नीलमपेरूर पदयानी- ऐसा भी कोई त्यौहार होता है? पढ़ें और जानें!
केरल की हरी भरी वादियों में बसा नीलमपेरूर गांव एक ऐसा नाम है जो हर साल चिंगम महीने में खुशियों से भर जाता है। यहां का पदयानी उत्सव खूबसूरती की बहार लेकर आता है। यह उत्सव नीलमपेरूर पल्ली भगवती मंदिर में मनाया जाता है, जो अलप्पुझा जिले के कुट्टनाड तालुक में है। यह मंदिर 1700 साल पुराना है, और उत्सव की जडें तीसरी या चौथी सदी तक ले जाती हैं। जब रात को हम सो रहे होते हैं, तभी रात के दस बजे एक अजीब सी आवाजें सुनने को मिलती हैं। गांव की शांति टूटती है, में एक आवाज़ में लोग चिल्लाते हैं हूयोह! और यह आवाज उत्सव की शुरुआत का संकेत होता है।

नीलमपेरूर पदयानी का जन्म चेरा राजा चेरामन पेरुमल से जुडा है। कथा है कि राजा बौद्ध धर्म के समर्थक थे। हिंदू लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन उन्होंने मंदिर में आकर पदयानी की शुरुआत की। यह उत्सव हिंदू और बौद्ध संस्कृति का सुंदर सा संगम है। प्रसिद्ध चीनी यात्री फा-हियान ने इसे पटना के बौद्ध उत्सव से मिलता जुलता बताया है। यह पदयानी केरल के अन्य पदयानी से अलग है, क्योंकि यहां कोलम यानी की मूर्तियां बनाई जाती हैं।
16 दिन का भव्य उत्सव
वैसे यह उत्सव 16 दिनों का होता है। और पदयानी का मतलब है पैदल सैनिकों की पंक्ति। लोग सैनिकों की तरह लाइन बनाकर नाचते हैं। यह उत्सव प्रकृति, कृषि और देवी की पूजा का बहुत बड़ा प्रतीक माना जाता है। सभी गांव वाले इस उत्सव के लिए महीनों पहले तैयारी करते हैं। वे मूर्तियां बनाते हैं, जो जानवरों, देवताओं और राक्षसों को दर्शाती हैं। यह रहस्यमई शुरुआत हमें ले जाती है, एक ऐसी दुनिया में जहां कला और आस्था का अद्भुत मेल होता है।
नीलमपेरूर गांव बेहद शांत है, लेकिन उत्सव के दौरान बेहिसाब रौनक छा जाती है। जो पूरे गांव को एक चमचमाता द्वीप बना देता है। लोग दूर-दूर से यहां आते हैं। सच में सच्चाई तो यह है की यह उत्सव केरल की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखता है। यह हमें सिखाता है कि पुरानी परंपराएं आज भी सुकून और रोचकता से भर देती हैं। उत्सव की शुरुआत से ही मन मोह लिया सा जाता है।
रस्मों में छिपी है, प्रकृति के रहस्यों की रोचक बातें!
