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Karwaan Book Fest: Delhi में लगने जा रहा है किताबों का मेला

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अगर आपको किताबें पढ़ना पसंद है, नए लेखकों से मिलना अच्छा लगता है या किताबों के बीच घंटों घूमना आपके लिए किसी आउटिंग से कम नहीं है, तो इस महीने Delhi में आपके लिए एक खास मौका आने वाला है। 29 अगस्त 2026 को Karwaan Book Fest का Delhi संस्करण आयोजित होने जा रहा है। यह कार्यक्रम पुरानी Delhi के चांदनी चौक इलाके में स्थित Omaxe Chowk में होगा। आयोजन से जुड़ी उपलब्ध जानकारी में किताबों के साथ लेखक, बातचीत और पुस्तक प्रेमियों के लिए कई तरह की गतिविधियों का जिक्र किया गया है। यानी यह सिर्फ किताबें खरीदने की जगह नहीं होगी। यहां किताबों के साथ उनसे जुड़े लोगों से मिलने, लेखकों की बातें सुनने और साहित्य की दुनिया को थोड़ा और करीब से समझने का मौका मिल सकता है। 29 अगस्त को कहां होगा Karwaan Book Fest? इस बार Karwaan Book Fest का Delhi संस्करण Omaxe Chowk, चांदनी चौक में होने वाला है। Omaxe Chowk पुरानी Delhi के चांदनी चौक इलाके में स्थित एक बड़ा खरीदारी केंद्र है। इसका पता एचसी सेन मार्ग, चांदनी चौक, नई Delhi-110006 है। यह चांदनी चौक के पुराने बाजारों के बीच स्थित होने की वजह से जगह के लिहाज से भी काफी खास है। यह स्थान उन लोगों के लिए भी अच्छा है जो किताबों के कार्यक्रम के साथ पुरानी Delhi की गलियों और बाजारों का मजा लेना चाहते हैं। कब होगा यह किताबों का मेला? Karwaan Book Fest की तारीख 29 अगस्त 2026 बताई गई है। यह दिन शनिवार है। आयोजन से जुड़ी जानकारी में 29 अगस्त को Delhi संस्करण होने की बात दी गई है। हालांकि अभी उपलब्ध जानकारी में कार्यक्रम के शुरू होने और खत्म होने का निश्चित समय नहीं दिया गया है। इसलिए इस समय कोई अनुमानित समय बताना सही नहीं होगा। अगर आप जाने का प्लान बना रहे हैं, तो आयोजन के एक-दो दिन पहले आयोजकों की तरफ से जारी होने वाली अंतिम समय-सारणी जरूर देख लें। आखिर Karwaan Book Fest में क्या होगा? Karwaan Book Fest को सिर्फ किताबों की बिक्री वाला कार्यक्रम समझना सही नहीं होगा। इस आयोजन की साझा की गई जानकारी में किताबों के साथ लेखकों, बातचीत और किताबों से जुड़ी दूसरी गतिविधियों की बात कही गई है। यानी यहां आपको अलग-अलग तरह की किताबें देखने के साथ लेखकों और साहित्य से जुड़े लोगों को सुनने का मौका भी मिल सकता है। Karwaan Book Fest ऐसे कार्यक्रमों की खास बात यही होती है कि यहां किताब सिर्फ एक सामान नहीं रहती। उसके पीछे लिखने वाले व्यक्ति, उसकी सोच और उस कहानी के बारे में भी जानने का मौका मिलता है। अगर आपको किताबों के बीच समय बिताना पसंद है, तो यह आयोजन आपके लिए अच्छा अनुभव हो सकता है। किताबों के साथ लेखकों से मिलने का मौका अगर आपने कभी किसी लेखक की किताब पढ़ी है, तो उसके लेखक को सामने सुनना अपने आप में अलग अनुभव होता है। किताब पढ़ते समय हम सिर्फ कहानी या जानकारी को समझते हैं, लेकिन लेखक से बातचीत के दौरान यह पता चल सकता है कि उसने वह कहानी क्यों लिखी, उसके पीछे क्या सोच थी और किताब तैयार करने में उसे किन चीजों से गुजरना पड़ा। Karwaan Book Fest में लेखकों से जुड़ी बातचीत और मुलाकातों की जानकारी इसी वजह से खास है। अगर आपको लिखने या पढ़ने में दिलचस्पी है, तो ऐसी बातचीत आपके लिए काफी काम की हो सकती है। किसी लेखक की लेखन यात्रा सुनकर आपको अपनी पढ़ने या लिखने की आदत को आगे बढ़ाने की प्रेरणा भी मिल सकती है। नए लेखकों के लिए भी अच्छा मंच आजकल किताबें लिखने वाले बहुत से नए लोग सामने आ रहे हैं। सोशल मीडिया के कारण लेखकों और पाठकों के बीच दूरी भी पहले जैसी नहीं रही। फिर भी किसी लेखक को सामने बैठकर सुनने का अनुभव अलग होता है। Karwaan Book Fest जैसे आयोजन नए लेखकों को पाठकों तक पहुंचने का मौका दे सकते हैं। यहां पाठक भी अपनी पसंद की किताबों के बारे में सीधे जान सकते हैं। खासकर जो लोग नई किताबें ढूंढ रहे हैं और हर बार वही चर्चित किताबें नहीं खरीदना चाहते, उनके लिए यह जगह अच्छी हो सकती है। किताबों के शौकीनों के लिए क्यों खास है यह आयोजन? कई बार किताबों की दुकान पर हम अपनी पसंद की कुछ किताबें देखकर वापस आ जाते हैं। लेकिन पुस्तक उत्सव का माहौल थोड़ा अलग होता