ब्रह्मपुत्र पर बने सराइघाट Bridge का हुआ कायाकल्प
ब्रह्मपुत्र के ऊपर बने ऐतिहासिक सराइघाट ब्रिज का करीब ₹7 करोड़ की लागत से हुआ बड़ा कायाकल्प, मरम्मत के बाद रेल और सड़क संपर्क को मिलेगी मजबूती। अगर आप कभी ट्रेन से गुवाहाटी गए हैं, तो एक वक्त ऐसा जरूर आया होगा जब आपकी खिड़की के बाहर अचानक एक बहुत बड़ी नदी दिखाई दी होगी।
दोनों तरफ दूर तक फैला पानी, उसके ऊपर बना लोहे का विशाल ढांचा और नीचे बहती ब्रह्मपुत्र नदी… यही वो पल होता है जब समझ आता है कि आप पूर्वोत्तर भारत के एक खास हिस्से में पहुंच चुके हैं। ब्रह्मपुत्र के ऊपर बना सराइघाट Bridge सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं है। यह असम और पूर्वोत्तर भारत के बाकी हिस्सों के बीच लंबे समय से एक बेहद जरूरी कड़ी रहा है। करीब छह दशक से ज्यादा समय से यह पुल रेल और सड़क यातायात को संभाल रहा है और इसके साथ असम के आधुनिक परिवहन इतिहास का एक बड़ा हिस्सा भी जुड़ा हुआ है।
अब इतने लंबे समय तक सेवा देने के बाद इस पुराने Bridge का बड़ा पुनर्वास किया गया है। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक करीब ₹7 करोड़ की लागत से इसके जरूरी हिस्सों की मरम्मत और मजबूती का काम किया गया। आठ पुराने एक्सपेंशन जॉइंट्स, रोड डेक और कई संरचनात्मक हिस्सों पर काम हुआ है। लेकिन इस Bridge की कहानी सिर्फ मरम्मत तक सीमित नहीं है।
इसके पीछे 1950 और 1960 के दशक का वो दौर है, जब ब्रह्मपुत्र के दोनों किनारों को जोड़ना पूर्वोत्तर के लिए एक बहुत बड़ी जरूरत थी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय भी इस पुल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तो आखिर सराइघाट Bridge इतना खास क्यों है? इसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? छह दशक बाद इसमें क्या काम किया गया और दिल्ली से गुवाहाटी तक ट्रेन से जाने वाले यात्रियों के लिए इसका क्या मतलब है? आइए पूरी कहानी आसान भाषा में समझते हैं।
ब्रह्मपुत्र के ऊपर पुल बनने से पहले सफर इतना आसान नहीं था
आज हम गुवाहाटी से देश के अलग-अलग हिस्सों में ट्रेन, सड़क और हवाई रास्ते से आसानी से पहुंच सकते हैं। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। सराइघाट Bridge बनने से पहले ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों किनारों के बीच सीधा रेल संपर्क नहीं था। उस समय सामान और यात्रियों को एक किनारे तक ट्रेन से लाया जाता था। इसके बाद नदी पार करने के लिए फेरी या नाव का सहारा लेना पड़ता था और दूसरी तरफ पहुंचने के बाद फिर से रेल यात्रा शुरू होती थी।
यानी एक ही सफर में बार-बार साधन बदलने पड़ते थे। चाय और कोयले जैसे सामानों की आवाजाही भी इसी वजह से मुश्किल होती थी। असम के चाय बागानों और दूसरे इलाकों से सामान नदी के किनारे तक पहुंचाया जाता और फिर ब्रह्मपुत्र पार करके आगे भेजा जाता था।
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ऐसे में एक स्थायी Bridge की जरूरत लगातार महसूस की जा रही थी। ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी के ऊपर पुल बनाना आसान काम नहीं था, लेकिन अगर असम को देश के बाकी हिस्सों से बेहतर तरीके से जोड़ना था, तो इस दिशा में आगे बढ़ना जरूरी था।
सराइघाट ब्रिज बनाने का फैसला कब हुआ?
