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Alwar: बाला किला, सरिस्का और घूमने की पूरी जानकारी

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अगर दिल्ली या जयपुर की भागदौड़ से थोड़ा ब्रेक लेकर ऐसी जगह जाना चाहते हैं, जहाँ एक ही ट्रिप में आपको पुराना इतिहास, पहाड़, जंगल, मंदिर और वाइल्डलाइफ सब देखने को मिल जाए, तो Alwar का नाम आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर होना चाहिए। राजस्थान का यह शहर सिर्फ अपने पुराने महलों और किलों के लिए ही नहीं, बल्कि अरावली की पहाड़ियों और सरिस्का के जंगलों के लिए भी जाना जाता है। Alwar की खास बात यह है कि यहाँ घूमने के लिए आपको सिर्फ एक तरह का अनुभव नहीं मिलता। एक तरफ पहाड़ी के ऊपर बना बाला किला है, जिसकी दीवारें कई सदियों पुरानी घटनाओं की गवाह रही हैं, तो दूसरी तरफ सरिस्का के घने जंगल हैं, जहाँ सफारी के दौरान बाघ, तेंदुआ, सांभर, चीतल और मोर जैसे वन्यजीव देखने का मौका मिल सकता है। अगर आपको ऐसी जगहें पसंद हैं जहाँ घूमने के साथ-साथ उनके पीछे छिपी बातें जानने में भी मजा आता है, तो Alwar आपको निराश नहीं करेगा। यहाँ बाला किले से जुड़ी शहजादा सलीम की कहानी है, दारा शिकोह की कैद का किस्सा है, पुराने जलाशय हैं और लॉर्ड विक्टर नाम के एक कुत्ते से जुड़ी दिलचस्प लोककथा भी सुनने को मिलती है। तो चलिए, इस पूरे सफर को थोड़ा करीब से जानते हैं और समझते हैं कि बाला किला और सरिस्का मिलकर Alwar को एक यादगार वीकेंड डेस्टिनेशन क्यों बनाते हैं। अरावली की चोटी पर खड़ा बाला किला आखिर कितना पुराना है? बाला किला Alwar की पहचान माने जाने वाले सबसे पुराने ऐतिहासिक स्थलों में से एक है। अरावली की पहाड़ियों के ऊपरी हिस्से में बना यह किला शहर के ऊपर से काफी दूर तक का शानदार नजारा दिखाता है। किले की शुरुआती नींव को 928 ईस्वी से जोड़ा जाता है और इसके निर्माण व पुनर्निर्माण में अलग-अलग दौर के शासकों की भूमिका रही। समय के साथ इस किले पर अलग-अलग राजवंशों और शासकों का प्रभाव रहा। निकुंभ राजपूतों से लेकर खानजादा, पठान, मुगल, मराठा और जाट शासकों तक, इस किले ने सत्ता के कई दौर देखे। बाद में अलवर राज्य के संस्थापक महाराव राजा प्रताप सिंह का भी इससे संबंध रहा। यही वजह है कि Alwar का बाला किला सिर्फ एक पुरानी इमारत नहीं लगता। इसकी दीवारों और रास्तों से गुजरते हुए आपको इतिहास के अलग-अलग दौर एक साथ दिखाई देते हैं। अकबर और शहजादा सलीम का बाला किले से क्या कनेक्शन था? बाला किले से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक बात शहजादा सलीम से संबंधित है। इतिहास से जुड़े विवरणों में बताया जाता है कि अकबर के बेटे सलीम को एक समय के लिए इस इलाके में रखा गया था और इसी वजह से किले में मौजूद एक भवन को आज सलीम महल के नाम से जाना जाता है। सलीम वही शहजादा थे जो आगे चलकर मुगल सम्राट जहांगीर बने। यानी जिस किले को आज लोग घूमने और इतिहास देखने के लिए आते हैं, वह कभी मुगल शाही परिवार की घटनाओं से भी जुड़ा हुआ था। इसके अलावा बाबर और दारा शिकोह से जुड़े किस्से भी बाला किले के इतिहास को और