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भारत के 7 Cave Temples जहाँ इतिहास, Spiritual Vibes और Adventure का मिलता है परफेक्ट कॉम्बो

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अगर आपकी Travel Bucket List में सिर्फ Hill Stations, Beaches या Forts ही शामिल हैं, तो अब उसमें कुछ ऐसे Cave Temples भी जोड़ लीजिए जो आपको हजारों साल पुराने भारत से रूबरू कराएंगे। ये Cave Temples सिर्फ पूजा-अर्चना की जगह नहीं हैं, बल्कि हमारी तहज़ीब, फ़न-ए-तामीर (Architecture) और बेहतरीन कारीगरी का जीता-जागता सबूत भी हैं। सोचिए, बिना किसी आधुनिक मशीन के पहाड़ों को काटकर बनाए गए ये मंदिर आज भी उतने ही शानदार दिखाई देते हैं। हर Cave की अपनी अलग कहानी है। कहीं भगवान शिव की विशाल प्रतिमा आपका इस्तकबाल करती है, तो कहीं बुद्ध की शांत मूर्तियां दिल को सुकून देती हैं। अगर आपको History, Nature, Photography और Spiritual Travel पसंद है, तो ये 7 Cave Temples आपकी अगली Trip के लिए बिल्कुल परफेक्ट हैं। 1. कैलासा मंदिर, एलोरा Cave, महाराष्ट्र एक ही चट्टान से बना दुनिया का बेमिसाल शाहकार महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास स्थित एलोरा का कैलासा मंदिर दुनिया के सबसे शानदार Cave Temples में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे एक ही विशाल चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर बनाया गया था। माना जाता है कि इसका निर्माण 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम ने करवाया था। आज भी इसे देखकर यकीन करना मुश्किल लगता है कि इतनी विशाल संरचना बिना आधुनिक तकनीक के बनाई गई होगी। इस जगह की खास बातें पूरा मंदिर एक ही पत्थर से तराशा गया है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर UNESCO World Heritage Site का हिस्सा है। इसकी नक्काशी और वास्तुकला दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहां क्या देखें? विशाल नंदी मंडप। भगवान शिव का मुख्य गर्भगृह। रामायण और महाभारत की कहानियों को दर्शाती पत्थर की नक्काशी। घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च। सुबह 9 बजे के आसपास पहुंचना सबसे बेहतर रहता है। कैसे पहुंचे? औरंगाबाद एयरपोर्ट से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित है। टैक्सी और बस आसानी से मिल जाती हैं। 2. अजंता Cave, महाराष्ट्र जहाँ हर दीवार एक कहानी सुनाती है अजंता की Cave भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में अपनी बौद्ध चित्रकला और मूर्तियों के लिए मशहूर है। यहां कुल 30 Cave हैं जिनका निर्माण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर छठी शताब्दी तक हुआ। इन गुफाओं की दीवारों पर बनी पेंटिंग्स आज भी लोगों को हैरान कर देती हैं। इस जगह की खास बातें लगभग 2000 साल पुरानी Wall Paintings। बौद्ध धर्म की कला और संस्कृति का शानदार संग्रह। UNESCO World Heritage Site। यहां क्या देखें? बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं। खूबसूरत चैत्य और विहार। रंग-बिरंगी प्राचीन चित्रकारी। घूमने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी। कैसे पहुंचे? औरंगाबाद और जलगांव दोनों से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। 