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इमली से बनने वाले 5 देसी पेय

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इमली (tamarind), एक ऐसा खट्टा मीठा फल, जिसे खाने के बाद तो दाँत भी खट्टे हो जाते हैं। खट्टी मीठी चटनी बनानी हो या सब्जी का स्वाद बढ़ाना हो, भारतीय किचन में आपको इमली जरूर मिल जाएगी। कच्ची इमली हरे रंग की होती है जबकि पकने पर इसका रंग कुछ लाल हो जाता है। कच्ची इमली कम गुणकारी होती है, जबकि पक्की इमली पाचन में सहायक होने के साथ-साथ कान्सटीपेशन की समस्या को भी कम करती है। क्योंकि, इसकी तासीर ठंडी होती है तो यह गर्मी में लाभदायक होती है। आईए जानते हैं कैसे इमली का पेय पदार्थों के रूप में सेवन किया जा सकता है इमली से बनने वाले पांच देसी पेय। 5 drinks made with tamarind इमली का अमलाना राजस्थानी संस्कृति का खान पान बेहद अनूठा और स्वादिष्ट होता है, इमली का अमलाना भी उन्हीं में से एक है। गर्मियों में राहत देने वाली ये ड्रिंक पीने में तो मज़ेदार होती ही है साथ ही, कई सारे फ़ायदे भी होते हैं। आइए जानते हैं, कैसे बनाएं इमली का अमलाना सामग्री 1/4 चम्मच इमली 2 बड़ी चम्मच गुड़ आवश्यकता अनुसार पानी 1 बड़ी चम्मच जीरा 1/2 बड़ी चम्मच काली मिर्च नमक काला नमक 1 नींबू पुदीने की पत्तियां बर्फ विधि एक कटोरे में इमली और गुड डालकर उसमें गर्म पानी मिलाएं। इसे मिक्सर में पीस कर छान लें। इसमें नमक, काला नमक, जीरा और काली मिर्च डालें। पुदीने की पत्तियां और नींबू डालकर पानी मिलाएं। अच्छे से मिलाकर बर्फ डालकर परोसें। इमली का शरबत कड़कती धूप और गर्मी में राहत देता है ये इमली का शर्बत! सामग्री 2 बड़ी चम्मच इमली आधा कप गुड़ या पिसी हुई चीनी स्वाद अनुसार नमक और काली मिर्च 1/4 चम्मच इलायची पाउडर विधि 2 घंटे के लिए इमली को गर्म पानी में भिगो दें। इसके बीज निकालकर गूदे सहित पीस लें। साफ़ कपड़े से छान लें। चीनी,नामक और इलायची डालकर बर्फ के साथ सर्व करें । इमली का पन्ना इमली का पन्ना भी कुछ कुछ राजस्थानी अमलाना जैसा ही होता है ये देशभर में पिया और पसंद किया जाता है। सामग्री 1 कप इमली 1 कप चीनी स्वादानुसार नमक स्वादानुसार काला नमक 1 चम्मच लाल मिर्च पुदीने की पत्ती 2 से 3 कप पानी विधि 2 कप पानी में इमली को भिगोकर रख दें। इमली के सही से भीग जानें पर गूदा और बीज निकालकर छान लें। छाने हुए इस पानी को एक उबाल आने तक गैस पर पका लें। काले नमक, सादा नमक और लाल मिर्च से गार्निश करें। इसे ठंड होने दें बर्फ और पुदीने की पत्तियां डालकर ग्लास में सर्व करें । इमली जीरा ड्रिंक इमली और जीरे से मिलकर बना ये पेय पेट को देता है राहत और स्वाद में होता है एकदम मज़ेदार। सामग्री 1 बड़ा चम्मच जीरा आधा कप इमली पिसा हुआ गुड़ स्वाद अनुसार सेंधा नमक बर्फ के टुकड़े विधि मध्यम तेज आंच पर कढ़ाई को गर्म करें । जीरे को खुशबू आने तक पकाएं, जीरा फूटने लगेगा। भुने हुए जीरे को ठंडा करके पीस लें। इमली के पेस्ट में जीरा, गुड़, सेंधा नमक और बर्फ डालकर ग्लास में परोस लें। इमली का मोहितो मोहितो (mojito) एक ऐसी