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ब्रह्मपुत्र पर बने सराइघाट Bridge का हुआ कायाकल्प

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ब्रह्मपुत्र के ऊपर बने ऐतिहासिक सराइघाट ब्रिज का करीब ₹7 करोड़ की लागत से हुआ बड़ा कायाकल्प, मरम्मत के बाद रेल और सड़क संपर्क को मिलेगी मजबूती। अगर आप कभी ट्रेन से गुवाहाटी गए हैं, तो एक वक्त ऐसा जरूर आया होगा जब आपकी खिड़की के बाहर अचानक एक बहुत बड़ी नदी दिखाई दी होगी। दोनों तरफ दूर तक फैला पानी, उसके ऊपर बना लोहे का विशाल ढांचा और नीचे बहती ब्रह्मपुत्र नदी… यही वो पल होता है जब समझ आता है कि आप पूर्वोत्तर भारत के एक खास हिस्से में पहुंच चुके हैं। ब्रह्मपुत्र के ऊपर बना सराइघाट Bridge सिर्फ आने-जाने का रास्ता नहीं है। यह असम और पूर्वोत्तर भारत के बाकी हिस्सों के बीच लंबे समय से एक बेहद जरूरी कड़ी रहा है। करीब छह दशक से ज्यादा समय से यह पुल रेल और सड़क यातायात को संभाल रहा है और इसके साथ असम के आधुनिक परिवहन इतिहास का एक बड़ा हिस्सा भी जुड़ा हुआ है। अब इतने लंबे समय तक सेवा देने के बाद इस पुराने Bridge का बड़ा पुनर्वास किया गया है। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक करीब ₹7 करोड़ की लागत से इसके जरूरी हिस्सों की मरम्मत और मजबूती का काम किया गया। आठ पुराने एक्सपेंशन जॉइंट्स, रोड डेक और कई संरचनात्मक हिस्सों पर काम हुआ है। लेकिन इस Bridge की कहानी सिर्फ मरम्मत तक सीमित नहीं है। इसके पीछे 1950 और 1960 के दशक का वो दौर है, जब ब्रह्मपुत्र के दोनों किनारों को जोड़ना पूर्वोत्तर के लिए एक बहुत बड़ी जरूरत थी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय भी इस पुल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तो आखिर सराइघाट Bridge इतना खास क्यों है? इसे बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? छह दशक बाद इसमें क्या काम किया गया और दिल्ली से गुवाहाटी तक ट्रेन से जाने वाले यात्रियों के लिए इसका क्या मतलब है? आइए पूरी कहानी आसान भाषा में समझते हैं। ब्रह्मपुत्र के ऊपर पुल बनने से पहले सफर इतना आसान नहीं था आज हम गुवाहाटी से देश के अलग-अलग हिस्सों में ट्रेन, सड़क और हवाई रास्ते से आसानी से पहुंच सकते हैं। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था। सराइघाट Bridge बनने से पहले ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों किनारों के बीच सीधा रेल संपर्क नहीं था। उस समय सामान और यात्रियों को एक किनारे तक ट्रेन से लाया जाता था। इसके बाद नदी पार करने के लिए फेरी या नाव का सहारा लेना पड़ता था और दूसरी तरफ पहुंचने के बाद फिर से रेल यात्रा शुरू होती थी। यानी एक ही सफर में बार-बार साधन बदलने पड़ते थे। चाय और कोयले जैसे सामानों की आवाजाही भी इसी वजह से मुश्किल होती थी। असम के चाय बागानों और दूसरे इलाकों से सामान नदी के किनारे तक पहुंचाया जाता और फिर ब्रह्मपुत्र पार करके आगे भेजा जाता था। ऐसे में एक स्थायी Bridge की जरूरत लगातार महसूस की जा रही थी। ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी के ऊपर पुल बनाना आसान काम नहीं था, लेकिन अगर असम को देश के बाकी हिस्सों से बेहतर तरीके से जोड़ना था, तो इस दिशा में आगे बढ़ना जरूरी था। सराइघाट ब्रिज बनाने का फैसला कब हुआ? ब्रह्मपुत्र पर पुल बनाने का विचार काफी पुराना था, लेकिन आज के सराइघाट Bridge के निर्माण की दिशा में बड़ा कदम 1958 के रेलवे बजट के दौरान उठा। तत्कालीन रेल मंत्री जगजीवन राम ने संसद में ब्रह्मपुत्र पर पुल के निर्माण से जुड़ी योजना की जानकारी दी थी। इसके बाद निर्माण की तैयारी शुरू हुई और 1959 में काम आगे बढ़ा। पुल का निर्माण उस समय की तकनीकी क्षमता और परिस्थितियों को देखते हुए अपने आप में बहुत बड़ा काम था। ब्रिज का मुख्य निर्माण सितंबर 1962 तक पूरा हो गया था। 23 सितंबर 1962 को पहला इंजन इस पुल से गुजरा और 31 अक्टूबर 1962 को पहली मालगाड़ी ने पुल पार किया। बाद में ऊपर का सड़क वाला हिस्सा भी शुरू हुआ और 7 जून 1963 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे औपचारिक रूप से राष्ट्र को समर्पित किया। यानी Bridge का इतिहास सिर्फ एक तारीख से नहीं जुड़ा है। 1962 में रेल सेवा शुरू होने और 1963 में औपचारिक उद्घाटन के साथ इसका इस्तेमाल धीरे-धीरे बढ़ता गया और यह असम की परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा बन गया। 1962 का युद्ध और सराइघाट ब्रिज की अहमियत सराइघाट Bridge का इतिहास भारत के रणनीतिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है। जिस साल इस पुल पर रेल यातायात शुरू हुआ, उसी साल भारत-चीन युद्ध हुआ। उस समय पूर्वोत्तर क्षेत्र तक सेना और जरूरी सामान पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी। ब्रह्मपुत्र को पार करने के लिए पहले जिस नदी परिवहन व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता था, उसकी जगह अब इस नए Bridge ने तेज और सीधा रेल संपर्क उपलब्ध कराया। रिपोर्टों के मुताबिक 1962 के युद्ध के दौरान पुल से सेना के लिए हथियार, गोला-बारूद और जरूरी सामान पहुंचाने में मदद मिली। इस वजह से सराइघाट Bridge सिर्फ परिवहन की सुविधा नहीं रहा, बल्कि देश की रणनीतिक जरूरतों के लिए भी महत्वपूर्ण बन गया। यही वजह है कि आज जब इस पुल की बात होती है, तो इसमें सिर्फ इंजीनियरिंग नहीं बल्कि उस समय की राष्ट्रीय जरूरत और पूर्वोत्तर के साथ देश के संपर्क की कहानी भी दिखाई देती है। इस Bridge का नाम सराइघाट क्यों पड़ा? सराइघाट नाम भी अपने आप में इतिहास से जुड़ा हुआ है। इसी क्षेत्र में 1671 में अहोम सेना और मुगल सेना के बीच प्रसिद्ध सराइघाट का युद्ध हुआ था। अहोम सेना का नेतृत्व लाचित बरफुकन ने किया था। ब्रह्मपुत्र के इसी क्षेत्र से जुड़ी उस ऐतिहासिक लड़ाई के नाम पर बाद में इस Bridge का नाम सराइघाट रखा गया। इसलिए जब कोई ट्रेन आज इस पुल से गुजरती है, तो वह सिर्फ ब्रह्मपुत्र को पार नहीं कर रही होती। उसके नीचे वही नदी बह रही होती है जिसके किनारे सदियों पहले सराइघाट का युद्ध हुआ था और ऊपर बना Bridge आधुनिक भारत के परिवहन इतिहास की एक बड़ी उपलब्धि को दिखाता है। छह दशक बाद आखिर मरम्मत की जरूरत क्यों पड़ी? कोई भी पुल कितनी भी मजबूत तकनीक से बनाया गया हो, लेकिन लगातार इतने वर्षों तक भारी यातायात, बारिश, नमी और मौसम का सामना