3. एलीफेंटा Cave, महाराष्ट्र समुद्र के बीच बसी एक ऐतिहासिक दुनिया अगर आप किसी ऐसे Cave Temple की तलाश में हैं जहां पहुंचने का सफर भी उतना ही मजेदार हो, तो एलीफेंटा आपके लिए बेस्ट है। मुंबई के Gateway of India से Ferry Ride लेकर इस द्वीप तक पहुंचा जाता है। यहां की विशाल त्रिमूर्ति शिव प्रतिमा दुनिया भर में मशहूर है। इस जगह की खास बातें भगवान शिव को समर्पित प्राचीन Cave Temple। समुद्र के बीच स्थित शानदार Heritage Site। UNESCO World Heritage Site। यहां क्या देखें? त्रिमूर्ति शिव प्रतिमा। महेशमूर्ति। विशाल पत्थर के स्तंभ और गुफाएं। घूमने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी। सुबह की Ferry लेना सबसे बेहतर रहता है। कैसे पहुंचे? मुंबई के Gateway of India से Ferry द्वारा लगभग एक घंटे में पहुंच सकते हैं। 4. बादामी Cave Temples, कर्नाटक   लाल चट्टानों के बीच छिपा Heritage Gem कर्नाटक के बादामी में स्थित ये Cave Temples चालुक्य साम्राज्य की शानदार विरासत हैं। लाल बलुआ पत्थर की पहाड़ियों में बने ये मंदिर History Lovers और Architecture Enthusiasts दोनों के लिए किसी खजाने से कम नहीं हैं। इस जगह की खास बातें चार प्रमुख Cave जिनमें हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म की झलक मिलती है। शानदार Rock-Cut Architecture। अगस्त्य झील के किनारे खूबसूरत लोकेशन। यहां क्या देखें? भगवान विष्णु और शिव की मूर्तियां। नटराज की शानदार प्रतिमा। अगस्त्य झील का पैनोरमिक View। घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी। कैसे पहुंचे? हुबली एयरपोर्ट सबसे नजदीक है। वहां से टैक्सी और बस उपलब्ध हैं। 5. उदयगिरि Cave, मध्य प्रदेश गुप्तकाल की अनमोल विरासत मध्य प्रदेश के विदिशा के पास स्थित उदयगिरि Cave भारत के सबसे पुराने हिंदू Rock-Cut Temples में से एक है। यहां की गुफाएं गुप्तकालीन कला और इतिहास की शानदार मिसाल पेश करती हैं। इस जगह की खास बातें भगवान विष्णु के वराह अवतार की विशाल प्रतिमा। गुप्तकाल की बेहतरीन मूर्तिकला। कम भीड़ और बेहद शांत माहौल। यहां क्या देखें? वराह अवतार की विशाल नक्काशी। प्राचीन शिलालेख। Rock-Cut मंदिरों की अनोखी बनावट। घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च। कैसे पहुंचे? भोपाल से लगभग 60 किलोमीटर और विदिशा से करीब 4 किलोमीटर दूर स्थित है। 6. पातालेश्वर Cave Temple, पुणे शहर के बीच छिपा Ancient Treasure पुणे के बीचों-बीच मौजूद यह Cave Temple 8वीं शताब्दी का माना जाता है। एक ही पत्थर को काटकर बनाए गए इस मंदिर का माहौल बेहद सुकूनभरा है। शहर की भागदौड़ के बीच यह जगह किसी Hidden Gem जैसी महसूस होती है। इस जगह की खास बातें भगवान शिव को समर्पित मंदिर। एक ही चट्टान से बनी पूरी संरचना। बेहद शांत और साफ-सुथरा परिसर। यहां क्या देखें? शिवलिंग। नंदी मंडप। गोलाकार पत्थर के स्तंभ। घूमने का सबसे अच्छा समय पूरा साल, लेकिन सुबह और शाम का समय सबसे अच्छा रहता है। कैसे पहुंचे? पुणे रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 7. गुप्तेश्वर Cave Temple, ओडिशा जंगलों के बीच बसी रूहानी दुनिया ओडिशा के कोरापुट जिले में स्थित गुप्तेश्वर Cave Temple Nature और Spirituality का खूबसूरत मेल है। घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच मौजूद यह Cave भगवान शिव को समर्पित है। यहां पहुंचते ही ठंडी हवा, हरियाली और गुफा का रहस्यमयी माहौल दिल को सुकून देता है। इस जगह की खास बातें प्राकृतिक Cave के अंदर स्थित शिवलिंग। हरियाली और पहाड़ों से घिरा शांत वातावरण। Adventure और Spiritual Travel का शानदार कॉम्बिनेशन। यहां क्या देखें? प्राकृतिक Cave। शिवलिंग। आसपास के

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INDORE: के यह 5 बाजार हैं शॉपिंग के लिए सबसे परफेक्ट, जहां एक बार तो जाना बनता है!

