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दिल्ली से दौसा की यात्रा-चांद बावड़ी में गायब हो गई थी बारात, खानवा युद्ध में घायल राणा सांगा की मृत्यु भी यहीं

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दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी से थोड़ा ब्रेक लेने और कुछ अलग अनुभव करने की चाह में, मैंने और मेरे दोस्तों ने दौसा की प्रसिद्ध चांद बावड़ी की यात्रा प्लान की। यह यात्रा सिर्फ एक ट्रिप नहीं थी, बल्कि राजस्थान के इतिहास, संस्कृति और एक अद्भुत स्थापत्य कला के नमूने को करीब से जानने का एक मौका था। पश्चिम विहार के मेरे फ्लैट से सुबह-सुबह जब हमारी कार निकली, तो हवा में एक नया जोश और उत्साह घुला हुआ था। इस दौरान चांद बावड़ी के बारात गायब होने के रहस्य को जानने के लिए भी उत्सुक था। दिल्ली से दौसा तक का सफर: ऐतिहासिक पड़ावों के बीच… दौसा तक का रास्ता, जो लगभग 250 किलोमीटर का है, हमें राजस्थान के ग्रामीण इलाकों और उसके सुनहरे इतिहास से रूबरू कराने वाला था। सुबह की ताजी हवा और हाईवे पर कम ट्रैफिक ने हमारी यात्रा को और भी मजेदार बना दिया। रास्ते में मैंने देखा कि कैसे धीरे-धीरे शहरी शोरगुल कम होता जा रहा था और हरे-भरे खेत तथा दूर क्षितिज पर दिखती अरावली की पहाड़ियां हमारा स्वागत कर रही थीं। सफर के दौरान, हमने कुछ देर के लिए बांदीकुई के पास ‘राणा सांगा की छतरी’ के पास रुकने का फैसला किया। हालांकि हमारा मुख्य लक्ष्य चांद बावड़ी थी, लेकिन इतिहास के इस महत्वपूर्ण पड़ाव को नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं था। राणा सांगा की छतरी: शौर्य का प्रतीकः राणा सांगा की छतरी, बांदीकुई से लगभग 5 किलोमीटर दूर बसवा में स्थित है। यह मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) की याद में बनाई गई एक स्मारक है। ग्रामीणों के मुताबिक, राणा सांगा की छतरी बांदीकुई के पास बसवा में इसलिए बनाई गई है क्योंकि 1527 में खानवा के युद्ध में घायल होने के बाद, उनके प्रमुख सहयोगी आमेर के राजा पृथ्वीराज कछवाहा ने उन्हें बसवा में सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था, जहां उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे। इसलिए, बसवा में राणा सांगा की स्मृति में छतरी बनाई गई है। राजस्थान के गांवों का भ्रमण: संस्कृति और सादगी… दौसा पहुंचने से पहले हमने कुछ स्थानीय गांवों का दौरा किया। यहां के लोग बेहद मिलनसार और अपनी संस्कृति से जुड़े हुए थे। मिट्टी के घर, रंग-बिरंगे परिधान पहने लोग और खेतों में काम करते किसान, यह सब कुछ इतना वास्तविक और दिल को छूने वाला था। हमें स्थानीय पकवानों का स्वाद चखने का भी मौका मिला, जो बेहद स्वादिष्ट थे। यह अनुभव हमें शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर एक शांतिपूर्ण और सरल जीवन की झलक दे गया। हमने वहां दाल-बाटी और चूरमा का स्वाद भी चखा। चांद बावड़ी: सीढ़ियों का अद्भुत भूलभुलैया… दोपहर होते-होते हम दौसा जिले के आभानेरी गांव स्थित ‘चांद बावड़ी’ पहुंच गए। बावड़ी को पहली नजर में देखते ही मैं मंत्रमुग्ध हो गया। यह सिर्फ एक बावड़ी नहीं, बल्कि कला, इंजीनियरिंग और इतिहास का एक अद्भुत संगम है। इसकी वास्तुकला इतनी जटिल और खूबसूरत है कि इसे देखकर आंखें थकती नहीं।चांद बावड़ी 13वीं सदी में निर्मित एक विशाल बावड़ी (सीढ़ीदार कुआं) है, जिसमें 3500 से अधिक सीढ़ियां हैं। ये सीढ़ियां 13 मंजिलों में एक व्यवस्थित पैटर्न में नीचे उतरती जाती हैं जिससे यह किसी भूलभुलैया जैसा प्रतीत होता है। बावड़ी के चारों ओर परिक्रमा करते हुए मैंने महसूस किया कि इसे इतनी सटीकता और सौंदर्य के साथ कैसे बनाया गया होगा। चांद बावड़ी की अनूठी वास्तुकलाः यह दुनिया की सबसे बड़ी और गहरी बावड़ियों में से एक है। इसकी सबसे खास बात इसकी त्रिकोणीय सीढ़ियां हैं, जो एक विशेष ज्यामितीय पैटर्न में बनी हैं। यह इतनी गहरी है कि नीचे का तापमान ऊपर के तापमान से 5-6 डिग्री सेल्सियस कम रहता है, जो भीषण गर्मी में भी राहत देता है। इसका निर्माण पानी बचाने और लोगों को स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था। चांद बावड़ी में बारात गायब होने का रहस्य… चांद बावड़ी से जुड़ी एक दिलचस्प और रहस्यमयी लोककथा है कि यहां एक पूरी बारात गायब हो गई थी। ग्रामीणों के अनुसार, एक बार एक बारात शादी के लिए जा रही थी और रात होने पर उन्होंने बावड़ी में विश्राम करने का फैसला किया। सुबह जब लोग जागे, तो बारात और उनके सारे सामान का कोई निशान नहीं था, जैसे वे हवा में गायब हो गए हों। कुछ स्थानीय लोग मानते हैं कि यह किसी अदृश्य शक्ति का कमाल था, जबकि कुछ इसे एक मनगढ़ंत कहानी मानते हैं। यह कथा बावड़ी के रहस्य और अलौकिक आकर्षण को और बढ़ा देती है। हालांकि, इस कहानी के कोई ठोक प्रमाण नहीं मिलते।हमने बावड़ी के एक-एक कोने को एक्सप्लोर किया। हर सीढ़ी, हर पत्थर अपनी एक कहानी कह रहा था। जैसे-जैसे हम नीचे उतरते गए, हवा ठंडी होती गई और सूरज की रोशनी भी कम होती गई, जिससे एक रहस्यमयी माहौल बन गया। ऐसा लगा जैसे हम समय में पीछे जा रहे हों। बावड़ी के ठीक सामने ‘हर्षत माता मंदिर’ है, जिसके खंडहर भी अपनी भव्यता का प्रमाण देते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर भी चांद बावड़ी के समय का ही है और इसे देवी हर्षत माता को समर्पित किया गया था। हर्षत माता मंदिर: एक प्राचीन धरोहर… हर्षत माता मंदिर चांद बावड़ी के ठीक सामने स्थित एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जो देवी हर्षत माता को समर्पित है। यह मंदिर अपनी शानदार मूर्तियों और जटिल नक्काशी के लिए जाना जाता है। हालांकि, यह अब खंडहर की स्थिति में है, लेकिन इसकी बची हुई कलाकृतियां इसकी पिछली भव्यता का प्रमाण देती हैं।हमने बावड़ी और मंदिर परिसर में काफी समय बिताया, फोटो खींची और इस अद्भुत स्थान की ऊर्जा को महसूस किया। शाम होते-होते सूरज की रोशनी सीढ़ियों पर एक अलग ही चमक बिखेर रही थी, जिससे बावड़ी और भी खूबसूरत लग रही थी। वापसी का सफर: एक यादगार अनुभव… सूर्य अस्त होने से पहले हमने दिल्ली के लिए वापसी की यात्रा शुरू की। मन में चांद बावड़ी की अद्भुत छवियां और राजस्थान के गांवों की सादगी बसी हुई थी। इस यात्रा ने न केवल मुझे एक शानदार पर्यटन स्थल से परिचित कराया, बल्कि भारत की समृद्ध विरासत और स्थापत्य कला की गहराई को भी समझने का मौका दिया।आस-पास के अन्य ऐतिहासिक स्थल: दौसा का छिपा खजानाःदौसा और उसके आसपास कई अन्य

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वेटिकन सिटी- दुनिया का सबसे छोटा देश, एक छोटी सी दुनिया की बड़ी कहानी

