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Dedicated Freight Corridor से बदल रही है भारत की रेल रफ्तार

Dedicated Freight Corridor

भारत में ट्रेन से सफर करने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने कभी अपनी ट्रेन को सिग्नल पर खड़े होकर दूसरी ट्रेन का इंतजार करते हुए न देखा हो। कई बार पैसेंजर ट्रेन को इसलिए रोक दिया जाता है क्योंकि आगे से मालगाड़ी निकलनी होती है। वहीं दूसरी तरफ मालगाड़ियों को भी घंटों लूप लाइन पर खड़ा रहना पड़ता है, ताकि सुपरफास्ट और एक्सप्रेस ट्रेनें आसानी से निकल सकें।

रेलवे की इस पुरानी व्यवस्था में यात्रियों का समय भी जाता था और माल को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में भी काफी वक्त लगता था। यही वह समस्या थी, जिसे दूर करने के लिए भारत में Dedicated Freight Corridor यानी मालगाड़ियों के लिए अलग रेल नेटवर्क बनाने की योजना तैयार की गई। आसान भाषा में कहें तो DFC ऐसी रेल लाइन है, जो खास तौर पर मालगाड़ियों के लिए बनाई गई है।

इन पटरियों पर यात्री ट्रेनें नहीं चलेंगी। इसका मतलब यह हुआ कि मालगाड़ियों को अपनी अलग लाइन मिल गई और यात्री ट्रेनों के लिए पुरानी रेल लाइनों पर रास्ता काफी हद तक खाली हुआ। आज DFC भारत के रेल और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। करीब 2,843 किलोमीटर लंबा यह नेटवर्क देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ता है और भारी मात्रा में सामान को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में मदद कर रहा है। Dedicated Freight Corridor के पूरा होने के साथ माल ढुलाई के तरीके में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है

DFC बनाने का विचार कहां से आया?

Dedicated Freight Corridor की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी। इसके पीछे करीब दो दशक की लंबी तैयारी और काम रहा है। साल 2005 में भारत और जापान के बीच हुई बैठक के दौरान इस तरह के फ्रेट कॉरिडोर की जरूरत और इसके निर्माण को लेकर चर्चा हुई। इसके बाद दोनों देशों के बीच सहयोग को लेकर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए गए।

Dedicated Freight Corridor

साल 2006 में इस प्रोजेक्ट को औपचारिक मंजूरी मिली। इसी के बाद 30 अक्टूबर 2006 को Dedicated Freight Corridor Corporation of India Limited यानी DFCCIL की स्थापना की गई। इस कंपनी को DFC के निर्माण और उससे जुड़े कामों की जिम्मेदारी दी गई।

लेकिन इतने बड़े रेल नेटवर्क को तैयार करना आसान काम नहीं था। जमीन अधिग्रहण से लेकर निर्माण तक कई तरह की परेशानियां सामने आईं। ठेकों में देरी हुई और अलग-अलग हिस्सों में निर्माण कार्य को पूरा करने में समय लगा। इसी वजह से Dedicated Freight Corridor को पूरी तरह तैयार होने में करीब 20 साल का लंबा समय लगा।

आज जब यह नेटवर्क तैयार होकर काम कर रहा है, तो इसकी सबसे खास बात इसकी तकनीक और क्षमता है। भारत में पूरी तरह बिजली से चलने वाला डबल-स्टैक कंटेनर फ्रेट कॉरिडोर तैयार हुआ है। यानी DFC सिर्फ एक अलग रेल लाइन नहीं है, बल्कि इसे भारी माल ढुलाई को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

इस प्रोजेक्ट में इतनी बड़ी रकम क्यों लगी?

इतने बड़े Dedicated Freight Corridor को तैयार करने के लिए भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय सहयोग भी मिला। ईस्टर्न कॉरिडोर के लिए विश्व बैंक ने करीब 14,900 करोड़ रुपये का कर्ज दिया। वहीं वेस्टर्न कॉरिडोर के निर्माण के लिए जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी यानी JICA की तरफ से करीब 38,722 करोड़ रुपये की मदद मिली।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि DFC सिर्फ एक सामान्य रेलवे प्रोजेक्ट नहीं था। इसके लिए अलग तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर, नई तकनीक और बड़े स्तर पर निर्माण की जरूरत थी। Dedicated Freight Corridor को इस तरह तैयार किया गया कि भारी और लंबी मालगाड़ियां ज्यादा तेजी और बेहतर तरीके से चल सकें।

