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बापू बाजार -गुलाबी शहर जयपुर

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बापू बाजार -गुलाबी शहर जयपुर की सबसे पसंदीदा मार्किट by Pardeep Kumar गुलाबी शहर जयपुर अपनी रॉयल् लुक और अद्भुत महलों, स्मारकों के लिए जाना जाता है। लेकिन, इसी के साथ यहां मिलने वाले ट्रेडिशनल आइटम्स इसे एक बेहतरीन शॉपिंग डेस्टिनेशन बना देते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि जयपुर में कई ऐसी बड़ी-बड़ी मार्केट हैं जहां आपको बहुत सारी अलग-अलग वेरायटीज की चीजें बहुत ही उचित दामों पर मिल जायेंगी। अपनी जयपुर यात्रा के अगले पड़ाव के इस ब्लॉग में आज हम आपको बताएंगे ऐसे ही एक बेहद खास बाजार के बारे में – जयपुर शहर के केंद्र में, सांगानेर गेट और गुलाबी शहर के नए गेट के बीच, बापू बाजार जूते से लेकर हैंडीक्राफ्ट्स तक, आर्टिफीसियल जूलरी से लेकर पीतल के काम और कीमती पत्थरों तक की खरीदारी के लिए एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है, जहां आपको अपनी मनपसंद का हर एक सामान आसानी से मिल जाएगा। राजस्थान जिस चीज के लिए प्रसिद्ध है वह है इसकी जीवंतता और भव्यता। और अगर आप इसकी राजधानी जयपुर में घूमने के लिए आते हो तो आप बापू बाजार में शॉपिंग करके अपनी ट्रिप को यादगार बना सकते हो। बापू बाजार यहां मिलने वाली फेमस राजस्थानी आइटम्स जैसे कलाकृतियों, हैंडीक्राफ्ट, परम्परागत कपड़े और आर्टिफिशियल जूलरी के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। बापू बाजार स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी अपने अट्रैक्शन के लिए खासी पहचान रखता है, जो इसे जयपुर सिटी के सबसे पसंदीदा मार्केट में से एक बनाता है। बापू बाजार चाहे कोई मिडल क्लास हो या रिच क्लास,  शॉपिंग के मामले में सबके लिए एकदम फिट बैठता है। कहा जाता है कि अगर आपको अच्छी तरह से बारगेनिंग करनी आती है तो आपको यहां हर चीज सही दामों में उपलब्ध हो जाएगी। यह पूरा बाजार भरा पड़ा है यहां मिलने वाले राजस्थान के कल्चरल आइटम से और यह उन लोगों के लिए एक परफेक्ट डेस्टिनेशन है जो कि पारंपरिक चीजें पहनना और रखना पसंद करते हैं। इस बाजार में कुछ चीजें हैं जो इसे एक खास बाजार बनाती है – मोजरी फुटवियर– पारंपरिक राजस्थानी फुटवियर को मोजरी कहा जाता है। मोजरी ज्यादातर चमड़े से बने होते हैं,  फुटवियर को विभिन्न पैटर्न और जीवंत रंगों के साथ खूबसूरती से डिजाइन और कढ़ाई की जाती है। बापू बाजार में मोजरी के जूते प्रामाणिक होने के साथ-साथ सस्ते भी हैं। आर्टफिशियल ज्यूलरी-  बापू बाजार में आपको आर्टिफिशियल जूलरी की जबर्दस्त वैरायटी मिल जायेंगी जिसमें गले के हार, झुमके, पायल, लाख (लाख के बर्तन) से बनी चूड़ियाँ और साथ ही रंगीन रेशम के धागों से बनी चूड़ियाँ शामिल हैं। यहाँ आपको इन सभी में हज़ारों डिज़ाइन मिल जायेंगे। राजस्थानी क्लोथ्स- अगर आपको राजस्थान में पारंपरिक बंधेज या टाई और डाई साड़ी या सूट  खरीदना है तो आपको यहां पर लहरिया, सांगानेरी प्रिंट से लेकर बाटिक प्रिंट तक बंधेज के पैटर्न और अलग-अलग डिजाइंस मिल जाएंगे। यहां के दुपट्टों और साड़ियों पर जीवंत और जटिल कढ़ाई के अलावा, उन पर सुंदर दर्पण का काम और गोटा-पट्टी का काम भी किया जाता है। जयपुरी रजाई–  जयपुरी रजाई अपने सॉफ्टनेस के लिए जानी जाती है। एक विशेष प्रकार के महीन सूती कपड़े से बनी जयपुरी रज़ाई हल्की होने के साथ-साथ गर्म और टिकाऊ होती है। रजाई को हाथ से बुनने के सदियों पुराने शिल्प के बाद, रजाई के कवर पर डिजाइन ब्लॉक प्रिंट किये जाते हैं। वे अपनी गर्माहट के साथ-साथ कपास की कोमलता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। हस्तशिल्प, शोपीस और सजावटी प्रोडक्ट्स – जयपुर के बापू बाजार में छोटी स्मारिका की दुकानों की कोई कमी नहीं है, यहाँ पर सड़क की दुकानें कलाकृतियों, पेन स्टैंड, कीचेन, मिरर वर्क वाली एक्सेसरीज से भरी पड़ी हैं। कठपुतली- कठपुतली शो और राजस्थानी परंपरा साथ-साथ चलती है। आमतौर पर, कठपुतली जीवंत रंग की प्रतीक होती हैं। आपको बापू बाजार में हर तरह की कठपुतलियाँ देखने को मिल जाएँगी। बापू बाजार में फ़ूड – जयपुर के बापू बाजार की गलियों से गुजरते समय दुकानों से आती हुई चाट की खुशबू से आप खुद को रोक नहीं पाएंगे। इसके अलावा फालूदा कुल्फी एक अन्य पसंदीदा स्थानीय व्यंजन है, जो दूध के साथ गुलाब की चाशनी के साथ मिलता है। इसके अलावा  सेंवई, मीठी तुलसी के बीजों का पारंपरिक मिश्रण भी यहां बेहद फेमस है। इसे अपनी पसंद की आइसक्रीम के स्कूप के साथ परोसा जाता है। बाजार का समय – बापू बाजार सप्ताह के सभी दिनों में सुबह 11  बजे से रात 10 बजे के बीच खुला रहता है। कौन-सा मौसम यहाँ आने के लिए सबसे बेहतर वैसे तो आप साल में किसी समय बापू बाजार आ सकते हैं, लेकिन नवंबर से मार्च के बीच सर्दियों के समय, दिन के ठंडे तापमान के कारण यहाँ शॉपिंग करना बेहतर माना जाता हैं। गर्मियां वास्तव में गर्म होती हैं और दिन में घूमना और खरीदारी करना मुश्किल हो जाता है। आप यहां सर्दियों में दिन में और गर्मियों के समय शाम में शॉपिंग कर सकते हैं। कैसे जाएँ बापू बाजार जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन से 4 किलोमीटर दूर है। आप कोई भी ऑटो रिक्शा किराए पर ले सकते है या कैब बुक करके भी यहां आसानी से पहुंच सकते हैं। इसके अलावा आप यहां पर किसी लोकल बस से भी आ सकते हैं।

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Masala Chowk – The Best Open Air Food Court In Jaipur

