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Ghalib Haveli: इतिहास, शायरी और घूमने की पूरी जानकारी

Ghalib

चाँदनी चौक के शोर के बीच छुपी वह हवेली, जहाँ कभी मिर्ज़ा ग़ालिब की महफ़िलें सजा करती थीं। पुरानी दिल्ली को सिर्फ बाज़ार, भीड़ और खाने-पीने की जगह समझना शायद इस शहर के साथ नाइंसाफी होगी। यहाँ की हर पुरानी गली अपने अंदर कोई न कोई किस्सा छुपाए बैठी है।

कहीं किसी हवेली की टूटी दीवार इतिहास की गवाही देती है, तो कहीं किसी पुराने बाज़ार की दुकान आज भी कई पीढ़ियों से चली आ रही है। इन्हीं गलियों में एक नाम ऐसा भी है, जिसे सुनते ही शायरी, दिल्ली और पुरानी तहज़ीब तीनों एक साथ याद आ जाते हैं—मिर्ज़ा ग़ालिब। चाँदनी चौक से बल्लीमारान की तरफ बढ़ते हुए जब आप गली कासिम जान में पहुंचते हैं, तो आसपास का माहौल अचानक थोड़ा अलग महसूस होने लगता है।

दुकानों और रोज़मर्रा की भागदौड़ के बीच एक ऐसी जगह आती है, जिसका नाम है ग़ालिब की हवेली। बाहर से देखने पर यह जगह बहुत बड़ी या भव्य नहीं लगती, लेकिन अंदर कदम रखते ही महसूस होता है कि यह सिर्फ एक पुरानी इमारत नहीं, बल्कि दिल्ली के एक ऐसे दौर की याद है जिसे अब हम सिर्फ किताबों और तस्वीरों में पढ़ते हैं।

यही वह जगह है जहाँ Ghalib ने अपने जीवन के आखिरी साल बिताए। यहीं उन्होंने अपने आसपास की दिल्ली को बदलते हुए देखा, 1857 की तबाही का दर्द महसूस किया और अपनी शायरी और खतों के जरिए उस दौर को शब्द दिए। आज हवेली का सिर्फ एक छोटा हिस्सा बचा है, लेकिन उसके साथ जुड़ी यादें इसे पुरानी दिल्ली की खास ऐतिहासिक जगहों में शामिल करती हैं

कौन थे मिर्ज़ा ग़ालिब और दिल्ली से उनका रिश्ता इतना खास क्यों था?

मिर्ज़ा असदुल्लाह बैग ख़ान, जिन्हें हम मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से जानते हैं, का जन्म 1797 में आगरा में हुआ था। बहुत कम उम्र में उनकी शादी उमराव बेगम से हो गई और इसके बाद उनका जीवन दिल्ली से जुड़ता चला गया। उनके परिवार की जड़ें मध्य एशिया के समरकंद से जुड़ी मानी जाती हैं और आगे चलकर Ghalib ने दिल्ली को ही अपनी जिंदगी और साहित्य का सबसे अहम हिस्सा बना लिया।

Ghalib

दिल्ली आने के शुरुआती दौर में Ghalib को अपनी पहचान बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। उस समय दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं थी, बल्कि उर्दू और फ़ारसी अदब का बड़ा केंद्र थी। यहाँ पहले से कई बड़े शायर मौजूद थे और साहित्य की दुनिया में अपनी जगह बनाना आसान नहीं था। Ghalib ने अपनी शायरी में प्यार, जिंदगी, अकेलापन, इंसानी स्वभाव, समाज और अपने आसपास बदलती दुनिया को अलग अंदाज़ में लिखा। यही वजह है कि उनकी शायरी सिर्फ उनके दौर तक सीमित नहीं रही।

आज भी उनकी कई पंक्तियां लोगों की रोज़मर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुकी हैं। बाद के वर्षों में Ghalib का संबंध मुग़ल दरबार से भी मजबूत हुआ। वह बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार से जुड़े और उन्हें शायरी की दुनिया में खास सम्मान मिला। लेकिन जिस दिल्ली ने उन्हें पहचान दी, उसी दिल्ली ने आगे चलकर उन्हें एक बहुत बड़ा बदलाव भी दिखाया।

बल्लीमारान की गली कासिम जान में कैसे बनी ग़ालिब की हवेली?

पुरानी दिल्ली का बल्लीमारान आज अपने बाज़ार, दुकानों और संकरी गलियों के लिए जाना जाता है। इसी इलाके में गली कासिम जान स्थित है, जहाँ Ghalib की हवेली आज भी उनके नाम से पहचानी जाती है। बताया जाता है कि यह मकान Ghalib को उनके एक प्रशंसक और स्थानीय हकीम की ओर से रहने के लिए मिला था।

वर्ष 1860 के आसपास Ghalib यहाँ रहने आए और 1869 में अपनी मृत्यु तक इसी जगह से जुड़े रहे। यानी उनके जीवन का आखिरी लगभग एक दशक इसी हवेली में बीता। उस समय यह जगह आज की तरह पर्यटकों के लिए कोई संग्रहालय नहीं थी। यह Ghalib का घर था, जहाँ रोज़मर्रा की जिंदगी चलती थी। यहाँ उनके दोस्त आते थे, शागिर्द उनसे मिलने आते थे और शायरी पर बातचीत होती थी।

इसी माहौल में उन्होंने अपने जीवन के आखिरी वर्षों को गुजारा। आज जब आप इस जगह पर खड़े होते हैं, तो शायद सबसे दिलचस्प बात यही लगती है कि जिस व्यक्ति की शायरी आज पूरी दुनिया में पढ़ी जाती है, वह कभी इन्हीं गलियों में सामान्य जिंदगी जीता था।

हवेली का कितना हिस्सा आज भी बचा है?

Ghalib के इंतकाल के बाद हवेली का इतिहास उतना आसान नहीं रहा। समय के साथ यह संपत्ति अलग-अलग लोगों के हाथों में जाती रही और धीरे-धीरे इसका मूल स्वरूप बदलता गया। पुरानी इमारतों के साथ अक्सर जो होता है, वही यहाँ भी हुआ। हिस्से बंटते गए, आसपास निर्माण होता गया और अतिक्रमण के कारण हवेली का बड़ा हिस्सा अपनी पहचान खोता चला गया। एक समय ऐसा भी आया जब इस जगह का इस्तेमाल दुकानों और दूसरे व्यावसायिक कामों के लिए होने लगा।

बताया जाता है कि 1990 के दशक तक इसके एक हिस्से में हीटर बनाने का काम भी होता था और वहाँ कोयला तक रखा जाता था। सोचिए, जिस जगह पर कभी Ghalib बैठकर शायरी किया करते होंगे, उसी जगह पर बाद में कारखाने जैसा काम होने लगा। यही वजह है कि आज जो हवेली दिखाई देती है, वह उस पुराने विशाल मकान का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है।

बाद में इसके संरक्षण की कोशिशें शुरू हुईं और दिल्ली सरकार तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से जुड़े प्रयासों के बाद इसे एक विरासत स्थल और संग्रहालय के रूप में विकसित किया गया। आज यह जगह Ghalib और उनके दौर को याद करने वाले लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

हवेली के अंदर पहुंचते ही सबसे पहले क्या दिखाई देता है?

