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पंजाब के लिए बैसाखी क्यों रखती है इतनी अहमियत? जानें रोचक बातें!

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पंजाब की खूबसूरत धरती पर जब अप्रैल का महीना आता है, तो हवा में एक अलग ही सुकून छा जाता है। बैसाखी का उत्सव वास्तव में इसी सुकून का प्रतीक है। यह त्यौहार न केवल फसल कटाई का जश्न है, बल्कि सिख इतिहास की एक घटना से भी जुड़ा हुआ है। बैसाखी को वैशाखी भी कहा जाता है, जो हिंदू सौर कैलेंडर के वैशाख महीने की पहली तारीख को मनाया जाता है। और यह 13 या 14 अप्रैल को आता है। देखा जाए तो, बैसाखी की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह त्यौहार सदियों पुराना है। पहले यह मुख्य रूप से किसानों का उत्सव हुआ करता था। किसानों की मेहनत और फसल कटाई का जश्न उत्सव के दौरान पंजाब के खेतों में रबी की फसलें तैयार हो जाती हैं। किसान अपनी मेहनत का फल पाकर खुशी महसूस कर रहे होते हैं। वे देवताओं को धन्यवाद देते हैं। लेकिन 1699 में यह त्यौहार और भी मनमोहक हो गया था। जब आनंदपुर साहिब में दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने पंज प्यारों को अमृत चखाया और सिखों को एकजुट किया। यह घटना बैसाखी के दिन ही हुई थी। गुरु जी ने कहा कि सिख समुदाय को अपनी रक्षा खुद करनी होगी। इस तरह, बैसाखी सिखों के लिए नया साल और साहस का प्रतीक बन गया। सिख इतिहास और बैसाखी का रिश्ता इस समय आनंदपुर साहिब के मैदान में हजारों सिख इकट्ठे हुए थे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने तंबू से खून से सनी तलवार निकाली। उन्होंने पूछा, कौन अपना सिर देगा? एक के बाद एक पांच सिख आगे आए। यह दृश्य कितना अद्भुत रहा होगा सोचकर हैरानी होती है। जहां हिम्मत और विश्वास की ज्योति जली होगी। तभी खालसा का जन्म हुआ, जो जाति-पाति से परे था। यह घटना बैसाखी को हमेशा के लिए अमर कर गई। झारखंड से लेकर पंजाब तक, बैसाखी की कहानी सबको आकर्षित करती है। यह त्यौहार गुरु अमर दास जी के समय से मनाया जाता है। वे चाहते थे कि सिख एकजुट हों। और फिर बैसाखी ने उन्हें जोड़ा भी। आज भी, यह उत्सव पंजाबी नये साल की शुरुआत के रूप में मनाते हैं। अद्भुत दृश्य बनता है जब किसान खेतों में सरसों के फूलों के बीच नाचते हैं। असल में यह इतिहास की मनमोहक गाथा है, जो हर साल दोहराई जाती है। वैसे बैसाखी हमें सिखाती है कि मेहनत और विश्वास से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। हकीकत है यह त्यौहार सुकून देता है, क्योंकि यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। पंजाब के गांवों में बैसाखी की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है। किसान अपने खेतों को सजाते हैं। महिलाएं नए कपड़े सिलवाती हैं। उत्सव ऊर्जा से भरा होता है। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड भी बैसाखी के दिन ही हुआ था, जो स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दे गया। यह दुखद घटना भी बैसाखी की महत्ता को बढ़ाती है। यह त्यौहार इतिहास की किताबों से निकलकर जीवंत हो जाता है। जब बैसाखी आती है। बैसाखी का उत्सव पंजाब की सबसे मनभावक रौनक क्यों माना जाता है? जब सुबह की पहली किरणें खेतों पर पड़ती हैं, तो हवा में गेहूं की खुशबू फैल जाती है। लोग सुबह जल्दी उठते हैं। नहा धोकर साफ कपड़े पहनते हैं। फिर गुरुद्वारों की ओर चल पड़ते हैं। स्वर्ण मंदिर में भजन कीर्तन की ध्वनि गूंजती है। लोग मत्था टेकते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह दृश्य खूबसूरत सपने जैसा लगता है। उत्सव की शुरुआत नगर कीर्तन से होती है। पंज प्यारे गुरु ग्रंथ साहिब जी की पालकी लेकर निकलते हैं। लोग पीछे चलते हैं। ढोल की थाप पर बधाई गाते जाते हैं। सड़कें रंग-बिरंगी हो जाती हैं। बच्चे फूल बरसाते हैं। और महिलाएं फुलकारी की चूनर ओढ़े खूब नाचती हैं। पुरुष पगड़ी बांधकर इसमें भाग लेते हैं। यह जुलूस ऊर्जा से भरा होता है। पंजाब के कई गांवों में मेला भी लगता है। वहां खाने के स्टॉल, खेल-तमाशे और हैन्डीक्राफ्ट बिकते हैं। बच्चे झूले झूलते हैं। युवा कुश्ती लड़ते हैं। वास्तव में यह मेला बेहद मनमोहक होता है। बैसाखी में भांगड़ा और गिद्दा नृत्य मुख्य हैं। भांगड़ा में पुरुष खूब नाचते हैं। और मनोरंजन करते हैं। गिद्दा में महिलाएं हाथों से ताल देते हुए थिरकती हुई नजर आती हैं। यह नृत्य फसल कटाई की खुशी दर्शाते हैं। पंजाब के अलावा, बैसाखी पूरे भारत में मनाया जाता है। असम में रोंगाली बिहू, बंगाल में पोइला बैसाख, तमिलनाडु में पुथांडु। हर जगह यह नया साल लाता है। लेकिन पंजाब में यह सबसे अलग लगता है। बैसाखी कैसे संभाले हुए है पंजाब की सांस्कृतिक विरासत? बैसाखी का सांस्कृतिक स्वरूप बेहद खास है। यह त्यौहार पंजाबी संस्कृति का आईना है। फसल कटाई के बाद किसान अपनी मेहनत का फल पाते हैं। वे खुशी से नाचते गाते हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। बैसाखी के इस उत्सव में पारंपरिक वेशभूषा का विशेष महत्व है। महिलाएं सलवार कमीज और फुलकारी की दुशाला पहनती हैं। फुलकारी की कढ़ाई बहुत खूबसूरत होती है। पुरुष कुर्ता पजामा और पगड़ी में सजते हैं। पगड़ी का रंग पीला या नारंगी होता है, जो कि फसल की याद दिलाता है। परंपराओं में लंगर सबसे मनभावक हिस्सा है। लंगर की परंपरा गुरुद्वारों में सबके लिए खाना बनता है। कोई भेदभाव नहीं होता है। लोग मिलकर खाते हैं। कढ़ा प्रसाद विशेष है। गेहूं के आटे, घी और चीनी से बनता है। इसका बहुत ही मजेदार होता है। फिर मीठे पीले चावल, सरसों का साग और मक्की की रोटी। ये व्यंजन नई फसल से बने होते हैं। किसान इन्हें बांटते हैं और सबको एकता की परंपरा सिखाते हैं। बैसाखी के मेले बहुत ही महत्व रखते हैं, वहां हस्तशिल्प, लोक संगीत और नाटक होते हैं जो सबको प्रेरित करते हैं। बच्चे खेलते हैं एवं युवा गटका प्रदर्शन करते हैं। गटका मार्शल आर्ट है, जो खालसा की हिम्मत दिखाता है। बैसाखी पंजाबी लोक कला को जीवित रखे हुए है यह कहते हुए मुझे कोई संकोच नहीं। भांगड़ा और गिद्दा न केवल पंजाब के नृत्य हैं, बल्कि नृत्य पंजाबी संस्कृति का हिस्सा हैं। पंजाब के अलावा यह त्यौहार अन्य राज्यों में भी मनाया जाता है। बिहार में वैशाखी, केरल में विशु। लेकिन पंजाब

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बाबर ने कहा था ग्वालियर के किले को ‘हिंद के किलों में मोती’, जानिए क्यों?

