यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त खजुराहो के मंदिर- क्यों हैं ख़ास?
विश्व धरोहर खजुराहो वैसे तो मध्य प्रदेश का एक छोटा-सा शहर मात्र है। लेकिन इसे विश्व में अपनी मनमोहक और अनोखी मंदिरों की शृंखला के लिए प्रसिद्धि प्राप्त है। दरअसल, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त खजुराहो के मंदिर न केवल भारतीय कला और वास्तुकला के प्रतीक हैं। साथ ही, यहाँ सनातनी भारतीय संस्कृति, दर्शन और जीवनशैली का जीवंत रूप देखने को मिलता है। खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गईं मूर्तियाँ जो अपनी कामुक और जटिल नक्काशी के लिए के अनोखे अंदाज के रूप में जानी जाती हैं। दुनिया भर के पर्यटकों, इतिहासकारों और कला प्रेमियों को आकर्षित करती ये कलाकृतियाँ वास्तविक और अद्भुत दृश्य का निर्माण करती हैं। खजुराहो के मंदिरों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वास्तुशिल्पीय विशेषताओं के साथ सांस्कृतिक महत्व और पर्यटन के दृष्टिकोण से उनकी अनोखी विशेषताओं को भी दिखाती हैं। खजुराहो का ऐतिहासिक परिदृश्य विश्व के सबसे प्राचीने मंदिरों में से एक खजुराहो के ऐतिहासिक परिदृश्य की बात की जाए तो ऐसा मना जाता है कि इन मंदिरों का निर्माण 9 वीं से 12 वीं शताब्दी के मध्य, चंदेल वंश के शासकों द्वारा करवाया गया था। चंदेल वंश, जो मध्य भारत में अपनी शक्ति और समृद्धि के लिए जाना जाता है, ने खजुराहो को अपनी राजधानी बनाया था और इसे कला और संस्कृति का केंद्र बनाने का काम भी चंदेल वंश के शासकों ने किया। खजुराहो में मूल रूप से 85 मंदिर बनाए गए जिनमें से आज केवल बीस से पच्चीस ही अच्छी स्थिति में हैं। इनका निर्माण काल लगभग 950 ईस्वी से 1150 ईस्वी के बीच माना गया है। इस पर राज करने वाले प्रमुख शासकों में यशोवर्मन, धनगदेव और विद्याधर जैसे चंदेल शासकों ने इन मंदिरों के निर्माण को गति दी। खजुराहो के यह मंदिर सनातन और जैन धर्म के प्रतीक के रूप में निर्मित किए गए थे। इन मंदिरों का निर्माण उस समय हुआ, जब भारत में मध्यकालीन कला और वास्तुकला मानो अपने चरम पर थी। क्यों खास है ये मंदिर? चंदेल शासकों ने इन मंदिरों को न केवल धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित किया बल्कि अपनी सांस्कृतिक और कलात्मक विरासत को प्रदर्शित करने के लिए भी बनवाया था। 13 वीं शताब्दी के पश्चात् खजुराहो का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा था। परंतु आज भी कई मंदिरों की वास्तुकलात्मक विशेषताएँ इस नागर शैली की वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जो उत्तर भारत के मंदिरों में भी स्पष्ट रूप से प्रमुख रूप में है। मंदिरों की विशेषताएँ ये हैं की मंदिरों के शिखर ऊँचे और घुमावदार हैं, जो आकाश की ओर प्रगति का प्रतीक हैं। मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गईं और नक्काशी से निर्मित मूर्तियाँ बहुत ही जटिल और जीवंत हैं। ये मूर्तियाँ देवी-देवताओं, अप्सराओं, मैथुन और दैनिक जीवन के क्रियाकलापों को दर्शाती हैं। मंदिरों में गर्भगृह, मंडप और अर्धमंडप जैसे हिस्से भी हैं जो सनातन मंदिरों की पारंपरिक संरचना को दर्शाते हैं। ये मंदिर पूरी तरह बलुआ पत्थर से बनाए गए हैं। जो उनकी दीर्घायु और नक्काशी की जटिलता को संभव बनाता है। खजुराहो की चर्चित मूर्तियाँ खजुराहो की केवल कुछ परसेंट मूर्तियाँ ही कामुक हैं लेकिन ये सबसे अधिक