Category Kerala South India Travel

केरल का ओणम स्नेक बोट फेस्टिवल जिसमें नाव भी सांप जैसी लगती है!

मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है..
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है!

यह पक्तियां किसी न किसी मंच से हमें सुनने को मिल जाती हैं! यदि आप इन् पंक्तियों का भाव असल में समझना चाहते हैं, तो आपको केरल के इस स्नेक बोट फेस्टिवल में शरीक होना पड़ेगा। यह हसीन बैकवाटर दुनिया को अपनी सुकून भरी वादियों से बुलाती हैं। और यहां का यह स्नेक बोट फेस्टिवल यक़ीनन एक ऐसा उत्सव है जो प्रकृति और संस्कृति को जोड़कर दिखाता है

यह फेस्टिवल वैल्लम काली के नाम से जाना जाता है, जहां लंबी सांप जैसी नावें पानी पर सरपट दौड़ती हैं। यह त्यौहार केरल के ओणम उत्सव के दौरान मनाया जाता है, जो अगस्त से सितंबर तक चलता है। हसीन बैकवाटर में ये नावें दौड़ती हैं, और दर्शक बेहिसाब उत्साह से भरे होते हैं। वैसे यह फेस्टिवल तकरीबन 400 साल पुराना है, लेकिन इसकी जड़ें 13वीं सदी तक भी जाती हैं।

कहानी शुरू होती है, केरल के पुराने राजाओं से। अल्लेप्पी और आसपास के इलाकों के राजा नदियों पर नावों से लड़ाई लड़ते थे। एक राजा को हार का सामना करना पड़ा। उन्होंने एक कुशल बढ़ई को बुलाया और एक ऐसी नाव बनाने को कहा जो तेज दौड़े। उस बढ़ई ने चूंदन वैल्लम बनाई, जो सांप की तरह लंबी और पतली नाव थी। इस नाव ने राजा को कई बार जीत दिलाई। दूसरे राजा ने जासूस भेजा, लेकिन नाव का राज़ न खुल सका। यक़ीनन, यह नावें युद्ध की थीं, लेकिन धीरे-धीरे वे उत्सव का हिस्सा बनीं।

स्नेक बोट फेस्टिवल

13वीं सदी में चेम्बकस्सेरी और कयामकुलम राज्यों के बीच युद्ध हुआ। चेम्बकस्सेरी के राजा देवनारायण ने युद्ध की बजाय नाव दौड़ का फैसला किया। इससे शांति आई, और यह परंपरा शुरू हुई। ओणम के दौरान ये दौड़ें धार्मिक रंग ले लेती हैं। जैसे अरनमुला में भगवान कृष्ण को समर्पित दौड़। बैकवाटर में ये नावें और नाविक हौसले से लवालब होते हैं। जीत के लिए, और दौड़ देखने आए दर्शक मजे करते हैं। यह फेस्टिवल केरल की सांस्कृतिक धरोहर है। तकरीबन हर गांव की अपनी नाव होती है, जिस पर लोग बेहिसाब गर्व करते हैं। दरअसल, ओणम राजा महाबली की याद में मनाया जाता है, और ये दौड़ें समृद्धि का प्रतीक हैं। स्नेक बोट फेस्टिवल की अपनी एक कहानी है जो हमें बताती है कि कैसे युद्ध को शांति में बदला जा सकता है। हकीकत तो यह है की यह उत्सव केरल की आत्मा है।

स्नेक बोट फेस्टिवल की जान हैं ये मनमोहक नावें चूंदन वैल्लम कहलाती हैं। जो सांप की तरह लंबी होती हैं। तकरीबन 100 से 120 फीट लंबी, ये नावें 100 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ती हैं। आगे का हिस्सा सांप के फन की तरह ऊंचा होता है, जो इन्हें अनोखा बनाता है। ये नावें अंजिली लकड़ी से बनती हैं, जो मजबूत और हल्की होती है। निर्माण का राज़ पीढ़ियों से चला आ रहा है। एक कुशल बढ़ई महीनों लगाता है इसको तैयार करने में। पहले लकड़ी काटी जाती है, फिर आकार दिया जाता है। वैसे तो बांस की सहायता से ही ढांचा मजबूत होता है। और नारियल की रस्सी से जोड़ा जाता है। कोई कील या पेंच नहीं, सिर्फ प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।

वैसे तो यह तकनीक 800 साल पुरानी है। और इसमें परथासरथी चूंदन सबसे पुरानी नाव मानी जाती है, जो आज भी नागिन तरह दौड़ती है। ये नावें पानी को काटती हुई अपना रास्ता बनाती हैं। इस नाव में पीछे की तरफ नाविक बैठते हैं, और आगे हेल्मन गीत गाता है। वांछिपट्टु कहलाते हैं ये गीत, जो ताल बनाते हैं। नाव की पतली शक्ल होने के कारण ही यह ये तेज चलती हैं। फेस्टिवल से पहले नावें सजाई जाती हैं। रंग-बिरंगे कपड़े, फूल और झंडे लगाए जाते हैं। यकीन मानिए यह दृश्य बहुत ही मनमोहक होता है। बनावट में भारतीय कला झलकती है। ये नावें सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि धार्मिक पूजा की वस्तु हैं। गांव वाले इन्हें देवता मानते हैं। नाव बनाने का यह राज़ केरल की कारीगरी का प्रतीक है।

