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Sultanpur Bird Sanctuary

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Sultanpur Bird Sanctuary: सुल्तानपुर नेशनल पार्क- खूबसूरत प्रवासी पक्षियों की आरामगाह By Pardeep Kumar नि:संदेह पक्षियों की फितरत है उड़ना और पक्षियों की तरह बेफ़िक्री से आसमान की सैर करना किसे पसंद नहीं होगा।  चाहे आप प्रकृति प्रेमी हैं या नहीं, लेकिन कभी न कभी आपके मन में भी यह ख्याल अवश्य आता-जाता रहता होगा कि काश हम भी इन पक्षियों की तरह एक जगह से दूसरे जगह और एक देश से दूसरे देश में उड़ सकते।आज हम इस ब्लॉग में आपको ले चलते है पक्षियों की उस आरामगाह में जहाँ इत्मीनान से वक़्त बिताने के लिए वो सैंकड़ों हज़ारों मील उड़कर आते हैं। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा के सुल्तानपुर नेशनल पार्क की जो देश भर में पक्षियों के स्वर्ग के रूप में अच्छा-खासा प्रसिद्ध है। सुल्तानपुर नेशनल पार्क, गुड़गाँव-झज्जर हाईवे पर फर्रुखनगर के नजदीक स्थित है। दिल्ली एनसीआर में होने के कारण सुल्तानपुर नेशनल पार्क वीकेंड बिताने का एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है। आप दिल्ली मेट्रो से यहाँ आना चाहें तो येलो लाइन से  हुडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन पर पहुँच कर, वहां से कोई निजी कैब या ऑटो बुक करके आप इस खूबसूरत पक्षी विहार तक पहुँच सकते हैं।अगर आप गुड़गाँव से जाएँ तो यह लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है और दिल्ली से लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर। you can watch this vlog – Like, comment & subscribe सुल्तानपुर जाने का सही समय सुल्तानपुर बर्ड सैंक्चुअरी में वैसे तो आप साल भर कभी भी आ सकते हैं। लेकिन अक्टूबर से जनवरी के बीच यहाँ आने का सबसे उपयुक्त समय रहता है। दरअसल इसी समय देश विदेश के प्रवासी पक्षी यहाँ भरी तादाद में आते हैं और कुछ महीने उनका ठहराव यहीं होता है। दिसंबर-जनवरी के महीने में अक्सर यहाँ विदेशी पक्षी आवास करते हैं। प्रवेश टिकट यहाँ प्रवेश करने के लिए आपको दस रुपए का टिकट लेना पड़ता है। साथ ही अगर आप फोटोग्राफी के लिए कैमरा ले जाना चाहते हैं तो उसका भी नाममात्र का चार्ज है। कार पार्किंग के लिए बेहतरीन सुविधा है। टिकट खिड़की के सामने ही आप अपनी कार पार्क कर सकते हैं। 142.52 हेक्टेयर में फैले  इस बर्ड सैंक्चुअरी में आपको जन्नत-सी एक अलग ही दुनिया दिखाई देगी। प्रकृति प्रेमियों के लिए तो यहाँ सब कुछ है। इस नेशनल पार्क में थोड़ा अंदर चलते ही आपको मिलेगी पानी से लबालब झील, जिनके किनारे पेड़ों पर सुन्दर और दुर्लभ पक्षियों की अनेक प्रजातियां दिखाई देती हैं। देसी-विदेशी पक्षियों के अलावा आपको यहाँ नीलगाय, गाय, हिरण, लंगूर और  बन्दर जैसे अन्य जीव जंतु भी दिखाई देंगे। जो यहाँ के माहौल को एक अलग ही रंग रुप प्रदान करते हैं। प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां पेलिकन, साइबेरियाई सारस, काले पंखों वाला स्टिल्ट, जलकाग, कॉमन ग्रीनशैंक्स, कुरजां आदि कुछ ऐसे प्रमुख प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां हैं जो सर्दियों के मौसम में इस नेशनल पार्क में आपको अवश्य मिल जायेंगे। क्योंकि हम अभी नवंबर महीने के अंत में इस पार्क में गए तो हमें साइबेरियाई सारस की प्रजाति दिखाई दी। झील के ऊपर लम्बी उड़ान भरता दिखने में बाज़ और चील जैसा विशालकाय यह पक्षी बेहद सुन्दर और आकर्षक लगता है। आप जैसे ही इस पार्क के बीचो-बीच बनी सुन्दर सी झील के पास पहुँचते हैं आपको पक्षियों के चहचहाने की मधुर आवाज़ सुनाई देगी। देश विदेश के इन दुर्लभ पक्षियों के जमावड़े व अठखेलियों से नेशनल पार्क की खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं। यहाँ आकर आपके मन को एक अलग ही सुकून का अनुभव होगा। दरअसल नवंबर दिसंबर के महीनों में झील के चारों और लगे पेड़ों पर फलों की तरह लदे ये पक्षी आपकी नज़रों को एक पल के लिए भी इधर उधर नहीं होने देंगे। वाईल्ड लाईफ फोटोग्राफर्स के लिए तो यह जगह जैसे कुदरत का एक नायाब तोहफा है। किस पल उनके कैमरे में कौन-सा दुर्लभ पक्षी कैद हो जाये कह नहीं सकते। बेहद सिस्टेमेटिक ढंग से बना नेशनल पार्क आपको बता दें सुल्तानपुर को 1972 में ‘वाटर बर्ड रिर्जव’ के रूप में घोषित किया गया। जुलाई 1991 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत  नेशनल पार्क का दर्जा दिया गया। इस बर्ड सैंक्चुअरी को बेहद सिस्टेमेटिक ढंग से बनाया गया है। यहाँ पर बहुत सारी झाडि़याँ, घास के मैदान और बहुत अधिक संख्या में बोगनवेलिया सहित अलग -अलग किस्म के पेड़ पौधे हैं। प्रकृति की खूबसूरती और पक्षी विहार की गरिमा  को बरक़रार रखते हुए अभ्यारण्य में काफ़ी अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।  इस नेशनल पार्क के अलग-अलग कोनों  पर पक्षियों की खूबसूरती को अच्छी तरह से निहारने के लिए चार वाच टावर बनाये गए हैं।  पर्यटकों की सुविधा के लिए यहाँ दूरबीन भी उपलब्ध हैं, जिसका प्रयोग करके आप दूर पेड़ों पर बैठे या झील में तैरते हुए पक्षियों को आसानी से देख सकते हैं। आप जैसे ही टिकट लेकर गेट से अंदर प्रवेश करते हैं सबसे पहले आपको दिखाई देता है इंटरप्रटेशन सेंटर। जहाँ आप पक्षियों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। जहाँ आपको चिड़िया और मोर जैसे पक्षियों के खूबसूरत स्टेचू दिखाई देंगे। जो एक बार अवश्य ही आपको यहाँ एक गेस्ट हाउस और जंगल विश्राम घर की भी व्यवस्था है, साथ ही खाने और जलपान के लिए छोटा-सा रेस्टोरेंट भी है। तो सोचिये मत, निकल पड़िये सुल्तानपुर नेशनल पार्क की और क्योंकि सर्दियों का समय आ चुका है और यह वही समय है जब प्रवासी पक्षियों का यहाँ शानदार जमघट लगना शुरू हो जाता है। जितनी ज्यादा सर्दी उतने सुन्दर पक्षी देखने का अवसर। Glimpse of Sultanpur National Park……

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Jal Mahal Jaipur the Water Palace