ब्रह्मपुत्र पर पुल बनाने का विचार काफी पुराना था, लेकिन आज के सराइघाट Bridge के निर्माण की दिशा में बड़ा कदम 1958 के रेलवे बजट के दौरान उठा। तत्कालीन रेल मंत्री जगजीवन राम ने संसद में ब्रह्मपुत्र पर पुल के निर्माण से जुड़ी योजना की जानकारी दी थी।
इसके बाद निर्माण की तैयारी शुरू हुई और 1959 में काम आगे बढ़ा। पुल का निर्माण उस समय की तकनीकी क्षमता और परिस्थितियों को देखते हुए अपने आप में बहुत बड़ा काम था। ब्रिज का मुख्य निर्माण सितंबर 1962 तक पूरा हो गया था। 23 सितंबर 1962 को पहला इंजन इस पुल से गुजरा और 31 अक्टूबर 1962 को पहली मालगाड़ी ने पुल पार किया।
बाद में ऊपर का सड़क वाला हिस्सा भी शुरू हुआ और 7 जून 1963 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे औपचारिक रूप से राष्ट्र को समर्पित किया। यानी Bridge का इतिहास सिर्फ एक तारीख से नहीं जुड़ा है। 1962 में रेल सेवा शुरू होने और 1963 में औपचारिक उद्घाटन के साथ इसका इस्तेमाल धीरे-धीरे बढ़ता गया और यह असम की परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा बन गया।
1962 का युद्ध और सराइघाट ब्रिज की अहमियत
सराइघाट Bridge का इतिहास भारत के रणनीतिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। जिस साल इस पुल पर रेल यातायात शुरू हुआ, उसी साल भारत-चीन युद्ध हुआ। उस समय पूर्वोत्तर क्षेत्र तक सेना और जरूरी सामान पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी।
ब्रह्मपुत्र को पार करने के लिए पहले जिस नदी परिवहन व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता था, उसकी जगह अब इस नए Bridge ने तेज और सीधा रेल संपर्क उपलब्ध कराया। रिपोर्टों के मुताबिक 1962 के युद्ध के दौरान पुल से सेना के लिए हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सामान पहुंचाने में मदद मिली।
इस वजह से सराइघाट Bridge सिर्फ परिवहन की सुविधा नहीं रहा, बल्कि देश की रणनीतिक जरूरतों के लिए भी महत्वपूर्ण बन गया। यही वजह है कि आज जब इस पुल की बात होती है, तो इसमें सिर्फ इंजीनियरिंग नहीं बल्कि उस समय की राष्ट्रीय जरूरत और पूर्वोत्तर के साथ देश के संपर्क की कहानी भी दिखाई देती है।
इस Bridge का नाम सराइघाट क्यों पड़ा?
सराइघाट नाम भी अपने आप में इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसी क्षेत्र में 1671 में अहोम सेना और मुगल सेना के बीच प्रसिद्ध सराइघाट का युद्ध हुआ था। अहोम सेना का नेतृत्व लाचित बरफुकन ने किया था। ब्रह्मपुत्र के इसी क्षेत्र से जुड़ी उस ऐतिहासिक लड़ाई के नाम पर बाद में इस Bridge का नाम सराइघाट रखा गया। इसलिए जब कोई ट्रेन आज इस पुल से गुजरती है, तो वह सिर्फ ब्रह्मपुत्र को पार नहीं कर रही होती।
उसके नीचे वही नदी बह रही होती है जिसके किनारे सदियों पहले सराइघाट का युद्ध हुआ था और ऊपर बना Bridge आधुनिक भारत के परिवहन इतिहास की एक बड़ी उपलब्धि को दिखाता है।
छह दशक बाद आखिर मरम्मत की जरूरत क्यों पड़ी?