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क्या आपने कभी सोचा है कि एक देश कितना छोटा हो सकता है? क्या वह किसी शहर से भी छोटा हो सकता है? या फिर एक स्टेडियम से भी? चलिए फाइव कोलोरस ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग मे आपको मिलवाते हैं “वेटिकन सिटी” (Vatican City) से – दुनिया का सबसे छोटा देश, जो आकार में भले ही बहुत छोटा हो, लेकिन उसका ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बेहद विशाल है। वेटिकन सिटी: एक परिचय क्या है खास वेटिकन सिटी में? सेंट पीटर बेसिलिका (St. Peter’s Basilica) दुनिया के सबसे भव्य और विशाल गिरजाघरों में से एक। माइकेलएंजेलो जैसे महान कलाकारों की कृतियों से सजी हुई यह इमारत ईसाई धर्म के लिए बहुत पवित्र मानी जाती है। सेंट पीटर बेसिलिका केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता की कला, वास्तुकला और श्रद्धा का एक जीवंत उदाहरण है। चाहे आप धार्मिक दृष्टिकोण से जाएं या कला के प्रेमी हों- यह स्थान हर किसी को मोहित करता है। चर्च की खासियत यह चर्च एक बार में 60,000 से अधिक लोगों को समा सकता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी चर्च मानी जाती है (क्षेत्रफल के हिसाब से)। पोप यहीं से बड़ी धार्मिक सभाओं का नेतृत्व करते हैं, विशेष रूप से ईस्टर और क्रिसमस पर। इसके गुंबद (Dome) ऊँचाई लगभग 136 मीटर (450 फीट) है।यह रोम में सबसे ऊँची इमारतों में से एक है। आप सीढ़ियों या लिफ्ट से ऊपर जाकर रोम का अद्भुत दृश्य देख सकते हैं। वर्तमान बेसिलिका का निर्माण 1506 ई. में शुरू हुआ और इसे पूरा होने में लगभग 120 साल लगे — यह 1626 ई. में बनकर तैयार हुई। इसे बनाने में कई महान कलाकारों और वास्तुकारों ने योगदान दिया, जिनमें शामिल हैं: माइकेलएंजेलो (Michelangelo) – उन्होंने इसका प्रसिद्ध गुंबद (डोम) डिज़ाइन किया। ब्रैमांटे (Bramante), राफाएल (Raphael) और बर्नीनी (Bernini) जैसे महान कलाकारों ने भी इसके निर्माण कार्य में भाग लिया। सिस्टीन चैपल (Sistine Chapel) यहां की छत पर बनी माइकेलएंजेलो की प्रसिद्ध पेंटिंग – “द क्रिएशन ऑफ एडम” – कला प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान है। सिस्टीन चैपल इस सिटी में वेटिकन पैलेस के भीतर स्थित है। यह पोप का आधिकारिक निवास है और वेटिकन म्यूज़ियम का एक हिस्सा भी है। सिस्टीन चैपल वह स्थान है जहाँ नए पोप का चुनाव (Papal Conclave) होता है। सभी कार्डिनल्स यहाँ एकत्रित होकर वोटिंग प्रक्रिया के द्वारा पोप चुनते हैं। सिस्टीन चैपल केवल दीवारों पर बनीं पेंटिंग्स नहीं हैं — यह इंसानी रचनात्मकता की चरम सीमा है, जहाँ ईश्वर की कहानियाँ कला के ज़रिए जीवंत हो उठती हैं। यहाँ खड़े होकर ऐसा महसूस होता है मानो आप समय और स्वर्ग दोनों को छू रहे हों। वेटिकन म्यूजिअम – वेटिकन सिटी छोटे से देश में मौजूद संग्रहालयों में हजारों साल पुरानी मूर्तियाँ, चित्रकला और ऐतिहासिक वस्तुएं हैं। यह स्थान इतिहास और कला के छात्रों के लिए किसी खजाने से कम नहीं। क्यों है ये देश इतना खास? वेटिकन म्यूज़ियम्स क्या आप जा सकते हैं इस छोटे-से देश में? बिलकुल! यह जगह रोम घूमने जाने वाले पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण है। हालांकि आप रात को यहां नहीं ठहर सकते, लेकिन दिनभर इसका भ्रमण करना एक अद्भुत अनुभव होता है। वेटिकन सिटी साबित करता है कि एक देश बड़ा होने से महान नहीं होता – उसकी संस्कृति, विरासत और उद्देश्य ही उसकी असली पहचान होते हैं। दुनिया का सबसे छोटा देश अपने इतिहास, कला और आस्था के जरिए पूरी दुनिया में अपनी एक अलग जगह बनाए हुए है।

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‎अमृतसर: डेस्टिनेशन ही नहीं, दिल को छू लेने वाला एक शहर

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कुछ शहर देखने के लिए होते हैं तो कुछ जीने के लिए और उन्हीं शहरों में से एक है अमृतसर, जो अपने भीतर इतिहास की झलक, संस्कृति की मिठास, श्रद्धा और पावनता समेटे खड़ा है। पंजाब की पावन धरती पर बसा यह शहर बना है आस्था, संघर्ष और अपनेपन की ऐतिहासिक समरूपता की भवना से। जब आप पहली बार अमृतसर की सड़कों पर कदम रखेंगे तो जैसे वहाँ की हवा भी कहती है- “स्वागत है, यहाँ आप अकेले नहीं हैं।” क्योंकि यहाँ आपको व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं बल्कि एक नागरिक होने की भावना के लिहाज से भी अनूठा महसूस होगा। श्री हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मन्दिर) ‎अमृतसर शहर का दिल, या यह कहें कि इसकी आत्मा.. तो वह है श्री हरिमंदिर साहिब, जिसे दुनिया ‘स्वर्ण मंदिर’ के नाम से जानती है। दिन की पहली किरण जब मंदिर के सोने से ढके गुंबदों पर पड़ती है, तो लगता है जैसे आसमान खुद इस पूरे शहर को आशीर्वाद दे रहा हो। मंदिर को चारों ओर से घेरे शांत जल का सरोवर- ‘अमृत सरोवर’ न केवल शहर के नाम का प्रतीक है, बल्कि एक ऐसी जगह है जहाँ बैठकर इंसान खुद से बातें कर सकता है। यहाँ कोई बड़ा या छोटा नहीं, सब एक समान हैं। सिर पर रुमाल बाँधे लोग नंगे पाँव चलकर यहाँ आते हैं और लंगर में बैठकर एक साथ भोजन करते हैं। वहाँ न जात देखी जाती है, न धर्म, वहाँ होती है तो केवल सेवा। हर रोज़ हज़ारों लोगों का भोजन बनाना, परोसना और साफ-सफाई करना, यह सब जिस समर्पण से किया जाता है, वही तो इस स्थान की खासियत है। बलिदान और संघर्ष की भूमि- अमृतसर अमृतसर केवल श्रद्धा और गुरुद्वारों का शहर नहीं, बलिदान और संघर्ष की भी भूमि है। स्वर्ण मंदिर से कुछ कदम की दूरी पर है जलियांवाला बाग, जिसकी दीवारें आज भी चीख-चीखकर उस दिन की गवाही देती हैं जब 1919 में निहत्थे, मासूम भारतीयों पर अंग्रेज़ों ने गोलियाँ बरसाईं। वह कुआँ, जिसमें लोग जान बचाने के लिए कूदे थे, आज भी वहाँ है। हर बार जब कोई पर्यटक वहाँ खड़ा होता है, तो एक गहरी चुप्पी उसे घेर लेती है। वो समझ पाता है कि आज़ादी सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक जंग थी जिसे हमने अपने खून से जीता है। जो हमें न जाने कितनी कुर्बानियों के बाद मिली है। वाघा बॉर्डर अमृतसर का एक पहलू है, देशभक्ति से लबरेज़ वाघा बॉर्डर। शाम के वक्त जब भारत और पाकिस्तान के सैनिक आमने-सामने खड़े होते हैं और कदमों की गूंज, तिरंगे की ऊँचाई, और देशभक्ति के नारे गूंजते हैं, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की रगों में जोश भर जाता है। यह एक सैन्य परंपरा होने के साथ एक भावनात्मक प्रदर्शन है जहाँ हर नागरिक एक सैनिक की तरह खड़ा होता है, जिसके हाथ में झंडा होता है और दिल में गर्व। जब आप अमृतसर जाएं, तो ऐसे मंज़र को भी महसूस कर सकते हैं। अमृतसर का खान-पान कहते हैं, दिल का रास्ता पेट से होकर गुज़रता है। अमृतसर अपने खान-पान के मामले में किसी जन्नत से कम है। यहाँ के अमृतसरी कुलचे, छोले, पराठें, स्वादिष्ट लस्सी और देसी घी की मिठाइयाँ- सब कुछ ऐसा है कि स्वाद ज़ुबान पर नहीं, सीधे दिल में उतरता है। पुराने शहर की गलियों में जब सुबह-सुबह तवे पर कुलचा सेंका जाता है, और पास ही ढाबे वाला आवाज़ लगाता है- “ओ जी, गरम-गरम कुल्चा लाओ!”, तो लगता है जैसे आप सिर्फ खाना नहीं खा रहे बल्कि इस शहर का एक हिस्सा बन गए हैं। अमृतसर के बाज़ार ‎यहाँ के बाज़ार, चाहे वो हॉल गेट हो, कटरा जामांदारा हो या गुरु बाज़ार; पंजाबी जूतियों, फुलकारी दुपट्टों और रंग-बिरंगे पटियालों से हमेशा सजे रहते हैं। हर दुकान से उठती पंजाबी गानों की बीट्स, दुकानदारों की हँसी और ग्राहकों की चहल-पहल मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो किसी त्योहार से कम नहीं लगता। अमृतसर की सबसे खास बात है, उसकी गर्मजोशी और अपनापन। यहाँ के लोग बिना जाने-पहचाने भी मुस्कुराकर बात करते हैं, रास्ता बताते हैं, और लस्सी का एक एक्स्ट्रा गिलास आपके सामने रख देते हैं। ये शहर आपको अपनी गोद में बिठाता है, और जब आप लौटने लगते हैं, तो आपके दिल में कुछ न कुछ छोड़ देता है। शायद एक याद, एक रंग, एक आवाज़, एक स्वाद- हाँ शायद लस्सी का! यात्रा से पहले जानने योग्य बातें: सबसे अच्छा समय : अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम सुहावना रहता है, यह समय अमृतसर की यात्रा के लिए अच्छा है।‎स्थान : अमृतसर, पंजाब (भारत-पाक सीमा से लगभग 28 किलोमीटर दूर) कैसे पहुँचे? ट्रेन, हवाईजहाज, या बस, तीनों विकल्प सुविधाजनक हैं।‎ठहरने के लिए जगहें : यहाँ हर बजट के अनुसार होटल मौजूद हैं। लेकिन स्वर्ण मंदिर के पास ठहरना, इस अनुभव को और खास बना देता है। ‎अमृतसर का बखान अगर एक वाक्य में करना हो, तो कहा जा सकता है कि- यह वो शहर है जहाँ आस्था, इतिहास, संस्कृति और आत्मीयता एक साथ देखने को मिलते हैं। और मिलता है अपनेपन का वो एहसास जो हमेशा याद रहे।