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ग्वालियर नाम सुनते ही संगीत की धुन मन में बजने लगती है। यह शहर मध्य प्रदेश का एक ऐसा शहर है जो इतिहास की किताबों से निकलकर हकीकत में सांस लेता है। यक़ीनन, यहां की हर गली, हर इमारत एक पुरानी कहानी बयां करती है। यदि इसके इतिहास को खंगाला जाए तो ग्वालियर की शुरुआत 8वीं शताब्दी से मानी जाती है, जब यह एक मजबूत किला था जो राजाओं की रक्षा करता था। समय के साथ यह शहर राजपूत, मुगल और मराठा शासकों का गढ़ बना। बाबर ने इसे हिंद के किलों में मोती कहा था, क्योंकि इसकी मजबूती और सुंदरता बेहिसाब थी। एक ऊंचे पहाड़ पर बसा किला जो दूर से ही आकर्षित करता है। आओ जानें ग्वालियर का इतिहास! ग्वालियर का नाम ग्वाल वर्ण के एक राजा से पड़ा, जिन्होंने इस जगह को बसाया था। यह शहर संगीत का भी घर है माना जाता है। क्योंकि तानसेन जैसे महान संगीतकार यहीं पैदा हुए हैं। यूनेस्को ने तो ग्वालियर को संगीत का रचनात्मक शहर भी घोषित किया है। यहां की हवा में अभी भी रागों की धुन गूंजती लगती है। शहर की सड़कें आज भी पुराने दिनों की याद दिलाती हैं। बाजारों में घूमते हुए लगता है, जैसे समय रुक गया हो। ग्वालियर में इतिहास और आधुनिकता सामंजस्य बेहद खास है। ग्वालियर की कहानी राजा मान सिंह तोमर से जुड़ी है, जिन्होंने 15वीं शताब्दी में शहर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उन्होंने किले को मजबूत किया और संगीत को बढ़ावा दिया। आज भी तानसेन संगीत समारोह में दुनिया भर के कलाकार यहां आते हैं। यह शहर इतिहास से प्रेम करने वालों के लिए बिल्कुल सही है। यहां घूमते हुए लगता है जैसे आप एक किताब के पन्नों में खो गए हों। सुरक्षा की दृष्टि से दी जाती है इस किले की मिसाल, क्यों ? ग्वालियर फोर्ट को देखते ही आनंद का एहसास होता है। यह किला शहर के ऊपर एक पहाड़ी पर बसा है, जो दूर से ही अपनी सुंदरता से लोगों को आकर्षित करता है। यह भारत के सबसे मजबूत किलों में से एक माना जाता है। किले का इतिहास 6वीं शताब्दी से है, लेकिन इसका मुख्य निर्माण तोमर राजाओं ने करवाया था ऐसा माना जाता है। यह किला 3 वर्ग किलोमीटर में फैला है और इसमें कई महल, मंदिर और तालाब भी मौजूद हैं। किले में घुसते ही हाथी पोल का स्वागत मिलता है। यह दरवाजा हाथियों से प्रेरित है। अंदर मन मंदिर महल है, जो राजा मान सिंह तोमर ने बनवाया था। इस महल की दीवारें कलरफुल टाइलों से सजी हैं, जो पीली, हरी और नीली रंगों के चित्र से सजी हुई हैं। हाथी, बाघ और मगरमच्छ जैसे जानवरों के चित्र देखकर लगता है जैसे कला जीवित हो उठी हो। यह महल, चित्र मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। फिर गुजरी महल आता है, जो राजा की पत्नी मृगनयनी के लिए बनाया गया था। यह महल गुजरी शैली में है और अब पुरातत्व संग्रहालय का हिस्सा है। यहां पर आज कई देखने लायक प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां भी मौजूद हैं। भारत की मोना लीसा? एक मूर्ति शालभंजिका को भारत की मोना लीसा कहा जाता है। किले में तेली का मंदिर भी है, जो 11वीं शताब्दी का है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी ऊंचाई 100 फीट के लगभग है। मंदिर की नक्काशी तो लाजवाब ही है। गोपचल पर्वत पर जैन तीर्थंकरों की चट्टान काटकर मूर्तियां बनाई गईं हैं। यहां सबसे बड़ी मूर्ति पार्श्वनाथ की है, जो दुनिया की सबसे बड़ी एक ही पत्थर से बनी मूर्ति है। अद्भुत मंदिर जो हमेशा चर्चा का विषय बनता है सास बहू मंदिर भी इसी किले में हैं। ये 11वीं शताब्दी के हैं और विष्णु को समर्पित माने जाते हैं। नाम सास बहू नहीं, सहस्रबाहु से आया है। वास्तव में मंदिरों की नक्काशी बहुत ही मनमोहक है। शाम को किले में लाइट एंड साउंड शो होता है। जिसमें अमिताभ बच्चन की आवाज में इतिहास की कहानियां सुनाई जाती हैं। यह शो किले को सिनेमाघरों के जैसा बना देता है। किले की दीवारें तो मानो समय की कहानियां बयां करती सी प्रतीत होती हैं। ग्वालियर के महल के अंदर का नजारा देख, चौंक उठेंगे आप! ग्वालियर के महल इतने हसीन हैं कि देखते ही दिल जीत लेते हैं। सबसे खास है जय विलास पैलेस, जो आज सिंधिया परिवार का घर है। यह 19वीं शताब्दी में बना और अब इसका आधा हिस्सा संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। पैलेस में टस्कन, इतालवी और कोरिंथियन शैली का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है। अंदर दुनिया का सबसे बड़ा झाड़ फानूस मौजूद है, जो 250 बल्बों से चमकता है। राजा ने इसे वर्साय पैलेस से प्रेरित होकर बनवाया था। संग्रहालय में प्राचीन हथियार, तस्वीरें और सिंधिया परिवार की कहानियां हैं। एक कमरा तो पूरी तरह सोने से सजा हुआ है। यह पैलेस राजसी वैभव की झलक देता है। जो वास्तव में, यहां घूमना सपने साकार करने जैसा है। शाहजहां महल.. इसके बाद आते हैं शाहजहां महल पर, जो मुगल शैली में बना हुआ है। यह जय विलास के पास ही है जो सिंधिया राजाओं का ही था। किले में जहांगीर महल भी देखने को मिलता है, जो शेर शाह सूरी ने बनवाया था। बाद में जहांगीर ने इसे नया रूप दिया। महल की बालकनियां और मेहराबें बहुत ही खूबसूरत हैं। इस किले का करण महल तोमर राजा किर्ति सिंह का है। और विक्रम महल शिव मंदिर था, जो विक्रमादित्य सिंह ने बनवाया। ये महल राजाओं की जिंदगी की कहानियां बयां करते हैं। यहां की दीवारों पर चित्र बने हैं जो संगीत और नृत्य दिखाते हैं। ग्वालियर संगीत का शहर है, इसलिए महलों में राग रागिनी के चित्र हैं आप खूब देख पाएंगे। यह दुनिया पर्यटकों को नया एहसास देती है। महलों में घूमते हुए लगता है जैसे आप स्वयं ही राजा बन गए हों। सुकून भरी शामें यहां बिताना तकरीबन जन्नत के जैसा महसूस कराती हैं। इतिहास के साथ अध्यात्म का मनोरम स्थल है ग्वालियर ग्वालियर के मंदिर इतने मनभावक हैं कि देखकर आस्था जाग उठती है। सास बहू मंदिर किले में ही हैं। ये 11वीं शताब्दी के हैं और लाल बलुआ पत्थर से बने हैं। मंदिरों की

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Sweets of India- Jalebi’s Radiance to Jaggery’s Rustic Heart!

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The roads of India serve not only as routes for trade and culture but also as hubs for creativity. Nowhere else does food become such a vibrant expression of daily life as it does in the backstreets of Indian cities and towns. Among the diverse options, sweets occupy a unique significance. From the twisted crunch of jalebi to the rich taste of jaggery, the streets of India narrate tales that are enveloped in sugar, syrup, and nostalgia. To grasp the essence of these sweets is to delve into India’s history, celebrations, and collective palate. Historical Roots of Indian Street Sweets The presence of sweets in Indian streets is not a recent phenomenon. Ancient texts mention preparations made with jaggery, honey, and grains. Jalebi is believed to have originated in the Middle East and gradually adapted to local taste over the centuries. What began in royal kitchens and temple offerings eventually found its way into the hands of street vendors. The street became the most democratic space for sweets. Royal desserts could be enjoyed by the common people once adapted for roadside stalls. Over time, these sweets became inseparable from the identity of Indian towns and cities. Jalebi The Golden Spiral of Celebration No Indian wedding or festival feels complete without jalebi. Its golden spiral fried in ghee and dipped in sugar syrup has become a symbol of joy. Street vendors prepare it fresh in the morning and evening, filling markets with the fragrance of sizzling batter. The popularity of jalebi lies in its dual character. It is crisp on the outside and soft within. It pairs equally well with milk in the north and fafda in Gujarat. For children, it is a treat after school. For adults, it is nostalgia served hot. Jalebi is not just food. It is performance. Watching a vendor pour the batter in perfect spirals is itself an art. This performance attracts passersby, who often cannot resist buying a plate. Jaggery The Rustic Sweetener of the People If jalebi represents celebration, jaggery represents everyday sweetness. Known locally as gur, jaggery is unrefined sugar made from sugarcane or palm sap. For centuries, it has been part of rural diets as a natural source of energy. On Indian streets, jaggery takes many forms. It is molded into blocks sold in weekly markets, shaped into candies for children, or mixed with sesame seeds to form til-gud during winter festivals. The charm of jaggery lies in its simplicity. It connects people to the soil and the rhythm of agriculture. It is seasonal, earthy, and deeply rooted in the idea of sustenance. Unlike refined sugar, it carries the fragrance of fields and the warmth of tradition. Street Sweets as Markers of Festivals Festivals in India are incomplete without sweets. On Diwali, lanes glow with shops selling laddus and barfis. During Eid, sheer khurma and sevaiyaan occupy stalls. Sankranti and Lohri see til-jaggery sweets exchanged as symbols of warmth. People cannot imagine Holi without gujiyas stuffed with khoya. Families eat these sweets and share them with loved ones. They become a language of community bonding. A neighbour offering a plate of jalebi or a family distributing gur during harvest symbolizes trust and joy. The street is the stage where this exchange becomes visible and inclusive. The Economics of Street Sweets Street sweets also tell an economic story. They are affordable, widely available, and suited for mass consumption. A few rupees can buy a piece of jalebi or a lump of jaggery. This accessibility makes them democratic. Unlike luxury desserts, they do not belong to a privileged class. Vendors depend on these sweets for daily income. For many small businesses, jalebi and jaggery are lifelines. Their stalls require limited investment and ensure steady demand. This cycle sustains thousands of families across cities and villages. Regional Variations and Local Identity Every region of India has its own identity sweets that dominate local streets. In Bengal, rasgulla and sandesh define the sweet tooth. In Maharashtra, pedha and puran poli make appearances during festivals and In the south, Mysore pak and payasam fill streets with rich aromas. Yet jalebi and jaggery remain the threads that connect all regions. Regional variations reflect geography and culture. In cold northern winters, hot jalebis provide comfort. In tropical belts, jaggery-based sweets cool the body. This balance between regional identity and national connection makes Indian street sweets extraordinary. Sweets as Emotional Anchors Food becomes memorable when tied to emotions. For many Indians, jalebi is linked to childhood mornings, when parents bought them as Sunday treats. For rural children, jaggery is associated with visits to the local haat. These simple memories keep people connected to their roots even when they move to cities or abroad. Street sweets thus become more than taste. They become symbols of belonging and comfort. Eating jalebi in a crowded market or chewing on a lump of jaggery in winter is as much about emotion as it is about sugar. Modern Transformations and Challenges With changing times, street sweets face new challenges. Concerns about hygiene and adulteration affect consumer trust. At the same time, fusion desserts and branded sweet chains compete for attention. Jalebi has seen reinventions such as chocolate-coated versions. Jaggery has entered urban markets as “organic sugar substitute.” Yet the core charm remains. The authenticity of eating jalebi hot from a kadhai or buying fresh jaggery from a street vendor cannot be replaced by packaged goods. The challenge lies in balancing tradition with safety and innovation. Why Jalebi and Jaggery Still Matter Despite globalization and changing lifestyles, jalebi and jaggery hold strong positions in Indian streets. They are affordable, rooted in history, emotionally meaningful, and adaptable. They connect rural with urban, past with present, and tradition with innovation. Their presence in the streets is proof that food is not just nutrition. It is also a story, a celebration, and a marker of identity. The Lasting Sweetness of Indian Streets! The streets of India are alive with colours, sounds, and fragrances. Among them, the sweet aroma

