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Delhi की Fatehpuri Masjid: 1857 की क्रांति से जुड़ा इतिहास

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पुरानी Delhi यानी शाहजहाँबाद की गलियों में कदम रखते ही इतिहास की महक महसूस होने लगती है। यहाँ की हर इमारत अपनी एक दास्तान सुनाती है, लेकिन चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर स्थित फ़तेहपुरी मस्जिद की बात ही कुछ और है। जहाँ एक तरफ लाल क़िला मुग़लिया सल्तनत की सियासी ताक़त का निशान है, वहीं फ़तेहपुरी मस्जिद उसी सड़क के दूसरे छोर पर रूहानी और मज़हबी ताक़त का संतुलन बनाए रखती है। यह मस्जिद न केवल इबादत की जगह है, बल्कि Delhi के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास की एक खामोश चश्मदीद गवाह भी रही है। फ़तेहपुरी मस्जिद का शानदार इतिहास फ़तेहपुरी मस्जिद का निर्माण सन् 1650 में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की एक बेगम, फ़तेहपुरी बेगम ने करवाया था। बेगम साहिबा फ़तेहपुर की रहने वाली थीं, इसीलिए उनके नाम पर इस मस्जिद का नाम फ़तेहपुरी मस्जिद पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि ताजमहल परिसर में बनी मस्जिद भी इन्हीं बेगम के नाम पर है। इतिहासकारों का मानना है कि मुग़ल दौर में शाही घराने की महिलाओं द्वारा मस्जिदें बनवाना ताक़त और धार्मिक योगदान दिखाने का एक ज़रिया भी था। फ़तेहपुरी मस्जिद को Delhi की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद माना जाता है। कई मायनों में इसे जामा मस्जिद की प्रतिद्वंद्वी के तौर पर भी देखा जाता था। मुग़ल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना यह मस्जिद मुग़ल दौर की वास्तुकला का एक बेमिसाल नमूना है, जिसे मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर से तैयार किया गया है। मस्जिद का मुख्य ढांचा एक विशाल और ऊँचे प्लेटफॉर्म पर टिका है। इसके दोनों किनारों पर ऊँची और शानदार मीनारें बनी हुई हैं। मस्जिद के ऊपर एक विशाल मुख्य गुंबद है, जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगा देता है। मस्जिद के मुख्य प्रार्थना हॉल में सात मेहराबदार रास्ते हैं। इनमें बीच वाली मेहराब सबसे ऊँची है और इसे सफ़ेद संगमरमर की पट्टियों से सजाया गया है। अंदरूनी हिस्से में दीवारों और छतों पर बारीक कैलीग्राफी और ज्यामितीय पैटर्न बने हुए हैं। ये डिजाइन उस दौर के कारीगरों की शानदार मेहनत और हुनर को दर्शाते हैं। मस्जिद का आँगन बहुत ही विशाल और खुला है। लाल पत्थर से बने इस आँगन में आकर एक अलग तरह का सुकून महसूस होता है। आँगन के ठीक बीच में वज़ू के लिए एक बड़ा तालाब या हौज बना हुआ है, जो सफ़ेद संगमरमर से तैयार किया गया है। मुग़ल काल में इस हौज में चाँदनी चौक से गुजरने वाली नहर का पानी आता था। 1857 के दौरान इसे काफी नुकसान पहुँचा और बाद में इसका दोबारा निर्माण कराया गया। मस्जिद के अंदर सफ़ेद संगमरमर का एक मिम्बर भी मौजूद है। इसमें चार सीढ़ियाँ हैं और इसका इस्तेमाल उपदेश देने के लिए किया जाता है। 