सामने जीवित हो जाता है। Research by Pravesh Chauhan Edited by Pardeep Kumar Click the link and  You Can Join Our YouTube Channel Like and Subscribe

Old Delhi Markets Bazar Delhi

Khari Baoli Market: Asia’s Largest Spice Market

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Khari Baoli: एशिया की सबसे बड़ी मसाला मार्किट जब भी किसी बाजार का नाम आता है तो स्वतः ही कपड़े और खानपान हमारे ज़ेहन में घूम जाते हैं। आमतौर पर जब भी हम चाँदनी चौक का नाम सुनते हैं तब हमें वहाँ बिकने वाले शानदार मैरिड क्लॉथ खासकर सूट और शानदार लहंगों की याद आती है, पर चाँदनी चौक में एक ऐसा बाज़ार भी है जहाँ वस्त्र, ज्वेलरी और चप्पल-जूतों से कुछ अलग मिलता है। जी हाँ, चाँदनी चौक के बीचों बीच बनी है खारी बावली जो एशिया की सबसे बड़ी मसाला मार्किट है। (Khari Baoli: Asia’s Largest Spice Market) चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन से खारी बावली सबसे पास पड़ती है, अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप बाज़ार तक पैदल जाना चाहे या ई रिक्शा से। फतेहपुरी मज्सिद से सीधे हाथ पर खारी बावली की शुरुवात हो जाती है। आगे बढ़ते ही आपको खुद-ब-खुद महसूस हो जाएगा कि आप खारी बावली में कदम रख चुके हैं क्योंकि चारों ओर से आ रही मसालों की खुशबू सब बयान कर देती है। ये है खारी बावली का इतिहास खारी बावली को 1650 में मुगल सम्राट शाहजहाँ की पत्नी फतहपुरी बेगम ने बनवाया था। खारी बावली शब्द सुनने में जितना दिलचस्प लगता है उतना ही उम्दा ये बाज़ार हकीकत में भी है। खारी का अर्थ नमकीन है वहीं बावली से मतलब सीढ़ीनुमा कुआँ से है। यहाँ बनी बावड़ियों का प्रयोग जानवरों के स्नान के प्रयोग में लाया जाता था। समय और विकास के साथ बावड़िया कहीं गायब हो गयीं हैं अब उस जगह इतिहास समेटे खारी बावली मौजूद है। आपकी रसोई में प्रयोग होने वाला दुर्लभ से दुर्लभ मसाला और ड्राई फ्रूट आपको खारी बावली में चुटकीयों में उपलब्ध हो जाएगा। हर प्रकार का ड्राई फ्रूट जैसे-फ्रूटबादाम, किशमिश मखाना, काजू, अखरोट, अंजीर, केसर, पिस्ता, खजूर, मूंगफली और न जाने कितने प्रकार के सूखे मेवे खारी बावली में आँख मूँद कर मिल जाते हैं। आपके ज़ेहन में ये सवाल जरूर आएगा कि ड्राई फ्रूट खरीदने के लिए खारी बावली जाने की जरूरत क्या है, वह तो कहीं से भी ले सकते हैं? पर आपको बता दें खारी बावली में आपको असली और बढ़िया गुणवत्ता का मेवा मिलेगा। कहीं और मेवा आसानी से उपलब्ध तो हो सकता है लेकिन खारी बावली का मेवा सबसे उम्दा और विश्वसनीय माना जाता है। इसके अलावा खारी बावली मसालों को लेकर भी बहुत प्रसिद्ध है। हल्दी, धनिया पाउडर, काली-लाल मिर्च, जीरा, काला जीरा अमचूर पाउडर, हींग, जायफल और हर वह नायाब और दुर्लभ मसाला जिसका प्रयोग रसोई में किया जाता है वह खारी बावली में उत्तम गुणवत्ता के साथ मिल जाएगा। आप यहाँ अपने बालों को चमकदार बनाने के लिए रीठा और अन्य प्रकार की जड़ी बूटीयाँ आदि भी खरीद सकते हैं। 400 साल पुरानी है दुकानें पूरी खारी बावली मार्किट में आपको दुकानों के नाम भी बेहद दिलचस्प मिलेंगे। यहाँ स्थित कुछ दुकानों के नाम आज भी, चावल वाले 13, 21 नंबर की दुकान, 15 नंबर की दुकान आदि है। इस ऐतिहासिक और पुराने बाज़ार को लगभग 400 वर्ष हो चुके हैं इसलिए यहाँ अधिकतर दुकानें खानदानी हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी यूँ ही चली आ रही है। दिल्ली के आसपास और दूरवर्ती इलाकों से शायद ही कोई किराने की दुकान वाला हो जो खारी बावली से सामान न खरीदता हो। देश की विभिन्न उत्पादक मंडियों जैसे निजामाबाद से हल्दी, कोटा से धनिया, ऊंझा से जीरा, गुंटूर से लाल मिर्च, कोच्चि या मंगलूर से इलायची खारी बावली में उपलब्ध होती है। यहाँ न सिर्फ देशी बल्कि अमेरिका, अफगानिस्तान जैसे देशों का भी ड्राई फ्रूट आसानी से मिल जाता है। दिन का चाहे कोई भी समय हो यहाँ आपको हर वक़्त लोगो की भीड़ आसानी से मिल जाएगी। दीपावली जैसे त्यौहार के समय तो आप को यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं मिलेगी। फेस्टिवल के समय यहाँ तरह-तरह ड्राई फ्रूट की भारी डिमांड होती है। आपको अपनी आँखों के सामने जितना बाज़ार दिखेगा वह असल में यह बाज़ार उससे कही ज़्यादा बड़ा है। यहीं दुकानों के ऊपर अलग-अलग मसालों और मेवे के गोदाम भी  बने हुए हैं। हर बाज़ार की अपनी अलग विशेषता होती है ठीक उसी प्रकार खारी बावली की विशेषता यहाँ मिलने वाले ख़ास मसालें और मेवे हैं। इसलिए जब भी उम्दा और कुछ खास मेवे और मसालों की इच्छा हो तो पुरानी दिल्ली में खारी बावली एक बेहतरीन विकल्प है। Five Colors of Travel

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Fatehpuri Masjid, Chandni Chowk, Delhi

