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बल्देवगढ़- एक ऐसा किला, जहां तोप चलाने से हो जाता था महिलाओं का गर्भपात!

मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित बल्देवगढ़ किला इतिहास का एक ऐसा नमूना है, जिसकी वीरता की कहानियां ना सिर्फ प्रेरित करती हैं, बल्कि बुन्देलखंड की गौरव को सहेजे हुए प्रतीत होता है। यह किला छोटा होते हुए भी अपने वैभव, स्थापत्य और वीरता की कहानियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। बुंदेलखंड की भूमि पर बसा यह किला एक ओर तो प्राचीन स्थापत्य कला की झलक दिखाता है, वहीं दूसरी ओर युद्धों और संघर्षों की गवाही भी देता है। चारों ओर फैली हरियाली, तालाब और ऊंची ऊंची पहाड़ियां इस किले को प्राकृतिक सौंदर्य से भी खास बनाती हैं

जब मैं यहां पहुंचा तो मुझे थोड़ी ग्लानि सी हुई, ग्लानि इस बात की इतनी खूबसूरत जगह को सरकार ने खंडर बना कर रखा है, ये नायाब चीजें हमारी धरोहर हैं और हमें इन चीजों की कद्र करनी चाहिए। खैर, बल्देवगढ़ कस्बा, टीकमगढ़ से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा है और यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे आसान साधन है। यह जगह भीड़भाड़ से दूर, शांति और इतिहास के खूबसूरत पन्नों को संजोए हुए है। जब कोई सैलानी किले की ओर बढ़ता है तो दूर से ही उसकी विशाल दीवारें और बुर्ज अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाते हैं।

बल्देवगढ़

स्थानीय लोग बताते हैं कि इस किले का नाम बल्देवगढ़ इसलिए पड़ा क्योंकि यहां कभी भगवान बलराम के मंदिर और उनकी पूजा का प्रचलन हुआ करता था। धीरे-धीरे यह जगह राजाओं और सेनापतियों की शरणस्थली बनी और एक मजबूत किले के रूप में विकसित हो गई। बल्देवगढ़ का वातावरण आज भी वीरता, शौर्य और परंपरा की कहानी कहता है। आइए इस पेशकश में जानते हैं, इस किले के बारे में कुछ खास बातें।

बल्देवगढ़ किला बुंदेला राजाओं की वीरता और स्थापत्य कला का जीवंत प्रतीक है। जैसा की आप तस्वीरों में देख पा रहे हैं कहा जाता है कि इस किले का निर्माण 17वीं शताब्दी में बुंदेला शासक राजा भोजराज ने करवाया था। उस समय बुंदेलखंड में लगातार युद्ध और संघर्ष चल रहे थे, इसलिए यह किला सुरक्षा और शासन दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था। किले की ऊंची दीवारें, मजबूत दरवाजे और गुप्त मार्ग इस बात का सबूत हैं कि इसे युद्धकला को ध्यान में रखकर बनाया गया था। यहां कई महल, मंदिर और बैठकें थीं जहां पर राजदरबार लगता था और समस्याएं निपटती थी। इतिहासकार बताते हैं कि यह किला कभी राजनीति, युद्धनीति और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।

बल्देवगढ़

मुगल और मराठों के दौर में भी बल्देवगढ़ किले का महत्व कम नहीं हुआ है। कई बार यह किला आक्रमणों और घेराबंदियों का गवाह बना, लेकिन अपनी मजबूती के कारण लंबे समय तक अडिग खड़ा रहा और आज भी भले सरकार इसकी देख रेख को नजरंदाज करती है फिर भी यह किला बहुत नायाब चीज है। यह किला सिर्फ ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि इसमें बुंदेला योद्धाओं की शौर्य गाथाएं दर्ज हैं। आज भी जब सैलानी इसके खंडहरों को देखते हैं तो उन्हें अतीत की वह गूंज सुनाई देती है, जब तलवारें टकराती थीं और रणभूमि में जयघोष गूंजता था।

बल्देवगढ़ किले की सबसे बड़ी खूबी इसकी स्थापत्य कला है। भले ही यह किला आकार में बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन इसकी संरचना बेहद मजबूत और आकर्षक है। किले के चारों ओर ऊंची दीवारें बनी हुई हैं, जिन पर बने बुर्ज और झरोखे आज भी स्थापत्य की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। किले के अंदर बने महल कभी राजपरिवार का निवास स्थल हुआ करते थे। इन महलों की खिड़कियों और दरवाजों पर की गई नक्काशी उस समय की कारीगरी का अद्भुत उदाहरण है। किले के भीतर एक सुंदर तालाब भी है, जिसे यहां के निवासी ‘सागर ताल’ कहते हैं।