1857 की क्रांति और मस्जिद की नीलामी फ़तेहपुरी मस्जिद ने Delhi के इतिहास के सबसे कठिन दौर भी देखे हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहाँ के उलेमा और इबादत करने वालों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। अंग्रेज़ों ने इस मस्जिद को बग़ावत का एक बड़ा केंद्र माना और इसी वजह से जंग के बाद इसे ज़ब्त कर लिया। अंग्रेज़ अफसरों ने इसे पूरी तरह ढहा देने का सुझाव भी दिया था, लेकिन बाद में मस्जिद को नीलाम करने का फैसला लिया गया। सन् 1860 में Delhi के एक रईस हिंदू व्यापारी, राय लाला चुन्ना मल ने इस मस्जिद को अंग्रेज़ों से खरीद लिया। इसकी कीमत कुछ स्रोतों में 19,000 रुपये और कुछ जगहों पर 39,650 रुपये बताई जाती है। लाला चुन्ना मल ने इस पवित्र जगह की गरिमा को बनाए रखा। हालांकि उस समय मस्जिद के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल सामान रखने के गोदाम के रूप में भी किया गया था। करीब 20 वर्षों तक यह मस्जिद उनके पास रही। इसके बाद 1877 में Delhi दरबार के मौके पर लॉर्ड लिटन के आदेश पर इसे मुसलमानों को वापस सौंप दिया गया। इसके बदले में सरकार ने लाला चुन्ना मल को चार गाँव इनाम में दिए। रूहानियत का केंद्र और विद्वानों की आरामगाह मस्जिद के आँगन में कदम रखते ही चाँदनी चौक का शोर काफी पीछे छूट जाता है। यहाँ का शांत माहौल रूहानियत से भरा हुआ महसूस होता है। मस्जिद के आँगन में कई महान इस्लामी विद्वानों की कब्रें भी मौजूद हैं। इनमें हज़रत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद मज़हर उल्लाह शाह और मौलाना मोहम्मद अहमद जैसी हस्तियों के नाम शामिल हैं। वर्तमान में यहाँ के शाही इमाम डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम अहमद हैं। उनका परिवार मुग़ल दौर से पीढ़ियों से इस मस्जिद की सेवा करता आ रहा है। यहाँ दारुल इफ्ता भी मौजूद है, जहाँ से मज़हबी रहनुमाई की जाती है। मस्जिद में आज भी ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा जैसे त्योहार बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं। इन मौकों पर हजारों लोग नमाज़ अदा करने के लिए यहाँ जुटते हैं। फ़तेहपुरी मस्जिद: आज के हालात और संरक्षण की जरूरत करीब 370 साल पुरानी होने की वजह से आज यह ऐतिहासिक इमारत कई मुश्किलों का सामना कर रही है। सही देख-रेख की कमी के कारण मस्जिद के पत्थरों के बीच की दरारें चौड़ी हो रही हैं और इसकी मीनारों में भी झुकाव दिखाई देने लगा है। छतों से पानी टपकने की वजह से मुख्य गुंबद और प्रार्थना हॉल को काफी नुकसान पहुँच रहा है। हालांकि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और Delhi वक्फ बोर्ड ने समय-समय पर मरम्मत की कोशिशें की हैं, लेकिन मस्जिद को अभी भी मजबूत संरक्षण की जरूरत है। मस्जिद के आसपास हुए अतिक्रमण ने भी इसकी खूबसूरती को काफी हद तक छिपा दिया है। स्थानीय लोगों और इमाम का मानना है कि अगर समय रहते इसका पुख्ता संरक्षण नहीं किया गया, तो मुग़ल वास्तुकला की इस अनमोल धरोहर को नुकसान पहुँच सकता है। सैलानियों के लिए जरूरी जानकारी अगर आप पुरानी Delhi घूमने का मन बना रहे हैं, तो फ़तेहपुरी मस्जिद आपकी लिस्ट में जरूर होनी चाहिए। यहाँ पहुँचने का सबसे आसान जरिया Delhi Metro है। चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन येलो लाइन पर स्थित है और मस्जिद तक पहुँचने के लिए सबसे सुविधाजनक विकल्प माना जाता है। स्टेशन से आप रिक्शा ले सकते हैं या पैदल भी मस्जिद तक जा सकते हैं। फ़तेहपुरी मस्जिद चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर गडोदिया मार्केट के पास स्थित है।

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Fatehpuri Masjid:1650 में बना मुग़ल वास्तुकला का Masterpiece