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अप्पम-स्टू: लजीज इतना कि पढ़कर ही मुंह में पानी आ जाएगा! Appam Stew

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केरल में खाए जाने वाले व्यंजन- अप्पम का नाम तो आपने सुना ही होगा लेकिन आज जानिए अप्पम-स्टू के बारे में। बहुत बार आपने ये तीन शब्द जरुर सुने होंगे कि मनुष्य की मूलभूत जरूरत रोटी, कपड़ा, और मकान है। इनमें से दो चीजें कपड़ा और मकान न हों तो चल भी सकता है, व्यक्ति इसके बगैर गुजर बसर कर सकता है। लेकिन खाने के बगैर इंसान का जीवित रह पाना, इसकी कल्पना भी करना असंभव सा महसूस होता है। हालांकि कपड़ा और मकान भी इंसान की अहम जरूरतों का हिस्सा हैं, लेकिन जब इंसानों ने इन चीजों का इस्तेमाल करना नहीं सीखा था, तब भी वे इस पृथ्वी पर सरवाइव कर पा रहे थे। लेकिन बिना आहार के जिंदा रह पाना संभव नहीं था। न ही आज संभव है। खैर, आज मनुष्य के पास कई तरह के संसाधन मौजूद हैं। वह कई तरह से बना सकता है, खा सकता है। आज हमारे खाने में कई तरह के नए-नए पकवान शामिल हो चुके हैं। वैसे भारत विविधताओं का देश है, अनेक भाषाएं, संस्कृतियां इस देश का गौरव है। यही भाव एवं विविधताएं इस देश को अन्य देशों, जिनमें हमारे पड़ोसी और दूसरी दुनिया के देशों से हमें अलग बनाती है। विविधताओं से भरपूर, मेरा भारत देश महान! इस देश में पहनावे और रंग-रूप में तो विविधता है ही लेकिन यहाँ के भोजन में जो विविधता है, वह अद्भुत है, स्वाद के लिहाज से या संस्कृति से लिहाज से यह हमारी भारतीय पहचान का अभिन्न हिस्सा है। इस विविधता से होता यह है की खुद की संस्कृति के अलावा हम दूसरी संस्कृति को परख सकते हैं। चाहे वह भोजन के रूप में हो या फिर पोशाक के रूप में। खाने की विविधता के चलते हम अपने स्वाद का दायरा बढ़ा सकते हैं। आज हम ऐसे ही एक स्वादिष्ट भोजन की बात करने वाले हैं। जो एक बार चखने पर ही किसी को भी अपने स्वाद का मुरीद बना सकता है। भारत के एक खूबसूरत राज्य केरल में इसका शुभारंभ हुआ और आज अलावा केरल के पूरे देश में इसके चाहने वाले हैं। जिसने इस लजीज डिस को नहीं चखा, शायद उसने केरल की संस्कृति को नहीं पहचाना। केरल के इस जाने-माने व्यंजन का नाम “अप्पम-स्टू” है। स्वाद से मजबूत, मुह में डालो तो मिश्री सी घुले, खाने में एकदम लाजबाब चाहे नास्ते में शामिल करो या फिर सुबह के खाने में। वैसे यह व्यंजन विशेष रूप से नास्ते के लिए ही बनाया जाता है। इसकी भूमिका कहीं भी हो चाहे नास्ते में हो या फिर हो ब्रेकफ़ास्ट में। लेकिन स्वाद का जबरदस्त है केरल का यह प्रसिद्ध व्यंजन अप्पम-स्टू। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है, एक बार आप भी आजमाइये, मुरीद न हुए तो फिर कहना। बाद में खा भी लेना, पहले अप्पम-इष्टू की विकास यात्रा तो जानो! निश्चित तौर पर इसके विकास में तयशुदा कोई तारीख नहीं है, हम बता पाने में असमर्थ हैं। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है की इसका विकास केरल और तमिलनाडु के दक्षिणवर्ती इलाकों में हुआ है। अप्पम इष्टू का विकास समय की घड़ी के साथ होता गया और आज हमें इसमें कई-कई तरह के बदलाव भी देखने को मिलते हैं। अप्पम के साथ इष्टू की जगह आज नॉन वेज इष्टू, ऐग इष्टू, मटन इष्टू आदि ने ले ली है। दरअसल कई तरह से इष्टू को तैयार किया जाने लगा है। हालांकि अप्पम में ज्यादा बदलावों की गुंजाइश नहीं है क्योंकि यह बिल्कुल मलाई, और मक्खन के जैसे प्रतीत होता है और इसमें हुए बदलावों को चिह्नित कर पाना भी बमुश्किल है। ये दिखता कैसा होगा? रोटी के भांति दिखने वाला अप्पम, वास्तव में होता तो रोटी की आकृति जैसा ही है लेकिन इसकी रेसेपी बहुत अलग है और विशेष भी। मात्र आकृति से किसी चीज की तुलना करना भी तो ठीक नहीं है। क्या कहते हो? वैसे इसकी रेसेपी में, चावल का आटा, नारियल का दूध, चीनी, नमक और पानी का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ जब इष्टू बनाने के लिए जायका लगता है, उसकी सुगंध से पूरा घर महक उठता है। इसको तैयार करना बड़ा दुर्लभ है, कभी आप प्रयास कीजिए बने तो ठीक है, नहीं तो ज़ोमेटो, ब्लिंकिट पर भी मिल जाएगा। ऑर्डर कीजिए और मजे लीजिए इसके लबाबदार स्वाद का। थोड़ा सा नमकीनी, बस थोड़ा सा मलाईदार। सोचना क्या है? सोचते तो वे लोग हैं, जो बिना खाए रहते हैं, जोक्स अपार्ट। बिना खाए भले कौन ही जीवित रहता है। कहने का बस इतना सा अर्थ है की कभी केरल के इस पारंपरिक नास्ते को भी आजमाइए। इसके मनोरम स्वाद के साक्षी बनिए। अब ऐसा है की केरल में तो नारियल वैसे ही है जैसे बरसात में मेंढक। मतलब हर दो कदम पर नारियल का पेड़। इसीलिए हर घर में, प्रत्येक व्यंजन में कहीं न कहीं किसी न किसी बहाने से घोल दिया जाता है। इधर ही देख लो, नमूना पेश है। अप्पम में भी नारियल का उपयोग और इष्टू में भी। क्या रोचक बात है, नई। हर जगह बस नारियल ही नारियल। यहां तक आ ही गए हो, तो थोड़ा विस्तार से जानिए! अप्पम वास्तव में एक तरह का पतला, मुलायम सा और फूला हुआ चावल का पैनकेक है, जो आमतौर पर कड़ाही के आकार की गहरी तली में पकाया जाता है। इसके किनारे कुरकुरे होते हैं, जबकि बीच में मोटा और मलाईदार होने के कारण नरम और स्पंजी होता है। जैसा की मैने पहले बताया, इसे बनाने के लिए चावल और नारियल को भिगोकर पीसा जाता है, सिलबट्टे से नहीं अब तो मिक्सी, और गिरेंडर आ गया है। हाँ, लेकिन बहुत जगह अभी भी सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता है, आप चाहें तो अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। पीसने के बाद इस घोल को रातभर खमीर उठाने के लिए छोड़ दिया जाता है। अगली सुबह जब यह खमीर उठ जाता है, तो इसे धीमी आंच पर कड़ाही में पकाया जाता है। बिल्कुल पराठे के जैसे। खाने की बात करूंगा तो, आपका मन करने लगेगा लेकिन फिर भी बता देता हूँ। अप्पम खाने में हल्का, सुपाच्य और बेहद लजीज होता है। यह दिखने में जितना आकर्षक होता है, कसम से उतना ही खाने में

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किताबें बदल सकती हैं आपका जीवन! लेकिन शुरू कैसे करें? पढ़ें और जानें!