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Fatehpuri Masjid – दिल्ली की एक ऐसी मस्जिद जिसे कभी अंग्रेजों ने नीलाम कर दिया था यूँ तो हमारे देश की पुरानी इमारतों और धरोहरों की अनगिनत खासियत हैं लेकिन एक चीज जो उन्हें बाकी सबसे अलग करती है वो है इनकी वास्तुकला।  कितने शासक आये और कितने गए लेकिन कुछ नहीं गया तो वो है यहाँ की इमारतों की अनूठी वास्तुकला  बनावट।  आज आपको हम इस ब्लॉग में ऐसी एक इमारत की वास्तुकला के दर्शन कराएंगे, जिसका नाम है फतेहपुरी मस्जिद। यह मस्जिद भले ही देश की अन्य जानी-पहचानी  और बड़ी मस्जिदों की तरह लाइम लाइट में न हो पर वक़्त के थपेड़े और बहुत से उतार-चढाव से गुजरी चाँदनी चौक की रौनक बढ़ाती फतेहपुरी मस्जिद  अपने आप में लाजवाब निर्माण कला की मिसाल है। सड़क के एक छोर पर बना है लाल किला और पश्चिम छोर पर फतेहपुरी मस्जिद। भीड़भाड़ वाली सड़कें पार करके जैसे ही आप फतेहपुरी मस्जिद के सामने पहुंचेंगे आपको ऐसा आभास होगा मानो सारी भागमदौड़ और शोर कहीं पीछे छूट गया हो।  380 साल पुरानी मस्जिद अपने अंदर न जाने कितने शासकों का इतिहास समेटे  हुए है जो इसे और भी अधिक दर्शनीय बनाता है। ये है फ़तेहपुरी मस्जिद का इतिहास चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन से 2 किलोमीटर दूर बनी फतेहपुरी मस्जिद का निर्माण 1650 में हुआ था। मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह की बेगम फतेहपुरी द्वारा करवाया गया था।  इसलिए मस्जिद का नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। आपको बता दें मस्जिद के पास ही एशिया का सबसे बड़े मसालों का बाजार- खारी बावली भी है। मस्जिद के इतिहास को लेकर विभिन्न कथाएँ हैं लेकिन माना जाता है कि 1857 में प्रथम भारतीय संग्राम के बाद अंग्रेजों ने मस्जिद को नीलाम कर दिया था।  उस समय राय लाला चुन्नामल ने मस्जिद को मात्र 11000 रुपय में खरीदा था।  जिनके वंशज आज भी चाँदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं।  1877 में लॉर्ड लिटन ने मस्जिद को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया और यही बोर्ड आज तक मस्जिद संभाल रहा है। जानिए मस्जिद की बनावट की खासियत फतेहपुरी मस्जिद की खूबसूरती का मुख्य कारण है उसकी बनावट में इस्तेमाल लाल पत्थर। दिल्ली के लालकिला और जामा मस्जिद की तरह इसका निर्माण भी लाल पत्थरों से किया गया है। मस्जिद परंपरागत डिजाइन में है लेकिन इबादत हॉल की आकृति धनुषाकार है।  मस्जिद के बड़े  दरवाज़े से आप जैसे ही अंदर प्रवेश करेंगे विशाल परिसर आपका दिल जीत लेगा। परिसर के बीच इस्लामी विद्वानों की  20 से अधिक कब्र हैं।  हजरत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद, मज़हर उल्लाह शाह, मौलाना मोहम्मद आदि की कब्र मस्जिद में मौजूद है। आपको बता दें मस्जिद में तीन विशाल दरवाजे हैं, जिसमें से 2 दरवाजे उत्तर में हैं और एक दक्षिण में।  आगे बढ़ते ही आपकी नजर सफेद संगमरमर से बने  एक पानी के कुंड पर जाएगी।  मस्जिद के दोनों तरफ लाल पत्थर से बने स्तंभों की कतारें हैं जो बिल्कुल बराबर संतुलन में बनी हुई हैं।  दो मंजिला मस्जिद में सात विशाल मेहराब बने हैं और यह दिल्ली की अकेली एकल गुंबददार मस्जिद है। इस्लाम धर्म के अनुयायी और लोग आज भी अपने दो प्रमुख त्योहारों ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा ने बड़ी संख्या में फतेहपुरी मस्जिद पहुंचते हैं। मस्जिद में बैठे एक मौलवी ने बताया की मस्जिद की बहुत मान्यता है, जिन लोगों पर अल्लाह का मेहरबानी होती है वही इस मस्जिद में प्रवेश कर पाते हैं और जो प्रवेश करता है अल्लाह उसे सारे दुखों से दूर रखते हैं। लेकिन अगर मस्जिद के रख रखाव की और थोड़ा विशेष ध्यान दिया जाए तो यह और भी सुन्दर  दिखाई दे। लगभग 380 साल पुरानी धरोहर होने के बावजूद भी फतेहपुरी मस्जिद आज भी उतनी दमदार है जितनी अपनी शुरुवाती दौर में रही होगी। मस्जिद के अंदर हर दीवार पर उर्दू में अलग-अलग कलमें लिखें हुए हैं। और कुरान की करीब 100 प्रतियाँ रखी हुई हैं। मस्जिद तो पुरानी दिल्ली की शान दुगनी करती ही है लेकिन मस्जिद आये लोगों के लिए बोनस है मस्जिद के बाहर मिलने वाला बढ़िया समान और स्वादिष्ट भोजन। क्योंकि देश के सबसे पुराने और प्रसिद्ध बाज़ारों में से एक में यह मस्जिद स्थित है। निकटतम मेट्रो स्टेशन यहाँ आने के लिए निकटतम मेट्रो स्टेशन चांदनी चौक है। धर्म और मज़हब से ऊपर उठ कर अगर आप एक शानदार शांतचित और अपनी बनावट और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध ईमारत का दीदार करना चाहते हैं तो आपके  लिए फतेहपुरी मस्जिद परफेक्ट है। Research by Geetu Katyal Edited by Pardeep Kumar

Culture Punjab

Maharaja Ranjit Singh Fort, Phillaur, Ludhiana

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Ludhiana: महाराजा रंजीत सिंह के किले और डेरा बाबा मुराद शाह दरगाह के कारण वीरवार का दिन लुधियानवियों के लिए है बेहद खास हर शहर की अपनी अलग खासियत होती है। यह खासियत खाने-पीने की चीजों से लेकर घूमने वाली जगहों से संबंधित भी हो सकती है। पंजाब का लुधियाना शहर जो देश भर में कपड़ा उद्योग और इंडस्ट्रियल कामकाज की वजह से जाना जाता है, इस शहर में आपको इनके अलावा भी बहुत कुछ देखने को मिलेगा। अगर आप लुधियाना के आसपास हैं या इस रुट से गुजर रहे हैं तो आप यहाँ की कुछ खूबसूरत जगहों का अच्छे से लुत्फ़ उठा सकते हैं। लुधियाना एक ऐतिहासिक शहर है, क्योंकि ऐतिहासिक स्मारक लोधी किला यही स्थित है। इस शहर को सन् 1480 में मुस्लिम शासक सिकंदर लोदी द्वारा सतलुज नदी के तट पर बसाया गया था, लोधी की वजह से शहर का नाम लुधियाना पड़ा। आज हम फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल के इस ब्लॉग में आपको लुधियाना की  प्रमुख जगहों से रूबरू करवाएंगे। लुधियाना से 15 किलोमीटर के दायरे में आप एक साथ कई प्रमुख जगह घूम सकते हैं। सबसे पहले टाइगर सफारी, बुध विहार हार्डिस वर्ल्ड, शनि गांव, मैयाजी सरकार की दरगाह और महाराजा रणजीत सिंह किला, यह सब जगह आपको समराला चौक से फिल्लोर के रास्ते में मिल जाएंगी। लेकिन ध्यान रहे इन सभी जगहों को घूमने के लिए आपको वीरवार का दिन ही चुनना होगा। तभी इन प्रमुख जगहों को घुमा जा सकता है। महाराजा रंजीत सिंह किला महाराजा रंजीत सिंह किले के अंदर प्रवेश करने के लिए किसी भी तरह की टिकट की आवश्यकता नहीं होती है। एंट्री बिल्कुल फ्री होती है। मुख्य द्वार पर पुलिस के जवान आपको टेंपरेचर चेक करने के बाद अंदर जाने देते हैं। किला अंदर से बहुत ही अद्भुत और विशालकाय दीवारों के साथ एक अलग ही नजारा पेश कर रहा था। किले के दरवाजे किसी फिल्मी किले से बिल्कुल भी कम नहीं थे। सच में  फिल्मों में दिखने वाले किलों से भी एक अलग नजारा वहां पर देखने को मिल रहा था। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि महाराजा जीत सिंह किला भी केवल वीरवार वाले दिन ही खुलता है, क्योंकि इसके अंदर भी दरगाह स्थित है। जहाँ  श्रद्धालु वीरवार वाले दिन ही आते है। किले के अंदर बड़ा-सा दरवाजा पार करने के बाद दरगाह आती है। आसपास पुलिस का पहरा दिखाई देता है। किले के अंदर पुलिस प्रशिक्षण केंद्र भी है। फोटोग्राफी करने की यहां सुरक्षा कारणों की वजह से सख्त मनाही है।आप फोटोग्राफी नहीं कर सकते हैं हालांकि लोग छुप-छुपा के एक दो फोटो ले रहे थे। अंदर एक संग्रहालय भी है। डेरा बाबा मुराद शाह, नकोदर लुधियाना से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित नकोदर में  डेरा बाबा मुराद शाह जी की दरगाह स्थित है जहाँ श्रद्धालुओं की खूब भीड़ उमड़ती है। अक्सर लुधियानवी वीरवार वाले दिन नकोदर घूमने जाते हैं। डेरा बाबा मुराद शाह जी की दरगाह का नजारा बहुत ही भव्य है। बाबा मुराद शाह के बारे में कुछ रोचक बातें हैं जिसके कारण यह दरगाह दुनिया भर में प्रसिद्ध है। बताते हैं  ”बाबाजी बिजली बोर्ड दिल्ली में एसडीओ के पद पर तैनात थे, उनके साथ एक मुस्लिम महिला काम करती थी। बाबा मुराद शाह जी का नाम पहले विद्यासागर था, वह उस मुस्लिम महिला से बेइंतहा मोहब्बत करते थे। एक दिन उस मुस्लिम महिला की शादी किसी और से तय हो गई। बाबा जी ने उस मुस्लिम महिला को कहा कि वह शादी करना चाहते हैं। मगर मुस्लिम महिला ने यह कहकर शादी करने के लिए मना कर दिया कि वह मुस्लिम नहीं है,अगर शादी करनी है तो पहले मुसलमान बनना पड़ेगा। बस फिर क्या था मुस्लिम महिला की बात बाबा जी को इतनी चुभी कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी और वापस अपने गांव नकोदर की ओर चल दिए। रास्ते में उन्होंने वारिस शाह की हीर पुस्तक खरीदी,उसके बाद बाबाजी की जिंदगी में नया मोड़ आ गया। हीर पुस्तक पढ़ते-पढ़ते बाबाजी नकोदर अपने घर के पास पहुंचे तो रास्ते में बाबा शेरेशाह जी ने उनको आवाज लगाते हुए कहा कि ओह विद्यासागर कहां जा रहे हो बाबा जी उनके पास गए, फिर शेरशाह जी कहते हैं “क्यों मुसलमान नहीं बनना है”। इतना सुनते ही बाबाजी सोच में पड़ गए। वह सोचने लगे कि आखिर उनको मेरा नाम और मेरी बातें कैसे पता चली। बाबा जी ने मन में सोचा कि यह जरूर कोई रूहानी इंसान हैं। इसके बाद बाबा जी ने कभी मुड़ कर पीछे नहीं देखा और घर वार छोड़कर शेरेशाह जी की शरण में आ गए। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि बाबा शेरे शाह पाकिस्तान से आए हुए थे और जब वह पाकिस्तान लौट कर जा रहे थे तो जाते वक्त शेरे शाह जी ने कहा की मेरे जाने के बाद “तुम मेरे गद्दी के मालिक होगे और दुनिया तुम्हें मुराद शाह के नाम से जानेगी”। 24 साल की उम्र में बाबा मुराद शाह जी ईश्वर की भक्ति में इतना लीन हो गए कि मात्र 28 साल की उम्र में वह फकीर बन गए। मौजूदा समय में यहां की गद्दी पंजाबी सूफी गायक गुरदास मान के पास है।”(बाबा मुराद शाह वेबसाइट में छपे एक लेख के मुताबिक) यहां पर वीरवार वाले दिन हजारों की संख्या में लोग आते हैं। यहां की साज-सज्जा बहुत ही अद्भुत है। वीरवार वाले दिन दरगाह में भंडारा दिन भर चलता रहता है। दरगाह के साथ ही बहुत बड़ी झील भी है जो कि मन को खूब शीतलता प्रदान करती है। इस दरगाह तक आप बस और ट्रेन किसी भी तरह आसानी से पहुंच सकते हैं। लेकिन ट्रैन की की तुलना में आप यहाँ बस से आसानी से पहुँच सकते हैं। Report by Pravesh Chauahan Edited by Pardeep Kumar

