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Best Places & Best Timings to Visit in Udaipur

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Udaipur Trip: झीलों का शहर- उदयपुर by Pardeep Kumar लॉकडाउन से पहले उदयपुर का प्रोग्राम बना। अक्टूबर का महीना और झीलों का शहर, ऐसे जैसे किसी सपने का सच हो जाना। क्योंकि कई बार एक शहर सिर्फ शहर नही होता बल्कि आपकी ज़िंदगी का एक अहम् ठहराव बन जाता है, आपके जज़्बातों का, ख्यालों का और दिल के धड़कने का ज़रिया बन जाता है। उदयपुर उन्ही शहरों में से एक है जिनके ख़्वाब देख कर मैं बड़ा हुआ। महाराजा उदय सिंह का बसाया उदयपुर शहर यकीनन राजा-महाराजाओं की विरासत का सबसे खूबसूरत प्रमाण है। अपनी इसी ख़ूबसूरती के कारण उदयपुर आज भी फ़िल्मी दुनिया के तमाम निर्माता-निर्देशकों की पहली पसंद है।(Udaipur) लेक व्यू होटल हम दिल्ली से उदयपुर ट्रैन से पहुंचे। टैक्सी ली और चल पड़े अपने होटल की और। हालांकि होटल पहले ही बुक कर दिया था लेकिन फिर भी किस्मत से होटल मिला उदयपुर के बेहद खास मंदिर जगदीश टेम्पल के बिलकुल पास में। और इतने पास में की होटल के रूम से मंदिर साफ़ दिखाई दे रहा था। पुराने उदयपुर शहर और लाल घाट के पास। सामने दूर तक फैली हुई पिछौला झील के पानी में चमकता सिटी पैलेस बस होटल के पैसे वसूल करवा रहा था। उदयपुर में लेक व्यू होटल लेने का ये सबसे बड़ा फ़ायदा है। एक बात आप अवश्य ध्यान रखिये की जब भी उदयपुर का ट्रिप बने होटल आप लेक व्यू देखकर ही बुक करें। रूफ टॉप पर शाम की चाय हो और सामने नीली झील को निहारने का अवसर। यकीन मानिये आपका पूरा टूर शानदार बन जायेगा। देश के सबसे रोमांटिक शहरों में से एक- उदयपुर वैसे उदयपुर देश के सबसे रोमांटिक शहरों में से एक है। जहां देखों वहीं पानी से लबालब झीलें गर्मियों में भी ठंडक का अहसास कराती हैं और ये तो फिर भी अक्टूबर का महीना था। दिन में ठीक-ठाक गमी थी, लेकिन रात थोड़ा-थोड़ा सर्दी का अहसास दे रही थी। दिन में, शहर में सड़कों पर ट्रैफिक और भीड़-भाड़ न के बराबर, इसलिए ज्यादा तपिश महसूस नही होती। वैसे उदयपुर में महल, हवेली, मंदिर , बाग और म्यूजियम हर चीज की भरमार है लेकिन जो एक चीज इसे दूसरे शहरों से जुदा करती है वो है चारों ओर झीलें ही झीलें- मानो जन्नत के बेइंतहां नजारे! यहां घूमने और देखने योग्य चार झीलें हैं -पिछौला लेक, फ़तेह सागर, उदय सागर और रंग सागर। चारों झीलें एक नहर से आपस में जुड़ी हैं। सिटी पैलेस की दीवार से सटकर पिछौला लेक है। और दूध तलाई नाम की झील पास ही है। किसी जमाने में यहां दूध बिकता था और आज पूजा-अर्चना होती है।(Udaipur) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर लम्बे सफ़र के बाद हम दिल्ली से उदयपुर ट्रैन से पहुंचे थे और वो भी सुबह-सुबह के वक़्त। इसलिए वक़्त का तकाज़ा था कि थोड़ा आराम कर लिया जाए। दो-तीन घटे आराम करने के बाद हमने होटल में ही चाय-नाश्ता किया। राजस्थान में हों और नाश्ते में पोहा न खाएं तो बस ये तो फिर राजस्थानी खान-पान के साथ एक तरह से ज्यादती है। आप राजस्थान के किसी भी शहर में चले जाएं, पोहा आपको हर जगह आसानी से मिल ही जाएगा। वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। बहुत से पर्यटक यहाँ मानसून में आना पसंद करते हैं। बारिशों में यहाँ झील का दीदार करना बेहद सुखद अनुभव है। आप जब भी किसी टूरिस्ट जगह पर घूमने जाएं तो बेहतर यही होता है की अच्छे से घूमने की प्लानिंग करें ताकि इत्मीनान से सभी जगह दखने का, खाने-पीने का, खरीददारी करने का सही ढ़ंग से लुत्फ़ उठा सकें। सो हमने उदयपुर घूमने का एक शेड्यूल बनाया और उसी के अनुसार निकल पड़े, सबसे पहले फ़तेह सागर झील के पास स्थित सहेलियों की बाड़ी। Best Place to Visit in Udaipur-सहेलियों की बाड़ी देश के मशहूर बागों में शुमार सहेलियों की बाड़ी नाम का यह सुन्दर बाग हरियाली और झर-झर बहते फव्वारों के लिए खूब जाना जाता है। इस बाग़ की खूबसूरती के कारण न जाने कितनी ही फिल्मों के बेहतरीन गीत यहाँ फिल्माए जा चुके हैं। बताते हैं कि इसे महाराणा संग्राम सिंह (द्वितीय) ने 1710 से 1734 के बीच राज परिवार की महिलाओं के सैरगाह के लिए बनवाया था। इसीलिए इसका नाम सहेलियों की बाड़ी रखा गया।     बाग के कई भाग हैं जिनके बेहद खूबसूरत नाम भी रखे गए हैं जैसे- सावन भादो, हाथी फव्वारें, बिन बादल बरसात और रास लीला आदि। बताते हैं कि पहले फ़तेह सागर झील के करीब छोटे-छोटे बहुत सारे बाग़-बगीचे थे। इन्हें महाराणा फ़तेह सिंह ने सहेलियों की बाड़ी में मिलाकर शानदार और भव्य रूप दे दिया। हमने बाग़ की सुंदरता का खूब आनंद लिया और तकरीबन दो घंटे से भी ज्यादा का समय यहाँ बिताया, बाग़ में बने सुन्दर-सुन्दर हाथियों और माहौल को खुशनुमा बना रहे फव्वारों के साथ खूब सारे फोटो लिए, वीडियो बनाई। आखिर यादें ही तो हैं जिनकों संजो कर रखा जा सकता है। इसलिए आप उदयपुर आये और इस बाग़ को न देखा तो समझ लीजिये आप जन्नत के एक लाज़वाब टुकड़े के दीदार से महरूम रह गए। अगले पड़ाव की तरफ बढ़ते तब तक भूख ने शोर मचाना शुरू कर दिया था। सो सहेलियों की बाड़ी के पास ही बड़ा बाजार है जहां बहुत सारे छोटे-बड़े भोजनालय आपको आसानी से मिल जायेंगे। लेकिन हमने दोपहर के भोजन में राजस्थानी थाली को तवज्जो दी। भारत में किसी भी शहर में घूमने का सीधा मतलब होता है अच्छे दृश्यों के साथ-साथ उस जगह के खाने की चीजों के स्वाद लेना। क्योंकि जब भी आप कहीं घूमने जाए अगर खाना वहां का स्पेशल न हो तो फिर आप शायद खाने के शौक़ीन नही हैं। थाली में राजस्थान का पारम्परिक भोजन दाल-चूरमा-बाटी के साथ लहसुन मिर्च की चटनी और तीखी सब्जियों के साथ तवे की रोटी सच में अद्भुत संजोग था। खाना अच्छा लगा इसलिए खूब खाया। दोपहर के भोजन के बाद हम शेड्यूल के हिसाब से चल पड़े सिटी पैलेस देखने। सिटी पैलेस देखने का समय सुबह 9 से शाम 5 बजे तक है। सिटी पैलेस में

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Best Places to visit in Amritsar