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किताबें सिर्फ कागज के पन्ने नहीं, बल्कि एक ऐसी दुनिया हैं जो हमें नई जगहों, नई कहानियों और नई सोच तक ले जाती हैं। पढ़ने की रुचि एक ऐसा शौक है जो मन को सुकून देता है और आत्मा को तृप्त करता है। यह एक ऐसी जुस्तजू है जो कभी खत्म नहीं होती। चाहे आप किसी रोमांचक उपन्यास में डूब जाएं या इतिहास की किताबों में खो जाएं, हर पन्ना कुछ न कुछ नया सिखाता है। किताबें हमें अनुभव देती हैं, और सोचिए बिना कहीं गए ही। जब हम छोटे थे, तो कहानियों की किताबें हमें जन्नत जैसी दुनिया में ले जाती थीं। राजकुमार, परियां, जंगल और जादू ये सब किताबों के पन्नों में जीवित से हो उठते थे। बडों के लिए भी किताबें उतनी ही आवश्यक हैं जितनी की युवाओं के लिए। एक अच्छी किताब आपको अपने व्यस्त जीवन से निकालकर कहीं और ले जाती है। यह एक ऐसी यात्रा है जो मनभावक होती है। जो सुकून की दास्तां कहती है। किताबें उम्र की मोहताज नहीं .. किताबों का जादू यह है कि वे हर उम्र के लिए हैं। बच्चे, युवा, बूढे सबके लिए कुछ न कुछ है। एक किताब आपको हंसाती है, रुलाती है, सोचने पर मजबूर करती है। यह आपको दूसरों के जीवन में झांकने का मौका देती है। उदाहरण के लिए, एक उपन्यास आपको किसी अनजान शहर में ले जा सकता है। एक आत्मकथा आपको किसी की जिंदगी की सैर कराती है। किताबें समय की सरपट दौड में सुकून का ठिकाना हैं। आज की डिजिटल दुनिया में किताबों की अहमियत और बढ़ गई है। स्क्रीन पर घंटों बिताने के बाद, किताबों की दुनिया में खो जाना एक ताजा हवा के झोंके जैसा है। यकीनन, पढ़ने की रुचि न सिर्फ मनोरंजन करती है, बल्कि दिमाग को तेज तर्रार बनाती है पढ़ने की आदत डालिए- छोटे कदम, बड़ी यात्रा शुरू कीजिए पढ़ने की रुचि पैदा करना आसान है, अगर आप छोटे कदम उठाएं। कई लोग सोचते हैं कि किताबें पढ़ना समय की बर्बादी है, लेकिन यह गलत है। पढ़ना एक ऐसी आदत है जो जीवन को अर्थपूर्ण बनाती है। अगर आप नई किताब शुरू करने से डरते हैं, तो छोटी और हल्की किताबों से शुरुआत करें। जैसे, बच्चों की कहानियां या मजेदार उपन्यास। ये किताबें मनमोहक होती हैं और आपको पढ़ने की ललक जगाती हैं। पहला कदम है अपनी रुचि की किताब चुनना। अगर आपको इतिहास पसंद है, तो इतिहास की किताब लें। अगर रोमांच पसंद है, तो रहस्यमयी उपन्यास चुनें। किताबों की दुनिया में हर किसी के लिए कुछ न कुछ है। उदाहरण के लिए, अगर आपको सैर करना पसंद है, तो यात्रा वृतांत पढ़ें। अगर खाना बनाना पसंद है, तो रेसिपी किताबें लें। धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय.. शुरुआत में कम समय दें। रोज 10 पेज पढें। धीरे धीरे यह आदत बनेगी। एक बार मैंने एक दोस्त को सलाह दी कि वह हर रात सोने से पहले 10 मिनट पढ़े। उसने एक मजेदार उपन्यास लिया और कुछ ही हफ्तों में वह किताबों का दीवाना हो गया। उसने कहा, “पढ़ना तो जन्नत में घूमने जैसा है!” पढ़ने का समय और जगह चुनें। सुकून भरी जगह, जैसे खिडकी के पास या बगीचे में, पढ़ने को और मजेदार बनाती है। अगर आप व्यस्त हैं, तो बस में या ट्रेन में पढ़ें। किताबें आपका साथी बन जाएंगी। यकीनन, छोटे कदम आपको पढने की बडी यात्रा पर ले जाएंगे। अब हम देखेंगे कि पढ़ना दिमाग और दिल को कैसे फायदा देता है। जीवन की सैर घर बैठे ही करनी है, तो किताबों की दुनिया में आइए किताबें पढ़ना सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि दिमाग और दिल के लिए दवा है। यह एक ऐसी आदत है जो आपको बेहिसाब फायदे देती है। सबसे पहला फायदा है दिमाग की कसरत। जब आप पढ़ते हैं, तो दिमाग नई बातें सीखता है। यह आपकी याददाश्त और सोचने की ताकत को बढाता है। एक किताब आपको नई दुनिया में ले जाती है, जहां आपकी कल्पना चारों दिशाओं में समान पहुँच बनाती है। पढ़ना तनाव कम करता है। एक अच्छी किताब आपको रोजमर्रा की चिंताओं से दूर ले जाती है। उदाहरण के लिए, एक रोमांचक कहानी पढ़ते समय आप अपने ऑफिस की टेंशन भूल जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि पढ़ना आपके दिमाग को शांत करता है, जैसे ध्यान करना। किताबें आपको दूसरों के जीवन को समझने में मदद करती हैं। एक उपन्यास में किरदारों की भावनाएं पढकर आप सहानुभूति सीखते हैं। यह आपको बेहतर इंसान बनाता है। जैसे, एक किताब में गरीब परिवार की कहानी पढकर आप उनकी मुश्किलें समझते हैं। यह आपके दिल को बडा करता है। पढ़ना आपको नई भाषा और शब्द सिखाता है। अगर आप रोज पढ़ते हैं, तो आपकी बोलचाल बेहतर होती है। आप ज्यादा आत्मविश्वास से बात करते हैं। यकीनन, किताबें आपके दिमाग और दिल को निखारती हैं। यह एक ऐसी आदत है जो जीवन को मनमोहक बनाती है। सही किताब का चयन करना अपनी जुस्तजू को रास्ता देने जैसा है किताब चुनना एक कला है। सही किताब आपकी रुचि को जगा सकती है, जबकि गलत किताब आपको बोर कर देगी। अपनी रुचि को समझें। अगर आपको रहस्य पसंद है, तो अगाथा क्रिस्टी की किताबें लें। अगर आपको हंसी मजाक पसंद है, तो आर के नारायण की कहानियां पढ़ें। यह चयन आपकी पढ़ने की यात्रा को पुख्ता बनाता है। पहले किताब का कवर देखें। हां, यह पुरानी कहावत है कि किताब को कवर से मत आंकें, लेकिन एक रंगीन कवर आपको आकर्षित करता है। किताब का पहला पन्ना पढ़ें। अगर वह आपको खींचे, तो वह आपके लिए है। मैंने एक बार एक किताब का पहला पन्ना पढ़ा और रात भर में उसे खत्म भी कर दिया। यह अनुभव बहुत ही उम्दा था। लाइब्रेरी या किताब की दुकान में समय बिताएं। अलग अलग तरह की किताबें देखें। अगर आप डिजिटल किताबें पसंद करते हैं, तो किंडल या ऑडिबल जैसे ऐप्स ट्राई करें। ऑडियो किताबें भी मजेदार होती हैं उनको भी आप ट्राई कर सकते हैं। और आप काम करते हुए भी सुन सकते हैं। सोशल मीडिया पर किताबों के समूह जॉइन करें। वहां लोग अपनी पसंद शेयर करते हैं। किताब चुनना एक अलग ही अनुभव है। सही किताब आपके

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नीलमपेरूर पदयानी- ऐसा भी कोई त्यौहार होता है? पढ़ें और जानें!