है। एक ही जगह पर अलग-अलग तरह की किताबें मिलती हैं। कोई कहानी पढ़ रहा होता है, कोई लेखक से बात कर रहा होता है और कोई ऐसी किताब खोज रहा होता है जिसके बारे में उसने पहले कभी नहीं सुना। Karwaan Book Fest Karwaan Book Fest का आकर्षण भी इसी तरह का बताया जा रहा है। आयोजन की जानकारी में इसे किताबों, लेखकों और बातचीत से जुड़ा कार्यक्रम कहा गया है। यानी अगर आप किताबों के बीच समय बिताना पसंद करते हैं, तो यहां आपको काफी कुछ देखने को मिल सकता है। बच्चों के लिए भी हो सकता है अच्छा अनुभव अगर आपके घर में बच्चे हैं और उन्हें किताबें पढ़ने की आदत डालना चाहते हैं, तो ऐसे आयोजन उनके लिए भी अच्छे हो सकते हैं। बच्चों को मोबाइल और स्क्रीन से कुछ समय दूर रखकर किताबों की दुनिया से परिचित कराने का यह आसान तरीका है। हालांकि इस आयोजन में बच्चों के लिए कौन-कौन सी खास गतिविधियां होंगी, इसकी पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। इसलिए बच्चों के लिए किसी विशेष कार्यक्रम की उम्मीद करने से पहले आयोजन की अंतिम सूची जरूर देख लें। फिर भी किताबों के माहौल में बच्चों को ले जाना उनके लिए एक अलग तरह का अनुभव हो सकता है। Karwaan Book Fest Omaxe Chowk में होने की वजह से और खास है जगह इस आयोजन की एक और अच्छी बात इसका स्थान है। Karwaan Book Fest ऐसी जगह होने जा रहा है जहां आप किताबों के साथ-साथ पुरानी Delhi का माहौल भी देख सकते हैं। Omaxe Chowk चांदनी चौक इलाके में स्थित है और यहां खरीदारी तथा खाने-पीने के कई विकल्प भी मिलते हैं। इसलिए अगर आप बाहर से आ रहे हैं तो अपना पूरा दिन इस

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Chandni Chowk- All you need to know  

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Chandni Chowk is one of the oldest and most famous markets in Delhi, India. Located in the heart of Old Delhi, it is a vibrant and bustling area known for its historical significance, cultural heritage, and vibrant shopping experience. The name “Chandni Chowk” translates to “Moonlight Square” or “Moonlight Market,” and it has a rich history that dates back to the Mughal era. Chandni chowk was established in the 17th century by the Mughal Emperor Shah Jahan when he decided to shift the capital of his empire from Agra to Delhi. It was designed as one of the main streets of Shahjahanabad, the new walled city of Delhi. The construction of Chandni Chowk began in 1650 and was completed in 1656. In its early days, Chandni Chowk was a grand boulevard lined with trees, canals, and pools, flanked by imposing havelis (mansions) and significant structures. The street was broad and served as the main thoroughfare of Shahjahanabad. It quickly became the commercial and cultural hub of the city, teeming with traders, merchants, artisans, and nobility. The market’s name is said to have originated from the moon’s reflection on a large pool that once existed in the area, creating a beautiful moonlit ambiance. The Mughal royal processions would often pass through Chandni Chowk, adding to its prestige and grandeur. Over the centuries, Chandni Chowk has witnessed various historical events and changes. It experienced the rise and decline of the Mughal Empire, followed by the British colonial rule in India. Many havelis were demolished, and the area underwent modernization. Despite the transformations, Chandni Chowk has managed to retain its old-world charm and cultural heritage. Today, it remains a bustling and vibrant market, featuring narrow lanes filled with a plethora of shops, vendors, and traders selling a diverse range of products. Whether you’re shopping for textiles, jewellery, spices, or indulging in mouth-watering street food, a visit to Chandni Chowk is a must for anyone exploring the cultural and historical treasures of Delhi. Read More on Chandni Chowk Historic monuments near Chandni chowk Chandni Chowk is located in