Bazar Delhi

Lajpat Nagar Central Market (New Delhi)

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Lajpat Nagar Central Market (New Delhi) -आम से लेकर खास हर किसी की पसंदीदा मार्किट Five Colors of Travel शॉपिंग करना किसी के लिए भी एक अलग दुनिया में एंट्री करने जैसा होता है। जहाँ जाकर हम बस खरीदारी में डूब जाते हैं। देखा जाए तो शॉपिंग और मार्किट एक दूसरे के पूरक हैं। फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल का एक मकसद आपको देश भर के प्रसिद्ध और थोड़े यूनिक बाज़ारों से रूबरू करवाना भी है। बाजार दर्शन की इसी कड़ी में आज हम हाज़िर हैं दिल्ली की बेहद खास लाजपत नगर मार्किट के साथ। जहाँ जाकर आप न केवल बढ़िया खरीदारी करते हैं बल्कि खरीदारी करने के गुर भी सीख सकते हैं। लाजपत नगर मार्किट लाजपत नगर मेट्रो स्टेशन से कुछ मिनटों की दूरी पर स्थित सेंट्रल मार्किट में वह सब मिलेगा जो आप लेना चाहते हैं। 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद लाजपत नगर में बहुत से लोगो ने शरण ली और यहीं से एक मार्किट की शुरुवात हुई, जिसको आज हम सेंट्रल मार्किट और लाजपत नगर मार्किट के नाम से जानते हैं। समय के साथ सेंट्रल मार्किट विकसित और विस्तारित होती गयी। आज सेंट्रल मार्किट न सिर्फ़ दिल्ली की बल्कि पूरे भारत की फेमस शॉपिंग मार्किट्स में से एक है। मल्टी फ्लोर पार्किंग अक्सर मार्केट्स में पार्किंग की समस्या का सामना करना पड़ता है लेकिन सेंट्रल मार्किट में मल्टी फ्लोर पार्किंग मौजूद है। जहाँ कोई भी रिसनेबल चार्ज में गाड़ी पार्क कर सकता है। पार्किंग के बाद सरगम, विजय सेल्स और वीवो जैसे बड़े-बड़े शोरूम आते हैं जहाँ मोबाइल, होम अप्लायंस और इलेक्ट्रॉनिक आइटम खरीदें जा सकता हैं। आगे बढ़ने पर आती है फेमस सिंधी ड्राई फ़ूड की दुकान जहाँ आपको बढ़िया, ओपन और पैक्ड दोनों तरह का ड्राई फ्रूट मिल जाएगा। डेकोरेटिव आइटम्स का हब थोड़ा आगे बढ़ने पर मिलता हैं डेकोरेशन का सामान। जहाँ फ्लावर पोट, गमलें, सीनरी और हर छोटी-बड़ी आकर्षित करने वाली आइटम आसानी से मिल जाती है। सड़क किनारे बिकने वाली ये डेकोरेटिव आइटम ऐसी लगती हैं मानो बेचने के लिए नहीं बल्कि सजाने के मकसद से रखी हुई हो। इसके बाद शुरू हो जाता है कपड़ों का संसार। सेंट्रल मार्किट अपने ट्रेंडी कपड़ों को लेकर सबसे अलग इमेज रखती है। आप चाहे कुछ भी इंडियन क्लोथ्स पहनते हों या वेस्टर्न, सेंट्रल मार्किट में आपको सब चुटकीयों में मिलेगा। महंगी तो बिलकुल नहीं है ये मार्किट इस मार्किट के बारे में एक मिथ है जो लोगों के बीच फैला हुआ है, कि सेंट्रल मार्किट में बहुत महंगे कपड़े मिलते हैं। जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं है,आपकों बता दें यहाँ आम आदमी से लेकर खास सभी बड़े इत्मीनान से शॉपिंग कर सकते हैं। इस मार्किट में कदम-क़दम पर आपकों 200-400 रुपय में सूट, टॉप और जीन्स आसानी से मिल जाएगी, वह भी बिल्कुल फैशनेबल। इसके अलावा यहाँ आपके पास बार्गेनिंग का भी विकल्प मौजूद है जो कोई भी आसानी से मिनटों में कर सकता है। शादियों की शॉपिंग हो या घर से जुड़ा छोटा-बड़ा सामान सेंट्रल मार्किट में सब कुछ मिलता है अगर आप ब्रांडेड कपड़ों के शौकीन हैं तो भी सेंट्रल मार्किट आपके लिए परफेक्ट है जहाँ आपको लगभग सभी ब्रांड के शोरूम आसानी से मिल जाएंगे। सेंट्रल मार्किट में इंसेंस, चुनमुन, डब्लू, पीटर इंग्लैंड, मोंटे कारलो, किन्स, लक्की, नरगिस, क्यू, सीता फैब्रिक्स, रितु वियर्स, इनर सर्कल, मान्यवर, नारंग संस और बहुत सारे नामी शोरूम मौजूद हैं। इन में से किस शोरूम में ज़्यादा भीड़ होती है, ये कहना मुश्किल है क्योंकि सारे लोगो से खचाखच भरे होते हैं। इनके अलावा सेंट्रल मार्किट में कुछ ऐसे शोरूम भी हैं जो आपको किसी और मार्किट में आसानी से नहीं मिलेंगे। क्योंकि इन शोरूम में आपको अच्छी वैरायटी के अलावा सभी ब्रैंड के कपड़े मिल जायेंगे। आमतौर पर सेंट्रल मार्किट के रेगुलर कस्टमर यहीं से शॉपिंग करते हैं। आपकों बता दें इन शोरूम में क्वालिटी और प्राइज का बहुत अच्छे से ध्यान रखा जाता है। इसी तरह फुट वेयर के लिहाज़ से भी सेंट्रल मार्किट एक परफेक्ट प्लेस है। यहाँ आपको 150 रुपए में बढ़िया बेली या स्लीपर आसानी से मिल जाएगी। वहीं बड़े-बड़े शोरूम भी हैं जहाँ आप अपनी मनचाही ब्रैंड का फुट वेयर आसानी से खरीद सकते हैं। सेंट्रल मार्किट में स्टश, स्टीलाटोज़ और सोना जैसे शोरूम फुट वेयर के लिए फेमस हैं। शादियों की शॉपिंग हो या घर से जुड़ा छोटा-बड़ा सामान सेंट्रल मार्किट में सब कुछ मिलता है। वह भी स्टाइलिश और ट्रेंडी लुक में। अब आप ही बताएँ इसके अलावा और क्या चाहिए? आपकों बता दें सेंट्रल मार्किट न सिर्फ़ शॉपिंग के लिहाज से परफेक्ट है बल्कि यहाँ के मोमोज़ और चाट भी बहुत फेमस है। सेंट्रल मार्किट घूमने के बाद कोई भी व्यक्ति इसे लाजपत नगर का दिल कहने में संकोच नहीं करेगा। सेंट्रल मार्किट सच में न जाने कितने लोगों का फैशन संजोये हुए है। ये मार्किट एक परफेक्ट उदाहरण है- बिज़नेस और लाइफस्टाइल दोनों का। Edited by Pardeep Kumar