दरअसल, नीलमपेरूर पदयानी की रस्में आकर्षक हैं। उत्सव की शुरुआत चूट्टुवेयप्पू से होती है। पहले तीन दिनों में सूखे नारियल के पत्तों को बांधकर मशालें बनाई जाती हैं। फिर रात दस बजे मंदिर के पश्चिम में चेरामन पेरुमल की प्रतीकात्मक अनुमति ली जाती है। फिर मशालें जलाकर मंदिर के चारों ओर परिक्रमा की जाती है। लोग चिल्लाते हैं कोहू और हूयोह! यह आवाज गांव की शांति को तोड देती है। मशालों की रोशनी में चेहरे चमक उठते हैं। यह दृश्य बहुत ही रोमांचक लगता है।
इसके बाद चौथे दिन से कोलम बनाना शुरू होता है।
कोलम महाभारत की कहानी से जुड़े होते हैं। इसमें मुख्य रूप से भिमा की खोज की कहानी को दर्शाया जाता है। पहले चार दिनों में कुदापदयानी होती है। जिसमें नारियल के डंठल से छत्रियां बनाई जाती हैं, जो फूलों से सजी होती हैं। अगले चार दिनों में जैकफ्रूट के पत्तों से मूर्तियां बनाई जाती हैं। और इनकी खास बात यह है की ये मूर्तियां हरा भरा रंग लिए होती हैं। बारहवें दिन के बाद नारियल के डंठल या केले के तने से मूर्तियां बनाई जाती हैं। यह मूर्तियाँ बनते देखना सौभाग्य की बात होती है।
थोताकाली और वेलाकाली का आकर्षण
उत्सव की इन रस्मों में कुदम पूजा काली, थोताकाली और वेलाकाली भी शामिल हैं। थोताकाली में आग के सामने नृत्य किया जाता है, जो डरावना तो होता ही है लेकिन इसमें संस्कृति के बहुत से राज छिपे होते हैं। ढोल की थाप पर लोग थिरकते लोग देखकर मन चंगा हो जाता है। अब आता है सबसे खास प्रदर्शन वेलाकाली। वेलाकाली में तलवारों का नृत्य होता है जो देखने लायक बनता है। प्लाविला नीरथु और कुदा नीरथु जैसे नृत्य भी इस उत्सव में शामिल होते हैं जो इस उत्सव का खास हिस्सा होते हैं।
ये रस्में विशेष रूप से आदिवासी और द्रविड परंपराओं से जुड़ी हैं। और इसमें बलि भी दी जाती है, लेकिन यह सब देवी को प्रसन्न करने के लिए होता है। पदयानी की रस्में तो शानदार हैं ही। पर वे कला, संगीत और नृत्य का मेल भी हैं। उत्सव में लोग पारंपरिक वेशभूषा पहनते हैं, जो सुंदरता के सभी पैमाने तोड़ देते हैं। महिलाएं रंग बिरंगी साड़ियां पहनती हैं। पुरुष धोती और ऊपरी वस्त्र। यह सब देखकर मनभावक लगता है। रस्में हमें बहुत कुछ सिखाती हैं और अपने अतीत की याद दिलाती हैं, और पुरानी परंपराओं की भी। यह उत्सव केरल की सादगी को दर्शाता है। अब हम कोलम की दुनिया में जाते हैं।
कोलम उत्सव का समागम इस उत्सव में चार चांद लगाता है
नीलमपेरूर पदयानी का सबसे मनमोहक हिस्सा कोलम हैं। ये मूर्तियां केट्टु पदयानी कहलाती हैं। कोलम जानवरों, देवताओं और राक्षसों को दर्शाती हैं। मुख्य कोलम हैं हंस, हाथी, भिमा, रावण, और इसके अलावा यक्षी। हंस सबसे खास हैं, इन्हें अन्नम कहते हैं। विशाल हंस 45 फीट ऊंचे तक होते हैं। इन्हें केले के तने और नारियल के पत्तों से बनाया जाता है। और फूलों से सजाया जाता है। कोलम बनाने में कलाकारों की कारीगरी कमाल की है यह कलाकारी आप इस उत्सव के अलावा काही और नहीं देख पाएंगे। इसे बनाने में वे जैकफ्रूट के पत्तों, नारियल के डंठल और केले के तने का इस्तेमाल करते हैं। हर कोलम में महाभारत की कहानी छिपी हुई मानी जाती है। जैसे एक कहानी भिमा, सौम्य फूल की खोज की कथा है। पहले दिन छोटे कोलम, फिर बड़े। अंतिम दिनों में विशाल हंस आते हैं। जो इस पूरे उत्सव का दिल जीत लेते हैं।

