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अलवर का राजकीय संग्रहालय, पेश करता है अलवर के इतिहास की झलक!

राजस्थान के अलवर शहर में बना राजकीय संग्रहालय, इतिहास और संस्कृति का नायाब खजाना है। यह संग्रहालय सिर्फ एक इमारत नहीं है, बल्कि समय की एक अनोखी कहानी है। यह आपको मुगल और राजपूत काल के शाही जीवन से रूबरू कराता है। अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं या बस कुछ नया देखना चाहते हैं, तो यह जगह आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अलवर का राजकीय संग्रहालय सिटी पैलेस की पांचवी मंजिल पर है। यह 1940 में स्थापित हुआ था, जब अलवर रियासत के अंतिम शासक तेज सिंह ने इसे शुरू किया।

यह संग्रहालय राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा संग्रहालय माना जाता है। यहां आपको राजा-महाराजाओं की तलवारें, चांदी की टेबल, पुराने चित्र और दुर्लभ किताबें देखने को मिलेंगी। एक खास बात है कि यहां एक म्यान में दो तलवारें रखी हैं, जो पूरे देश में कहीं और नहीं मिलती। सुना तो था ही! आज देख भी लिया कि इस संग्रहालय में एक चांदी की टेबल ऐसी है कि उस पर मछली तैरती दिखती है। जब मैंने इसके बारे में पढ़ा, तो उत्साह बढ़ गया। यह संग्रहालय न सिर्फ पर्यटकों के लिए बल्कि इतिहास प्रेमियों के लिए भी खास है। हर साल हजारों लोग इसे देखने आते हैं। खासकर राजस्थान दिवस पर, जब प्रवेश मुफ्त होता है, यहां भीड़ उमड़ पड़ती है।

अलवर

अलवर का राजकीय संग्रहालय इतिहास का एक जीता-जागता सबूत है। यह सिटी पैलेस में बना है, जिसे 1793 में राजा बख्तावर सिंह ने बनवाया था। यह इमारत अपने आप में खूबसूरत है, जिसमें संगमरमर के मंडप और जालीदार बालकनियां हैं। संग्रहालय की शुरुआत 1940 में हुई थी, जब अलवर रियासत के शासक तेज सिंह ने इसे स्थापित किया था। उस समय अलवर रियासत की पुरानी वस्तुओं को सहेजने का काम शुरू हुआ था। यहां आपको राजपूत और मुगल काल की चीजें देखने को मिलेंगी। संग्रहालय में चार मुख्य कक्ष हैं प्रतिमा और शिलालेख कक्ष, हस्तशिल्प कक्ष, चित्रकला कक्ष, और अस्त्र-शस्त्र कक्ष।

हर कक्ष में कुछ न कुछ ऐसा है जो आपको हैरान कर देगा। वहां की हर चीज आपको राजा-महाराजाओं के समय में ले जाती है। संग्रहालय में 11वीं और 12वीं सदी की मूर्तियां हैं, जो अलवर के आसपास के मंदिरों से लाई गई हैं। इनमें गणेश की अष्टभुजी मूर्ति खास है। इसके अलावा, दुर्लभ पांडुलिपियां जिनमें बाबरनामा और रागमाला चित्र आपको मुगल काल की याद दिलाएंगे। संग्रहालय में राजा-महाराजाओं की शाही ड्रेस, पुराने हथियार, और हस्तलिखित किताबें भी हैं। यह सब देखकर आपको लगेगा कि आप किसी शाही दरबार में खड़े हैं। संग्रहालय की खासियत यह है कि यह अलवर के इतिहास को बहुत खूबसूरती से पेश करता है। अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं, तो यह जगह आपके लिए सबसे अच्छा अनुभव देगी। राजकीय संग्रहालय अलवर में इतना कुछ है कि आप घंटों घूम सकते हैं। यह तीन बड़े हॉल में बंटा है, और हर हॉल में अलग-अलग चीजें हैं। आइए, इन सबको एक-एक करके देखते हैं।

यहां आपको राजा-महाराजाओं की शाही ड्रेस और मिट्टी के खिलौने मिलेंगे। इन कपड़ों में सोने-चांदी की कढ़ाई है, जो उस समय की शाही शान दिखाती है। मिट्टी के खिलौने बच्चों के लिए बनाए गए थे, लेकिन उनकी बनावट इतनी सुंदर है कि बड़े भी देखते रह जाते हैं।
दूसरा हॉल चित्रकला और पांडुलिपियां
यहां आपको मुगल और राजपूत शैली की पेंटिंग्स मिलेंगी। रागमाला चित्र और बाबरनामा जैसी दुर्लभ किताबें हैं। 18वीं सदी में जब मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ, कई चित्रकार दिल्ली से अलवर आए। इनमें डालचंद जैसे मशहूर चित्रकार थे, जिन्होंने राजा बख्तावर सिंह और विनय सिंह के लिए काम किया। एक पेंटिंग में तैमूर से लेकर औरंगजेब तक के चित्र हैं। यह देखकर आपको इतिहास जीवंत लगेगा।