Haryana Lifestyle

Sultanpur Bird Sanctuary

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Sultanpur Bird Sanctuary: सुल्तानपुर नेशनल पार्क- खूबसूरत प्रवासी पक्षियों की आरामगाह By Pardeep Kumar नि:संदेह पक्षियों की फितरत है उड़ना और पक्षियों की तरह बेफ़िक्री से आसमान की सैर करना किसे पसंद नहीं होगा।  चाहे आप प्रकृति प्रेमी हैं या नहीं, लेकिन कभी न कभी आपके मन में भी यह ख्याल अवश्य आता-जाता रहता होगा कि काश हम भी इन पक्षियों की तरह एक जगह से दूसरे जगह और एक देश से दूसरे देश में उड़ सकते।आज हम इस ब्लॉग में आपको ले चलते है पक्षियों की उस आरामगाह में जहाँ इत्मीनान से वक़्त बिताने के लिए वो सैंकड़ों हज़ारों मील उड़कर आते हैं। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा के सुल्तानपुर नेशनल पार्क की जो देश भर में पक्षियों के स्वर्ग के रूप में अच्छा-खासा प्रसिद्ध है। सुल्तानपुर नेशनल पार्क, गुड़गाँव-झज्जर हाईवे पर फर्रुखनगर के नजदीक स्थित है। दिल्ली एनसीआर में होने के कारण सुल्तानपुर नेशनल पार्क वीकेंड बिताने का एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है। आप दिल्ली मेट्रो से यहाँ आना चाहें तो येलो लाइन से  हुडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन पर पहुँच कर, वहां से कोई निजी कैब या ऑटो बुक करके आप इस खूबसूरत पक्षी विहार तक पहुँच सकते हैं।अगर आप गुड़गाँव से जाएँ तो यह लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है और दिल्ली से लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर। you can watch this vlog – Like, comment & subscribe सुल्तानपुर जाने का सही समय सुल्तानपुर बर्ड सैंक्चुअरी में वैसे तो आप साल भर कभी भी आ सकते हैं। लेकिन अक्टूबर से जनवरी के बीच यहाँ आने का सबसे उपयुक्त समय रहता है। दरअसल इसी समय देश विदेश के प्रवासी पक्षी यहाँ भरी तादाद में आते हैं और कुछ महीने उनका ठहराव यहीं होता है। दिसंबर-जनवरी के महीने में अक्सर यहाँ विदेशी पक्षी आवास करते हैं। प्रवेश टिकट यहाँ प्रवेश करने के लिए आपको दस रुपए का टिकट लेना पड़ता है। साथ ही अगर आप फोटोग्राफी के लिए कैमरा ले जाना चाहते हैं तो उसका भी नाममात्र का चार्ज है। कार पार्किंग के लिए बेहतरीन सुविधा है। टिकट खिड़की के सामने ही आप अपनी कार पार्क कर सकते हैं। 142.52 हेक्टेयर में फैले  इस बर्ड सैंक्चुअरी में आपको जन्नत-सी एक अलग ही दुनिया दिखाई देगी। प्रकृति प्रेमियों के लिए तो यहाँ सब कुछ है। इस नेशनल पार्क में थोड़ा अंदर चलते ही आपको मिलेगी पानी से लबालब झील, जिनके किनारे पेड़ों पर सुन्दर और दुर्लभ पक्षियों की अनेक प्रजातियां दिखाई देती हैं। देसी-विदेशी पक्षियों के अलावा आपको यहाँ नीलगाय, गाय, हिरण, लंगूर और  बन्दर जैसे अन्य जीव जंतु भी दिखाई देंगे। जो यहाँ के माहौल को एक अलग ही रंग रुप प्रदान करते हैं। प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां पेलिकन, साइबेरियाई सारस, काले पंखों वाला स्टिल्ट, जलकाग, कॉमन ग्रीनशैंक्स, कुरजां आदि कुछ ऐसे प्रमुख प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां हैं जो सर्दियों के मौसम में इस नेशनल पार्क में आपको अवश्य मिल जायेंगे। क्योंकि हम अभी नवंबर महीने के अंत में इस पार्क में गए तो हमें साइबेरियाई सारस की प्रजाति दिखाई दी। झील के ऊपर लम्बी उड़ान भरता दिखने में बाज़ और चील जैसा विशालकाय यह पक्षी बेहद सुन्दर और आकर्षक लगता है। आप जैसे ही इस पार्क के बीचो-बीच बनी सुन्दर सी झील के पास पहुँचते हैं आपको पक्षियों के चहचहाने की मधुर आवाज़ सुनाई देगी। देश विदेश के इन दुर्लभ पक्षियों के जमावड़े व अठखेलियों से नेशनल पार्क की खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं। यहाँ आकर आपके मन को एक अलग ही सुकून का अनुभव होगा। दरअसल नवंबर दिसंबर के महीनों में झील के चारों और लगे पेड़ों पर फलों की तरह लदे ये पक्षी आपकी नज़रों को एक पल के लिए भी इधर उधर नहीं होने देंगे। वाईल्ड लाईफ फोटोग्राफर्स के लिए तो यह जगह जैसे कुदरत का एक नायाब तोहफा है। किस पल उनके कैमरे में कौन-सा दुर्लभ पक्षी कैद हो जाये कह नहीं सकते। बेहद सिस्टेमेटिक ढंग से बना नेशनल पार्क आपको बता दें सुल्तानपुर को 1972 में ‘वाटर बर्ड रिर्जव’ के रूप में घोषित किया गया। जुलाई 1991 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत  नेशनल पार्क का दर्जा दिया गया। इस बर्ड सैंक्चुअरी को बेहद सिस्टेमेटिक ढंग से बनाया गया है। यहाँ पर बहुत सारी झाडि़याँ, घास के मैदान और बहुत अधिक संख्या में बोगनवेलिया सहित अलग -अलग किस्म के पेड़ पौधे हैं। प्रकृति की खूबसूरती और पक्षी विहार की गरिमा  को बरक़रार रखते हुए अभ्यारण्य में काफ़ी अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।  इस नेशनल पार्क के अलग-अलग कोनों  पर पक्षियों की खूबसूरती को अच्छी तरह से निहारने के लिए चार वाच टावर बनाये गए हैं।  पर्यटकों की सुविधा के लिए यहाँ दूरबीन भी उपलब्ध हैं, जिसका प्रयोग करके आप दूर पेड़ों पर बैठे या झील में तैरते हुए पक्षियों को आसानी से देख सकते हैं। आप जैसे ही टिकट लेकर गेट से अंदर प्रवेश करते हैं सबसे पहले आपको दिखाई देता है इंटरप्रटेशन सेंटर। जहाँ आप पक्षियों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। जहाँ आपको चिड़िया और मोर जैसे पक्षियों के खूबसूरत स्टेचू दिखाई देंगे। जो एक बार अवश्य ही आपको यहाँ एक गेस्ट हाउस और जंगल विश्राम घर की भी व्यवस्था है, साथ ही खाने और जलपान के लिए छोटा-सा रेस्टोरेंट भी है। तो सोचिये मत, निकल पड़िये सुल्तानपुर नेशनल पार्क की और क्योंकि सर्दियों का समय आ चुका है और यह वही समय है जब प्रवासी पक्षियों का यहाँ शानदार जमघट लगना शुरू हो जाता है। जितनी ज्यादा सर्दी उतने सुन्दर पक्षी देखने का अवसर। Glimpse of Sultanpur National Park……