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Jal Mahal – झील के बीचों-बीच बना अनोखे सौन्दर्य और अद्भुत स्थापत्यकला का बेजोड़ उदाहरण by Pardeep Kumar अपनी यात्रा के अगले पड़ाव पर हम आ पहुंचे हैं राजस्थान के एक ऐसे शहर जो प्रेम, शांति और कला की अपनी एक अलग ही कहानी बयां करता है। कुछ शहर खूबसूरत होते हैं और कुछ सुन्दर बनने की चेष्टा करते हैं। लेकिन राजस्थान का जयपुर शहर तो शायद सुंदरता के लिए बनाया गया है जिसका नाम जेहन में आते ही मन गुलाबी हो उठता है। चाहे दिन का समय हो या रात का, इस शहर की चमक और बनावट मन से उतरती ही नहीं। चारों और अरावली की पहाडयों से घिरा, चौड़ी और साफ़ सुथरी सड़कों और अपने चमकीले और सैकड़ों साल पुराने बाज़ारों के कारण यह शहर किसी भी पर्यटक के मन को खुश करने में पूरी तरह सक्षम है। हमनें  अपने जयपुर ट्रिप में न केवल यहाँ के ऐतिहासिक और भव्य किलों को एक्सप्लोर किया बल्कि यहाँ की जीवन शैली, कल्चर, वास्तुकला, बाजार और खानपान को भी समझने की कोशिश की। इसी कड़ी में आज के इस ब्लॉग में हम आपको बता रहे हैं जयपुर की एक बेहद खूबसूरत जगह जलमहल के बारे में। You can also watch Jal Mahal Vlog on our YouTube Channel Five Colors of Travel, Like Share & Subscribe कैसे पहुंचे जलमहल झील के बीचोंबीच बना ये जलमहल राजस्थान के जयपुर जिले के आमेर मार्ग पर स्थित है, दिल्ली से लगभग 260 किलो मीटर और अजमेर से 146 किलो मीटर की दूरी पर बना ये महल पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र है। किस समय और किस मौसम में यहाँ आना बेस्ट रहता है वैसे तो यह महल 24 घंटे खुला रहता है पर यहां आने का सबसे उपयुक्त समय सुबह दस बजे से रात नौ बजे तक है इस समय अधिकतर लोग यहां पिकनिक करने, क्वालिटी टाइम स्पेंड करने और सुबह शाम यहां के लोकल लोग वॉक करने भी आते हैं। यहां आने का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से मार्च के बीच का है । दरअसल इन दिनों सर्दियों की खिली-खिली धूप में जल महल का नजारा बहुत ही अद्भुत और खूबसूरत लगता है। जानिए जलमहल का इतिहास पिंक सिटी जयपुर की ‘मानसागर’ झील के बीचों बीच बना ‘जलमहल’ अनोखे सौन्दर्य और अद्भुत स्थापत्यकला का बेजोड़ उदाहरण है। इस महल का निर्माण आज से लगभग 300 साल पहले आमेर के महाराज सवाई मानसिंह ने सन् 1799 में करवाया था। आपको बता दें यह पाँच मंज़िला इमारत और इस झील की सुंदरता उस समय के राजाओं के आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी और राजा अक्सर नाव में बैठकर इस महल की सैर किया करते थे । जल महल की वास्तुकला जलमहल एक पाँच मंज़िला इमारत है जिसकी 4 मंज़िल पानी के भीतर बनी हैं और एक पानी के ऊपर नज़र आती है। उस समय के राजा इस महल का उपयोग अपने मनोरंजन के लिए करते थे. धीरे-धीरे यहां राजाओं की आवाजाही कम हो गयी जिसके कारण यह महल लगभग 200 सालों के लिए वीरान हो गया। उसके बाद साल 2000 में इसकी मरम्मत का काम दोबारा शुरू किया गया और इसे दोबारा सैलानियों के लिए खोला गया। बाहरी परिसर से देखने पर आपको यू लगेगा मानो कोई विशाल नाव झील में उतरी हो। जलमहल के किनारे लगने वाला शानदार बाजार सैर सपाटे और घूमने के साथ-साथ यह क्षेत्र अब  लोगों के लिए आय का साधन भी बन गया है. यहां पर आपको राजस्थानी मोजड़ी, राजस्थानी जूती, हैंड बैग, होम डेकोरेटिव आइटम्स, ज्वेलरी और एडिशनल क्लोथ्स, मैग्नेट और भी कई डेली यूज़ के सामान मिलते हैं, इसी के साथ आपको यहां खाने-पीने के बहुत सारे आइटम भी मिल जाएंगे. यहां पर स्पेशली आपको मैग्नेट के आइटम्स बेचते बहुत से पुराने परंपरागत लोग दिख जायेंगे। साथ ही आप यहां पर ऊंट और घोड़े की सवारी का आनंद भी उठा सकते हैं । पिकनिक, नेचर लवर्स और क्वॉलिटी टाइम बिताने के लिए यह जगह एक बेहतरीन प्लेस है। आप यहां आकर पक्षियों और मछलियों को दाना देते हुए पहाड़ों के बीच में बनी इस झील के बेहतरीन नजारो का आनंद ले सकते हैं। बहुत से कपल्स यहां पर आपको राजस्थानी पोशाक में फोटो शूट करते हुए भी नजर आएंगे। पिकनिक स्पॉट वैसे जल महल का निर्माण आवासीय तौर पर ना होकर एक पिकनिक स्पॉट के तौर पर किया गया था. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि जल महल के अंदर कोई कमरा नहीं है। और न ही कभी इस महल में राजाओं ने कभी रात्रि विश्राम नहीं किया। एक चीज जो इस महल को बेहद खूबसूरत और थोड़ा हटकर बनाती है वो है इस महल के अंदर बने गलियारे और छत पर बनाया शानदार बगीचा। इसकी खूबसूरत बनावट के कारण ही किसी जमाने में इसे ‘रोमांटिक महल’ के नाम से भी जाना जाता था।  महल की खासियत की बात करें तो तपते रैगिस्तान के बीच बसे इस महल में गरमी नहीं लगती, क्‍योंकि इसके कई तल पानी के अंदर बनाए गए हैं। आप आसानी से इस महल से पहाड़ और झील का ख़ूबसूरत नज़ारा भी देख सकते हैं। चांदनी रात में झील के पानी में इस महल का नजारा बेहद आकर्षक लगता है। पक्षी विहार जलमहल अब पक्षी विहार के रूप में भी विकसित हो रहा है। बताते हैं जल महल की  नर्सरी में तकरीबन एक लाख से ज्‍यादा पेड़ लगे हुए हैं। दिन रात बहुत से माली पेड़-पौधों की देखभाल में लगे रहते हैं। यह नर्सरी राजस्थान की सबसे उंचे पेड़ों वाली नर्सरी भी मानी  जाती  है। रात के समय में ये महल न केवल अद्भुत रूप ले लेता है बल्कि रंग बिरंगी लाइटों से जगमग होकर हर किसी को अपनी खूसूरती का कायल भी बना लेता है। अगर आपकी जरा भी दिलचस्पी फोटोग्राफी में है तो जल महल आपके लिए एक बेहद सुन्दर और लाज़वाब जगह है। इस महल के आसपास के नज़ारे इतने आकर्षक हैं कि यह सिर्फ फोटो खींचने के लिए ही नहीं बल्कि आपको अपने फोटो खिंचवाने पर भी मजबूर कर देंगे। some glimpse of Jal Mahal……..