कोई भी पुल कितनी भी मजबूत तकनीक से बनाया गया हो, लेकिन लगातार इतने वर्षों तक भारी यातायात, बारिश, नमी और मौसम का सामना करने के बाद उसके कुछ हिस्सों में टूट-फूट होना स्वाभाविक है। सराइघाट Bridge भी छह दशक से ज्यादा समय से लगातार इस्तेमाल में है।
समय के साथ इसके रोड डेक के कुछ हिस्सों में खराबी, पानी के रिसाव और एक्सपेंशन जॉइंट्स से जुड़ी समस्याएं सामने आईं। आपके दिए गए विवरण और हाल की रिपोर्ट के मुताबिक इस बार मरम्मत में खास ध्यान आठ क्षतिग्रस्त एक्सपेंशन जॉइंट्स पर दिया गया।
इसके अलावा रोड डेक और दूसरे जरूरी संरचनात्मक हिस्सों को भी ठीक किया गया। करीब ₹7 करोड़ की लागत वाले इस पुनर्वास को लंबे समय तक पुल को सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया है। यानी यह सिर्फ ऊपर से सड़क पर नई परत बिछाने जैसा छोटा काम नहीं था। पुल के उन हिस्सों पर काम किया गया जो लंबे समय तक इसके इस्तेमाल और सुरक्षा के लिए जरूरी हैं।
दो महीने के काम में क्या-क्या बदला गया?
इस मरम्मत अभियान के दौरान Bridge पर कई जरूरी काम किए गए। सबसे महत्वपूर्ण काम एक्सपेंशन जॉइंट्स का था। पुल के अलग-अलग हिस्सों में तापमान और संरचना की हलचल को संभालने के लिए ये जॉइंट्स जरूरी होते हैं। पुराने और खराब हो चुके आठ एक्सपेंशन जॉइंट्स पर काम किया गया। इसके साथ रोड डेक के क्षतिग्रस्त हिस्सों को हटाकर नए कंक्रीट का काम किया गया।
पुल के निचले हिस्से में मौजूद स्टील संरचना की भी मरम्मत और मजबूती की गई। ऊपर सड़क की परत से जुड़े काम के साथ पहुंच वाली सड़कों पर भी जरूरी सुधार किए गए। इस पूरे काम के दौरान ट्रैफिक को संभालना भी बड़ी चुनौती थी, क्योंकि यह कोई बंद पड़ा हुआ पुराना ढांचा नहीं है। यह आज भी असम के परिवहन नेटवर्क का जरूरी हिस्सा है।
13 जुलाई से 15 सितंबर तक चला बड़ा मरम्मत अभियान
आपके दिए गए कंटेंट के अनुसार मरम्मत का काम 13 जुलाई 2026 से शुरू हुआ और 15 सितंबर 2026 तक पूरा किया गया। इसके लिए करीब दो महीने का विशेष ट्रैफिक ब्लॉक लिया गया था। इतने पुराने और व्यस्त Bridge पर काम करते समय सिर्फ निर्माण करना ही चुनौती नहीं होता।
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काम के साथ सुरक्षा, यातायात, आसपास के लोगों की आवाजाही और रेल परिचालन को भी ध्यान में रखना पड़ता है। इसी वजह से बड़े मरम्मत कार्यों के लिए पहले से योजना बनानी पड़ती है। सराइघाट Bridge के मामले में भी इसी तरह चरणबद्ध तरीके से काम पूरा किया गया।
दिल्ली-गुवाहाटी ट्रेन यात्रियों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर आप दिल्ली से गुवाहाटी ट्रेन से जाते हैं, तो सराइघाट Bridge आपके सफर के अंतिम हिस्से में आने वाली उन महत्वपूर्ण संरचनाओं में से एक है जो पूर्वोत्तर की रेल कनेक्टिविटी को आगे बढ़ाती हैं। Bridge की मरम्मत और मजबूती का सीधा फायदा सिर्फ गुवाहाटी जाने वाले यात्रियों को ही नहीं बल्कि पूरे रेल नेटवर्क को मिलता है।
मालगाड़ियों और यात्री ट्रेनों के लिए यह मार्ग महत्वपूर्ण है। जब किसी बड़े पुल पर रख-रखाव का काम जरूरी होता है, तो उसका असर ट्रेन संचालन और सड़क यातायात दोनों पर पड़ सकता है। इसलिए समय रहते जरूरी मरम्मत करना लंबे समय में बेहतर परिचालन के लिए जरूरी होता है।
इस Bridge के साथ जुड़ी कनेक्टिविटी को और मजबूत करने की दिशा में नए प्रोजेक्ट भी चल रहे हैं। केंद्र सरकार की मार्च 2026 की जानकारी में सराइघाट Bridge डबलिंग परियोजना को करीब ₹1,474 करोड़ की लागत वाली परियोजनाओं की सूची में शामिल किया गया था।