दिलचस्प बनाते हैं। हालांकि इन कहानियों से जुड़ी अलग-अलग स्थानीय और ऐतिहासिक व्याख्याएं मिलती हैं, इसलिए इन्हें सुनते समय लोककथा और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर समझना जरूरी है। बाला किले की बनावट देखकर समझ आता है कि यह सिर्फ महल नहीं था पहाड़ी पर बने किसी किले को देखकर सबसे पहले उसकी ऊंचाई और दीवारें ध्यान खींचती हैं, लेकिन बाला किले की खासियत इसकी पूरी सुरक्षा व्यवस्था और वास्तुकला में दिखाई देती है। यह किला लगभग 5 किलोमीटर लंबा बताया जाता है और पहाड़ी के काफी बड़े हिस्से में फैला हुआ है। किले में कई प्रवेश द्वार बनाए गए थे, जिनमें जय पोल, सूरज पोल, किशन पोल, चांद पोल, लक्ष्मण पोल और अंधेरी गेट प्रमुख माने जाते हैं। अलग-अलग हिस्सों में बने बुर्ज और दीवारों में बने छोटे-छोटे छेद उस समय की सैन्य व्यवस्था की झलक देते हैं। आज जब आप Alwar के बाला किले में घूमते हैं तो इन दीवारों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुराने समय में किसी पहाड़ी किले को सुरक्षित रखना कितना बड़ा काम रहा होगा। रानी महल से लेकर पुराने जलाशयों तक, किले के अंदर क्या देखें? बाला किले को सिर्फ बाहर से देखकर वापस आ जाना सही नहीं होगा। इसके अंदर मौजूद पुराने महल, जल स्रोत और अलग-अलग हिस्से इसकी कहानी को पूरा करते हैं। रानी महल या रनिवास किले के उन हिस्सों में से है जहाँ राजघराने की महिलाओं के रहने से जुड़ी बातें मिलती हैं। पुराने समय में झरोखे सिर्फ खूबसूरती के लिए नहीं होते थे। इनके जरिए महल की महिलाएं नीचे होने वाले उत्सव और गतिविधियों को देख सकती थीं। किले के आसपास पुराने जल स्रोत भी बनाए गए थे ताकि पहाड़ी पर रहने वाले लोगों और पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था बनी रहे। जय ताल डैम, सलीम सागर और सूरज कुंड जैसे जल स्रोत इसी पुराने जल प्रबंधन की याद दिलाते हैं। आज भले ही इनका इस्तेमाल पहले जैसा न होता हो, लेकिन इन जगहों को देखकर समझ आता है कि पहाड़ी किले में पानी की व्यवस्था कितनी जरूरी रही होगी। लॉर्ड विक्टर की कहानी: किले का सबसे अलग किस्सा बाला किले से जुड़ी कहानियों में लॉर्ड विक्टर का किस्सा सबसे अलग है। स्थानीय तौर पर सुनाई जाने वाली इस कहानी के मुताबिक, पुराने समय में किले में तोपों के परीक्षण के दौरान एक प्रशिक्षित कुत्ते का इस्तेमाल किया जाता था। कहानी के अनुसार लॉर्ड विक्टर को तोप की बत्ती में आग लगाने की ट्रेनिंग दी गई थी। आग लगाने के बाद वह पानी के कुंड की ओर भाग जाता था ताकि धमाके से बच सके। इसी वजह से उसका नाम किले की लोककथाओं में आज भी सुनने को मिलता है। इस कहानी के कई हिस्से लोककथा के रूप में बताए जाते हैं, इसलिए इसे पक्के ऐतिहासिक तथ्य की तरह नहीं बल्कि Alwar से जुड़ी एक पुरानी स्थानीय कहानी के रूप में देखना ज्यादा सही है। फिर भी किले की सैर के दौरान ऐसी बातें जगह को और दिलचस्प बना देती हैं। क्या बाला किले में रहस्यमयी आवाजें भी सुनाई देती थीं? बाला किले से

Siliserh Lake Alwar Travel Rajasthan

Siliserh Lake Alwar: अलवर, राजस्थान की मिनी लेक डिस्ट्रिक्ट!