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Amer Fort

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Amer Fort : राजस्थान की आन-बान और शान- आमेर का ऐतिहासिक किला by Pardeep Kumar गुलाबी शहर के नाम से प्रसिद्ध जयपुर से कोई विरला ही होगा जो वाकिफ न हो। भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक राजस्थान की राजधानी जो अपने खानपान से लेकर समृद्ध इतिहास, संस्कृति और कला के कारण भी दुनिया भर में फेमस है। you can watch this blog on YouTube कहा जाता है कि इस शहर को वेल्स के राजकुमार के स्वागत की खुशी में गुलाबी रंग से रंगा गया था और तभी से इसे गुलाबी शहर (पिंक सिटी ) के नाम से जाना जाता है। जयपुर शहर का नाम आते ही यहाँ के बड़े-बड़े और भव्य किले दिलोदिमाग में तैरने लगते हैं। और इन्हीं किलों में निसंदेह सबसे पहले जिस किले की छवि उभरती है वो है खूबसूरत आमेर का किला। राजस्थान के जयपुर शहर को और ज्यादा खूबसूरत बना देने वाला ये आमेर का किला, अम्बर किला के नाम से भी जाना जाता है। ये किला ना केवल जयपुर शहर बल्कि पूरे राजस्थान के शानदार पर्यटन स्थलों में से एक है। आमेर का किला इतना प्रसिद्ध है कि यहाँ पर हर रोज छह हजार से भी अधिक लोग घूमने के लिए आते हैं। यह किला राज्य की राजधानी जयपुर से 11 किलोमीटर की दूरी पर है। आमेर जाने का सबसे अच्छा समय अगर आप इस किले की खूबसूरती का आनंद लेना चाहते हैं, तो सर्दियों के समय में नवंबर से मार्च महीने के बीच यहां जाना सबसे अच्छा माना जाता है। इसका कारण ये है कि रेतीले राजस्थान में दिन के समय मौसम गर्म ही रहता है। ऐसे में धूप और सूरज की गर्मी कभी-कभी आपको बहुत ज्यादा परेशान कर सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि आप सर्दियों में ही जयपुर जैसे शहर की यात्रा करने की प्लानिंग करें। आमेर कैसे पहुंचे इस किले तक पहुंचने के लिए जयपुर से बस, ऑटो-रिक्शा, टैक्सी या कैब ली जा सकती है। आप अजमेरी गेट और एमआई रोड से आमेर शहर के लिए रोडवेज या प्राइवेट बसों से भी जा सकते हैं। आमेर का किला एक पहाड़ी पर है, इसलिए किले का दीदार करने के लिए आपको किले के थोड़ी दूर पहले से ही या तो पैदल चलना होगा या फिर आप टैक्सी या जीप से भी किले के मुख्य द्वार तक पहुँच सकते हैं। या फिर आप अपनी पर्सनल गाड़ी से भी यहां जा सकते हैं। किले के मुख्य द्वार के पास थोड़ी सपाट चढ़ाई है, इसलिए अगर आप एक्सपर्ट ड्राइवर हैं तो ही अपनी पर्सनल गाड़ी से किले तक जाने का रिस्क लें। अगर आप सीजन के दौरान यहां जा रहे हैं, तो खुद की गाड़ी से जाने से बचना ही बेहतर होगा, क्योंकि ट्रैफिक जाम आपके लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। हालांकि ऐसा सीजनल टाइम में ही ज्यादा होता है। अंदर प्रवेश करके आप हाथी की सवारी का भी अपना आनंद और रोमांच ले सकते हैं। हाथी सवारी आपके लिए तब और ज्यादा फायदेमंद साबित हो जाती है, जब आप परिवार के साथ किला घूमने गए हो, हालांकि अगर आप हाथी की सवारी करते हुए किले की सैर करना चाहते है, तो एक हाथी की सवारी के लिए आपको लगभग 1000-1,200 रुपये का तक देना पड़ सकता है। याद रहे कि एक हाथी पर दो से ज्यादा पर्यटक सवार नहीं हो सकते। हाथियों की ये सवारी सुबह से ही शुरू हो जाती है। टिकट और लागत आमेर के किले के लिए विदेशी सैलानियों से 250 रुपये और भारतीयों सैलानियों से टिकट के 50 रुपये लिए जाते हैं। अगर आप स्टूडेंट हैं, तो जयपुर शहर की यात्रा करते समय अपना स्कूल या कॉलेज आईडी कार्ड ले जाना कभी मत भूलिए, किले की सैर के लिए मिलने वाली टिकटों पर स्टूडेंट्स को भारी छूट दी जाती है, इसके अलावा सात साल से कम उम्र के बच्चे के लिए यहां ज्यादातर जगहों पर टिकट निःशुल्क हैं। आमेर के किले में टिकट काउंटर सूरज पोल के सामने जलेब चौक प्रांगण में मौजूद है। आप वहां एक ऑफिसियल टूरिस्ट गाइड भी ले सकते हैं। इसके अलावा लंबी लम्बी लाइनों से बचने के लिए आप टिकट ऑनलाइन भी खरीद सकते हैं। आमेर का इतिहास आमेर के किले की इतिहास की बात करें, तो यह कभी जयपुर रियासत की राजधानी हुआ करती थी। यह किला राजपूत शासकों का निवास स्थान हुआ करता था। मुगल सम्राट अकबर की सेना का नेतृत्व करने वाले महाराजा मान सिंह प्रथम ने 1592 में 11वीं सदी के किले के अवशेषों पर इसका निर्माण शुरू करवाया था। राजस्थान में छह पहाड़ी किलों के समूह के हिस्से के रूप में किले को 2013 में यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी घोषित किया गया। इस किले की वास्तुकला राजपूत (हिंदू) और मुगल (इस्लामी) शैलियों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। माना जाता है कि 967 ई. में मीणाओं के एक उप कुल में आमेर शहर और आमेर का किला राजा एलन सिंह चंदा द्वारा बसाया और बनाया गया था. चूंकि मीना अंबा माता की भक्त थीं, इसलिए उन्होंने अपने किले का नाम उनके नाम पर आमेर का किला रखा. पहाड़ी पर ऊंचे स्थान पर स्थित इस किले से माओटा झील दिखाई देती है, यह झील ही आमेर पैलेस के लिए पानी का मुख्य स्रोत है। आपको बता दें आमेर और जयगढ़ किले को एक ही संरचना के रूप में माना जाता है, क्योंकि ये दोनों किले लगभग एक ही परिसर में हैं और खास बात ये कि एक ही भूमिगत मार्ग दोनों किलों को आपस में जोड़ता है। ऐसा माना जाता है कि किसी युद्ध के समय या जब कभी दुश्मन हमला कर दें तो उन हमलों से बचने के लिए इस मार्ग का उपयोग किया जाता था। किले का निर्माण सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक राजा मान सिंह प्रथम ने करवाया था। बाद में, अन्य राजपूत शासकों द्वारा इसका आगे विस्तार किया गया। अपनी अद्भुत वास्तुकला के साथ, जो मुगल और हिंदू शैलियों को जोड़ती है, लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना किला, अपने उच्च प्राचीर, कई द्वारों, पत्थरों वाले रास्तों और शानदार दृश्यों के कारण खासा प्रसिद्ध है। वैसे आमेर का यह किला चार भागों में बँटा है जिसका प्रत्येक