ड्रिंक है जिसका नाम लेते हुए आप शायद इसे गलत बोल दें लेकिन इसका स्वाद हमेशा सही मिलेगा। बिल्कुल ऐसा जो आपको तरो ताज़ा कर देगा। देसी इमली और विदेशी मोहितो का ये संगम आपको जरूर पसंद आएगा। तो, आइए जानते कैसे बनता है ये गर्मियों का खास इमली मोहितो। सामग्री 1 बड़ी चम्मच इमली (पेस्ट) 1/4 कप गुड़ एक चुटकी नमक और काला नमक एक चुटकी लाल मिर्च आवश्यता अनुसार पीने वाला सोडा विधि एक कढ़ाई में गुड़ और पानी डालकर गाढ़ा होने तक मिल लें। इसमें इमली का पेस्ट डालें। इसमें लाल मिर्च पाउडर, नमक और इलायची डालकर पकाएं। इसे ठंडा होने दें। एक ग्लास में पुदीना, नींबू का टुकड़ा और हल्का सा काला नमक डालें। इसमें तैयार किया हुआ पेस्ट और पानी डालकर मिलाएं। इसमें सोडा और बर्फ डालकर सर्व करें। इमली अपने आप में एक मज़ेदार फल है और इसके ये पेय हैं और भी स्वादिष्ट! गर्मियों में स्वास्थ्य का ध्यान रखें और इन ड्रिंक्स का आनंद लें।

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लोकल मार्केट vs सुपर मार्केट – असली स्वाद कहाँ?

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“असली स्वाद कहाँ है?” ये सवाल जितना सीधा लगता है, इसका जवाब उतना ही गहराई से हमारे खानपान, संस्कृति और जीवनशैली से जुड़ा हुआ है। हम में से अधिकतर लोग जब भी किसी यात्रा पर निकलते हैं तब अक्सर दो विकल्पों के बीच झूलते रहते हैं। एक ओर चमचमाते सुपरमार्केट्स हैं जहाँ सब कुछ पैक्ड, प्रोसेस्ड और ब्रांडेड होता है, और दूसरी ओर लोकल बाजार हैं – जीवन से भरपूर, मौलिकता और ताजगी से लबरेज़। किसी भी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है – ख़ानपान, जो कि सीधा सीधा बाज़ार से जुड़ा होता है।फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम दोनों की तुलना करेंगे स्वाद, अनुभव, विश्वसनीयता और संस्कृति के आधार पर, और जानने की कोशिश करेंगे – दरअसल असली स्वाद कहाँ छुपा है? ताजगी(freshness)बनाम प्रस्तुति(presentation)– क्या दिखता है वही असली होता है? लोकल मार्केट में सब्जियाँ और फल अक्सर सुबह-सवेरे खेतों से सीधे आते हैं। उन पर मिट्टी की हल्की परत, कभी-कभी कुछ निशान, और प्राकृतिक गंध – ये सब मिलकर हमें याद दिलाते हैं, कि ये भोजन धरती से जुड़ा है। केमिकल रहित है ।वहीं सुपरमार्केट में वही टमाटर या सेब खूबसूरत पैकिंग में, वैक्सिंग के बाद रखे होते हैं – वे एक जैसे दिखते हैं, पर स्वाद में वो मिट्टी की सोंधी खुशबू नहीं होती। बातचीत का स्वाद – सौदा नहीं, संवाद होता है लोकल बाजार में एक खास सामाजिक जुड़ाव होता है। सब्ज़ी वाले चाचा का “बहनजी आज की लौकी तो बिलकुल बाग़ की है” कहना, या फल वाले से “थोड़ा और मीठा दे दो” की सौदेबाज़ी – ये सब बाजार को बाजार नहीं, रिश्तों की मंडी बनाते हैं। एक यात्री के लिए वहाँ के लॉकल्स से जुड़ने का सीधा जरिया।सुपरमार्केट में आप मशीन से बिल लेते हैं, कार्ड स्वाइप करते हैं और निकल जाते हैं – कोई रिश्ता नहीं, कोई संवाद नहीं। जिंदगी जैसे एक मशीन हो। कीमत(Price)और पारदर्शिता(Transparency) – सस्ता कहाँ, सही कहाँ? लोकल मार्केट में मोलभाव की गुंजाइश होती है, लेकिन साथ ही आपको यह भी पता होता है कि टमाटर किस गाँव से आया, कौन किसान है। आप कभी-कभी सीधे उत्पादक से खरीद रहे होते हैं।