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अमृतसर- आस्था और सुकून का शहर मुझे जब भी अपने व्यस्त शेड्यूल में या रोज़मर्रा की ज़िंदगी में थोड़े सुकून के पल चाहिए होते हैं तब अनायास ही यात्रा का ख्याल आता है। जब कभी ऐसा लगता है कि इस तनावपूर्ण और भागदौड़ भरी ज़िंदगी से थोड़ी निजात चाहिए तब मेरे पास अंतिम विकल्प यात्रा का ही बचता है। इस बार कार्यक्रम बना अमृतसर का। वो भी प्रसिद्ध त्यौहार बैसाखी के अगले दिन। कैसे पहुंचे अमृतसर बैसाखी के त्यौहार की शुरुआत भारत के पंजाब राज्य से ही हुई है और इसे रबी की फसल की कटाई शुरू होने की ख़ुशी के रूप में मनाया जाता है। बैसाखी के दिन गोल्डन टेम्पल को जगमगाती लाइटों से सजाया जाता है। देश भर से सिख श्रद्धालु इस दिन अमृतसर पहुँचते हैं। बैसाखी से अगले दिन जाने का फायदा ये हुआ कि भीड़ इतनी नहीं थी। वैसे अमृतसर घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च ही रहता है। हम हिसार से अमृतसर ट्रैन से पहुंचे। स्टेशन से उतरते ही बाहर फ्री बस सेवा का भी इंतेज़ाम रहता है जो ‘सतनाम वाहेगुरु’ के जयकारें लगाते हुए सीधे गोल्डन टेम्पल ले जाती है। गुरूद्वारे पहुँचते-पहुँचते रात के 11 बज चुके थे। हमनें अंदर परिसर में ही स्थित गंगा निवास में वातानुकूलित रूम बुक करवाया था। भले ही अप्रैल के महीने में ठीक-ठाक गर्मी होती है पर अंदर परिसर में ठंडक थी। थोड़ा आराम करने के बाद जैसे ही हमनें हरमंदिर साहिब में कदम रखा एक हमें अलग ही वातावरण की अनुभूति हुई। और लगा जैसे यहाँ आना पूरी तरह सार्थक हो गया। मेन हाल में दर्शन के लिए लम्बी-लम्बी लाइनें लगी हुयी थी। सुबह तड़के पालकी के दर्शन किये। दर्शन के लिए भले ही भीड़ कितनी ही क्यों न हो पर थकान जरा-सी भी नहीं होती, बस यही खासियत है यहाँ की। परमात्मा एक है और वो सब जगह मौज़ूद है। एक औंकार, सतनाम करता पुरख निरभउ निरवैर…… गोल्डन टेम्पल में दिन रात शब्द कीर्तन और गुरुबाणी चलती रहती है जो दुनिया की भाग दौड़ से थके हारे मन को रूहानी सुकून देती है। अद्भुत और अलौकिक गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार है जो इस बात के प्रतीक हैं की यहाँ के दरवाज़े हर धर्म के लोगो के लिए खुले हैं। रात में जगमगाती रौशनी में संगमरमर और सोने के आवरण से बना यह गुरुद्वारा अद्भुत और अलौकिक लगता है। अंदर परिसर में ही दुनिया की सबसे बड़ी रसोई में से एक गुरु के लंगर में रोज़ाना हज़ारों लोग प्रशाद रूप में भोजन ग्रहण करते है। इतनी बेहतरीन व्यवस्था, इतना स्वाद और इतना अपनापन। सच में अद्भुत। इसी कारण कहते हैं अमृतसर में कोई भूखा नहीं सोता। पवित्र जल के तालाब के बीचों-बीच गुरुद्वारा साहिब है व चारों तरफ बड़ा-सा प्रांगण है। जहाँ आपको सैंकड़ों श्रद्धालु सिमरन करते मिल जायेंगे। गुरूद्वारे में एक भव्य म्यूजियम भी है जहां सिख धर्म से जुडी ऐतिहासिक चीज़ें रखी गयी है। गुरुओं की देन- अमृतसर शहर वैसे तो अमृतसर को देश विदेश में सब जानते हैं लेकिन दरबार साहिब (गोल्डन टेम्पल ) इस शहर की लाइफ लाइन है। पूरा अमृतसर शहर गोल्डन टेम्पल के इर्द गिर्द ही बसा हुआ है। अमृतसर शहर गुरुओं की देन माना जाता है। चौथे गुरु रामदास जी ने पांच सौ बीघा जमीन लेकर यह शहर बसाया था। तभी इसका नाम पड़ा रामदासपुर। महाराज रंजीत सिंह ने हरमिंदर साहिब पर उन्नीसवीं शताब्दी में सोने का आवरण चढ़वाया था और तब से अमृतसर को स्वर्ण नगरी भी कहा जाने लगा। एक शहर के तौर पर देखें तो यह सिर्फ अपने गुरुद्वारों के लिए प्रसिद्ध नहीं है बल्कि कौमी एकता का एक बेहतरीन उदाहरण भी है – यहाँ जहां एक तरफ बेहद खूबसूरत दुर्गियाना मंदिर है वहीँ आज़ादी की लड़ाई की गवाह दिल्ली की जामा मस्जिद जैसी दिखती खैरउद्दीन मस्जिद भी है। जहाँ हज़ारों लोग इबादत के लिए आते हैं।(Golden Temple, Amritsar) वाघा बॉर्डर अमृतसर शहर से 30-32 किलोमीटर एकऔर डेस्टिनेशन है वाघा बॉर्डर। यहाँ पर रोज़ शाम को दोनों देशों के सिपाहियों द्वारा बहुत ही जोशीले ढंग से अपने-अपने राष्ट्रीय ध्वज को वापिस उतरा जाता है। इस दौरान देशभक्ति का ऐसा रंग चढ़ जाता है जिसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं। यहाँ की ये जोशीली परेड देखने के लिए आपको समय से पहले ही जाना पड़ता है वरना भीड़ इतनी हो जाती है कि वहां पर खड़े होने की भी जगह नसीब नहीं होती। जलियावालां बाग अमृतसर में ही भारत की आज़ादी के इतिहास का साक्षी प्रसिद्ध जलियावालां बाग भी है। आज जलियावालां बाग एक पर्यटक स्थल बन गया है और रोजाना हजारों सैलानी इसे देखने आते हैं। यहाँ की दीवार पर आज भी उन गोलियों के निशान मौज़ूद हैं जो जनरल डायर ने निहत्थी भीड़ पर चलवाई थी जिसमे हज़ारों लोग मारे गए थे। अमृतसर शहर के पुराने बाजार आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जैसे किसी ज़माने में हुआ करते थे। आप शाम के समय पैदल ही बाजार की सैर पर निकल सकते हैं। भीड़-भाड़ वाले ये बाजार एक बार तो आपको चांदनी चौक की याद दिला देंगे। अगर आप खाने के शौकीन हैं तो अमृतसर आपके लिए किसी जन्नत से कम नहीं होगा। अमृतसर लस्सी, छोले भटूरे, राजमा चावल और पिन्नी का स्वाद पूरी दुनिया में मशहूर है। बात चाहे धार्मिक आस्था की हो, इतिहास की हो, संस्कृति की या फिर खानपान की, अमृतसर का कोई सानी नहीं।

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Qutub Minar Delhi – World Heritage Site

