मॉनसून में रेडियो पर बजते दिल के तराने, वो पुराने गाने!
हवाओं में नमी, मिट्टी की सौंधी खुशबू और दिल को छू लेने वाला संगीत। मानसून का मौसम हो या हमारे पुराने दिनों की कोई और बात.. जब हम संगीत को याद करते हैं तो मॉनसून में रेडियो का नाम हमारे दिमाग में ज़रूर आता है।
रेडियो, एक लंबे समय से बारिश के मौसम में हमारा साथी रहा है। जब बूंदों को आने का वक़्त हो चलता है तो ‘रिमझिम गिरे सावन’ जैसे नग़मे एक पुरानी याद की तरह हमारे कानों से होकर गुजरते हैं। रेडियो का रिश्ता न केवल मानसून बल्कि हर एक मौसम से है।
वो पुराने दिन, वो सुहाने दिन..
आइए जानते हैं रेडियो शुरु कैसे हुआ?
भारत में रेडियो की शुरुआत मुंबई में निजी रेडियो प्रसारण के साथ हुई। 1923 में बॉम्बे (अब मुंबई) में Radio club of Bombay में हुआ पहला निजी रेडियो प्रसारण एक प्रयोग जैसा था।
बाद में, 1930 में ब्रिटिश सरकार ने रेडियो का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया और इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस Indian state Broadcasting service (ISBS) की शुरुआत हुई। फिर बात आती है ऑल इंडिया रेडियो All India Radio (AIR) जिसे हम आज भी जानते हैं। 8 जून 1936 को ISBS का नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो किया गया।

कैसे चली रेडियो की कहानी?
ब्रिटिश राज के दौरान अंग्रेजी सरकार ने रेडियो का उपयोग सूचना के प्रसार के लिए किया। हालांकि, 1940 के दशक में आजादी की लड़ाई में भी क्रांतिकारियों ने इसका उपयोग किया।
उसके बाद तो जैसे ये राष्ट्र निर्माण का एक हथियार बन गया।
1957 में भारत का पहला रेडियो मनोरंजन कार्यक्रम ‘विविध भारती‘ शुरू हुआ।
1967 में मद्रास में पहला FM प्रसारण शुरू हुआ। जबकि इसे (FM) लोकप्रियता 1990 के दशक से मिलनी शुरू हुई।
बारिश, रेडियो और पुराने गानों का जादू
मॉनसून के साथ रेडियो का पुराना रिश्ता है इसीलिए आज भी बारिश की बूंदों के साथ पुराने गानों के सुर हमारे कानों में गूंजने लगते हैं। ये गीत हमारी प्लेलिस्ट ही नहीं, हमारे यादों की लिस्ट में भी सबसे ऊपर आते हैं।

“एक लड़की भीगी-भागी सी…”
“रिमझिम गिरे सावन…”
“प्यार हुआ इकरार हुआ…”
चाय, खिड़की और एक तरन्नुम
बारिश के मौसम में चाय- पकौड़े न हो तो फिर मज़ा कैसा? लेकिन चाय के साथ अगर एक सुरीली तान भी कानों में पड़ने लगे तो बारिश का ये सुहाना मौसम और खूबसूरत बन जाता है।
भीगी-भीगी रातों में.. ये गाना जब वाकई भीगी भीगी रातों में बजता है तो मंज़र अपने आप ही और सुहाना हो जाता है।

गीत-संगीत किसे पसंद नहीं होता? संगीत की ध्वनि तो मनुष्य जीवन को जोड़ने का काम करती है। किसी को रॉक पॉप म्यूजिक पसंद होता है तो किसी को पुराने गानों का संगीत।
मंजिल वही राह नई
आज रेडियो कई रूपों और विधाओं में सुना जाता है, जिसमें पॉडकास्ट एक बेहद लोकप्रिय विधा है। इसके साथ ही अब रेडियो के डिजिटल ऐप्स भी बेहद पसंद किए जाते हैं। जो केवल गीत और ग़ज़लों ही नहीं कहानी जैसी विधाओं के लिए भी खूब भाव से सुने जाते हैं।
आज भले ही हम सबके हाथों में स्मार्टफोन्स हैं पर ज़रा सोचिए वो क्या मंज़र होता होगा जब एक हल्की खड़खड़ाहट भरी आवाज का वॉयस ओवर और दिल की तरन्नुम से मेल खाने वाले गानों को एक सब्र से रेडियो पर सुना जाता होगा।
इन गीतों में सिर्फ सुर नहीं हैं, यादें हैं, एहसास है। उस वक्त का, उस मिट्टी का, उन हवाओं का और रेडियो का..
रेडियो और रेडियो पर बजने वाले गाने हमेशा यादों का एक ऐसा हिस्सा रहेंगे जो न हम कभी भूलना चाहेंगे और न ही कभी भुला पाएंगे।