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अजमेर शरीफ़ दरगाह

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अजमेर शरीफ़ दरगाह – जहाँ हर किसी की मुराद होती है पूरी  By Pardeep Kumar राजस्थान यात्रा के अपने अगले पड़ाव में, हम आपको ले कर आये हैं एक बेहद धार्मिक स्थान अजमेर शरीफ दरगाह। अजमेर शहर के सबसे अधिक देखे जाने वाले स्थानों में से एक, अजमेर शरीफ दरगाह एक सूफी दरगाह है। जिसे राजस्थान के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। अजमेर शरीफ, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का भव्य एवं बेहद खूबसूरत मकबरा है। इसे ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह के नाम से भी जाना जाता है। आपको बता दें कि ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती एक प्रसिद्ध सूफी संत होने के साथ-साथ इस्लामिक विद्धान और दार्शनिक भी थे। ऐसा माना जाता है कि अजमेर दरगाह पर अगर आप सच्चे मन से किसी भी चीज के लिए प्रार्थना करते हैं, इबादत करते हैं तो आपकी प्रार्थना अवश्य ही पूरी होती है। अजमेर शरीफ़ कैसे पहुंचे राजस्थान का अजमेर शहर देश के लगभग सभी प्रसिद्ध शहरों से रेल, सड़क या हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है। अगर आप दिल्ली से अपने पर्सनल व्हीकल से आ रहे हैं तो आरामदायक नेशनल हाईवे का प्रयोग करते हुए यहाँ बेहद आसानी से पहुँच सकते हैं। रास्ते में आपको बहुत सारे पांच सितारा टाइप के ढाबे जलपान के लिए मिल जायेंगे। जयपुर हवाई अड्डा अजमेर शहर के सबसे नजदीक है। हवाई अड्डे से, आप या तो टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या अजमेर शरीफ दरगाह तक पहुंचने के लिए बस से भी जा सकते हैं। watch Ajmer sharif Vlog with english subtitles अगर आप यहाँ ट्रैन से आना चाहते हैं तो अजमेर के लिए लगभग सभी बड़े शहरों से आपको नियमित ट्रेनें मिल जाएँगी,  स्टेशन से आप कैब बुक कर सकते हैं या अजमेर शरीफ दरगाह तक पहुंचने के लिए स्थानीय बस ले सकते हैं। हालांकि कैब किराए पर लेना एक विकल्प है, लेकिन दिल्ली, जयपुर, जोधपुर और जैसलमेर से अजमेर के लिए सीधी बसें चलती हैं। अजमेर दरगाह तक पहुँचने के लिए आप बस स्टॉप से टैक्सी या अन्य स्थानीय साधन ले सकते हैं। यहां साल के किसी भी महीने में आ सकते हैं दिल्ली से लगभग 400 किलोमीटर और अजमेर बस अड्डे से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह दरगाह भक्तों के आकर्षण का महत्वपूर्ण केंद्र है। देश विदेश से लोग यहां अपनी मनोकामना पूरी करने आते हैं दिन-रात यहां भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। अगर आपके मन में श्रद्धा भाव है तो आप यहां साल के किसी भी महीने में आ सकते हैं। सर्दियों के दौरान यहां गेट सुबह 5 बजे से रात 9 बजे तक खुले रहते हैं और गर्मियों के दौरान के सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक। आप किसी भी समय यहां पर आ सकते हैं। पार्किंग आपको बता दें कि अजमेर शरीफ दरगाह से लगभग एक किलोमीटर पहले ही आपको अपना वाहन किसी उचित पार्किंग स्थल पर छोड़कर दरगाह तक पैदल ही जाना होगा, तंग गलियों में वाहन ले जाने की कोई सुविधा नहीं है। कार पार्किंग को लेकर आप थोड़ा ध्यान रखें, क्योंकि दरगाह से एक डेढ़ किलोमीटर पहले ही आपको बहुत से पार्किंग स्लॉट मिलेंगे, जो तकरीबन सौ रुपए में आपकी कार अपने प्लॉट या दुकान के सामने पार्क करवा देंगे। ध्यान रहें कार में कोई भी कीमती सामान न छोड़ें। क्योंकि अधिकतर पार्किंग वाले किसी भी तरह की स्लिप नहीं देंगे। हाँ, आप यहाँ पैदल चलने के अलावा रिक्शा से भी जा सकते हैं, यहां की सैंकड़ों साल पुरानी छोटी-छोटी गलियों से निकलकर आपको सामने की ओर दरगाह का गेट दिखाई देगा। दरगाह जाने के रास्‍ते वैसे दरगाह जाने के लिए चारों और दरवाजे हैं लेकिन रूटीन में दो ही दरवाजे खुले रहते हैं बाकी दरवाजे विशेष मौकों और त्यौहारों पर ही खुलते हैं। दो दरवाजे – एक गेट नंबर 4 और दूसरा गेट नंबर 2, गेट नंबर 2 से दरगाह में एंट्री थोड़ी आसान है क्‍योंकि गेट नंबर 2 तक लोकल रिक्शा वगैरह जाते हैं और इसलिए यहां पर भीड़ नहीं लगती। वहीं अगर आप गेट नंबर 4 पर आपको भीड़ भी मिलेगी और काफी चलना भी होगा। वैसे आमतौर पर यहाँ भीड़ फेस्टिवल सीजन के दौरान ज्यादा होती है। गेट नंबर 4 पर दरगाह का मुख्‍य प्रवेश द्वार है। आप अपनी पार्किंग की सुविधा के हिसाब से किसी भी गेट से एंट्री कर सकते हैं। इन संकरी गलियों से गुजरते हुए आपको गुलाब के फूलों, मनमोहक इत्र,  अजमेर शरीफ की स्पेशल मिठाई और अगरबत्ती की दुकान दिखाई देंगी। आप यहां से दरगाह के लिए चादर, फूल या अपने अनुसार कोई भी चढ़ाने की वस्तु ले सकते हैं। याद रहे कि प्रवेश करते वक्त आप अपने जूते-चप्पल दरगाह के गेट के बाहर ही उतार कर जाए। अजमेर शरीफ दरगाह में कैमरा इत्यादि चीजें ले जाने की इजाजत नहीं है इसलिए आप अपना कीमती सामान किसी सुरक्षित स्थान पर छोड़कर जाएं। गेट में प्रवेश करते ही आपकी यात्रा शुरू हो जाती है। जैसे ही आप दरगाह में प्रवेश करेंगे मुगल सम्राट हुमायूं द्वारा निर्मित  सुंदर नक्काशी वाले विशाल दरवाजों की एक श्रृंखला आपको दिखाई देगी। ये सभी दरवाजे शुद्ध चांदी से बने हैं, और इन पर बेहतरीन नक्काशी देखने लायक है। एक विशाल गेट से होते हुए आप एक बड़े से प्रांगण में पहुंचेंगे। जहाँ आपको ख़वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के मकबरे की एक झलक दिखाई देगी, जो संगमरमर से बना है। दरगाह के शीर्ष पर, सोने की परत चढ़ी हुई है, जो शुद्ध चांदी और संगमरमर से बनी रेलिंग से सुरक्षित है। दरगाह के प्रांगण के अंदर पहुँचते ही आपको असीम सुकून का अहसास होता है जो आपको और कहीं मिलना दुर्लभ है। यहीं प्रांगण के बीच में स्थित अजमेर शरीफ दरगाह के चारों ओर बहुत सारे लोग इबादत करते दिखाई देंगे। यहाँ सिर्फ इस्लाम धर्म को मानने वाले ही नहीं बल्कि  सभी धर्मों के लोग दूर-दूर से अपनी-अपनी मुरादें लेकर आते हैं। इतना ही नहीं मुराद पूरी होने पर ख्वाजा का शुक्राना अदा करने भी आते हैं। यहाँ चादर और फूलों की टोकरी चढ़ाते हैं। आम लोगों के अलावा अक्सर बॉलीवुड स्टार भी अपनी फिल्मों की सफलता के लिए यहाँ दुआ मांगने आते हैं। यहाँ आपको बहुत सारे श्रद्धालु धागा बांध कर मन्नत मांगते हुए