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अगर आप दिल्ली या जयपुर की भागदौड़ और शोर-शराबे से कुछ समय के लिए दूर जाना चाहते हैं और किसी ऐसी जगह की तलाश में हैं जहाँ प्रकृति, इतिहास और सुकून तीनों एक साथ मिल जाएँ, तो राजस्थान के अलवर जिले में स्थित सिलीसेढ़ झील (Siliserh Lake) आपके लिए एक शानदार विकल्प हो सकती है। अरावली की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसी यह झील अपनी शांत फिज़ा, ऐतिहासिक लेक पैलेस और समृद्ध वन्यजीवों के लिए जानी जाती है। पहली बार यहाँ आने वाले कई पर्यटक इसकी तुलना उदयपुर की झीलों से करते हैं। यही वजह है कि इसे राजस्थान का “मिनी लेक डिस्ट्रिक्ट” भी कहा जाता है। Siliserh झील का इतिहास: एक राजा का विजन और रानी के लिए प्यार Siliserhझील की कहानी सिर्फ एक पर्यटन स्थल की नहीं है, बल्कि यह दूरदर्शी सोच और प्रेम की भी मिसाल मानी जाती है। साल 1845 में अलवर के तत्कालीन शासक महाराजा विनय सिंह ने इस कृत्रिम झील का निर्माण करवाया था। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य अलवर शहर के लिए पानी की व्यवस्था करना था। इसके लिए रूपारेल नदी की एक सहायक धारा पर बांध बनाया गया और इस विशाल जलाशय का निर्माण हुआ। आज भी झील के आसपास दिखाई देने वाले पुराने जल मार्ग और संरचनाएँ उस समय की शानदार इंजीनियरिंग का प्रमाण हैं। झील के किनारे स्थित खूबसूरत सिलीसेढ़ लेक पैलेस इस जगह को और भी खास बना देता है। कहा जाता है कि महाराजा विनय सिंह ने यह महल अपनी प्रिय रानी शीला, जो भरतपुर की राजकुमारी थीं, उनके लिए बनवाया था। उस दौर में यह महल शाही शिकारगाह के रूप में इस्तेमाल होता था, लेकिन आज इसे राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) ने एक खूबसूरत हेरिटेज होटल में बदल दिया है। भारत की 96वीं रामसर साइट: Siliserh को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान Siliserh झील ने हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 13 दिसंबर 2025 को इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड्स की सूची में शामिल करते हुए भारत की 96वीं रामसर साइट घोषित किया गया। यह दर्जा किसी भी झील या वेटलैंड के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे उसके संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलती है। इस उपलब्धि के बाद Siliserh केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि देश के महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्थलों में भी शामिल हो गई है। स्थानीय लोगों के लिए यह गर्व की बात है और इससे आने वाले वर्षों में यहाँ पर्यटन और संरक्षण दोनों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। वाइल्डलाइफ का रोमांच: मगरमच्छ और पक्षियों का बसेरा सिलीसेढ़ झील सिर्फ खूबसूरत नजारों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी वाइल्डलाइफ के लिए भी जानी जाती है। पिछले कुछ वर्षों में यहाँ मगरमच्छों की संख्या तेजी से बढ़ी है और वर्तमान में झील में लगभग 288 मगरमच्छ मौजूद बताए जाते हैं। बोटिंग के दौरान या लेक पैलेस के आसपास बने व्यू पॉइंट्स से कई बार इन मगरमच्छों को धूप सेंकते हुए देखा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि यहाँ मगरमच्छों की आबादी बिना किसी बड़े सरकारी