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Qutub Minar: कुतुब मीनार नहीं देखा तो दिल्ली दर्शन अधूरा है सुनहरें लफ़्ज़ों का इतिहास आज भी तेरे हर पत्थर, तेरी हर दीवार पर है जो ख़ूबसूरती उस ज़माने में थी वही क़ातिलाना अदा आज क़ुतुब मीनार पर है। वैसे तो पूरी दिल्ली ही देखने के लिहाज़ से बहुत खास है पर इसकी कुछ नायाब इमारतों को देखे बिना दिल्ली दर्शन अधूरा है। क़ुतुब मीनार इन्हीं खास और नायाब जगहों में से एक है। इस बात में कोई शक नहीं कि मुगलों ने दिल्ली को खूबसूरत बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। शायद इसी का परिणाम है  दिल्ली चारों दिशाओं से बेहद खूबसूरत मुगल इमारतों से सजी हुई है। आज अपने दिल्ली दर्शन में हम निकले हैं क़ुतुब मीनार के दीदार पर। कैसे पहुंचे क़ुतुब मीनार लॉकडाउन के बाद से ही दिल्ली में मेट्रो सेवा कई जगहों पर बदहाल है, मेट्रो स्टेशन के बाहर लम्बी-लम्बी लाइन्स आसानी से देखने को मिल जाएँगी। इसलिए हमें इन सब से बचते हुए  डीटीसी बस यात्रा का आनंद लेना ही मुनासिब लगा। एक लंबी बस यात्रा के बाद हम पहुंचे क़ुतुब मीनार। लेकिन अगर आप मेट्रो से आते हैं तो यहाँ का मेट्रो स्टेशन है क़ुतुब मीनार। सड़क के एक तरफ कुतुब मीनार परिसर है तो दूसरी तरफ टिकट घर। 40 रुपये का टिकट लिया और उत्सुकतावश अपने कदम तेजी से बढ़ा दिए क़ुतुब मीनार की तरफ। भीड़ ठीक-ठाक ही थी, क्योंकि किसी भी ऐतिहासिक इमारत में चहल-पहल के बिना हमारी  दिल्ली अधूरी है जनाब। आपको कुतुबमीनार के परिसर में जहाँ एक तरफ युवा अलग-अलग पोज़ में फोटोशूट करते दिख जायेंगे वहीँ, परिवार के साथ आने वालों के लिए भी यह एक बेहतरीन यादगार जगह है। वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। इन दिनों में जो एक चीज आप सभी पर्यटन स्थलों पर सबसे ज्यादा मिस करेंगे वो है विदेशी सैलानी। कोविड महामारी के कारण विदेशी सैलानियों की कमी महसूस हुई और उनके साथ इतिहास का बखान करने वाले ट्यूरिस्ट गाइड भी मीनार में दूर-दूर तक नज़र नहीं आए। बस सब समय का खेल है, उम्मीद करते हैं जल्द ही सब पहले जैसा हो। काली गुबंद वाली मस्जिद पूरा कुतुब मीनार परिसर 13 अलग-अलग व्यूपोइंट्स में बंटा हुआ है। हम में से ज्यादातर लोग मुख्य कुतुब मीनार और लौह स्तम्भ से ही वाकिफ़ हैं पर और भी बहुत कुछ है अपनी नक़्क़ाशी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध क़ुतुबमीनार के इस परिसर में। परिसर में घुसते ही सबसे पहले नजर आती है काली गुबंद वाली मस्जिद। अंदर आते ही सबसे पहले इस मस्जिद पर ही नजर पड़ती है। आगे बढ़ने पर विशिष्ट मुगल शैली के बगीचें दिखाई देते हैं  जो कि मुगलों की प्रसिद्ध चार बाग की शैली में बने हैं। ये चार बाग शैली किसी भी इमारत में जान डाल देती है। प्रसिद्ध मुगल इमारतों में बागों की इसी शैली का प्रयोग किया जाना आम बात है। मीनार के पास मण्डप जैसी दिखने वाली संरचना को कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद कहा जाता है। ये जानकारी पास लगे सूचना बोर्ड से ही मिली अन्यथा हम तो इसे एक सामान्य मण्डप भर समझ रहे थे। इस मस्जिद की स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1190 के दशक में की थी। इस मस्जिद की खासियत इसकी स्थापत्य कला है। इंडो इस्लामिक शैली से बनी ये मस्जिद और इसकी नक्काशी एक बार तो आपको दीवाना ही बना देगी। नक्काशीदार स्तंभो पर खड़ी यह मस्जिद बनावट के मामले में बेहतरीन है। अगर यूं कहें कि कुतुब मीनार परिसर की शोभा बढ़ाने में इस मस्जिद का भी अमूल्य योगदान है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। अलाई मीनार आप जैसे-जैसे परिसर में आगे बढ़ते जायेंगे वैसे ही अद्भुत स्थापत्य कला के मुरीद बनते चले जायेंगे। आगे दिखी अजीब-सी बेढ़ंगी चट्टान जैसी दिखने वाली एक इमारत। पास पहुंच कर पता चला ये है अलाई मीनार। जी, ये वही मीनार है जिसे दिल्ली के बाद के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने बनाने की कोशिश की थी। ये खिलजी के अधूरे सपने जैसा है। खिलजी कुतुबमीनार से भी ऊंची इमारत बनाना चाहता था पर किसी कारणवश ये सपना अधूरा ही रह गया। इल्तुतमिश का मकबरा अलाई मीनार से आगे बढ़कर परिसर में एक सफेद और लाल बलुआ पत्थर से बना मकबरा नजर आ रहा था। ये वही मकबरा था जिसमें दिल्ली के दूसरे शासक इल्तुतमिश को दफनाया गया था। ये मकबरा कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद के ठीक पीछे ही है। मकबरा अपनी इस्लामिक बनावट के कारण अलग ही नजर आ रहा था। इसकी खूबसूरती को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल था कि ये एक कब्र है। किसी शाही महल जैसी इसकी बनावट वास्तव में अद्भुत है। बीच-बीच में बने सफेद मेहराब और खुली छत इसे और भी आकर्षक बनाते हैं। इसी के ठीक सामने अलाउद्दीन खिलजी का मदरसा है, जिसे शायद खिलजी ने अपनी छाप छोड़ने के लिए बनवाया था। मेहराबों के समूह जैसा दिखने वाला ये मदरसा शिक्षा का केंद्र रहा होगा, जिसमें छात्रों के लिए कमरें और पुस्तकालय हुआ करते थे। मदरसे का परिसर काफी विशाल है। मार्ग में आगे प्रेमी जोड़े तस्वीरें खिंचवाते दिखे। विचार आया इन्हें इस परिसर के इतिहास से क्या ही लेना देना। इनके लिए ये अब सिर्फ क्वालिटी टाइम बिताने का एक ठिकाना भर है। लौह स्तम्भ परिसर का बारीकी से मुआयना करते हुए हम कुतुब मीनार पास ही स्थित लौह स्तम्भ के करीब पहुंचे। बचपन में अपनी किसी किताब में इस लौह-स्तम्भ का जिक्र पढ़ा था। जो कहता था कि इस स्तम्भ को पीठ के बल खड़े होकर दोनों हाथों से गले लगा सकने वाला व्यक्ति भाग्यशाली होता है। इच्छा मेरी भी थी इस किंवदंती को एक बार आजमाने की। दुर्भाग्य से अब लौह स्तम्भ के चारों तरफ ग्रिल लगा दी गई है ताकि पर्यटक उसके पास न पंहुचे। शायद  अब स्तम्भ को देखना भर ही हमारे भाग्य में था। खैर, इसकी वैज्ञानिक खासियत को जान लेना भी जरूरी है। 550 ईस्वी से भी पहले का ये स्तम्भ आज भी अपने पौराणिक रूप में जस का तस है। आज भी जंग का एक कतरा इस स्तम्भ को छू तक नहीं पाया। स्तम्भ पर संस्कृत के शिलालेख उकेरे हुए हैं। स्तम्भ कुल 7.2

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Taj Mahal-One of Seven Wonders

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Taj Mahal: मोहब्बत और तहज़ीब की अनोखी विरासत – ताज महल by Pardeep Kumar दुनिया में कितनी ही अनगिनत जगह हैं जिन्हें ज़िंदग़ी में एक बार देख लेना भी किसी सपने के मुक़्क़मल होने से कम नहीं लगता। ऐसी ही नायाब जगहों में से एक है ताज महल।(Taj mahal) देश की राजधानी से मात्र 234 किलोमीटर की दूरी पर बसा आगरा शहर न केवल ऐतिहासिक है बल्कि सदैव देश की सियासत का अहम् केंद्र भी रहा है। और आगरा को दुनिया भर में शौहरत दिलाने का काम किया है ताजमहल ने। जब  माँ बाप अपने बच्चों के नाम से जाने जाएँ तब उन्हें बेहद सुखद अहसास होता है और ऐसे ही ताजमहल के नाम से अपनी विशेष पहचान बनाने में निसंदेह आगरा फ़क़्र महसूस करता होगा। दरअसल जब भी हम कहीं घूमने का कार्यक्रम बनाते हैं तो ज़हन में सबसे पहले नाम आता है, ताजमहल। इक़लौती ऐसी कविता जिसे संगमरमर से तराशा गया है। जिसका ऑरा कुछ ऐसा है कि सामने पाकर भी विश्वास कर पाना मुश्क़िल लगता है। बात कुछ ऐसी थी कि एक शाम जब परिवार के साथ बैठकर चाय का लुत्फ़ उठाया जा रहा था तो ख़्याल आया क्यूं न कहीं घूमने जाया जाए। आमतौर पर मध्यवर्गीय परिवारों में थोड़ा क्वालिटी टाइम बिताने के लिए ही हम कहीं आउट ऑफ़ स्टेशन जाते हैं। किसी ने सुझाया ताजमहल। तो इस सुझाव को फाइनल होने में जरा भी समय नहीं लगा। बस फिर क्या, यहीं से जाने की तैयारियां शुरू हुई और क्योंकि सफ़र लंबा था तो यकीनन मज़ा भी बहुत आने वाला था। खाने-पीने की चीज़ें सबसे पहले पैक की गई, साथ ही चाय का एक बड़ा थर्मस। यूं तो रास्ते में ढ़ेरों ढ़ाबों ने रूकने का इशारा दिया लेकिन जब रास्ता इतना आरामदायक हो तो कहां कहीं रूकने का दिल करता है। बस तमाम सफर के दौरान यमुना एक्सप्रेस वे के बिलकुल मिडल में ही एक जगह रुक कर अपने घर की बनी चाय का मजा लिया गया। एक प्याला चाय सारी थकान दूर भगाय। यमुना एक्सप्रेसवे से हम आगरा की तरफ बढ़ते जा रहे थे। क्या सुहाना सफ़र था। उगते सूरज को सलाम कर हम निकले और भरी दोपहरी में आगरा पहुंचे, जहां का तापमान उबाल मार रहा था। इतनी गर्मी कि कोई हद-हिसाब नहीं इसीलिए सबसे पहले हमने होटल बुक करना ज़्यादा बेहतर समझा। सोचा पहले थोड़ा आराम फ़रमा लिया जाए फिर निकलेंगे ताजमहल के दीदार के लिए। दो-तीन घंटे आराम कर हल्की शाम होते ही हमने ताजमहल जाने की तैयारी की। संकरी गलियों से होकर ट्र्ैफिक की जद्दोजहद से निकलकर आख़िरकार हम उस अविश्वसनीय मीनार के क्षेत्र में पहुंच गए। ताजमहल परिसर और ऊंट गाड़ी ताजमहल परिसर में प्रवेश करते ही ताज से लगभग एक डेढ़ किलोमीटर दूर आपको अपनी कार पार्क करनी पड़ेगी। प्रदूषण के मध्यनज़र पार्किंग क्षेत्र को परिसर से थोड़ा दूर बनाया गया है। अच्छी बात ये है कि पार्किंग से ताज तक पैदल जाने के अलावा आपको मिलेगी ऊंट गाड़ी। आप आराम से ऊंट गाड़ी की सवारी करते हुए टिकट खिड़की तक पहुँच सकते हैं।  हमने थोड़ा समय बचाते हुए ऊंट गाड़ी की सवारी का भी आनंद उठाया। जैसे ही ताज के पास पहुंचे महसूस हुआ जैसे मोहब्बत का नूर टपक रहा हो, वहां के हर एक पत्थर में, फूलों में, पत्तों में। जैसे रूहानियत का अलग ही जहां हो। सारी विशेष चीज़ें मानो एक ही थाली में परोस दी गईं हो। मुग़ल सम्राट शाहजहां के अरमानों को पूरा करता यह अद्भुत स्मारक बेग़म मुमताज़ के लिए बनाई गई अविश्वास्य इमारत जिसे हम मुमताज़ महल के नाम से भी जानते हैं। अकेले मक़बरे को बनने में क़रीब 11 वर्ष का समय लगा। ज़ाहिर है, इतनी ख़ूबसूरत इमारत जिसकी एक-एक ईंट अकल्पनीय कला की ग़वाही दे रही हों, चार दिन में तो बनकर तैयार हो नहीं सकती। इसीलिए समय तो लगना ही था और परिसर में मौजूद बाक़ी की इमारतों को भी तक़रीबन 21 से 22 वर्ष लगे। ताज को यमुना का स्पर्श ताजमहल केवल पर्यटक स्थल ही नहीं बल्क़ि कई प्रकार की कारीगरी का खज़ाना भी है। जैसे-जैसे आप इसके नज़दीक़ जाएंगे तो पाएंगे कि सिर्फ ताज ही नहीं, उसके आसपास बनाई गई सभी इमारतें अपने आप में बेमिसाल कारीगरी का नमूना है। वैसे यह झूठ नहीं है जिसे आर्किटेक्चर में दिलचस्पी है उसके लिए तो ताजमहल की यात्रा सोने की ख़दान से कम नहीं है। हिमालय की गोद से निकलती यमुना अपने 1370 कि.मी. के लंबे सफ़र में कई मोड़ और ठिकानों से होकर ग़ुज़रती है। उन्हीं ठिकानों में से एक है ताजमहल। वैसे शाहजहां ने भी क्या ख़ूब दिमाग़ दौड़ाया, सोचा अगर ताज को यमुना का स्पर्श मिल जाए तो क्या बात होगी, ताज की ख़ूबसूरती दोगुनी हो जाएगी और देखिए ऐसा ही हुआ। यमुना नदी पर ख़ासा ध्यान देते हुए मक़बरे तक जाने से पहले यह विशाल बालकनी बनाई गई है जहां खड़े होकर आप यमुना नदी को निहार सकते हैं और नदी की ओर से आने वाली ठंडी हवाएं आपको एकदम तरोताज़ा कर देती हैं। बेशक़ यह दृश्य आपको आश्चर्यचकित करने में ज़रा भी विफल नहीं होगा। ताजमहल को ग़ौर से देख लेने के बाद आपका दिल चाहेगा कि यहां बैठकर मन मोह लेने वाले गीत सुनते रहें और बस यहां की हवा में खो जाएं। कुछ ऐसा ही जादू है इस जगह में। दरवाज़ा ए रोज़ा बहरहाल, आइए इतिहास को थोड़ा खंगालते हुए मुग़लों के दौर में एक बार फिर चलते हैं और शुरूआत करते हैं दरवाज़ा ए रोज़ा से। आप जैसे ही ताजमहल के अंदर प्रवेश करते हैं तब आपको सबसे पहले दिखाई देता है एक विशाल दरवाज़ा जो दूर से ही ताज की अद्भुत झलक पेश करता है। ये इमारतें महज़ ख़ूबसूरती ही नहीं बल्क़ि मज़बूत इरादों की भी मिसाल क़ायम करती हैं। ताजमहल को अपने इतना नज़दीक पाना वाक़ई में सपने सा लग रहा था। ज़ाहिर है जिसे लोग देशभर से निहारने आते हैं, जिसकी सुंदरता की दुनियाभर में प्रशंसा की जाती है उससे भला हम कैसे अछूते रह जाते। दरवाज़ा ए रोज़ा ताजमहल परिसर के महत्वपूर्ण भागों में से एक है। जहां पहुंचने के लिए हमें कई पड़ाव पार करने होते हैं। वो कहते हैं ना किसी भी सुंदर चीज़