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मसाला चौक,जयपुर – फूड लवर्स के लिए खूबसूरत जगह By Pardeep Kumar खाने-पीने के मामले में देखा जाए तो पिंक सिटी जयपुर वास्तव में एक ऐसा शहर है जो कि बहुत फेमस है यहां के बेहद लजीज व्यंजनों के कारण, क्योंकि यहां के प्रसिद्ध व्यंजन, तरह-तरह की स्टाइल और तरह-तरह की चीजों से बने हुए होते हैं। इस रॉयल सिटी के लोग खाने के बहुत ही शौकीन माने जाते हैं और यह शहर फूड लवर्स के लिए खास मायने रखता है। अगर बात खाने से संबंधित हो तो जयपुर की खूबसूरत जगहों में से एक जगह है मसाला चौक जो कि खाने को लेकर अपनी वैरायटी के लिए और अपनी क्वालिटी के लिए बहुत ही मशहूर है। You can watch Masala Chowk Video @ our You Tube Vlog जयपुर की इस पसंदीदा फूड डेस्टिनेशन से तो आप परिचित ही होंगे और अगर नहीं है तो आइए आज 5 कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में आपको ले चलते हैं एक बेहतरीन फूड डेस्टिनेशन मसाला चौक की सैर पर, जहां की व्यंजनों की वैराइटीज को देखकर आप खुद को खाने से रोक नहीं पाएंगे। दरअसल किसी भी शहर में बहुत सारी पसंदीदा चीजों का एक साथ एक जगह पर मिलना बहुत ही मुश्किल हो जाता हैं। लेकिन जयपुर का मसाला चौक एक ऐसी जगह है जहां आपको सभी लोकप्रिय व्यंजन और स्ट्रीट फूड एक ही जगह पर आसानी से उपलब्ध हो जाएंगे। 2018 में अपने बनने के बाद सेआज तक, मसाला चौक ने हर खाने के शौकीन फिर चाहे वह जयपुर शहर का हो या फिर बाहर का कोई टूरिस्ट हर किसी के दिल पर शिद्दत से राज किया है। जयपुर के मसाला चौक की शुरुआत जयपुर के सभी प्रसिद्ध स्ट्रीट फूड को सिर्फ एक जगह पर लाने के उद्देश्य से हुई। यह एक ओपन-एयर फूड कोर्ट है जिसमें बैठने की अच्छी व्यवस्था है, जिसने इसे उन सभी लोगों के लिए एक टॉप हैंगआउट डेस्टिनेशन बना दिया है जो स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेना पसंद करते हैं। मसाला चौक तक कैसे पहुंचे मसाला चौक का पता लगाना बहुत आसान है। यह बहुत प्रसिद्ध स्मारक, अल्बर्ट हॉल म्यूजियम के ठीक पीछे राम निवास बाग में स्थित है। आप गूगल मैप्स की मदद से अल्बर्ट हॉल म्यूजियम तक पहुंच सकते हैं। अल्बर्ट हॉल के टिकट काउंटर से थोड़ा आगे साउथ की ओर बढ़ेंगे तो मसाला चौक आपके बायीं तरफ दिखाई देगा। यहां तक पहुंचने के लिए आप जयपुर बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से ऑटो या टैक्सी ले सकते हैं और यदि आपको चलना पसंद है तो आप पैदल यात्रा भी कर सकते हैं।Masala Chowk in Jaipur कार पार्किंग की व्यवस्था यहाँ आकर आप अपनी कार अल्बर्ट म्यूजियम की पार्किंग में पार्क कर सकते हैं।  मसाला चौक के बाहर भी रोड पर पार्किंग की लेन बनाई गई है।  बस ध्यान रहें जहाँ तक पार्किंग मार्क की गई है आप अपनी कार वहीँ तक पार्क करें अन्यथा नगर निगम की गाड़ी आपकी कार को उठा ले जाएगी और बेवजह आपको उसके लिए फिर एक नियत जुर्माना अदा करना पड़ेगा। अच्छे खासे रंग में भंग पड़ने की फिर पूरी संभावना भी रहेगी। मसाला चौक का समय जयपुर के इस मशहूर हैंगआउट का समय सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक है। भीड़ से बचने के लिए मसाला चौक जाने का सबसे अच्छा समय दिन के समय या शाम को होता है। प्रवेश शुल्क मसाला चौक के लिए प्रति व्यक्ति प्रवेश शुल्क के रूप में 10 रुपये लिए जाते हैं। मसाला चौक मेन्यू यहां कुल 21 स्टॉल है,  जो शहर के चारों ओर सबसे अच्छा स्ट्रीट फूड परोसते हैं। इन स्टॉल्स में से प्रमुख हैं -सम्राट, रामकृष्ण कलकट्टी चाटो, सोमिललाल रावत मिष्ठान भंडारी, गोपाल सिंह पटसी भंडारी, शंकर समोसा, सेठानी का ढाबा, भारतीय आइसक्रीम फालूदा, रमन डोसावाला, श्री झारखंड नाथ पोहा और चाटो, गुलाबजी चायवाला, दिल्ली चाट और कैफे, प्रेम प्रकाश समोसा, बहुत खूब!, भगत मिष्ठान भंडारी, ब्रिजवासी फालूदा केसर कुल्फी, पवना राजस्थानी व्यंजनी, जयपुरी चटकारा, घर पर आग, अंडेवालाज़ी, महावीर रबड़ी भंडारी, आइसक्रीम और शेक। Masala Chowk in Jaipur यहां के आउटलेट्स में चाट, आइसक्रीम, फालूदा, कुल्फी, समोसा, कचौरी, पोहा, चाय, राजस्थानी व्यंजन, पानी पुरी, मिठाई, दक्षिण भारतीय भोजन, मांसाहारी व्यंजन, अंडे के व्यंजन और कई तरह के फूड आइटम्स मिलते हैं।