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पुरानी दिल्ली की गलियों में कदम रखते ही इतिहास की महक महसूस होने लगती है। यहाँ की हर इमारत अपनी एक दास्तान सुनाती है, लेकिन चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर स्थित Fatehpuri Masjid की बात ही कुछ और है। जहाँ एक तरफ लाल क़िला मुग़लिया सल्तनत की सियासी ताक़त का निशान है, वहीं Fatehpuri Masjid उसी सड़क के दूसरे छोर पर रूहानी और मज़हबी ताक़त का संतुलन बनाए रखती है। यह मस्जिद न केवल इबादत की जगह है, बल्कि दिल्ली के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास की एक खामोश चश्मदीद गवाह भी रही है। Fatehpuri Masjid का शानदार इतिहास Fatehpuri Masjid का निर्माण सन् 1650 में मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की एक बेगम, फ़तेहपुरी बेगम ने करवाया था। बेगम साहिबा फ़तेहपुर की रहने वाली थीं, इसीलिए उनके नाम पर इस मस्जिद का नाम Fatehpuri Masjidपड़ा। दिलचस्प बात यह है कि ताजमहल परिसर में बनी मस्जिद भी इन्हीं बेगम के नाम पर है। इतिहासकारों का मानना है कि मुग़ल दौर में शाही घराने की महिलाओं द्वारा मस्जिदें बनवाना ताक़त दिखाने का एक ज़रिया भी था। Fatehpuri Masjidको दिल्ली की दूसरी सबसे बड़ी मस्जिद माना जाता है और कई मायनों में इसे जामा मस्जिद की ‘प्रतिद्वंद्वी’ (Rival) के तौर पर देखा जाता था। मुग़ल वास्तुकला का एक बेहतरीन और नायाब नमूना यह मस्जिद मुग़ल दौर की वास्तुकला का एक बेमिसाल नमूना है, जिसे मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) से तैयार किया गया है। मस्जिद का मुख्य ढांचा एक विशाल और ऊँचे प्लेटफॉर्म पर टिका है, जिसके दोनों किनारों पर ऊँची और शानदार मीनारें बनी हुई हैं। मस्जिद के ऊपर एक विशाल मुख्य गुंबद है, जो इसकी भव्यता में चार चाँद लगा देता है। मस्जिद के मुख्य प्रार्थना हॉल में सात मेहराबदार रास्ते हैं, जिनमें बीच वाली मेहराब सबसे ऊँची है और इसे सफ़ेद संगमरमर की पट्टियों से सजाया गया है। अंदरूनी हिस्से में दीवारों और छतों पर बारीक कैलीग्राफी और ज्यामितीय पैटर्न बने हुए हैं, जो उस दौर के कारीगरों की महारत को दर्शाते हैं। मस्जिद का आँगन बहुत ही विशाल और खुला है, जो लाल पत्थर से बना है और यहाँ आकर एक अजीब सा सुकून मिलता है। आँगन के ठीक बीच में हाथ-मुँह धोने के लिए एक बड़ा तालाब या हौज बना हुआ है, जो सफ़ेद संगमरमर से तैयार किया गया है। मुग़ल काल में इस हौज में चाँदनी चौक से गुज़रने वाली नहर का पानी आता था, लेकिन 1857 के दौरान इसे काफ़ी नुक़सान पहुँचाया गया और बाद में इसे दोबारा बनाया गया। मस्जिद के अंदर एक सफ़ेद संगमरमर का मिम्बर यानी उपदेश देने का मंच (Pulpit) भी मौजूद है, जिसमें चार सीढ़ियाँ हैं और इसका इस्तेमाल उपदेश देने के लिए किया जाता है। 1857 की क्रांति और मस्जिद की नीलामी की दर्दभरी कहानी Fatehpuri Masjid ने दिल्ली के इतिहास के सबसे काले दिन भी देखे हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (Sepoy Mutiny) के दौरान यहाँ के उलेमा () और इबादत करने वालों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। अंग्रेज़ों ने इस मस्जिद को बग़ावत का एक बड़ा केंद्र माना और इसीलिए जंग के बाद इसे ज़ब्त कर लिया। अंग्रेज़ अफ़सरों ने तो यहाँ तक सुझाव दिया था कि इस मस्जिद को पूरी तरह ढहा दिया जाए, लेकिन बाद में इसे नीलाम करने का फ़ैसला लिया गया। सन् 1860 में, दिल्ली के एक रईस हिंदू व्यापारी, राय लाला चुन्ना मल ने इस मस्जिद को महज़ 19,000 (कुछ स्रोतों के अनुसार 39,650) रुपये में अंग्रेज़ों से ख़रीद लिया। लाला चुन्ना मल ने इस पवित्र जगह की गरिमा को बनाए रखा, हालाँकि इसके कुछ हिस्सों का इस्तेमाल उस वक़्त सामान रखने के गोदाम के तौर पर भी किया गया। तकरीबन 20 सालों तक यह मस्जिद उनके पास रही और फिर 1877 में दिल्ली दरबार के मौक़े पर लॉर्ड लिटन के आदेश पर इसे मुसलमानों को वापस सौंप दिया गया। इसके बदले में सरकार ने लाला चुन्ना मल को चार गाँव इनाम में दिए। रूहानियत का केंद्र और महान विद्वानों की आरामगाह मस्जिद के आँगन में कदम रखते ही चाँदनी चौक का शोर एकदम पीछे छूट जाता है। यहाँ का शांत माहौल रूहानियत से भरा है। मस्जिद के आँगन में कई महान इस्लामी विद्वानों (Scholars) की क़ब्रें भी मौजूद हैं, जिनमें हज़रत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद मज़हर उल्लाह शाह और मौलाना मोहम्मद अहमद जैसी हस्तियां शामिल हैं। वर्तमान में यहाँ के शाही इमाम डॉ. मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम अहमद हैं, जिनका परिवार मुग़ल दौर से पीढ़ियों से इस मस्जिद की सेवा कर रहा है। यहाँ ‘दारुल इफ्ता’ भी है जहाँ से मज़हबी मार्गदर्शन किया जाता है। मस्जिद में आज भी ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा जैसे त्योहार बहुत धूमधाम से मनाए जाते हैं और हज़ारों की तादाद में लोग यहाँ नमाज़ अदा करने जुटते हैं। Fatehpuri Masjid: आज के हालात और संरक्षण की ज़रूरत 370 साल पुरानी होने की वजह से आज यह ऐतिहासिक इमारत कई मुश्किलों से गुज़र रही है। सही देख-रेख की कमी की वजह से मस्जिद के पत्थरों के बीच की दरारें चौड़ी हो रही हैं और इसकी मीनारें भी एक तरफ झुकने लगी हैं। छतों से पानी टपकने (Seepage) की वजह से मुख्य गुंबद और प्रार्थना हॉल को काफ़ी नुक़सान पहुँच रहा है। हालाँकि आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) और दिल्ली वक्फ बोर्ड ने समय-समय पर मरम्मत की कोशिशें की हैं, लेकिन फ़िलहाल यह मस्जिद सरकारी उपेक्षा का शिकार महसूस होती है। मस्जिद के आस-पास हुए अतिक्रमण (Encroachment) ने भी इसकी खूबसूरती को छुपा दिया है। स्थानीय लोगों और इमाम का मानना है कि अगर समय रहते इसका पुख्ता संरक्षण नहीं किया गया, तो हम मुग़ल वास्तुकला के इस अनमोल सितारे को खो सकते हैं। सैलानियों के लिए ज़रूरी जानकारी और ट्रैवल गाइड अगर आप पुरानी दिल्ली घूमने का मन बना रहे हैं, तो Fatehpuri Masjid आपकी लिस्ट में ज़रूर होनी चाहिए। यहाँ पहुँचने का सबसे आसान ज़रिया दिल्ली मेट्रो है। ‘चाँदनी चौक’ (येलो लाइन) सबसे नज़दीकी मेट्रो स्टेशन है, जहाँ से आप रिक्शा ले सकते हैं या पैदल भी जा सकते हैं। मस्जिद चाँदनी चौक के पश्चिमी छोर पर गडोदिया मार्केट के पास स्थित है। यहाँ घूमने के लिए कोई एंट्री फीस नहीं लगती और यह सुबह 5:00 बजे से रात 9:30 बजे

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जानिए भारत की सबसे बड़ी और प्रसिद्ध दरगाहों के बारे में