Mera Safarnama- The Writers Corner Uttar Pradesh

सोरों- क्या वाक़ई धरती का केंद्र है ये मंदिरों की नगरी, मेरा सफरनामा

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मेरे पिता जी का जन्म स्थान सोरों शूकरक्षेत्र, उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में स्थित गंगा नदी के समीप एक सतयुगीन तीर्थस्थल और वराह भगवान की अवतार भूमि के रूप में जाना जाता है। इस स्थान को तुलसीदास जी की जन्मभूमि भी माना जाता है। आज भी जब मैं वहाँ जाती हूँ तो पुराने दरवाज़े, मकान, मंदिर और खंडहर देखकर विस्मित हो उठती हूँ उसपर भी जब सब बड़े हमें बताते है कि कैसे कारीगरी करके इन्हें बनाया गया था, तो सुनकर और भी अच्छा लगता है। हालाँकि, आज उन मकानों में कोई रहता तो नहीं है और आधुनिकीकरण के चलते बहुत से बदलाव आए हैं पर सोरों जाकर लगता है कि आज भी कुछ पुराने वक़्त के लम्हों को जी रही हूँ। मैं अच्छी साँस ले रही हूँ और एक ऐसा सुकून महसूस कर रही हूँ जो मुझे अपने जन्म स्थान दिल्ली में नहीं मिलता है। शायद इसीलिए वहाँ जाने पर मन करता है कि वहीं बस जाऊं। मंदिरों की नगरी, मेरा गाँव सोरों सोरों जी एक तीर्थ स्थल है। ये जगह मंदिरों से घिरी हुई है। पग पग पर यहाँ मंदिरों की खूबसूरत शृंखलाएँ हैं। हर रास्ते से गुजरते हुए आपको एक न एक नया-पुराना मंदिर जरूर दिखेगा। और बल्कि यहाँ तो कुछ ऐसे पुराने मकान भी मौजूद हैं जो किसी मंदिर से कम मालूम नहीं होते। यहाँ की गलियों से गुजरते हुए आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे आप किसी पुरानी दुनिया में आ गए हों और जहाँ आप पौराणिकता को भी महसूस करने लग जाएं। यहाँ मंदिरों की बात ही कुछ और है। क्योंकि कुछ विकसित शहरों की तरह यहाँ के मंदिरों में लोग आपको केवल तस्वीरें खींचते या खिंचवाते नहीं मिलेंगे बल्कि शांति से बैठे या भजन कीर्तन में संलग्न दिखेंगे। जब मैं थोड़ी और छोटी थी और अपने गांव जाती थी, तो हमारे बाबा हमें गंगाजी की एक परिक्रमा लगवाते थे जिसमें न जाने कितने मंदिर आते थे। और ये मंदिर आज भी उतने ही जीवंत लगते हैं। कुछ मंदिरों का जीर्णोद्धार हो गया है लेकिन ज्यादातर मंदिरों में आज भी वो पारंपरिक और सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है जो केवल यहीं मिल सकती है। मानो तो सब सच है.. जब भी मैं सोरों जाती हूंँ वहाँ पर मुझे लोगों से एक बात अक्सर सुनने को मिलती है कि यह नगरी नदियों की गोद में एक पावन तीर्थ स्थल होने के साथ संसार का केंद्र भी है। मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी के प्रलय में डूबने के समय भगवान वराह ने अपनी नाक पर पृथ्वी को रखकर इसकी रक्षा की थी। कुछ दिनों पहले जब हम यहाँ जा रहे थे तो बस में बैठे एक अनजान अंकल से मेरे पापा की बात होने लगी। वे दोनों एक दूजे को इस स्थान की पारंपरिक और सांस्कृतिक सुंदरता का बखान करने लगे। मैं उन दोनों की बातें सुन रही थी और सोच रही थी क्या वाकई गंगा की उपनदियों से घिरा ये छोटा सा गांव, इतने बड़े संसार का केंद्र हो सकता है। क्योंकि पृथ्वी तो गोल है और इसका कोई छोर नहीं। सोरों में गंगा आरती की बेला जब हम यहाँ अपने पुराने घर पहुंचे तो हमारे घर से कुछ ही कदम की दूरी पर स्थित चारों ओर से घिरी गंगा जी की परिक्रमा के लिए गए। ऐसा मनोरम दृश्य मैंने उसे दिन से पहले कभी नहीं देखा था। गंगा आरती शुरू हुई और हम पुजारी के हाथ में जल रही, दिये की लौ को देखकर उसमें खो गए। हमें इस बात का बिल्कुल आभास नहीं था कि आगे क्या होने वाला है, लेकिन जब वह हुआ तो यह पल मेरे लिए पूरी जिंदगी की याद बन गया। अचानक हल्की-हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो गई। और कब ये बूंदा-बांदी बारिश में तब्दील हो गई हमें पता भी नहीं चला। और फिर शाम का वक्त हो चला था तो पूरे क्षेत्र में रंग बिरंगी चमचमाती लाइटें जला दी गईं। बारिश की गिरती बूंदों के साथ उन चमचमाती रंग बिरंगी लाइट का जो प्रतिबिंब गंगा की धारा में दिख रहा था वह मेरे दिल को एक ऐसा सुकून दे रहा था जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।‎उस दिन मैंने जाना कि कभी-कभी हम बिना बोले भी बहुत सारी बातें कर जाते हैं। जो उस दिन मैंने उस नदी से और अपने दिल से की। ‎नाव तो सिर्फ तस्वीर के लिए थी अपने घर के पास वाली गंगा नदी से दूर हम एक प्रचलित नदी, कछला पहुंचे। हम खूब नहाए और हमने बहुत सारे मजे किए। लेकिन जैसे ही मैंने नाव देखी मेरा मन उसमें बैठने को कर गया। मैंने अपने पिताजी से कहा कि मुझे इस नाव में बैठना है पर उन्होंने साफ इनकार कर दिया। मन थोड़ा दुखी हुआ पर सोचा, कि चलो यह सब तो जिंदगी का हिस्सा है। लेकिन मैंने हार नहीं मानी अगर मैं उसमें बैठकर नहीं घूम पाई तब भी मैंने उसमें बैठकर एक तस्वीर जरूर ली। और वह तस्वीर इतनी सुंदर आई कि आज तक मेरे ज़हन और मेरी इंस्टाग्राम की पोस्ट में छपी हुई है। कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है..एकान्त ही शोर से बेहतर है। शान्त ही शोख से बेहतर है। जब भी मैं यहाँ जाती हूँ, यह ख्याल मेरे जहन में जरूर उमड़ता है कि शांति कितनी अच्छी हो सकती है और एकांत में रहना आपके दिल को कितना सुकून दे सकता है। भले ही, आप उत्तर प्रदेश में रहते हैं या दिल्ली में या फिर भारत के किसी और कोने में। आपको एक बार इस शांति का अनुभव करने के लिए और इस पौराणिकता को महसूस करने के लिए यहाँ जरूर जाना चाहिए। मेरा सफरनामा- नंदनी वार्ष्णेय