नया सराइघाट ब्रिज पहले से ही इस इलाके में है
कई लोगों को लगता है कि गुवाहाटी में सिर्फ यही एक सराइघाट Bridge है, लेकिन ऐसा नहीं है। पुराने सराइघाट Bridge के पास एक नया Bridge भी बनाया गया है। नया सराइघाट Bridge पुराने पुल के समानांतर बना सड़क पुल है और इसे 2017 में शुरू किया गया था।
इससे पुराने Bridge पर सड़क यातायात का दबाव कम करने में मदद मिली। यानी आज जब आप इस इलाके में पहुंचते हैं तो ब्रह्मपुत्र के ऊपर पुराने ऐतिहासिक ढांचे के साथ नया Bridge भी दिखाई देता है। एक तरफ छह दशक से ज्यादा पुराना ढांचा है, दूसरी तरफ आधुनिक जरूरतों के हिसाब से विकसित नया संपर्क मार्ग।
आगे बन रहा नया रेल-सह-सड़क पुल भी क्यों जरूरी है?
सराइघाट क्षेत्र में कनेक्टिविटी को लेकर आगे भी काम जारी है। 2022 में मौजूदा सराइघाट Bridge के पास ब्रह्मपुत्र पर एक नए रेल-सह-सड़क पुल की परियोजना को मंजूरी दी गई थी। उस समय इसकी स्वीकृत लागत ₹996.75 करोड़ बताई गई थी।
इस तरह के नए पुल बनने का सबसे बड़ा फायदा यही होता है कि पुराने ढांचे पर निर्भरता कम की जा सके और भविष्य में बढ़ने वाले यातायात को संभालने के लिए अतिरिक्त क्षमता तैयार हो। आज पूर्वोत्तर में सड़क और रेल दोनों स्तर पर कनेक्टिविटी का विस्तार हो रहा है। ऐसे में सराइघाट जैसे पुराने पुल को मजबूत बनाए रखना और उसके साथ नई क्षमता तैयार करना दोनों जरूरी हैं।
दिल्ली-गुवाहाटी रेल रूट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
दिल्ली से गुवाहाटी तक का रेल सफर सिर्फ दो बड़े शहरों को जोड़ने वाला रास्ता नहीं है। यह देश के बाकी हिस्सों को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ने वाली लंबी रेल कड़ी का हिस्सा है।
इस मार्ग से यात्रियों के साथ बड़ी मात्रा में सामान भी आता-जाता है। असम और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों तक जरूरी वस्तुओं की आवाजाही में रेल की बड़ी भूमिका है। गुवाहाटी पूर्वोत्तर का एक महत्वपूर्ण परिवहन केंद्र है। यहां से आगे असम के अलग-अलग हिस्सों और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों के लिए सड़क और रेल संपर्क मिलता है।
इसलिए इस Route में आने वाली किसी भी बड़ी संरचना की मजबूती पूरे क्षेत्र की कनेक्टिविटी से जुड़ जाती है। यही कारण है कि सराइघाट Bridge की मरम्मत को सिर्फ स्थानीय काम के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
क्या इस मरम्मत के बाद ट्रेन की रफ्तार भी बढ़ेगी?
यह समझना जरूरी है कि किसी पुल की मरम्मत का मतलब अपने आप ट्रेन की गति बढ़ जाना नहीं होता। ट्रेन की अधिकतम गति कई चीजों पर निर्भर करती है, जिसमें ट्रैक की स्थिति, पुल की क्षमता, सिग्नलिंग, सेक्शन की अनुमति और पूरे रेल मार्ग की परिस्थितियां शामिल होती हैं।
हां, किसी महत्वपूर्ण Bridge की संरचनात्मक स्थिति बेहतर होने से सुरक्षित और भरोसेमंद परिचालन के लिए आधार मजबूत होता है। आगे चलकर अगर पूरे Route पर ट्रैक और दूसरे ढांचे का भी सुधार होता है, तो यात्रा समय कम करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इसलिए सराइघाट Bridge का यह काम लंबी अवधि में बेहतर रेल कनेक्टिविटी की दिशा में एक जरूरी कदम माना जा सकता है।
ब्रह्मपुत्र के ऊपर से गुजरते समय ट्रेन में क्या महसूस होता है?