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गोरखपुर के रामगढ़ ताल

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गोरखपुर के रामगढ़ ताल की विशालता किसी समुद्र के किनारे से कम नहीं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित गोरखपुर, बाबा गोरखनाथ के नाम से देश भर में जाना-पहचाना जाता है। अगर गोरखपुर की बात की जाये तो यह जगह अनेक अध्यात्मिक, पुरातात्विक और  प्राकृतिक धरोहरों को अपने में समेटे हुए है।  प्रेमचन्द की कर्मभूमि, फिराक गोरखपुरी की जन्मभूमि, शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व चौरीचौरा आन्दोलन के शहीदों की शहादत स्थली के रुप मे गोरखपुर को पूर्वांचल के गौरव का प्रतीक माना जाता है। यात्राओं के अपने अद्भुत और खास सफर में फाइव कलर आफ ट्रेवल की टीम आज पहुंच चुकी है यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में। आज अपने इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे गोरखपुर के बेहद खूबसूरत रामगढ़ ताल के बारे में। एक समय था जब रामगढ़ ताल को कोई पूछता नहीं था, क्योंकि वहां पर ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं थी जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिल सके। मगर पिछले कुछ सालों में रामगढ़ ताल को पर्यटन की दृष्टि से डेवलप किया गया है, इस तरह संवारा गया है कि आज वह घूमने फिरने के लिए प्रसिद्ध जगह बन चुका है। पहले तो यहां पर केवल गोरखपुर के लोग ही जाया करते थे, मगर आज  इसके सौंदर्यीकरण किये के बाद  यहां दूर-दूर से लोग घूमने के लिए आते हैं। रामगढ़ ताल का इतिहास  इतिहासकार डॉ. राजबली पांडे के मुताबिक ईसा पूर्व छठी शताब्दी में गोरखपुर का नाम पहले कभी  रामग्राम था। यहां पर कोलिय गणराज्य स्थापित हुआ करता था। कोलिया गणराज्य वही गणराज्य है जो हमें गौतम बुध के समय में देखने को मिलता है उस समय की राप्ती नदी आज के रामगढ़ ताल से होकर गुजरती थी। कुछ समय पश्चात राप्ती नदी की दिशा बदलने की वजह से उसके कुछ अवशेष बच गए, जिससे रामगढ़ ताल अस्तित्व में आया। रामग्राम से ही इसका नाम रामगढ़ ताल पड़ा। दूसरी जनश्रुति यह भी है कि प्राचीन समय में इस ताल के स्थान पर एक बहुत बड़ा नगर हुआ करता था। एक राजा का अहंकार ले डूबा। यह नगर एक ऋषि के श्राप की वजह से जमीन में समा गया। जिस वजह से यह पूरा नगर ताल में तबदील हो गया, जिसे आज हम रामगढ़ ताल कहते हैं। यह जनश्रुति गोरखपुरियों से सुनने को बखुबी मिलती है। रामगढ़ ताल राप्ती नदी से महज कुछ मिनटों की दूरी पर स्थित है। जब आप ताल की विशालता देखोगे तो आपको यह नजारा किसी समुद्र के किनारे से कम नहीं लगेगा। रामगढ़ ताल के किनारे की सड़कें बिल्कुल साफ-सुथरी और ताल का किनारा देखने योग्य है। कहा जाता है कि आज तक ताल की गहराई को नापा नहीं जा सका है। शायद यही कारण होगा कि किसी को भी ताल के किनारे नहाते हुए नहीं देखा गया। यह ताल लगभग 18 किलोमीटर तक फैला हुआ है। ताल का किनारा तो बहुत पहले ही आरंभ हो जाता है। मगर ताल के किनारे बने पार्कनुमा जगह जिसे नौका विहार कहते हैं वहां पर जाने के लिए महज 500 मीटर का सफर तय करना होता है। पार्किंग की व्यवस्था  अगर आप बाइक से जा रहे हैं तो आपको स्टैंड पर गाड़ी खड़ी करने के लिए 10 रूपये देने होते हैं। अगर चार पहिया है तो उसके 20 रू लिए जाते हैं। स्टैंड पर गाड़ी खड़ी करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि गाड़ी चोरी होने का रिस्क नहीं रहता है जिस से बेफिक्र होकर हम सफर का आनंद ले सकते हैं। नौका विहार गाड़ी खड़ी करने के बाद जैसे ही नौका विहार की और प्रवेश करते हैं तो बड़ा सा बुध द्वार देखने को मिलता है। पार्कनुमा नौका विहार के अंदर  चहल-पहल इस तरह की थी मानो यहां पर कोई मेला लगा हुआ है। मगर ऐसा कोई भी मेला वहां पर नहीं लगा हुआ था, फिर भी वहां घूमने वालों की संख्या कम नहीं थी। इससे इस बात का अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि ताल की प्रसिद्धि और वहां की व्यवस्था लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। फेमिली और कपल्स के लिए सबसे बेस्ट जगह  आसपास लगे बाजार को देखकर ऐसा लग रहा था मानो ताल नहीं बाजार में घूमने  आये हो। वहां पर बैठने की व्यवस्था किसी पार्क से कम नहीं थी। कपल्स भी यहां पर घूमने के लिए आते हैं और कपल्स के लिए यह सबसे बेस्ट जगह भी है। कपल्स के लिए किसी भी तरह की रोक टोक नहीं है। स्पेशली यहां पर अधिकतर लोग फोटोशूट के लिए भी आते हैं। सेल्फी लेने वालों की संख्या कि कोई गिनती नहीं थी। बाजारों में मिल रहा समान बहुत ज्यादा महंगा नहीं है। आप 20 से 100 रूपये तक बहुत अच्छा समान खरीद सकते हैं। अगर किश्ती में घूमने का आनंद लेना चाहते हैं तो उसका भी मूल्य बहुत ज्यादा नहीं है, आप महज 60 से 100 रू के बीच में 15 या 20 मिनट तक बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। ठिठुरन पैदा करने वाली ठंड और खिलखिलाती धूप दोनों के मेलजोल ने शरीर में एनर्जी का लेवल इस कदर बढ़ाया हुआ था कि लोग वहां पर कई घंटों तक समय बिता रहे थे। घर से सुबह के निकले लोग शाम में वापसी कर रहे थे। लोग ठंड में धूप सेकने का आनंद भी ले रहे थे। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था वैसे-वैसे भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी और भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। हालांकि ताल के किनारे किसी भी तरह की कोरोना  गाइडलाइन को फॉलो नहीं किया जा रहा था, ना ही अधिकतर लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे थे।  बस वहां पर इक्का-दुक्का लोग ही मास्क पहने हुए दिख रहे थे। अभी ताल पर सौन्दर्यकरण का काम चल रहा है। जिससे उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में इसकी सुंदरता में और भी इजाफा होगा। यहाँ आने वाले पर्यटक इस ताल की खूबसूरती की तुलना मुंबई के मरीन ड्राइव और जुहू चौपाटी से करते हैं। यहां से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर आपको सबसे पहले बौद्ध संग्रहालय और चिड़ियाघर देखने को मिल जाएगा। अगर आप गोरखपुर घूमने का प्लान बना रहे हैं या गोरखपुर के पास से गुजर रहे हैं या गोरखपुर के आस-पास रहते

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Fatehpur Sikri

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Fatehpur Sikri – ऐतिहासिक शहर फतेहपुर सीकरी में देखने के लिए बहुत कुछ है खास by Pardeep Kumar भारतीय सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। राजा, नवाबों और यहां के दूसरे शासकों ने यहां एक से एक बेहतरीन महल बनवाए, इमारतें बनवाई और आलीशान किले बनवाए और कुछ राजा ऐसे भी हुए जिन्होंने पूरे शहर बसाये। ये शहर और उनमें स्थित ऐतिहासिक इमारतें कई राजवंशों के उत्थान और पतन के जीते-जागते उदाहरण हैं। और उन्हीं उदाहरणों में से एक है फतेहपुर सीकरी। आज के इस ब्लॉग में हम आपको बता रहें हैं फतेहपुर सीकरी शहर के बारे में। you can watch Fatehpur sikri fort video with all information on Five Colors of Travel Vlog यह शहर आगरा से लगभग 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आगरा तक आप अपने बजट के अनुसार किसी भी मार्ग का चुनाव कर सकते हैं। आगरा शहर बड़े-बड़े शहरों से हवाई मार्ग, रेलवे लाइंस और नेशनल हाईवे से जुड़ा हुआ है। आगरा से फतेहपुर सीकरी का सफर आप किसी स्थानीय बस, टैक्सी या कैब से भी कर सकते हैं। जानिए फतेहपुर सीकरी का इतिहास मुगल सम्राट अकबर ने 1569 में शहर की स्थापना की और 1571 से 1585 तक इसे अपनी राजधानी बनाया। शहर के निर्माण में लगभग 15 साल लगे जहां अदालतों, महलों, मस्जिदों और अन्य संरचनाओं का निर्माण किया गया। पहले इसका नाम फतेहाबाद था जहां फतेह का मतलब जीत होता है। बाद में इसका नाम बदलकर फतेहपुर सीकरी कर दिया गया। यहां उनके दरबारियों से नौ रत्नों का चयन किया गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें फतेहपुर और सीकरी दो अलग-अलग जगह हैं। फतेहपुर में आपको बुलंद दरवाज़ा, शैख़ सलीम चिश्ती की दरगाह और जामा मस्जिद जैसी खूबसूरत जगह देखने को मिलेंगी। वहीं सीकरी अकबर का किला था जिसमें अकबर लगभग पंद्रह वर्षों तक रहा। यही वह जगह है जहाँ अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की बुनियाद रखी। लेकिन पानी की भारी किल्लत के कारण अकबर ने फतेहपुर सीकरी को छोड़कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया। अकबर ने चित्तौड़ और रणथंभौर को जीतकर 1569 में शहर की स्थापना की थी। शहर का निर्माण लगभग 15 वर्षों में पूरा हुआ और इसमें महल, हरम, कोर्ट और अन्य संरचनाएं शामिल थीं। आप देखेंगे कि शहर में इमारतों का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया था। शाही महल के मंडप ज्यामितीय रूप से अरब वास्तुकला से बनाये गए  हैं। पानी की कमी और मुगलों और राजपूतों के बीच लगातार युद्धों के कारण अकबर ने यह शहर छोड़ दिया। फतेहपुर सीकरी तीन तरफ से दीवार और चौथी तरफ से एक झील से घिरा हुआ है। इमारतों की वास्तुकला मुगल और भारतीय खासकर हिंदू और जैन वास्तुकला पर आधारित थी। यहां कई उम्दा और खूबसूरत संरचनाएं जैसे मस्जिद, महल, मकबरे आदि हैं, जिन्हें टूरिस्ट देख सकते हैं। उनमें से कुछ के नाम हैं – बुलंद दरवाजा, जामा मस्जिद, इबादत खाना, जमात खाना, सलीम चिश्ती का मकबरा, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जोधा बाई पैलेस, पंच महल, बीरबल का घर, अनूप तलाओ, हुजरा-ए-अनूप तलाओ, नौबत खाना, पचीसी कोर्ट। जब भी आप यहाँ घूमने आएं, अगर आप कपल्स हैं तब एक बात का अवश्य ख्याल रखिये शहर में एंट्री करते ही यहाँ के कुछ लोग आपको गाइड के रूप में बार्गेनिंग करते मिल जायेंगे, जो आपको अलग-अलग तरीके से चादर या कुछ अन्य चीजें खरीदने के लिए ठगने का प्रयास करेंगे। इन सबसे बचने के एक ही तरीका है आप सिर्फ ऑथोराइजड गाइड से बात करें। जोधा बाई पैलेस आप जैसे ही किले में एंट्री करेंगे बाईं तरफ आपको सबसे पहले जोधा बाई का महल दिखाई देगा। जोधा बाई का यह महल  रानीवास और जेनानी द्योढ़ी के नाम से भी जाना जाता है। महल विशाल है और दो मंजिला है।  महल का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में स्थित है और बहुत ही शानदार है। वैसे तो यह महल अकबर का हरम था जिसमें अकबर अपनी शाही बेगमों के साथ रहता था लेकिन  महल के निर्माण में प्रयुक्त हिंदू रूपांकनों से पता चलता है कि महल एक हिंदू महिला के लिए बनाया गया था। इसलिए शायद इसे जोधा बाई का महल समझा गया। इस शानदार इमारत निर्माण में  नीले  रंग के टाइलों का प्रयोग किया गया था, जो कि मुल्तान से लाये गये थे। फ़तेहपुर सीकरी में जितने भी भवन थे उन भवनों के आकार में यह महल सबसे बड़ा है। अकबर ने जोधाबाई को ही मरियम-उज्जमानी का नाम दिया था। जहांगीर जोधा बाई के बेटा था। जोधा बाई का यह महल गर्मी और सर्दी दोनों मौसमों के अनुकूल बनाया गया था। पंच महल पंच महल का निर्माण अकबर ने करवाया था। महल महिलाओं के हरम के पास था और इसे इस तरह से बनाया गया है कि यह गर्मियों के दौरान आराम प्रदान करता है। पंच महल एक पांच मंजिला महलनुमा संरचना है जिसमें हर मंजिल धीरे-धीरे आकार में घटती जाती  है। नीचे से ऊपर की ओर जाने पर प्रत्येक मंजिल दूसरी से छोटी होती है।  प्रत्येक स्तंभ में एक जाली थी जहां से महिलाएं शहर में होने वाली घटनाओं को आसानी से देख सकती थी। इसमें कुल 176 स्तंभ हैं। बीरबल का महल बीरबल न केवल अकबर के नौ रत्नों में से एक था और बल्कि उसके सब मंत्रियों में सबसे खास भी था। इसलिए बादशाह अकबर ने बीरबल के लिए महल बनवाया। यह महल अकबर की बड़ी रानियों- रुकैया बेगम तथा सलमा बेगम का निवास स्थान के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। यह दो मंजिला महल मुगल और फारसी वास्तुकला के आधार पर बनाया गया था। खास महल देखने में बेहद सुन्दर यह खास महल मुगल बादशाह अकबर का महल था। भूतल में दो कमरे हैं और पहली मंजिल में ख्वाबगाह है। भूतल के एक कमरे का उपयोग भोजन कक्ष के रूप में और दूसरे का उपयोग पुस्तकालय के रूप में किया जाता था। एक झरोखा है जहां से अकबर आम जनता से संपर्क करता था। ख्वाबगाह महिलाओं के हरम से जुड़ा था और जाली से ढका हुआ था। इसी ख्वाबगाह के सामने अनूप तालाब भी बना है। यहाँ की छते अन्य महलों के अपेक्षाकृत नीची हैं। अनूप तलाब अनूप तलाव ख्वाबगाह के सामने बना एक तालाब है। टैंक लाल