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केरल की हरी भरी वादियों में बसा नीलमपेरूर गांव एक ऐसा नाम है जो हर साल चिंगम महीने में खुशियों से भर जाता है। यहां का पदयानी उत्सव खूबसूरती की बहार लेकर आता है। यह उत्सव नीलमपेरूर पल्ली भगवती मंदिर में मनाया जाता है, जो अलप्पुझा जिले के कुट्टनाड तालुक में है। यह मंदिर 1700 साल पुराना है, और उत्सव की जडें तीसरी या चौथी सदी तक ले जाती हैं। जब रात को हम सो रहे होते हैं, तभी रात के दस बजे एक अजीब सी आवाजें सुनने को मिलती हैं। गांव की शांति टूटती है, में एक आवाज़ में लोग चिल्लाते हैं हूयोह! और यह आवाज उत्सव की शुरुआत का संकेत होता है। नीलमपेरूर पदयानी का जन्म चेरा राजा चेरामन पेरुमल से जुडा है। कथा है कि राजा बौद्ध धर्म के समर्थक थे। हिंदू लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन उन्होंने मंदिर में आकर पदयानी की शुरुआत की। यह उत्सव हिंदू और बौद्ध संस्कृति का सुंदर सा संगम है। प्रसिद्ध चीनी यात्री फा-हियान ने इसे पटना के बौद्ध उत्सव से मिलता जुलता बताया है। यह पदयानी केरल के अन्य पदयानी से अलग है, क्योंकि यहां कोलम यानी की मूर्तियां बनाई जाती हैं। 16 दिन का भव्य उत्सव वैसे यह उत्सव 16 दिनों का होता है। और पदयानी का मतलब है पैदल सैनिकों की पंक्ति। लोग सैनिकों की तरह लाइन बनाकर नाचते हैं। यह उत्सव प्रकृति, कृषि और देवी की पूजा का बहुत बड़ा प्रतीक माना जाता है। सभी गांव वाले इस उत्सव के लिए महीनों पहले तैयारी करते हैं। वे मूर्तियां बनाते हैं, जो जानवरों, देवताओं और राक्षसों को दर्शाती हैं। यह रहस्यमई शुरुआत हमें ले जाती है, एक ऐसी दुनिया में जहां कला और आस्था का अद्भुत मेल होता है। नीलमपेरूर गांव बेहद शांत है, लेकिन उत्सव के दौरान बेहिसाब रौनक छा जाती है। जो पूरे गांव को एक चमचमाता द्वीप बना देता है। लोग दूर-दूर से यहां आते हैं। सच में सच्चाई तो यह है की यह उत्सव केरल की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखता है। यह हमें सिखाता है कि पुरानी परंपराएं आज भी सुकून और रोचकता से भर देती हैं। उत्सव की शुरुआत से ही मन मोह लिया सा जाता है। रस्मों में छिपी है, प्रकृति के रहस्यों की रोचक बातें! दरअसल, नीलमपेरूर पदयानी की रस्में आकर्षक हैं। उत्सव की शुरुआत चूट्टुवेयप्पू से होती है। पहले तीन दिनों में सूखे नारियल के पत्तों को बांधकर मशालें बनाई जाती हैं। फिर रात दस बजे मंदिर के पश्चिम में चेरामन पेरुमल की प्रतीकात्मक अनुमति ली जाती है। फिर मशालें जलाकर मंदिर के चारों ओर परिक्रमा की जाती है। लोग चिल्लाते हैं कोहू और हूयोह! यह आवाज गांव की शांति को तोड देती है। मशालों की रोशनी में चेहरे चमक उठते हैं। यह दृश्य बहुत ही रोमांचक लगता है।इसके बाद चौथे दिन से कोलम बनाना शुरू होता है। कोलम महाभारत की कहानी से जुड़े होते हैं। इसमें मुख्य रूप से भिमा की खोज की कहानी को दर्शाया जाता है। पहले चार दिनों में कुदापदयानी होती है। जिसमें नारियल के डंठल से छत्रियां बनाई जाती हैं, जो फूलों से सजी होती हैं। अगले चार दिनों में जैकफ्रूट के पत्तों से मूर्तियां बनाई जाती हैं। और इनकी खास बात यह है की ये मूर्तियां हरा भरा रंग लिए होती हैं। बारहवें दिन के बाद नारियल के डंठल या केले के तने से मूर्तियां बनाई जाती हैं। यह मूर्तियाँ बनते देखना सौभाग्य की बात होती है। थोताकाली और वेलाकाली का आकर्षण उत्सव की इन रस्मों में कुदम पूजा काली, थोताकाली और वेलाकाली भी शामिल हैं। थोताकाली में आग के सामने नृत्य किया जाता है, जो डरावना तो होता ही है लेकिन इसमें संस्कृति के बहुत से राज छिपे होते हैं। ढोल की थाप पर लोग थिरकते लोग देखकर मन चंगा हो जाता है। अब आता है सबसे खास प्रदर्शन वेलाकाली। वेलाकाली में तलवारों का नृत्य होता है जो देखने लायक बनता है। प्लाविला नीरथु और कुदा नीरथु जैसे नृत्य भी इस उत्सव में शामिल होते हैं जो इस उत्सव का खास हिस्सा होते हैं। ये रस्में विशेष रूप से आदिवासी और द्रविड परंपराओं से जुड़ी हैं। और इसमें बलि भी दी जाती है, लेकिन यह सब देवी को प्रसन्न करने के लिए होता है। पदयानी की रस्में तो शानदार हैं ही। पर वे कला, संगीत और नृत्य का मेल भी हैं। उत्सव में लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं, जो सुंदरता के सभी पैमाने तोड़ देते हैं। महिलाएं रंग बिरंगी साड़ियां पहनती हैं। पुरुष धोती और ऊपरी वस्त्र। यह सब देखकर मनभावक लगता है। रस्में हमें बहुत कुछ सिखाती हैं और अपने अतीत की याद दिलाती हैं, और पुरानी परंपराओं की भी। यह उत्सव केरल की सादगी को दर्शाता है। अब हम कोलम की दुनिया में जाते हैं। कोलम उत्सव का समागम इस उत्सव में चार चांद लगाता है नीलमपेरूर पदयानी का सबसे मनमोहक हिस्सा कोलम हैं। ये मूर्तियां केट्टु पदयानी कहलाती हैं। कोलम जानवरों, देवताओं और राक्षसों को दर्शाती हैं। मुख्य कोलम हैं हंस, हाथी, भिमा, रावण, और इसके अलावा यक्षी। हंस सबसे खास हैं, इन्हें अन्नम कहते हैं। विशाल हंस 45 फीट ऊंचे तक होते हैं। इन्हें केले के तने और नारियल के पत्तों से बनाया जाता है। और फूलों से सजाया जाता है। कोलम बनाने में कलाकारों की कारीगरी कमाल की है यह कलाकारी आप इस उत्सव के अलावा काही और नहीं देख पाएंगे। इसे बनाने में वे जैकफ्रूट के पत्तों, नारियल के डंठल और केले के तने का इस्तेमाल करते हैं। हर कोलम में महाभारत की कहानी छिपी हुई मानी जाती है। जैसे एक कहानी भिमा, सौम्य फूल की खोज की कथा है। पहले दिन छोटे कोलम, फिर बड़े। अंतिम दिनों में विशाल हंस आते हैं। जो इस पूरे उत्सव का दिल जीत लेते हैं। सामूहिक प्रयास और संस्कृति की झलक इस तरह से दर्शाया जाता है की हंस कोलम देखकर यकायक आश्चर्य में हम चले जाते हैं। वे मंदिर के मैदान में नाचते हुए आते हैं। ढोल की थाप पर थिरकते हुए दिखाई पढ़ते हैं। लोग चिल्लाते हैं, और यह दृश्य मनमोहक होते जाता है। अन्य कोलम जैसे रावण का डरावना रूप, यक्षी का रहस्यमयी चेहरा। हाथी कोलम शक्ति का प्रतीक। ये कोलम कृषि और प्रकृति

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झारखंड का सरहुल उत्सव सिखाता है प्रकृति से प्रेम करना, जानिए कैसे?