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The Great Wall of India – Kumbhalgarh

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Kumbhalgarh Fort: कुम्भलगढ़ – ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया by Pardeep Kumar जबसे मेरी विशेष रूचि भारत का इतिहास जानने में हुई खासकर बड़े-बड़े किलों और महलों का, तब से कुम्भलगढ़ की दीवार के बारे में खूब सुना था। चौदहवीं सदी में बना कुम्भलगढ़ परकोटा दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है। चीन की दीवार के बाद कुम्भलगढ़ के परकोटे की चौड़ाई सबसे अधिक है।(Kumbhalgarh Fort) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर राजस्थान के राजसमन्द जिले में स्थित कुम्भलगढ़ के किले को इत्मीनान से देखने के लिए आपको पूरा एक दिन लग ही जाता है। अपने शेड्यूल के हिसाब से हम सुबह 11 बजे तक कुम्भलगढ़ पहुँच गए थे। पार्किंग से कुम्भलगढ़ किले तक जाने के दो तरीके हैं एक आप लगभग दो किलोमीटर चढ़ाई पैदल चलें, दूसरा वहां बहुत सारी जीप आपको मिल जाएँगी जिसमें सौ रुपए सवारी के हिसाब से वो किले तक पहुंचा देंगे। जहाँ से आपको टिकट लेना और अंदर प्रवेश करना है। अक्टूबर का महीना था इसलिए अभी 11 बजे तक इतनी खास गर्मी नहीं थी। पानी और कुछ खाने पीने का सामान अपने पास अवश्य रखें क्योंकि ये किला बहुत बड़ा है, ऊपर से पूरे किले में सिर्फ चढ़ाई ही चढ़ाई है जोकि अमूमन सभी किलों में होती ही है। लेकिन यहाँ आपको सीढियां भी बहुत चढ़नी पड़ेंगी इसलिए शारीरिक और मानसिक रूप से अपने आप को मजबूत रखें। वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। क्योंकि देखा जाए तो राजस्थान में साल भर गर्मी ही रहती है। कुंभलगढ़ का किला राजस्थान के किलों का अपना एक अलग समृद्ध इतिहास है, जो इसे देसी-विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बनाता है। यहां के किले व महल अपनी बनावट के कारण अनजाने ही लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। वैसे राजस्थान के लगभग सभी किले चाहे वो जैसलमेर का सोनार किला हो या जयपुर का आमेर या जयगढ़ का किला सभी सैलानियों में अच्छे खासे प्रसिद्ध हैं, लेकिन फिर भी कुंभलगढ़ का किला अपना एक अलग महत्व रखता है। वो इसलिए कि इस किले की खासियत है उसकी दीवार, जिस पर चार घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं।(Kumbhalgarh Fort) दुनिया के सात आश्चर्यों में से एक चीन की दीवार के बारे में तो सब जानते हैं, लेकिन यहाँ आपको बता दें कुंभलगढ़ को भी ग्रेट वॉल ऑफ इंडिया कहा जाता है। चित्तौड़गढ़ किले के बाद कुंभलगढ़ किला राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा किला माना जाता है। यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरिटेज घोषित यह किला मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप का जन्मस्थान है। इस किले को युद्ध में कभी भी जीता नहीं गया। कहते हैं हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी किले में रहे। कुम्भलगढ़ किला परिसर बता दें किसी समय कुम्भलगढ़ किला परिसर में छोटे-बड़े लगभग 400 मंदिर होते थे। कुछ एक मंदिरों को छोड़कर बाकी अब नष्ट हो गए हैं। किले के मुख्य दरवाजे से जैसे ही प्रवेश करते हैं वैसे ही सामने दाहिने हाथ की तरफ नीलकंठ महादेव जी का एक भव्य मंदिर दिखाई देता है। मुख्य दरवाजे से अंदर जाते ही मंदिर की तरफ छोटा-सा बाजार बना हुआ है जहाँ आप खाने-पीने से लेकर हल्की-फुल्की खरीददारी कर सकते हैं। आपकी चढ़ाई इस किले के सबसे ऊपरी हिस्से में बादल महल व कुम्भा महल में जाकर समाप्त होती है, बदल महल से आप दूर-दूर तक फैली हुई अरावली श्रंखला की ख़ूबसूरती निहार सकते हैं। हमनें वहां से आसपास के खूबसूरत नज़ारों को कैमरे में कैद किया। किले में कई जगह ऐसी हैं जहाँ से आप कुम्भलगढ़ की दीवार को भी देख सकते हैं जिससे इस किले की विशालता का सहज ही अनुमान हो जाता है। अबुल फजल किले की ऊंचाई के विषय में लिखते हैं “यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।“ सच कहूं तो इस ऐतिहासिक किले का अनुभव बेहद शानदार रहा। यहाँ से लौटने के बाद मन सोचने पर विवश हो जाता है कि किस तरह इंसान जीवन के किस्से लिखता है और साम्राज्यों की कहानियां भी। और भले ही इन किलों की गर्वीली कहानियां कितनी ही पुरानी क्यों न हो जाये लेकिन फिर भी सदियों तक दोहराई जाती रहेंगी। (Kumbhalgarh Fort) Written by Pardeep Kumar Glimpse of Kumbhalgarh Fort….