the heart of Old Delhi, which is steeped in history and dotted with numerous historic monuments and landmarks. Here are some of the prominent historic monuments around Chandni Chowk: Red Fort (Lal Qila): One of the most iconic landmarks of Delhi, the Red Fort, is situated just a short distance away from Chandni Chowk. Built by the Mughal Emperor Shah Jahan in the 17th century, the Red Fort served as the main residence of the Mughal emperors until 1857. It is a UNESCO World Heritage Site and an architectural marvel, with its impressive red sandstone walls, magnificent gates, and intricate designs. Jama Masjid: Another significant historical monument near Chandni Chowk is the Jama Masjid, which is one of the largest and most revered mosques in India. Constructed by Shah Jahan between 1644 and 1656, the Jama Masjid’s grandeur lies in its vast courtyard, onion-shaped domes, and two towering minarets. It can accommodate thousands of worshippers during prayers and offers stunning views of Old Delhi from its minarets. Fatehpuri Masjid: Located at the western end of Chandni Chowk, the Fatehpuri Masjid is an elegant mosque built by Fatehpuri Begum, one of Shah Jahan’s wives. The mosque’s architecture exhibits a blend of Mughal and Islamic styles and features a beautiful central dome and minarets. St. James’ Church: While Old Delhi is predominantly associated with Mughal-era monuments, St. James’ Church stands as an example of British colonial architecture. Built-in 1836, it is one of the oldest churches in Delhi and is known for its stunning white exterior and elegant design. Gurudwara Sis Ganj Sahib: This Sikh gurudwara holds immense historical and religious significance. It marks the site where the ninth Sikh Guru, Guru Teg Bahadur, was beheaded on the orders of Aurangzeb, the Mughal Emperor. The present gurudwara was built in his memory and is an essential place of worship for Sikhs. Gauri Shankar Temple: An ancient Hindu temple dedicated to Lord Shiva, the Gauri Shankar Temple is a prominent religious site in Chandni Chowk. The temple features an 800-year-old lingam (phallic symbol) of Lord Shiva and is visited by devotees throughout the year. These are just a few of the historic monuments around Chandni Chowk. Exploring these landmarks offers a glimpse into the rich history, architectural brilliance, and cultural diversity of Old Delhi. Most famous four bazaars of Chandni Chowk Chandni Chowk, being one of the oldest and busiest markets in Delhi, is divided into several smaller bazaars, each with its own specializations and unique offerings. The four main bazaars of Chandni Chowk are: Fatehpuri Market is one of the bustling markets located in Chandni Chowk, Delhi. It is named after Fatehpuri Begum, one of the wives of Mughal Emperor Shah Jahan. The market is well-known for its wholesale trade of a variety of goods and merchandise, catering to both locals and retailers. Fatehpuri Market is primarily a wholesale market, and you’ll find a wide range of products being traded in bulk quantities. Items such as textiles, garments, fabrics, shoes, hardware, kitchenware, and household items are among the commodities sold here. The market is particularly famous for its cloth and garment shops. Retailers from various parts of Delhi and neighboring states come here to purchase textiles and ready-made clothing at wholesale prices. The market area consists of various traditional bazaars, each specializing in specific types of products. For example, there are bazaars for jewelry, cosmetics, accessories, and more. Like many markets in Chandni Chowk, Fatehpuri Market also has its share of street food vendors. You can find some local favorites and quick snacks to refuel while exploring the area. Fatehpuri Market is located close to the historic Fatehpuri Masjid, which adds to the charm and cultural significance of the area. The mosque itself is worth a visit and showcases splendid Mughal architecture. If you’re looking for a unique shopping experience and want to buy goods in bulk or explore the vibrant ambiance of an old Delhi market,