प्रजनन कार्यक्रम के बढ़ी है। कुछ मगरमच्छ 50 साल से अधिक पुराने बताए जाते हैं और उनकी लंबाई लगभग ढाई मीटर तक पहुँच चुकी है। पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह झील किसी जन्नत से कम नहीं है। आसपास के जंगलों और जल क्षेत्र में 100 से ज्यादा पक्षी प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं। सर्दियों के मौसम में कई प्रवासी पक्षी भी यहाँ आते हैं। किंगफिशर, क्रेन और दूसरी रंग-बिरंगी प्रजातियाँ इस पूरे क्षेत्र को जीवंत बना देती हैं। Siliserh लेक पैलेस: शाही अंदाज में बिताइए एक रात झील के किनारे खड़ा Siliserh लेक पैलेस यहाँ का सबसे बड़ा आकर्षण माना जाता है। अगर आप एक रात शाही माहौल में बिताना चाहते हैं, तो RTDC द्वारा संचालित यह हेरिटेज होटल आपके लिए बेहतरीन विकल्प हो सकता है। महल के कमरों में आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ पुरानी राजस्थानी शान की झलक भी देखने को मिलती है। यहाँ लक्जरी सुइट, एसी रूम और नॉन-एसी रूम जैसी अलग-अलग श्रेणियाँ उपलब्ध हैं। होटल के रेस्टोरेंट में भारतीय और कॉन्टिनेंटल दोनों तरह का भोजन मिलता है। झील के किनारे बैठकर डिनर करना या सुबह चाय के साथ झील का नजारा देखना अपने आप में यादगार अनुभव बन जाता है। मजेदार गतिविधियाँ: बोटिंग और फोटोग्राफी का मजा Siliserh की यात्रा बोटिंग के बिना अधूरी मानी जाती है। झील में अलग-अलग प्रकार की नावें उपलब्ध हैं जो आपको पानी के बीच से अरावली की खूबसूरत पहाड़ियों और लेक पैलेस का शानदार दृश्य दिखाती हैं। बोटिंग करते समय कई बार पहाड़ियों की ढलानों पर सांभर हिरण और अन्य वन्यजीव भी दिखाई दे जाते हैं। प्रकृति प्रेमियों के लिए यह अनुभव बेहद खास होता है। फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए सूर्यास्त का समय सबसे शानदार माना जाता है। जब डूबते सूरज की सुनहरी किरणें झील के पानी और महल की दीवारों पर पड़ती हैं, तो पूरा दृश्य किसी पोस्टकार्ड जैसा दिखाई देता है। यही समय सबसे ज्यादा फोटोग्राफर्स को आकर्षित करता है। वैज्ञानिक नजरिया: झील के पानी की गुणवत्ता Siliserh झील पर कई वैज्ञानिक अध्ययन भी किए जा चुके हैं। इन अध्ययनों के अनुसार झील के पानी का तापमान मौसम के अनुसार 9 डिग्री से 31 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। पानी का pH स्तर 7.1 से 8.3 के बीच पाया गया है, जो इसे हल्का क्षारीय बनाता है। यह स्थिति मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए अनुकूल मानी जाती है। मानसून के दौरान आसपास के खेतों से कुछ पोषक तत्व पानी में मिल जाते हैं, लेकिन कुल मिलाकर झील का जल स्तर और गुणवत्ता संतोषजनक मानी जाती है। यही वजह है कि यहाँ जैव विविधता भी काफी समृद्ध है। भविष्य का विजन: पर्यटन 2030 अलवर प्रशासन और पर्यटन विभाग आने वाले वर्षों में Siliserh को एक बड़े इको-टूरिज्म सेंटर के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। ‘विजन 2030’ के तहत यहाँ पर्यटकों के लिए बेहतर सुविधाएँ, पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि सिलीसेढ़ केवल एक पिकनिक स्पॉट न रहे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाला एक प्रमुख

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अलवर का राजकीय संग्रहालय, पेश करता है अलवर के इतिहास की झलक!