DFC के दो बड़े हिस्से

भारत का 2,843 किलोमीटर लंबा DFC मुख्य रूप से दो बड़े कॉरिडोर में बंटा हुआ है। इनमें पहला है ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और दूसरा है वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर।

ईस्टर्न DFC

ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर यानी EDFC करीब 1,337 किलोमीटर लंबा है। यह पंजाब के न्यू साहनेवाल, लुधियाना से शुरू होकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश से होते हुए बिहार के न्यू सोननगर तक जाता है। यह हिस्सा अक्टूबर 2023 में पूरी तरह चालू हो गया था।

इस DFC का मुख्य काम कोयला, लोहा, इस्पात, खाद्यान्न और दूसरे भारी खनिजों को तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना है। देश के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों के बीच भारी सामान की आवाजाही में ईस्टर्न Dedicated Freight Corridor की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।

पहले ऐसे सामान को ले जाने के लिए सामान्य रेलवे नेटवर्क पर निर्भर रहना पड़ता था। वहां यात्री और मालगाड़ियां दोनों एक ही नेटवर्क का इस्तेमाल करती थीं। अब DFC के अलग ट्रैक मिलने से मालगाड़ियों को अपनी अलग राह मिल गई है।

वेस्टर्न DFC

दूसरा बड़ा हिस्सा है वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर यानी WDFC। इसकी लंबाई करीब 1,506 किलोमीटर है। यह उत्तर प्रदेश के न्यू दादरी से शुरू होकर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात से गुजरते हुए महाराष्ट्र में मुंबई के पास जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट यानी JNPT तक जाता है। वेस्टर्न DFC खास तौर पर एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंटेनर ट्रैफिक और औद्योगिक सामान की ढुलाई के लिए तैयार किया गया है।

हाल ही में न्यू सानंद नॉर्थ-न्यू मकरपुरा, न्यू उमरगाँव-न्यू सफाले और न्यू सफाले-न्यू JNPT जैसे आखिरी तीन सेक्शन के उद्घाटन के साथ पूरा वेस्टर्न Dedicated Freight Corridor 100 प्रतिशत चालू हो गया। इन तीन सेक्शन को पूरा करने में 20,700 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आई। इसके साथ ही भारत का पूरा 2,843 किलोमीटर लंबा DFC नेटवर्क चालू हो गया।

डबल-स्टैक ट्रेनें क्यों हैं खास?

वेस्टर्न DFC की सबसे खास बात इसकी डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेनें हैं। आपने शायद कभी ऐसी ट्रेन देखी हो, जिसमें एक कंटेनर के ऊपर दूसरा कंटेनर रखा होता है। इसे ही डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेन कहा जाता है। आम तौर पर इतनी ऊंचाई वाली ट्रेन को बिजली के तारों के नीचे चलाना आसान नहीं होता। दूसरे देशों में भी डबल-स्टैक ट्रेनें चलती हैं, लेकिन वहां कई जगह ऐसी ट्रेनें डीजल इंजन से चलाई जाती हैं।

Dedicated Freight Corridor

भारत ने इस समस्या को अलग तरीके से हल किया। वेस्टर्न Dedicated Freight Corridor पर ओवरहेड इलेक्ट्रिक तारों यानी OHE को सामान्य ऊंचाई से काफी ऊपर रखा गया है। जहां सामान्य ऊंचाई करीब 6 मीटर होती है, वहीं यहां इसे लगभग 7.45 मीटर तक रखा गया है।

इस ऊंचाई की वजह से डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेनें बिजली के तारों के नीचे आसानी से चल सकती हैं। इसके लिए खास तरह के हाई-रिच पेंटोग्राफ भी बनाए गए हैं। यानी DFC पर सिर्फ पटरियां और तार ही अलग नहीं हैं, बल्कि बिजली लेने के लिए इस्तेमाल होने वाली तकनीक को भी इस हिसाब से तैयार किया गया है।

12,000 हॉर्सपावर वाले इंजन

इतनी भारी मालगाड़ियों को खींचने के लिए सामान्य इंजन पर्याप्त नहीं होते। इसलिए Dedicated Freight Corridor पर शक्तिशाली WAG-12B क्लास के इलेक्ट्रिक इंजन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ये इंजन बिहार के मधेपुरा में बनाए गए हैं और इनकी क्षमता 12,000 हॉर्सपावर है। ये करीब 6,000 टन तक का भार खींच सकते हैं।