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Dilli Haat INA, Delhi- History, Timings, How to Reach

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Dilli Haat-दिल्ली हाट: पारम्परिक भारत की खूबसूरत झलक अगर आपका लगाव ट्रेडिशनल चीज़ों से हैं और पारम्परिक खरीदारी और हस्तकलाओं का बेहद शौक रखते हैं और शहरी परिवेश में रहते हैं तो दिल्ली के आईएनए स्थित  दिल्ली हाट जरूर जाइएगा।  दिल्ली के शहरी परिवेश में ग्रामीण और पारम्परिक भारत का अहसाह कराने वाले बाजार यानी दिल्ली हाट (आईएनए) का अपना ही एक अलग स्वैग है। मेट्रो के आसान और सुहाने सफर का लुत्फ़ उठाते हुए उतर जाइए आईएनए मेट्रो स्टेशन पर। मेट्रो से बाहर निकलते ही सामने ही है आपका दिल्ली हाट।(Dilli Haat) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर हाट के परिसर में घुसते ही सामने ही टिकट घर है। आपको ये  टिकट घर कुछ अलग ही दिखाई देगा, जैसे मधुबनी की कोई हस्तनिर्मित झोपड़ी जो कि किसी का भी ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करेगी । यहाँ कोविड महामारी के बाद से पर्यटकों की कमी साफ दिखाई दी । और यहाँ  खरीददारी के लिए आने वालों की कमी का असर टिकट के दामों पर साफ साफ़ दिखाई दिया, जो टिकट 30 रुपये की  हुआ करती थी, इस वक्त वो 10 रुपये की कर दी गयी थी। पिछले एक साल से इस कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभाव पर्यटन और बाजारों पर ही देखने को मिला है। और खबर ये भी मिली कि दिल्ली हाट में खरीददारों के लिए आने वालों के लिए एक समय ये  एंट्री मुफ्त भी कर दी गई थी।(Delhi Haat) वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों और खरीददारों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। लेकिन जब भी आपका मन कुछ एंटीक खरीदने का हो तब आप किसी भी समय यहाँ बेधड़क आ सकते हैं फिर चाहे कोई भी मौसम हो। ख़ूबसूरत पारम्परिक बाजार आप जैसे ही दिल्ली हाट में अंदर प्रवेश करेंगे  तो आपको लगेगा आप एक बारगी तो जैसे किसी गांव के पारम्परिक बाजार में पहुंच गए हो। ईंटो की जालीदार शैली से बने छोटे-छोटे कमरे एक कतार में बड़ी सुंदरता से बनाए गए हैं। वहां सभी दुकानों में सीमेंट के पलस्तर की जगह हाथों से लिपाई-पुताई की गई है, इस तरह हट नुमा घर की बनावट आपको किसी भी सामान्य भारतीय गांव में आसानी से देखने को मिल जाती है। शायद यही ख़ूबसूरती दिल्ली हाट को बाकी सभी बाज़ारों से अलग करता है। इसलिए यहाँ जितने लोग खरीददारी करने आते हैं उतने ही वीकेंड पर मौज मस्ती, खाने-पीने या यूँ कहिये अपना क्वालिटी टाइम बिताने भी आते हैं। ये हाट पूरे भारत की एक छोटी सी पारम्परिक झलक दिखाता है। हस्तकला और क्राफ्ट से संबंधित गांव इस जगह घूम कर आपको ऐसा लगेगा जैसे  देश के अलग-अलग हिस्सों से आये कारीगरों ने यहाँ अपना एक अलग हस्तकला और क्राफ्ट से संबंधित गांव बसा दिया दिया हो। कहीं कोई अपने खिलौने बेच रहा था तो कोई महिलाओं से सम्बंधित वस्तुएं। खास बात ये थी कि ज्यादातर पूरे हाट में महिलाओं से सम्बन्धित प्रोडक्ट ही दिखाई दे रहे थे। हर दूसरी शॉप में कोई न कोई  अपनी कारीगरी और कला का प्रदर्शन कर रहा था।  देश के हर कोने से हुनरमंदों को एक छत्त के नीचे लाने से न केवल इन कलाकारों के हुनर को एक विशेष पहचान मिल रही है बल्कि यह उनके लिए आय का भी एक बेहतरीन जरिया सिद्ध हो रहा है। यहाँ ख़रीददारी के लिए आने वाले  लोगो में इन हस्तनिर्मित चीज़ों को खरीदने की चाहत भी साफ देखी जा सकती थी। देश के छोटे-छोटे हिस्सों से आए इन कलाकारों के लिए ये जगह किसी सपने से कम नही वरना ऐसी कीमती कला कुछ हिस्सों तक सिमट कर रह जाती हैं और एक समय पर अपना अस्तित्व ही खो बैठती हैं। ओपन रंगमंच अगर आप परिवार और दोस्तों के साथ इस जगह पर आने की सोच रहे हों तो यह एक शानदार निर्णय रहेगा।  हाट के परिसर में सामने की ओर एक रंगमंच भी है जो मनोरंजन के उद्देश्य से बनाया गया है। इस ओपन रंगमंच में विभिन्न प्रदेशों के कलाकारों द्वारा  पारम्परिक वाद्ययंत्र और संगीत की ध्वनि आपको थिरकने पर मजबूर कर देगीं। खान-पान के लिए भी प्रसिद्ध हस्तनिर्मित वस्तुओं और संगीत संध्या के अलावा दिल्ली हाट अपने खान-पान के लिए भी प्रसिद्ध है। विभिन्न कलाओं के साथ-साथ यहां के भोजन में भी पूरे भारत की झलक मिलती है। गुजराती ढोकला खाने की इच्छा हो या दक्षिण का उत्तपम यहां हर राज्य के पकवान आपका स्वागत करेंगे। सिक्किम से लेकर कश्मीर तक सब कुछ मिलेगा यहां। समझ लीजिए छोटा-सा भारत दिल्ली हाट के रूप में बसा दिया गया है। इतना तय है कि ये जगह आपको निराश तो बिल्कुल नहीं कर सकती।(Delhi Haat) तो आइये और छोटे भारत के दर्शन पर निकल पड़िए। मधुबनी से लेकर चिकनकारी तक सब कुछ है यहां। कोल्हापुरी हो या गोटापत्ती हर चीज़ आपको यहां देखने को मिलेगी तो इंतज़ार किस बात का शहरों के मॉल देख कर थक गए हो तो आओ कुछ नया अनुभव करने। ग्रामीण अनुभव और सुंदर कलाओं के इस जश्न में। Research – Nikki Rai Written & Edited by Pardeep Kumar You can visit our YouTube channel to explore more destinations- Like & Subscribe