सुपरमार्केट में आपको फिक्स प्राइस और चमकदार टैग मिलते हैं – लेकिन उस पर छपी एक्सपायरी और पैकिंग डेट पर आंख मूँद कर भरोसा करना पड़ता है। स्वाद(Taste)और स्थानीयता(Regional)– देसी ज़ुबान की पहचान लोकल बाजारों में आपको मौसमी और स्थानीय चीज़ें आसानी से मिलती हैं – कच्चे आम की खटास, सहजन की फली, ताज़ी हल्दी या रामदाना – जिनका स्वाद दादी की रसोई से जुड़ा है।सुपरमार्केट्स में ‘इंटरनेशनल किचन’ का स्वाद तो होता है, पर वो लोकल ज़ुबान की पहचान धीरे-धीरे मिटा देता है। सुविधा(Comfort) बनाम समझदारी(Intelligence)– क्या सचमुच सुपरमार्केट सुविधाजनक है? सुपरमार्केट में एसी चलता है, ट्रॉली मिलती है, और एक छत के नीचे सब कुछ – ये सब सुविधाजनक है, पर कई बार यह आपको ज़रूरत से ज़्यादा खरीदवा देता है। बजट होता है कम खर्च हो जाता है ज़्यादा।लोकल बाजार में आप समय लेते हैं, हर चीज़ छूकर, परखकर खरीदते हैं – वहाँ उपभोक्ता भी जागरूक होता है, और चुनाव भी समझदारी से करता है। तो फिर – असली स्वाद कहाँ है?“असली स्वाद मिट्टी में है, मौसम में है, उस विक्रेता की मुस्कान में है जो कहता है – आज ये आम देख लीजिए, अपने ही बाग से तोड़ा है, एकदम ताजा और मीठा, खाएँगे तो कई दिन तक याद रखेंगे।” सुपरमार्केट्स की भूमिका आधुनिक जीवन में जरूरी है, लेकिन अगर आप स्वाद, ताजगी, और संबंधों की तलाश में हैं – तो फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रैवल का जवाब साफ है – असली स्वाद लोकल मार्केट में है। जब कोई यात्री किसी शहर या गाँव की ओर कदम बढ़ाता है, तो वह केवल रास्ते नहीं नापता, बल्कि वहाँ की रूह को छूना चाहता है। और उस रूह की सबसे सजीव झलक उसे मिलती है – लोकल मार्केट में। “खरीदारी सिर्फ चीज़ें जुटाने का नाम नहीं, वो एक अनुभव है – स्वाद से जुड़ा, रिश्तों से जुड़ा, और हमारी जड़ों से जुड़ा।” एक ट्रैवलर के लिए लोकल मार्केट क्या है? यह उसकी डायरी का सबसे रंगीन पन्ना है।एक ऐसा अनुभव जहाँ भाषा, स्वाद, दृश्य और भाव – सब एक साथ मिलते हैं। यह वह जगह है, जहाँ यात्रा एक मंज़िल नहीं, एक एहसास बन जाती है।जब अगली बार आप किसी यात्रा में हो और बाज़ार जाएँ, तो सिर्फ सुविधा को न देखें – स्वाद और संवेदना को भी महसूस करें।क्योंकि असली स्वाद, सिर्फ थाली में नहीं – हमारे लोकल बाजारों में भी होता है।

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बुरांश के फूल : फूल एक फायदे अनेक