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Best Places To Eat In Chandni Chowk, Old Delhi

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चाँदनी चौक है दिल्ली के वर्ल्ड फेमस स्ट्रीट फ़ूड की पहचान अलग-अलग संस्कृतियों में रची बसी दिल्ली देश की शान और देश की जान मानी जाती है, फिर चाहे दिल्ली के लाजपत नगर की बात करें या चाँदनी चौक की, दिल्ली अपने आप में एक गहरा इतिहास समेटे हुए है। इसके अलावा अगर दिल्ली के मशहूर खान-पान की बात करें तो यहाँ न तो बंगाल का रोशोगुल्ला इतना फेमस है और ना ही हरियाणा का चूरमा। दिल्ली में सबसे फेमस है दिल्ली का “स्ट्रीट फ़ूड”। जी हाँ, दिल्ली का स्ट्रीट फ़ूड जहाँ आपको मुंबई की भेल पूरी, तिब्बतन मोमोज़, अमृतसरी कुलचा, इंदौर का पोहा, नई दिल्ली की चाट और भी लगभग सभी राज्यों के फेमस फ़ूड का जायका यहाँ हर गली में मौजूद मिलेगा। दिल्ली जितनी अपनी विरासत और ऐतिहासिक जगहों के लिए मशहूर है उतनी ही यहाँ के स्ट्रीट फ़ूड की महक देश भर में स्वाद का परिचय देते दिखाई पड़ती है। तो आज के इस ब्लॉग में हम आपको ले चलेंगे दिल्ली के ऐतिहासिक और मशहूर चाँदनी चौक में। जहाँ के स्ट्रीट फ़ूड का ज़ायका ऐसा है कि सिर्फ खुशबू से ही मुँह में पानी आ जाता है। Best Places To Eat In Chandni Chowk, Old Delhi चाँदनी चौक की इन 5 दुकानों का स्वाद दिल्ली में आपको और कहीं नहीं मिलेगा, तो चाँदनी चौक आकर यहाँ खाना बिल्कुल ना भूलें। दौलत की चाट : अगर कभी चाट की बात हो रही हो तो सभी के मन में कुछ तीखा, मसालेदार, चटपटा आने लगता है पर दौलत की चाट एक ऐसी चाट है जिसका स्वाद मीठा है। दौलत की चाट दिल्ली की सबसे मशहूर विंटर डैज़र्ट है जो सिर्फ अक्टूबर से मार्च के महीने में ही खाने को मिलती है दिल्ली के चाँदनी चौक में और जिसके चर्चे आप लोगों ने काफी सुने भी होंगे। चाँदनी चौक की लगभग हर गली में आपको दौलत की चाट के स्टाल्स लगे दिखाई देंगे। क्यों फेमस है – दौलत की चाट एक रहस्यमय मिठाई है जिसे कहा जाता है कि यह मुग़ल शासन के टाइम से बनायी जा रही है। इस चाट का सिर्फ सर्दियों में मिलने का यह कारण है क्योंकि इसकी रेसिपी में सर्दियों की ओस का इस्तमाल किया जाता है। जरूर आप भी सोच रहे होंगे की ओस से रेसिपी ये कैसे मुकम्मल है, पर यही तो खासियत है दौलत के चाट की। इसमें सबसे पहले दूध को उबाल कर बाहर ठण्ड में रख दिया जाता है जिससे ठंडा होने पर उबले हुए दूध के ऊपर ओस बैठ जाती है। इस मिठाई को अपने सुंदर दिखने के लिए लगभग आधे दिन और पूरी रात की आवश्यकता होती है, और इसे केवल 2-3 घंटे के लिए ही खुले में रखा जा सकता है। इस चाट को लखनऊ में निमिष और कानपूर में मलाई मक्खन के नाम से जाना जाता है। नटराज दही भल्ले : चाँदनी चौक की लगभग सभी दुकानें काफी पुराने समय से हैं। और उन्हीं में से एक है नटराज दही भल्ले जो 1940 से दही भल्लों का स्वाद परोस रही है। यहाँ चौबीसों घंटे लगी भीड़ आपको इसके स्वाद का गवाह दे देगी। नरम, दानेदार, और फुले हुए भल्ले और उसके बहार चढ़ी सुपर क्रिस्पी परत , लाल इमली की चटनी , और उप्पर से छिड़के मसाले। आ गया ना मुँह में पानी ?यहाँ के दही भल्ले जितने मशहूर हैं वाकई उतने स्वादिष्ट भी हैं। तो चाँदनी चौक जाकर दही भल्ले टेस्ट करना बिलकुल ना भूलें। पराठें वाली गली : चाँदनी चौक में सबसे मशहूर पराठें वाली गली का नाम तो न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश भर में ही काफी मशहूर है। यहाँ पर आपको पराठों की 40-50 वैरायटी मिल जाएगी। और यहाँ के पराठों की खास बात यह है कि यहाँ पर बनने वाले पराठें देसी घी में डीप फ्राई किए जाते है, और यहाँ पर आकर आप पराठों में तेल की उम्मीद ना ही रखें तो बेहतर है। और एक चीज़ यहाँ पर खास है कि यहाँ पर सभी लगभग शुद्ध शाकाहारी पराठें ही बनाते हैं जिसमे ना ही प्याज शामिल है