Fatehpuri Masjid:1650 में बना मुग़ल वास्तुकला का Masterpiece
पुरानी दिल्ली की गलियों में कदम रखते ही इतिहास की महक महसूस होने लगती है। यहाँ की हर इमारत अपनी एक दास्तान सुनाती है, लेकिन चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर स्थित Fatehpuri Masjid की बात ही कुछ और है। जहाँ एक तरफ लाल क़िला मुग़लिया सल्तनत की सियासी ताक़त का निशान है, वहीं Fatehpuri Masjid उसी सड़क के दूसरे छोर पर रूहानी और मज़हबी ताक़त का संतुलन बनाए रखती है। यह मस्जिद न केवल इबादत की जगह है, बल्कि दिल्ली के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास की एक खामोश चश्मदीद गवाह भी रही है।
Fatehpuri Masjid का शानदार इतिहास
Fatehpuri Masjid का निर्माण सन् 1650 में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की एक बेगम, फ़तेहपुरी बेगम ने करवाया था। बेगम साहिबा फ़तेहपुर की रहने वाली थीं, इसीलिए उनके नाम पर इस मस्जिद का नाम Fatehpuri Masjidपड़ा। दिलचस्प बात यह है कि ताजमहल परिसर में बनी मस्जिद भी इन्हीं बेगम के नाम पर है। इतिहासकारों का मानना है कि मुग़ल दौर में शाही घराने की महिलाओं द्वारा मस्जिदें बनवाना ताक़त दिखाने का एक ज़रिया भी था। Fatehpuri Masjidको दिल्ली की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद माना जाता है और कई मायनों में इसे जामा मस्जिद की ‘प्रतिद्वंद्वी’ (Rival) के तौर पर देखा जाता था।

मुग़ल वास्तुकला का एक बेहतरीन और नायाब नमूना
यह मस्जिद मुग़ल दौर की वास्तुकला का एक बेमिसाल नमूना है, जिसे मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) से तैयार किया गया है। मस्जिद का मुख्य ढांचा एक विशाल और ऊँचे प्लेटफॉर्म पर टिका है, जिसके दोनों किनारों पर ऊँची और शानदार मीनारें बनी हुई हैं।
मस्जिद के ऊपर एक विशाल मुख्य गुंबद है, जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगा देता है। मस्जिद के मुख्य प्रार्थना हॉल में सात मेहराबदार रास्ते हैं, जिनमें बीच वाली मेहराब सबसे ऊँची है और इसे सफ़ेद संगमरमर की पट्टियों से सजाया गया है। अंदरूनी हिस्से में दीवारों और छतों पर बारीक कैलीग्राफी और ज्यामितीय पैटर्न बने हुए हैं, जो उस दौर के कारीगरों की महारत को दर्शाते हैं।
मस्जिद का आँगन बहुत ही विशाल और खुला है, जो लाल पत्थर से बना है और यहाँ आकर एक अजीब सा सुकून मिलता है। आँगन के ठीक बीच में हाथ-मुँह धोने के लिए एक बड़ा तालाब या हौज बना हुआ है, जो सफ़ेद संगमरमर से तैयार किया गया है। मुग़ल काल में इस हौज में चाँदनी चौक से गुज़रने वाली नहर का पानी आता था, लेकिन 1857 के दौरान इसे काफ़ी नुक़सान पहुँचाया गया और बाद में इसे दोबारा बनाया गया। मस्जिद के अंदर एक सफ़ेद संगमरमर का मिम्बर यानी उपदेश देने का मंच (Pulpit) भी मौजूद है, जिसमें चार सीढ़ियाँ हैं और इसका इस्तेमाल उपदेश देने के लिए किया जाता है।
1857 की क्रांति और मस्जिद की नीलामी की दर्दभरी कहानी
Fatehpuri Masjid ने दिल्ली के इतिहास के सबसे काले दिन भी देखे हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (Sepoy Mutiny) के दौरान यहाँ के उलेमा () और इबादत करने वालों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। अंग्रेज़ों ने इस मस्जिद को बग़ावत का एक बड़ा केंद्र माना और इसीलिए जंग के बाद इसे ज़ब्त कर लिया। अंग्रेज़ अफ़सरों ने तो यहाँ तक सुझाव दिया था कि इस मस्जिद को पूरी तरह ढहा दिया जाए, लेकिन बाद में इसे नीलाम करने का फ़ैसला लिया गया।

सन् 1860 में, दिल्ली के एक रईस हिंदू व्यापारी, राय लाला चुन्ना मल ने इस मस्जिद को महज़ 19,000 (कुछ स्रोतों के अनुसार 39,650) रुपये में अंग्रेज़ों से ख़रीद लिया। लाला चुन्ना मल ने इस पवित्र जगह की गरिमा को बनाए रखा, हालाँकि इसके कुछ हिस्सों का इस्तेमाल उस वक़्त सामान रखने के गोदाम के तौर पर भी किया गया।
तकरीबन 20 सालों तक यह मस्जिद उनके पास रही और फिर 1877 में दिल्ली दरबार के मौक़े पर लॉर्ड लिटन के आदेश पर इसे मुसलमानों को वापस सौंप दिया गया। इसके बदले में सरकार ने लाला चुन्ना मल को चार गाँव इनाम में दिए।
रूहानियत का केंद्र और महान विद्वानों की आरामगाह
मस्जिद के आँगन में कदम रखते ही चाँदनी चौक का शोर एकदम पीछे छूट जाता है। यहाँ का शांत माहौल रूहानियत से भरा है। मस्जिद के आँगन में कई महान इस्लामी विद्वानों (Scholars) की क़ब्रें भी मौजूद हैं, जिनमें हज़रत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद मज़हर उल्लाह शाह और मौलाना मोहम्मद अहमद जैसी हस्तियां शामिल हैं।