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पहाड़ों(mountains) पर जाना किसे पसंद नहीं? हर कोई पहाड़ों पर जाकर अपने और अपने परिवारजनों के साथ कुछ समय व्यतीत करना चाहता है। लेकिन यह चाहत तब और ज्यादा बढ़ जाती है जब कड़ाके की ठंड के खत्म होने के बाद धीरे-धीरे तीखी धूप पड़ने लगती है। फिर हमें एहसास होता है कि अरे अभी तो साल की शुरुआत हुई थी, अब तुरंत मार्च कैसे आ गया? और यहीं सब सोचते सोचते हम अपना बैक पैक (Pack your bag) करते हैं और निकल जाते हैं पहाड़ों की सैर पर! क्योंकि यह वह समय होता जब पहाड़ी इलाके में बहुत कम भीड़ देखने को मिलती है और साथ हीं साथ मौसम बहुत हीं खुशनुमा सा होता है। लेकिन खूबसूरत नजारों के अलावा इस समय पहाड़ी इलाकों में एक और खूबसूरत चीज देखने को मिलती है वह है बुरांश के फूल(Rhododendron Tree)। बुरांश के फूल आमतौर पर फरवरी से मई के बीच खिलते (Blooms) हैं। इसका फूलना वर्ष के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकता है, लेकिन यह सामान्यतः बहार के मौसम में होता है। ये बुरांश के फूल इतने खूबसूरत होते हैं कि जब आप फरवरी से में के बीच पहाड़ी इलाके में जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश या कश्मीर आदि की सैर करेंगे तो आपको वहां के पहाड़ों पर लाल रंग के फूलों की चादर (Red Flower) देखने को मिलेंगे। जो पहाड़ों की खूबसूरती को और भी अधिक बढ़ा देते हैं। गोल और घुमावदार पहाड़ी रास्ते इन लाल फूलों की वजह से और भी ज्यादा रोमांचक हो जाते हैं। अगर आप ऐसे मौसम में अपने प्रिय जन (Loved Ones) के साथ पहाड़ी इलाकों की सैर पर निकलते हैं तो यह खूबसूरत सफर इतना खूबसूरत बन जाता है कि आप जिंदगी भर कभी नहीं भूल सकते हैं। आज का ये ब्लॉग पहाड़ी इलाके में खिलने वाले बुरांश के फूलों के उपर हैं। इस ब्लॉग में लोग हम आपको बताएंगे की पहाड़ी इलाके में बुरांश के फूलों से बनाई जाने वाली चटनी की रेसिपी क्या होती हैं और यह चटनी क्यों इतना खास होता है। बुरांश के पेड़ की कुछ मुख्य खासियतें हैं: फूल: बुरांश के पेड़ के फूल बहुत ही सुंदर होते हैं और अक्सर गुलाबी, लाल, या सफेद रंगों में पाए जाते हैं। चयापथ्य: इसके पत्तों और फूलों का अर्क चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। बुरांश के अर्क में कुछ औषधीय गुण होते हैं जो कई स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याओं के इलाज में मदद कर सकते हैं। स्थायित्व: बुरांश के पेड़ अक्सर हिमालयी क्षेत्र में पाए जाते हैं और यहाँ के शान्त और शीतल जलवायु को सहने की क्षमता रखते हैं। पर्यावरणीय महत्व: बुरांश के पेड़ अपने पर्यावरणीय महत्व के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनकी रूपरेखा और पेड़ों का विस्तार पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं। यह थीं कुछ मुख्य खासियतें, लेकिन बुरांश के पेड़ के और भी कई महत्वपूर्ण गुण हो सकते हैं। बुरांश के फूलों से बनी चटनी एक स्वादिष्ट और अनोखी स्वाद की विधि है। यहां एक सामान्य रेसिपी है: सामग्री: विधि: इस चटनी को पराठे, रोटी, या चावल के साथ स्वादिष्टीकरण के रूप में सर्व किया जा सकता है। परिणाम स्वादिष्ट होगा! बुरांश के फूलों की चटनी के कई स्वास्थ्य लाभ हो सकते हैं, जैसे कि: ये थे कुछ बुरांश के फूलों की चटनी के पौष्टिक फायदे। लेकिन बीमार लोग ध्यान दें कि इसका सेवन मात्राबद्ध और चिकित्सक की सलाह के साथ किया जाना चाहिए। बुरांश के फूलों का जूस एक स्वास्थ्यकर और रसीला पेय है जिसमें कई गुण होते हैं। यहां एक सरल बुरांश के फूलों का जूस बनाने की विधि है: सामग्री: विधि: यह स्वादिष्ट जूस आपको गर्मियों में ठंडा करने के साथ-साथ बुरांश के फूलों के सारे लाभ भी प्रदान करेगा। ध्यान दें कि इसे पीने से पहले हमेशा अच्छे से छानकर पीना चाहिए।