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शिमला की 10/10 खूबसूरती, यहाँ देखिए फोटो ब्लॉग के माध्यम से!

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दोस्तों, वैसे तो शिमला को किसी तरह के इंट्रोडक्शन की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। शिमला को “क्वीन ऑफ़ हिल्स ” भी कहा जाता है। शिमला, हिमाचल प्रदेश की राजधानी और राज्य का सबसे बड़ा शहर भी है। आओ इतिहास को जानें जब भी पहाड़ों पर छुट्टी बिताने की बात आती है तो शिमला हमेशा लोगों के दिमाग में रहता है। ब्रटिश काल में इस शहर को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया था। शिमला भारतीयों के साथ-साथ विदेशी पर्यटकों के लिए भी एक फेमस टूरिस्ट प्लेस है। शिमला के बारे में एक और इंटरेस्टिंग फैक्ट है कि शिमला-कालका रेलवे लाइन यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट्स में शामिल है और दुनिया भर के पर्यटकों को अट्रैक्ट करती है। बेजोड़ इंजिनियरिंग का चमत्कार यह रेलवे लाइन लगभग 806 पुलों और 103 सुरंगों को पार करते हुए तकरीबन 96 किमी की दूरी तय करती है। मैक्सिमम ऊंचाई पर स्थित इस रेलवे लाइन को गिनीज बुक ऑफ रिकॉड्स में भी शामिल किया गया है। यदि आप शिमला की यात्रा पर विचार कर रहे है तो मार्च से जून तक का समय यहाँ की यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। क्योंकि इस समय यहाँ का मौसम मैदानी इलाकों की तुलना में कूल रहता है।शिमला भारत के सभी बड़े शहरों से काफी अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 342 किलोमीटर है। शानदार हाईवे से होते हुए आप आसानी से यहाँ पहुँच सकते हैं।हमें दिल्ली से यहाँ तक पहुँचने में लगभग नौ घंटे लगे। थोड़ी तैयारी से जाना क्योंकि शिमला में घूमने की जगह यहाँ के फेमस मॉल रोड से होती है इसलिए हमने सबसे पहले अपनी गाड़ी पार्क की, नीचे लिफ्ट के पास बनी पार्किंग में। यहाँ पर पार्किंग मिलना पूरी तरह आपकी किस्मत पर डिपेंड करता है। अगर निगम पार्किंग फुल मिले तो यहाँ पर प्राइवेट पार्किंग वाले पीक सीजन में तीन सौ रुपए से लेकर पांच सौ तक चार्ज करते हैं। क्योंकि आप ऊपर मॉल रोड तक अपनी गाड़ी नहीं ले जा सकते इसलिए प्रशासन द्वारा लिफ्ट की व्यवस्था की गई है। ताकि आप आसानी से मॉल रोड तक जा सके। लिफ्ट से मॉल रोड तक जाने के लिए सिर्फ दस रुपए प्रति व्यक्ति टिकट लगती है। मॉल रोड लिफ्ट से आप सीधे मॉल रोड पर पहुँच जाते हो। अगर आप ख़रीददारी के शौकीन है तो आपके लिए मॉल रोड सबसे अच्छी जगहों में से एक है। यहां पर आप हिमाचली शॉल, वुडेन आइटम्स और ऊनी वस्त्रों की शॉपिंग कर सकते हैं। इसके अलावा यहां पर बहुत सारे शॉपिंग सेंटर और अच्छे रेस्त्रां है जहां आप अपनी फॅमिली या फ्रेंड्स के साथ अच्छा समय बिता सकते है। यहां केवल इमरजेंसी व्हीकल्स को ही चलने की अनुमति है। शाम के वक़्त मॉल-रोड पर मोमोज़, आईस्क्रीम वगैरह के तमाम स्टॉल लग जाते हैं। यानी यहां आप घूमते-फिरते स्ट्रीट-फूड्स को एंजॉय कर सकते हैं। यहां के शानदार कैफे में काफ़ी पीने का भी अपना ही आनंद है। रिज मॉल रोड़ से थोड़ा आगे चलने पर आप शिमला की बेहद खूबसूरत जगह रिज पर पहंच जाओगे। वास्तव में यह स्थान शिमला आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख स्थानों में से एक है। यहां पर ओपन प्लेस है जहां से पर्वत श्रंखलाओं का मनोरम और अद्भुत दृश्य देखा जा सकता है। बड़ी संख्या में पर्यटक इस मनोरम दृश्य को देखने आते है। क्राइस्ट चर्च शिमला यहीं रिज मैदान पर आपको उत्तर भारत का दूसरा सबसे पुराना चर्च दिखाई देगा जो आज भी अपनी ख़ूबसूरती से शिमला आने वाले पर्यटकों को खूब लुभाता है। ब्रिटिश शासनकाल में बना यह चर्च आज भी शिमला की शान बना हुआ है। वर्ष 1857 में नियो गोथिक आर्ट में बना यह चर्च एंग्लीकेन ब्रिटिशन कम्युनिटी के लिए बनाया गया था जिसे उस समय सिमला कहते थे। इस क्राइस्ट चर्च को कर्नल जेटी बोयलियो ने 1844 में डिजाइन किया था। लेकिन इसका निर्माण करीबन 13 साल बाद 1857 में शुरू किया गया। इसके उपर लगी बड़ी घड़ी 1860 में कर्नल डमबेल्टन ने दान की थी। ईसाई धर्म के विश्वास, उम्मीद, परोपकार, धैर्य, विनम्रता की प्रतीक चर्च में पांच बड़ी खिड़कियां लगी है जो कीमती कांच से बनाई गई हैं।देश विदेश से शिमला आने वाले लाखों सैलानी इस चर्च में जाना नहीं भूलते हैं। चर्च के अंदर जाकर आप शांति से प्रार्थना कर सकते हैं। यहां आने वाले सैलानी चर्च के सामने फोटो भी खिंचवाते हैं। शिमला समर फेस्टिवल हमारी शिमला ट्रिप में इस बार किस्मत से हमें शिमला समर फेस्टिवल देखने को मिला। पूरे रिज मैदान को अच्छे से सजाया गया था। शिमला समर फेस्टिवल हर साल बहुत उत्साह और भव्यता के साथ मनाया जाता है। हमें रिज पर खाने पीने के अलग-अलग तरह के स्टॉल भी दिखाई दिए। साथ ही आप यहाँ से कपड़ों की शॉपिंग भी कर सकते हो। हमने इस समर फेस्टिवल को खूब एन्जॉय किया। लक्कड़ बाजार शिमला जैसा कि नाम से ही पता चलता है, शिमला के लक्कड़ बाजार में लकड़ी से बनी हुई चीजें मिलती हैं। अगर आप टूरिस्ट हैं और कहीं बाहर से शिमला घूमने आये हैं और यादगार के रूप में यहां से कुछ टिकाऊ चीज ले जाना चाहते हैं तो लक्कड़ बाजार में आपको बहुत सारे अल्टेरनेट मिल जायेंगे। इसके अलावा आप यहां शिमला के लोकल फ़ूड का आनंद भी उठा सकते हैं। लक्कड़ बाजार शिमला रिज के बिलकुल करीब ही स्थित है। कैसे पहुंचे? शिमला पर्यटकों के लिए मनपसंद जगहों में से एक है। यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य और पहाड़ों के बीच बसा एक खूबसूरत हिल स्टेशन है। शिमला भारत के अन्य शहरों से काफी अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 342 किमी है। हवाई मार्ग– शिमला एयरपोर्ट जूब्बड़हट्टी में स्थित है जो शिमला से लगभग 23 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां से सार्वजनिक परिवहन कैब लेकर आप अपने गंतव्य तक जा सकते है। यह केवल दिल्ली की उड़ाने से जुड़ा है और पास में सबसे बड़ा हवाई अड्डा चंडीगढ़ में स्थित है जो चंडीगढ़ से शिमला के बीच की दूरी लगभग 116 किमी की दूरी पर है। चंडीगढ़ एयरपोर्ट से आपको सार्वजनिक परिवहन के माध्यम जैसे बस या कैब से