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INDORE: इंदौर बस साफ–सफाई में नंबर वन नहीं है, खरीदारी के लिए भी हिंदुस्तान के सबसे सुंदर और मोहक शहरों में से एक माना जाता है। यहां की गलियों में घूमते हुए जो अपनापन, ताज़गी और खुशबू महसूस होती है, वह शायद ही कहीं और मिले। इंदौर अपने बेहतरीन खान–पान, शानदार कपड़ा मंडियों, आकर्षक कॉस्मेटिक शॉप्स, किताबों की महक और रंग–बिरंगी साड़ियों के लिए मशहूर है। अगर कोई शख्स इंदौर घूमने आए और यहां की मार्केट की रौनक न देखे, तो समझिए सफर अधूरा है। शहर के कुछ खास बाज़ार जिसमें छप्पन दुकान, एमटी कपड़ा बाज़ार, अटाला बाज़ार, खजूरी बाज़ार और शीतलामाता बाजार न सिर्फ खरीदारी का केंद्र हैं, बल्कि यहां की संस्कृति, लोगों की गर्मजोशी और इंदौरी अंदाज़ को खुलकर बयां करती है। हर गली में एक नया रंग बिखरा हुआ हो और दुकानदारों की मुस्कुराहटों में अपनापन महसूस होता है। यही वजह है कि इंदौर की मार्केट्स पूरे देश में चर्चित हैं और यहां का माहौल पर्यटकों को हमेशा बांधकर रखता है। छप्पन दुकान मार्केट (Chappan Dukan Market) सबसे पहले बात करते हैं छप्पन दुकान की जिसे इंदौर का मिनी फूड पैराडाइज़ कहा जाता है। नाम छप्पन दुकान इसलिए पड़ा क्योंकि शुरुआत में यहां सिर्फ 56 दुकानें थीं और हर दुकान किसी न किसी खास व्यंजन के लिए फेमस थी। आज भी यह जगह इंदौर का दिल मानी जाती है जहां सुबह से रात तक भीड़ लगी रहती है। पोहा, जलेबी, भुट्टे का किस, दही वड़ा, गराड़ू, मकई, फलूदा, पान, मोमोज़, पिज़्ज़ा, सब कुछ यहां मिलता है। खाने के साथ–साथ यहां स्ट्रीट शॉपिंग भी काफी मज़ेदार है। परिवार, दोस्त, कपल, सभी कभी न कभी यहां जरूर आते हैं। छप्पन दुकान में स्वाद की खुशी और इंदौर की मेहमाननवाज़ी का असली मज़ा मिलता है। शाम के समय मार्केट लाइट्स, म्यूजिक और भीड़ का जो माहौल बनता है, वह अपने आप में त्यौहार जैसा लगता है। यह जगह बताती है कि भोजन सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं बल्कि शहर की पहचान और संस्कृति का प्रतीक है और सच कहें तो यहां खाए गए व्यंजनों का स्वाद ज़िंदगी भर याद रहता है। कहां है और कैसे पहुंचे? छप्पन दुकान इंदौर के न्यू पलासिया में स्थित है, शहर के बीचों बीच। इंदौर रेलवे स्टेशन से यह लगभग 3 किलोमीटर और देवी अहिल्या एयरपोर्ट से करीब 10 किलोमीटर दूर है। यहां ऑटो, कैब या सिटी बस से आसानी से पहुंचा जा सकता है। पार्किंग और बैठने की अच्छी सुविधा भी उपलब्ध है।(यही वजह है कि इंदौर की मार्केट्स पूरे देश में चर्चित हैं और यहां का माहौल पर्यटकों को हमेशा बांधकर रखता है।) एमटी कपड़ा मार्केट (MT Kapda Market) अब ज़िक्र करते हैं एमटी कपड़ा बाज़ार का जो इंदौर ही नहीं बल्कि पूरे मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी कपड़ा मंडी मानी जाती है। यहां थोक का कारोबार इतना बड़ा है कि पूरे देश से व्यापारी कपड़े खरीदने आते हैं। शादी–विवाह हो या त्यौहार हर मौके के लिए यहां शानदार वैराइटी मिलती है सूट–सलवार, कुर्ती, ब्लाउज़ डिजाइन, लहंगे, पुरुषों के शेरवानी, जोधपुरी सेट्स, बच्चों के गारमेंट्स और होम टेक्सटाइल की भी बेहतरीन रेंज उपलब्ध है। यहां कपड़े इतने किफायती दाम पर मिलते हैं कि लोग आसपास के शहरों से स्पेशल खरीदारी करने आते हैं। पूरे बाज़ार में दौड़ती–भागती गाड़ियां, कपड़े ले जाते मज़दूर, दुकानों में लगी भीड़ और सौदेबाज़ी का माहौल दिलचस्प लगता है। अगर किसी को फैशन बिज़नेस शुरू करना हो तो एमटी कपड़ा बाज़ार उसके लिए सोने की खान साबित हो सकता है। इतने विशाल स्तर पर व्यापार होने के बाद भी दुकानदारों की विनम्रता और व्यवहार दिल जीत लेते हैं। यह बाज़ार शहर की आर्थिक ताकत का बड़ा स्तंभ माना जाता है। यह भी पढे – Hidimba Devi Temple: हिमाचल के मनाली में एकमात्र भीम की पत्नी हिडिंबा को समर्पित महाभारत युगीन मंदिर!  