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(India’s most famous mosque) “रमजान का महीना हो और ईद आने वाली हो तो जिस जगह आपको सबसे ज्यादा भीड़ देखने को मिलेगी वह है मस्जिद! रमजान के महीने में नमाज अदा करने के लिए बहुत अधिक मात्रा में लोग मस्जिदों की तरफ रुख़ करते हैं, और करे भी क्यों ना? मुस्लिम समुदाय के लिए यह त्यौहार उनका सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार जो होता है। लोग बड़े ही जतन से महीने भर रोजा़ रखने के बाद साफ और सच्चे मन से अल्लाह की इबादत के लिए दरगाह और मस्जिद जाते हैं।” ईद एक महत्वपूर्ण इस्लामी त्योहार है जो मुसलमान समुदाय में मनाया जाता है। यह प्रत्येक साल मुस्लिम कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है और यह ईद-उल-फ़ित्र और ईद-उल-अज़हा के रूप में दो भिन्न प्रकार की होती है। ईद का महत्व इस्लाम धर्म में अल्लाह की कृपा, धार्मिकता, सामाजिक एकता और धार्मिक समर्थन को अवतरित करता है।आज के ब्लॉग में हम आपको बताएँगे भारत की सबसे प्रसिद्ध मस्जिदों (India’s most famous mosque) के बारे में। जामा मस्जिद दिल्ली अब भारत के सबसे प्रसिद्ध दरगाह की बात हो और भारत के सबसे प्रसिद्ध शहर का नाम ना आए तो यह तो नाइंसाफी होगी। जी हाँ, भारत की सबसे प्रसिद्ध दरगाह भारत के सबसे प्रसिद्ध शहर दिल्ली में हीं स्थित है, जिसे हम जामा मस्जिद के नाम से जानते हैं।जामा मस्जिद भारत की एक ऐसी मस्जिद है जिसे शायद ही कोई न जानता हो। लाल किला के सामने बनी यह मस्जिद देश की सबसे प्रसिद्ध मस्जिद मानी जाती है। जामा मस्जिद अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और वास्तुकला के कारण खास है। यह दिल्ली की सबसे बड़ी मस्जिद है और मुग़ल वास्तुकला का अद्वितीय उदाहरण है। इसे मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने 17वीं सदी में 1656 ईसवी में बनवाया था। इसकी बड़ी शानदार मीनारें, व्यापक सजावट, और विशाल आंगन उसे विशेष बनाती हैं। जामा मस्जिद में ईद के दिन लाखों लोग एक साथ ईद की नमाज अदा करने के लिए इकट्ठा होते हैं। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह हजरत निजामुद्दीन की दरगाह एक महत्वपूर्ण सूफी संत के समाधि स्थल के रूप में जानी जाती है। यह दिल्ली में स्थित है और सूफी संत हजरत निजामुद्दीन के नाम पर नामित है, जिन्होंने 14वीं सदी में यहां बहुत से सामाजिक कार्य किए थे। हजरत निजामुद्दीन की दरगाह की सबसे खास बात यह है कि यहां के माहौल में एक अपनेपन का भाव है। यहां के चारों और की रौनक, शांति और भक्ति का वातावरण यहाँ आने वाले आगंतुकों को आकर्षित करता है। अगर बात करें हजरत निजामुद्दीन औलिया के बारे में तो वह भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण सूफी संतों में से एक थे। उनका असली नाम शाहबुद्दीन मोहम्मद था और वे दिल्ली में 13वीं और 14वीं सदी के बीच रहा करते थे। उन्होंने विशेष रूप से सूफी पंथ को फैलाने और धार्मिक समरसता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी दरगाह पर आज भी लाखों श्रद्धालु आते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। अजमेर शरीफ दरगाह जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो भारत एक ऐसा देश है जहां हर तरह के रहन-सहन खानपान और बोलचाल वाले लोग एक साथ मिलजुल कर रहते हैं। भारतीय संस्कृति की इसी विशालता का एक बेहतरीन उदाहरण है अजमेर शरीफ दरगाह! अजमेर शरीफ दरगाह जिसे ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह शरीफ के नाम से भी जाना जाता है, राजस्थान के अजमेर में स्थित एक ऐसी दरगाह है, जो संतों सद्गुरुओं और अराधकों की भक्ति और श्रद्धा का केंद्र है। अजमेर शरीफ की दरगाह एक ऐतिहासिक स्थल है। जो सूफी संत हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से जुड़ा हुआ है। अजमेर शरीफ दरगाह को मुस्लिम धर्म का पवित्रतम स्थान माना जाता है। यहाँ आने वाले लोग अपनी इच्छाएं