चर्चित हैं। ये मूर्तियाँ दर्शन और मानव जीवन की समग्रता को दर्शाती हैं। मंदिरों की संरचना भूकंप-रोधी और पर्यावरण के बिल्कुल अनुकूल है, जो प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग की विकसित समझ को दर्शाती है। यदि हम इसके सांस्कृतिक और दार्शनिक महत्व के बारे में चर्चा करें तो खजुराहो के मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं हैं, वे भारतीय दर्शन, संस्कृति और जीवनशैली के प्रतीक हैं। खजुराहो की कामुक मूर्तियाँ तंत्र दर्शन से प्रेरणा प्राप्त हैं, जो आध्यात्मिकता और शारीरिक सुख को एक साथ जोड़ता है उसका युग्म बनाता है। ये सुन्दर मूर्तियाँ जीवन के सभी पहलुओं— जैसे प्रेम, काम, धर्म, और मोक्ष—को समान महत्व देती हैं। इन मूर्तियाँ की खास बात यह है की यह कला प्राचीन भारत में यौनिकता के प्रति खुले दृष्टिकोण को दर्शाती हैं, जो आधुनिक समय में दुर्लभ हैं। अधिकांश मंदिर शिव, विष्णु, और अन्य सनातनी देवताओं को समर्पित हैं, जिनमें कंदरिया महादेव मंदिर और लक्ष्मण मंदिर प्रमुख हैं। कुछ मंदिर, जैसे पार्श्वनाथ मंदिर, जैन धर्म को समर्पित है, जो खजुराहो की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाते हुए नज़र आते हैं। इस खास जगह पर हमें सांस्कृतिक एकता, सनातन और जैन मंदिरों का एक साथ होना दिखाई देता है। चंदेल वंश और धार्मिक गठजोड़ की भावना वास्तव में चंदेल वंश, काल के धार्मिक गठजोड़ की भावना को दर्शाता है। हालांकि खजुराहो के मंदिर तीन समूहों में बँटे हैं- पश्चिमी, पूर्वी, और दक्षिणी। यहाँ कुछ प्रमुख मंदिरों का वर्णन और है, जिसमें पहला कंदरिया महादेव मंदिर जिसकी विशेषता यह है की यह खजुराहो का सबसे बड़ा और सबसे भव्य मंदिर है। जो भगवान शिव को समर्पित है। इसकी दीवारों पर 600 से अधिक मूर्तियाँ हैं, जिनमें अप्सराएँ, युद्ध के दृश्य और कामुक मूर्तियाँ शामिल हैं। मंदिर का शिखर 31 मीटर ऊँचा है और इसकी संरचना पूरी तरह नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। लक्ष्मण मंदिर विशेषता का जिक्र करें तो भगवान विष्णु को समर्पित यह सबसे पुराने और प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसमें वैष्णव मूर्तियों के साथ-साथ सामाजिक जीवन के नमूने भी हैं। इसका ऐतिहासिक महत्व और सुंदर प्रवेश द्वार, इस मंदिर को विशेष बनाते हैं। यहाँ के पार्श्वनाथ मंदिर की विशेषता यह है कि यह मंदिर जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है। मूर्तिकला में गैर-कामुक मूर्तियाँ अधिक हैं, जो जैन धर्म की सादगी को दर्शाती हुई दिखाई पड़ती हैं। यह अद्भुत स्थान जैन संस्कृति और कला का एक अनोखा उदाहरण है। मंदिर के प्रांगण में विश्वनाथ मंदिर के लिए भी जगह है, जिसकी विशेषता यह है कि यह शिव के नंदी मंदिर के साथ एकदम सटा हुआ है और एक महत्वपूर्ण मंदिर भी है। इसमें एक विशाल नंदी प्रतिमा और कुछ विशेष और जटिल मूर्तियाँ हैं। इसका शांत वातावरण और भव्य संरचना, वास्तव में पर्यटन के दृष्टिकोण से इसको एक प्रमुख पर्यटन स्थल बनाती है, जो अपनी विशेषताओं के कारण, विश्व भर के पर्यटकों को आकर्षित करती है। कैसे पहुँचें ? खजुराहो का अपना अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो देश के बड़े-बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है जिनमें दिल्ली, मुंबई और वाराणसी शामिल हैं। इसी के साथ नजदीकी रेलवे स्टेशन झाँसी (175 किमी)