कहां है और कैसे पहुंचे? एमटी कपड़ा बाज़ार इंदौर के उषा नगर / सांताक्रूज़ Santa Cruz क्षेत्र में स्थित है। यह शहर का प्रमुख थोक कपड़ा हब है। इंदौर रेलवे स्टेशन से लगभग 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर है। टैक्सी, ऑटो या बस से आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है। अटाला मार्केट इंदौर (Atala Market Indore) इसी अंदाज़ में चलते हैं अटाला बाज़ार, जो युवाओं और महिलाओं की मनपसंद जगहों में गिना जाता है। यहां पर ट्रेंडी कपड़े, कॉस्मेटिक्स, ज्वेलरी, बैग्स और फैशन एक्सेसरीज़ की इतनी विशाल रेंज मिलती है कि समझ नहीं आता पहले क्या खरीदें और छोड़ें क्या। छोटे–छोटे स्टॉल हों या बड़े शोरूम हर दुकान पर विकल्पों की दुनिया सजी मिलती है। कॉलेज जाने वाली लड़कियों से लेकर शादी में तैयार होने वाली महिलाओं तक के लिए यह मार्केट एक परफेक्ट डेस्टिनेशन है। सस्ते दाम, न्यू ट्रेंड और मनमाफिक चयन यही इसकी पहचान है। खास बात यह है कि यहां के दुकानदार इतने फ्रेंडली होते हैं कि bargaining करना भी मज़ेदार लगता है। अगर किसी को आधुनिक फैशन से अपडेट रहना हो, तो अटाला बाज़ार जरूर जाना चाहिए। शाम के वक्त यहां की चहल–पहल और रंगीन रोशनी माहौल को और भी खूबसूरत बना देती है। कहां है और कैसे पहुंचे? अटाला बाज़ार इंदौर के राजवाड़ा क्षेत्र के पास स्थित है। शहर के पुराने और सबसे व्यस्त बाजारों में से एक। यहां पहुंचना बेहद आसान है। इंदौर रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किलोमीटर दूर। ऑटो, ई-रिक्शा, सिटी बस या पैदल भी आराम से पहुंचा जा सकता है। यह भी पढे – TERE ISHQ MEIN: दिल्ली की दिलकश गलियों में शूट हुई धनुष की नई फिल्म, सोशल मीडिया पर जमकर वायरल! खजूरी मार्केट इंदौर (Khajuri Market Indore) अब बात करते हैं खजूरी बाज़ार की, जिसे इंदौर का ज्ञान–केंद्र कहा जा सकता है। यह बाज़ार किताबों के प्रेमियों के लिए किसी खज़ाने से कम नहीं। स्कूल–कॉलेज की किताबें हों, कॉम्पिटीशन की तैयारी के लिए स्टडी मटीरियल, साहित्यिक किताबें, बेस्टसेलर नॉवेल, धार्मिक–आध्यात्मिक ग्रंथ, स्टेशनरी, आर्ट–क्राफ्ट सामान—सबकुछ यहां मिलता है। छात्रों, प्रोफेसरों और बुक–लवर्स की लगातार भीड़ यहां की पहचान है। कई लोग कहते हैं कि खजूरी बाज़ार की महक में पुरानी किताबों की सुगंध घुली होती है जो मन को आनंदित करती हैं। यहां किताब खरीदने का अनुभव किसी जश्न से कम नहीं लगता जैसे ज्ञान की एक नई खिड़की खुल रही हो। स्टेशनरी की दुकानों

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बल्देवगढ़- एक ऐसा किला, जहां तोप चलाने से हो जाता था महिलाओं का गर्भपात!

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मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित बल्देवगढ़ किला इतिहास का एक ऐसा नमूना है, जिसकी वीरता की कहानियां ना सिर्फ प्रेरित करती हैं, बल्कि बुन्देलखंड की गौरव को सहेजे हुए प्रतीत होता है। यह किला छोटा होते हुए भी अपने वैभव, स्थापत्य और वीरता की कहानियों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। बुंदेलखंड की भूमि पर बसा यह किला एक ओर तो प्राचीन स्थापत्य कला की झलक दिखाता है, वहीं दूसरी ओर युद्धों और संघर्षों की गवाही भी देता है। चारों ओर फैली हरियाली, तालाब और ऊंची ऊंची पहाड़ियां इस किले को प्राकृतिक सौंदर्य से भी खास बनाती हैं। जब मैं यहां पहुंचा तो मुझे थोड़ी ग्लानि सी हुई, ग्लानि इस बात की इतनी खूबसूरत जगह को सरकार ने खंडर बना कर रखा है, ये नायाब चीजें हमारी धरोहर हैं और हमें इन चीजों की कद्र करनी चाहिए। खैर, बल्देवगढ़ कस्बा, टीकमगढ़ से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा है और यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे आसान साधन है। यह जगह भीड़भाड़ से दूर, शांति और इतिहास के खूबसूरत पन्नों को संजोए हुए है। जब कोई सैलानी किले की ओर बढ़ता है तो दूर से ही उसकी विशाल दीवारें और बुर्ज अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि इस किले का नाम बल्देवगढ़ इसलिए पड़ा क्योंकि यहां कभी भगवान बलराम के मंदिर और उनकी पूजा का प्रचलन हुआ करता था। धीरे-धीरे यह जगह राजाओं और सेनापतियों की शरणस्थली बनी और एक मजबूत किले के रूप में विकसित हो गई। बल्देवगढ़ का वातावरण आज भी वीरता, शौर्य और परंपरा की कहानी कहता है। आइए इस पेशकश में जानते