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Pinjore Garden

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Pinjore Garden – पिंजौर गार्डन- राजस्थानी और मुगल शैली का एक बेहतरीन उदाहरण by Pardeep Kumar भारत के हरियाणा राज्य में पंचकूला जिले में पिंजौर स्थित है और यहीं पर है राजस्थानी और मुगल शैली का एक बेहतरीन उदाहरण पिंजौर गार्डन। उत्तर भारत के सबसे प्राचीन और सबसे आकर्षक बागों में शामिल यह पिंजौर गार्डन 17वीं शताब्दी में मुग़ल शहंशाह औरंगजेब के शासन काल में वास्तुकार नवाब फिदाई खान द्वारा बनाया गया था। you can watch Pinjore Garden Vlog with all information @ Five colors of Travel You Tube Channel https://www.youtube.com/watch?v=vT7GpPeXiiM नवाब फ़िदई ख़ान उस दौरान मुग़ल सल्तनत में राज्यपाल के रूप में भी काम कर रहे थे। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि एक बार जब वह पिंजौर घाटी का दौरा कर रहे थे, तो वह इस घाटी की सुंदरता से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने यहीं इसी स्थान पर सुन्दर से बगीचे के डिजाइन को लागू करने का फैसला कर लिया। (Pinjore Garden) बताते हैं फिदाई खान इस बाग़ का सुख ज्यादा नहीं भोग सका। और कुछ ही सालों में वापस लौटना पड़ा। तब पिंजौर के बागानों और आसपास की जमीनों को भुगतान के रूप में पटियाला राज्य को दे दिया गया। तब उस समय पटियाला के राजा अमर सिंह शासन कर रहे थे। पिंजौर के अधिग्रहण करने के उपरान्त उन्होंने इस बगीचे पर काम फिर से शुरू कर दिया। बाद में देश आज़ाद होने के उपरांत और हरियाणा राज्य बनने के बाद उनके बेटे, महाराजा यादवेंद्र सिंह ने पिंजौर गार्डन राष्ट्र को दान कर दिया और तभी से पिंजौर गार्डन को आम जनता के लिए खोल दिया गया। पिंजौर गार्डन कैसे पहुंचे पिंजौर गार्डन देश के सबसे खूबसूरत शहरों में से एक चंडीगढ़ से तकरीबन 22 किलोमीटर दूर चंडीगढ़-शिमला नेशनल हाईवे पर पिंजोर कस्बें  में स्थित है।  चंडीगढ़ से आप बहुत ही आसानी से टैक्सी या कैब करके पिंजौर जा सकते हैं। अगर आप रेलवे मार्ग से यहाँ आना चाहें तो कालका रेलवे स्टेशन से यह गार्डन लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पिंजौर गार्डन को किसी समय मुगल गार्डन भी कहा जाता था। वास्तव में यह गार्डन मुगल वास्तुशिल्प कला का अद्भुत नमूना है। मुगल शैली से निर्मित इस गार्डन में हरी मखमली घास और रंग बिरंगे फूल पर्यटको को बरबस ही अपनी और आकर्षित करते हैं। पिंजौर गार्डन भारत में टैरेस गार्डन का एक अनोखा और अद्भुत उदाहरण है। बताते हैं कि पांडवों ने अपने निर्वासन के दौरान कुछ समय के लिए इस जगह आराम किया था। पिंजौर गार्डन में चारबाग पैटर्न है और यह पारंपरिक मुगल शैली में बनाया गया है। आप अगर घूमने के शौक़ीन हैं या इतिहास के जानकार हैं तो जानते ही होंगे की मुगलों की बनाई अधिकतर इमारतें या स्मारक चार बाग़ पैटर्न पर आधारित हैं। आपको बता दें यह गार्डन देश भर में टैरेस गार्डन के रूप में एक बेहतरीन मुकाम क्यों रखता है। इस बगीचे में कुल सात छते हैं जो कुछ दूरी पर नीचे उतरते हुए एक के बाद एक बनी हुई हैं। लगभग 100 एकड़ में फैले इस बगीचे को बेहद खूबसूरती से सात छतों पर बनाया गया है। जैसे ही आप इस गार्डन में एंट्री करते हैं सबसे पहले आपको दिखाई देगी यहाँ की पहली छत। बगीचे का मुख्य द्वार इसी पहली छत पर खुलता है जहाँ से आप बगीचे में कल-कल करते पानी के झरने देख सकते हैं। इस छत को राजस्थानी-मुगल शैली में डिजाइन किया गया है। एंट्री करते ही मुख्य द्वार के ऊपरी हिस्से पर आपको राजस्थानी शैली की सुन्दर और बारीक़ नक्काशी दिखाई देगी। जो यहाँ आने वाले किसी भी टूरिस्ट का मन मोह लेती है। जैसे ही आप कुछ कदम आगे चलेंगे आपको मुगल-राजस्थान शैली की वास्तुकला में निर्मित शीश महल दिखाई देगा। इस महल को इसके वास्तुकार फिदाई खान का दरबार कहा जाता है। इसी छत पर आपको पंक्तिबद्ध ऊँचे-ऊँचे पेड़ दिखाई देते हैं जो यहाँ आने वाले टूरिस्ट्स को गर्मियों में ठंडी छाया प्रदान करते हैं। इसी शीशमहल के सामने दूसरी छत पर रोमांटिक रंग महल हैं जहाँ से आप इस बगीचे की सुंदरता का जी भर के आनंद ले सकते हैं। रंग महल फिदाई खान की बेगमो के मनोरंजन स्थल के रूप में बनाया गया था। यहाँ से आप दूर दूर तक फैली खूबसूरत वादियां और प्रकृति के खुशनुमा नज़ारों का आनंद ले सकते हैं। अगले टैरेस पर सुन्दर जल महल है, जिसमें एक वर्गाकार फव्वारा है। जल महल फिदाई खान की बेगमो  के स्नानगार के रूप में जाना जाता है। यहा आने वाले देशी विदेशी पर्यटक इस खुबसूरत महल की सुदंरता को निहारते रह जाते है। जैसे-जैसे आप इस बगीचे में आगे बढ़ेंगे एक से बढ़कर एक मन मोहते फव्वारे और दुर्लभ किस्म के पेड़ पौधे बाहें फैलाएं आपका सहर्ष स्वागत करते दिखाई देंगे, बाग़ के सबसे निचले हिस्से में या यूँ कह लीजिये की सबसे निचली छत पर एक ओपन-एयर थिएटर है। जहां संभवतः प्राचीन काल में कलाकार अपनी प्रस्तुतियां दिया करते थे। यहाँ पर आपको बहुत सी फैमिलीज़  और कपल्स  क्वालिटी टाइम एन्जॉय करते हुए मिल जायेंगे। वनस्पतियों में विभिन्न प्रकार के सुगंधित फूलों के पौधे, आम के बाग, झाड़ियाँ और अन्य पेड़ हैं। रास्ते में चलने वाले पर्यटकों के लिए के लिए लम्बे वृक्ष छाया प्रदान करते हैं। यह गार्डन इतने नायब ढंग से बनाया गया है कि आप एक बार यहाँ आएंगे तो बस यहीं के होकर रह जायेंगे। शिमला और कसौली जाने वाले सैलानी अक्सर कालका से पहले यहां की हरियाली देखकर ठहर जाते हैं। आमों की खुशबू को समेटे वास्तुशिल्प का यह अनूठा उदाहरण वास्तव में अभी भी मुगलकालीन इतिहास को संजोये हुए है। पिंजौर गार्डन जाने का सबसे अच्छा समय वैसे पिंजौर गार्डन की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय फरवरी से अप्रैल और अक्टूबर  से दिसंबर तक है क्योंकि इस दौरान मौसम सुखद रहता है। लेकिन आप हर साल जुलाई महीने में आयोजित होने वाले  मैंगो फेस्टिवल को भूलकर भी मिस नहीं करना चाहेंगे। इस त्यौहार का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मैंगो प्रदर्शनी है जहाँ पूरे भारत में उगाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के आम मिलते हैं। इस फेस्टिवल के दौरान देश भर से पर्यटक आमों की अलग अलग वैराइटी  देखने उमड़ पड़ते हैं। प्रवेश शुल्क