यह तालाब न केवल जल की जरूरत पूरी करता था बल्कि किले की खूबसूरती भी बढ़ाता है। किले के अंदर बने मंदिर इसकी धार्मिक महत्ता को भी दर्शाते हैं। बहुत पहले यहां भगवान बलराम और अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती थी। इसके अलावा किले में बने गुप्त मार्ग और तहखाने यह बताते हैं कि इसे कितनी सोच-समझकर डिजाइन किया गया था। आज भले ही किला खंडहर हो गया हो, लेकिन इसके खंडहरों में भी एक अलग ही रोमांच और रहस्य छिपा है। पर्यटक जब इसकी दीवारों पर हाथ रखते हैं तो उन्हें पत्थरों के बीच से इतिहास की धड़कनें सुनाई देती हैं। स्थापत्य कला के ये नमूने बल्देवगढ़ को विशेष बनाते हैं।

बल्देवगढ़ किला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की संस्कृति का भी हिस्सा है। यहां के लोग इस किले से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं। स्थानीय लोककथाओं में इस किले का जिक्र बार-बार आता है। बुजुर्ग आज भी वीर योद्धाओं की कहानियां सुनाते हैं, जिन्होंने इस किले की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हैं। त्यौहारों और मेलों के दौरान बल्देवगढ़ किले की रौनक और बढ़ जाती है। खासकर, होली, दीवाली और दशहरा जैसे पर्व यहां बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। होली पर यहां का माहौल बेहद खास होता है, जब लोकगीतों की गूंज और रंगों की बौछार इस किले की दीवारों को भी सुंदर बना देती है। यहां की लोककथाओं में छिपी वीरता और प्रेम की कहानियां पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।

बल्देवगढ़

कहा जाता है कि इस किले में कभी राजा-रानियों का शाही परिवार बसा था, जिसकी चहल-पहल  अब भी हवा में महसूस की जा सकती है। बुंदेली कला, नृत्य और संगीत की परंपरा इस किले से गहराई से जुड़ी है। बल्देवगढ़ किला बुंदेलखंड की आत्मा को समझने का एक माध्यम है। यहां आकर कोई भी सिर्फ दीवारें और खंडहर नहीं देखता, बल्कि उस संस्कृति को महसूस करता है जिसने सदियों से इस भूमि को जीवित रखा है। मैंने स्वयं यहां आकार यह अनुभव की इतिहास में हमारी संस्कृति कितनी खास थी। खास तो आज भी लेकिन यदि हम इसे सुरक्षित कर पाएं तो ज्यादा बेहतर होगा।  

आज बल्देवगढ़ किला भले ही खंडहर में तब्दील हो चुका हो, लेकिन इसका आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ है। यह जगह इतिहास प्रेमियों, फोटोग्राफरों और रोमांच की तलाश में आने वाले पर्यटकों के लिए किसी रोमांटिक जगह से कम नहीं है। पर्यटन की दृष्टि से यह किला बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी देखरेख और प्रचार-प्रसार की कमी के कारण अभी तक यह राष्ट्रीय स्तर पर उतना प्रसिद्ध नहीं हो पाया है। यदि सरकार और स्थानीय प्रशासन इस किले को संरक्षित करने पर ध्यान दें तो यह न सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय बन सकता है। सैलानी यहां आकर इतिहास को जीते हैं, स्थापत्य की सुंदरता को देखते हैं और बुंदेली संस्कृति का अनुभव करते हैं।

बल्देवगढ़

आसपास के गांवों की सादगी और लोगों की मेहमाननवाजी भी यात्रा को खास बना देती है। बल्देवगढ़ किला भविष्य में मध्यप्रदेश का एक बड़ा पर्यटन केंद्र बन सकता है। यहां रिसॉर्ट, गाइडेड टूर और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएं तो यह जगह और भी सुंदर हो उठेगी। सच कहा जाए तो बल्देवगढ़ किला अतीत और वर्तमान के बीच पुल की तरह है, जो आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ने का काम करता है।

मध्यप्रदेश के जिले टीकमगढ़ से किले की दूरी मात्र 20 से 30 km है, हर समय यहां बसें चालू हैं तो आप जब चाहें यहां आ सकते हैं, इसके अलावा टीकमगढ़ रेलवे स्टेशन भी है तो आपका सफर ट्रेन से और भी आसान हो सकता है। किले में किसी तरह की सिक्युरिटी नहीं है लेकिन यहां इसकी देखभाल करने के लिए लोग हैं, जो यहां पर साफ सफाई मेन्टेन रखते हैं। किले में जाने के लिए शुल्क की बात करूं तो आपको मात्र 20 रुपए व्यक्ति देना होगा। मुझे नहीं लगता इससे बेहतर कोई भी जगह हो सकती है।

Written by- Pushpendra Goutam

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