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जौहरी बाजार- जयपुर की परंपरा, पहचान और बदलते वक़्त की कहानी

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राजस्थान की राजधानी जयपुर न केवल अपने किलों, हवेलियों और महलों के लिए जानी जाती है, बल्कि उसके जीवंत बाज़ार भी इस शहर की आत्मा को जीवित रखते हैं। इन्हीं बाज़ारों में से एक है- जौहरी बाजार, जो अपनी रंगीन गलियों, चमकते आभूषणों और सांस्कृतिक विरासत के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। यह सिर्फ एक ख़रीदारी का स्थान नहीं है बल्कि शताब्दियों पुरानी परंपराओं और जीवनशैली की झलकियां भी पेश करता है। मतलब अगर आप जयपुर आए और जौहरी बाजार नहीं देखा, तो समझिए आपने एक देखने लायक चीज छोड़ दी और इस शहर की धड़कन को महसूस ही नहीं किया। जौहरी बाजार का इतिहास । Johari bazaar जौहरी बाजार का इतिहास उस समय से जुड़ा है जब जयपुर शहर को एक नियोजित यानी योजना के तहत बनाई गई राजधानी के रूप में विकसित किया गया था। 1727 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर की स्थापना की और शहर की संरचना को वास्तुशास्त्र तथा शिल्पशास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर तैयार करने की योजना बनाई। उसी समय इस बाजार की भी नींव रखी गई। ‘जोहरी’ शब्द का अर्थ होता है ‘रत्नों व आभूषणों (गहनों) का जानकार’, और यह बाज़ार विशेष रूप से रत्न-कारीगरों व आभूषण विक्रेताओं के लिए ही विकसित किया गया था। तत्कालीन रजवाड़ों की रानियाँ और राजघरानों के सदस्य यहीं से अपने गहनों के लिए विशेष कारीगरों से डिज़ाइन बनवाते थे। कला और कारीगरी की पहचान-जौहरी बाजार यह बाज़ार न केवल व्यापार का केंद्र रहा है, बल्कि स्थानीय कला, कारीगरी और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक बनकर उभरा। यहाँ के कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी कला को संजोते आ रहे हैं। कुंदन, मीणाकारी, पोल्की और थेवा जैसी पारंपरिक आभूषण शैलियाँ आज भी जौहरी बाजार में जिंदा हैं और यहाँ की पहचान हैं। यहाँ बनने वाले गहनों में न केवल सुनार की मेहनत होती है, बल्कि सदियों पुरानी तकनीकों और पारिवारिक परंपराओं की छाप भी होती है। जौहरी बाजार की वास्तुकला जौहरी बाजार की गलियाँ वास्तुकला की दृष्टि से भी अनोखी हैं। गुलाबी रंग में रंगी हुई इमारतें, मेहराबदार (a door with a round top) दरवाजे, छोटे मंदिर, और सजावटी झरोखे इस बाजार को एक विशेष रूप देते हैं। बाजार की सड़कें सीधी और चौड़ी हैं, जिससे त्योहारों के समय निकलने वाली झांकियों और शोभायात्राओं के लिए भी स्थान मिलता है। इसके चारों ओर स्थित प्रमुख चौपड़ (जयपुर की चारदीवारी के केंद्र में स्थित) जैसे त्रिपोलिया चौपड़ और बड़ी चौपड़, बाजार के संचालन और नियंत्रण में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। लहरिया से पाजेब तक यह बाज़ार न केवल गहनों के लिए जाना जाता है, बल्कि पारंपरिक परिधानों और सजावटी वस्तुओं के लिए भी जाना जाता है। लहरिया और बंधेज की साड़ियाँ, लाख की चूड़ियाँ, हाथ से बनी नथें, मांगटीका, बिछुए और राजस्थानी पायजेब(पायल) यहाँ आम तौर पर देखने पर मिलती हैं। छोटे-छोटे स्टॉल्स पर चूड़ी बेचती महिलाएं, पारंपरिक अंदाज़ में बात करते दुकानदार और हर दुकान के बाहर चमकते बल्ब- इन सबका मिला जुला दृश्य इस बाजार को एक सांस्कृतिक विरासत की पहचान देता है। परंपरा से आधुनिकता तक जौहरी बाजार समय के साथ बदला ज़रूर है, लेकिन अपने मूल को उसने अब भी संभालकर रखा है। अब यहाँ पारंपरिक दुकानों के साथ-साथ कुछ आधुनिक शोरूम भी देखने को मिलते हैं। डिजिटल पेमेंट्स, पैकिंग सुविधाएँ, वातानुकूलित (Air conditioned) स्टोर, इन सबने बाजार को आधुनिक रूप दिया है। लेकिन आज भी यहाँ पीतल की ट्रे में गहनों को रखकर पेश किया जाता है, और ग्राहक के सामने उसी पुराने अंदाज़ में मोलभाव किया जाता है। कुछ खरीदना नहीं है? तो घूमने ही चले जाओ.. खरीदारी के अलावा, जौहरी बाजार में घूमना अपने आप में एक अनुभव है। सड़क किनारे मिलने वाली प्याज़ की कचोरी, घेवर, समोसे और अन्य पारंपरिक मिठाइयाँ भी यहाँ की विशेषताओं में शामिल हैं। शाम के समय जब बाजार रोशनी से जगमगाता है, तब यहाँ की रौनक दोगुनी हो जाती है। कई परिवार तो केवल यहाँ की मिठाइयों या साड़ियों की ख़रीददारी के लिए ही इस इलाके में आते हैं। विदेशी भी चाव से करते हैं यहाँ खरीददारी यह बाजार पर्यटन की दृष्टि से भी एक प्रमुख आकर्षण है। देश–विदेश से आने वाले पर्यटक, यहाँ की शिल्पकला और पारंपरिक वस्त्रों से बेहद प्रभावित होते हैं। कई लोग विशेष अवसरों जैसे विवाह, तीज, गणगौर या करवा चौथ के लिए यहाँ से ही गहनों की ख़रीदारी करना पसंद करते हैं। इस वजह से यह बाजार केवल स्थानीय व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक सेतु की भूमिका भी निभाता है। यहाँ पहुचें रेल, बस या ऑटो- किसी से भी.. जौहरी बाजार तक पहुँचना भी बेहद सरल है। यह जयपुर के पुराने शहर यानी पिंक सिटी में स्थित है और शहर के लगभग हर मुख्य स्थल से इसकी दूरी 5 से 7 किलोमीटर के बीच है। जयपुर रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड या एयरपोर्ट से। यहाँ तक ऑटो, टैक्सी या ई-रिक्शा की सुविधा आसानी से मिल जाती है। यदि आप यहाँ पहली बार आ रहे हैं, तो सुबह के समय या संध्या के ठीक पहले का समय सबसे बेहतर है। गहनों का बाजार, खुशियों की सौगात जौहरी बाजार सिर्फ एक बाजार या खरीदारी करने की जगह ही नहीं है बल्कि यह जयपुर की रचनात्मक लोक परंपरा और संस्कृति को आज की आधुनिक जीवनशैली के साथ पेश करता है। यहाँ की हर गली में कोई कहानी बसी है, हर गहने में किसी कारीगर का सपना और हर ग्राहक की आँखों में सौंदर्य की चाहत झलकती है। यह बाजार केवल जयपुर का एक बाजार नहीं है बल्कि भारत के उस जीवंत हिस्से के भाग है जो कभी अपनी चमक नहीं खोता।