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Rajaji National Park, Rishikesh

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Rajaji National Park, Rishikesh- नेचर लवर्स का बेस्ट डेस्टिनेशन By Pardeep Kumar राजाजी नेशनल पार्क उत्तराखंड के देहरादून में ऋषिकेश से 6 किमी की दूरी पर स्थित है और यह नेशनल पार्क लगभग  830 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी स्थापना 1983 में  मोतीचूर सैंक्चुअरी, चिल्ला सैंक्चुअरी और राजाजी सैंक्चुअरी मिलाकर की गई है। यह नेशनल पार्क चारों और से पहाड़ों, वादियों और नदी से घिरा हुआ है, जिस कारण यहां की प्राकृतिक सुंदरता टूरिस्ट्स खासकर नेचर लवर्स को अपनी ओर खींच लाती है। (Rajaji National Park Rishikesh) जंगली जानवरों और विभिन्न पक्षियों से प्रेम करने वाले टूरिस्ट देश के कोने-कोने से इस पार्क में घूमने फिरने छुटियां मनाने आते हैं। यदि आप भी राजाजी नेशनल पार्क के बारे में जानना चाहते हैं तो हमारे इस ब्लॉग को पूरा जरूर पढ़े – इस पार्क का नाम प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी और आज़ाद भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती  राजगोपालाचारी के नाम पर रखा गया है। आध्यात्मिक नगरी ऋषिकेश के बिलकुल करीब स्थित भारत के प्रमुख वाइल्ड लाइफ  सैंक्चुअरी में गिना जाना वाला यह पार्क पक्षियों की लगभग 315 प्रजातियों का घर है। एशियाई हाथी, हिरन ,चीता, भालू, कोबरा, जंगली सुअर, साँभर, भारतीय खरगोश, जंगली बिल्ली  जैसे जन्तु इस पार्क में पाये जाते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें चीता, सुस्त भालू, हिरण और भौंकने वाले हिरण भी इस पार्क में आसानी से देखे जा सकते हैं। इस पार्क की सबसे खास बात जो इसे पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनाती है वो ये कि गंगा नदी इस पार्क में लगभग 24 किमी की दूरी तय करती है। जब आप यहाँ जंगल सफारी करते हैं तो यकीनन इसमें से बहने वाली वाली नदी की छोटी छोटी धाराएं आपकी यात्रा को सुख़नुमा अहसास के साथ रोमांचक भी बनाती है। पार्क में साल, पश्चिमी गंगा के नमी वाले जंगल,उत्तरी शुष्क पतझड़ वाले वन और खैर-शीशम के जंगल पाये जाते हैं । यहाँ आने के लिए बेस्ट मौसम और सफारी टाइमिंग  पर्यटकों के लिये पार्क प्रतिवर्ष 15 नवम्बर से 15 जून के बीच खुला रहता है। कुछ स्पेशल सरकमस्टान्सेस में समय में बदलाव संभव है।  पर्यटक अपने 34 किमी लम्बे जंगल सफारी के दौरान पहाड़ियों की सुन्दरता, घाटियों और नदियों के मनोरम दृश्य का आनन्द ले सकते हैं। यहाँ पर आप जंगल सफारी का आनंद दिन में दो बार ले सकते हैं एक सुबह छह बजे से 10 बजे तक और दूसरा शाम को तीन बजे से छह बजे तक। नेशनल पार्क में जीप सफारी के लिए आपको  सभी तरह के टैक्स और एंट्री फी के साथ लगभग 3200 रुपए पे करने पड़ते हैं। बफर जोन सफारी और मैग्गी पॉइंट यहाँ जंगल सफारी के लिए आप चीला रेंज जो की यहाँ का फेमस एरिया है के अलावा बफर जोन सफारी भी कर सकते हैं अगर आप यहाँ के जंगल को अच्छे से एक्स्प्लोर करना चाहते हैं तो बफर जोन एक अच्छा अल्टेरनाते हो सकता है। जहाँ जंगल के बीचोबीच नदी के किनारे मैग्गी पॉइंट पर चाय, पकौड़े और गर्मागर्म  मैग्गी का आनंद लिया जा सकता है  साथ ही यहाँ पर पहाड़ी की छोटी पर विंध्य वासिनी टेम्पल भी है जो  यहाँ आने वाले नेचर लवर्स को अपनी और आकर्षित करता है। ठहरने के लिए उपयुक्त जगह ठहरने के लिए आपको इस नेशनल पार्क में आपके बजट के अनुसार बहुत सारे होटल और  रिसॉर्ट्स मिल जायेंगे। फिर भी सभी मील्स के साथ आप एक रिसोर्ट के लिए कम से कम चार-पांच हज़ार का बजट मान के चलिए। अगर आप नेशनल पार्क में घूमने के लिए या अपना क्वालिटी टाइम बिताने के लिए आना चाह  रहे हैं तो  होटल की बजाय रिसोर्ट में रुकना ज्यादा बेहतर रहता है। बाकि यहाँ सब कुछ आपके बजट पर डिपेंड करता है। राजाजी नेशनल पार्क कैसे पहुंचे राजाजी नेशनल पार्क आने के लिए अगर आप प्लेन से आ रहे हैं तो जॉली ग्रांट देहरादून हवाई अड्डा, यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा है जो यहाँ से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से आपको टैक्सी या कैब आसानी से उपलब्ध हो जायेगी। और अगर आप ट्रैन से आना चाहें तो निकटतम रेलवे स्टेशन  हरिद्वार है जो  भारत के प्रमुख शहरों के साथ रेलवे नेटवर्क द्वारा अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। यहां से आपको आसानी से सभी बड़े शहरों के लिए ट्रेन मिल जायेंगी। अगर आप अपनी कार से या बस से यहाँ आना चाहें तो दिल्ली से मेरठ एक्सप्रेसवे और  हरिद्वार से होते हुए आप आसानी से यहाँ पहुंच सकते हैं। दिल्ली से लगभग 239 किलो मीटर की दूरी पर हरिद्वार स्थित है।