स्नेक बोट फेस्टिवल में कई दौड़ें होती हैं। सबसे मशहूर है नेहरू ट्रॉफी बोट रेस। यह अल्लेप्पी के पुन्नामदा झील पर अगस्त के दूसरे शनिवार को होती है। यह दौड़ 1952 में जवाहरलाल नेहरू के एक दौरे पर शुरू हुई थी। और नेहरू ने नावों को देखा और चांदी की ट्रॉफी देकर, केरल के इस फेस्टिवल को केरल के ओलंपिक के जैसा बना दिया।

स्नेक बोट फेस्टिवल

इस दौड़ में भी 8 से 10 नावें भाग लेती हैं। रेस की दूरी 1.5 किलोमीटर होती है। इस दौड़ में दर्शक जोर जोर से चिल्लाते हैं। क्योंकि ट्रॉफी जीतना गांव का गौरव है। दूसरी प्रमुख दौड़ चंपकुलम है। यह सबसे पुरानी रेस है, जो जून-जुलाई में पंबा नदी पर होती है। अंबलप्पुझा श्री कृष्ण मंदिर की मूर्ति स्थापना की याद में। इस में भी 9 नावें दौड़ती हैं। अरनमुला उत्थरत्तथी बोट रेस ओणम के दौरान पंबा नदी पर ही आयोजित होती है। यह उत्सव ही, भगवान कृष्ण को समर्पित है। यह रेस दो दिन चलती है, वल्लासद्या भोज के साथ-साथ। ये दौड़ें मजेदार हैं। तकरीबन लाखों दर्शक इन रेसओ को देखने आते हैं। इन सब में चैंपियंस बोट लीग नई शुरुआत है, जो कई जगहों पर दौड़ें आयोजित करती है। यह फेस्टिवल को नई राह दिखाता है।

स्नेक बोट फेस्टिवल में वीर नाविक ही जीत दिलाते हैं। हर नाव पर 100 से ज्यादा युवक होते हैं, जो हौसला अफजाही में मदत करते हैं। ये सब युवक गांव के ही होते हैं, जो महीनों पहले प्रशिक्षण लेते हैं। सुबह शाम अभ्यास, ताकि वे इस रेस में जीत सकें। हेल्मन गीत गाता है, और यह गीत प्रेरणा देता है।
रेस से पहले का प्रशिक्षण काफी कठिन होता है। नाविक नाव पर चढ़कर घंटों सीखते हैं। ड्रमर ताल देता है। इस खेल में यह सब जरूरी है क्योंकि एक गलती पूरी नाव को पीछे धकेल देती है। यक़ीनन, यह सब बहुत मजेदार होता है, जब वे जीतते हैं। सभी नाव पर युवक सफेद धोती पहनते हैं। उनके चेहरे पर उत्साह और वीरता होती है। दौड़ में वे सब जान डाल देते हैं, पानी के छींटे उड़ाते हैं। और गांव वाले बेहिसाब तालियां बजाते हैं। लोगों की यह एकता केरल को एकजुट करता है। इसके अलावा फेस्टिवल में यही नाविक हीरो होते हैं। उनकी मेहनत ही जीत दिलाने में अहम रोल निभाती है।

स्नेक बोट उत्सव केरल के साथ साथ पूरे देश के लिए गौरव का त्यौहार है। क्योंकि यह दौड़, दौड़ के साथ-साथ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है। कथकली नृत्य, लोक गीत और चेंदमेलम संगीत। यह सब पर्यटकों को अकाशीत करते हैं। इस रेस में दर्शक किनारे बैठकर अपने अपने गांव की नावों को सपोर्ट करते हैं। ओणम का सध्या भोज बहुत ही स्वादिष्ट होता है, जो शाकाहारी व्यंजनों से भरा होता है। पर्यटन के लिए यह ssआबसे खूबसूरत पल है। इस समय तकरीबन लाखों पर्यटक केरल आते हैं। अल्लेप्पी में इतने होटल बुक होते हैं की देर से आने वालों के लिए होटल बुक कर पान मुश्किल भरा काम हो जाता है। देश के पर्यटकों के अलावा यहां विदेशी पर्यटक भी खूब आते हैं। और उत्सव की रौनक से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। यह फेस्टिवल केरल की संस्कृति दिखाता है। यह ओणम महाबली की याद में, दौड़ें समृद्धि लाती हैं।

इस ओणम के समय पूरे केरल में लोग खूब खुशियां मनाते हैं, केरल के अलावा वे जहां भी रहते हैं, अपने इस उत्सव को बड़े ही धूम-धाम से मनाते हैं। केरल से आने बाले मेरे सभी भाई बंधुओं को ओणम की बहुत-बहुत शुभकामनाएं

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