Mera Safarnama- The Writers Corner Travel

बालाजी का चमत्कार और भूतों से मुक्ति तक का सफर

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जानिए… दिल्ली से मेहंदीपुर बालाजी का यात्रा अनुभव यायावर अजय राज की जुबानी- बालाजी का चमत्कार दिल्ली की आपाधापी भरी जिंदगी से निकलकर कुछ दिनों के लिए शांति और सुकून की तलाश में मैंने मेहंदीपुर बालाजी के लिए एक यात्रा की योजना बनाई। द्वारका के अपने फ्लैट से सुबह तड़के निकला, मन में भक्ति और जिज्ञासा का अनोखा मेल था। यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शांति और ऐतिहासिक धरोहरों को करीब से जानने का एक अवसर भी थी। यह मेरे लिए बहुत रोचक थी।(बालाजी का चमत्कार) यात्रा का शुभारंभ: दिल्ली से आगरा होते हुए…दिल्ली से सुबह-सुबह निकलना हमेशा मुझे पसंद रहा है, क्योंकि हाईवे पर ट्रैफिक कम मिलता है। मैंने अपनी कार से यात्रा शुरू की और सबसे पहले आगरा की ओर बढ़ा। मथुरा-वृंदावन जाने का रास्ता मुझे पहले ही पता था, पर इस बार मन में श्रीबालाजी के दर्शन की ही धुन थी। आगरा पहुंचते ही यमुना एक्सप्रेसवे की शानदार सड़क ने सफर को और भी सुहाना बना दिया। रास्ते में मैंने कुछ देर के लिए फतेहपुर सीकरी के पास रुकने का विचार किया। यह मुगल सम्राट अकबर द्वारा बनवाया गया ऐतिहासिक शहर है, जिसकी बुलंद दरवाजा जैसी संरचनाएं वास्तुकला का अद्भुत नमूना हैं। यहां के शांत वातावरण और ऐतिहासिक इमारतों को देखकर मन को एक अलग ही सुकून मिला। थोड़ी देर यहां बिताकर मैं फिर अपनी मंजिल की ओर अग्रसर हुआ। फतेहपुर सीकरी का महत्वफतेहपुर सीकरी 16वीं शताब्दी में मुगल सम्राट अकबर द्वारा स्थापित एक योजनाबद्ध शहर था। यह अपनी शानदार वास्तुकला, विशेषकर ‘बुलंद दरवाजा’ और ‘पंच महल’ के लिए प्रसिद्ध है। अकबर ने इस शहर को अपनी राजधानी के रूप में बनवाया था, लेकिन पानी की कमी के कारण इसे बाद में छोड़ दिया गया। यह यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है।सफर आगे बढ़ा और जल्द ही मैं राजस्थान की सीमा में दाखिल हो गया। राजस्थान की पहचान, उसके रंगीन परिदृश्य और राजस्थानी लोकगीतों की हल्की धुन मुझे अपने भीतर महसूस हो रही थी। रास्ते में कई छोटे-बड़े गांव और कस्बे भी आए, जिनकी सादगी और ग्रामीण जीवनशैली ने शहरी भागदौड़ से दूर एक अलग ही दुनिया का अहसास कराया। मेहंदीपुर बालाजी की पावन भूमि पर आगमनदोपहर होते-होते मैं मेहंदीपुर बालाजी धाम पहुंच गया। जैसे ही मंदिर परिसर के करीब पहुंचा, वहां का माहौल ही बदल गया। एक अलग तरह की ऊर्जा और भक्ति का संचार महसूस होने लगा। मंदिर के आसपास सैकड़ों दुकानें थीं, जहां प्रसाद, पूजा सामग्री और बालाजी से जुड़ी चीजें मिल रही थीं। मैंने अपनी गाड़ी पार्किंग में लगाई और मंदिर की ओर कदम बढ़ाए।मेहंदीपुर बालाजी धाम हनुमान जी को समर्पित एक बहुत ही प्रसिद्ध और चमत्कारी मंदिर है। यह स्थान भूत-प्रेत बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति के लिए जाना जाता है। मंदिर में प्रवेश करते ही मुझे भक्तों की भीड़ और एक विशेष तरह का माहौल मिला। लोग जोर-जोर से हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे थे और जयकारे लगा रहे थे। मेहंदीपुर बालाजी की विशेषतामेहंदीपुर बालाजी मंदिर राजस्थान के दौसा जिले में स्थित है। इस मंदिर के पास से ही करौली जिले की सीमा शुरु हो जाती है। इसी के पास टोड़ा की घाटी है, जो पहाड़ अपने आप में जन्नत से कम नहीं है। यह मंदिर भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं से प्रभावित लोगों को ठीक करने के लिए जाना जाता है। यहां पर हनुमान जी की बाल स्वरूप की पूजा की जाती है। मंदिर में ‘प्रेतराज सरकार’ और ‘भैरव बाबा’ के भी स्थान हैं, जिनकी अपनी विशेष महत्ता है। मंदिर में दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी हुई थीं। मैंने भी कतार में लगकर अपनी बारी का इंतजार किया। मंदिर के अंदर का वातावरण बहुत ही अलग था। मैंने पहले कभी ऐसा कुछ नहीं देखा था। लोग अजीबो-गरीब हरकतें कर रहे थे, कुछ रो रहे थे, कुछ चिल्ला रहे थे, और कुछ मूर्छित हो रहे थे। कहा जाता है कि यह सब नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रभाव के कारण होता है, जो बालाजी के आशीर्वाद से दूर होती हैं। यह सब देखकर मन में एक अजीब सी मिश्रित भावनाएं थीं – थोड़ी श्रद्धा, थोड़ी जिज्ञासा।मैंने हनुमान जी के दर्शन किए, प्रसाद चढ़ाया और अपनी मनोकामनाएं मांगीं। मंदिर परिसर में ही प्रेतराज सरकार और भैरव बाबा के भी दर्शन किए। यहां पर ‘दर्ख्वास्त’ और ‘सवाई’ की विशेष प्रक्रियाएं होती हैं, जिन्हें लोग अपनी बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए करते हैं। इन प्रक्रियाओं में लोग मंदिर परिसर में ही बैठकर कुछ विशेष अनुष्ठान करते हैं। दर्ख्वास्त और सवाईदर्ख्वास्त: यह बालाजी को अपनी समस्या बताने का एक तरीका है। इसमें लोग विशेष प्रसाद (जैसे लड्डू) चढ़ाते हैं और अपनी समस्या के निवारण के लिए प्रार्थना करते हैं।सवाई: यह समस्या के निवारण के बाद बालाजी को धन्यवाद देने या उनका आभार व्यक्त करने का एक तरीका है। इसमें लोग अपनी क्षमतानुसार दान करते हैं या भंडारा करवाते हैं।मैंने मंदिर परिसर में कुछ समय बिताया और वहां की ऊर्जा को महसूस किया। कई लोगों से बातचीत भी की, जिन्होंने अपने अनुभवों को साझा किया कि कैसे बालाजी के आशीर्वाद से उनकी परेशानियां दूर हुई हैं। यह सब सुनकर मेरा विश्वास और भी गहरा हो गया। मंदिर के नियम और मान्यताएं…बालाजी मंदिर में कई विशेष नियम और मान्यताएं हैं। जैसे, यहां से कोई भी प्रसाद घर नहीं ले जाया जाता है। लोग अक्सर अपनी समस्याओं को पीछे छोड़ने के प्रतीक के रूप में कपड़े या अन्य वस्तुएं मंदिर परिसर में छोड़ जाते हैं। यहां मांस-मदिरा का सेवन वर्जित है और भक्तों को शुद्धता का पालन करना होता है।शाम तक मैं मंदिर के आसपास ही रहा। यहां कई धर्मशालाएं और छोटे-बड़े होटल भी थे, जहां भक्त रुक सकते थे। मैंने एक स्थानीय भोजनालय में सात्विक भोजन किया, जो मंदिर के वातावरण के अनुकूल था। वापसी की यात्रा: दिल्ली की ओर…अगले दिन सुबह मैंने फिर से बालाजी के दर्शन किए और फिर दिल्ली के लिए अपनी वापसी की यात्रा शुरू की। मन में एक अलग तरह की शांति और सकारात्मकता का अनुभव हो रहा था। मेहंदीपुर बालाजी की यात्रा ने मुझे न केवल एक धार्मिक अनुभव दिया, बल्कि जीवन की कुछ अनसुलझी पहेलियों पर विचार करने का अवसर भी प्रदान किया।वापसी के रास्ते में मैंने एक और ऐतिहासिक स्थल ‘नीलकंठ महादेव मंदिर’

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India’s Top 5 Night Markets: Culture, Chaos & Charm Unfold