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झारखंड एक बेहद खूबसूरत प्रदेश है। इसी खूबसूरत प्रदेश में एक ऐसा त्यौहार है जिसका प्रकृति के साथ गहरा नाता है। सरहुल नाम का यह उत्सव आदिवासी समुदायों का सबसे बडा जश्न है। और यह चैत्र महीने में मनाया जाता है, जब साल के पेडों पर नई कोपलें फूटती हैं। सरहुल का मतलब है साल पेड़ की पूजा। यह त्यौहार आदिवासी जनजातियों के लिए नया साल की शुरुआत माना जाता है। इसे खुशी, समृद्धि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक कहा जाता है। सरहुल की जड़ें कितनी पुरानी हैं आइए जानते हैं? वैसे तो सरहुल की कहानी बहुत पुरानी है। कुछ किंवदंतियां इसे महाभारत काल से जोडती हैं। कहा जाता है कि महाभारत में जब पांडव वनवास में थे, तो उन्होंने साल पेड की पूजा की थी। लेकिन मुख्य रूप से यह आदिवासी संस्कृति से जुडा हुआ है। झारखंड के आदिवासी लोग प्रकृति को देवता मानते हैं। सिर झारखंड के नहीं बल्कि पूरे देश के दुनिया के आदिवासी प्रकृति को ही अपना देवता मानते हैं। साल का पेड़ उनके लिए जीवन का आधार है। यह पेड़ जंगल की रक्षा करता है और फल फूल देता है। सरहुल में साल की पूजा से वे प्रकृति से आशीर्वाद मांगते हैं। और तीन दिन के इस त्योहार में वे खूब आनंद से इस त्यौहार को मनाते हैं। चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीसरी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा तक यह चलता है। गांव का पुजारी, जिसे पहान कहते हैं, मुख्य भूमिका निभाता है। वह जंगल में जाकर साल के फूल लाता है। फूलों को देखकर वह बताता है कि साल कैसा रहेगा। अगर फूल ज्यादा हैं, तो अच्छी फसल होगी। क्या हैं इससे जुड़ी मान्यताएं? उनकी यह मान्यता लोगों को उत्साह से भर देती है। सरहुल की खास बात यह है कि झारखंड के गांवों में सरहुल की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है। लोग नए कपडे सिलवाते हैं, घर साफ करते हैं। इसके अलावा यह त्यौहार सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि समुदाय की एकता को बढ़ावा देता है। सरहुल के दौरान लोग मिलकर नाचते गाते हैं। वास्तव में यह उत्सव हमें सिखाता है कि प्रकृति से जुडना कितना जरूरी है। आज की दुनिया में जहां पर्यावरण का नुकसान हो रहा है, सरहुल जैसा त्यौहार हमें याद दिलाता है कि पेड पौधे हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं। वैसे तो कई कहानियां सरहुल से जुडी हैं। एक कथा है कि साल देवता ने आदिवासियों की रक्षा की थी। इसलिए वे उसकी पूजा करते हैं। दरअसल यह त्यौहार झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। यह हमें बताता है कि आदिवासी जीवन कितना प्रकृति से जुडा है। सरहुल सिर्फ एक त्यौहार नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। यह हमें खुशी और समृद्धि की कामना करना सिखाता है। प्रकृति का अभिनंदन, पूजा और रस्मों को सलीके से निभाया जाता है सरहुल में पूजा का तरीका बहुत खास है। यह त्यौहार प्रकृति को धन्यवाद देने का माध्यम है। गांव का पहान जंगल में जाता है। वह साल पेड के नीचे पूजा करता है। मुर्गी की बलि देता है और फूल लाता है। इन फूलों को सरना स्थल पर लाकर पूजा की जाती है। सरना आदिवासियों का पवित्र स्थान है, जहां वे देवताओं की पूजा करते हैं। पहान फूलों को देखकर भविष्य बताता है। अगर फूल सफेद और ताजा हैं, तो साल अच्छा होगा। लोग खुशी से चिल्लाते हैं। फिर फूलों को गांव में बांटा जाता है। हर घर में फूल रखे जाते हैं। यह रस्म समृद्धि लाती है। महिलाएं पारंपरिक कपडे पहनती हैं। वे साडी जैसे वस्त्र पहनती हैं, जिन पर फूलों की डिजाइन होती है। पुरुष धोती और कुर्ता पहनते हैं। पूजा के बाद नाच गाने शुरू होते हैं। लोग ढोल और नगाडे बजाते हैं। सच में आप भी देखना कभी आदिवासी नृत्य कमाल का होता है। वे हाथ पकडकर घेरा बनाते हैं और मजे के साथ नृत्य गाते हैं। गीत प्रकृति और जीवन पर होते हैं। यह दृश्य बिल्कुल देखने लायक होता है। बच्चे से लेकर बूढे तक सभी इसमें भाग लेते हैं। प्रकृति से प्रेम, लेकिन दी जाती है बलि! रस्मों में बलि भी दी जाती है। मुर्गी या बकरी की बलि से देवता खुश होते हैं। फिर प्रसाद बांटा जाता है। ज्यादातर इस प्रसाद में चावल, गुड और फल होते हैं। फिर सभी लोग मिलकर इस प्रसाद को खाते हैं। यह रस्म एकता बढाती है। और सरहुल में कोई भेदभाव नहीं होता। सब मिलजुलकर एक साथ जश्न मनाते हैं। सरहुल का यह त्यौहार हमें सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान करना कितना जरूरी है। आज की दुनिया में सरहुल जैसे उत्सव हमें पर्यावरण की याद दिलाते हैं। यह रस्में सरहुल को रौनक देती हैं। और हमें बहुत कुछ सिखाती हैं, दरअसल आदिवासी जनजातियों से सीखने के लिए है बहुत कुछ। नाच गाने की उमंग, उत्सव की रौनक को दिखाता है सरहुल उत्सव में नाच गाने का मजा ही अलग है। यह त्यौहार खुशी से भरा होता है। लोग सुबह से शाम तक नाचते गाते हैं। ढोल की थाप पर पैर धूल उड़ाते हैं। इस आदिवासी नृत्य में कई प्रकार हैं। जैसे करमा नृत्य, जहां युवक युवतियां मिलकर नाचते हैं। यह नृत्य प्यार और खुशी का प्रतीक है। गीत तो सरहुल के विशेष ही होते हैं। वे साल देवता की स्तुति करते हैं। गीतों में प्रकृति की सुंदरता का वर्णन होता है। जो सच में लाजबाब लगता है। महिलाएं मधुर स्वर में गाती हैं। पुरुष वाद्य यंत्र बजाते हैं। जैसे मांदर, नगाडा और बांसुरी। यह संगीत जंगल की हवा में घुल जाता है। और नया सबेरा सा लाता है। सरहुल उत्सव में खेल भी होते हैं। युवा कुश्ती लडते हैं जो मजेदार होता है। बच्चे दौड लगाते हैं और फिर विजेताओं को पुरस्कार दिए जाते हैं। इसके बाद शाम को आग के चारों तरफ बैठकर और कुछ खड़े होकर नाच करते हैं। कुछ लोग कहानियां सुनाते हैं। पुरानी कथाएं जो पीढी दर पीढी चलती हैं। यकीन मानिए यह दृश्य कमाल का होता है। सरहुल के खाने की तो बात ही निराली है। लोग देसी मुर्गी, चावल और सब्जियां बनाते हैं। गुड की मिठाई मिलती है। यह भोजन सादा लगता है लेकिन स्वादिष्ट बहुत होता है। सभी लोग मिलकर खाते हैं। यह

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केरल का ओणम स्नेक बोट फेस्टिवल जिसमें नाव भी सांप जैसी लगती है!