Ghalib की हवेली का मौजूदा हिस्सा बहुत बड़ा नहीं है, इसलिए इसे देखने में पूरा दिन लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन छोटा होने के बावजूद यहाँ रखी चीजें काफी दिलचस्प हैं। हवेली की बनावट में पुरानी दिल्ली की पारंपरिक वास्तुकला की झलक मिलती है। लखौरी ईंटों और चूने के गारे से बनी पुरानी दीवारें, मेहराबदार हिस्से और बीच का आंगन इस जगह को बाकी आधुनिक इमारतों से बिल्कुल अलग बनाते हैं।

पहले यह आंगन खुले आसमान के नीचे रहा होगा, लेकिन अब संरक्षण के लिए इसके ऊपर फाइबरग्लास की छत बनाई गई है। इससे पुरानी संरचना को धूप और बारिश से बचाने में मदद मिलती है। अंदर पहुंचते ही आपको Ghalib से जुड़ी कई चीजें दिखाई देती हैं।

सबसे खास आकर्षणों में उनकी आदमकद प्रतिमा शामिल है। प्रतिमा में Ghalib को हुक्के के साथ बैठे हुए दिखाया गया है। सिर पर टोपी, पारंपरिक पोशाक और आराम की मुद्रा में बैठी यह प्रतिमा उस समय के उनके व्यक्तित्व की एक तस्वीर सामने रखती है।

ग़ालिब की पांडुलिपियां, खत और पुरानी चीजें क्यों खास हैं?

किसी भी लेखक या शायर को समझने का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ उनकी किताबें पढ़ना नहीं, बल्कि उनकी लिखावट और निजी जीवन से जुड़ी चीजों को देखना भी होता है। Ghalib की हवेली में यही अनुभव मिलता है। यहाँ Ghalib के जीवन और साहित्य से जुड़ी पांडुलिपियों, पत्रों और उनकी लिखावट के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं।

उर्दू और फ़ारसी की पुरानी किताबों के साथ उस दौर से जुड़ी कुछ वस्तुएं भी देखने को मिलती हैं। Ghalib के कपड़ों और उनकी पत्नी उमराव बेगम के पहनावे की प्रतिकृतियां भी प्रदर्शित की गई हैं। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि उस दौर के लोगों का पहनावा कैसा हुआ करता था।

हवेली में रखी चीजों को देखते हुए सबसे दिलचस्प अनुभव यह है कि यहाँ Ghalib को सिर्फ एक महान शायर के रूप में नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में भी समझने का मौका मिलता है। उनकी पसंद, उनका रहन-सहन, दोस्तों के साथ उनका समय और उनकी जिंदगी की परेशानियां—इन सबकी झलक उनके बारे में मौजूद सामग्री से मिलती है।

दीवारों पर लिखी ग़ालिब की शायरी आपको कुछ देर रुकने पर मजबूर करती है

Ghalib की हवेली में घूमते हुए एक चीज ऐसी है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है—उनकी शायरी। दीवारों पर उनकी मशहूर ग़ज़लों और शेरों की पंक्तियां लिखी हुई हैं। इन्हें पढ़ते हुए अचानक आपको महसूस होता है कि आप सिर्फ किसी संग्रहालय में नहीं घूम रहे, बल्कि उस शायर की दुनिया के बीच खड़े हैं जिसकी पंक्तियां आज भी उतनी ही जानी-पहचानी हैं।

उनकी एक मशहूर पंक्ति है—“उग रहा है दर-ओ-दीवार से सब्ज़ा ग़ालिब, हम बयाबाँ में हैं और घर में बहार आई है”। एक और शेर है—“तेरे वादे पर जिए हम तो यह जान झूठ जाना, कि खुशी से मर न जाते अगर एतबार होता”। और फिर वह पंक्ति, जिसे शायद आपने कई बार सुना होगा—“बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसान होना”। Ghalib की खासियत यही थी कि वह बहुत साधारण लगने वाली जिंदगी की बातों को भी ऐसी भाषा में लिख देते थे कि वह सालों बाद भी लोगों को अपनी लगती है।

आम, पतंग और शतरंज—शायर ग़ालिब की जिंदगी सिर्फ शायरी तक सीमित नहीं थी

Ghalib के बारे में बात करते समय अक्सर उनकी शायरी पर ही चर्चा होती है, लेकिन उनका व्यक्तित्व उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प था। उन्हें खाने-पीने का काफी शौक था। कबाब, भुना हुआ गोश्त, शामी कबाब, सोहन हलवा और आम जैसी चीजें उनकी पसंद से जुड़ी हुई बताई जाती हैं।