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With each sunset, India is in a thousand and one lights, colours, and sounds, particularly for its night time markets. Visitors who seek something beyond temples and museums will find the night markets where authentic India takes place: street foods crackle on open fires, indie clothing overflows from small stalls, and people’s chatter from the walk-way becomes cultural experience. A Glamorous Roll Call of the Sleekest Night Markets in India That Combine the New with the Old, Something for Gen Z Travelers, Influencers, and Curious Travelers. 1. Arpora Saturday Night Market, Goa The Place To Be: Bohemian flair, live music & international cuisine Vibe: Relaxed yet charged Highlights: Street food fusion, handcrafted accessories and DJs playing sets from trance to indie rock. IG Moment: Colourful fairy lights covering rows of antique racks and tattoo booths. Best For: New-generation nomads, backpackers, and sun-down-to-sun-up party people. Sarojini nagar flea market; Hottest Spot: Thrift chic + college crowd vibe 2. Khwab Mahal Night Bazaar, Delhi Famous For: Colourful visuals and audio, with some slightly more affordable purchases Vibe: Vibrant, budget-friendly, über-urban Highlights: Rs. 100 fashion bargains, recycled art, Korean skincare booths, and quirky cafes. IG Moments: Strike a pose for the gram-fame shots while flaunting the sheen of paper lanterns above a thrifted shopping haul. Best For: College-going students, content creators, budget-fashion followers 3. Johari Bazaar (Evening Hours), Jaipur Why It’s Trending: Royal heritage + Gen Z jewelry finds Vibe: Traditional with a twist Highlights: Under pink-lit skies are silver oxidized jewelry, lehengas, mojris, and meenakari works. IG Moment: Mirror selfie with Rajasthani earrings and mehndi decorated hands. Best For: Wedding shopping, solo female travellers, slow travellers 4. Shilparamam Night Market, Hyderabad Why It’s Trending: Artsy vibe + Hyderabadi biryani stalls Vibe: Folk meets fusion Highlights: Handicrafts, puppetry, and local live performances. IG Moments: Lantern-lit walkways and traditional mural backdrops Best For: Culture enthusiasts, families, and art lovers 5. Bapu Bazaar, Udaipur (Twilight Hours) Why It’s Trending: Instagrammable handicrafts + lakeside glow Vibe: Serene, soulful, stunning Highlights: Juttis, Rajasthani art, and tie-dye fabrics IG Moments: Shopping amidst the sparkling Lake Pichola Ideal For: Bargain hunters, tech enthusiasts, and Tamil foodies Night Markets & The Rise of Nocturnal Nomads Night markets are not merely a case of purchasing and consuming-a cultural include. With slow travel having gone mainstream, food blogging, and streetstyle fashion hauls, they’re becoming Instagram playgrounds and YouTube reel zones. Quick Tips for Night Market Travel: Bring cash: Vendors mostly demand UPI or cash. Go Insta-ready: The light, colors, and people make stunning posts. Don’t eat away: From golgappas to momos-eat them all! Go local: Get chatting-to be introduced to gems. Stay street-smart: Safety first, particularly when going to late-night joints. Conclusion Indian night markets are more than just “bazaar culture” and have turned into a lifestyle trend. Be it for aesthetic thrills, food thrills, and/or just a couple of hours of night time ooey-gooey Indian magic, these luminous centres certainly guarantee an experience that’s raw, real, and unforgettable. So, next time you’re overseas in some new Indian city and ready to forego the hotel meal-a dark stroll should be on your agenda because that’s when the real action starts.

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लोधी गार्डन : दिल्ली में स्थित गुंबदों और मकबरों की दास्ताँ

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दिल्ली की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी और महानगर की चकाचौंध के बीच, एक ऐसी हरी-भरी जगह है जो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को बयां करती है, लोधी गार्डन। यह कोई आम बगीचा नहीं, बल्कि इतिहास के रंगों और प्रकृति की शांति का खूबसूरत मेल है। जब आप लोधी गार्डन में प्रवेश करते हैं, तो आपको सिर्फ एक बगीचा देखने को नहीं मिलता, बल्कि सदियों पुराना एक इतिहास मिलता है, जो हर पेड़, हर पत्थर और हर रास्ते में अपनी कहानी बुन रहा होता है। इस स्थान की जड़ें 15वीं सदी तक जाती हैं, जब सैय्यद और लोदी वंश के शासकों ने इसे अपने विश्राम और समाधि स्थल के रूप में चुना। गार्डन में मौजूद प्रमुख स्मारकों में मोहम्मद शाह और सिकंदर लोदी के मकबरे शामिल हैं, जो इंडो-इस्लामिक (Indo- Islamic) स्थापत्य कला के शानदार उदाहरण हैं। आओ, लोधी गार्डन के इतिहास को जानें- इन मकबरों की स्थापत्य विशेषताएँ , जैसे अष्टकोणीय संरचना, छतरियाँ, अलंकृत दरवाज़े और खूबसूरत प्लास्टर वर्क- उस दौर की वास्तुकला में झलकने वाली कला और सौंदर्य को दर्शाते हैं। मोहम्मद शाह, जो सैय्यद वंश के तीसरे शासक थे, उनका मकबरा आज भी अपनी भव्यता के साथ यहाँ मौजूद है, और ऐसा माना जाता है कि उसमें उनके साथ उनके परिवार के सदस्यों की भी कब्रें हैं। जहाँ आज हम पेड़ों के नीचे बैठकर शांति को महसूस कर पाते हैं, वहाँ कभी एक ‘ख़ैरपुर’ गाँव हुआ करता था। 1931 तक ये क्षेत्र गाँव के रूप में मौजूद था, लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान 1936 में यहाँ के ग्रामीणों को हटाकर, इस क्षेत्र को एक सुव्यवस्थित बग़ीचे के रूप में विकसित किया गया और ब्रिटिश वायसराय की पत्नी के नाम पर इसका नाम रखा गया ‘लेडी विलिंगडन पार्क‘। (Lady Willingdon Park) स्वतंत्रता के बाद, 1947 में इसका नाम बदला गया और इसे आज के लोधी गार्डन के रूप में पहचाना जाने लगा। इतिहासस से शहरी रिट्रीट तक का सफर – लोधी गार्डन 1968 में इस गार्डन को दो प्रसिद्ध शख्सियतों ने नया रूप दिया- अमेरिकन लैंडस्केप आर्किटेक्ट गैरेट एक्बो और आर्किटेक्ट जोसेफ एलन स्टीन, जिन्होंने यहाँ ग्लास हाउस, फाउंटेन से सजी झील, बोनसाई गार्डन और गुलाब उद्यान जैसी विशेषताएँ जोड़ीं। नतीजा यह निकला कि यह स्थान एक ऐतिहासिक पार्क से एक बहु-आयामी शहरी रिट्रीट बन गया, जहाँ लोग न सिर्फ इतिहास से रूबरू होते हैं, बल्कि प्रकृति की गोद में कुछ सुकून के पल भी बिता सकते हैं। बड़ा गुम्बद बड़ा गुम्बद लोधी गार्डन के मध्य में स्थित है जो कि तीन संरचनाओं से मिलकर बना है। बड़ा गुम्बद, मस्जिद, और मेहमान ख़ाना (गेस्ट हाउस)। “बड़ा गुम्बद” नाम अपने विशाल गुंबद के कारण पड़ा, जिसकी ऊँचाई लगभग 27 मीटर और माप 19 x 19 मीटर है। इसकी अनोखी बात यह है कि इसमें कोई कब्र नहीं है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह एक भव्य प्रवेशद्वार रहा होगा। इसके चारों ओर की दीवारें खुली हैं, और इसके ऊपरी हिस्से में कंगूरों का अद्भुत डिज़ाइन, काले संगमरमर की सजावट और लाल पत्थर की नक्काशी इस इमारत को सौंदर्य और भव्यता का प्रतीक बनाते हैं। मस्जिद और मेहमान खाना इसके सामने स्थित मस्जिद और मेहमान खाना भी स्थापत्य कला के बेहतरीन उदाहरण हैं। मस्जिद में “मेहराब” है, जो पश्चिमी दीवार में नमाज़ की दिशा दर्शाने के लिए होता है। मेहमान खाना भी इसी पैमाने पर बना है लेकिन बिना गुंबद और परिसज्जा के। यहाँ की मेहराबें और संयोजन उस समय की जीवनशैली को दर्शाते हैं। शीश गुम्बद शीश गुम्बद, जो अपनी चौकोर संरचना और छिपी हुई सीढ़ियों के लिए प्रसिद्ध है, लोधी गार्डन का एक और आकर्षण है। इसकी दीवारों पर खुले हुए द्वार और हवादार आर्किटेक्चर इसे एक ऐसा मकबरा बनाते हैं, जिसमें वास्तुकला के साथ-साथ वायुमंडल का भी बढ़िया सामंजस्य है। अंदर का मुख्य कक्ष 10 मीटर का है और इसमें भी कई कब्रें हैं। कल से आज तक आज का लोधी गार्डन सिर्फ इतिहास प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि हर किसी के लिए खुला है- चाहे आप एक जॉगिंग ट्रैक पर भागना चाहें, बच्चों के साथ पिकनिक का मज़ा लेना हो या फिर किसी शांत कोने में बैठकर किताब पढ़नी हो, यह जगह हर मूड और हर मौसम के लिए उपयुक्त है। यहाँ की पगडंडियाँ, पुराने पेड़, रंग-बिरंगे फूल, झील के किनारे बहता पानी और पक्षियों की चहचहाहट, हर कदम पर आपको एक नया अनुभव देते हैं। साथ ही, यह गार्डन कला प्रेमियों के लिए भी एक सौगात है। यहाँ प्रदर्शित मूर्तियाँ और कला-कृतियाँ इस स्थान को और भी जीवंत बनाती हैं। यहाँ पर समय जैसे ठहर जाता है- हर पत्थर इतिहास बोलता है और हर पौधे में जीवन झलकता है।‎लोधी रोड पर स्थित यह गार्डन, सफदरजंग टॉम्ब और खान मार्केट के बीच बसा हुआ है, और दिल्लीवासियों व पर्यटकों दोनों का एक पसंदीदा स्थान है। जब भी दिल्ली के शोरगुल से राहत की तलाश हो, और मन इतिहास से संवाद करना चाहे, तो आप लोधी गार्डन जा सकते हैं। क्योंकि यह सिर्फ एक बाग़ नहीं, एक ऐसी सुंदर जगह है जो आपको नित्य नए अनुभव दे सकती है। यह गार्डन इतिहास, प्रकृति और एक केवल महसूस की जाने वाली शांति के संगम का यह खूबसूरत उदाहरण है।‎