वर्तमान में यहाँ के शाही इमाम डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम अहमद हैं, जिनका परिवार मुग़ल दौर से पीढ़ियों से इस मस्जिद की सेवा कर रहा है। यहाँ ‘दारुल इफ्ता’ भी है जहाँ से मज़हबी मार्गदर्शन किया जाता है। मस्जिद में आज भी ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा जैसे त्योहार बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं और हज़ारों की तादाद में लोग यहाँ नमाज़ अदा करने जुटते हैं।
Fatehpuri Masjid: आज के हालात और संरक्षण की ज़रूरत
370 साल पुरानी होने की वजह से आज यह ऐतिहासिक इमारत कई मुश्किलों से गुज़र रही है। सही देख-रेख की कमी की वजह से मस्जिद के पत्थरों के बीच की दरारें चौड़ी हो रही हैं और इसकी मीनारें भी एक तरफ झुकने लगी हैं। छतों से पानी टपकने (Seepage) की वजह से मुख्य गुंबद और प्रार्थना हॉल को काफ़ी नुक़सान पहुँच रहा है। हालाँकि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) और दिल्ली वक्फ बोर्ड ने समय-समय पर मरम्मत की कोशिशें की हैं, लेकिन फ़िलहाल यह मस्जिद सरकारी उपेक्षा का शिकार महसूस होती है।
मस्जिद के आस-पास हुए अतिक्रमण (Encroachment) ने भी इसकी खूबसूरती को छुपा दिया है। स्थानीय लोगों और इमाम का मानना है कि अगर समय रहते इसका पुख्ता संरक्षण नहीं किया गया, तो हम मुग़ल वास्तुकला के इस अनमोल सितारे को खो सकते हैं।
सैलानियों के लिए ज़रूरी जानकारी और ट्रैवल गाइड
अगर आप पुरानी दिल्ली घूमने का मन बना रहे हैं, तो Fatehpuri Masjid आपकी लिस्ट में ज़रूर होनी चाहिए। यहाँ पहुँचने का सबसे आसान ज़रिया दिल्ली मेट्रो है। ‘चाँदनी चौक’ (येलो लाइन) सबसे नज़दीकी मेट्रो स्टेशन है, जहाँ से आप रिक्शा ले सकते हैं या पैदल भी जा सकते हैं। मस्जिद चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर गडोदिया मार्केट के पास स्थित है। यहाँ घूमने के लिए कोई एंट्री फीस नहीं लगती और यह सुबह 5:00 बजे से रात 9:30 बजे तक खुली रहती है। सैलानियों के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय सबसे अच्छा है क्योंकि इस दौरान मौसम खुशगवार रहता है।
मस्जिद के अंदर जाते वक़्त कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है। चूंकि यह एक पवित्र जगह है, इसलिए सादे और शालीन कपड़े पहनकर जाएँ और सिर ढकना बेहतर माना जाता है। नमाज़ के वक़्त खामोशी बरतें और इबादत करने वालों का लिहाज़ करें। मस्जिद के तीन मुख्य द्वार हैं: मुख्य द्वार लाल क़िले की तरफ खुलता है, उत्तरी द्वार खारी बावली (मसालों की मंडी) की तरफ और दक्षिणी द्वार कटरा बरियान की ओर जाता है। फ़ोटोग्राफ़ी के शौकीनों के लिए खारी बावली की तरफ से मस्जिद का नज़ारा बेहद शानदार होता है।

आस-पास घूमने लायक अन्य जगहें
Fatehpuri Masjid के आस-पास और भी कई ऐतिहासिक स्थल हैं जिन्हें आप एक ही दिन में देख सकते हैं। मस्जिद के ठीक सामने की सड़क सीधे लाल क़िले तक जाती है। इसके अलावा एशिया की सबसे बड़ी मसालों की मंडी खारी बावली मस्जिद के उत्तरी गेट के पास ही है। आप यहाँ से जामा मस्जिद, गुरुद्वारा शीशगंज साहिब और सेंट जेम्स चर्च जैसी जगहों पर भी आसानी से जा सकते हैं।
Fatehpuri Masjid महज़ ईंट-पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि पुरानी दिल्ली की धड़कन है। यह वह जगह है जहाँ इतिहास की परतें आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी के साथ घुली-मिली नज़र आती हैं। चाहे आप इतिहास के पन्ने पलटना चाहते हों, मुग़ल वास्तुकला को करीब से देखना चाहते हों या बस कुछ पल सुकून के बिताना चाहते हों, Fatehpuri Masjid आपको कभी मायूस नहीं करेगी। अपनी अगली दिल्ली यात्रा में इस ऐतिहासिक धरोहर को करीब से महसूस करने के लिए थोड़ा वक़्त ज़रूर निकालें।