हैं, इस किले के बारे में कुछ खास बातें। किले का अतीत जान क्यों परेशान हो जाते हैं लोग? बल्देवगढ़ किला बुंदेला राजाओं की वीरता और स्थापत्य कला का जीवंत प्रतीक है। जैसा की आप तस्वीरों में देख पा रहे हैं कहा जाता है कि इस किले का निर्माण 17वीं शताब्दी में बुंदेला शासक राजा भोजराज ने करवाया था। उस समय बुंदेलखंड में लगातार युद्ध और संघर्ष चल रहे थे, इसलिए यह किला सुरक्षा और शासन दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था। किले की ऊंची दीवारें, मजबूत दरवाजे और गुप्त मार्ग इस बात का सबूत हैं कि इसे युद्धकला को ध्यान में रखकर बनाया गया था। यहां कई महल, मंदिर और बैठकें थीं जहां पर राजदरबार लगता था और समस्याएं निपटती थी। इतिहासकार बताते हैं कि यह किला कभी राजनीति, युद्धनीति और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मुगल और मराठों के दौर में भी बल्देवगढ़ किले का महत्व कम नहीं हुआ है। कई बार यह किला आक्रमणों और घेराबंदियों का गवाह बना, लेकिन अपनी मजबूती के कारण लंबे समय तक अडिग खड़ा रहा और आज भी भले सरकार इसकी देख रेख को नजरंदाज करती है फिर भी यह किला बहुत नायाब चीज है। यह किला सिर्फ ईंट और पत्थर का ढांचा नहीं है, बल्कि इसमें बुंदेला योद्धाओं की शौर्य गाथाएं दर्ज हैं। आज भी जब सैलानी इसके खंडहरों को देखते हैं तो उन्हें अतीत की वह गूंज सुनाई देती है, जब तलवारें टकराती थीं और रणभूमि में जयघोष गूंजता था। स्थापत्य कला में छिपे हैं इतिहास के राज बल्देवगढ़ किले की सबसे बड़ी खूबी इसकी स्थापत्य कला है। भले ही यह किला आकार में बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन इसकी संरचना बेहद मजबूत और आकर्षक है। किले के चारों ओर ऊंची दीवारें बनी हुई हैं, जिन पर बने बुर्ज और झरोखे आज भी स्थापत्य की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। किले के अंदर बने महल कभी राजपरिवार का निवास स्थल हुआ करते थे। इन महलों की खिड़कियों और दरवाजों पर की गई नक्काशी उस समय की कारीगरी का अद्भुत उदाहरण है। किले के भीतर एक सुंदर तालाब भी है, जिसे यहां के निवासी ‘सागर ताल’ कहते हैं। यह तालाब न केवल जल की जरूरत पूरी करता था बल्कि किले की खूबसूरती भी बढ़ाता है। किले के अंदर बने मंदिर इसकी धार्मिक महत्ता को भी दर्शाते हैं। बहुत पहले यहां भगवान बलराम और अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती थी। इसके अलावा किले में बने गुप्त मार्ग और तहखाने यह बताते हैं कि इसे कितनी सोच-समझकर डिजाइन किया गया था। आज भले ही किला खंडहर हो गया हो, लेकिन इसके खंडहरों में भी एक अलग ही रोमांच और रहस्य छिपा है। पर्यटक जब इसकी दीवारों पर हाथ रखते हैं तो उन्हें पत्थरों के बीच से इतिहास की धड़कनें सुनाई देती हैं। स्थापत्य कला के ये नमूने बल्देवगढ़ को विशेष बनाते हैं। लोककथाओं में किले की वीरता का होना इसे और खास बनाता है बल्देवगढ़ किला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की संस्कृति का भी हिस्सा है। यहां के लोग इस किले से गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं। स्थानीय लोककथाओं में इस किले का जिक्र बार-बार आता है। बुजुर्ग आज भी वीर योद्धाओं की कहानियां सुनाते हैं, जिन्होंने इस किले की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हैं। त्यौहारों और मेलों के दौरान बल्देवगढ़ किले की रौनक और बढ़ जाती है। खासकर, होली, दीवाली और दशहरा जैसे पर्व यहां बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। होली पर यहां का माहौल बेहद खास होता है, जब लोकगीतों की गूंज और रंगों की बौछार इस किले की दीवारों को भी सुंदर बना देती है। यहां की लोककथाओं में छिपी वीरता और प्रेम की कहानियां पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। कहा जाता है कि इस किले में कभी राजा-रानियों का शाही परिवार बसा था, जिसकी चहल-पहल  अब भी हवा में महसूस की जा सकती है। बुंदेली कला, नृत्य और संगीत की परंपरा इस किले से गहराई से जुड़ी है। बल्देवगढ़ किला बुंदेलखंड की आत्मा को समझने का एक माध्यम है। यहां आकर कोई भी सिर्फ दीवारें और खंडहर नहीं देखता, बल्कि उस संस्कृति को महसूस करता है जिसने सदियों से इस भूमि को जीवित रखा है। मैंने स्वयं यहां आकार यह अनुभव की इतिहास में हमारी संस्कृति कितनी खास थी। खास तो आज भी लेकिन यदि हम इसे सुरक्षित कर पाएं तो ज्यादा बेहतर होगा।   किले का पहले और आज में क्या बदला आज बल्देवगढ़ किला भले ही खंडहर में तब्दील हो चुका हो, लेकिन इसका आकर्षण आज भी कम नहीं हुआ है। यह जगह इतिहास प्रेमियों,