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Dhanaulti Uttarakhand: धनौल्टी- जहाँ की फ़िज़ाओं में ही रोमांस है by Pardeep Kumar अक्टूबर महीने की बात है जब कॉलेज ट्रिप के साथ मेरा धनौल्टी जाने का प्लान बना। मेरी बहुत-सी यात्रायें नौजवान विद्यार्थियों के साथ ही मुमकिन हो पाई हैं। हँसते खिल-खिलाते ऊर्जा से भरपूर युवाओं के साथ यात्रा करना वास्तव में गज़ब का अनुभव है। धनौल्‍टी मसूरी से कुछ ही दूरी पर स्थित एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन है। किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर चारों और से देवदार से घिरी यह जगह अपनी लंबी-लंबी ढलानें और धीमे गति से चलने वाली ठंडी हवाओं के कारण यहाँ आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेती है। यहाँ पहुँचने का सही समय वैसे तो मार्च से जून के बीच है लेकिन अक्टूबर के महीने में भी आप इस जगह की ख़ूबसूरती का भरपूर मजा उठा सकते हैं। अक्टूबर के महीने में दिन में इतनी कड़ाके की सर्दी नहीं महसूस होती, हाँ, रात को किसी भी हिल स्टेशन पर आपको हीटर की जरुरत अवश्य महसूस होगी। शायद यही अदा होती है पहाड़ों की कि अगर सर्दी में भी अलाव सेंकने की नौबत न आये तो फिर आप क्या पहाड़ों में आये।(Dhanaulti, Uttarakhand) कैसे पहुंचे धनौल्टी कई हिल स्टेशनों पर विचार विमर्श करने के बाद आखिरकार धनौल्टी जाना तय हुआ। अगर आप एक बड़े ग्रुप में जा रहे हैं तो ट्रैवलर करना सबसे बेहतर रहता है। वरना चार-पांच लोगों के लिए तो अपनी कार से बेहतरीन कुछ भी नहीं। दिल्ली से धनौल्टी लगभग 320 किलोमीटर की दूरी पर है और आपको दिल्ली से धनौल्टी पहुँचने में लगभग 7 घंटे का समय अवश्य लग जायेगा। हम शाम को 4 बजे के करीब दिल्ली से निकले और रात 11 बजे के आसपास धनौल्टी पहुंच गए। क्योंकि सफर लम्बा था, और रास्ते भर अंताक्षरी और शेरों शायरी का कभी न खत्म होने वाला दौर चला था इसलिए थकान लाज़िमी थी, सो डिनर किया और बिस्तर पर गिरते ही नींद की आगोश में चले गए। क्योंकि हमने पहले ही किसी होटल की बजाय कैंप रिज़ोर्ट बुक किया था, धनौल्टी जाएँ और एडवेंचर का आनंद न लें तो बात कुछ जमती नहीं। और ये टेंट हाउस वाला रिजॉर्ट  इतना खूबसूरत होगा ये हमें सुबह जागने के बाद पता चला। पहाड़ों की तलहटी में एक दूसरे से थोड़ी-थोड़ी दूर बने ये टेंट हाउस सूरज की पहली किरण के साथ ही चमक उठे। सामने हिमालय की बर्फीली चोटियां, दूर से हमारी और कौतुहलता से ताकते देवदार के लम्बे-लम्बे वृक्ष मानों कह रहे हों कि एक बार यहां आ ही गए हो तो अब लौट कर जाने की न सोचना। खूबसूरत सूर्योदय का रसपान अगर आप किसी हिल स्टेशन में उगते सूरज के साथ पहाड़ों पर फैली सोने-सी लालिमा और मनभावन दृश्य का आनंद लेना चाहते हैं तो बस सुबह थोड़ा जल्दी जागना पड़ेगा। और मैं चाह कर भी ऐसे दृश्य को मिस नहीं करना चाहता था। इसलिए थोड़ा जल्दी जाग गया। जल्दी-जल्दी दैनिक कार्यों से निवृत होकर बहादुर को चाय के लिए आवाज़ लगाई। सर्द सुबह के छह बजे थे। मेरे और बहादुर के अलावा सब गहरी नींद में सोये हुए थे। बहादुर रिज़ोर्ट का मुख्य कुक था जिससे रात के खाने के समय जान-पहचान हो गई थी। अगर आप खाने के थोड़े भी शौक़ीन हैं तो आपको ये जान पहचान करनी ही पड़ती है। बहरहाल अपने टेंट हाउस के बरामदे में बैठ कर सुबह-सुबह कड़क और एकदम गर्म चाय का आनंद लिया और एकबारगी तो लगा बस यहीं घंटों बैठा रहूं और प्रकृति के निरंतर बदलते मूड्स में खो जाऊं। हवायें  चल रही थी और वो भी ठंडी, लेकिन  एकदम शुद्ध। आजकल ये खुली हवा नए उभरते शहरों में दुर्लभ हो गई है और ये बड़े शहर मानों नए ज़माने के शरणार्थी शिविर जैसे हो गए हैं। आबादी के साथ शहर भी बढ़ रहे हैं और सुविधाएँ भी। साथ में बढ़ रही है एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़। और इन शहरों के कोने-कोने में लगे श्लोगन ‘योर क्लीन सिटी’ ‘योर ग्रीन सिटी’ जैसे वहां के बाशिंदों को देखकर मुँह चिढ़ा रहे हो। हर शहर में कई-कई नए शहर बन रहे हैं। सब कुछ मिल जायेगा इन महानगरों में- सिवाय खुली हवा के, शुद्ध हवा के। पहाड़ों के गांव और जनजीवन हमारे रिज़ोर्ट से दो सौ मीटर नीचे, तलहटी में बसा एक छोटा-सा गांव दिखाई दे रहा था। हमारे इधर ऐसे थोड़े बहुत घरों वाले गांव को ढाणी कहते हैं। पहाड़ों में आप कहीं भी चले जाइये ऐसे ही छोटे-छोटे गांव दिखाई देंगे। अभी नाश्ते में काफी समय था इसलिए सोचा आज मॉर्निंग वाक पहाड़ों में ही सही। इसलिए अपना कैमरा उठाया, मफलर पहना और कदम बढ़ा दिए नीचे तलहटी की और। अक्टूबर के महीने में भी दिसंबर जैसी सर्दी का अहसास हो रहा था। नीचे उत्तरते ही सामने एक बूढ़ी अम्मा दिखाई दी, जो बड़े इत्मीनान से अपनी गाय को चारा डाल रही थी। मुझे देखकर थोड़ी ठिठकी और फिर दोबारा से अपने काम में लग गई। शायद मेरे हाथ में कैमरा देख लिया था और ऊपर रिज़ॉर्ट से अनेक सैलानी अक्सर यहाँ आते होंगे, इन पहाड़ी गांव के मनोरम दृश्य कैद करने। लेकिन इन सब में एक बात जो पहाड़ी लोगों की मुझे पसंद आयी, खासकर शहर से थोड़ा दूर इन छोटे छोटे-गांव में  वो ये थी कि ये लोग होते बहुत शांत हैं, एक अलग तरह का संतोष हमेशा मुझे इनके चेहरे पर दिखाई देता है। मुझे दो-तीन छोटे बच्चें वहां खेलते दिखाई दिए। थोड़ी देर वहां ठहर कर प्रकृति के कुछ अनछुए-अनदेखे पलों का रसपान किया और वापिस आ गया अपने रिज़ॉर्ट में। तब तक नाश्ता तैयार हो चुका था और बाकी सब नहाने-धोने में व्यस्त थे।  देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ खूबसूरत इको पार्क आज हमारा धनौल्टी में ही एक बेहद खूबसूरत जगह इको पार्क जाने का प्रोग्राम था। सबने अच्छे से नाश्ता किया। चाय और परांठे वो भी मक्खन के साथ। गरमा गर्म नाश्ते का लुत्फ़ उठाने के बाद हम निकल पड़ें इको पार्क की और। तकरीबन बारह बजे तक हम पार्क पहुंच गए थे। धनौल्टी चारों और से  लम्बे-लम्बे देवदार के पेड़ों से घिरा हुआ है और इन पेड़ों की सारी  खूबसूरती जैसे ईको पार्क में समा

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Garjiya Devi Temple – Jim Corbett, Ramnagar

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Garjiya Devi Temple: राम नगर का गर्जिया मंदिर- यहाँ रूह का सुकून ही नहीं आँखों में ठहर जाने वाले ख़्वाब से नज़ारे भी हैं by Pardeep Kumar ज़र्रे-ज़र्रे में उसी का नूर है झांक खुद में वो न तुझसे दूर है इश्क़ है उससे तो सबसे इश्क़ कर इस इबादत का यही दस्तूर है ….. यहाँ सिर्फ रूह का सुकून ही नहीं आँखों में ठहर जाने वाले ख़्वाब से नज़ारे भी हैं। हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के रामनगर में स्थित ऐसे ही एक खूबसूरत ‘गिरिजा देवी मंदिर’ की जो कोसी नदी के बीचो-बीच एक टापू पर बना है। इस मंदिर को स्थानीय भाषा में यहाँ के लोग गर्जिया मंदिर कहते हैं। अगर ये कहा जाये हमारा देश मंदिरों का देश है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। हर जगह के मंदिर अपने आप में एक अलग ही इतिहास और चमत्कार समेटे हुए हैं। पर देश में ऐसे बहुत ही कम मंदिर देखने को मिलेंगे जहाँ जाकर आप अपनी आस्था के साथ प्रकृति का खूब आनंद ले सकते हैं, यहाँ नदी है, सामने पहाड़ हैं और देश के पहले नेशनल पार्क की गोद में आप अपना बेहतरीन क्वालिटी टाइम भी बिता सकते हैं। कैसे पहुंचे गर्जिया मंदिर आपको बता दूँ रामनगर ट्रेन और बस सेवाओं के माध्यम से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से मुरादाबाद तक तो हाईवे ही है। बाकी रास्ता भी ठीक ही है। यहां तक पहुंचने के लिए रामनगर से आप टैक्सी ले सकते हैं और अगर आपके पास अपना वाहन है तो आपको और भी सुविधा हो जाएगी, क्योंकि फिर आप अपनी मर्जी से रुकते-रूकाते खाते-पीते यात्रा का लुत्फ़ उठा सकते हैं। क्योंकि पहाड़ों की तलहटी में बसे ऐसे डेस्टिनेशन फोटोग्राफी के लिए बेहतरीन विकल्प होते हैं। हम दिल्ली से रामनगर एक काव्य विमोचन समारोह में आये थे। मेरे साथ मेरे दो प्रिय विद्यार्थी थे या यूँ कह लीजिए शानदार युवा कवि थे तो ज्यादा सही रहेगा। हम दिल्ली से तकरीबन सुबह नौ बजे निकले और रामनगर लगभग 3-4 बजे के करीब पहुँच गए थे। शायरी कविताओं और गीत-ग़ज़लों में 260 किलोमीटर कब निकल गए पता ही नहीं चला। और ऐसे साहित्यिक लोगों के साथ रास्ते में रूककर कड़क चाय पीने का जो मजा है मुझे लगता है वो अन्यत्र दुर्लभ है। Garjiya Devi Temple Ramnagar गर्जिया मंदिर कार्यक्रम अगले दिन था वो भी रात को, इसलिए शेड्यूल के हिसाब से हमनें उस दिन आराम किया और अगले दिन सुबह-सुबह निकल गए जिम कॉर्बेट एरिया में स्थित गर्जिया मंदिर की और। आप इस जगह को सिर्फ एक धार्मिक नजरिये से न देखकर एक पिकनिक स्पॉट भी कह सकते हैं, क्योंकि वहां जाने का हमारा उदेश्य भी प्राकृतिक नज़ारों का रसपान करना ही था। वैसे देखा जाये तो प्राकृतिक तौर पर यह जगह जैव विविधता लिए हुए नदियों और पहाड़ों के बीच कुदरत के नैसर्गिक सौंदर्य का एक बेहतरीन उदाहरण है। गर्जिया मंदिर तक पहुँचने के लिए आपको पहले पार्किंग में अपनी गाड़ी पार्क करनी पड़ेगी, फिर एक छोटे -से बाजार होते हुए एक ब्रिज क्रॉस करना पड़ता है। ब्रिज पार करने के बाद आप पहुँचते है बिलकुल मंदिर के करीब। मंदिर एक छोटे से पहाड़ की चोटी पर बना हुआ है जो दूर से देखने पर ही श्रद्धालुओं को इसके चमत्कारिक होने का अहसास कराता है। गर्जिया मंदिर का चमत्कारिक इतिहास मंदिर के साथ जो नदी बह रही है उसके किनारे लगभग एक-आध किलोमीटर तक छोटी-छोटी छप्परनुमा दुकानें बनी हुई हैं जहाँ आपको मंदिर के लिए प्रसाद-फूल वगैरह बेचते दुकानदार दिख जायेंगे। वहीं हमने देखा एक चाय वाला गर्मागर्म चाय बना रहा था और समोसे भी। बस खाने के शौक़ीन लोगों के लिए इतना दृश्य काफी है। चाय पीते हुए उत्सुकतावश हमने उस चायवाले से मंदिर के चमत्कारिक इतिहास के बारे में पूछा तो जैसे वह बस इसी मौके की तलाश में था बड़े गर्व से उसने मंदिर के बारे में कई बातें बताई। उसी से हमें पता चला कि आज गर्जिया मंदिर जिस टीले पर है, वह कोसी नदी की बाढ़ में कहीं ऊपरी क्षेत्र से बहकर आया था। भैरव देवता ने टीले को बहते हुए आता देखा | मंदिर को टीले के साथ बहते हुये आता देखकर भैरव देव ने कहा – “थि रौ, बैणा थि रौ’’ मतलब कि ‘ठहरो, बहन ठहरो, मेरे साथ यही पर रहो, यहीं निवास करो। बस तभी से गर्जिया में गिरिजा देवी निवास कर रही हैं। उसी ने बताया कि गिरिजा देवी पार्वती का ही दूसरा नाम है। दरअसल ये कहानियां सिर्फ कहानी नहीं है बल्कि लोगों की आस्था का विषय भी है। क्योंकि ये कहानी सुनाते हुए चाय वाले के भक्ति भाव आसानी से पढ़े जा सकते थे। खैर समोसे और चाय निपटाने के बाद हम थोड़ा पैदल चलकर आगे निकले और एक सुन्दर-सी जगह देखकर नदी में नहाने उत्तर गए। नदी में पानी का स्तर कोई ज्यादा नहीं था। हाँ, पानी ठंडा जरूर था। लेकिन था बिल्कुल साफ़। बरसात के समय लगातार पानी बरसने से पत्थरों पर थोड़ी काई नज़र आ रही थी। नेचर लवर्स के लिए यह सच में यह एक बेहतरीन डेस्टिनेशन है। Garjiya Devi Temple Ramnagar वैसे पूरा कार्बेट पार्क क्षेत्र विशाल घास के मैदानों में फैला हुआ है, जो कि पहाडियों से घिरा हुआ है। इन पहाड़ों से छोटी-छोटी नदियां निकल कर मैदानों की ओर बहती हैं। और यही नदिया बनाती हैं इस क्षेत्र को बेहद खूबसूरत और दर्शनीय भी। यहाँ सर्दियों में रातें ठंडी होती हैं लेकिन दिन धूपदार और गरम होते हैं। अन्य मैदानी इलाकों की तरह यहाँ जुलाई से सितंबर तक बारिश होती है। हमनें दिनभर पूरे गिर्जिया क्षेत्र में प्रकृति के नज़ारों का खूब आनंद लिया और शाम को वापिस निकल गए रामनगर। इस तरह इस छोटी-सी यात्रा का यही समापन हुआ। लेकिन यहाँ से जाने के बाद भी ज़ेहन में चमत्कारिक कहानियां और उनके पात्र चलते रहे।