अगर आपने अभी तक ट्रेन से सराइघाट Bridge पार नहीं किया है, तो गुवाहाटी की यात्रा में यह हिस्सा आपको जरूर याद रहेगा। जैसे ही ट्रेन पुल पर पहुंचती है, खिड़की से बाहर ब्रह्मपुत्र का चौड़ा फैलाव दिखाई देता है। नदी की चौड़ाई, पानी के ऊपर चलता लंबा Bridge और दोनों तरफ का खुला आसमान सफर को अलग ही अनुभव देता है।
दिन के समय नदी का पूरा फैलाव साफ दिखाई देता है। मौसम साफ हो तो आसपास के इलाके भी नजर आते हैं। शाम के समय नजारा और बदल जाता है। हालांकि ट्रेन से गुजरते समय फोटो लेने के चक्कर में सुरक्षा से समझौता नहीं करना चाहिए। खिड़की या दरवाजे से बाहर निकलकर फोटो लेने जैसी हरकत बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।
गुवाहाटी पहुंचें तो सिर्फ Bridge देखकर वापस न आएं
अगर आप गुवाहाटी यात्रा के लिए जा रहे हैं, तो सराइघाट Bridge के साथ शहर की दूसरी खास जगहों को भी अपनी योजना में शामिल कर सकते हैं। गुवाहाटी में नीलाचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। इसके अलावा ब्रह्मपुत्र नदी पर क्रूज और नाव की सवारी भी शहर के अनुभव को अलग बना सकती है।
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शाम के समय नदी के आसपास का माहौल काफी सुंदर लगता है। अगर आप फोटो या वीडियो बनाना पसंद करते हैं, तो मौसम साफ होने पर सूर्यास्त का समय अच्छा रह सकता है। बस ध्यान रखें कि नदी, पुल या किसी भी रेल क्षेत्र में फोटो बनाते समय सुरक्षा नियमों का पालन करना जरूरी है।
सराइघाट सिर्फ एक पुल नहीं, असम की बदलती तस्वीर का हिस्सा है
किसी भी पुराने ढांचे को देखकर अक्सर हमें सिर्फ उसकी उम्र दिखाई देती है। लेकिन सराइघाट Bridge की कहानी इससे कहीं बड़ी है। इस पुल ने उस समय ब्रह्मपुत्र को पार करने का रास्ता आसान किया जब नदी के दोनों किनारों के बीच रेल संपर्क एक बड़ी समस्या था। फिर 1962 के युद्ध के समय इसका रणनीतिक महत्व सामने आया।
इसके बाद दशकों तक इसने यात्रियों, मालगाड़ियों और सड़क यातायात को संभाला। अब जब छह दशक से ज्यादा समय बाद इसके महत्वपूर्ण हिस्सों का पुनर्वास किया गया है, तो यह एक तरह से पुराने ढांचे को नई जरूरतों के लिए तैयार करने की कोशिश भी है। साथ ही नए Bridge और डबलिंग जैसी परियोजनाएं यह दिखाती हैं कि आने वाले समय में पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी को सिर्फ पुराने ढांचों के भरोसे नहीं छोड़ा जा रहा।
आने वाले समय में पूर्वोत्तर का सफर कितना बदलेगा?