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Top 5 National Parks in Madhya Pradesh

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मध्य प्रदेश भारत के सबसे बड़े राज्यों में से एक है और वन क्षेत्र के आधार पर यह भारत का सबसे अधिक वन विस्तार वाला राज्य है। ऐसे में यहां नेशनल पार्क और वन्य जीव अभ्यरण्यों की संख्या भी बहुत अधिक है। वैसे तो मध्य प्रदेश में 11 नेशनल पार्क हैं, लेकिन कुछ नेशनल पार्क्स ऐसे हैं जो बहुत हीं खास और खूबसूरत हैं। फाइव कलर्स का ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं मध्य प्रदेश के पांच प्रमुख नेशनल पार्क (5 National Parks of Madhya Pradesh) के बारे में जहां एक बार जाना तो बनता है। 1. कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) देश के सबसे प्रसिद्ध नेशनल पार्क में से एक कूनो नेशनल पार्क हाल में ही काफी चर्चा का विषय रहा था। यहां कुछ दिनों पहले नामीबिया से 8 चीतों को ला कर रखा गया था। मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित इस नेशनल पार्क में आकर आपको एक अलग ही अनुभूति होगी। चारों ओर घने जंगल और बेफिक्र घूम रहे जंगली जानवर किसी अलग ही दुनिया का आभास करा देते हैं। यह नेशनल पार्क कूनो नदी के तट पर स्थित है। यह कह सकते हैं कि कूनो नदी यहां की जीवन रेखा है। यहां के जंगली जानवरों को गर्मी के समय सिर्फ इसी नदी का सहारा होता है। बात करें अगर इस पार्क के फैलाव की तो यह नेशनल पार्क 415 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और हजारों जानवरों का आसरा है। कैसे पहुंचे कूनो राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Kuno National Park)? 2. सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान (Satpura National Park) सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान सतपुड़ा की पहाड़ियों में बसा हुआ एक नेशनल पार्क है जो मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले में स्थित है। सतपुड़ा नेशनल पार्क लगभग 524 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी स्थापना 1981 में हुई थी। यह नेशनल पार्क एक टाइगर रिजर्व भी है तथा बोरी और पंचमढ़ी अभ्यारण्य के साथ अपनी सीमा साझा करता हैं। इसी नेशनल पार्क में धूपगढ़ चोटी (1350 मीटर) अवस्थित हैं। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना (Fauna) निवास करते है जिनमे बाघ, तेंदुआ, सांभर, चौसिंगा, भेडकी, नीलगाय, चीतल, चिंकारा, लोमड़ी, जंगली सुअर, साही, भालू, काला हिरण, गौर, जंगली कुत्ता, उड़न गिलहरी, मूषक मृग और भारतीय विशाल गिलहरी शामिल हैं। कैसे पहुंचे सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Satpura National Park)? 3. बांधवगढ़ नेशनल पार्क (Bandhavgarh National Park) मध्य प्रदेश के विंध्याचल पर्वत में स्थित बांधवगढ़ नेशनल पार्क अपने बाघों के लिए प्रसिद्ध है। बांधवगढ़ नेशनल पार्क में इन बाघों को देखने के लिए दुनिया के अलग-अलग कोने से साल भर में लगभग 50,000 से भी ज्यादा पर्यटक आते हैं और जंगल सफारी के जरिए बाघों की खोज में निकल जाते हैं। बांधवगढ़ नेशनल पार्क लगभग 105 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस नेशनल पार्क में बाघ के अलावा कई अन्य प्रकार के स्तनधारी जीव भी पाए जाते हैं। जिनमें तेंदुआ, भेड़िया, सियार, हिरण, भालू, लंगूर, बंदर, जंगली सूअर, जंगली कुत्ते, लोथल बीयर और चीतल जैसे जीव प्रमुख है। वर्तमान समय में बांधवगढ़ नेशनल पार्क में 165 बाघ अपना जीवन यापन कर रहे हैं। कैसे पहुंचे बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Bandhavgarh National Park)? 