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Chor Bazaar, Delhi

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जानिए एशिया की सबसे सस्ती मार्किट दिल्ली के चोर बाजार की कहानी : जहाँ सुबह चार बजे लोग आने लगते हैं शॉपिंग के लिए दिल्ली में घूमने के लिए कई प्रमुख जगह और प्रसिद्ध बाजार हैं । इनमें से बहुत सी जगह कई हजार साल पुराने भी हैं और उनका ऐतिहासिक महत्व भी है। हमने आपको अपने पिछले व्लॉगस में कई ऐतिहासिक से लेकर आधुनिक जगहों से परिचित करवाया है। मगर आज हम जिस जगह से आपका परिचय करवाने जा रहे हैं वह किसी पहचान की मोहताज नहीं है।जी हाँ, हम बात कर रहे हैं  दिल्ली की फेमस संडे मार्किट, जिसे चोर बाजार भी कहा जाता है। संडे मार्केट यानी कि चोर बाजार में आपको कपड़ों से लेकर जूतों तक, कॉस्मेटिक से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स  तक का सामान आसानी से और कम रुपए में मिल जाएगा। इस बाजार के बारे में कहा जाता है कि  अगर आप मन में जिस चीज का नाम लोगे वो चीज आपको यहाँ मिल जाएगी। बता दें कि अधिकतर लोग इस बाजार को चोर बाजार के नाम से ही जानते हैं। शायद यहाँ मिलने वाली चीजों के काम दाम के कारण।  तो आइए आज के इस सफर में हम आपको ले चलते हैं दिल्ली की संडे मार्केट यानी कि चोर बाजार में…. चोर बाजार के बारे में सुना तो बचपन से बहुत कुछ था। मगर वहां जाने का मौका अब मिला। चोर बाजार को लेकर ऐसी अफवाहें हैं कि वहां पर चोरी का सामान मिलता है। आप जानते ही हैं भारत में लोग कम दाम की चीजों को ज्यादा महत्व देते हैं। इसके पीछे कारण कोई भी हो चाहे वह चीज चोरी की हो या कैसी भी हो, लोग उसे खरीदना जरूर पसंद करते हैं क्योंकि वह कम दाम की होती है। आपको बता दें इसे एशिया की सबसे सस्ती मार्केट भी कहा जाता है। यहां हर तरह के हजारों आइटम मिलते हैं। यदि आपके पास 1000 रुपए है, तो आप यहां बैग, ईयरफोन, सॉक्स, कॉसमेटिक और कई यूटिलिटी आइटम भी खरीद सकते हैं। खास बात ये कि आउटडेटेड प्रोडक्ट्स को तो यहाँ कई गुना कम कीमत में खरीदा जा सकता है। यहाँ जाने का सही वक्त चोर बाजार जाने के लिए आपको सूर्य देवता के उदय होने से पहले ही पहुंचना होता है। वहां जाने के लिए सुबह जल्दी उठना पड़ता है। मगर याद रहे कि यह बाजार केवल रविवार के दिन ही लगता है। अगर आप दिल्ली के रहने वाले हैं  तो आप मार्केट में आसानी से पहुंच सकते हैं। अगर आप कहीं बाहर से आ रहे हैं तो आपको करीब 4-5 बजे के आसपास बाजार में पहुंचना होगा। अभी फिलहाल रात ही थी सूर्य देवता ने अभी दर्शन नहीं दिए थे। आप बस से जैसे ही लाल किला स्टॉप पर उतरते हो, उतरते ही सामने ही आपको बड़ी संख्या में लोग देखने को मिलते हैं। एक बारगी ऐसा लगेगा मानो वहां पर किसी तरह का मेला लगा हुआ है। इतनी भीड़ सुबह तड़के आपको आम तौर पर किसी भी मार्किट में दिखाई नहीं देगी । हां, दिन के समय की बात अलग है । मगर एकदम सुबह किसी बाजार में हजारों की संख्या में लोगों का होना आपको भी हैरान कर सकता है। अभी दिन निकलना बाकी था ऐसे समय में जब दिन भी ना निकला हो और लोगों की संख्या हजारों में हो तो इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि इस मार्केट को लेकर लोगों में कितना उत्साह है। बता दें कि लोग इस मार्केट में रात 3 बजे से ही पहुंचने लग जाते हैं। एक वजह ऐसी भी इतनी बड़ी संख्या में लोग सुबह-सुबह वहां पर इसलिए पहुंचते हैं क्योंकि रात के अंधेरे में बहुत-सा कीमती सामान कम रूपयों में मिल जाता है। सड़क के किनारे ही हजारों की संख्या में लोगों का जमावड़ा देखने को मिलता है। पास जाकर देखा तो वहां पर एक बोरी में जूते लेकर लोग बेच रहे होते हैं और ऐसे ही जूते बेचने वालों की संख्या भी कई गुना थी। तड़के सुबह अँधेरा होने के कारण लोग मोबाइल की टॉर्च जलाकर सामान की परख करते हैं और तोलमोल करके सामान को खरीद रहे होते हैं। गारमेंट्स की बात करें तो वहां पर कपड़े भी आपको कम रुपए में मिल जाते हैं। कबूतर मार्केट इसे कबूतर मार्केट भी कहा जाता है, क्योंकि यहां पर आपको कोयल, बुग्गी, जावा, कबूतर, खरगोश, आदि सस्ते दामों में आसानी से मिल जाएंगे। जैसे ही दिन चढ़ने लगता है, वैसे ही सड़क पर सामान बेचने वालों की संख्या कम होने लग जाएगी। इसके अंदर जो मार्केट लगती है वह पूरे दिन ही लगी रहती है। जिसे संडे मार्केट कहा जाता है। जो सुबह सड़क के किनारे सामान मिलता है वह रात के अंधेरे में भी मिलता है। रात के अंधेरे में मिलने वाले समान को संदिग्ध माना जाता है। यही कारण है इसे चोर बाजार का नाम दिया गया है। जैसा कि आपको पहले भी बताया है कि कपड़ों से लेकर जूते तक, कॉस्मेटिक से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक का सारा सामान यहाँ पर उपलब्ध है। खास बात ये कि इस मार्केट में आपको किसी भी सामान का जितना मूल्य बताया जाता है, आपको उसका रेट आधे से कम लगाना होता है यानि कि आपको बार्गेनिंग या तोलमोल करना आना चाहिए। यहाँ शॉपिंग का मन बनाने से पहले अच्छा होगा कि आपके साथ कोई ऐसा व्यक्ति जाए जिसे गैजेट्स और टेक्नोलॉजी की बारीक़ समझ हो। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा, वैसे-वैसे मार्केट में भीड़ भी बढ़ती जाएगी। रविवार को दिन के समय यहाँ आपको अच्छी खासी भीड़ देखने को मिल जाएगी। दिन के समय अगर आप यहाँ शॉपिंग करने आएं तो इस संडे बाजार के सामने ही प्रसिद्ध लाल क़िला, जामा मस्जिद और चांदनी चौक भी है जिसे आप मजे से घूम सकते हैं। लैपटॉप लेना खतरे से खाली नहीं लैपटॉप की बात करें तो लैपटॉप यहाँ से लेना किसी खतरे से कम नहीं है। लैपटॉप का मूल्य आपको 6 हजार से 10 हजार तक का बताया जाता है। लोग तोल मोल करके ले जाते हैं। लेकिन हम आपको सलाह देंगे कि यहाँ से लेपटॉप लेना किसी खतरे से खाली नहीं है। हां, अगर कोई इस फील्ड में एक्सपर्ट है