इनकी रफ्तार 100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है। सोचिए, एक तरफ एक के ऊपर एक कंटेनर रखे हुए हैं, दूसरी तरफ हजारों टन सामान है और उसे खींचने के लिए 12,000 हॉर्सपावर का इलेक्ट्रिक इंजन लगा हुआ है। यही वजह है कि DFC को सामान्य मालगाड़ी नेटवर्क से अलग माना जाता है।

माल पहुंचाने में बच रहा है समय

DFC का सबसे बड़ा फायदा समय की बचत के रूप में सामने आया है। पहले उत्तर प्रदेश के दादरी से मुंबई के JNPT बंदरगाह तक माल पहुंचाने में औसतन करीब 66 घंटे लगते थे। अब यह समय घटकर करीब 58 घंटे रह गया है। यानी एक ही रूट पर करीब 8 घंटे की बचत हो रही है।

व्यापार और उद्योग के लिए ये 8 घंटे भी काफी मायने रखते हैं, क्योंकि माल जितनी जल्दी पहुंचेगा, आगे की पूरी प्रक्रिया उतनी ही तेजी से हो सकेगी। सामान्य रेलवे नेटवर्क पर मालगाड़ियों की औसत रफ्तार करीब 20 से 25 किलोमीटर प्रति घंटे तक रह जाती थी।

वहीं Dedicated Freight Corridor पर मालगाड़ियां करीब 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की औसत रफ्तार से चल रही हैं। कुछ हिस्सों में इनकी रफ्तार 99 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक भी पहुंच रही है। यानी DFC ने मालगाड़ियों की रफ्तार को काफी बदल दिया है।

लॉजिस्टिक्स का खर्च भी कम होगा

किसी सामान को बनाने के बाद उसे बाजार तक पहुंचाना हो या किसी कारखाने के लिए कच्चा माल लाना हो, हर जगह परिवहन की लागत जुड़ी होती है। इसे ही लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कहा जाता है। भारत में यह लागत पहले जीडीपी के करीब 14 प्रतिशत तक हुआ करती थी।

Dedicated Freight Corridor नेटवर्क की वजह से इस लागत को 8-9 प्रतिशत या करीब 7 प्रतिशत तक लाने का अनुमान है। अगर ऐसा होता है तो इसका फायदा सिर्फ रेलवे को नहीं बल्कि उद्योग और व्यापार को भी मिलेगा। सामान को कम समय और कम खर्च में पहुंचाना आसान होगा। इससे भारतीय सामान को वैश्विक बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनाने में भी मदद मिल सकती है।

सिर्फ 4 प्रतिशत नेटवर्क, लेकिन 14 प्रतिशत से ज्यादा माल ढुलाई

DFC की एक और खास बात इसकी क्षमता है। यह भारतीय रेलवे के कुल रेल नेटवर्क का करीब 4 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन इसके बावजूद यह देश की कुल रेल माल ढुलाई का 14 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा संभाल रहा है। वर्तमान में ईस्टर्न और वेस्टर्न Dedicated Freight Corridor पर रोजाना करीब 400 से ज्यादा मालगाड़ियां चल रही हैं।

इसका मतलब है कि इन अलग पटरियों का इस्तेमाल लगातार बड़े स्तर पर हो रहा है। यही वजह है कि DFC को देश के लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के लिए एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

आम रेल यात्रियों को इससे क्या फायदा?

पहली नजर में लग सकता है कि Dedicated Freight Corridor का आम यात्रियों से क्या लेना-देना है। आखिर इन पटरियों पर तो यात्री ट्रेनें चलती ही नहीं हैं। लेकिन इसका फायदा यात्रियों को सीधे तौर पर मिल रहा है। पहले भारी मालगाड़ियां और यात्री ट्रेनें एक ही रेल नेटवर्क का इस्तेमाल करती थीं। जब मालगाड़ियों को DFC की अलग लाइन मिल गई, तो सामान्य रेल लाइनों पर दबाव कम हुआ।

इसका सीधा फायदा यात्री और एक्सप्रेस ट्रेनों को मिला। उनके लिए रास्ता ज्यादा खुला और ट्रेनों की लेटलतीफी कम करने में मदद मिली। यानी DFC पर मालगाड़ी चली, लेकिन उसका फायदा पैसेंजर ट्रेन में सफर करने वाले लोगों को भी मिला।

सड़क पर भी कम हो सकता है दबाव

भारी मात्रा में सामान को ट्रकों के जरिए एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने पर सड़कों पर ज्यादा वाहन चलते हैं। इससे जाम, ईंधन की खपत और प्रदूषण जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। Dedicated Freight Corridor के जरिए बड़ी मात्रा में सामान रेल से ले जाने पर सड़क पर भारी वाहनों का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