अलवर

यह हॉल सबसे रोमांचक है। यहां अकबर और जहांगीर की तलवारें हैं। लेकिन सबसे खास है एक म्यान में दो तलवारें। यह इतनी अनोखी चीज है कि लोग इसे देखने दूर-दूर से आते हैं। इसके अलावा, भारी बंदूकें भी हैं, जिन्हें उठाना आज के समय में मुश्किल है।

अलवर

यहां 11वीं-12वीं सदी की मूर्तियां हैं, जो राजोरगढ़ और नीलकंठ जैसे मंदिरों से लाई गई हैं। इनमें गणेश की नृत्य करती मूर्ति सबसे खास है। शिलालेखों में पुराने समय की कहानियां लिखी हैं। यह कक्ष इतिहास के विद्यार्थियों के लिए खास है। इस संग्रहालय में एक पुरानी साइकिल भी है, जो इंग्लैंड से मंगवाई गई थी। यह साइकिल गेयर वाली थी और राजा के लिए खास थी। संग्रहालय में हर चीज की अपनी कहानी है। अगर आप फोटो खींचना चाहते हैं, तो पहले अनुमति लें। फिर आप मन भर के फोटो खींच सकते हैं, वीडियो निकाल सकते हैं।

अलवर पहुंचना बहुत आसान है। यह दिल्ली से 163 किलोमीटर और जयपुर से 170 किलोमीटर दूर है। संग्रहालय सिटी पैलेस में है, जो अलवर का मुख्य आकर्षण है। यहां पहुंचने के कई तरीके हैं।
हवाई मार्ग सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जयपुर में है, जो 170 किलोमीटर दूर है। वहां से टैक्सी या बस ले सकते हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी हवाई अड्डा भी 163 किलोमीटर दूर है। टैक्सी से मात्र 3-4 घंटे ही लगते हैं।
रेल मार्ग अलवर जंक्शन रेलवे स्टेशन शहर के बीच में है। यह दिल्ली, जयपुर और अन्य शहरों से जुड़ा है। स्टेशन से सिटी पैलेस 5-7 किलोमीटर दूर है। ऑटो या टैक्सी आसानी से मिल जाएगी।
सड़क मार्ग अलवर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा है। दिल्ली से NH48 ले सकते हैं। जयपुर से भी बसें और टैक्सी उपलब्ध हैं। रास्ते में आपको अरावली की पहाड़ियां दिखेंगी, जो सफर को और सुंदर बनाती हैं। संग्रहालय सुबह 9:45 से शाम 4:45 तक खुला रहता है। शुक्रवार को बंद रहता है। टिकट की कीमत ज्यादा नहीं, और राजस्थान दिवस जैसे मौकों पर मुफ्त प्रवेश होता है। अगर आप मेलों के समय जाएं, जैसे राजस्थान दिवस, तो और मजा आएगा। अब अगले भाग में जानते हैं कि संग्रहालय के आसपास और क्या देख सकते हैं।

अलवर का राजकीय संग्रहालय तो खास है ही, लेकिन इसके आसपास भी बहुत कुछ है। सिटी पैलेस अपने आप में एक शानदार इमारत है। इसके पास मूसी रानी की छतरी और कृष्ण मंदिर है। मूसी रानी, राजा बख्तावर सिंह की पत्नी थीं, जो उनके साथ सती हुई थीं। पास ही बाला किला है, जो एक पहाड़ी पर बना है। यह 10वीं सदी का किला है, जिसमें जय पोल, सूरज पोल जैसे छह प्रवेश द्वार हैं। हालांकि, यह अभी पर्यटकों के लिए बंद है, लेकिन इसका बाहरी नजारा देखने लायक है। अलवर के पास सरिस्का टाइगर रिजर्व भी है, जो 37 किलोमीटर दूर है। वहां आप जंगल सफारी का मजा ले सकते हैं हमने तो भाई जंगल सफारी के खूब मजे लिए ।और कई जानवर भी देखे।

अलवर

संग्रहालय घूमने के लिए कुछ टिप्स हल्के कपड़े और आरामदायक जूते पहनें। गर्मी में पानी साथ रखें। संग्रहालय में फोटो खींचने की अनुमति पहले लें। चीजों को छूने की मनाही है, खासकर हथियारों को। अलवर में खाने के लिए ढाबों पर राजस्थानी खाना ट्राई करें, जैसे दाल बाटी चूरमा। स्थानीय मिठाई में कलाकंद मशहूर है। होटल या गेस्ट हाउस आसानी से मिल जाएंगे। अगर आप सस्ता विकल्प चाहते हैं, तो रेलवे स्टेशन के पास कई बजट होटल हैं। यहां का माहौल ही अलग है। अगर आप इतिहास, कला या शाही जीवन को करीब से देखना चाहते हैं, तो राजकीय संग्रहालय अलवर जरूर आयें। यह आपको निराश नहीं करेगा

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Hello! I Pardeep Kumar

मुख्यतः मैं एक मीडिया शिक्षक हूँ, लेकिन हमेशा कुछ नया और रचनात्मक करने की फ़िराक में रहता हूं।

लम्बे सफर पर चलते-चलते बीच राह किसी ढ़ाबे पर कड़क चाय पीने की तलब हमेशा मुझे ज़िंदा बनाये रखती
है।

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