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Surajkund International Crafts Mela (Faridabad)

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Surajkund International Crafts Mela (Faridabad): खानपान, संस्कृति और हस्तशिल्प का अनूठा संगम: सूरजकुंडअंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला फरीदाबाद by Pardeep Kumar सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला आज विश्व में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। फरीदाबाद में  खूबसूरत अरावली पहाड़ियों में लगने वाला यह 35वां अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला है। (Surajkund International Crafts Mela) 19 मार्च से 4 अप्रैल तक होगा आयोजित आपको बता दें कि कोरोना के चलते वर्ष 2021 में इसका आयोजन नहीं हो पाया था आमतौर पर यह मेला फरवरी के महीने में 1 से 14 फरवरी के बीच लगता है लेकिन इस बार इसका आयोजन 19 मार्च से 4 अप्रैल तक किया गया है। खानपान, संस्कृति और हस्तशिल्प का अनूठा संगम सूरजकुंड मेले का प्रथम बार आयोजन सन् 1987 में हुआ था। वर्ष 2009 में पहली बार भारतीय राज्यों के अलावा दूसरे देशों को आमंत्रित करने का प्रचलन शुरू हुआ।  इस कड़ी में सूरजकुंड में शामिल होने वाला पहला देश मिस्र बना था।  तभी से दुनिया भर के हस्तशिल्पकार और अन्य कलाकार इस मेले में आते हैं। जिस कारण मेले में भारत के अलग-अलग राज्यों की संस्कृति तो देखने को मिलती ही है साथ में विदेशी संस्कृति और हस्तशिल्प कला का यहां पर खूब दीदार होता है। विदेशों के मंझे हुए शिल्पकार अपने हाथों से तैयार किए गए सामान का इस मेले में प्रदर्शन करते हैं। (Surajkund International Crafts Mela) कोरोना के कारण  पिछले साल आयोजित न कर पाने के कारण इस बार हरियाणा सरकार ने इस मेले को भव्य बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। टिकट मूल्य और कैसे करें ऑनलाइन टिकटों की बुकिंग इस बार के मेले में लोगों को बेहतरीन सुविधा देने की व्यवस्था की गई है।  काउंटर के अलावा पेटीएम के सहयोग से मेले की टिकटों की बुकिंग की शानदार व्यवस्था की  गई है। आप आसानी से पेटीएम से टिकट्स बुक कर सकते हो। पर्यटकों को  असुविधा न हो इसके लिए प्रत्येक पार्किंग के पास टिकट काउंटर बनाया गया।  मेले की टिकट आम दिनों में ₹120, वहीं शनिवार और रविवार को टिकट की कीमत ₹180 रखी गई है। मेले की टाइमिंग सुबह 10 बजे से लेकर देर शाम तक है।(Surajkund International Crafts Mela) करीब 47 एकड़ में लगने वाले इस मेले में एंट्री करने के लिए पांच गेट बनाए गए हैं जिसमें लोकल सिटीजंस के लिए दो गेट, एक गेट वीआईपी एंट्री के लिए, एक गेट मीडियाकर्मियों की एंट्री के लिए और एक गेट स्टाफ वर्कर्स की एंट्री के लिए बनाया गया है। पूरे मेला स्थल को 18 सेक्टरों में बांटा गया है। फूड कोर्ट मेले के अंदर खाने पीने के लिए अलग फूड कोर्ट की व्यवस्था की गई है जहां आपको अलग-अलग राज्यों के लज़ीज और स्वादिष्ट पकवान खाने को मिलेंगे। जिसमें दिल्ली की मशहूर चाट, गोहाना की मशहूर जलेबी ,राजस्थान की कचोरी, जम्मू कश्मीर का फेमस चिकन और मटन, साउथ के उत्तपम डोसा, छोले भटूरे ,मटर कुल्चा आदि सारी चीजें मिल जायेंगी। युवाओं और बच्चों के लिए यहां पर एडवेंचर जोन की व्यवस्था भी की गई है। जिसमें तरह-तरह के झूले, निशानेबाजी, गुलेल बाजी और भी कई तरह के गेम्स की व्यवस्था की गई है।अगर आप सूरजकुंड मेले में जाए तो एडवेंचर जोन में जाना बिल्कुल भी ना भूले। सेल्फी प्वाइंट     मेले के अंदर कई जगह पर सेल्फी प्वाइंट भी बनाए गए हैं, जहां पर आप पौराणिक और सांस्कृतिक धरोहरों के साथ अपनी पिक्चर क्लिक करवा सकते हैं। पूरे मेले को अलग-अलग राज्यों की पौराणिक धरोहरों के साथ संजोया गया है। मेले के अंदर एक जगह हरियाणा की प्रसिद्ध चौपाल का इंतजाम भी है। जिसमें अलग-अलग राज्यों और बाहरी देशों के कलाकार अपने क्षेत्र के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए मेले में पहुंचने वाले लोगों का मनोरंजन करते है और उन्हें अपनी सभ्यता और अपनी संस्कृति से रूबरू करवाते हैं। इसके अलावा आपको हर 10 कदम के बाद अलग-अलग राज्यों की झांकियां देखने को मिलेंगी, जिसमें कलाकार अपने लोकगीतों और लोकनृत्य को प्रस्तुत करते हैं और मेले में आने वाले लोगों को मस्ती में झूमने पर मजबूर कर देते हैं। मेले में अनेकों प्रकार के स्टॉल लगाए गए हैं जिसमें अलग-अलग राज्यों और अलग-अलग क्षेत्रों के हस्तशिल्पकारों द्वारा बनाए गए प्रोडक्ट्स जैसे कढ़ाई किए गए दुपट्टे, शॉल, सूट, अलग-अलग प्रकार के कपड़े, हिमाचली टोपी, कश्मीरी कालीन, राजस्थानी मोजड़ी, जूते और भी कई प्रकार की हैंड मेड चीजें आपको मिल जायेंगी। मेले के अंदर कश्मीरी थीम को ध्यान में रखते हुए वहां की परंपरा, वहां की संस्कृति को दर्शाया गया है। मेले में घूमने आए लोग यहां पर खूब फोटोग्राफी करते हैं।  मेले प्रशासन द्वारा जगह-जगह पर साफ पीने योग्य पानी की व्यवस्था भी की गई है जिससे कि मेले में आने वाले यात्रियों को गर्मी में राहत प्रदान हो। छाता या हैट साथ ले जाना बिल्कुल भी ना भूले आपको बता दें कि आजकल चिलचिलाती गर्मी से बचने के लिए आप अपना छाता या हैट अपने साथ अवश्य रखें और पानी की बोतल ले जाना बिल्कुल भी ना भूले। इससे आपको गर्मी से अवश्य राहत मिलेगी। क्योंकि यह मेला देर शाम तक चलता है इसलिए आप अपनी सुविधा और दिन में पड़ने वाली गर्मी से बचने के लिए शाम के समय भी यहाँ आ सकते हैं। (Surajkund International Crafts Mela) Photo Gallery – Surajkund Crafts Fair

