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लॉक डाउन के बाद मेरी यह पहली यात्रा थी। काफी दिनों से मन बाहर घूमने को हिलोरें मार रहा था, काफी दिनों से कुछ ट्रेडिशनल और हट कर खाने का दिल भी कर रहा था। साथ ही अपने निकोन कैमरे के लिए एक अच्छा-सा नया बैग भी खरीदना था। इस बीच अच्छी खबर ये थी कि दिल्ली में कोरोना के भी बस कुछ ही केस बचे थे, इसलिए तमाम सावधानी के बीच निश्चय किया दिल्ली के सबसे पुराने बाज़ारों में से एक चांदनी चौक घूमने का, जहाँ की फोटोग्राफर मार्किट से कैमरे के लिए मुझे बैग भी मिल जायेगा और पराठें वाली गली के ज़ायकेदार पराठें भी।(Paranthe wali gali)’

कोरोना को लेकर थोड़ा डर कम था, क्योंकि पिछले सप्ताह ही वैक्सीन की दूसरी डोज ले ली थी और भीड़-भाड़ वाली जगह बिना मास्क के जाना तो वैसे भी खतरे से खाली नहीं। इसलिए कोरोना बचाव संबंधी सारे साजो-सामान से लैस होकर मैं अपनी कार से चांदनी चौक पहुंचा। लाल किले के सामने वैसे तो एमसीडी की बड़ी पार्किंग है लेकिन उस दिन शायद कुछ निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए मुझे पार्किंग की जगह मिली पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने। जिसके बाद चांदनी चौक पहुँचने के लिए मुझे लगभग डेढ़ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। मेरी सलाह यही रहेगी आप मेट्रो से आराम से आइये, चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन पर उतरिये और बस सामने चंद कदम दूर आपकी मंजिल।

बताते हैं चांदनी चौक को मुग़ल बादशाह शाहजहां की पुत्री जहाँ आरा बेग़म ने डिज़ाइन किया था। पहले यहाँ चांदी की बहुत सारी दुकानें होती थी बाद में समय के साथ कपड़ों और अन्य आभूषणों की दुकानें भी बढ़ती गयी। लाल किले के साथ ही चांदनी चौक का निर्माण करवाया गया था।
लगातार दो दिन से हो रही बारिश के बाद जब आप घर से निकलते हो तब मौसम आप पर थोड़ा मेहरबान होता है, इसलिए जुलाई के महीने में भी आप पैदल चलने की अच्छी स्थिति में होते हो। क्योंकि चांदनी चौक का अभी हाल ही में नवीनीकरण किया गया है, तो हो सकता है आपको थोड़ा ज्यादा पैदल चलना पड़े। जिनको ज्यादा पैदल चलना पसंद न हो उन्हें पुरानी दिल्ली की इन गलियों के लिए आसानी से रिक्शें मिल जायेंगे। यह आपकी उम्र, उत्साह और ऊर्जा पर भी निर्भर करता है।

मैंने पराठें वाली गली के बारे में खूब सुना था, कई हिंदी फिल्मों में भी देखा था। बस अब वक़्त आ गया था इन पराठों का स्वाद चखने का। गली में एंट्री करते ही कुछ दुकानें छोड़ कर कोने पर एक पराठें की पुरानी दुकान दिखाई दी। जिस पर लिखा था प. बाबू राम देवी दयाल पराठें वाले, सिन्स 1889, दुकान में प्रवेश किया और एक खाली टेबल देखकर अपना आसन जमा लिया। आप आसानी से आर्डर दे सके इसके लिए सामने दीवार पर पूरा मेन्यू कार्ड पेंट करवा रखा था, लेकिन असली जद्दोजहद शुरू होती है तब जब आपको 40-50 तरह के पराठों में से कोई एक आर्डर करना हो। मिक्स वेज, रबड़ी, खोया, आलू गोभी, पापड़, भिंडी, करेला, अचार, मेथी, पनीर, चीज़, गाजर, मटर और भी बहुत तरह के पराठें मेन्यू में थे।