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Paranthe Wali Gali

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Paranthe Wali Gali: परांठे वाली गली के ज़ायकेदार परांठे by Pardeep Kumar लॉक डाउन के बाद मेरी यह पहली यात्रा थी। काफी दिनों से मन बाहर घूमने को हिलोरें मार रहा था, काफी दिनों से कुछ ट्रेडिशनल और हट कर खाने का दिल भी कर रहा था। साथ ही अपने निकोन कैमरे के लिए एक अच्छा-सा नया बैग भी खरीदना था। इस बीच अच्छी खबर ये थी कि दिल्ली में कोरोना के भी बस कुछ ही केस बचे थे, इसलिए तमाम सावधानी के बीच निश्चय किया दिल्ली के सबसे पुराने बाज़ारों में से एक चांदनी चौक घूमने का, जहाँ की फोटोग्राफर मार्किट से कैमरे के लिए मुझे बैग भी मिल जायेगा और पराठें वाली गली के ज़ायकेदार पराठें भी।(Paranthe wali gali)’ कैसे पहुंचे  पराठें वाली गली कोरोना को लेकर थोड़ा डर कम था, क्योंकि पिछले सप्ताह ही वैक्सीन की दूसरी डोज ले ली थी और भीड़-भाड़ वाली जगह बिना मास्क के जाना तो वैसे भी खतरे से खाली नहीं। इसलिए कोरोना बचाव संबंधी सारे साजो-सामान से लैस होकर मैं अपनी कार से चांदनी चौक पहुंचा। लाल किले के सामने वैसे तो एमसीडी की बड़ी पार्किंग है लेकिन उस दिन शायद कुछ निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए मुझे पार्किंग की जगह मिली पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने। जिसके बाद चांदनी चौक पहुँचने के लिए मुझे लगभग डेढ़ किलोमीटर पैदल चलना पड़ा।  मेरी सलाह यही रहेगी आप मेट्रो से आराम से आइये, चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन पर उतरिये और बस सामने चंद कदम दूर आपकी मंजिल। चांदनी चौक बाजार बताते हैं चांदनी चौक को मुग़ल बादशाह शाहजहां की पुत्री जहाँ आरा बेग़म ने डिज़ाइन किया था। पहले यहाँ चांदी की बहुत सारी दुकानें होती थी बाद में समय के साथ कपड़ों और अन्य आभूषणों की दुकानें भी बढ़ती गयी। लाल किले के साथ ही चांदनी चौक का निर्माण करवाया गया था। लगातार दो दिन से हो रही बारिश के बाद जब आप घर से निकलते हो तब मौसम आप पर थोड़ा  मेहरबान होता है, इसलिए जुलाई के महीने में भी आप पैदल चलने की अच्छी स्थिति में होते हो। क्योंकि चांदनी चौक का अभी हाल ही में नवीनीकरण किया गया है, तो हो सकता है आपको थोड़ा ज्यादा पैदल चलना पड़े। जिनको ज्यादा पैदल चलना पसंद न हो उन्हें पुरानी दिल्ली की इन गलियों के लिए  आसानी से रिक्शें मिल जायेंगे। यह आपकी उम्र, उत्साह और ऊर्जा पर भी निर्भर करता है। पराठें वाली गली मैंने पराठें वाली गली के बारे में खूब सुना था, कई हिंदी फिल्मों में भी देखा था। बस अब वक़्त आ गया था इन पराठों का स्वाद चखने का।  