Ghalib

खासकर आमों के लिए Ghalib की दीवानगी का किस्सा काफी मशहूर है। कहा जाता है कि एक बार बहादुर शाह ज़फ़र के साथ बाग़ में घूमते हुए Ghalib आम के पेड़ को काफी देर तक देखते रहे। जब बादशाह ने वजह पूछी, तो Ghalib ने अपने मजाकिया अंदाज़ में कहा कि बुजुर्गों से सुना है कि हर दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है और वह देख रहे हैं कि किसी आम पर उनके बाप-दादा का नाम भी लिखा है या नहीं।

यह किस्सा कितना सच और कितना मशहूर लोककिस्सा है, इस पर अलग-अलग बातें मिलती हैं, लेकिन इससे Ghalib के हाजिरजवाबी वाले अंदाज़ की एक खूबसूरत तस्वीर जरूर सामने आती है। Ghalib को पतंग उड़ाना, शतरंज, चौपड़, पचीसी और गंजिफा जैसे खेल भी पसंद थे। दोस्तों के साथ बैठना, बातचीत करना और महफ़िलें जमाना भी उनकी जिंदगी का हिस्सा था।

1857 ने ग़ालिब की दिल्ली को हमेशा के लिए बदल दिया

अगर Ghalib की जिंदगी में किसी घटना का सबसे गहरा असर पड़ा, तो वह 1857 का विद्रोह था। उस समय दिल्ली राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल से गुजर रही थी। विद्रोह के बाद शाहजहाँनाबाद की स्थिति बहुत खराब हो गई। शहर में हिंसा हुई, कई इलाकों को नुकसान पहुंचा और मुग़ल सत्ता का अंत लगभग सामने आ गया।

बहादुर शाह ज़फ़र को दिल्ली से दूर कर दिया गया और वह दौर, जिसे Ghalib ने अपनी आंखों के सामने देखा था, तेजी से खत्म हो गया। Ghalib ने इस पूरे दौर का उल्लेख अपनी फ़ारसी रचना दस्तंबू में किया। उनकी लिखी बातों से उस समय की दिल्ली की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। उनकी एक पंक्ति इस दर्द को सामने रखती है—“चौक जिसको कहें, वह मक़तल है, आज घर बना है नमूना ज़िंदान का”।

यानी जिस शहर में कभी बाज़ार और महफ़िलें थीं, वही जगहें हिंसा और डर से भर गई थीं। आज Ghalib की हवेली में खड़े होकर 1857 के बारे में सोचना इसलिए भी खास लगता है क्योंकि यह वही शहर है जिसे Ghalib ने अपने जीवन के सबसे कठिन समय में देखा था।

बल्लीमारान की गलियों में आज भी पुरानी दिल्ली का रंग क्यों महसूस होता है?

Ghalib की हवेली देखने के बाद बाहर निकलते ही आप फिर से उसी पुरानी दिल्ली में लौट आते हैं जहाँ दुकानदार आवाज लगाते हैं, गलियों में लोगों की भीड़ रहती है और हर कुछ कदम पर खाने की खुशबू आती रहती है।

बल्लीमारान का इलाका खासतौर पर जूते और चश्मों के बाजार के लिए जाना जाता है। यहाँ घूमते हुए आपको पुरानी दिल्ली का वह रूप दिखाई देता है जहाँ बाजार सिर्फ खरीदारी की जगह नहीं बल्कि रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं।

Ghalib की हवेली की यात्रा को सिर्फ 30–40 मिनट की संग्रहालय यात्रा बनाकर खत्म करने के बजाय आसपास की गलियों में थोड़ा पैदल घूमना ज्यादा अच्छा अनुभव हो सकता है। एक तरफ इतिहास है और दूसरी तरफ आज की भागदौड़। यही पुरानी दिल्ली की खासियत है कि दोनों चीजें एक ही गली में साथ दिखाई देती हैं।

ग़ालिब की हवेली देखने के बाद पुरानी दिल्ली का स्वाद कैसे लें?