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Jantar Mantar-Jaipur

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Jantar Mantar-Jaipur- प्राचीन भारत की विश्व प्रसिद्ध खगोल विद्या का जीता जागता उदाहरण by Pardeep Kumar राजस्थान की राजधानी जयपुर में सवाई जय सिंह द्वारा बनवाया गया जंतर-मंतर यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज सूची में शामिल है। यहाँ पर मौजूद उपकरण और यंत्र बेहद पुराने होने के बावजूद भी आधुनिकता का प्रमाण देते हैं। इन बेहद पुराने उपकरणों से समय को मापा जाता है।  आपकी जानकारी के लिए बता दें सिटी पैलेस, गोवर्धन मंदिर, हवा महल और भी कई सुन्दर और फेमस जगह जयपुर के जंतर-मंतर के आस-पास  ही कुछ क़दमों की दूरी पर स्थित है। गुलाबी शहर का लुत्फ़ उठाते हुए आप इन जगह का दीदार करके अपने सफर को हमेशा के लिए यादगार बना सकते है। जयपुर यात्रा के तमाम ब्लोग्स आप फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के ब्लॉग से पढ़ सकते हैं और अपनी यात्रा को बेहद आसान बना सकते हैं। आपने कभी सूर्य तो कभी चंद्र ग्रहण के बारे में अवश्य सुना होगा, इन यंत्रो से भविष्य में आने वाले ऐसे ग्रहण के विषय में पता लगाया जाता है। वैसे भी जयपुर स्थित जंतर-मंतर  भारत के सबसे बेहतरीन वेधशालाओं में से एक है। सवाई जयसिंह ने देश के अलग अलग स्थानों पर जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं का निर्माण करवाया। जयपुर के अलावा  उज्जैन, मथुरा, दिल्ली और वाराणसी में भी ऐसी ही वेधशाला का निर्माण करवाया था। इस कड़ी में पहली वेधशाला 1725 में दिल्ली में बनी। इसके 10 वर्ष बाद1734 में जयपुर में जंतर मंतर का निर्माण हुआ। इसके लगभग पंद्रह वर्ष बाद 1748 में मथुरा, उज्जैन और बनारस में भी ऐसी ही वेधशालाएं खड़ी की गईं। कहते हैं महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने जयपुर की वेधशाला का निर्माण करवाने से पहले विभिन्न देशों में अपने शांति दूत भेजे और वहां से खगोल शास्त्र पर उम्दा दर्जे की पांडुलिपियां मंगवाई, जिनसे उन्होंने खगोल विज्ञान को समझा। जंतर मंतर की टिकट जंतर-मंतर जयपुर में भारतीय एडल्ट्स  के लिए टिकट की कीमत 50 रुपए है और भारतीय स्टूडेंट के लिए 15 रुपए है। वही दूसरी तरफ विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट की कीमत ₹200 और फॉरेन स्टूडेंट के लिए 100 निर्धारित की गई है। जंतर-मंतर जयपुर के खुलने का समय जंतर-मंतर जयपुर के खुलने का समय सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक है। यह हफ्ते के सातों दिन खुला रहता है, और आप पूरे जंतर-मंतर को अच्छे से घंटे भर में देख सकते हैं। कौन सा समय जंतर-मंतर जाने के लिए उपयुक्त रहेगा किसी भी टूरिस्ट के लिए जंतर मंतर जाने का सबसे उपयुक्त समय दोपहर का है क्योंकि इस दौरान आप यहाँ मौजूद उपकरणों की कार्य प्रणाली को बेहतर समझ पाएंगे। सबसे बढ़िया है कि आप एक एक्सपर्ट गाइड की हेल्प लें। जंतर मंतर में स्थित यहाँ के उपकरण आपको एक पल के लिए बांध देने की क्षमता रखते हैं और जैसे ही आप इनकी बनावट देखोगे, इनकी खूबियां देखते ही रह जाओगे। यहाँ पर बहुत सारे उपकरण हैं जो आपको अलग-अलग ज्यामितीय आकारों के दिखाई देंगे। यही वो उम्दा उपकरण हैं जो जयपुर के जंतर मंतर को दुनिया के बेहतरीन वेधशालाओं में से एक बनाते हैं। सबसे पहले लेते हैं सम्राट यंत्र को इसके विशाल आकार के कारण ही इसे सम्राट यंत्र नाम दिया गया। 90 फीट की ऊंचाई वाला यह यंत्र जंतर मंतर का सबसे बड़ा यंत्र है। इस यंत्र के ऊपरी हिस्से में एक छतरी बनी हुई दिखाई देती है। यह उपकरण ग्रह-नक्षत्रों में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल व समय का पता लगाने के बनाया गया है। दिशा यंत्र जंतर मंतर के ठीक बीचो-बीच आपको दिखाई देगा वर्ग के आकार की समतल भूमि पर लाल पत्थर से बना दिशा यंत्र, जिसके केंद्र से चारों दिशाओं की ओर समकोण बनाए गए हैं। जैसा कि नाम से जाहिर हो रहा है इस यंत्र द्वारा दिशाओं का पता लगाया जाता है। दिखने में भले ही यह साधारण सा ही लगे लेकिन इस यंत्र का भी अपना विशेष महत्त्व है। जयप्रकाश यन्त्र आपको जानकार हैरानी होगी कि खगोल विद्या में माहिर महाराजा जयसिंह ने ही जय प्रकाश यंत्रों का आविष्कार किया। अपनी बनावट में बेजोड़ यह यंत्र कटोरे के आकार के दिखाई देते हैं। जंतर मंतर में ये यंत्र सम्राट यंत्र और दिशा यंत्र के बिलकुल बीचो बीच बनाये गए हैं। इन यंत्रों से सूर्य की किसी राशि में अवस्थिति का पता चलता है। ये दोनो यंत्र एक दुसरे के पूरक हैं। क्रांति वृत क्रांति यंत्र का प्रयोग सौर मंडल में दिन के वक्त सूरज के चिन्हों को देखने के लिए किया जाता है। इस बेहद उम्दा प्रकार के और दिखने में भी खूबसूरत से यंत्र को देखे बिना आपकी जंतर मंतर की यात्रा अधूरी ही समझिये। ध्रुव दर्शक यंत्र ध्रुवदर्शक यंत्र से ध्रुव तारे की स्थिति और दिशा ज्ञान के बारे में पता चलता है । उत्तर दक्षिण दिशा की ओर दीवारनुमा यह पट्टिका दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमश: उठी हुई है।अगर आप इसके दक्षिणी सिरे पर आँख टिका कर देखेंगे तो उत्तरी सिरे पर ध्रुव तारे की स्थिति बिलकुल स्पष्ट होगी। रामयंत्र राम यंत्र में स्तंभों के वृत्त के बीच केंद्र तक डिग्रियों के फलक दर्शाए गए हैं। इन फलकों से भी महत्वपूर्ण और जरुरी खगोलीय गणनाएं की जाती थीं। जंतर मंतर की पश्चिमी दीवार के पास स्थित राम यंत्र में आपको दो यंत्र दिखाई देंगे। इन यंत्रों के दो लघु रूप भी जंतर मंतर में इन्हीं यंत्रों के पास स्थित हैं। इसके अलावा आपको जयपुर के जंतर मंतर में अलग-अलग ज्यामितीय आकारों के  षष्ठांश यंत्र, नाड़ीवलय यंत्र, राशि वलय यंत्र और  चक्र यंत्र जैसे अन्य उम्दा और बेजोड़ यंत्र भी दिखाई देंगे। जंतर मंतर के ये उपकरण बेहद आकर्षक है और ये अपनी खूबी देखते ही बयान करते है। जब भी आप जयपुर के जंतर मंतर जाएँ एक बात का विशेष ख्याल रखें की जंतर मंतर जाने का सबसे उचित समय दोपहर का ही माना जाता है क्योंकि इस दौरान आप यहाँ मौजूद उपकरणों को न केवल बखूबी कार्य करते हुए देख पाऐंगे बल्कि  आप इनके कार्यों को उचित ढंग से समझ भी पाऐंगे। Some Glimpse of Jantar Mantar, Jaipur

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बापू बाजार -गुलाबी शहर जयपुर