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Red Fort- Delhi

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Red Fort- Delhi: लाल किला – देश की आन बान और शान का प्रतीक by Pardeep Kumar देश की आन बान और शान का प्रतीक लाल किला दिल्ली शहर का सबसे फेमस टूरिस्ट प्लेस है, जो हर साल यहां आने वाले लाखों पर्यटकों को अपनी और खूब आकर्षित करता है। यही वह प्रसिद्ध किला है, जहाँ से हर साल देश के प्रधानमंत्री 15 अगस्त के दिन यहां की प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं और देश की जनता को सम्बोधित करते हैं। अगर पर्यटन स्थलों की बात की जाए तो लाल किला दिल्ली का सबसे बड़ा स्मारक भी है।(Red Fort, Delhi) इस ब्लॉग में आज हम आपको बताएंगे इस किले के ऐतिहासिक और राजनैतिक महत्त्व के साथ-साथ इसकी शानदार वास्तुकला और अद्भुत बनावट के बारे में। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित यह लाल किला देश की आजादी का प्रतीक माना जाता है। भारतीय और मुगल वास्तुशैली से बने इस भव्य ऐतिहासिक किले का निर्माण पांचवें मुगल शहंशाह शाहजहां ने 1638 ईसवी में करवाया था। जो लगभग 10 साल निर्माण कार्य के बाद 1648 ईसवीं में बन कर तैयार हुआ। यमुना नदी के किनारे स्थित इस किले का अद्भुत सौंदर्य और आकर्षण देखते ही बनता है। (Red fort , Delhi) देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक यह ऐतिहासक स्मारक यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल है। लाल किले के सौंदर्य, भव्यता और आकर्षण को देखने दुनिया के कोने-कोने से लोग आते हैं और इसकी शाही बनावट और अनूठी वास्तुकला की खूब प्रशंसा भी करते हैं। आपको बता दें यह शाही किला मुगल बादशाहों का न सिर्फ राजनीतिक केन्द्र था, बल्कि यह उनका औपचारिक केन्द्र भी हुआ करता था, जिस पर करीब 200 सालों तक मुगल वंश के विभिन्न शासकों ने राज किया। देश की जंग-ए-आजादी का भी गवाह रहा लाल किला मुगलकालीन वास्तुकला, सृजनात्मकता और सौंदर्य का अनुपम और अनूठा उदाहरण है। आपको बता दें कि शाहजहां, इस किले को उनके द्वारा बनवाए गए सभी किलों में बेहद आकर्षक और सुंदर बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 1638 ईसवी में ही अपनी राजधानी आगरा को दिल्ली शिफ्ट कर लिया था, और फिर तल्लीनता से इस किले के निर्माण में ध्यान देकर इसे भव्य और आर्कषक रुप दिया था। शाहजहां ने आगरा में स्थित ताजमहल को भव्य रुप देने वाले डिजाइनर और मुगल काल के प्रसिद्ध वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी को इस किले की शाही डिजाइन बनाने के लिए चुना था। वहीं उस्ताद अहमद अपने नाम की तरह ही अपनी कल्पना शक्ति से शानदार इमारत बनाने में उस्ताद थे, उन्होंने लाल किले को बनवाने में भी अपनी पूरी विवेकशीलता और कल्पनाशीलता का इस्तेमाल कर इसे अति सुंदर और भव्य रुप दिया था। यही वजह है कि लाल किले के निर्माण के इतने सालों के बाद आज भी इस किले की विशालता और खूबसूरती के लिए विश्व भऱ में जाना जाता है। भारत का राष्ट्रीय गौरव समझे जाने वाले इस किले का इतिहास न केवल बेहद दिलचस्प है बल्कि यह किला अनेक लड़ाइयों का साक्षी भी रहा हैI इसी किले के कारण ही उस समय भारत की राजधानी दिल्ली को शाहजहांनाबाद कहा जाता था। कला प्रेमी, विशेषकर स्थापत्य कला प्रेमी शाहजहां के शासनकाल को मुग़ल शासन का स्वर्ण युग और भारतीय सभ्यता का सबसे समृद्ध काल भी कहा गया है। शाहजहां के बाद उसके बेटे औरंगजेब ने इस किले में मोती-मस्जिद का भी निर्माण करवाया था। लगभग 250 एकड़ में फैला यह शानदार किला मुगलों और अंग्रेजों के संघर्ष की कहानी भी बयां करता हैं। 17वीं सदी में करीब 30 साल तक यह लाल किला बिना शासक के रहा। 18वीं सदी में अंग्रेजों ने लाल किले पर अपना कब्जा जमा लिया और इसे किले में जमकर लूट-पाट की। भारत की आजादी के बाद सबसे पहले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस पर तिरंगा फहराकर देश के नाम संदेश दिया था। आजादी के बाद लाल किले का इस्तेमाल सैनिक प्रशिक्षण के लिए किया जाने लगा और बाद में दिसम्बर 2003 में, भारतीय सेना ने इसे भारतीय पर्यटन विभाग को सौंप दिया। इसके सौंदर्य, आर्कषण और भव्यता की वजह से इसे 2007 में वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल किया गया था और आज इस ऐतिहासिक किले की खूबसूरती को देखने दुनिया के कोने-कोने से लोग इसे देखने दिल्ली जाते हैं। अपनी ऊँची-ऊँची और मजबूत दीवारों से घिरा यह किला करीब 250 एकड़ में फैला हुआ है। छत्ता चौक या बाजार इस किले के दो मुख्य द्वार है – दिल्ली दरवाज़ा एवं लाहौर दरवाज़ा। लाहौर दरवाज़ा इसका मुख्य प्रवेश द्वार है। इसके अन्दर प्रवेश करते ही आपको एक शानदार और आकर्षक बाजार दिखाई देगा जिसे छत्ता चौक या बाजार कहते हैं, छत्ता मतलब ढका हुआ। आप जैसे ही लाहौरी दरवाजे से किले में अंदर प्रवेश करते हैं तो आपको यह बाजार दिखाई देगा जिसमे दोनों तरफ दो मंजिला मेहराबदार दुकानें बनी हुई हैं जो शाही परिवार की रानियों और महिलाओं के लिए बनवाया गया था ताकि वो आसानी से यहाँ से खरीददारी कर सके। दोनों तरफ 32 कमरें बने हुए हैं जो आज भी दुकानों के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। नक्कारखाना लाहौर गेट से छत्ता चौक तक आने वाली सड़क से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक्कारखाना बना है। यह संगीतज्ञों के लिए बनाये गए महल का मुख्य दरवाज़ा है। दीवान-ए-आम इस गेट के पार एक और खुला मैदान है, जो कि दीवाने-ए-आम का प्रांगण हुआ करता था। दीवान-ए-आम में बादशाह आम जनता से रूबरू होते थे। एक शानदार सिंहासन का छज्जा दीवाने आम के बीचों बीच बना था। यह बादशाह के लिए बनाया गया था जहाँ बैठ कर बादशाह जनता की फरियाद सुनता था। महल की योजना मूलरूप से इस्लामिक शैली में है, परंतु यहाँ बने मण्डप हिन्दू वास्तुकला को छाप छोड़ते हैं। ज़नाना महल के दो हिस्से महिलाओं हेतु बने हैं, जिन्हें जनाना कहते हैं: मुमताज महल, जो अब संग्रहालय बना हुआ है, एवं रंग महल, जिसमें सुवर्ण मण्डित नक्काशीदार छतें एवं संगमरमर के सरोवर बने हैं, जिसमें नहर-ए-बहिश्त से जल आता था और समस्त महल में पानी की पूर्ति होती थी। खास महल यही दक्षिण में एक और मण्डप है जिसे खास महल कहते हैं। इसमें शाही कमरे बने हैं। इनमें राजसी शयन-कक्ष, प्रार्थना-कक्ष, एक