गली में एंट्री करते ही कुछ दुकानें छोड़ कर कोने पर एक पराठें की पुरानी दुकान दिखाई दी। जिस पर लिखा था प. बाबू राम देवी दयाल पराठें वाले, सिन्स 1889, दुकान में प्रवेश किया और एक खाली टेबल देखकर अपना आसन जमा लिया। आप आसानी से आर्डर दे सके इसके लिए सामने दीवार पर पूरा मेन्यू कार्ड पेंट करवा रखा था, लेकिन असली जद्दोजहद शुरू होती है तब जब आपको 40-50 तरह के पराठों में से कोई एक आर्डर करना हो। मिक्स वेज, रबड़ी, खोया, आलू गोभी, पापड़, भिंडी, करेला, अचार, मेथी, पनीर, चीज़, गाजर, मटर और भी बहुत तरह के पराठें मेन्यू में थे। मेन्यू में है हर तरह के परांठे मैंने दो पराठें आर्डर किये जिसमे एक पापड़ का था और दूसरा मिक्स वेज। 7-8 मिनट के इंतज़ार के बाद एक थाली लगाई गई जिसमे इमली की चटनी, आलू की सब्जी, सीताफल की सब्जी, मूली-गाजर का अचार और एक मिक्स वेज सब्जी और एक अलग प्लेट में दो गर्मागर्म पराठें। दोस्तों, किसी महापुरुष ने बिलकुल सही कहा है कि खाने का मजा तभी है जब आपको जोरदार भूख लगी हो और अगर भोजन स्वादिष्ट हो तो फिर समझ लीजिये आज आप स्वर्ग के चक्कर लगा आये।  देश भर में प्रसिद्ध पराठें वाली गली के पराठों की खासियत ईमानदारी से कहूँ तो मुझे यहाँ के पराठें खूब भाये, शायद भूख लगी थी इसलिए थोड़े ज्यादा । लेकिन एक बात और बता दूँ हम अपने घरों में आमतौर पर तवे पर बने पराठें खाते हैं लेकिन यहाँ पर बनने वाले पराठें डीप फ्राई किये जाते हैं देसी घी में। मतलब की यहाँ आकर आप पराठों में कम तेल की उम्मीद न ही रखें तो बेहतर है। मैंने यहाँ पर जो एक चीज नोट की वो ये कि यहाँ पर लगभग सभी बिलकुल शुद्ध शाकाहारी पराठे ही बनाते हैं न प्याज न लहसून। शायद अपनी पुरानी परम्पराओं का निर्वहन करने के लिए। पराठों को स्वादिष्ट बनाने के लिए उनमें बादाम और काजू जैसे सूखे मेवे भी डाले जाते हैं। अगर आप खाने के जरा भी शौक़ीन हैं तो आप थाली में सर्व की गई कोई भी चीज पूरा खत्म किये बिना टेबल से नहीं उठेंगे, बस यही खासियत है देश भर में प्रसिद्ध पराठें वाली गली के पराठों की। बड़े-बड़े नेता-अभिनेता भी चख चुके है यहाँ का स्वाद उत्सुकतावश जब मैंने काउंटर पर बैठे दुकानदार से पूछा तो उन्होंने बताया कि उनका परिवार पिछली पांच-छह पीढ़ियों से पराठें वाली दुकान चला रहा है। उन्होंने बड़े गर्व से बताया की हम स्वाद के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं करते। बड़े-बड़े नेता-अभिनेता हमारे यहाँ के पराठों का स्वाद चख चुके हैं। उन्होंने एक बात और बताई की यहाँ पर पराठें की जितनी भी दुकाने हैं वो सभी एक ही खानदान की हैं। परिवार बढ़ते गए तो दुकाने भी बढ़ती गयी। मुझे यहाँ की कुछ बाते बेहद पसंद आयी, एक तो ये कि भले ही ये पराठें छोटी कढ़ाई में डीप फ्राई करके बनाये जाते हों पर ये ज्यादा हैवी नहीं लगते, स्वादिष्ट लगते हैं, दूसरा इन दुकान वालों का मीठा  व्यवहार जो इनके खाने में और जायका घोल देता है,  बार-बार यहाँ आने का निमत्रण देता है। देखिये मेरे केस में तो ऐसा हुआ है बाकी हर किसी का अनुभव दूसरे से थोड़ा अलग ही होता है। खैर, पराठों का आनंद लेने के बाद चांदनी चौक के फोटोग्राफर मार्किट से कैमरे का बैग खरीदा, यहाँ पर भी आपको फोटोग्राफी से संबंधित तमाम इक्विपमेंट्स ठीक-ठाक दाम में मिल जायेंगे।(Paranthe wali gali) घूमते-घूमते थकान काफी हो चुकी