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Jal Mahal Jaipur the Water Palace

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Jal Mahal – झील के बीचों-बीच बना अनोखे सौन्दर्य और अद्भुत स्थापत्यकला का बेजोड़ उदाहरण by Pardeep Kumar अपनी यात्रा के अगले पड़ाव पर हम आ पहुंचे हैं राजस्थान के एक ऐसे शहर जो प्रेम, शांति और कला की अपनी एक अलग ही कहानी बयां करता है। कुछ शहर खूबसूरत होते हैं और कुछ सुन्दर बनने की चेष्टा करते हैं। लेकिन राजस्थान का जयपुर शहर तो शायद सुंदरता के लिए बनाया गया है जिसका नाम जेहन में आते ही मन गुलाबी हो उठता है। चाहे दिन का समय हो या रात का, इस शहर की चमक और बनावट मन से उतरती ही नहीं। चारों और अरावली की पहाडयों से घिरा, चौड़ी और साफ़ सुथरी सड़कों और अपने चमकीले और सैकड़ों साल पुराने बाज़ारों के कारण यह शहर किसी भी पर्यटक के मन को खुश करने में पूरी तरह सक्षम है। हमनें  अपने जयपुर ट्रिप में न केवल यहाँ के ऐतिहासिक और भव्य किलों को एक्सप्लोर किया बल्कि यहाँ की जीवन शैली, कल्चर, वास्तुकला, बाजार और खानपान को भी समझने की कोशिश की। इसी कड़ी में आज के इस ब्लॉग में हम आपको बता रहे हैं जयपुर की एक बेहद खूबसूरत जगह जलमहल के बारे में। You can also watch Jal Mahal Vlog on our YouTube Channel Five Colors of Travel, Like Share & Subscribe कैसे पहुंचे जलमहल झील के बीचोंबीच बना ये जलमहल राजस्थान के जयपुर जिले के आमेर मार्ग पर स्थित है, दिल्ली से लगभग 260 किलो मीटर और अजमेर से 146 किलो मीटर की दूरी पर बना ये महल पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र है। किस समय और किस मौसम में यहाँ आना बेस्ट रहता है वैसे तो यह महल 24 घंटे खुला रहता है पर यहां आने का सबसे उपयुक्त समय सुबह दस बजे से रात नौ बजे तक है इस समय अधिकतर लोग यहां पिकनिक करने, क्वालिटी टाइम स्पेंड करने और सुबह शाम यहां के लोकल लोग वॉक करने भी आते हैं। यहां आने का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से मार्च के बीच का है । दरअसल इन दिनों सर्दियों की खिली-खिली धूप में जल महल का नजारा बहुत ही अद्भुत और खूबसूरत लगता है। जानिए जलमहल का इतिहास पिंक सिटी जयपुर की ‘मानसागर’ झील के बीचों बीच बना ‘जलमहल’ अनोखे सौन्दर्य और अद्भुत स्थापत्यकला का बेजोड़ उदाहरण है। इस महल का निर्माण आज से लगभग 300 साल पहले आमेर के महाराज सवाई मानसिंह ने सन् 1799 में करवाया था। आपको बता दें यह पाँच मंज़िला इमारत और इस झील की सुंदरता उस समय के राजाओं के आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी और राजा अक्सर नाव में बैठकर इस महल की सैर किया करते थे । जल महल की वास्तुकला जलमहल एक पाँच मंज़िला इमारत है जिसकी 4 मंज़िल पानी के भीतर बनी हैं और एक पानी के ऊपर नज़र आती है। उस समय के राजा इस महल का उपयोग अपने मनोरंजन के लिए करते थे. धीरे-धीरे यहां राजाओं की आवाजाही कम हो गयी जिसके कारण यह महल लगभग 200 सालों के लिए वीरान हो गया। उसके बाद साल 2000 में इसकी मरम्मत का काम दोबारा शुरू किया गया और इसे दोबारा सैलानियों के लिए खोला गया। बाहरी परिसर से देखने पर आपको यू लगेगा मानो कोई विशाल नाव झील में उतरी हो। जलमहल के किनारे लगने वाला शानदार बाजार सैर सपाटे और घूमने के साथ-साथ यह क्षेत्र अब  लोगों के लिए आय का साधन भी बन गया है. यहां पर आपको राजस्थानी मोजड़ी, राजस्थानी जूती, हैंड बैग, होम डेकोरेटिव आइटम्स, ज्वेलरी और एडिशनल क्लोथ्स, मैग्नेट और भी कई डेली यूज़ के सामान मिलते हैं, इसी के साथ आपको यहां खाने-पीने के बहुत सारे आइटम भी मिल जाएंगे. यहां पर स्पेशली आपको मैग्नेट के आइटम्स बेचते बहुत से पुराने परंपरागत लोग दिख जायेंगे। साथ ही आप यहां पर ऊंट और घोड़े की सवारी का आनंद भी उठा सकते हैं । पिकनिक, नेचर लवर्स और क्वॉलिटी टाइम बिताने के लिए यह जगह एक बेहतरीन प्लेस है। आप यहां आकर पक्षियों और मछलियों को दाना देते हुए पहाड़ों के बीच में बनी इस झील के बेहतरीन नजारो का आनंद ले सकते हैं। बहुत से कपल्स यहां पर आपको राजस्थानी पोशाक में फोटो शूट करते हुए भी नजर आएंगे। पिकनिक स्पॉट वैसे जल महल का निर्माण आवासीय तौर पर ना होकर एक पिकनिक स्पॉट के तौर पर किया गया था. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जल महल के अंदर कोई कमरा नहीं है। और न ही कभी इस महल में राजाओं ने कभी रात्रि विश्राम नहीं किया। एक चीज जो इस महल को बेहद खूबसूरत और थोड़ा हटकर बनाती है वो है इस महल के अंदर बने गलियारे और छत पर बनाया शानदार बगीचा। इसकी खूबसूरत बनावट के कारण ही किसी जमाने में इसे ‘रोमांटिक महल’ के नाम से भी जाना जाता था।  महल की खासियत की बात करें तो तपते रैगिस्तान के बीच बसे इस महल में गरमी नहीं लगती, क्‍योंकि इसके कई तल पानी के अंदर बनाए गए हैं। आप आसानी से इस महल से पहाड़ और झील का ख़ूबसूरत नज़ारा भी देख सकते हैं। चांदनी रात में झील के पानी में इस महल का नजारा बेहद आकर्षक लगता है। पक्षी विहार जलमहल अब पक्षी विहार के रूप में भी विकसित हो रहा है। बताते हैं जल महल की  नर्सरी में तकरीबन एक लाख से ज्‍यादा पेड़ लगे हुए हैं। दिन रात बहुत से माली पेड़-पौधों की देखभाल में लगे रहते हैं। यह नर्सरी राजस्थान की सबसे उंचे पेड़ों वाली नर्सरी भी मानी  जाती  है। रात के समय में ये महल न केवल अद्भुत रूप ले लेता है बल्कि रंग बिरंगी लाइटों से जगमग होकर हर किसी को अपनी खूसूरती का कायल भी बना लेता है। अगर आपकी जरा भी दिलचस्पी फोटोग्राफी में है तो जल महल आपके लिए एक बेहद सुन्दर और लाज़वाब जगह है। इस महल के आसपास के नज़ारे इतने आकर्षक हैं कि यह सिर्फ फोटो खींचने के लिए ही नहीं बल्कि आपको अपने फोटो खिंचवाने पर भी मजबूर कर देंगे। some glimpse of Jal Mahal……..