पुरानी दिल्ली घूमना हो और खाने की बात न हो, ऐसा शायद ही हो सकता है। Ghalib की हवेली के आसपास और चाँदनी चौक की तरफ आपको कई पुराने खाने-पीने के ठिकाने मिल जाएंगे। लाला रामकिशन दास जी की दुकान पर पूरियों और आलू की सब्जी के साथ सादा लेकिन पुराना दिल्ली वाला स्वाद लिया जा सकता है। वहीं बादशाह हलवाई की इमरती, जलेबी, बालूशाही और फजला जैसी मिठाइयां भी इलाके की खास पहचान हैं।

अगर आपको ठंडी लस्सी पसंद है तो A-1 मिल्क शॉप की कुल्हड़ लस्सी आजमा सकते हैं। इसके अलावा रबड़ी और दही भी यहां मिलते हैं। थोड़ा आगे जामा मस्जिद की तरफ जाएं तो मटिया महल का बाजार शुरू हो जाता है। यहां शीरमाल, कबाब और कई तरह के मुग़लई खाने का स्वाद लिया जा सकता है।

इस तरह Ghalib की हवेली की यात्रा सिर्फ इतिहास देखने तक सीमित नहीं रहती। यह शायरी, पुरानी दिल्ली की गलियों और यहां के खाने को एक साथ महसूस करने का मौका बन जाती है।

ग़ालिब की हवेली तक कैसे पहुंचें?

Ghalib की हवेली पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में गली कासिम जान में स्थित है। यहां निजी गाड़ी लेकर पहुंचना थोड़ा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि आसपास की गलियां काफी संकरी और भीड़भाड़ वाली हैं।

मेट्रो से आना सबसे आसान विकल्पों में से एक है। चाँदनी चौक और चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से आगे का रास्ता पैदल या ई-रिक्शा से पूरा किया जा सकता है। जामा मस्जिद मेट्रो स्टेशन से भी पुरानी दिल्ली के इस हिस्से तक पहुंचा जा सकता है।

अगर आप पहली बार जा रहे हैं, तो आखिरी कुछ दूरी पैदल चलने के लिए तैयार रहें। पुरानी दिल्ली में रास्ते की खूबसूरती भी इसी में है कि हर कुछ कदम पर कोई पुरानी दुकान, हवेली, मस्जिद, मंदिर या बाजार दिखाई देता है।

ग़ालिब की हवेली जाने का समय और टिकट कितना है?

दिए गए विवरण के अनुसार Ghalib की हवेली सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक खुली रहती है और दोपहर में थोड़े समय के लिए लंच ब्रेक रहता है। सोमवार को हवेली बंद रहने की जानकारी दी गई है।

यहाँ प्रवेश शुल्क न होने की जानकारी भी दी जाती है, लेकिन यात्रा से पहले समय और प्रवेश व्यवस्था की ताजा जानकारी जरूर जांच लेना बेहतर रहेगा, क्योंकि ऐतिहासिक स्थलों के समय और नियम कभी-कभी बदल सकते हैं।

अगर आप आराम से घूमना चाहते हैं तो खुलने के आसपास या फिर दोपहर के बाद का समय चुन सकते हैं। पुरानी दिल्ली में दोपहर की भीड़ को ध्यान में रखते हुए अपनी पूरी यात्रा का समय थोड़ा खुला रखना बेहतर रहेगा।

ग़ालिब की हवेली सिर्फ शायर की याद नहीं, पुरानी दिल्ली को समझने का एक रास्ता है

Ghalib की हवेली को देखने के बाद शायद सबसे बड़ी बात यही समझ आती है कि इतिहास हमेशा बड़ी-बड़ी इमारतों में ही नहीं मिलता। कभी-कभी एक छोटा-सा आंगन, पुरानी ईंटों की दीवार और किसी शायर की लिखी कुछ पंक्तियां भी पूरे दौर की तस्वीर सामने रख देती हैं।

