Delhi की Fatehpuri Masjid: 1857 की क्रांति से जुड़ा इतिहास
पुरानी Delhi यानी शाहजहाँबाद की गलियों में कदम रखते ही इतिहास की महक महसूस होने लगती है। यहाँ की हर इमारत अपनी एक दास्तान सुनाती है, लेकिन चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर स्थित फ़तेहपुरी मस्जिद की बात ही कुछ और है। जहाँ एक तरफ लाल क़िला मुग़लिया सल्तनत की सियासी ताक़त का निशान है, वहीं फ़तेहपुरी मस्जिद उसी सड़क के दूसरे छोर पर रूहानी और मज़हबी ताक़त का संतुलन बनाए रखती है। यह मस्जिद न केवल इबादत की जगह है, बल्कि Delhi के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास की एक खामोश चश्मदीद गवाह भी रही है। फ़तेहपुरी मस्जिद का शानदार इतिहास फ़तेहपुरी मस्जिद का निर्माण सन् 1650 में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की एक बेगम, फ़तेहपुरी बेगम ने करवाया था। बेगम साहिबा फ़तेहपुर की रहने वाली थीं, इसीलिए उनके नाम पर इस मस्जिद का नाम फ़तेहपुरी मस्जिद पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि ताजमहल परिसर में बनी मस्जिद भी इन्हीं बेगम के नाम पर है। इतिहासकारों का मानना है कि मुग़ल दौर में शाही घराने की महिलाओं द्वारा मस्जिदें बनवाना ताक़त और धार्मिक योगदान दिखाने का एक ज़रिया भी था। फ़तेहपुरी मस्जिद को Delhi की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद माना जाता है। कई मायनों में इसे जामा मस्जिद की प्रतिद्वंद्वी के तौर पर भी देखा जाता था। मुग़ल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना यह मस्जिद मुग़ल दौर की वास्तुकला का एक बेमिसाल नमूना है, जिसे मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर से तैयार किया गया है। मस्जिद का मुख्य ढांचा एक विशाल और ऊँचे प्लेटफॉर्म पर टिका है। इसके दोनों किनारों पर ऊँची और शानदार मीनारें बनी हुई हैं। मस्जिद के ऊपर एक विशाल मुख्य गुंबद है, जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगा देता है। मस्जिद के मुख्य प्रार्थना हॉल में सात मेहराबदार रास्ते हैं। इनमें बीच वाली मेहराब सबसे ऊँची है और इसे सफ़ेद संगमरमर की पट्टियों से सजाया गया है। अंदरूनी हिस्से में दीवारों और छतों पर बारीक कैलीग्राफी और ज्यामितीय पैटर्न बने हुए हैं। ये डिजाइन उस दौर के कारीगरों की शानदार मेहनत और हुनर को दर्शाते हैं। मस्जिद का आँगन बहुत ही विशाल और खुला है। लाल पत्थर से बने इस आँगन में आकर एक अलग तरह का सुकून महसूस होता है। आँगन के ठीक बीच में वज़ू के लिए एक बड़ा तालाब या हौज बना हुआ है, जो सफ़ेद संगमरमर से तैयार किया गया है। मुग़ल काल में इस हौज में चाँदनी चौक से गुजरने वाली नहर का पानी आता था। 1857 के दौरान इसे काफी नुकसान पहुँचा और बाद में इसका दोबारा निर्माण कराया गया। मस्जिद के अंदर सफ़ेद संगमरमर का एक मिम्बर भी मौजूद है। इसमें चार सीढ़ियाँ हैं और इसका इस्तेमाल उपदेश देने के लिए किया जाता है। 