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गोवर्धन की 21 किलो मीटर की यात्रा आपको थकाती नहीं है बल्कि जीवन के सारे पापों से मुक्त कर देती है!

गोवर्धन

गोवर्धन की राह सफर की पहली दस्तक का अनुभव सुनिए

दिल्ली से निकला तो सुबह के 6 बज रहे थे। कार की खिड़की से बाहर झाँका तो धूप हल्की-हल्की उतर रही थी। मन में एक अजीब-सी एक्साइटमेंट थी। सड़कों पर गाड़ियां दौड़ रही थीं, पर मेरा मन पहले से ही ब्रज की गलियों में पहुंच चुका था। दिल्ली पार करते ही शहर की हस्ल-बस्ल खत्म होने लगी। अब सामने थे हरे-भरे खेत, मिट्टी की सोंधी खुशबू और गायों की रंभाहट। हर कुछ किलोमीटर पर कोई न कोई ढाबा, जहां तवे से उठती पराठों की भाप हवा में मिल रही थी।(मथुरा की धरती पर बसा यह पवित्र स्थान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक जिंदगी का एहसास, एक मन की यात्रा, और एक जन्नत का टुकड़ा है। )

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मथुरा पहुंचने से पहले ही कार के भीतर कोई भजन बजा “गोवर्धन धरन गोकुल तरन…और उस पल लगा जैसे सफर का मकसद अब बस एक ही है गोवर्धन की परिक्रमा। कार से उतरते ही सामने गोवर्धन पर्वत की झलक मिली। लोगों की भीड़, माथे पर चंदन, और चारों तरफ़ जयकारों की आवाज़ “जय गोवर्धन धारी!” और राधे-राधे हवा में भक्ति थी और ज़मीन पर श्रद्धा का संसार। इतना मनोरम दृश्य आप कहीं और नहीं देख सकते

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परिक्रमा का परमानंद

गोवर्धन की सबसे प्रसिद्ध परंपरा है उसकी परिक्रमा। करीब 21 किलोमीटर लंबी यह परिक्रमा हर यात्री के धैर्य और श्रद्धा की परीक्षा लेती है। सुबह-सुबह मैंने और मेरे दो साथियों ने इ-रिक्शा में बैठकर परिक्रमा शुरू की। शुरू में लगा “अरे, इतना तो आराम से कर लेंगे,” पर कुछ ही दूर चलने पर महसूस हुआ कि यह सिर्फ यात्रा नहीं है, बल्कि आत्मा की परीक्षा भी है। रास्ते में मिट्टी उड़ी हुई थी, थक चुके थे, लेकिन हर मोड़ पर कोई-न-कोई जय श्रीकृष्ण और राधे-राधे बोलता मिला और मन फिर ताज़ा हो गया।

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बुजुर्ग महिलाएं सिर पर कलश रखकर चल रही थीं, बच्चे भजन गा रहे थे, और परिंदे अपने ही ताल में झूम रहे थे। बीच में एक छोटे से ढाबे पर रुका। एक प्याला लस्सी ली इतनी ठंडी और गाढ़ी कि जैसे आत्मा तक ठंडक पहुंच गई हो। दुकानदार बोला भैया, परिक्रमा का असली मज़ा तो इसी मिट्टी में है, थकान तो बस तन की होती है, मन तो गोवर्धन में रम जाता है। वो बात सुनकर सच में लगा यहां हर कदम भक्ति की ओर जाता है।

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यात्रा से इतर अन्नकूट महोत्सव

यदि आप गोवर्धन में अन्नकूट के दिन पहुंचें तो मान लीजिए ब्रज की असली जन्नत देख ली है आपने। दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला यह पर्व गोवर्धन पूजा से जुड़ा हुआ है। मंदिरों में हजारों दीपक जलते हैं और तरह-तरह के व्यंजन पर्वत के रूप में सजाए जाते हैं। मैं जब दीवाली के पहले पहुंचा, तो भीड़ में एक अद्भुत एनर्जी थी। चारों तरफ़ खुशबू कहीं पूरी तल रही थी, कहीं हलवा बन रहा था। हर कोई प्रसाद चढ़ाने में व्यस्त था। मंदिर के भीतर जब प्रवेश किया, तो सामने देखा भोग की थालियां पर्वत की तरह सजी हुईं थी।

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चावल, दाल, सब्जियां, मिठाई, और फल सब कुछ भक्ति का रूप बन चुका था। वहां बैठे एक पुजारी ने कहा बाबूजी, ये पर्वत भोजन का नहीं, भावना का प्रतीक है। प्रसाद का पहला कौर लिया तो लगा जैसे भीतर तक संतोष उतर आया हो। ये किसी फाइव-स्टार डिनर जैसा स्वाद नहीं था, ये तो भक्ति का स्वाद था मीठा, सच्चा और आत्मा को तृप्त करने वाला।

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राधा कुंड और श्याम कुंड का रोमांच