मनोकामनाएं और संकल्प ख्वाजा साहब के समक्ष रखते हैं और उनकी दुआओं के पूरी होने की कामना करते हैं। अजमेर शरीफ के दरगाह में माथा टेकने के लिए भारत अन्य राज्यों के पर्यटकों के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी पर्यटक घूमने आते हैं। सलीम चिश्ती की दरगाह फतेहपुर सीकरी शहर में सलीम चिश्ती की दरगाह भी है। यहां सिर्फ देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने से लोग मन्नत मांगने आते हैं। जामा मस्जिद सफेद संगमरमर से बनी है जहां आकर आपको अलग शांति महसूस होगी। फतेहपुर सीकरी में सलीम चिश्ती की दरगाह का इतिहास गौरतलब है। यह दरगाह मुग़ल बादशाह अकबर के पुत्र सलीम जिन्हें बाद में जहाँगीर के नाम से जाना गया, के समय में बनवाई गई थी। यह दरगाह उनकी मासूम बेटी के मृत बचपन की यादों को समर्पित थी। इसे अकबर ने अपने बेटी के नाम पर “मारियम-उल-वश्त” का नाम दिया था। आज यह एक प्रमुख पर्यटन स्थल है और लोग यहाँ आकर मन्नतें माँगते हैं। हाजी अली दरगाह, मुंबई हाजी अली दरगाह मुंबई के महिम परिसर में स्थित है और मुस्लिम समुदाय के लोग यहाँ नमाज अदा करने आते हैं। हाजी अली दरगाह की निर्माण तारीखों के मामले में कुछ अनिश्चितताएं हैं, लेकिन इसे इस्लामिक धर्मावलम्बियों के प्रमुख स्थलों में से एक के रूप में जाना जाता है। इस मस्जिद से बॉलीवुड अभिनेता धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन जैसे कई फ़िल्मी सितारों का संबंध रहा है। हाजी अली दरगाह के पास मस्जिद और एक बड़ी मस्जिद है। यहाँ एक मुख्य महल भी है जिसमें विशाल अधिवेशन हॉल, श्रद्धालुओं के लिए आरामदायक बैठकरी, और प्रसाद की दुकानें शामिल हैं। दरगाह के चारों ओर रखी गई छतें और जालियां उसे भव्य बनाती हैं। हाजी अली दरगाह एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है और यहाँ हर वर्ष बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ आती है। खासतौर पर जुम्मे के दिन और ईद के मौके पर यहाँ बहुत अधिक भीड़ रहती है। खास करके मुंबई में रहने वाले मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए यह सबसे प्रसिद्ध इबादतगाह है।

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Fatehpuri Masjid, Chandni Chowk, Delhi

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Fatehpuri Masjid – दिल्ली की एक ऐसी मस्जिद जिसे कभी अंग्रेजों ने नीलाम कर दिया था यूँ तो हमारे देश की पुरानी इमारतों और धरोहरों की अनगिनत खासियत हैं लेकिन एक चीज जो उन्हें बाकी सबसे अलग करती है वो है इनकी वास्तुकला।  कितने शासक आये और कितने गए लेकिन कुछ नहीं गया तो वो है यहाँ की इमारतों की अनूठी वास्तुकला  बनावट।  आज आपको हम इस ब्लॉग में ऐसी एक इमारत की वास्तुकला के दर्शन कराएंगे, जिसका नाम है फतेहपुरी मस्जिद। यह मस्जिद भले ही देश की अन्य जानी-पहचानी  और बड़ी मस्जिदों की तरह लाइम लाइट में न हो पर वक़्त के थपेड़े और बहुत से उतार-चढाव से गुजरी चाँदनी चौक की रौनक बढ़ाती फतेहपुरी मस्जिद  अपने आप में लाजवाब निर्माण कला की मिसाल है। सड़क के एक छोर पर बना है लाल किला और पश्चिम छोर पर फतेहपुरी मस्जिद। भीड़भाड़ वाली सड़कें पार करके जैसे ही आप फतेहपुरी मस्जिद के सामने पहुंचेंगे आपको ऐसा आभास होगा मानो सारी भागमदौड़ और शोर कहीं पीछे छूट गया हो।  