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बापू बाजार -गुलाबी शहर जयपुर की सबसे पसंदीदा मार्किट by Pardeep Kumar गुलाबी शहर जयपुर अपनी रॉयल् लुक और अद्भुत महलों, स्मारकों के लिए जाना जाता है। लेकिन, इसी के साथ यहां मिलने वाले ट्रेडिशनल आइटम्स इसे एक बेहतरीन शॉपिंग डेस्टिनेशन बना देते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि जयपुर में कई ऐसी बड़ी-बड़ी मार्केट हैं जहां आपको बहुत सारी अलग-अलग वेरायटीज की चीजें बहुत ही उचित दामों पर मिल जायेंगी। अपनी जयपुर यात्रा के अगले पड़ाव के इस ब्लॉग में आज हम आपको बताएंगे ऐसे ही एक बेहद खास बाजार के बारे में – जयपुर शहर के केंद्र में, सांगानेर गेट और गुलाबी शहर के नए गेट के बीच, बापू बाजार जूते से लेकर हैंडीक्राफ्ट्स तक, आर्टिफीसियल जूलरी से लेकर पीतल के काम और कीमती पत्थरों तक की खरीदारी के लिए एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है, जहां आपको अपनी मनपसंद का हर एक सामान आसानी से मिल जाएगा। राजस्थान जिस चीज के लिए प्रसिद्ध है वह है इसकी जीवंतता और भव्यता। और अगर आप इसकी राजधानी जयपुर में घूमने के लिए आते हो तो आप बापू बाजार में शॉपिंग करके अपनी ट्रिप को यादगार बना सकते हो। बापू बाजार यहां मिलने वाली फेमस राजस्थानी आइटम्स जैसे कलाकृतियों, हैंडीक्राफ्ट, परम्परागत कपड़े और आर्टिफिशियल जूलरी के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। बापू बाजार स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के बीच भी अपने अट्रैक्शन के लिए खासी पहचान रखता है, जो इसे जयपुर सिटी के सबसे पसंदीदा मार्केट में से एक बनाता है। बापू बाजार चाहे कोई मिडल क्लास हो या रिच क्लास,  शॉपिंग के मामले में सबके लिए एकदम फिट बैठता है। कहा जाता है कि अगर आपको अच्छी तरह से बारगेनिंग करनी आती है तो आपको यहां हर चीज सही दामों में उपलब्ध हो जाएगी। यह पूरा बाजार भरा पड़ा है यहां मिलने वाले राजस्थान के कल्चरल आइटम से और यह उन लोगों के लिए एक परफेक्ट डेस्टिनेशन है जो कि पारंपरिक चीजें पहनना और रखना पसंद करते हैं। इस बाजार में कुछ चीजें हैं जो इसे एक खास बाजार बनाती है – मोजरी फुटवियर– पारंपरिक राजस्थानी फुटवियर को मोजरी कहा जाता है। मोजरी ज्यादातर चमड़े से बने होते हैं,  फुटवियर को विभिन्न पैटर्न और जीवंत रंगों के साथ खूबसूरती से डिजाइन और कढ़ाई की जाती है। बापू बाजार में मोजरी के जूते प्रामाणिक होने के साथ-साथ सस्ते भी हैं। आर्टफिशियल ज्यूलरी-  बापू बाजार में आपको आर्टिफिशियल जूलरी की जबर्दस्त वैरायटी मिल जायेंगी जिसमें गले के हार, झुमके, पायल, लाख (लाख के बर्तन) से बनी चूड़ियाँ और साथ ही रंगीन रेशम के धागों से बनी चूड़ियाँ शामिल हैं। यहाँ आपको इन सभी में हज़ारों डिज़ाइन मिल जायेंगे। राजस्थानी क्लोथ्स- अगर आपको राजस्थान में पारंपरिक बंधेज या टाई और डाई साड़ी या सूट  खरीदना है तो आपको यहां पर लहरिया, सांगानेरी प्रिंट से लेकर बाटिक प्रिंट तक बंधेज के पैटर्न और अलग-अलग डिजाइंस मिल जाएंगे। यहां के दुपट्टों और साड़ियों पर जीवंत और जटिल कढ़ाई के अलावा, उन पर सुंदर दर्पण का काम और गोटा-पट्टी का काम भी किया जाता है। जयपुरी रजाई–  जयपुरी रजाई अपने सॉफ्टनेस के लिए जानी जाती है। एक विशेष प्रकार के महीन सूती कपड़े से बनी जयपुरी रज़ाई हल्की होने के साथ-साथ गर्म और टिकाऊ होती है। रजाई को हाथ से बुनने के सदियों पुराने शिल्प के बाद, रजाई के कवर पर डिजाइन ब्लॉक प्रिंट किये जाते हैं। वे अपनी गर्माहट के साथ-साथ कपास की कोमलता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। हस्तशिल्प, शोपीस और सजावटी प्रोडक्ट्स – जयपुर के बापू बाजार में छोटी स्मारिका की दुकानों की कोई कमी नहीं है, यहाँ पर सड़क की दुकानें कलाकृतियों, पेन स्टैंड, कीचेन, मिरर वर्क वाली एक्सेसरीज से भरी पड़ी हैं। कठपुतली- कठपुतली शो और राजस्थानी परंपरा साथ-साथ चलती है। आमतौर पर, कठपुतली जीवंत रंग की प्रतीक होती हैं। आपको बापू बाजार में हर तरह की कठपुतलियाँ देखने को मिल जाएँगी। बापू बाजार में फ़ूड – जयपुर के बापू बाजार की गलियों से गुजरते समय दुकानों से आती हुई चाट की खुशबू से आप खुद को रोक नहीं पाएंगे। इसके अलावा फालूदा कुल्फी एक अन्य पसंदीदा स्थानीय व्यंजन है, जो दूध के साथ गुलाब की चाशनी के साथ मिलता है। इसके अलावा  सेंवई, मीठी तुलसी के बीजों का पारंपरिक मिश्रण भी यहां बेहद फेमस है। इसे अपनी पसंद की आइसक्रीम के स्कूप के साथ परोसा जाता है। बाजार का समय – बापू बाजार सप्ताह के सभी दिनों में सुबह 11  बजे से रात 10 बजे के बीच खुला रहता है। कौन-सा मौसम यहाँ आने के लिए सबसे बेहतर वैसे तो आप साल में किसी समय बापू बाजार आ सकते हैं, लेकिन नवंबर से मार्च के बीच सर्दियों के समय, दिन के ठंडे तापमान के कारण यहाँ शॉपिंग करना बेहतर माना जाता हैं। गर्मियां वास्तव में गर्म होती हैं और दिन में घूमना और खरीदारी करना मुश्किल हो जाता है। आप यहां सर्दियों में दिन में और गर्मियों के समय शाम में शॉपिंग कर सकते हैं। कैसे जाएँ बापू बाजार जयपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन से 4 किलोमीटर दूर है। आप कोई भी ऑटो रिक्शा किराए पर ले सकते है या कैब बुक करके भी यहां आसानी से पहुंच सकते हैं। इसके अलावा आप यहां पर किसी लोकल बस से भी आ सकते हैं।

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Masala Chowk – The Best Open Air Food Court In Jaipur

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मसाला चौक,जयपुर – फूड लवर्स के लिए खूबसूरत जगह By Pardeep Kumar खाने-पीने के मामले में देखा जाए तो पिंक सिटी जयपुर वास्तव में एक ऐसा शहर है जो कि बहुत फेमस है यहां के बेहद लजीज व्यंजनों के कारण, क्योंकि यहां के प्रसिद्ध व्यंजन, तरह-तरह की स्टाइल और तरह-तरह की चीजों से बने हुए होते हैं। इस रॉयल सिटी के लोग खाने के बहुत ही शौकीन माने जाते हैं और यह शहर फूड लवर्स के लिए खास मायने रखता है। अगर बात खाने से संबंधित हो तो जयपुर की खूबसूरत जगहों में से एक जगह है मसाला चौक जो कि खाने को लेकर अपनी वैरायटी के लिए और अपनी क्वालिटी के लिए बहुत ही मशहूर है। You can watch Masala Chowk Video @ our You Tube Vlog जयपुर की इस पसंदीदा फूड डेस्टिनेशन से तो आप परिचित ही होंगे और अगर नहीं है तो आइए आज 5 कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में आपको ले चलते हैं एक बेहतरीन फूड डेस्टिनेशन मसाला चौक की सैर पर, जहां की व्यंजनों की वैराइटीज को देखकर आप खुद को खाने से रोक नहीं पाएंगे। दरअसल किसी भी शहर में बहुत सारी पसंदीदा चीजों का एक साथ एक जगह पर मिलना बहुत ही मुश्किल हो जाता हैं। लेकिन जयपुर का मसाला चौक एक ऐसी जगह है जहां आपको सभी लोकप्रिय व्यंजन और स्ट्रीट फूड एक ही जगह पर आसानी से उपलब्ध हो जाएंगे। 2018 में अपने बनने के बाद सेआज तक, मसाला चौक ने हर खाने के शौकीन फिर चाहे वह जयपुर शहर का हो या फिर बाहर का कोई टूरिस्ट हर किसी के दिल पर शिद्दत से राज किया है। जयपुर के मसाला चौक की शुरुआत जयपुर के सभी प्रसिद्ध स्ट्रीट फूड को सिर्फ एक जगह पर लाने के उद्देश्य से हुई। यह एक ओपन-एयर फूड कोर्ट है जिसमें बैठने की अच्छी व्यवस्था है, जिसने इसे उन सभी लोगों के लिए एक टॉप हैंगआउट डेस्टिनेशन बना दिया है जो स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेना पसंद करते हैं। मसाला चौक तक कैसे पहुंचे मसाला चौक का पता लगाना बहुत आसान है। यह बहुत प्रसिद्ध स्मारक, अल्बर्ट हॉल म्यूजियम के ठीक पीछे राम निवास बाग में स्थित है। आप गूगल मैप्स की मदद से अल्बर्ट हॉल म्यूजियम तक पहुंच सकते हैं। अल्बर्ट हॉल के टिकट काउंटर से थोड़ा आगे साउथ की ओर बढ़ेंगे तो मसाला चौक आपके बायीं तरफ दिखाई देगा। यहां तक पहुंचने के लिए आप जयपुर बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से ऑटो या टैक्सी ले सकते हैं और यदि आपको चलना पसंद है तो आप पैदल यात्रा भी कर सकते हैं।Masala Chowk in Jaipur कार पार्किंग की व्यवस्था यहाँ आकर आप अपनी कार अल्बर्ट म्यूजियम की पार्किंग में पार्क कर सकते हैं।  मसाला चौक के बाहर भी रोड पर पार्किंग की लेन बनाई गई है।  बस ध्यान रहें जहाँ तक पार्किंग मार्क की गई है आप अपनी कार वहीँ तक पार्क करें अन्यथा नगर निगम की गाड़ी आपकी कार को उठा ले जाएगी और बेवजह आपको उसके लिए फिर एक नियत जुर्माना अदा करना पड़ेगा। अच्छे खासे रंग में भंग पड़ने की फिर पूरी संभावना भी रहेगी। मसाला चौक का समय जयपुर के इस मशहूर हैंगआउट का समय सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक है। भीड़ से बचने के लिए मसाला चौक जाने का सबसे अच्छा समय दिन के समय या शाम को होता है। प्रवेश शुल्क मसाला चौक के लिए प्रति व्यक्ति प्रवेश शुल्क के रूप में 10 रुपये लिए जाते हैं। मसाला चौक मेन्यू यहां कुल 21 स्टॉल है,  जो शहर के चारों ओर सबसे अच्छा स्ट्रीट फूड परोसते हैं। इन स्टॉल्स में से प्रमुख हैं -सम्राट, रामकृष्ण कलकट्टी चाटो, सोमिललाल रावत मिष्ठान भंडारी, गोपाल सिंह पटसी भंडारी, शंकर समोसा, सेठानी का ढाबा, भारतीय आइसक्रीम फालूदा, रमन डोसावाला, श्री झारखंड नाथ पोहा और चाटो, गुलाबजी चायवाला, दिल्ली चाट और कैफे, प्रेम प्रकाश समोसा, बहुत खूब!, भगत मिष्ठान भंडारी, ब्रिजवासी फालूदा केसर कुल्फी, पवना राजस्थानी व्यंजनी, जयपुरी चटकारा, घर पर आग, अंडेवालाज़ी, महावीर रबड़ी भंडारी, आइसक्रीम और शेक। Masala Chowk in Jaipur यहां के आउटलेट्स में चाट, आइसक्रीम, फालूदा, कुल्फी, समोसा, कचौरी, पोहा, चाय, राजस्थानी व्यंजन, पानी पुरी, मिठाई, दक्षिण भारतीय भोजन, मांसाहारी व्यंजन, अंडे के व्यंजन और कई तरह के फूड आइटम्स मिलते हैं।