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राजस्थान के अलवर शहर में बना राजकीय संग्रहालय, इतिहास और संस्कृति का नायाब खजाना है। यह संग्रहालय सिर्फ एक इमारत नहीं है, बल्कि समय की एक अनोखी कहानी है। यह आपको मुगल और राजपूत काल के शाही जीवन से रूबरू कराता है। अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं या बस कुछ नया देखना चाहते हैं, तो यह जगह आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अलवर का राजकीय संग्रहालय सिटी पैलेस की पांचवी मंजिल पर है। यह 1940 में स्थापित हुआ था, जब अलवर रियासत के अंतिम शासक तेज सिंह ने इसे शुरू किया। यह संग्रहालय राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा संग्रहालय माना जाता है। यहां आपको राजा-महाराजाओं की तलवारें, चांदी की टेबल, पुराने चित्र और दुर्लभ किताबें देखने को मिलेंगी। एक खास बात है कि यहां एक म्यान में दो तलवारें रखी हैं, जो पूरे देश में कहीं और नहीं मिलती। सुना तो था ही! आज देख भी लिया कि इस संग्रहालय में एक चांदी की टेबल ऐसी है कि उस पर मछली तैरती दिखती है। जब मैंने इसके बारे में पढ़ा, तो उत्साह बढ़ गया। यह संग्रहालय न सिर्फ पर्यटकों के लिए बल्कि इतिहास प्रेमियों के लिए भी खास है। हर साल हजारों लोग इसे देखने आते हैं। खासकर राजस्थान दिवस पर, जब प्रवेश मुफ्त होता है, यहां भीड़ उमड़ पड़ती है। अलवर संग्रहालय की शाही विरासत की अनोखी कहानी अलवर का राजकीय संग्रहालय इतिहास का एक जीता-जागता सबूत है। यह सिटी पैलेस में बना है, जिसे 1793 में राजा बख्तावर सिंह ने बनवाया था। यह इमारत अपने आप में खूबसूरत है, जिसमें संगमरमर के मंडप और जालीदार बालकनियां हैं। संग्रहालय की शुरुआत 1940 में हुई थी, जब अलवर रियासत के शासक तेज सिंह ने इसे स्थापित किया था। उस समय अलवर रियासत की पुरानी वस्तुओं को सहेजने का काम शुरू हुआ था। यहां आपको राजपूत और मुगल काल की चीजें देखने को मिलेंगी। संग्रहालय में चार मुख्य कक्ष हैं प्रतिमा और शिलालेख कक्ष, हस्तशिल्प कक्ष, चित्रकला कक्ष, और अस्त्र-शस्त्र कक्ष। हर कक्ष में कुछ न कुछ ऐसा है जो आपको हैरान कर देगा। वहां की हर चीज आपको राजा-महाराजाओं के समय में ले जाती है। संग्रहालय में 11वीं और 12वीं सदी की मूर्तियां हैं, जो अलवर के आसपास के मंदिरों से लाई गई हैं। इनमें गणेश की अष्टभुजी मूर्ति खास है। इसके अलावा, दुर्लभ पांडुलिपियां जिनमें बाबरनामा और रागमाला चित्र आपको मुगल काल की याद दिलाएंगे। संग्रहालय में राजा-महाराजाओं की शाही ड्रेस, पुराने हथियार, और हस्तलिखित किताबें भी हैं। यह सब देखकर आपको लगेगा कि आप किसी शाही दरबार में खड़े हैं। संग्रहालय की खासियत यह है कि यह अलवर के इतिहास को बहुत खूबसूरती से पेश करता है। अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं, तो यह जगह आपके लिए सबसे अच्छा अनुभव देगी। राजकीय संग्रहालय अलवर में इतना कुछ है कि आप घंटों घूम सकते हैं। यह तीन बड़े हॉल में बंटा है, और हर हॉल में अलग-अलग चीजें हैं। आइए, इन सबको एक-एक करके देखते हैं। पहला हॉल शाही परिधान और हस्तशिल्प यहां आपको राजा-महाराजाओं की शाही ड्रेस और मिट्टी के खिलौने मिलेंगे। इन कपड़ों में सोने-चांदी की कढ़ाई है, जो उस समय की शाही शान दिखाती है। मिट्टी के खिलौने बच्चों के लिए बनाए गए थे, लेकिन उनकी बनावट इतनी सुंदर है कि बड़े भी देखते रह जाते हैं।