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मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है..पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है!यह पक्तियां किसी न किसी मंच से हमें सुनने को मिल जाती हैं! यदि आप इन् पंक्तियों का भाव असल में समझना चाहते हैं, तो आपको केरल के इस स्नेक बोट फेस्टिवल में शरीक होना पड़ेगा। यह हसीन बैकवाटर दुनिया को अपनी सुकून भरी वादियों से बुलाती हैं। और यहां का यह स्नेक बोट फेस्टिवल यक़ीनन एक ऐसा उत्सव है जो प्रकृति और संस्कृति को जोड़कर दिखाता है। यह फेस्टिवल वैल्लम काली के नाम से जाना जाता है, जहां लंबी सांप जैसी नावें पानी पर सरपट दौड़ती हैं। यह त्यौहार केरल के ओणम उत्सव के दौरान मनाया जाता है, जो अगस्त से सितंबर तक चलता है। हसीन बैकवाटर में ये नावें दौड़ती हैं, और दर्शक बेहिसाब उत्साह से भरे होते हैं। वैसे यह फेस्टिवल तकरीबन 400 साल पुराना है, लेकिन इसकी जड़ें 13वीं सदी तक भी जाती हैं। आओ जानें इतिहास.. कहानी शुरू होती है, केरल के पुराने राजाओं से। अल्लेप्पी और आसपास के इलाकों के राजा नदियों पर नावों से लड़ाई लड़ते थे। एक राजा को हार का सामना करना पड़ा। उन्होंने एक कुशल बढ़ई को बुलाया और एक ऐसी नाव बनाने को कहा जो तेज दौड़े। उस बढ़ई ने चूंदन वैल्लम बनाई, जो सांप की तरह लंबी और पतली नाव थी। इस नाव ने राजा को कई बार जीत दिलाई। दूसरे राजा ने जासूस भेजा, लेकिन नाव का राज़ न खुल सका। यक़ीनन, यह नावें युद्ध की थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे उत्सव का हिस्सा बनीं। 13वीं सदी में चेम्बकस्सेरी और कयामकुलम राज्यों के बीच युद्ध हुआ। चेम्बकस्सेरी के राजा देवनारायण ने युद्ध की बजाय नाव दौड़ का फैसला किया। इससे शांति आई, और यह परंपरा शुरू हुई। ओणम के दौरान ये दौड़ें धार्मिक रंग ले लेती हैं। जैसे अरनमुला में भगवान कृष्ण को समर्पित दौड़। बैकवाटर में ये नावें और नाविक हौसले से लवालब होते हैं। जीत के लिए, और दौड़ देखने आए दर्शक मजे करते हैं। यह फेस्टिवल केरल की सांस्कृतिक धरोहर है। तकरीबन हर गांव की अपनी नाव होती है, जिस पर लोग बेहिसाब गर्व करते हैं। दरअसल, ओणम राजा महाबली की याद में मनाया जाता है, और ये दौड़ें समृद्धि का प्रतीक हैं। स्नेक बोट फेस्टिवल की अपनी एक कहानी है जो हमें बताती है कि कैसे युद्ध को शांति में बदला जा सकता है। हकीकत तो यह है की यह उत्सव केरल की आत्मा है। नावों को कुछ खास तरीके से बनाए जाने का राज क्या है? स्नेक बोट फेस्टिवल की जान हैं ये मनमोहक नावें चूंदन वैल्लम कहलाती हैं। जो सांप की तरह लंबी होती हैं। तकरीबन 100 से 120 फीट लंबी, ये नावें 100 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ती हैं। आगे का हिस्सा सांप के फन की तरह ऊंचा होता है, जो इन्हें अनोखा बनाता है। ये नावें अंजिली लकड़ी से बनती हैं, जो मजबूत और हल्की होती है। निर्माण का राज़ पीढ़ियों से चला आ रहा है। एक कुशल बढ़ई महीनों लगाता है इसको तैयार करने में। पहले लकड़ी काटी जाती है, फिर आकार दिया जाता है। वैसे तो बांस की सहायता से ही ढांचा मजबूत होता है। और नारियल की रस्सी से जोड़ा जाता है। कोई कील या पेंच नहीं, सिर्फ प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। वैसे तो यह तकनीक 800 साल पुरानी है। और इसमें परथासरथी चूंदन सबसे पुरानी नाव मानी जाती है, जो आज भी नागिन तरह दौड़ती है। ये नावें पानी को काटती हुई अपना रास्ता बनाती हैं। इस नाव में पीछे की तरफ नाविक बैठते हैं, और आगे हेल्मन गीत गाता है। वांछिपट्टु कहलाते हैं ये गीत, जो ताल बनाते हैं। नाव की पतली शक्ल होने के कारण ही यह ये तेज चलती हैं। फेस्टिवल से पहले नावें सजाई जाती हैं। रंग-बिरंगे कपड़े, फूल और झंडे लगाए जाते हैं। यकीन मानिए यह दृश्य बहुत ही मनमोहक होता है। बनावट में भारतीय कला झलकती है। ये नावें सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि धार्मिक पूजा की वस्तु हैं। गांव वाले इन्हें देवता मानते हैं। नाव बनाने का यह राज़ केरल की कारीगरी का प्रतीक है। नावों की इन दौड़ों के पीछे की अद्भुत कहानियां जी चुरा लेती हैं.. स्नेक बोट फेस्टिवल में कई दौड़ें होती हैं। सबसे मशहूर है नेहरू ट्रॉफी बोट रेस। यह अल्लेप्पी के पुन्नामदा झील पर अगस्त के दूसरे शनिवार को होती है। यह दौड़ 1952 में जवाहरलाल नेहरू के एक दौरे पर शुरू हुई थी। और नेहरू ने नावों को देखा और चांदी की ट्रॉफी देकर, केरल के इस फेस्टिवल को केरल के ओलंपिक के जैसा बना दिया। इस दौड़ में भी 8 से 10 नावें भाग लेती हैं। रेस की दूरी 1.5 किलोमीटर होती है। इस दौड़ में दर्शक जोर जोर से चिल्लाते हैं। क्योंकि ट्रॉफी जीतना गांव का गौरव है। दूसरी प्रमुख दौड़ चंपकुलम है। यह सबसे पुरानी रेस है, जो जून-जुलाई में पंबा नदी पर होती है। अंबलप्पुझा श्री कृष्ण मंदिर की मूर्ति स्थापना की याद में। इस में भी 9 नावें दौड़ती हैं। अरनमुला उत्थरत्तथी बोट रेस ओणम के दौरान पंबा नदी पर ही आयोजित होती है। यह उत्सव ही, भगवान कृष्ण को समर्पित है। यह रेस दो दिन चलती है, वल्लासद्या भोज के साथ-साथ। ये दौड़ें मजेदार हैं। तकरीबन लाखों दर्शक इन रेसओ को देखने आते हैं। इन सब में चैंपियंस बोट लीग नई शुरुआत है, जो कई जगहों पर दौड़ें आयोजित करती है। यह फेस्टिवल को नई राह दिखाता है। रेस जीतने के लिए एकता, अभ्यास और लगन क्यों जरूरी हैं? स्नेक बोट फेस्टिवल में वीर नाविक ही जीत दिलाते हैं। हर नाव पर 100 से ज्यादा युवक होते हैं, जो हौसला अफजाही में मदत करते हैं। ये सब युवक गांव के ही होते हैं, जो महीनों पहले प्रशिक्षण लेते हैं। सुबह शाम अभ्यास, ताकि वे इस रेस में जीत सकें। हेल्मन गीत गाता है, और यह गीत प्रेरणा देता है।रेस से पहले का प्रशिक्षण काफी कठिन होता है। नाविक नाव पर चढ़कर घंटों सीखते हैं। ड्रमर ताल देता है। इस खेल में यह सब जरूरी है क्योंकि एक गलती पूरी नाव को पीछे धकेल देती है। यक़ीनन, यह सब बहुत मजेदार होता है, जब वे

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नानी के घर ने दी इतिहास को जानने की इच्छा,पूरी हुई दिल्ली में – मेरा सफरनामा

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छुट्टियाँ हमेशा ही बचपन की सबसे प्यारी यादें होती हैं। मेरी छुट्टियाँ भी अक्सर नानी के साथ बीतती थीं, क्योंकि मेरी नानी आगरा में रहती हैं। आगरा, जो अपने ऐतिहासिक वैभव और धरोहरों के लिए विश्वभर में जाना जाता है। इस बार गर्मियों में जब मैं नानी के घर गई, तो मन में एक नया विचार आया- क्यों न इस बार आगरा को केवल घूमने-फिरने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास समझने के लिए देखा जाए। फिर मैं वहाँ गयी ताज महल। मैं वहाँ से तो लौट आई लेकिन ये स्मृतियाँ मेरे मस्तिष्क में घर कर गईं। मेरी उत्सुकता इतनी बढ़ गयी कि मैं फिर से उसे जीने पहुँच गयी एक ऐसी जगह जहाँ मुझे ये सब फिर से दिख सकता था। इसी सोच के साथ मेरी शिल्प संग्रहालय की इस यात्रा की शुरुआत हुई। मेरा सफरनामा / Mera Safarnama ताजमहल: प्रेम की शाश्वत गाथा सुबह का समय था जब मैंने पहली बार ताजमहल के सामने खड़े होकर उसे निहारा। बचपन से सुनती आई थी कि यह दुनिया के सात अजूबों में से एक है, लेकिन जब अपनी आँखों से देखा तो मानो समय ठहर गया। सफ़ेद संगमरमर पर पड़ती सूरज की सुनहरी किरणें उसे किसी सपने जैसा बना रही थीं। चारों ओर फैले हरे-भरे बागान उसकी शोभा को और बढ़ा रहे थे। वहाँ खड़े होकर ऐसा महसूस हो रहा था जैसे पूरी दुनिया की विविधता उस एक स्मारक में समा गई हो। यह केवल एक इमारत नहीं थी, बल्कि एक संदेश था कि सच्चा प्रेम समय और मृत्यु से परे भी अमर रह सकता है। कपड़ों और शिल्प की कहानियाँ इतिहास केवल स्मारकों में ही नहीं, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के जीवन और संस्कृति में भी सांस लेता है। इसी खोज ने मुझे शिल्प संग्रहालय तक पहुँचा दिया। यहाँ मैंने देखा कि कैसे सूत से धागा, और धागे से वस्त्र बनते हैं। राजसी पोशाकों को तैयार करते हाथ देखकर मुझे नानी की बातें याद आईं- “हमारे ज़माने में कपड़े अपने हाथों से बनते थे, उनमें एक अलग ही अपनापन होता था।” यह दृश्य मुझे बता रहा था कि असली सुंदरता केवल कपड़े की चमक में नहीं, बल्कि उस मेहनत और प्रेम में है जो उसके बनने की प्रक्रिया में छिपा होता है। मिट्टी और संगीत संग्रहालय में आगे बढ़ी तो एक कुम्हार अपने चाक पर घड़ा बना रहा था। मिट्टी और उसके हाथों का यह संगम जैसे हमारी सभ्यता की नींव को उजागर कर रहा था। वहीं एक कोने में रखे वीणा और सितार मुझे यह एहसास दिला रहे थे कि कला केवल वस्तु नहीं, दिल की आवाज़ होती है। ऐसा लगा मानो कोई युगों पुराना राग छेड़ने ही वाला हो। सिंधु घाटी: अतीत की झलक मेरी यात्रा यहीं नहीं रुकी। अंधेरे से भरे एक कक्ष में कदम रखते ही मैं जैसे हज़ारों साल पीछे चली गई। वहाँ दीवारों पर अंकित दृश्य थे। औरतें खाना बना रही थीं, बच्चे मिट्टी के आँगन में खेल रहे थे, कुम्हार बर्तन बना रहे थे। कुछ क्षणों के लिए लगा कि मैं भी उन्हीं बच्चों के साथ मिट्टी में खेल रही हूँ। इस अनुभव ने समझाया कि सभ्यता बदलती है, साधन बदलते हैं पर मेहनत और सृजनशीलता ही इंसान की असली ताकत है। जीवन का सच: कंकाल से सीख इसी दौरान मेरी नज़र एक कांच के पीछे रखे कंकाल पर पड़ी। पहले तो अजीब सा लगा, पर धीरे-धीरे एहसास हुआ कि यही तो जीवन का सत्य हैं। चाहे सभ्यता कितनी भी महान क्यों न हो, घर और महल कितने भी भव्य क्यों न हों, अंत में मनुष्य उसी हड्डियों के ढांचे में सिमट जाता है। यह दृश्य एक गहरी सीख देता है; बाहरी सुंदरता क्षणिक है, असली महत्व आंतरिक सुंदरता और सादगी का है। धरती और भविष्य की जिम्मेदारी इतिहास की गलियों से निकलकर मेरी नज़र एक और दृश्य पर पड़ी। नीले ग्रह को दर्शाती तस्वीर पर एक नल लगा था और संदेश स्पष्ट था, “यदि तुमने मेरी कदर नहीं की तो मैं सूख जाऊँगी।” पृथ्वी पर केवल 3 प्रतिशत मीठा जल है और उसमें से भी बहुत थोड़ा ही हमारे काम आता है। यह समझ मुझे वर्तमान और भविष्य दोनों की जिम्मेदारी का अहसास कराती है। अनुभव का सार इस अनोखी यात्रा ने मुझे जीवन को एक नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर दिया। ताजमहल की चमक में प्रेम की शाश्वतता दिखाई दी, शिल्प और कुम्हार की मेहनत ने विरासत का महत्व समझाया, सिंधु घाटी ने सभ्यता की नींव से परिचय कराया, कंकाल ने जीवन की असली सच्चाई से रूबरू करवाया और धरती ने भविष्य की जिम्मेदारी का बोध कराया। यह अनुभव केवल अतीत को देखने भर का नहीं था, बल्कि अपने वर्तमान को पहचानने और आने वाले कल के लिए सजग रहने की प्रेरणा भी था। मुझे एहसास हुआ कि इतिहास केवल किताबों में बंद नहीं है, वह हर उस कदम पर जीवित है जिसे हम समझने की कोशिश करें। यही वजह है कि यह यात्रा मेरे लिए एक अमूल्य सीख बन गई- अतीत से जुड़कर ही वर्तमान को सार्थक और भविष्य को सुरक्षित बनाया जा सकता है।