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बच्चों के संग यात्रा को आसान कैसे बनाएं? जानिए 7 जरूरी टिप्स

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एक ऐसी यात्रा जिसमें जरा-सी शरारतें, थोड़ी-सी ज़िद, मासूम हंसी और ढेर सारे सवाल साथ चलते हों, कितनी प्यारी लगती है। ऐसी यात्रा का लुत्फ़ बच्चों के साथ उठाया जा सकता है। ‎बच्चों के साथ यात्रा करना एक ऐसा अनुभव है, जो बहुत कुछ सिखाता है। धैर्य, प्लानिंग और सबसे ज़्यादा – छोटी-छोटी चीज़ों में खुशी ढूंढ़ना। अगर आपने कभी किसी छोटे से बच्चे को ट्रेन की खिड़की से बाहर झांकते हुए “माँ देखो गाय!” कहते सुना है, तो आप जानते होंगे कि वो पल किसी महंगी फ्लाइट या लग्ज़री होटल से बड़ा होता है। पर हकीकत यही है कि बच्चों के साथ सफर करने में मेहनत ज़रूर लगती है। आपको हर पल अलर्ट रहना होता है, कब बच्चा भूखा हो जाए, कब बोर हो जाए, कब ऊबकर रोने लगे। लेकिन यकीन मानिए, थोड़ी सी समझदारी, थोड़ा सा धैर्य और थोड़ी सी तैयारी से यह सफर न केवल आसान हो सकता है, बल्कि ज़िंदगी की सबसे सुंदर यादों में बदल सकता है। ‎मंज़िल का चुनाव ‎सबसे पहले तो मंज़िल चुनने से शुरुआत कीजिए। बच्चे किसी भी जगह को अपने नज़रिए से देखते हैं — उनके लिए झील की सैर, पहाड़ों की ठंडी हवा, या समुंदर की लहरें किसी परी-कथा से कम नहीं होतीं। पर आपको देखना है कि वह जगह बच्चे की उम्र और ज़रूरतों के मुताबिक है या नहीं। क्या वहाँ अस्पताल पास है? क्या मौसम बहुत कठोर तो नहीं? क्या सफर बहुत लंबा तो नहीं? ऐसे सवाल छोटे लग सकते हैं, लेकिन ये बहुत जरूरी हैं।‎ पैकिंग (बच्चों के साथ) फिर आती है पैकिंग। बच्चों के साथ पैकिंग का मतलब है हर छोटी से छोटी चीज़ के बारे में सोचना — खाने पीने के सामान तथा कपड़ों से लेकर उनका पसंदीदा खिलौना तक। पर इसका मतलब यह नहीं कि आप ज़रूरत से ज़्यादा सामान ले लें। सामान कम हो लेकिन उसका चुनाव स्मार्टनेस के साथ होना चाहिए। ऐसे कपड़े जो जल्दी सूख जाएँ, ऐसा खाना जो खराब न हो, जैसे मिल्क पॉउडर, फल, सूखे स्नैक्स वगेरह और ऐसी चीजें जो सफर में उनका ध्यान बाँधे रखें जैसे लूडो व पज़ल इत्यादि गेम्स — इस तरह से अच्छी पैकिंग की जा सकती है। बच्चों को ध्यान में रखकर समय का चुनाव बच्चों को लेकर निकलने से पहले समय का चयन भी समझदारी से करना चाहिए। बहुत सुबह निकलना या देर रात तक सफर करना, आमतौर पर बच्चों के लिए थका देने वाला हो सकता है। दिन के समय निकलना बेहतर रहता है जब बच्चे तरोताज़ा हों और सफर को एन्जॉय कर सकें। और बीच-बीच में थोड़ा रुकना, कुछ देर खुली हवा में चलना, उनके मूड को भी अच्छा बनाए रखता है। साथ ही, मौसम का चुनाव भी आवश्यकतानुसार करना चाहिए । खान पान की व्यवस्था ‎अब बात करें खाने की — बच्चे के खाने के समय व भोजन का ध्यान भी हमें ही रखना होगा ताकि वह भूख से चिड़चिड़ा न हो जाए। उनकी पसंद का कुछ हल्का-फुल्का खाना हमेशा साथ रखें। कुछ फल, नमकीन, घर का बना परांठा या बिस्किट इत्यादि अच्छे विकल्प हो सकते हैं । और हाँ, यात्रा के दौरान पानी साथ रखना तो सबसे ज़्यादा जरूरी है। इससे आप न केवल उनके पेट का ख्याल रख पाएंगे, बल्कि सफर के दौरान उनका मूड भी अच्छा बना रहेगा । मनोरंजन यात्रा के दौरान मनोरंजन भी एक महत्वपूर्ण तत्व है, इसकी भूमिका को कम नहीं आँकना चाहिए। चाहे कार की लम्बी यात्रा हो या ट्रेन का सफर, थोड़ी देर बाहर के नज़ारे देखने के बाद बच्चे ऊब सकते हैं। इसलिए उनके लिए कहानियों की किताब, रंग भरने वाली कॉपी, लूडो, या पज़ल गेम वगेरह ले जाना अच्छा रहता है। इस तरह के गेम्स या एक्टिविटीज़ के ज़रिये न केवल बच्चों का मनोरंजन होता है बल्कि इससे उनकी एकाग्रता (concentration) का स्तर भी बढ़ता है। और सबसे जरूरी-उनसे बातें कीजिए। उन्हें बताइए कि आप कहाँ जा रहे हैं, वहाँ क्या देखने को मिलेगा। इससे उनका उत्साह बढ़ता है और वे खुद को इस अनुभव का हिस्सा मानते हैं। साथ ही, इससे उनकी जिज्ञासा भी बढ़ती है, जिसकी शांति वे भ्रमण के दौरान करते हैं। होटल का चुनाव ‎इसके अलावा, होटल चुनते समय भी देखें कि वह बच्चों के अनुकूल है या नहीं। वह इलाका कैसा है, वहाँ खान पान की सुविधा कैसी है, तथा थोड़ी खुली जगह है या नहीं इत्यादि। अतः होटल भी बच्चों के अनुसार होना चाहिए । इसलिए अगली बार जब आप बच्चों के साथ निकलें, तो घबराएँ नहीं — बस थोड़ा सोच समझकर एक अच्छी यात्रा प्लैन करें। और बच्चों के साथ स्वयं भी बच्चे बनकर यात्रा का लुत्फ़ उठाएँ। यात्रा अपने आप आसान हो जाएगी।‎