सामूहिक प्रयास और संस्कृति की झलक
इस तरह से दर्शाया जाता है की हंस कोलम देखकर यकायक आश्चर्य में हम चले जाते हैं। वे मंदिर के मैदान में नाचते हुए आते हैं। ढोल की थाप पर थिरकते हुए दिखाई पढ़ते हैं। लोग चिल्लाते हैं, और यह दृश्य मनमोहक होते जाता है। अन्य कोलम जैसे रावण का डरावना रूप, यक्षी का रहस्यमयी चेहरा। हाथी कोलम शक्ति का प्रतीक। ये कोलम कृषि और प्रकृति से जुड़े हुए माने जाते हैं। जो अपने आप में बहुत खास माने जाते हैं।
वैसे तो कोलम बनाने में गांव वाले मिलकर काम करते हैं। बच्चे फूल इकट्ठा करते हैं। महिलाएं सजाती हैं। पुरुष ढोते हैं। यह सामूहिक प्रयास इस महोत्सव को सफल बनाता है। वास्तव में कोलम ही तो उत्सव की आत्मा हैं। वे ही अपनी अद्भुत और आकर्षक कला बयां करते हैं। यही मनमोहक दृश्य पर्यटकों को खींचता है।
संगीत का जादू और नृत्य के बिना तो सब फीका-फीका ही मानिए
नीलमपेरूर पदयानी में संगीत और नृत्य का जादू सबको बांध लेता है। उत्सव रात में होता है। ढोल, नगाड़ा, मांदर और बांसुरी की धुन पर लोग थिरकते को मजबूर हो जाते हैं। थोताकाली नृत्य जो आग के सामने होता है, इसकी तो बात ही निराली है। इसमें लोग मशालें लिए नाचते हैं। उनकी आवाजें गूंजती हैं। लोग छत्रियां लिए घूमते हैं। वेलाकाली में तलवारें चमकती हैं। यह सभी नृत्य वीरता दिखाते हैं। प्लाविला नीरथु में नाव जैसी हरकतें होती हैं। कुदा नीरथु में छत्र नृत्य और गीत लोकगीत होते हैं। वे देवी की स्तुति करने का एक तरीका हैं। महिलाओं के मधुर स्वर, पुरुषों की गहरी आवाज सच में बात बन जाती है।
इस सभी नृत्यों में लोग सैनिकों की तरह लाइन बनाते हैं। और कोलम को नचाया जाता है यह दृश्य विहंगम होता है। जो हंस कोलम होते हैं उनको थिरकते हुए मंदिर तक पहुंचाया जाता हैं। यह सब देखकर दर्शक तालियां बजाते हैं। साथ ही साथ बच्चे उत्साहित होते हैं। यह संगीत का जादू उत्सव ही संगीत की जान है। लोग रात भर जागते हैं, इस उत्सव की रात में सोना तो फिर उत्सव का क्या मजा, वैसे इस रात कोई नहीं सोता।
पर्यटकों के लिए आखिर क्यों खास बनता है यह उत्सव?
नीलमपेरूर पदयानी पर्यटकों के लिए मनभावक और विहंगम है। यदि आप जाना चाहते हैं तो चंगनासेरी रेलवे स्टेशन यहां के लिए सबसे नजदीक रेलवे स्टेशन है, जो यहां से मात्र 10 किमी दूर है। दूसरा विकल्प है कोचीन एयरपोर्ट जो 101 किमी की दूरी पर आपको पड़ेगा। बस या टैक्सी भी एक अच्छा विकल्प माना जा सकता है। उत्सव सितंबर में होता है, मलयालम केलेंडर के अनुसार चिंगम महीने में। इस समय मौसम सुहावना होता है, जो आपकी यात्रा की सारी थकान उतार देगा तो चिंता की कोई बात नहीं है। पर्यटक कोलम देखकर हैरान होते हैं और होना भी चाहिए क्योंकि इस उत्सव की खासियत यही है। यहां आकर विशाल हंस देखकर उनकी तस्वीरें लीजिए और अपने दोस्तों को भी इस उत्सव के बारे में बताइए।
स्थानीय खाना ट्राई करना भूल गए तो आपका उत्सव में शरीक होना विफल माना जाएगा। चावल, सब्जी और मिठाई सबकुछ ट्राई कीजिए। कुल मिलाकर यह नीलमपेरूर पदयानी एक शानदार सफर है।