और न ही लहसून। इन पराठों को और स्वादिष्ट बनाने के लिए बादाम काजू और सूखे मेवे भी डाले जाते है। अगर आप खाने के ज़रा भी शौकीन हो तो थाली ख़त्म किए बिना आप यहाँ से उठ नहीं पाएंगे क्योंकि यही तो खास बात है पराठें वाली गली की। कुरेशी कबाब : जामा मस्जिद के पास, मीना बाजार के बिलकुल सामने अपनी विरासत जमाए कुरेशी कबाब नॉन वेज़ लवर्स का अड्डा है। वैसे तो यहाँ आपको अलग अलग तरह के कबाब खाने को मिल जायेंगे पर लजीज आनंद के लिए आप यहाँ कबाब रायते और चटनी के साथ आर्डर करें। यहाँ कबाब इतने टेस्टी हैं कि आप दुबारा यहाँ आए बिना रह नहीं पाएंगे और ये कबाब न सिर्फ टेस्टी बल्कि बजट फ्रेंडली भी है। ज्ञानी की हट्टी : तो क्या आप भी हैं रबड़ी के दीवाने हैं तो चल पड़िये ज्ञानी दी हट्टी में खाने। पुरानी दिल्ली के सबसे सीक्रेट फूड्स में से एक है ज्ञानी दी हट्टी जोकि अपने रबड़ी फालूदा के लिए सबसे ज्यादा जानी जाती है। दाल का हलवा, मूंग का हलवा, बादाम का हलवा, सूजी का हलवा और कई तरह की मिठाइयाँ इस जगह आपको मिल जाएँगी। तो इंतज़ार किस बात का है। चल पड़िये चाँदनी चौक की इन मशहूर जगहों में और चख लीजिये दिल्ली के स्ट्रीट फ़ूड का स्वाद।

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Paranthe Wali Gali

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Paranthe Wali Gali: परांठे वाली गली के ज़ायकेदार परांठे by Pardeep Kumar लॉक डाउन के बाद मेरी यह पहली यात्रा थी। काफी दिनों से मन बाहर घूमने को हिलोरें मार रहा था, काफी दिनों से कुछ ट्रेडिशनल और हट कर खाने का दिल भी कर रहा था। साथ ही अपने निकोन कैमरे के लिए एक अच्छा-सा नया बैग भी खरीदना था। इस बीच अच्छी खबर ये थी कि दिल्ली में कोरोना के भी बस कुछ ही केस बचे थे, इसलिए तमाम सावधानी के बीच निश्चय किया दिल्ली के सबसे पुराने बाज़ारों में से एक चांदनी चौक घूमने का, जहाँ की फोटोग्राफर मार्किट से कैमरे के लिए मुझे बैग भी मिल जायेगा और पराठें वाली गली के ज़ायकेदार पराठें भी।(Paranthe wali gali)’ कैसे पहुंचे  पराठें वाली गली कोरोना को लेकर थोड़ा डर कम था, क्योंकि पिछले सप्ताह ही वैक्सीन की दूसरी डोज ले ली थी और भीड़-भाड़ वाली जगह बिना मास्क के जाना तो वैसे भी खतरे से खाली नहीं। इसलिए कोरोना बचाव संबंधी सारे साजो-सामान से लैस होकर मैं अपनी कार से चांदनी चौक पहुंचा। लाल किले के सामने वैसे तो एमसीडी की बड़ी पार्किंग है लेकिन उस दिन शायद कुछ निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए मुझे पार्किंग की जगह मिली पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने। जिसके बाद चांदनी चौक पहुँचने के लिए मुझे लगभग डेढ़ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।  मेरी सलाह यही रहेगी आप मेट्रो से आराम से आइये, चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन पर उतरिये और बस सामने चंद कदम दूर आपकी मंजिल। चांदनी चौक बाजार बताते हैं चांदनी चौक को मुग़ल बादशाह शाहजहां की पुत्री जहाँ आरा बेग़म ने डिज़ाइन किया था। पहले यहाँ चांदी की बहुत सारी दुकानें होती थी बाद में समय के साथ कपड़ों और अन्य आभूषणों की दुकानें भी बढ़ती गयी। लाल किले के साथ ही चांदनी चौक का निर्माण करवाया गया था। लगातार दो दिन से हो रही बारिश के बाद जब आप घर से निकलते हो तब मौसम आप पर थोड़ा  मेहरबान होता है, इसलिए जुलाई के महीने में भी आप पैदल चलने की अच्छी स्थिति में होते हो। क्योंकि चांदनी चौक का अभी हाल ही में नवीनीकरण किया गया है, तो हो सकता है आपको थोड़ा ज्यादा पैदल चलना पड़े। जिनको ज्यादा पैदल चलना पसंद न हो उन्हें पुरानी दिल्ली की इन गलियों के लिए  आसानी से रिक्शें मिल जायेंगे। यह आपकी उम्र, उत्साह और ऊर्जा पर भी निर्भर करता है। पराठें वाली गली मैंने पराठें वाली गली के बारे में खूब सुना था, कई हिंदी फिल्मों में भी देखा था। बस अब वक़्त आ गया था इन पराठों का स्वाद चखने का।  गली में एंट्री करते ही कुछ दुकानें छोड़ कर कोने पर एक पराठें की पुरानी दुकान दिखाई दी। जिस पर लिखा था प. बाबू राम देवी दयाल पराठें वाले, सिन्स 1889, दुकान में प्रवेश किया और एक खाली टेबल देखकर अपना आसन जमा लिया। आप आसानी से आर्डर दे सके इसके लिए सामने दीवार पर पूरा मेन्यू कार्ड पेंट करवा रखा था, लेकिन असली जद्दोजहद शुरू होती है तब जब आपको 40-50 तरह के पराठों में से कोई एक आर्डर करना हो। मिक्स वेज, रबड़ी, खोया, आलू गोभी, पापड़, भिंडी, करेला, अचार, मेथी, पनीर, चीज़, गाजर, मटर और भी बहुत तरह के पराठें मेन्यू में थे। मेन्यू में है हर तरह के परांठे मैंने दो पराठें आर्डर किये जिसमे एक पापड़ का था और दूसरा मिक्स वेज। 