पूर्वोत्तर भारत में रेल और सड़क संपर्क लगातार बढ़ रहा है। नए रेल मार्ग, दोहरीकरण, पुल और सड़क परियोजनाएं इस क्षेत्र को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण हैं। सराइघाट Bridge इसी पूरी तस्वीर का एक हिस्सा है।
पुराने Bridge को मजबूत करना तत्काल जरूरत को संभालता है, जबकि नए पुल और लाइन क्षमता से जुड़े प्रोजेक्ट भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हैं। मार्च 2026 में केंद्र सरकार द्वारा दी गई जानकारी में सराइघाट Bridge डबलिंग के साथ न्यू बोंगाईगांव–गोआलपाड़ा–गुवाहाटी दोहरीकरण जैसी परियोजनाओं का भी उल्लेख किया गया था।
इसका मतलब साफ है कि पूर्वोत्तर का रेल नेटवर्क आने वाले समय में सिर्फ यात्रियों की संख्या संभालने के लिए नहीं, बल्कि बढ़ते माल और क्षेत्रीय संपर्क की जरूरतों के हिसाब से भी विकसित किया जा रहा है।
Five Colors of Travel की ओर से खास सुझाव
- अगर आप ट्रेन से गुवाहाटी जा रहे हैं तो खिड़की से ब्रह्मपुत्र का नजारा जरूर देखें। यह सफर का ऐसा हिस्सा है जहां आपको असम के इतिहास और आज की कनेक्टिविटी दोनों एक साथ महसूस होंगी।
- पुराना Bridge रेल और सड़क यातायात के लिए इस्तेमाल होता है, इसलिए सिर्फ फोटो के लिए ट्रैक, रेल लाइन या प्रतिबंधित हिस्से के पास जाने की कोशिश न करें। सुरक्षित जगह से ही तस्वीरें और वीडियो बनाएं।
- अगर आपके पास एक दिन का अतिरिक्त समय है तो गुवाहाटी को सिर्फ स्टेशन तक सीमित न रखें। कामाख्या मंदिर, नदी के आसपास के क्षेत्र और स्थानीय बाजारों को अपनी यात्रा में शामिल कर सकते हैं।
- असम में बारिश और नमी का असर मौसम के हिसाब से काफी बदल सकता है। निकलने से पहले मौसम की जानकारी लें और उसके अनुसार छाता, हल्के कपड़े, जरूरी दवाइयां और आरामदायक जूते साथ रखें।
- दिल्ली से गुवाहाटी की यात्रा लंबी है, इसलिए पानी, हल्का खाना, मोबाइल चार्ज रखने का इंतजाम और जरूरी सामान अपने छोटे बैग में रखें। सफर को सिर्फ गंतव्य तक पहुंचने का जरिया न मानें, रास्ते में दिखने वाले पूर्वोत्तर के बदलते नजारे भी इस यात्रा का हिस्सा हैं।
सराइघाट Bridge की कहानी असल में एक पुल की कहानी से कहीं ज्यादा बड़ी है। यह उस दौर की याद दिलाता है जब ब्रह्मपुत्र के दोनों किनारों को जोड़ना पूर्वोत्तर के लिए एक बड़ी चुनौती था। 1962 में रेल यातायात शुरू होने और 1963 में औपचारिक उद्घाटन के बाद इस पुल ने असम और देश के बाकी हिस्सों के बीच संपर्क को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।
छह दशक से ज्यादा समय बाद इसका पुनर्वास इस बात का उदाहरण है कि पुराने और महत्वपूर्ण ढांचों की देखभाल कितनी जरूरी होती है। करीब ₹7 करोड़ की लागत से किए गए हालिया काम में एक्सपेंशन जॉइंट्स, रोड डेक और दूसरे जरूरी हिस्सों पर ध्यान दिया गया है। और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इसके आसपास नई कनेक्टिविटी परियोजनाएं, Bridge डबलिंग और रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने के काम भी आगे बढ़ रहे हैं।
इसलिए अगली बार जब आपकी ट्रेन ब्रह्मपुत्र के ऊपर से गुजरे और खिड़की के बाहर लोहे का यह विशाल ढांचा दिखाई दे, तो एक पल के लिए जरूर सोचिएगा—आप सिर्फ एक नदी पार नहीं कर रहे हैं, बल्कि उस Bridge से गुजर रहे हैं जिसने छह दशक से ज्यादा समय से पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने में अपनी अहम भूमिका निभाई है।