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Humayun’s Tomb, Delhi

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Humayun’s Tomb- हुमायूँ का मकबरा : मुग़ल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना मुगलों ने अपने शासन के दौरान मकबरों का निर्माण करते वक़्त शायद यही सोचा होगा की एक दिन वे दुनिया से चले जाएंगे, लेकिन उनके बनाए गए ये मकबरें उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगे। क्योंकि मुगलों द्वारा बनाई हर विरासत बेहद भव्य और आकर्षक है और ऐसे ही एक उत्कृष्ट विरासत की बात आज हम अपनी इस यात्रा में करेंगे। बाबर के सबसे बड़े बेटे हुमायूँ को हम सभी ने इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा है। लेकिन क्या आपने हुमायूँ का मकबरा देखा है? अगर अब आप ये सोच रहे हैं कि हुमायूँ का मकबरा भी इतिहास के अध्याय की तरह उबाऊ है तो आप गलत हैं, क्योंकि हुमायूँ का मकबरा भारत का पहला उद्यान-मकबरा है जो मुगल स्थापत्य के बेहतरीन उदहारणों में से एक है जिसे 1993 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के रूप में घोषित किया गया था।(Humayun’s Tomb) दिलवालों की दिल्ली में 1565 ई. में बना हुमायूँ का मकबरा मथुरा रोड़ पर स्थित है। एक बात गौर करने वाली है कि हर हेरिटेज की तरह हुमायूँ का मकबरा किसी बादशाह द्वारा नहीं बल्कि हुमायूँ की बेगम रानी हमीदा बानो ने अपने शोहर की याद में बनवाया था। साथ ही आपको बता दें ताजमहल का निर्माण इसी मकबरे से प्रभावित होकर किया गया था।(Humayun Tomb) टिकट घर और यहाँ कैसे पहुंचे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम मेट्रो स्टेशन से हुमायूँ का मकबरा लगभग 2 किलोमीटर दूर है. अब 2 किलोमीटर का रास्ता आपको 11 नंबर गाड़ी से पार करना है या ऑटो से, ये आप पर और आपकी जेब पर निर्भर करता है।  मकबरे में एंट्री के लिए भारतीय नागरिक की 35 रुपये  और विदेशी सैलानियों के लिए 550 रुपए की टिकट लगती है. टिकट खरीदने के लिए कैशलेस माध्यम अपनाना पड़ता है क्यूंकि नकद भुगतान का विकल्प फिलहाल कोरोना काल के कारण मौजूद नहीं है। टिकट लेते ही सफर शुरू हो जाता है, जिसमें मुसाफिर होते हैं हम, आप और हमारी दिलचस्पी।(Humayun’s Tomb) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों  का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। सर्दियों में ऐतिहासिक इमारतों का दीदार मन को भाता है। ईसा खान का मकबरा To watch video of this blog, you can visit our YouTube channel- Five colors of travel – Like & Subscribe हुमायूँ के मकबरे तक पहुंचने की शुरुवात ईसा खान के मकबरें और मस्ज़िद के साथ होती है जो हुमायूँ के मकबरे से 20 साल पहले बनाया गया था। ईसा खान शेरशाह सूरी के दरबार में एक अफगान रईस था। यह मकबरा अष्टकोणीय मकबरा है जो अपनी आकर्षक वास्तुकला से किसी को भी अपना दीवाना बना सकता है।  इसमें लगी छतरियां, चमकदार टाइल्स और जालीदार जालियां इसकी खूबसूरती  को और अधिक  बढ़ाती हैं। ईसा खान के मकबरे के बाहर लगे एक सूचना बोर्ड को पढ़ने के बाद पता चला कि 20वी शताब्दी में यहां पूरा एक गांव आबाद था। वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण देखने के बाद अब हम आगे बढ़ें।  चारों तरफ बस हरियाली ही हरियाली पसरी हुई थी जो पूरी धरोहर को चार-चाँद लगा रही थी। बू हतीमा गेट ईसा खान के मकबरे के बाद आता है बू हतीमा गेट। यह विशाल दरवाजा बू हतीमा के मकबरे-बगीचे तक जाता है। रास्ते का अग्रभाग कत्तलदार है और टाइल कार्य के अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं। बगीचे की दीवार के दो उत्तरी बुर्ज़ गुम्बदी छतरियों से सुसज्जित हैं। 19वीं शताब्दी में बगीचे की पश्चिमी दीवार के कुछ हिस्से को तोड़कर प्रवेश द्वार बनाया गया था। अरब सराय दरवाज़ा बू हतीमा गेट पार करते ही दाएं हाथ पर अरब सराय दरवाज़ा दिखता है जो लगभग 14 मीटर बड़ा है। इस दरवाज़े को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम इतिहास के पन्नो पर वापस लौट गए हों। यह दरवाज़ा हुमायूँ के मकबरे के निर्माण के लिए शिल्पकारों के अहाते की ओर जाता है। लाल पत्थर, सफ़ेद सांगमंरमर, झरोखें और चमक़दार टाइलों के अवशेष से बना ये दरवाज़ा पर्यटकों  को खूब आकर्षित करता है। थोड़ा आगे चलने पर एक और दरवाज़ा आता है।  जिसमें घुसते ही दोनों तरफ हुमायूँ के मकबरे से जुड़े इतिहास के बोर्ड और पुस्तकें देखने को मिलती है। इसी दरवाज़े से सामने देखने पर खूबसूरती के सारे पैमाने लांघता हुमायूँ का मकबरा दिखाई देता है। हुमायूँ का मकबरा यकीन मानिये, हुमायूँ का मकबरा तस्वीरों में जितना खूबसूरत लगता है वास्तव में उससे कही ज्यादा है। इतना की शायद ही कोई इसकी ख़ूबसूरती बखान कर पाए।  लाल और सफ़ेद सेंड स्टोन से बनी ये इमारत उतनी ही नायाब है जितना आगरा में बना ताजमहल।  मकबरे के सामने बने फव्वारे की ठंडक को महसूस करते हुए आप जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगें, आपका मन इसकी सुंदरता के वश में कैद होता चला जाएगा।  इस दो मंजिला स्मारक की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते आप महसूस करेंगे की मकबरा पहले से दुगना आकर्षक होता जा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं फारसी और तुर्की स्थापत्य शैली के मिश्रण से बना हुआ ये मकबरा लगभग 27 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। हुमायूँ के मकबरे को मुगलों का ‘शयनागार’ भी कहा जाता है। सच मानिए लाल और काले बलुआ पत्थर से बना ये मकबरा बहुत उम्दा विरासत है जिसे आप सभी को देखना चाहिए। आप इस मकबरे के सामने बने उद्यान में बैठकर अपनी थकान मिटाते हुए इसकी मोहकता का रसपान कर सकते हैं। मन ऐसा हो रहा था मानो इस अद्भुत विरासत को एक बार शुरू से दुबारा घूमूँ।लेकिन 3 घंटे होने में बस 5 मिनट ही बाकी थे जिसके कारण मुझे न चाहते हुए भी मकबरे को अलविदा कहना पड़ा। आपको बता दूं इन दिनों शायद कोरोना महामारी की वजह से एंट्री के बाद मकबरे में 3 घंटे तक ही रहने की अनुमति है। शायद मकबरें में ज्यादा भीड़ न हो इस वजह से। बाहर निकलते ही चटनी और भुट्टे की ख़ुश्बू आ रही थी। मैंने भुट्टा लिया और मकबरे को अलविदा कह अपने कदम बढ़ा दिए घर की तरफ। (Humayun’s Tomb) Written & Edited by Pardeep Kumar glimpse of Humayun Tomb…best monument of Mughals. The world heritage