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Amer Fort

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Amer Fort : राजस्थान की आन-बान और शान- आमेर का ऐतिहासिक किला by Pardeep Kumar गुलाबी शहर के नाम से प्रसिद्ध जयपुर से कोई विरला ही होगा जो वाकिफ न हो। भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक राजस्थान की राजधानी जो अपने खानपान से लेकर समृद्ध इतिहास, संस्कृति और कला के कारण भी दुनिया भर में फेमस है। you can watch this blog on YouTube कहा जाता है कि इस शहर को वेल्स के राजकुमार के स्वागत की खुशी में गुलाबी रंग से रंगा गया था और तभी से इसे गुलाबी शहर (पिंक सिटी ) के नाम से जाना जाता है। जयपुर शहर का नाम आते ही यहाँ के बड़े-बड़े और भव्य किले दिलोदिमाग में तैरने लगते हैं। और इन्हीं किलों में निसंदेह सबसे पहले जिस किले की छवि उभरती है वो है खूबसूरत आमेर का किला। राजस्थान के जयपुर शहर को और ज्यादा खूबसूरत बना देने वाला ये आमेर का किला, अम्बर किला के नाम से भी जाना जाता है। ये किला ना केवल जयपुर शहर बल्कि पूरे राजस्थान के शानदार पर्यटन स्थलों में से एक है। आमेर का किला इतना प्रसिद्ध है कि यहाँ पर हर रोज छह हजार से भी अधिक लोग घूमने के लिए आते हैं। यह किला राज्य की राजधानी जयपुर से 11 किलोमीटर की दूरी पर है। आमेर जाने का सबसे अच्छा समय अगर आप इस किले की खूबसूरती का आनंद लेना चाहते हैं, तो सर्दियों के समय में नवंबर से मार्च महीने के बीच यहां जाना सबसे अच्छा माना जाता है। इसका कारण ये है कि रेतीले राजस्थान में दिन के समय मौसम गर्म ही रहता है। ऐसे में धूप और सूरज की गर्मी कभी-कभी आपको बहुत ज्यादा परेशान कर सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि आप सर्दियों में ही जयपुर जैसे शहर की यात्रा करने की प्लानिंग करें। आमेर कैसे पहुंचे इस किले तक पहुंचने के लिए जयपुर से बस, ऑटो-रिक्शा, टैक्सी या कैब ली जा सकती है। आप अजमेरी गेट और एमआई रोड से आमेर शहर के लिए रोडवेज या प्राइवेट बसों से भी जा सकते हैं। आमेर का किला एक पहाड़ी पर है, इसलिए किले का दीदार करने के लिए आपको किले के थोड़ी दूर पहले से ही या तो पैदल चलना होगा या फिर आप टैक्सी या जीप से भी किले के मुख्य द्वार तक पहुँच सकते हैं। या फिर आप अपनी पर्सनल गाड़ी से भी यहां जा सकते हैं। किले के मुख्य द्वार के पास थोड़ी सपाट चढ़ाई है, इसलिए अगर आप एक्सपर्ट ड्राइवर हैं तो ही अपनी पर्सनल गाड़ी से किले तक जाने का रिस्क लें। अगर आप सीजन के दौरान यहां जा रहे हैं, तो खुद की गाड़ी से जाने से बचना ही बेहतर होगा, क्योंकि ट्रैफिक जाम आपके लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। हालांकि ऐसा सीजनल टाइम में ही ज्यादा होता है। अंदर प्रवेश करके आप हाथी की सवारी का भी अपना आनंद और रोमांच ले सकते हैं। हाथी सवारी आपके लिए तब और ज्यादा फायदेमंद साबित हो जाती है, जब आप परिवार के साथ किला घूमने गए हो, हालांकि अगर आप हाथी की सवारी करते हुए किले की सैर करना चाहते है, तो एक हाथी की सवारी के लिए आपको लगभग 1000-1,200 रुपये का तक देना पड़ सकता है। याद रहे कि एक हाथी पर दो से ज्यादा पर्यटक सवार नहीं हो सकते। हाथियों की ये सवारी सुबह से ही शुरू हो जाती है। टिकट और लागत आमेर के किले के लिए विदेशी सैलानियों से 250 रुपये और भारतीयों सैलानियों से टिकट के 50 रुपये लिए जाते हैं। अगर आप स्टूडेंट हैं, तो जयपुर शहर की यात्रा करते समय अपना स्कूल या कॉलेज आईडी कार्ड ले जाना कभी मत भूलिए, किले की सैर के लिए मिलने वाली टिकटों पर स्टूडेंट्स को भारी छूट दी जाती है, इसके अलावा सात साल से कम उम्र के बच्चे के लिए यहां ज्यादातर जगहों पर टिकट निःशुल्क हैं। आमेर के किले में टिकट काउंटर सूरज पोल के सामने जलेब चौक प्रांगण में मौजूद है। आप वहां एक ऑफिसियल टूरिस्ट गाइड भी ले सकते हैं। इसके अलावा लंबी लम्बी लाइनों से बचने के लिए आप टिकट ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं। आमेर का इतिहास आमेर के किले की इतिहास की बात करें, तो यह कभी जयपुर रियासत की राजधानी हुआ करती थी। यह किला राजपूत शासकों का निवास स्थान हुआ करता था। मुगल सम्राट अकबर की सेना का नेतृत्व करने वाले महाराजा मान सिंह प्रथम ने 1592 में 11वीं सदी के किले के अवशेषों पर इसका निर्माण शुरू करवाया था। राजस्थान में छह पहाड़ी किलों के समूह के हिस्से के रूप में किले को 2013 में यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी घोषित किया गया। इस किले की वास्तुकला राजपूत (हिंदू) और मुगल (इस्लामी) शैलियों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। माना जाता है कि 967 ई. में मीणाओं के एक उप कुल में आमेर शहर और आमेर का किला राजा एलन सिंह चंदा द्वारा बसाया और बनाया गया था. चूंकि मीना अंबा माता की भक्त थीं, इसलिए उन्होंने अपने किले का नाम उनके नाम पर आमेर का किला रखा. पहाड़ी पर ऊंचे स्थान पर स्थित इस किले से माओटा झील दिखाई देती है, यह झील ही आमेर पैलेस के लिए पानी का मुख्य स्रोत है। आपको बता दें आमेर और जयगढ़ किले को एक ही संरचना के रूप में माना जाता है, क्योंकि ये दोनों किले लगभग एक ही परिसर में हैं और खास बात ये कि एक ही भूमिगत मार्ग दोनों किलों को आपस में जोड़ता है। ऐसा माना जाता है कि किसी युद्ध के समय या जब कभी दुश्मन हमला कर दें तो उन हमलों से बचने के लिए इस मार्ग का उपयोग किया जाता था। किले का निर्माण सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मान सिंह प्रथम ने करवाया था। बाद में, अन्य राजपूत शासकों द्वारा इसका आगे विस्तार किया गया। अपनी अद्भुत वास्तुकला के साथ, जो मुगल और हिंदू शैलियों को जोड़ती है, लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना किला, अपने उच्च प्राचीर, कई द्वारों, पत्थरों वाले रास्तों और शानदार दृश्यों के कारण खासा प्रसिद्ध है। वैसे आमेर का यह किला चार भागों में बँटा है जिसका प्रत्येक