Ghalib

यह जगह Ghalib के जीवन से जुड़ी है, लेकिन इसके जरिए आप 19वीं सदी की दिल्ली को भी समझ सकते हैं। वह दिल्ली जहाँ मुग़ल दरबार का असर था, जहाँ शायरों की महफ़िलें होती थीं, जहाँ गलियों में अलग-अलग तरह के लोग रहते थे और जहाँ कुछ ही दशकों में राजनीतिक और सामाजिक दुनिया पूरी तरह बदल गई।

आज उसी जगह के बाहर आधुनिक दुकानें हैं, मोबाइल फोन पर बातें करते लोग हैं, ई-रिक्शा हैं और खाने की दुकानों पर लगी भीड़ है। लेकिन हवेली के अंदर जाते ही कुछ देर के लिए समय जैसे थोड़ा पीछे चला जाता है। यही Ghalib की हवेली को खास बनाता है।

अगर आपको पुरानी दिल्ली को नए नजरिए से देखना है तो यहां जरूर जाएं

पुरानी दिल्ली घूमने वाले ज्यादातर लोग चाँदनी चौक, लाल किला, जामा मस्जिद और बाजारों तक सीमित रह जाते हैं। ये जगहें अपनी जगह बेहद खास हैं, लेकिन अगर आप दिल्ली के साहित्य और तहज़ीब से जुड़ा कोई छोटा लेकिन यादगार पड़ाव देखना चाहते हैं, तो Ghalib की हवेली को अपनी सूची में शामिल कर सकते हैं।

यहां आने के लिए आपको बहुत ज्यादा समय या किसी लंबे कार्यक्रम की जरूरत नहीं है। हवेली देखने के बाद आप बल्लीमारान की गलियों में घूम सकते हैं, चाँदनी चौक की तरफ जा सकते हैं, पुरानी दिल्ली का खाना खा सकते हैं और फिर जामा मस्जिद या आसपास की दूसरी ऐतिहासिक जगहों को अपनी यात्रा में जोड़ सकते हैं।

एक तरह से यह छोटी-सी यात्रा दिल्ली के कई रंग एक साथ दिखा देती है—इतिहास, साहित्य, बाजार, खाना और पुरानी तहज़ीब। और शायद यही वजह है कि Ghalib का नाम आज भी दिल्ली के साथ इतनी मजबूती से जुड़ा हुआ है।

Five Colors of Travel की ओर से कुछ खास सुझाव

  • पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में गाड़ी लेकर जाना और पार्किंग ढूंढना मुश्किल हो सकता है। इसलिए चाँदनी चौक या चावड़ी बाजार मेट्रो तक पहुंचकर आगे पैदल या ई-रिक्शा लेना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा।
  • जाने से पहले खुलने का समय और साप्ताहिक बंदी जरूर जांच लें। अगर संग्रहालय किसी विशेष दिन या रखरखाव के कारण बंद हो, तो आपकी यात्रा बेवजह खराब नहीं होगी।
  • सिर्फ हवेली देखकर वापस न लौटें। बल्लीमारान की गलियों, पुराने बाजारों और आसपास की ऐतिहासिक इमारतों को देखने के लिए कम से कम एक-दो घंटे अतिरिक्त रखें।
  • Ghalib की हवेली के बाद पुरानी दिल्ली के स्थानीय खाने का स्वाद आपकी यात्रा को और मजेदार बना सकता है। लेकिन भीड़ और साफ-सफाई का ध्यान रखते हुए वही चीजें खाएं जो आपको ताजा और ठीक तरीके से परोसी हुई लगें।
  • हवेली छोटी है, इसलिए हर चीज को ध्यान से देखने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। दीवारों पर लिखी शायरी, पांडुलिपियों और Ghalib के जीवन से जुड़ी जानकारी को थोड़ा समय देकर पढ़ें—यही इस जगह की असली खूबसूरती है।
Shivani Pal

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