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गोरखपुर के रामगढ़ ताल

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गोरखपुर के रामगढ़ ताल की विशालता किसी समुद्र के किनारे से कम नहीं उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में स्थित गोरखपुर, बाबा गोरखनाथ के नाम से देश भर में जाना-पहचाना जाता है। अगर गोरखपुर की बात की जाये तो यह जगह अनेक अध्यात्मिक, पुरातात्विक और  प्राकृतिक धरोहरों को अपने में समेटे हुए है।  प्रेमचन्द की कर्मभूमि, फिराक गोरखपुरी की जन्मभूमि, शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व चौरीचौरा आन्दोलन के शहीदों की शहादत स्थली के रुप मे गोरखपुर को पूर्वांचल के गौरव का प्रतीक माना जाता है। यात्राओं के अपने अद्भुत और खास सफर में फाइव कलर आफ ट्रेवल की टीम आज पहुंच चुकी है यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में। आज अपने इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे गोरखपुर के बेहद खूबसूरत रामगढ़ ताल के बारे में। एक समय था जब रामगढ़ ताल को कोई पूछता नहीं था, क्योंकि वहां पर ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं थी जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिल सके। मगर पिछले कुछ सालों में रामगढ़ ताल को पर्यटन की दृष्टि से डेवलप किया गया है, इस तरह संवारा गया है कि आज वह घूमने फिरने के लिए प्रसिद्ध जगह बन चुका है। पहले तो यहां पर केवल गोरखपुर के लोग ही जाया करते थे, मगर आज  इसके सौंदर्यीकरण किये के बाद  यहां दूर-दूर से लोग घूमने के लिए आते हैं। रामगढ़ ताल का इतिहास  इतिहासकार डॉ. राजबली पांडे के मुताबिक ईसा पूर्व छठी शताब्दी में गोरखपुर का नाम पहले कभी  रामग्राम था। यहां पर कोलिय गणराज्य स्थापित हुआ करता था। कोलिया गणराज्य वही गणराज्य है जो हमें गौतम बुध के समय में देखने को मिलता है उस समय की राप्ती नदी आज के रामगढ़ ताल से होकर गुजरती थी। कुछ समय पश्चात राप्ती नदी की दिशा बदलने की वजह से उसके कुछ अवशेष बच गए, जिससे रामगढ़ ताल अस्तित्व में आया। रामग्राम से ही इसका नाम रामगढ़ ताल पड़ा। दूसरी जनश्रुति यह भी है कि प्राचीन समय में इस ताल के स्थान पर एक बहुत बड़ा नगर हुआ करता था। एक राजा का अहंकार ले डूबा। यह नगर एक ऋषि के श्राप की वजह से जमीन में समा गया। जिस वजह से यह पूरा नगर ताल में तबदील हो गया, जिसे आज हम रामगढ़ ताल कहते हैं। यह जनश्रुति गोरखपुरियों से सुनने को बखुबी मिलती है। रामगढ़ ताल राप्ती नदी से महज कुछ मिनटों की दूरी पर स्थित है। जब आप ताल की विशालता देखोगे तो आपको यह नजारा किसी समुद्र के किनारे से कम नहीं लगेगा। रामगढ़ ताल के किनारे की सड़कें बिल्कुल साफ-सुथरी और ताल का किनारा देखने योग्य है। कहा जाता है कि आज तक ताल की गहराई को नापा नहीं जा सका है। शायद यही कारण होगा कि किसी को भी ताल के किनारे नहाते हुए नहीं देखा गया। यह ताल लगभग 18 किलोमीटर तक फैला हुआ है। ताल का किनारा तो बहुत पहले ही आरंभ हो जाता है। मगर ताल के किनारे बने पार्कनुमा जगह जिसे नौका विहार कहते हैं वहां पर जाने के लिए महज 500 मीटर का सफर तय करना होता है। पार्किंग की व्यवस्था  अगर आप बाइक से जा रहे हैं तो आपको स्टैंड पर गाड़ी खड़ी करने के लिए 10 रूपये देने होते हैं। अगर चार पहिया है तो उसके 20 रू लिए जाते हैं। स्टैंड पर गाड़ी खड़ी करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि गाड़ी चोरी होने का रिस्क नहीं रहता है जिस से बेफिक्र होकर हम सफर का आनंद ले सकते हैं। नौका विहार गाड़ी खड़ी करने के बाद जैसे ही नौका विहार की और प्रवेश करते हैं तो बड़ा सा बुध द्वार देखने को मिलता है। पार्कनुमा नौका विहार के अंदर  चहल-पहल इस तरह की थी मानो यहां पर कोई मेला लगा हुआ है। मगर ऐसा कोई भी मेला वहां पर नहीं लगा हुआ था, फिर भी वहां घूमने वालों की संख्या कम नहीं थी। इससे इस बात का अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि ताल की प्रसिद्धि और वहां की व्यवस्था लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। फेमिली और कपल्स के लिए सबसे बेस्ट जगह  आसपास लगे बाजार को देखकर ऐसा लग रहा था मानो ताल नहीं बाजार में घूमने  आये हो। वहां पर बैठने की व्यवस्था किसी पार्क से कम नहीं थी। कपल्स भी यहां पर घूमने के लिए आते हैं और कपल्स के लिए यह सबसे बेस्ट जगह भी है। कपल्स के लिए किसी भी तरह की रोक टोक नहीं है। स्पेशली यहां पर अधिकतर लोग फोटोशूट के लिए भी आते हैं। सेल्फी लेने वालों की संख्या कि कोई गिनती नहीं थी। बाजारों में मिल रहा समान बहुत ज्यादा महंगा नहीं है। आप 20 से 100 रूपये तक बहुत अच्छा समान खरीद सकते हैं। अगर किश्ती में घूमने का आनंद लेना चाहते हैं तो उसका भी मूल्य बहुत ज्यादा नहीं है, आप महज 60 से 100 रू के बीच में 15 या 20 मिनट तक बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। ठिठुरन पैदा करने वाली ठंड और खिलखिलाती धूप दोनों के मेलजोल ने शरीर में एनर्जी का लेवल इस कदर बढ़ाया हुआ था कि लोग वहां पर कई घंटों तक समय बिता रहे थे। घर से सुबह के निकले लोग शाम में वापसी कर रहे थे। लोग ठंड में धूप सेकने का आनंद भी ले रहे थे। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था वैसे-वैसे भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी और भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। हालांकि ताल के किनारे किसी भी तरह की कोरोना  गाइडलाइन को फॉलो नहीं किया जा रहा था, ना ही अधिकतर लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे थे।  बस वहां पर इक्का-दुक्का लोग ही मास्क पहने हुए दिख रहे थे। अभी ताल पर सौन्दर्यकरण का काम चल रहा है। जिससे उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में इसकी सुंदरता में और भी इजाफा होगा। यहाँ आने वाले पर्यटक इस ताल की खूबसूरती की तुलना मुंबई के मरीन ड्राइव और जुहू चौपाटी से करते हैं। यहां से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर आपको सबसे पहले बौद्ध संग्रहालय और चिड़ियाघर देखने को मिल जाएगा। अगर आप गोरखपुर घूमने का प्लान बना रहे हैं या गोरखपुर के पास से गुजर रहे हैं या गोरखपुर के आस-पास रहते