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अजमेर शरीफ़ दरगाह

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अजमेर शरीफ़ दरगाह – जहाँ हर किसी की मुराद होती है पूरी  By Pardeep Kumar राजस्थान यात्रा के अपने अगले पड़ाव में, हम आपको ले कर आये हैं एक बेहद धार्मिक स्थान अजमेर शरीफ दरगाह। अजमेर शहर के सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थानों में से एक, अजमेर शरीफ दरगाह एक सूफी दरगाह है। जिसे राजस्थान के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। अजमेर शरीफ, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का भव्य एवं बेहद खूबसूरत मकबरा है। इसे ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह के नाम से भी जाना जाता है। आपको बता दें कि ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती एक प्रसिद्ध सूफी संत होने के साथ-साथ इस्लामिक विद्धान और दार्शनिक भी थे। ऐसा माना जाता है कि अजमेर दरगाह पर अगर आप सच्चे मन से किसी भी चीज के लिए प्रार्थना करते हैं, इबादत करते हैं तो आपकी प्रार्थना अवश्य ही पूरी होती है। अजमेर शरीफ़ कैसे पहुंचे राजस्थान का अजमेर शहर देश के लगभग सभी प्रसिद्ध शहरों से रेल, सड़क या हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है। अगर आप दिल्ली से अपने पर्सनल व्हीकल से आ रहे हैं तो आरामदायक नेशनल हाईवे का प्रयोग करते हुए यहाँ बेहद आसानी से पहुँच सकते हैं। रास्ते में आपको बहुत सारे पांच सितारा टाइप के ढाबे जलपान के लिए मिल जायेंगे। जयपुर हवाई अड्डा अजमेर शहर के सबसे नजदीक है। हवाई अड्डे से, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या अजमेर शरीफ दरगाह तक पहुंचने के लिए बस से भी जा सकते हैं। watch Ajmer sharif Vlog with english subtitles अगर आप यहाँ ट्रैन से आना चाहते हैं तो अजमेर के लिए लगभग सभी बड़े शहरों से आपको नियमित ट्रेनें मिल जाएँगी,  स्टेशन से आप कैब बुक कर सकते हैं या अजमेर शरीफ दरगाह तक पहुंचने के लिए स्थानीय बस ले सकते हैं। हालांकि कैब किराए पर लेना एक विकल्प है, लेकिन दिल्ली, जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर से अजमेर के लिए सीधी बसें चलती हैं। अजमेर दरगाह तक पहुँचने के लिए आप बस स्टॉप से टैक्सी या अन्य स्थानीय साधन ले सकते हैं। यहां साल के किसी भी महीने में आ सकते हैं दिल्ली से लगभग 400 किलोमीटर और अजमेर बस अड्डे से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह दरगाह भक्तों के आकर्षण का महत्वपूर्ण केंद्र है। देश विदेश से लोग यहां अपनी मनोकामना पूरी करने आते हैं दिन-रात यहां भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। अगर आपके मन में श्रद्धा भाव है तो आप यहां साल के किसी भी महीने में आ सकते हैं। सर्दियों के दौरान यहां गेट सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक खुले रहते हैं और गर्मियों के दौरान के सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक। आप किसी भी समय यहां पर आ सकते हैं। पार्किंग आपको बता दें कि अजमेर शरीफ दरगाह से लगभग एक किलोमीटर पहले ही आपको अपना वाहन किसी उचित पार्किंग स्थल पर छोड़कर दरगाह तक पैदल ही जाना होगा, तंग गलियों में वाहन ले जाने की कोई सुविधा नहीं है। कार पार्किंग को लेकर आप थोड़ा ध्यान रखें, क्योंकि दरगाह से एक डेढ़ किलोमीटर पहले ही आपको बहुत से पार्किंग स्लॉट मिलेंगे, जो तकरीबन सौ रुपए में आपकी कार अपने प्लॉट या दुकान के सामने पार्क करवा देंगे। ध्यान रहें कार में कोई भी कीमती सामान न छोड़ें। क्योंकि अधिकतर पार्किंग वाले किसी भी तरह की स्लिप नहीं देंगे। हाँ, आप यहाँ पैदल चलने के अलावा रिक्शा से भी जा सकते हैं, यहां की सैंकड़ों साल पुरानी छोटी-छोटी गलियों से निकलकर आपको सामने की ओर दरगाह का गेट दिखाई देगा। दरगाह जाने के रास्‍ते वैसे दरगाह जाने के लिए चारों और दरवाजे हैं लेकिन रूटीन में दो ही दरवाजे खुले रहते हैं बाकी दरवाजे विशेष मौकों और त्यौहारों पर ही खुलते हैं। दो दरवाजे – एक गेट नंबर 4 और दूसरा गेट नंबर 2, गेट नंबर 2 से दरगाह में एंट्री थोड़ी आसान है क्‍योंकि गेट नंबर 2 तक लोकल रिक्शा वगैरह जाते हैं और इसलिए यहां पर भीड़ नहीं लगती। वहीं अगर आप गेट नंबर 4 पर आपको भीड़ भी मिलेगी और काफी चलना भी होगा। वैसे आमतौर पर यहाँ भीड़ फेस्टिवल सीजन के दौरान ज्यादा होती है। गेट नंबर 4 पर दरगाह का मुख्‍य प्रवेश द्वार है। आप अपनी पार्किंग की सुविधा के हिसाब से किसी भी गेट से एंट्री कर सकते हैं। इन संकरी गलियों से गुजरते हुए आपको गुलाब के फूलों, मनमोहक इत्र,  अजमेर शरीफ की स्पेशल मिठाई और अगरबत्ती की दुकान दिखाई देंगी। आप यहां से दरगाह के लिए चादर, फूल या अपने अनुसार कोई भी चढ़ाने की वस्तु ले सकते हैं। याद रहे कि प्रवेश करते वक्त आप अपने जूते-चप्पल दरगाह के गेट के बाहर ही उतार कर जाए। अजमेर शरीफ दरगाह में कैमरा इत्यादि चीजें ले जाने की इजाजत नहीं है इसलिए आप अपना कीमती सामान किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़कर जाएं। गेट में प्रवेश करते ही आपकी यात्रा शुरू हो जाती है। जैसे ही आप दरगाह में प्रवेश करेंगे मुगल सम्राट हुमायूं द्वारा निर्मित  सुंदर नक्काशी वाले विशाल दरवाजों की एक श्रृंखला आपको दिखाई देगी। ये सभी दरवाजे शुद्ध चांदी से बने हैं, और इन पर बेहतरीन नक्काशी देखने लायक है। एक विशाल गेट से होते हुए आप एक बड़े से प्रांगण में पहुंचेंगे। जहाँ आपको ख़वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के मकबरे की एक झलक दिखाई देगी, जो संगमरमर से बना है। दरगाह के शीर्ष पर, सोने की परत चढ़ी हुई है, जो शुद्ध चांदी और संगमरमर से बनी रेलिंग से सुरक्षित है। दरगाह के प्रांगण के अंदर पहुँचते ही आपको असीम सुकून का अहसास होता है जो आपको और कहीं मिलना दुर्लभ है। यहीं प्रांगण के बीच में स्थित अजमेर शरीफ दरगाह के चारों ओर बहुत सारे लोग इबादत करते दिखाई देंगे। यहाँ सिर्फ इस्लाम धर्म को मानने वाले ही नहीं बल्कि  सभी धर्मों के लोग दूर-दूर से अपनी-अपनी मुरादें लेकर आते हैं। इतना ही नहीं मुराद पूरी होने पर ख्वाजा का शुक्राना अदा करने भी आते हैं। यहाँ चादर और फूलों की टोकरी चढ़ाते हैं। आम लोगों के अलावा अक्सर बॉलीवुड स्टार भी अपनी फिल्मों की सफलता के लिए यहाँ दुआ मांगने आते हैं। यहाँ आपको बहुत सारे श्रद्धालु धागा बांध कर मन्नत मांगते हुए