दूसरा हॉल चित्रकला और पांडुलिपियांयहां आपको मुगल और राजपूत शैली की पेंटिंग्स मिलेंगी। रागमाला चित्र और बाबरनामा जैसी दुर्लभ किताबें हैं। 18वीं सदी में जब मुगल साम्राज्य कमजोर हुआ, कई चित्रकार दिल्ली से अलवर आए। इनमें डालचंद जैसे मशहूर चित्रकार थे, जिन्होंने राजा बख्तावर सिंह और विनय सिंह के लिए काम किया। एक पेंटिंग में तैमूर से लेकर औरंगजेब तक के चित्र हैं। यह देखकर आपको इतिहास जीवंत लगेगा। तलवारों और अस्त्र-शस्त्रों का अनोखा संग्रह यह हॉल सबसे रोमांचक है। यहां अकबर और जहांगीर की तलवारें हैं। लेकिन सबसे खास है एक म्यान में दो तलवारें। यह इतनी अनोखी चीज है कि लोग इसे देखने दूर-दूर से आते हैं। इसके अलावा, भारी बंदूकें भी हैं, जिन्हें उठाना आज के समय में मुश्किल है। मुगल और राजपूत काल की अद्भुत कलाकृतियां यहां 11वीं-12वीं सदी की मूर्तियां हैं, जो राजोरगढ़ और नीलकंठ जैसे मंदिरों से लाई गई हैं। इनमें गणेश की नृत्य करती मूर्ति सबसे खास है। शिलालेखों में पुराने समय की कहानियां लिखी हैं। यह कक्ष इतिहास के विद्यार्थियों के लिए खास है। इस संग्रहालय में एक पुरानी साइकिल भी है, जो इंग्लैंड से मंगवाई गई थी। यह साइकिल गेयर वाली थी और राजा के लिए खास थी। संग्रहालय में हर चीज की अपनी कहानी है। अगर आप फोटो खींचना चाहते हैं, तो पहले अनुमति लें। फिर आप मन भर के फोटो खींच सकते हैं, वीडियो निकाल सकते हैं। अलवर संग्रहालय कैसे पहुंचें? सबसे आसान रास्ता! अलवर पहुंचना बहुत आसान है। यह दिल्ली से 163 किलोमीटर और जयपुर से 170 किलोमीटर दूर है। संग्रहालय सिटी पैलेस में है, जो अलवर का मुख्य आकर्षण है। यहां पहुंचने के कई तरीके हैं।हवाई मार्ग सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जयपुर में है, जो 170 किलोमीटर दूर है। वहां से टैक्सी या बस ले सकते हैं। दिल्ली का इंदिरा गांधी हवाई अड्डा भी 163 किलोमीटर दूर है। टैक्सी से मात्र 3-4 घंटे ही लगते हैं।रेल मार्ग अलवर जंक्शन रेलवे स्टेशन शहर के बीच में है। यह दिल्ली, जयपुर और अन्य शहरों से जुड़ा है। स्टेशन से सिटी पैलेस 5-7 किलोमीटर दूर है। ऑटो या टैक्सी आसानी से मिल जाएगी।सड़क मार्ग अलवर सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा है। दिल्ली से NH48 ले सकते हैं। जयपुर से भी बसें और टैक्सी उपलब्ध हैं। रास्ते में आपको अरावली की पहाड़ियां दिखेंगी, जो सफर को और सुंदर बनाती हैं। संग्रहालय सुबह 9:45 से शाम 4:45 तक खुला रहता है। शुक्रवार को बंद रहता है। टिकट की कीमत ज्यादा नहीं, और राजस्थान दिवस जैसे मौकों पर मुफ्त प्रवेश होता है। अगर आप मेलों के समय जाएं, जैसे राजस्थान दिवस, तो और मजा आएगा। अब अगले भाग में जानते हैं कि संग्रहालय के आसपास और क्या देख सकते हैं। संग्रहालय के आसपास की दिलचस्प जगहें अलवर का राजकीय संग्रहालय तो खास है ही, लेकिन इसके आसपास भी बहुत कुछ है। सिटी पैलेस अपने आप में एक