4. पेंच नेशनल पार्क (Pench National Park) पेंच नेशनल पार्क मध्य प्रदेश का एक प्रमुख नेशनल पार्क है। यह राष्ट्रीय उद्यान 758 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इस उद्यान की स्थापना 1975 में हुई थी। यहां पर पीफोल, कोपीजेन्ट, रेड जंगल फोल, रेड वेन्टेड बुलबुल, बेस्ट डबारबेट, क्रीमसन, मेंगपाई राबिन, रॉकेट टेल डोगों, व्हिस्टल टील, लेसर आदि पक्षियों की प्रजातियों के साथ, एक वन्यजीव हॉटस्पॉट है। पेंच नदी इस उद्यान को दो भागों में बाँटती है। पेंच टाइगर रिज़र्व को भारत का सर्वश्रेष्ठ टाइगर रिज़र्व होने का गौरव प्राप्त है। रुडयार्ड किपलिंग की प्रसिद्ध कहानियों में से एक ‘द जंगल बुक’ इसी पार्क पर आधारित है। कैसे पहुंचे पेंच राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Pench National Park)? 5. कान्हा-किसली राष्ट्रीय उद्यान (Kanha–Kisli National Park) कान्हा नेशनल पार्क मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा नेशनल पार्क है। यह नेशनल पार्क अपने बारहसिंगा (Reindeer) के लिए प्रसिद्ध है। यह नेशनल पार्क लगभग 940 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। सर्वप्रथम कान्हा राष्ट्रीय उद्यान को 1 जून 1955 को नेशनल पार्क का दर्जा दे दिया गया। इसके पश्चात 1973 में इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया। कान्हा नेशनल पार्क में बारहसिंगा के अलावा भी कई प्रकार के वन्य जीव निवास करते है जिनमे बाघ, सारस, भेड़िया, छोटी बत्तख, चिन्कारा, भारतीय पेंगोलिन शामिल है। कैसे पहुंचे कान्हा राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Kanha National Park)?

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MP के इन जगहों पर भारतीय स्थापत्य कला और प्राकृतिक खूबसूरती की दिखती है झलक

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मध्य प्रदेश में भारत के कई ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं जो न सिर्फ आर्कियोलॉजिस्ट को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, बल्कि सामान्य पर्यटकों का भी ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। सबसे अधिक क्षेत्रफल पर वन होने के कारण मध्य प्रदेश में कई सारे नेशनल पार्क्स भी हैं। इसी वजह से यह राज्य प्राकृतिक रूप से भी सुंदर और मनमोहक है। अगर आप भी मध्य प्रदेश घूमना चाहते हैं तो हम आपको बताने वाले हैं मध्य प्रदेश के कुछ ऐसे जगहों के बारे में जहाँ एक बार जाना तो बनता है। 1. उज्जैन (Ujjain) इस शहर को महाकाल की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। मध्य प्रदेश के इस शहर को पहले पूरे भारतवर्ष में अवंतिका नगरी कहा जाता था। यह शहर महाकालेश्वर महादेव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। भारत के कोने-कोने से लोग यहां महाकालेश्वर महादेव के दर्शन करने और उनकी पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं। इस शहर में इसके अलावा और भी कई पर्यटन स्थल हैं। जिनमें रामघाट, काल भैरव मंदिर और मंगलनाथ मंदिर प्रमुख हैं। कैसे पहुंचे उज्जैन (How to reach Ujjain) : उज्जैन पहुंचाना बहुत हीं आसान है, क्योंकि शहर का अपना रेलवे स्टेशन भी है। जहां देश के अलग-अलग राज्यों से ट्रेनें आती हैं। इसके अलावा अगर आप फ्लाइट से उज्जैन पहुंचाना चाहते हैं तो आप इंदौर एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट ले सकते हैं। इंदौर उज्जैन से लगभग 50 किलोमीटर की ही दूरी पर स्थित है। इसलिए आप बहुत ही आसानी से इंदौर से उज्जैन पहुंच सकते हैं। उज्जैन शहर सड़क मार्ग के द्वारा भी देश के अन्य राज्यों से बहुत अच्छे से जुड़ा हुआ है। आप उज्जैन अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। 