7-8 मिनट के इंतज़ार के बाद एक थाली लगाई गई जिसमे इमली की चटनी, आलू की सब्जी, सीताफल की सब्जी, मूली-गाजर का अचार और एक मिक्स वेज सब्जी और एक अलग प्लेट में दो गर्मागर्म पराठें। दोस्तों, किसी महापुरुष ने बिलकुल सही कहा है कि खाने का मजा तभी है जब आपको जोरदार भूख लगी हो और अगर भोजन स्वादिष्ट हो तो फिर समझ लीजिये आज आप स्वर्ग के चक्कर लगा आये।  देश भर में प्रसिद्ध पराठें वाली गली के पराठों की खासियत ईमानदारी से कहूँ तो मुझे यहाँ के पराठें खूब भाये, शायद भूख लगी थी इसलिए थोड़े ज्यादा । लेकिन एक बात और बता दूँ हम अपने घरों में आमतौर पर तवे पर बने पराठें खाते हैं लेकिन यहाँ पर बनने वाले पराठें डीप फ्राई किये जाते हैं देसी घी में। मतलब की यहाँ आकर आप पराठों में कम तेल की उम्मीद न ही रखें तो बेहतर है। मैंने यहाँ पर जो एक चीज नोट की वो ये कि यहाँ पर लगभग सभी बिलकुल शुद्ध शाकाहारी पराठे ही बनाते हैं न प्याज न लहसून। शायद अपनी पुरानी परम्पराओं का निर्वहन करने के लिए। पराठों को स्वादिष्ट बनाने के लिए उनमें बादाम और काजू जैसे सूखे मेवे भी डाले जाते हैं। अगर आप खाने के जरा भी शौक़ीन हैं तो आप थाली में सर्व की गई कोई भी चीज पूरा खत्म किये बिना टेबल से नहीं उठेंगे, बस यही खासियत है देश भर में प्रसिद्ध पराठें वाली गली के पराठों की। बड़े-बड़े नेता-अभिनेता भी चख चुके है यहाँ का स्वाद उत्सुकतावश जब मैंने काउंटर पर बैठे दुकानदार से पूछा तो उन्होंने बताया कि उनका परिवार पिछली पांच-छह पीढ़ियों से पराठें वाली दुकान चला रहा है। उन्होंने बड़े गर्व से बताया की हम स्वाद के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं करते। बड़े-बड़े नेता-अभिनेता हमारे यहाँ के पराठों का स्वाद चख चुके हैं। उन्होंने एक बात और बताई की यहाँ पर पराठें की जितनी भी दुकाने हैं वो सभी एक ही खानदान की हैं। परिवार बढ़ते गए तो दुकाने भी बढ़ती गयी। मुझे यहाँ की कुछ बाते बेहद पसंद आयी, एक तो ये कि भले ही ये पराठें छोटी कढ़ाई में डीप फ्राई करके बनाये जाते हों पर ये ज्यादा हैवी नहीं लगते, स्वादिष्ट लगते हैं, दूसरा इन दुकान वालों का मीठा  व्यवहार जो इनके खाने में और जायका घोल देता है,  बार-बार यहाँ आने का निमत्रण देता है। देखिये मेरे केस में तो ऐसा हुआ है बाकी हर किसी का अनुभव दूसरे से थोड़ा अलग ही होता है। खैर, पराठों का आनंद लेने के बाद चांदनी चौक के फोटोग्राफर मार्किट से कैमरे का बैग खरीदा, यहाँ पर भी आपको फोटोग्राफी से संबंधित तमाम इक्विपमेंट्स ठीक-ठाक दाम में मिल जायेंगे।(Paranthe wali gali) घूमते-घूमते थकान काफी हो चुकी

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Dariba Kalan in Chandni Chowk

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Dariba Kalan : चाँदनी चौक के मशहूर दरीबा कलां और किनारी बाज़ार Five Colors of Travel देश भर में प्रसिद्ध चाँदनी चौक में जान डालते हैं वहाँ के कई छोटे-बड़े बाज़ार। हर एक मील पर एक नया बाज़ार शुरू हो जाता है और बाज़ार भी कुछ ऐसे जहाँ हर नुक्कड़ और चौराहे पर कुछ अलग व उम्दा दिखना बड़ी बात नहीं। चाँदनी चौक के ऐतिहासिक और बेहद पुराने बाजारों की सूची में शुमार दरीबा कलां और किनारी बाज़ार की भी अपनी अलग खासियत है। यही कारण है कि वहाँ बने बाज़ार पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी पहचान बनाये हुए हैं।( Dariba Kalan, Chandni Chowk) दरीबा कलां ज्वेलरी हब दरीबा कलां केवल एक बाज़ार तक सीमित न होकर ज्वेलरी की एक पूरी अलग दुनिया है। जहाँ हीरे जवाहरात, सोना, चांदी, सिल्वर, एथनिक और वेस्टर्न हर तरह का ज्वेलरी पीस आसानी से उपलब्ध हो जाता है। 