साथ ही बिजली से चलने वाली मालगाड़ियों की वजह से ईंधन की बचत और कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलती है। इस तरह DFC का असर सिर्फ रेलवे की पटरियों तक सीमित नहीं है। इसका संबंध सड़क, उद्योग, व्यापार और पर्यावरण से भी जुड़ता है।

सामान की कीमतों पर भी असर

जब किसी कारखाने तक कच्चा माल पहुंचने में कम समय और कम खर्च लगेगा, तो उत्पादन की पूरी प्रक्रिया ज्यादा बेहतर हो सकती है। इसी तरह तैयार सामान को बाजार तक पहुंचाने में भी समय और लागत कम हो सकती है। DFC से लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कम होने की उम्मीद इसी वजह से महत्वपूर्ण है। इसका फायदा आगे चलकर रोजमर्रा की चीजों और खाने-पीने के सामान की कीमतों में स्थिरता लाने में भी मिल सकता है।

DFC के बाद अब आगे की तैयारी

2,843 किलोमीटर के Dedicated Freight Corridor नेटवर्क के चालू होने के बाद अब देश में फ्रेट नेटवर्क को और बड़ा करने की तैयारी है। पश्चिम बंगाल के दनकुनी से गुजरात के सूरत तक 2,052 किलोमीटर लंबे तीसरे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की घोषणा की गई है। यह नया DFC पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे 6 राज्यों को जोड़ने की योजना का हिस्सा है।

इसके अलावा खड़गपुर से विजयवाड़ा वाले ईस्ट कोस्ट कॉरिडोर और इटारसी से विजयवाड़ा वाले नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर जैसे संभावित प्रोजेक्ट की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी DPR पर भी काम चल रहा है। इसका मतलब साफ है कि Dedicated Freight Corridor की कहानी 2,843 किलोमीटर पर खत्म नहीं होने वाली। देश में माल ढुलाई के लिए अलग और तेज रेल नेटवर्क तैयार करने की योजना आगे भी बढ़ रही है।

भारत की बदलती रेल रफ्तार

अगर पुराने समय की रेलवे व्यवस्था को देखें, तो मालगाड़ियों को यात्री ट्रेनों के बीच रास्ता मिलने का इंतजार करना पड़ता था और यात्री ट्रेनों को मालगाड़ियों के निकलने का। DFC ने इस व्यवस्था को काफी हद तक अलग कर दिया है। अब मालगाड़ियों के लिए अलग ट्रैक है, ज्यादा वजन उठाने की क्षमता है, डबल-स्टैक कंटेनर हैं, ऊंचे OHE हैं और 12,000 हॉर्सपावर वाले इलेक्ट्रिक इंजन हैं।

Dedicated Freight Corridor

दूसरी तरफ सामान्य रेलवे नेटवर्क पर यात्री ट्रेनों के लिए भी ज्यादा जगह बन रही है। यही वजह है कि Dedicated Freight Corridor को सिर्फ मालगाड़ियों के लिए बनाई गई रेल लाइन समझना पूरी तस्वीर नहीं बताता। यह देश की परिवहन व्यवस्था में बदलाव का एक बड़ा हिस्सा है।

2,843 किलोमीटर लंबे DFC के पूरी तरह चालू होने के बाद अब माल ढुलाई की रफ्तार पहले से तेज हुई है। दादरी से JNPT तक माल पहुंचाने का समय घटा है, डबल-स्टैक कंटेनर ट्रेनें चल रही हैं और रोजाना सैकड़ों मालगाड़ियां इस नेटवर्क का इस्तेमाल कर रही हैं। आने वाले समय में अगर नए Dedicated Freight Corridor भी तैयार होते हैं, तो देश के अलग-अलग औद्योगिक और व्यापारिक इलाकों के बीच सामान की आवाजाही और तेज हो सकती है।

Five Colors of Travel की ओर से कुछ खास सुझाव

  • DFC को समझें: रेल सफर में इसके रूट और डबल-स्टैक ट्रेनों को जरूर देखें।
  • रेल से सामान भेजें: भारी सामान के लिए रेल परिवहन को प्राथमिकता दें।
  • रफ्तार पर ध्यान दें: DFC ने मालगाड़ियों की बदलती रफ्तार को समझने का मौका दिया है।
  • नई तकनीक देखें: ऊंचे OHE और WAG-12B इंजन खास आकर्षण हैं।
  • रेलवे का नया रूप जानें: पुराने रेल नेटवर्क के साथ Dedicated Freight Corridor को भी समझें।
Shivani Pal

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