मैंने दो पराठें आर्डर किये जिसमे एक पापड़ का था और दूसरा मिक्स वेज। 7-8 मिनट के इंतज़ार के बाद एक थाली लगाई गई जिसमे इमली की चटनी, आलू की सब्जी, सीताफल की सब्जी, मूली-गाजर का अचार और एक मिक्स वेज सब्जी और एक अलग प्लेट में दो गर्मागर्म पराठें। दोस्तों, किसी महापुरुष ने बिलकुल सही कहा है कि खाने का मजा तभी है जब आपको जोरदार भूख लगी हो और अगर भोजन स्वादिष्ट हो तो फिर समझ लीजिये आज आप स्वर्ग के चक्कर लगा आये।


ईमानदारी से कहूँ तो मुझे यहाँ के पराठें खूब भाये, शायद भूख लगी थी इसलिए थोड़े ज्यादा । लेकिन एक बात और बता दूँ हम अपने घरों में आमतौर पर तवे पर बने पराठें खाते हैं लेकिन यहाँ पर बनने वाले पराठें डीप फ्राई किये जाते हैं देसी घी में। मतलब की यहाँ आकर आप पराठों में कम तेल की उम्मीद न ही रखें तो बेहतर है। मैंने यहाँ पर जो एक चीज नोट की वो ये कि यहाँ पर लगभग सभी बिलकुल शुद्ध शाकाहारी पराठे ही बनाते हैं न प्याज न लहसून। शायद अपनी पुरानी परम्पराओं का निर्वहन करने के लिए। पराठों को स्वादिष्ट बनाने के लिए उनमें बादाम और काजू जैसे सूखे मेवे भी डाले जाते हैं। अगर आप खाने के जरा भी शौक़ीन हैं तो आप थाली में सर्व की गई कोई भी चीज पूरा खत्म किये बिना टेबल से नहीं उठेंगे, बस यही खासियत है देश भर में प्रसिद्ध पराठें वाली गली के पराठों की।

उत्सुकतावश जब मैंने काउंटर पर बैठे दुकानदार से पूछा तो उन्होंने बताया कि उनका परिवार पिछली पांच-छह पीढ़ियों से पराठें वाली दुकान चला रहा है। उन्होंने बड़े गर्व से बताया की हम स्वाद के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं करते। बड़े-बड़े नेता-अभिनेता हमारे यहाँ के पराठों का स्वाद चख चुके हैं। उन्होंने एक बात और बताई की यहाँ पर पराठें की जितनी भी दुकाने हैं वो सभी एक ही खानदान की हैं। परिवार बढ़ते गए तो दुकाने भी बढ़ती गयी। मुझे यहाँ की कुछ बाते बेहद पसंद आयी, एक तो ये कि भले ही ये पराठें छोटी कढ़ाई में डीप फ्राई करके बनाये जाते हों पर ये ज्यादा हैवी नहीं लगते, स्वादिष्ट लगते हैं, दूसरा इन दुकान वालों का मीठा व्यवहार जो इनके खाने में और जायका घोल देता है, बार-बार यहाँ आने का निमत्रण देता है। देखिये मेरे केस में तो ऐसा हुआ है बाकी हर किसी का अनुभव दूसरे से थोड़ा अलग ही होता है।

खैर, पराठों का आनंद लेने के बाद चांदनी चौक के फोटोग्राफर मार्किट से कैमरे का बैग खरीदा, यहाँ पर भी आपको फोटोग्राफी से संबंधित तमाम इक्विपमेंट्स ठीक-ठाक दाम में मिल जायेंगे।(Paranthe wali gali)

घूमते-घूमते थकान काफी हो चुकी थी इसलिए वापसी में पार्किंग तक रिक्शा लिया और अपनी गाड़ी तक पहुंचा और देर शाम तक घर….
Written by Pardeep Kumar

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