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Murthal ke Paranthe

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Murthal ke Paranthe: मुरथल के परांठे वाले ढाबे -जहाँ रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग खाने का लुत्फ उठाते हैं by Pardeep Kumar अगर आप परांठे खाने के शौक़ीन हैं तो आज हम आपको अपने इस ब्लॉग में रू-ब-रू करवाएंगे तकरीबन देश भर में प्रसिद्ध मुरथल के मशहूर परांठों के स्वाद से। वैसे तो मुरथल के परांठे पूरे देश में फेमस हैं लेकिन फिर भी दिल्ली से लगते सात राज्यों में अपने पराठों के स्वाद के लिए प्रसिद्ध मुरथल के ढाबों का कोई सानी नहीं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से भी लोग यहाँ आकर परांठों का लुत्फ़ उठाते हैं। खासकर शनिवार और रविवार को यहां दिल्ली-एनसीआर से परांठों के शौकीनों की भारी भीड़ उमड़ती है। अगर आप दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहे हैं तो एन एच 1 पर सोनीपत के नजदीक और दिल्ली से तकरीबन घंटे भर के सफर पर एक छोटे से कस्बे मुरथल में यह ढ़ाबे मौजूद हैं। (Murthal ke Paranthe) किसान आंदोलन और दिल्ली से मुरथल का सफर काफी दिनों से मुरथल का प्लान बनाया जा रहा था। क्योंकि आजकल किसान आंदोलन के कारण दिल्ली से मुरथल पहुंचना थोड़ा मुश्किल हो गया था इसलिए कई बार प्रोग्राम बना और बिगड़ भी गया। लेकिन इस बार वीकेंड पर हमने ठान लिया था कि कैसे भी करके मुरथल के परांठे खाने ही हैं। सो दिल्ली से हमने औचंदी बॉर्डर का रास्ता लिया और अंदर अलग-अलग गांव से होते हुए सोनीपत शहर से गुजरते हुए तकरीबन दोपहर के 3 बजे मुरथल पहुंचे। और जब आप इस तरह का सफर तय करते हैं तब भूख कुछ ज्यादा ही लग जाती है और मैं हमेशा कहता हूँ खाने का असली मजा तब है जब आपको जोर की भूख लगी हो। और ऊपर से मुरथल के विख्यात परांठे हो वो भी ताजा मक्खन के साथ तो बस समझ लीजिये आपका दिन बन गया। वैसे तो मेरा सारा बचपन सोनीपत शहर में ही गुजरा है। 12वीं कक्षा तक मेरी स्कूली एजुकेशन इसी शहर में हुयी और इसी कारण जब भी मेरा और मेरे कुछ दोस्तों का मन करता तब हम सोनीपत से मुरथल आ जाते थे परांठे खाने। सोनीपत से मुरथल यही 6-7 किलोमीटर है और आजकल तो ऐसा लगता है कि मुरथल सोनीपत शहर में ही मिल गया है। वो नब्बें का दशक था। यही 1997-98 का समय। स्कूल टाइम की यादें और मुरथल के परांठे मुझे अच्छे से याद है तब मुरथल बस स्टॉप से पानीपत की तरफ थोड़ा आगे निकल कर गुलशन का ढ़ाबा ही फेमस हुआ करता था और उसके आसपास एक दो ढ़ाबे और थे। तब परांठे का साइज आज के परांठों के साइज से बड़ा होता था। तब मुरथल के ढाबों पर सिर्फ दाल मखनी, परांठे, खूब सारा मक्खन और मीठे में खीर ही मिलती थी लेकिन आज यहां पर हर प्रकार के शाकाहारी स्वादिष्ट व्यंजन मिलते हैं। नब्बे के दशक में हम देखते थे कि पहले सिर्फ ट्रक चालक यहां से गुजरते हुए रुककर खाना