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Lodhi Garden Delhi

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Lodhi Garden: लोधी गार्डन- मकबरों और बागों का स्वर्ग हम दिल्ली वालों के लिए बारिश किसी वरदान से कम नहीं है। खासतौर पर तब जब हद से ज्यादा गर्मी पड़ रही हो। जून हो या जुलाई, दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी घर से बाहर निकलने नहीं देती। ऐसे में बारिश का सुहावना मौसम बन जाए तो फिर दिल्ली दर्शन की बात ही क्या। समझ लीजिए आनंद के सागर में डुबकी लगा ली। पिछले दो दिनों से लगातार हो रही बारिश अब थम चुकी थी। मौसम को देखते हुए योजना बनी लोधी गार्डन घूमने की।(Lodhi Garden) watch Vlog of Lodhi Garden. Like and subscribe अब आप सोचेंगे इसमें ऐसा क्या खास है तो बता दें ये केवल एक गार्डन नहीं बल्कि मकबरों से सुसज्जित एक परिसर है, जिसे पर्यटन के लिहाज से गार्डन का नाम दे दिया गया है। प्रकृति प्रेमी बंधुओं के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं। इसकी खूबसूरती और इतिहास इतना खास है जिसे जानने के बाद आप खुद को इस जगह जाने से रोक नहीं पाएंगे। कैसे पहुंचे लोधी गार्डन लोधी गार्डन मेन लोधी रोड, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के पास स्थित है। लोधी गार्डन जेएनएल मेट्रो स्टेशन से चंद कदम की दूरी पर ही है। खास बात ये कि लोधी गार्डन की एंट्री बिलकुल फ्री है। बड़ा गुबंद जैसे ही हमनें गार्डन में प्रवेश किया अंदर जाते हुए केवल पेड़ पौधे ही नजर आ रहे थे। कुछ कदम आगे बढ़ते ही एक बेहद आकर्षक इमारत दिखी। ये था बड़ा गुबंद। सबसे जरूरी बात ये पूरा परिसर लोधियों के अंतर्गत हुआ करता था। आज इस परिसर में लोधी वंश से सम्बन्ध रखने वालों की कब्रें हैं जिनपर मकबरे बने हुए हैं। ये मकबरे ही आज यहाँ आने वाले सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें लोधी वंशज सुल्तानों के राज्यकाल (1454-1526) में दो प्रकार के मकबरों का निर्माण हुआ एक चौकोर और दूसरा अठपहलू। बड़ा गुबंद चौकोर मकबरे का उदाहरण है। इस मकबरे के बिल्कुल साथ में एक मस्जिद बनी हुई है जिसे बड़ा गुबंद मस्जिद कहा जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं बड़ा गुबंद मकबरा इस मस्जिद का प्रवेश द्वार है परंतु ये एक अलग मकबरा ही है। इस मकबरे में दफनाये गए व्यक्ति की पहचान नहीं कि जा सकी है पर माना जाता है ये व्यक्ति सिकन्दर लोधी के राज्य में किसी विशिष्ट पद पर रहा होगा। बगल में ही बड़ा गुबंद नाम की मस्जिद भी है जो मेहराबों जैसे आकार की है। स्तम्भों पर स्थित ये मस्जिद सन 1494 के आस पास की है। इसके अंदर की खूबसूरती देखकर कोई भी दंग रह जायेगा। सफेद चूना पत्थर और लाल बलुआ पत्थरों से बनी ये मस्जिद अद्भुत वास्तुशैली की मिसाल है। एक बार जो इसे देख ले उसका मुंह खुला का खुला रह जाए। अरबी शैली में बनी ये मस्जिद पूरी तरह से कुरान की आयतों और रंगीन बेलबूटों से सजी हुई है। हम तो पूरी तरह इसकी सुंदरता के कायल हो गए। शीश गुबंद मस्जिद के सामने खड़े होने पर सामने ही एक और अनोखा मकबरा नजर आ रहा था। ये था शीश गुबंद। हम सुंदर बाग और फूलों की महक लेते हुए सामने के मकबरे यानी शीश गुबंद पहुँचे। शीश-गुबंद अन्य इमारतों से कुछ अलग लगा। इसके ऊपरी भाग पर नीले रंग की टाइलें इसे अलग ही चमक दे रही थी। इस्लामिक शैली से बना ये मकबरा आज भी खूबसूरती में किसी से कम नहीं। यह मकबरा प्रथम लोधी बादशाह बहलोल लोधी का है। मकबरे की छत पर उकेरी गई कलाकृतियां और डिज़ाइन अद्भुत थे। बारीक कारीगरी देखकर नजरें हटने का नाम नहीं ले रही थीं। अठपुला दूर-दूर तक देखने पर बाग में बस हरियाली ही हरियाली नजर आ रही थी पर वहां लगा परिसर का नक्शा आगे बहुत कुछ होने की सूचना दे रहा था। कुछ दूरी पर एक मानवनिर्मित झील दिखी जिस पर एक पुल बना हुआ है जिसे अठपुला कहा जाता है। सिकंदर लोधी के मकबरे से थोड़ी ही दूर सात मेहरावों वाला एक पुल है जिसे नाले पर बनाया गया है। सूचना बोर्ड की जानकारी कह रही थी यह मेहराबी पुल अकबर के शासन काल में बनवाया गया जो कि नाले के पानी को यमुना नदी तक पहुँचाने का काम करता था। सिकन्दर लोधी का मकबरा लोधी गार्डन की खास बात यही है कि ये पूरा परिसर ही सुंदरता लिए हुए है आप जितना आगे चलते जायेंगे आपको यहाँ उतना ही अच्छा फील होगा। आगे चलते हुए हमें दिखाई दी यहाँ की मुख्य इमारत यानी सिकन्दर लोधी का मकबरा। अठपहलू शैली का ये मकबरा अन्य सब मकबरों से अलग भी था और भव्य भी। सिकन्दर लोधी, लोधी वंश का द्वितीय शासक था। मकबरा ऊंचाई पर बनाया गया है जिसमें मकबरे का एक अलग बाग भी है। यहाँ जितने भी मकबरें दिखाई दिए उन सबकी संरचना एक जैसी ही थी। इसकी खासियत ये है ये मकबरा पूरे परिसर के बीचों-बीच है। ये मकबरा अष्टभुजाकार है जो चारों ओर से देखने पर एक समान दिखता है। लोधी गार्डन ऐसी जगह है जहाँ आप घंटों प्रकृति का आनंद ले सकते हैं। ज़िंदगी की भागम-भाग से दूर किसी अपने के साथ यहाँ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं। सब कुछ है यहाँ पुरानी इमारतें, मकबरें और पानी की झीलें भी। मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा अब वक्त हो चला था घर लौटने का, बस बाहर निकलने के लिए चले ही थे कि अचानक बारिश अपने पूरे शबाब के साथ बरसने लगी, मानो बादलों का सारा गुस्सा आज ही फूट पड़ा हो। निकलते हुए लोधी गार्डन का एक आखिरी मकबरा जो हमसे छूट रहा था सामने नजर आया। बारिश से बचने के लिए हम भागे मकबरे की ओर। ये था मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा। ये गोलाकार मकबरा दूर से किसी महल के बैठकघर जैसा लगता है। अगर मुझसे पूछा जाए तो पूरे परिसर में सबसे अनोखा मकबरा यही लगा। बारिश से बचते कई लोग इस मकबरे की सीढ़ियों पर बारिश का सुखद आनंद लेते दिखे। और मुझे याद आया क़तील शिफ़ाई का एक मशहूर शेर- दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था बारिश के ऐसे