2. मैहर माता मंदिर सतना (Maihar Mata Temple Satna) त्रिकूट पर्वत की ऊंचाइयों पर स्थित मैहर मंदिर की कहानी आदिशक्ति सती के आत्मदाह से जुड़ी हुई है। देश के 108 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ (Shaktipeeth) त्रिकूट पर्वत के इस पहाड़ी पर भी स्थित है। जिस स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करवाया गया है। बताया जाता है कि इस स्थान पर माता का हार टूट कर गिरा था, इसलिए इस जगह को मैहर का नाम दिया गया। यह मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिला के त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है। जहां तक पहुंचाने के लिए भक्तों को पहाड़ी पर चढ़ाई करनी होती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि पूरे भारत में माता शारदा का यह इकलौता मंदिर है। इस मंदिर में माता शारदा के साथ ही अन्य देवी देवताओं की पूजा भी की जाती है। 3. खजुराहो (Khajuraho) इस स्थान को मध्य प्रदेश का सम्मान माना जाता है। यह वही स्थान है जहां आपको विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों से समृद्ध मंदिरों का समूह देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश का खजुराहो भारत के प्राचीन कालीन इतिहास को बखूबी बयां करता है। खजुराहो के मंदिरों के समूह का निर्माण आज से लगभग 1300 साल पहले हुआ था। मंदिरों पर बनाई गई कलाकृतियां यह दर्शाती हैं कि हमारा भारत आज से हजार साल पहले भी कितना मॉडर्न (modern) था।खजुराहो में आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम (Archaeological Museum) है, जहां आपको कई सारे छोटे बड़े मंदिरों का समूह देखने को मिलेंगे। आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम के इस एरिया को पश्चिमी मंदिर समूह के नाम से भी जाना जाता है। आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम में जैसे ही आप इंटर करेंगे आपको बहुत ही खूबसूरत से गार्डन से होकर गुजर कर जाना होगा। यहाँ के मंदिरों में कंदरिया मंदिर, मतंगेश्वर मंदिर, लक्ष्मण मन्दिर, विश्वनाथ मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर और विष्णु गुप्त मंदिर प्रमुख हैं। 4. भोपाल (Bhopal) इस शहर को महाराजा भोज की नगरी के नाम से जाना जाता है। यह शहर आज के समय में मध्य प्रदेश की राजधानी है और इस शहर को एक अच्छा टूरिस्ट डेस्टिनेशन माना जाता है। क्योंकि यहां के टूरिस्ट प्लेसेस इतने बेहतरीन हैं कि यहां आने वाले लोगों को यही का हो कर रह जाने का मन करने लगता है। अगर आपको भी कभी मौका मिले मध्य प्रदेश जाने का तो आप एक बार भोपाल जरुर विजिट करें। (Visiting places of Bhopal) भोपाल की घूमने लायक जगहों की सूची में अपर लेक (Upper Lake), वन विहार (Van Vihar), सैर सपाटा (Sair Sapata), गौहर महल (Gauhar Mahal), मध्य प्रदेश ट्राईबल म्यूजियम (Madhya Pradesh Tribal Museum), पीपल्स मॉल (People’s Mall), भीमबेटका की गुफ़ाएँ (Bhimvetka caves), ताज उल मस्जिद (Taj ul Masjid) और सांची स्तूप (Sanchi Stupa) का नाम आता है। 5. कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) देश के सबसे प्रसिद्ध नेशनल पार्क में से एक कूनो नेशनल पार्क हाल में ही काफी चर्चा का विषय रहा था। यहां कुछ दिनों पहले नामीबिया से 8 चीतों को ला कर रखा गया था। मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित इस नेशनल पार्क में आकर आपको एक अलग ही अनुभूति होगी। चारों ओर घने जंगल और बेफिक्र घूम रहे जंगली जानवर किसी अलग ही दुनिया का आभास करा देते हैं। यह नेशनल पार्क कूनो नदी के तट पर स्थित है। यह कह सकते हैं कि कूनो नदी यहां की जीवन रेखा है। यहां के जंगली जानवरों को गर्मी के समय सिर्फ इसी नदी का सहारा होता है। बात करें अगर इस पार्क के फैलाव की तो यह नेशनल पार्क 415 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और हजारों जानवरों का आसरा है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान कैसे पहुंचे (How to reach Kuno National Park) ग्वालियर एयरपोर्ट कूनो नेशनल पार्क के सबसे नजदीक स्थित एयरपोर्ट है। यह एयरपोर्ट देश के अन्य शहरों जैसे दिल्ली, कोटा, पटना, जयपुर आदि से भली भांति जुड़ा हुआ है। दिल्ली एयरपोर्ट से ग्वालियर के लिए फ्लाइट लगभग ₹2000 से ₹3000 तक की आती है। आप नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन के माध्यम से भी ग्वालियर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा आप बाय रोड भी कूनो नेशनल पार्क पहुंच सकते हैं।