खाते थे, या फिर सोनीपत के युवाओं की टोलियां जिनका कभी-कभार बाहर खाने का मन करता। लेकिन आज यहाँ का मंज़र बिलकुल बदल चुका है, अब आपको इन फुली एयर कंडीशंड ढाबों की पार्किंग में सैंकड़ों लक्ज़री कार दिखाई देंगी और कई बार तो भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि सैंकड़ों गाड़ियों की पार्किंग की जगह होने के बाद भी यहाँ आपको अपनी कार पार्क करने की जगह नहीं मिलती। Murthal Ke Paranthe आजकल लोग यहां अपने परिवार के साथ पार्टी व अन्य पारिवारिक कार्यक्रम आयोजित करने आते हैं, मैंने आपको पहले ही बताया कि दिल्ली से महज घंटा भर की ड्राइव कर यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यही बड़ी वजह है कि दिल्ली और एनसीआर के लोग खासकर युवा यहाँ अक्सर देर रात या वीकेंड पर पराठे खाने के लिए आते हैं। बताते हैं मुरथल के ढाबों की शुरुआत 1950-60 के दशक में हुई थी। बेहद परम्परागत ढाबों के तौर पर शुरू हुए यह ढाबे आज अपनी अलग ही क्रेज बना चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग यहां आकर खाने का लुत्फ उठाते हैं। यह वास्तव में एक अद्भुत संख्या है। वैसे तो यहाँ जितने भी ढाबे हैं चाहे काफी पुराना पहलवान ढाबा हो, आहूजा हो या फिर झिलमिल उन सभी में परांठों का स्वाद लाजवाब है लेकिन फिर भी अमरीक सुखदेव का पिछले एक दशक से यहाँ एक तरफा राज है। शायद यही वजह है अगर आप वीकेंड पर यहाँ आएंगे तो हो सकता है लगभग 20-25 मिनट आपको बैठने के लिए सीट भी न मिले। लेकिन कहते हैं न कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, बस यहाँ इंतज़ार का फल बेहद स्वादिष्ट मिलेगा। सुपर स्टार धर्मेंद्र का गरम-धरम ढाबा अमरीक सुखदेव के बिलकुल साथ लगता और कुछ साल पहले बना गरम-धरम ढ़ाबा भी है, जोकि अपनी बनावट के कारण लोगों में काफी पॉपुलर भी हो रहा है। इस ढ़ाबे की पूरी थीम बॉलीवुड सुपरस्टार धर्मेंद्र की फिल्मों पर बेस्ड है। पूरे ढ़ाबे को धर्मेंद्र की फिल्मों के अनुसार डिज़ाइन किया गया है। ढ़ाबे के बाहर मेन गेट पर आपको शोले फिल्म की मशहूर पानी की टंकी दिखाई देगी जिस पर चढ़कर धर्मेंद्र फिल्म की नायिका हेमा मालिनी को परपोज करता है। अंदर ढ़ाबे में आप ऑटो रिक्शा, ट्रक और धर्मेंद्र की फिल्मों के पोस्टरों के बीच में इस ढाबे पर बनने वाले फेमस फ्रूट परांठे का स्वाद भी ले सकते हैं। हम अमरीक सुखदेव के परांठे कई बार खा चुके थे इसलिए इस बार हमने गरम-धरम ढ़ाबे के परांठे खाने का निर्णय लिया। एंट्री गेट पर ही गार्ड ने हैंड सेनिटाइज करवाए। अंदर वातानुकूलित हॉल में एक अच्छा-सा कार्नर देखकर हमने आसन जमा लिया। भूख लगी थी इसलिए तुरंत चाय और मिक्स वेज परांठे आर्डर किये। तकरीबन 10 मिनट के इंतज़ार के बाद परांठे की थाली आ चुकी थी। कड़क चाय, दो-तीन तरह का अचार, हरी मिर्च और ताजे मक्खन की भरी कटोरी और गरमा-गर्म परांठे। बिना तले स्वादिष्ट परांठे अगले कुछ लम्हें सब कुछ भूल कर हमने सिर्फ परांठों पर ही फोकस किया। स्वादिष्ट और एकदम फ्रेश। पराठे खाते वक्त हमने देखा कि यहाँ के परांठों की फिलिंग में ज्यादा चीजें