1857 की क्रांति और मस्जिद की नीलामी फ़तेहपुरी मस्जिद ने Delhi के इतिहास के सबसे कठिन दौर भी देखे हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहाँ के उलेमा और इबादत करने वालों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। अंग्रेज़ों ने इस मस्जिद को बग़ावत का एक बड़ा केंद्र माना और इसी वजह से जंग के बाद इसे ज़ब्त कर लिया। अंग्रेज़ अफसरों ने इसे पूरी तरह ढहा देने का सुझाव भी दिया था, लेकिन बाद में मस्जिद को नीलाम करने का फैसला लिया गया। सन् 1860 में Delhi के एक रईस हिंदू व्यापारी, राय लाला चुन्ना मल ने इस मस्जिद को अंग्रेज़ों से खरीद लिया। इसकी कीमत कुछ स्रोतों में 19,000 रुपये और कुछ जगहों पर 39,650 रुपये बताई जाती है। लाला चुन्ना मल ने इस पवित्र जगह की गरिमा को बनाए रखा। हालांकि उस समय मस्जिद के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल सामान रखने के गोदाम के रूप में भी किया गया था। करीब 20 वर्षों तक यह मस्जिद उनके पास रही। इसके बाद 1877 में Delhi दरबार के मौके पर लॉर्ड लिटन के आदेश पर इसे मुसलमानों को वापस सौंप दिया गया। इसके बदले में सरकार ने लाला चुन्ना मल को चार गाँव इनाम में दिए। रूहानियत का केंद्र और विद्वानों की आरामगाह मस्जिद के आँगन में कदम रखते ही चाँदनी चौक का शोर काफी पीछे छूट जाता है। यहाँ का शांत माहौल रूहानियत से भरा हुआ महसूस होता है। मस्जिद के आँगन में कई महान इस्लामी विद्वानों की कब्रें भी मौजूद हैं। इनमें हज़रत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद मज़हर उल्लाह शाह और मौलाना मोहम्मद अहमद जैसी हस्तियों के नाम शामिल हैं। वर्तमान में यहाँ के शाही इमाम डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम अहमद हैं। उनका परिवार मुग़ल दौर से पीढ़ियों से इस मस्जिद की सेवा करता आ रहा है। यहाँ दारुल इफ्ता भी मौजूद है, जहाँ से मज़हबी रहनुमाई की जाती है। मस्जिद में आज भी ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा जैसे त्योहार बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं। इन मौकों पर हजारों लोग नमाज़ अदा करने के लिए यहाँ जुटते हैं। फ़तेहपुरी मस्जिद: आज के हालात और संरक्षण की जरूरत करीब 370 साल पुरानी होने की वजह से आज यह ऐतिहासिक इमारत कई मुश्किलों का सामना कर रही है। सही देख-रेख की कमी के कारण मस्जिद के पत्थरों के बीच की दरारें चौड़ी हो रही हैं और इसकी मीनारों में भी झुकाव दिखाई देने लगा है। छतों से पानी टपकने की वजह से मुख्य गुंबद और प्रार्थना हॉल को काफी नुकसान पहुँच रहा है। हालांकि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और Delhi वक्फ बोर्ड ने समय-समय पर मरम्मत की कोशिशें की हैं, लेकिन मस्जिद को अभी भी मजबूत संरक्षण की जरूरत है। मस्जिद के आसपास हुए अतिक्रमण ने भी इसकी खूबसूरती को काफी हद तक छिपा दिया है। स्थानीय लोगों और इमाम का मानना है कि अगर समय रहते इसका पुख्ता संरक्षण नहीं किया गया, तो मुग़ल वास्तुकला की इस अनमोल धरोहर को नुकसान पहुँच सकता है। सैलानियों के लिए जरूरी जानकारी अगर आप पुरानी Delhi घूमने का मन बना रहे हैं, तो फ़तेहपुरी मस्जिद आपकी लिस्ट में जरूर होनी चाहिए। यहाँ पहुँचने का सबसे आसान जरिया Delhi Metro है। चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन येलो लाइन पर स्थित है और मस्जिद तक पहुँचने के लिए सबसे सुविधाजनक विकल्प माना जाता है। स्टेशन से आप रिक्शा ले सकते हैं या पैदल भी मस्जिद तक जा सकते हैं। फ़तेहपुरी मस्जिद चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर गडोदिया मार्केट के पास स्थित है।