17वीं शताब्दी से चल रही ये मार्किट लाल किले से सिर्फ 5 मिनट की दूरी पर स्थित है। लगभग 2 किलोमीटर लम्बी सड़क पर बनी इस मार्किट में घुसते ही आपके चारों ओर अगर कुछ है तो वह है सोना, चांदी और ज्वेलरी के उम्दा डिज़ाइन। मार्किट की शुरुवात होती है प्रसिद्ध जलेबी वाले की दुकान से जो न जाने कितने सालों से अपनी जलेबी की मिठास से चाँदनी चौक में मिठास घोल रहा है। आगे बढ़ते ही आपको खुद-ब-खुद महसूस हो जाएगा की चाँदनी चौक नाम में चाँदनी शब्द दरीबा कलां से ही लिया गया है। क्योंकि यहां के अधिकतर दुकानदार चाँदी के गहनों के अलावा चाँदी के बर्तन और चाँदी की बनी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी सैंकड़ों सालों से बेचते आ रहे हैं। पीढ़ियों से चल रहे इस बाज़ार में आपको हर प्रकार की ज्वेलरी के उम्दा डिज़ाइन आसानी से मिल जाएंगे, जिनकी कला और खूबसूरती देख आप असमंजस में पड़ जाएंगे की क्या ले और क्या नहीं। सदियों पुराना शाही बाजार बता दें दरीबा कलां बाज़ार की स्थापना का श्रेय मुगल बादशाह शाहजहाँ को जाता है। माना जाता है कि बाज़ार में बादशाह, उनके परिवार और शाही लोग खरीदारी करने आते थे, खासकर महलों की बेगमों के लिए भी बाजार में गहनों की दुकानें खोली गई। तब से लेकर आज तक यह महिलाओं का पसंदीदा बाजार है। चाँदी के बर्तन बताते हैं यह बाजार कई बार लूटा गया लेकिन हर बार फिर से स्थापित हो गया। आज इस बाज़ार में मीरीमल सुल्तान सिंह जैन, धन्नूमल जगाधर मल, लिली डीयाना, भगवान दास खन्ना, श्रीराम हरि राम, राम स्वरूप जैन, राधे कृष्ण, रत्न चंद जैसे अनेक पुराने जौहरियों के वंशजों के अलावा बहुत से नए जौहरी भी अपना कारोबार कर रहे हैं। इसके अलावा बाज़ार में आपको नेपाली, तिब्बती ज्वेलरी भी आसानी से मिल जाएगी। आपको बता दें बाज़ार में रोज़ाना करोड़ो का कारोबार होता है और त्यौहारों के दिनों में डिमांड दुगनी हो जाती है। कीमत के लिहाज से भी दरीबा कलां परफेक्ट है। किनारी बाज़ार चांदनी चौक के सबसे मशहूर बाज़ारों में से एक किनारी बाज़ार दरीबा कलां के बिलकुल पास में स्थित है। बाज़ार की शुरुवात होती है प्रेम चंद गोटे वाले चौक से। जहाँ लोग शादी से लेकर, दुकानों और घरों का सामान भी खरीदते हैं। इस बाज़ार में फैंसी गोटा पट्टी, लेस, शादी की पगड़ियाँ, शगुन के लिफाफे, शगुन के थाल, ज्वेलरी बॉक्स और न जाने कितने प्रकार की आइटम मिलते हैं। आपको बता दें वैसे तो किनारी बाज़ार में थोक में सामान ज्यादा बिकता है लेकिन कुछ दुकानदार रिटेल में भी अपना सामान बेचते हैं। यहाँ पर बिकने वाला सामान आपको बेहद किफायती दामों में मिल जाता है। बात चाहे शादी में प्रयोग होने वाले सजावट के सामान की हो या अन्य वस्त्रों की किनारी बाज़ार में आपको सब मिलेगा। किनारी बाज़ार का नाम सूट और साड़ी के नीचे लगने वाली किनारी के नाम पर ही रखा गया है। यहाँ आपको हर तरह की किनारी, गोटा और लटकन मिल जाएगी। ये बाजार भले ही संकरी गलियों में बने हुए हैं, भले ही यहाँ की दुकानें छोटी-छोटी हैं लेकिन दुकानें छोटी होने के बावजूद भी यहाँ आने वाले खरीददारों को न केवल बहुत सारी वैरायटी मिल जाती है बल्कि क्वालिटी से भी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाता। चाँदनी चौक के यह दोनों बाज़ार इसीलिए दिल्ली के सबसे अच्छे बाजारों में गिने जाते हैं। कम कीमत में बढ़िया सामान किसको पसंद नहीं है? ये दोनों ऐतिहासिक बाज़ार अपनी क्वालिटी, प्रोडक्ट के यूनिकनेस और कीमत हर लिहाज़ से परफेक्ट हैं। तो अब जब भी चाँदनी चौक जाएँ दरीबा कलां और किनारी बाज़ार में खरीदारी का लुफ्त जरुर उठाएँ।(Dariba Kalan, Chandni Chowk) Written & Research by Geetu Katyal Edited by Pardeep kumar You can watch video of this blog- Dariba kalan & Kinari Bazar Like & Subscribe

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Mirza Ghalib Ki Haveli

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Mirza Ghalib Ki Haveli- मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली: एक शायर की आखिरी विरासत पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या? वैसे तो पुरानी दिल्ली की संकरी गलियां और लोगो के हुजूम से गुलज़ार चाँदनी चौक का हर कोना पुरानी दिल्ली को नायाब बनाता है, लेकिन इन भीड़भाड़ व शोरगुल भरे बाजारों के ठीक बीचो-बीच एक शांत-सी मनमोहक हवेली भी है जो कभी मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib)  का घर हुआ करती थी। जिन लोगों को शायरी पसंद है उन सभी के लिए  ग़ालिब की इस हवेली का ज़र्रा-ज़र्रा जैसे मोहब्बत की चाशनी में घुला हुआ शरबत है। Mirza Ghalib Ki Haveli कैसे पहुंचे मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर घोषित ये हवेली किसी को भी ग़ालिब का दीवाना बना सकती है क्यूंकि हवेली की पूरी सजावट उनकी लिखी शायरियों से ही की गयी है।  