380 साल पुरानी मस्जिद अपने अंदर न जाने कितने शासकों का इतिहास समेटे  हुए है जो इसे और भी अधिक दर्शनीय बनाता है। ये है फ़तेहपुरी मस्जिद का इतिहास चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन से 2 किलोमीटर दूर बनी फतेहपुरी मस्जिद का निर्माण 1650 में हुआ था। मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह की बेगम फतेहपुरी द्वारा करवाया गया था।  इसलिए मस्जिद का नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। आपको बता दें मस्जिद के पास ही एशिया का सबसे बड़े मसालों का बाजार- खारी बावली भी है। मस्जिद के इतिहास को लेकर विभिन्न कथाएँ हैं लेकिन माना जाता है कि 1857 में प्रथम भारतीय संग्राम के बाद अंग्रेजों ने मस्जिद को नीलाम कर दिया था।  उस समय राय लाला चुन्नामल ने मस्जिद को मात्र 11000 रुपय में खरीदा था।  जिनके वंशज आज भी चाँदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं।  1877 में लॉर्ड लिटन ने मस्जिद को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया और यही बोर्ड आज तक मस्जिद संभाल रहा है। जानिए मस्जिद की बनावट की खासियत फतेहपुरी मस्जिद की खूबसूरती का मुख्य कारण है उसकी बनावट में इस्तेमाल लाल पत्थर। दिल्ली के लालकिला और जामा मस्जिद की तरह इसका निर्माण भी लाल पत्थरों से किया गया है। मस्जिद परंपरागत डिजाइन में है लेकिन इबादत हॉल की आकृति धनुषाकार है।  मस्जिद के बड़े  दरवाज़े से आप जैसे ही अंदर प्रवेश करेंगे विशाल परिसर आपका दिल जीत लेगा। परिसर के बीच इस्लामी विद्वानों की  20 से अधिक कब्र हैं।  हजरत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद, मज़हर उल्लाह शाह, मौलाना मोहम्मद आदि की कब्र मस्जिद में मौजूद है। आपको बता दें मस्जिद में तीन विशाल दरवाजे हैं, जिसमें से 2 दरवाजे उत्तर में हैं और एक दक्षिण में।  आगे बढ़ते ही आपकी नजर सफेद संगमरमर से बने  एक पानी के कुंड पर जाएगी।  मस्जिद के दोनों तरफ लाल पत्थर से बने स्तंभों की कतारें हैं जो बिल्कुल बराबर संतुलन में बनी हुई हैं।  दो मंजिला मस्जिद में सात विशाल मेहराब बने हैं और यह दिल्ली की अकेली एकल गुंबददार मस्जिद है। इस्लाम धर्म के अनुयायी और लोग आज भी अपने दो प्रमुख त्योहारों ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा ने बड़ी संख्या में फतेहपुरी मस्जिद पहुंचते हैं। मस्जिद में बैठे एक मौलवी ने बताया की मस्जिद की बहुत मान्यता है, जिन लोगों पर अल्लाह का मेहरबानी होती है वही इस मस्जिद में प्रवेश कर पाते हैं और जो प्रवेश करता है अल्लाह उसे सारे दुखों से दूर रखते हैं। लेकिन अगर मस्जिद के रख रखाव की और थोड़ा विशेष ध्यान दिया जाए तो यह और भी सुन्दर  दिखाई दे। लगभग 380 साल पुरानी धरोहर होने के बावजूद भी फतेहपुरी मस्जिद आज भी उतनी दमदार है जितनी अपनी शुरुवाती दौर में रही होगी। मस्जिद के अंदर हर दीवार पर उर्दू में अलग-अलग कलमें लिखें हुए हैं। और कुरान की करीब 100 प्रतियाँ रखी हुई हैं। मस्जिद तो पुरानी दिल्ली की शान दुगनी करती ही है लेकिन मस्जिद आये लोगों के लिए बोनस है मस्जिद के बाहर मिलने वाला बढ़िया समान और स्वादिष्ट भोजन। क्योंकि देश के सबसे पुराने और प्रसिद्ध बाज़ारों में से एक में यह मस्जिद स्थित है। निकटतम मेट्रो स्टेशन यहाँ आने के लिए निकटतम मेट्रो स्टेशन चांदनी चौक है। धर्म और मज़हब से ऊपर उठ कर अगर आप एक शानदार शांतचित और अपनी बनावट और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध ईमारत का दीदार करना चाहते हैं तो आपके  लिए फतेहपुरी मस्जिद परफेक्ट है। Research by Geetu Katyal Edited by Pardeep Kumar