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Jantar Mantar-Jaipur

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Jantar Mantar-Jaipur- प्राचीन भारत की विश्व प्रसिद्ध खगोल विद्या का जीता जागता उदाहरण by Pardeep Kumar राजस्थान की राजधानी जयपुर में सवाई जय सिंह द्वारा बनवाया गया जंतर-मंतर यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज सूची में शामिल है। यहाँ पर मौजूद उपकरण और यंत्र बेहद पुराने होने के बावजूद भी आधुनिकता का प्रमाण देते हैं। इन बेहद पुराने उपकरणों से समय को मापा जाता है।  आपकी जानकारी के लिए बता दें सिटी पैलेस, गोवर्धन मंदिर, हवा महल और भी कई सुन्दर और फेमस जगह जयपुर के जंतर-मंतर के आस-पास  ही कुछ क़दमों की दूरी पर स्थित है। गुलाबी शहर का लुत्फ़ उठाते हुए आप इन जगह का दीदार करके अपने सफर को हमेशा के लिए यादगार बना सकते है। जयपुर यात्रा के तमाम ब्लोग्स आप फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के ब्लॉग से पढ़ सकते हैं और अपनी यात्रा को बेहद आसान बना सकते हैं। आपने कभी सूर्य तो कभी चंद्र ग्रहण के बारे में अवश्य सुना होगा, इन यंत्रो से भविष्य में आने वाले ऐसे ग्रहण के विषय में पता लगाया जाता है। वैसे भी जयपुर स्थित जंतर-मंतर  भारत के सबसे बेहतरीन वेधशालाओं में से एक है। सवाई जयसिंह ने देश के अलग अलग स्थानों पर जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं का निर्माण करवाया। जयपुर के अलावा  उज्जैन, मथुरा, दिल्ली और वाराणसी में भी ऐसी ही वेधशाला का निर्माण करवाया था। इस कड़ी में पहली वेधशाला 1725 में दिल्ली में बनी। इसके 10 वर्ष बाद1734 में जयपुर में जंतर मंतर का निर्माण हुआ। इसके लगभग पंद्रह वर्ष बाद 1748 में मथुरा, उज्जैन और बनारस में भी ऐसी ही वेधशालाएं खड़ी की गईं। कहते हैं महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने जयपुर की वेधशाला का निर्माण करवाने से पहले विभिन्न देशों में अपने शांति दूत भेजे और वहां से खगोल शास्त्र पर उम्दा दर्जे की पांडुलिपियां मंगवाई, जिनसे उन्होंने खगोल विज्ञान को समझा। जंतर मंतर की टिकट जंतर-मंतर जयपुर में भारतीय एडल्ट्स  के लिए टिकट की कीमत 50 रुपए है और भारतीय स्टूडेंट के लिए 15 रुपए है। वही दूसरी तरफ विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट की कीमत ₹200 और फॉरेन स्टूडेंट के लिए 100 निर्धारित की गई है। जंतर-मंतर जयपुर के खुलने का समय जंतर-मंतर जयपुर के खुलने का समय सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक है। यह हफ्ते के सातों दिन खुला रहता है, और आप पूरे जंतर-मंतर को अच्छे से घंटे भर में देख सकते हैं। कौन सा समय जंतर-मंतर जाने के लिए उपयुक्त रहेगा किसी भी टूरिस्ट के लिए जंतर मंतर जाने का सबसे उपयुक्त समय दोपहर का है क्योंकि इस दौरान आप यहाँ मौजूद उपकरणों की कार्य प्रणाली को बेहतर समझ पाएंगे। सबसे बढ़िया है कि आप एक एक्सपर्ट गाइड की हेल्प लें। जंतर मंतर में स्थित यहाँ के उपकरण आपको एक पल के लिए बांध देने की क्षमता रखते हैं और जैसे ही आप इनकी बनावट देखोगे, इनकी खूबियां देखते ही रह जाओगे। यहाँ पर बहुत सारे उपकरण हैं जो आपको अलग-अलग ज्यामितीय आकारों के दिखाई देंगे। यही वो उम्दा उपकरण हैं जो जयपुर के जंतर मंतर को दुनिया के बेहतरीन वेधशालाओं में से एक बनाते हैं। सबसे पहले लेते हैं सम्राट यंत्र को इसके विशाल आकार के कारण ही इसे सम्राट यंत्र नाम दिया गया। 90 फीट की ऊंचाई वाला यह यंत्र जंतर मंतर का सबसे बड़ा यंत्र है। इस यंत्र के ऊपरी हिस्से में एक छतरी बनी हुई दिखाई देती है। यह उपकरण ग्रह-नक्षत्रों में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल व समय का पता लगाने के बनाया गया है। दिशा यंत्र जंतर मंतर के ठीक बीचो-बीच आपको दिखाई देगा वर्ग के आकार की समतल भूमि पर लाल पत्थर से बना दिशा यंत्र, जिसके केंद्र से चारों दिशाओं की ओर समकोण बनाए गए हैं। जैसा कि नाम से जाहिर हो रहा है इस यंत्र द्वारा दिशाओं का पता लगाया जाता है। दिखने में भले ही यह साधारण सा ही लगे लेकिन इस यंत्र का भी अपना विशेष महत्त्व है। जयप्रकाश यन्त्र आपको जानकार हैरानी होगी कि खगोल विद्या में माहिर महाराजा जयसिंह ने ही जय प्रकाश यंत्रों का आविष्कार किया। अपनी बनावट में बेजोड़ यह यंत्र कटोरे के आकार के दिखाई देते हैं। जंतर मंतर में ये यंत्र सम्राट यंत्र और दिशा यंत्र के बिलकुल बीचो बीच बनाये गए हैं। इन यंत्रों से सूर्य की किसी राशि में अवस्थिति का पता चलता है। ये दोनो यंत्र एक दुसरे के पूरक हैं। क्रांति वृत क्रांति यंत्र का प्रयोग सौर मंडल में दिन के वक्त सूरज के चिन्हों को देखने के लिए किया जाता है। इस बेहद उम्दा प्रकार के और दिखने में भी खूबसूरत से यंत्र को देखे बिना आपकी जंतर मंतर की यात्रा अधूरी ही समझिये। ध्रुव दर्शक यंत्र ध्रुवदर्शक यंत्र से ध्रुव तारे की स्थिति और दिशा ज्ञान के बारे में पता चलता है । उत्तर दक्षिण दिशा की ओर दीवारनुमा यह पट्टिका दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमश: उठी हुई है।अगर आप इसके दक्षिणी सिरे पर आँख टिका कर देखेंगे तो उत्तरी सिरे पर ध्रुव तारे की स्थिति बिलकुल स्पष्ट होगी। रामयंत्र राम यंत्र में स्तंभों के वृत्त के बीच केंद्र तक डिग्रियों के फलक दर्शाए गए हैं। इन फलकों से भी महत्वपूर्ण और जरुरी खगोलीय गणनाएं की जाती थीं। जंतर मंतर की पश्चिमी दीवार के पास स्थित राम यंत्र में आपको दो यंत्र दिखाई देंगे। इन यंत्रों के दो लघु रूप भी जंतर मंतर में इन्हीं यंत्रों के पास स्थित हैं। इसके अलावा आपको जयपुर के जंतर मंतर में अलग-अलग ज्यामितीय आकारों के  षष्ठांश यंत्र, नाड़ीवलय यंत्र, राशि वलय यंत्र और  चक्र यंत्र जैसे अन्य उम्दा और बेजोड़ यंत्र भी दिखाई देंगे। जंतर मंतर के ये उपकरण बेहद आकर्षक है और ये अपनी खूबी देखते ही बयान करते है। जब भी आप जयपुर के जंतर मंतर जाएँ एक बात का विशेष ख्याल रखें की जंतर मंतर जाने का सबसे उचित समय दोपहर का ही माना जाता है क्योंकि इस दौरान आप यहाँ मौजूद उपकरणों को न केवल बखूबी कार्य करते हुए देख पाऐंगे बल्कि  आप इनके कार्यों को उचित ढंग से समझ भी पाऐंगे। Some Glimpse of Jantar Mantar, Jaipur