गोवर्धन की यात्रा तब तक अधूरी है जब तक आप राधा कुंड और श्याम कुंड नहीं देख लेते। यह दोनों कुंड जैसे दो आत्माएं हैं एक प्रेम की, दूसरा भक्ति की। कहते हैं राधा कुंड का जल सबसे पवित्र है। वहां पहुंचा तो देखा सैकड़ों भक्त जल में स्नान कर रहे थे, कुछ लोग मौन साधे बैठे ध्यान कर रहे थे। एक वृद्धा ने बताया यहां  का पानी तन नहीं, मन धो देता है। पानी में डूबते सूरज की किरणें ऐसी लग रही थीं जैसे कोई गोल्डन मिरर चमक रहा हो। किनारे बैठे साधु तुलसी की माला फेरते हुए गा रहे थे – राधे-राधे बोलना पड़ेगा, वरना मन नहीं डोलेगा। उनकी आवाज़ में एक अजीब खिंचाव था। उस पल मुझे लगा कि गोवर्धन का हर कण राधा-कृष्ण के प्रेम की गवाही देता है।

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दीपों की रौशनी में सुकून का एहसास

शाम ढलते ही गोवर्धन का रूप बिल्कुल बदल जाता है। दिन की चहल पहल धीरे-धीरे शांत होती है, पर माहौल में एक दिव्य ऊर्जा भर जाती है। हर गली में दीपक जलते हैं, मंदिरों से भजन की मधुर ध्वनि आती है और हवा में अगरबत्ती की खुशबू तैरती है। मैं एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठा था। मिट्टी के कुल्हड़ में गरम चाय, सामने दीपों की पंक्तियां और पीछे बजता “हरे रामा हरे कृष्णा”। कुछ विदेशी श्रद्धालु भी थे, जो ‘हरे कृष्ण मूवमेंट’ से जुड़े थे। वे नाच रहे थे, गा रहे थे और हर चेहरे पर असीम शांति थी। पास बैठे एक ब्रजवासी ने बोला गोवर्धन की रात तो सोल थेरेपी है। तन थक सकता है, पर मन यहां कभी नहीं थकता। उसने सही कहा था। रात की वह निस्तब्धता, दीपों की वह मद्धम रोशनी, और हवा में घुली भक्ति — यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना देते हैं जिसे शब्दों में बांधा नहीं जा सकता।

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ठिकाना और लोगों की सादगी में छिपा अपनापन

गोवर्धन में ठहरने के लिए बहुत से धर्मशाला, आश्रम और छोटे होटल हैं। मैंने एक साधारण धर्मशाला चुनी, जहां दीवारों पर श्रीकृष्ण की लीला चित्रित थी। वहां का वातावरण बिल्कुल परिवार जैसा था। सुबह जब उठकर बाहर निकला तो देखा, बच्चे गायों को चारा खिला रहे थे, महिलाएं तुलसी को जल चढ़ा रही थीं। हर चेहरा मुस्कुराता हुआ, हर गली में जीवन का रंग बिखरा हुआ था। यहां के लोग भले ही सादगी से रहते हों, पर उनका दिल बहुत बड़ा है। हर कोई मदद करने को तत्पर, हर कोई मुस्कराहट के साथ स्वागत करने वाला। यही तो असली ब्रज की पहचान है मृदुलता और अपनापन।

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लौटते वक्त यादों में बस गया गोवर्धन

जब वापसी का वक्त आया, तो मन में अजीब-सी खामोशी थी। कार चल रही थी, पर दिल अभी भी गोवर्धन की गलियों में घूम रहा था। वो परिक्रमा की थकान, वो राधा कुंड की शांति, वो अन्नकूट का स्वाद, और वो रात की दीप मालाएं सब यादों के झरोखे में तैर रहे थे। गोवर्धन सिर्फ घूमने की जगह नहीं है, ये तो आत्मा को झकझोर देने वाला अनुभव है। यहां आकर समझ आता है कि श्रद्धा सिर्फ पूजा नहीं होती, वो जीवन का तरीका होती है। मैंने जब आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा, तो लगा जैसे पर्वत मुस्करा रहा हो।

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गोवर्धन जहां जन्नत धरती पर उतरती है!

गोवर्धन की यात्रा एक साधारण ट्रिप नहीं है, ये एक स्पिरिचुअल जर्नी है। जहां हर कदम भक्ति से भीगा हुआ है, हर हवा का झोंका प्रेम से सराबोर है। कभी तुम भी आना बिना किसी प्लान के, बस यूं ही। यहां की मिट्टी तुम्हारे जूतों से चिपक जाएगी, पर साथ ही तुम्हारे दिल में भी बस जाएगी। क्योंकि गोवर्धन कोई जगह नहीं, वो तो एक एहसास है जहां आस्था, सादगी, और सुकून तीनों एक साथ सांस लेते हैं। यहां आकर समझ आता है कि जन्नत कहीं ऊपर आसमान में नहीं, वो तो ब्रज की मिट्टी में है।

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