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लखनऊ को ही क्यों कहा जाता है, नवाबों की नगरी? पढ़ो तो जानो!

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लखनऊ, उत्तर प्रदेश की राजधानी, एक ऐसी नगरी है जो इतिहास, संस्कृति और तहजीब के लिए जानी जाती है। गोमती नदी के किनारे बसी यह नगरी नवाबों की शान और अवध की विरासत को अपने सीने में समेटे हुए है। नवाबों के दौर से लेकर आज तक, लखनऊ ने अपनी मनमोहक छवि को बरकरार रखा है। यह शहर सुकून और सौंदर्य का प्रतीक है, जहां हर गली दास्तां सुनाती है। लखनऊ का इतिहास 18वीं सदी से शुरू होता है, जब अवध के नवाबों ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। नवाब आसफ उद दौला ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी बनवाई इमारतें, जैसे बड़ा इमामबाड़ा, आज भी शहर की शान हैं। गंगा- जमुनी संस्कृति लखनऊ की तहजीब पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां की गंगा जमुनी संस्कृति हिंदू और मुस्लिम परंपराओं का मनभावक मेल है। लोग एक दूसरे के त्यौहारों में बढ़चड़कर और उत्साह से हिस्सा लेते हैं। शहर की सडकों पर चलते हुए आप नवाबी दौर की खुशबू महसूस करेंगे। चौक की गलियां, हजरतगंज के बाजार और अमीनाबाद की रौनक लखनऊ को जन्नत जैसा बनाती हैं। यह शहर खाने, कपडों और कला का खजाना है। तहजीब और तमीज का यह शहर हर किसी को अपनी जुस्तजू में बांध लेता है। लखनऊ की खासियत उसकी सादगी और शान में है। यहां की बोली अवधी इतनी मीठी है कि हर बात मन को छू लेती है। यह शहर समय के साथ बदलता गया, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वही है। ऐतिहासिक धरोहरों में नवाबी शान! लखनऊ की ऐतिहासिक धरोहरें इस नगरी को बेहद खास बनाती हैं। सबसे पहले बात करते हैं बडा इमामबाड़ा की। जो 1784 में नवाब आसफ उद दौला ने बनवाया था। यह इमारत इतनी विशाल है कि देखते ही मन में सम्मान जाग उठता है। इसका भूलभुलैया वाला हिस्सा पर्यटकों को घूमने पर मजबूर करता है। संकरी सीढियां और गलियारों से आपको महोब्बत हो जाएगी। ऊपर से गोमती नदी का नजारा आपको सुकून से भर देगा। पास में हुसैनाबाद क्लॉक टावर, जो भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है। 221 फीट ऊंचा यह टावर 1881 में बना था आपको देखने को मिलता है। इसकी गोथिक शैली और घंटियों की आवाज लखनऊ की हवा में अपनापन घोल देती है। रात में जब यह रोशनी से चमकता है, तो लगता है जैसे कोई जन्नत जमीन पर उतर आई हो। यहां का रूमी दरवाजा भी यहां की शान है। इसे तुर्की के एक दरवाजे से प्रेरणा लेकर बनवाया गया था। 60 फीट ऊंचा यह दरवाजा नवाबी कला का नमूना है। इसके पास ही छोटा इमामबाड़ा है, जिसमें खूबसूरत झाड फानूस और नक्काशी देखने लायक है। ये जगहें लखनऊ की नवाबी शान को महसूस कराती हैं। कैसरबाग महल इस नवाबों की नगरी में कैसरबाग महल नाम की एक और धरोहर है। इसे नवाब वाजिद अली शाह ने बनवाया था। हालांकि समय के साथ यह थोड़ा पुराना हो चुका है लेकिन इसकी भव्यता आज भी बरकरार है। और लखनऊ की ये धरोहरें इतिहास की किताब के पन्ने जैसी हैं। जो आपको अतीत की गाथा सुनाती हैं। ये नवाबों की जुस्तजू और उनके शौक को दर्शाती हैं। सच तो यह है की लखनऊ घूमने वाले इन जगहों को देखे बिना अधूरे रहते हैं। इसलिए आप यदि यहां आते हैं तो इस बात का ध्यान रखें की यहां की हरेक जगह को इत्मीनान से घूमकर इस कलाकारी का लुत्फ उठाएं। लखनऊ के खानपान की दुनिया भर में मिसाल क्यों दी जाती है? लखनऊ के खाने को पूरी दुनिया भर में पसंद किया जाता है। यहां का हर व्यंजन मनमोहक है। इसके मशहूर होने की पीछे की कहानी यह है की नवाबों ने इस खाने को कला बनाया, और यह परंपरा आज भी ज्यों की त्यो कायम है। दरअसल, लखनऊ की गलियों में खाने की खुशबू आपको अपनी ओर खींचती है। अब हम बात करते हैं, कुछ जाने-माने, और मशहूर व्यंजनों की। इन सभी में सबसे पहले आता है, कबाब। टुंडे कबाब इतने नरम होते हैं कि मुंह में घुल जाते हैं। कहते हैं, एक नवाब के लिए जिनके दांत नहीं थे, यह कबाब बनाया गया था। इसके अलावा बिरयानी भी लखनऊ की शान में शरीक है। इदरीस की बिरयानी और वहिद की बिरयानी में चावल का हर दाना स्वाद से भरा होता है। साथ में मटन की खुशबू और मसालों का मेल इसे बेमिसाल बनाता है। अगर आप शाकाहारी हैं, तो लखनऊ में आपके लिए भी बहुत कुछ है। चटनी और दाल के साथ पराठे या पनीर की सब्जी का स्वाद यकीनन आपको दीवाना बना देगा। मिठाइयों में रसीले गुलाब जामुन और शाही टुकडा लखनऊ की खासियत हैं। अमीनाबाद के बाजार में मिठाई की दुकानें स्वाद की बहार ला देती हैं। यहां मलाई की गिलौरी और रबडी का स्वाद ऐसा है कि आप बार बार खाना चाहेंगे। चौक की गलियों में ठंडाई और कुल्फी का मजा ओय होए होए होए मजा आ जाता है। गर्मियों में एक गिलास ठंडाई सुकून देता है। लखनऊ का खाना सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि नवाबी तहजीब की कहानी है। यहां खाना बनाना और खाना दोनों ही कला है। हर व्यंजन में प्यार और मेहनत साफ साफ झलकती है। लखनऊ की तहजीब अब हम लखनऊ की तहजीब पर नजर डालते हैं। क्योंकि तहजीब का बेमिसाल रंग गंगा जमुनी संस्कृति लखनऊ की तहजीब दुनिया भर में मशहूर है। यह गंगा जमुनी संस्कृति का प्रतीक है, जहां हिंदू और मुस्लिम मिलकर रहते हैं। यह तहजीब लखनऊ को जन्नत बनाती है। लोग यहां एक दूसरे के त्यौहारों में बड़े उत्साह से हिस्सा लेते हैं। दीवाली हो या ईद, हर कोई मिलकर जश्न मनाता है। लखनऊ की बोली अवधी इतनी मीठी है कि हर बात मन को छू लेती है। लोग मेहमानों का स्वागत बडे प्यार से करते हैं। लखनऊ के नवाबों ने तहजीब को नया मुकाम दिया है। वे कला, संगीत और शायरी के शौकीन थे जो यह की पहचान मानी जाती है। आज भी लखनऊ में कवि सम्मेलन और मुशायरे होते रहते हैं। लखनऊ की चिकनकारी इसके अलावा लखनऊ चिकनकारी के लिए भी मशहूर है। यह कढाई इतनी बारीक है कि देखने पर मनमोहक लगती है। चौक और अमीनाबाद में चिकनकारी की दुकानें हर सैलानी को अपनी ओर खींचती हैं। साडी, कुर्ते और