आपको बता दें मिर्ज़ा ग़ालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ां ग़ालिब है जिन्हें प्यार से “मिर्जा नीता” नाम से भी जाना जाता है।  उनकी पत्नी का नाम उमराव था, विवाह के समय गालिब 13 वर्ष और उमराव 12 वर्ष की थी। मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिए थे यहां अंतिम श्वास उत्तर प्रदेश के आगरा में जन्में मिर्जा ग़ालिब शादी के बाद दिल्ली आ गए थे। आगरा से लौटने के बाद गालिब ने 1860-1869 तक इसी हवेली में शरण ली थी और इसी हवेली में बैठकर ग़ालिब ने ऊर्दू और पारसी में ‘दीवान’ की रचना की थी।  यही वो स्थान है जहाँ उन्होंने अपने अंतिम श्वास लिए थे।  ग़ालिब की मौत के बाद साल 1999 तक इस हवेली में दुकानें बननी और बाजार लगना शुरू हो गया था। जिसके कारण हवेली की चमक फीकी पड़ती चली गई। यही कारण है कि 500 एकड़ में बनी ये हवेली अब बस 150 एकड़ की बची है।(Mirza Ghalib ki Haveli) 1999 में सरकार ने इस हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया। धरोहर घोषित करने के बाद ग़ालिब की हवेली का पुर्ननिर्माण किया गया, मुगल लखोरी, ब्रिक्स, सैंड स्टोन और लकड़ी के दरवाजों का इस्तेमाल कर हवेली को खूबसूरत लुक दिया गया। मुगल वस्तुकला से बनी हवेली के लकड़ी के बड़े से दरवाजे को देखते ही आप ग़ालिब के समय में लौट जाएंगे। हवेली में अंदर घुसते ही सीधे हाथ पर एक बड़ा-सा कमरा है। कमरे में ग़ालिब का अचकन और उनकी बेगम के वस्त्र फ्रेम करके बेहद संजीदगी से लगाए गए हैं।  बीचो-बीच ग़ालिब का स्टैच्यू दिखेगा जिसके दोनों तरफ गालिब की मोटी-मोटी पोथी रखी हुई हैं। आप जैसे-जैसे हवेली में आगे बढ़ेंगे आपको ग़ालिब द्वारा खेलें जाने वाले खेल चौसर, शतरंज की बिसातें, उनके बर्तन और पुरानी पुस्तकें देखने को मिलेंगी। Mirza Ghalib Ki Haveli यहाँ आपको ग़ालिब के अलावा उनके समकालीन शायरों के चित्र भी दिखाई देंगे। हवेली में एक जगह हुक्के के साथ गालिब का एक बिलकुल जीवंत प्रतीत होता स्टैच्यू भी नजर आएगा जो शायद इस बात का प्रतीक है कि वो हुक्के के बेहद शौक़ीन थे। पूरी हवेली की तमाम दीवारों पर ग़ालिब और उनकी शायरी के पोट्रेट बड़े ही तहज़ीब और करीने से लगाए गए हैं। जिनकों देखकर पढ़कर ग़ालिब के तमाम शेर ज़ेहन में अनायास ही घूम जाते हैं…. “उग रहा दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ग़ालिब हम बयावां में हैं और घर में बहार आई है” फ्री में एंट्री जबसे ग़ालिब की हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है तबसे यह हवेली पुरानी दिल्ली का एक प्रमुख आकर्षण  बन चुकी है। सुबह 11 से शाम 6 बजे तक आम दर्शकों के लिए खुलने वाली ये धरोहर हवेली सिर्फ सोमवार के दिन बंद रहती है। आप बिना किसी टिकट के यहाँ फ्री में एंट्री करिये। साथ में आप अपने कैमरे से हवेली की जी भर के तस्वीरें लीजिये। फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है। ग़ालिब किसी इमारत या चारदीवारी के मोहताज नहीं हैं और न ही उन्हें इन तंग और सौ-डेढ़ सौ एकड़ की हवेलियों में समेटा जा सकता है। लेकिन फिर भी जिनको ग़ालिब से इश्क़ है, शेरो-शायरी पसंद है, जो कवितायेँ लिखते-पढ़ते हैं और जो ग़ालिब को समझना चाहते हैं उनको यहाँ अवश्य आना चाहिए।     क्यों जाएँ मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली ? Five Reasons to Visit Mirza Ghalib ki Haveli-    1.  जिन लोगों को कविताएं -शायरी में दिलचस्पी है उन सभी के लिए  ग़ालिब की यह हवेली एक अच्छा विकल्प है।    2.  मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली दिल्ली के चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है, जहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है।    3. राष्ट्रीय धरोहर घोषित इस हवेली में मिर्ज़ा ग़ालिब की जिंदगी से संबंधित काफी पुरानी चीजें हैं, जो ग़ालिब के चाहने वालों के लिए यकीनन किसी तोहफे से कम नहीं।    4. यहाँ आप बिना किसी टिकट के फ्री में एंट्री कर सकते हैं।  5. फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है। Research by Geetu Katyal Written & Edited by Pardeep Kumar