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Fatehpur Sikri

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Fatehpur Sikri – ऐतिहासिक शहर फतेहपुर सीकरी में देखने के लिए बहुत कुछ है खास by Pardeep Kumar भारतीय सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। राजा, नवाबों और यहां के दूसरे शासकों ने यहां एक से एक बेहतरीन महल बनवाए, इमारतें बनवाई और आलीशान किले बनवाए और कुछ राजा ऐसे भी हुए जिन्होंने पूरे शहर बसाये। ये शहर और उनमें स्थित ऐतिहासिक इमारतें कई राजवंशों के उत्थान और पतन के जीते-जागते उदाहरण हैं। और उन्हीं उदाहरणों में से एक है फतेहपुर सीकरी। आज के इस ब्लॉग में हम आपको बता रहें हैं फतेहपुर सीकरी शहर के बारे में। you can watch Fatehpur sikri fort video with all information on Five Colors of Travel Vlog यह शहर आगरा से लगभग 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आगरा तक आप अपने बजट के अनुसार किसी भी मार्ग का चुनाव कर सकते हैं। आगरा शहर बड़े-बड़े शहरों से हवाई मार्ग, रेलवे लाइंस और नेशनल हाईवे से जुड़ा हुआ है। आगरा से फतेहपुर सीकरी का सफर आप किसी स्थानीय बस, टैक्सी या कैब से भी कर सकते हैं। जानिए फतेहपुर सीकरी का इतिहास मुगल सम्राट अकबर ने 1569 में शहर की स्थापना की और 1571 से 1585 तक इसे अपनी राजधानी बनाया। शहर के निर्माण में लगभग 15 साल लगे जहां अदालतों, महलों, मस्जिदों और अन्य संरचनाओं का निर्माण किया गया। पहले इसका नाम फतेहाबाद था जहां फतेह का मतलब जीत होता है। बाद में इसका नाम बदलकर फतेहपुर सीकरी कर दिया गया। यहां उनके दरबारियों से नौ रत्नों का चयन किया गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें फतेहपुर और सीकरी दो अलग-अलग जगह हैं। फतेहपुर में आपको बुलंद दरवाज़ा, शैख़ सलीम चिश्ती की दरगाह और जामा मस्जिद जैसी खूबसूरत जगह देखने को मिलेंगी। वहीं सीकरी अकबर का किला था जिसमें अकबर लगभग पंद्रह वर्षों तक रहा। यही वह जगह है जहाँ अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की बुनियाद रखी। लेकिन पानी की भारी किल्लत के कारण अकबर ने फतेहपुर सीकरी को छोड़कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया। अकबर ने चित्तौड़ और रणथंभौर को जीतकर 1569 में शहर की स्थापना की थी। शहर का निर्माण लगभग 15 वर्षों में पूरा हुआ और इसमें महल, हरम, कोर्ट और अन्य संरचनाएं शामिल थीं। आप देखेंगे कि शहर में इमारतों का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया था। शाही महल के मंडप ज्यामितीय रूप से अरब वास्तुकला से बनाये गए  हैं। पानी की कमी और मुगलों और राजपूतों के बीच लगातार युद्धों के कारण अकबर ने यह शहर छोड़ दिया। फतेहपुर सीकरी तीन तरफ से दीवार और चौथी तरफ से एक झील से घिरा हुआ है। इमारतों की वास्तुकला मुगल और भारतीय खासकर हिंदू और जैन वास्तुकला पर आधारित थी। यहां कई उम्दा और खूबसूरत संरचनाएं जैसे मस्जिद, महल, मकबरे आदि हैं, जिन्हें टूरिस्ट देख सकते हैं। उनमें से कुछ के नाम हैं – बुलंद दरवाजा, जामा मस्जिद, इबादत खाना, जमात खाना, सलीम चिश्ती का मकबरा, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जोधा बाई पैलेस, पंच महल, बीरबल का घर, अनूप तलाओ, हुजरा-ए-अनूप तलाओ, नौबत खाना, पचीसी कोर्ट। जब भी आप यहाँ घूमने आएं, अगर आप कपल्स हैं तब एक बात का अवश्य ख्याल रखिये शहर में एंट्री करते ही यहाँ के कुछ लोग आपको गाइड के रूप में बार्गेनिंग करते मिल जायेंगे, जो आपको अलग-अलग तरीके से चादर या कुछ अन्य चीजें खरीदने के लिए ठगने का प्रयास करेंगे। इन सबसे बचने के एक ही तरीका है आप सिर्फ ऑथोराइजड गाइड से बात करें। जोधा बाई पैलेस आप जैसे ही किले में एंट्री करेंगे बाईं तरफ आपको सबसे पहले जोधा बाई का महल दिखाई देगा। जोधा बाई का यह महल  रानीवास और जेनानी द्योढ़ी के नाम से भी जाना जाता है। महल विशाल है और दो मंजिला है।  महल का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में स्थित है और बहुत ही शानदार है। वैसे तो यह महल अकबर का हरम था जिसमें अकबर अपनी शाही बेगमों के साथ रहता था लेकिन  महल के निर्माण में प्रयुक्त हिंदू रूपांकनों से पता चलता है कि महल एक हिंदू महिला के लिए बनाया गया था। इसलिए शायद इसे जोधा बाई का महल समझा गया। इस शानदार इमारत निर्माण में  नीले  रंग के टाइलों का प्रयोग किया गया था, जो कि मुल्तान से लाये गये थे। फ़तेहपुर सीकरी में जितने भी भवन थे उन भवनों के आकार में यह महल सबसे बड़ा है। अकबर ने जोधाबाई को ही मरियम-उज्जमानी का नाम दिया था। जहांगीर जोधा बाई के बेटा था। जोधा बाई का यह महल गर्मी और सर्दी दोनों मौसमों के अनुकूल बनाया गया था। पंच महल पंच महल का निर्माण अकबर ने करवाया था। महल महिलाओं के हरम के पास था और इसे इस तरह से बनाया गया है कि यह गर्मियों के दौरान आराम प्रदान करता है। पंच महल एक पांच मंजिला महलनुमा संरचना है जिसमें हर मंजिल धीरे-धीरे आकार में घटती जाती  है। नीचे से ऊपर की ओर जाने पर प्रत्येक मंजिल दूसरी से छोटी होती है।  प्रत्येक स्तंभ में एक जाली थी जहां से महिलाएं शहर में होने वाली घटनाओं को आसानी से देख सकती थी। इसमें कुल 176 स्तंभ हैं। बीरबल का महल बीरबल न केवल अकबर के नौ रत्नों में से एक था और बल्कि उसके सब मंत्रियों में सबसे खास भी था। इसलिए बादशाह अकबर ने बीरबल के लिए महल बनवाया। यह महल अकबर की बड़ी रानियों- रुकैया बेगम तथा सलमा बेगम का निवास स्थान के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। यह दो मंजिला महल मुगल और फारसी वास्तुकला के आधार पर बनाया गया था। खास महल देखने में बेहद सुन्दर यह खास महल मुगल बादशाह अकबर का महल था। भूतल में दो कमरे हैं और पहली मंजिल में ख्वाबगाह है। भूतल के एक कमरे का उपयोग भोजन कक्ष के रूप में और दूसरे का उपयोग पुस्तकालय के रूप में किया जाता था। एक झरोखा है जहां से अकबर आम जनता से संपर्क करता था। ख्वाबगाह महिलाओं के हरम से जुड़ा था और जाली से ढका हुआ था। इसी ख्वाबगाह के सामने अनूप तालाब भी बना है। यहाँ की छते अन्य महलों के अपेक्षाकृत नीची हैं। अनूप तलाब अनूप तलाव ख्वाबगाह के सामने बना एक तालाब है। टैंक लाल