केरल के Akkare Kottiyoor Shiva Temple के साल में सिर्फ 21 दिन खुलते हैं द्वार, जानिए क्या है इसकी खास बात?
Akkare Kottiyoor Shiva Temple Kerala कन्नूर । अगर आप भी अपनी अगली ट्रिप पर भारत के किसी ऐसे रहस्यमयी और अनदेखे कोने को एक्सप्लोर करना चाहते हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, तो भगवान के अपने देश यानी केरल (God’s Own Country) का यह डेस्टिनेशन आपकी लिस्ट में जरूर होना चाहिए। केरल के कन्नूर जिले में ‘कट्टूर‘ के बेहद घने और शांत जंगलों के बीच स्थित है ‘अक्करे कोट्टियूर’ (Akkare Kottiyoor) शिव मंदिर। Kannur Tourism Guide
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि, यहां पूरे साल कोई स्थायी मंदिर का ढांचा नहीं रहता और यह इलाका बिल्कुल वीरान रहता है। लेकिन साल में एक बार, एक विशेष समय पर यहां आस्था का ऐसा जनसैलाब उमड़ता है कि, पूरी दुनिया के ट्रैवलर्स और श्रद्धालु यहां खिंचे चले आते हैं।
पौराणिक इतिहास: जब राजा दक्ष के यज्ञ में नहीं बुलाए गए शिव भगवान
इस जगह का इतिहास सीधे माता सती और भगवान शिव के उस पौराणिक कालखंड से जुड़ा है, जिसका जिक्र हमारे वेदों में मिलता है। मान्यताओं के अनुसार, यह वही पावन और ऐतिहासिक स्थान है जहां राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में राजा दक्ष ने अपने दामाद यानी भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया था, जिसे माता सती ने अपने आराध्य और पति का घोर अपमान माना। इसी अपमान से आहत होकर माता सती ने यज्ञ कुंड की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया था।
यही वजह है कि, इस घटना की याद और महादेव के प्रति अगाध श्रद्धा को दर्शाने के लिए यहां सदियों से एक विशेष यात्रा निकाली जाती है। इस महोत्सव के दौरान शिव के प्रतीक को एक बेहद खूबसूरत सजे हुए हाथी पर बैठाकर पवित्र नदी के बीच से गुजारा जाता है और महादेव का भव्य जलाभिषेक किया जाता है।
नदी के पानी में विलीन रहता है स्वयंभू शिवलिंग
एक सामान्य सैलानी के लिए यह यात्रा किसी बड़े अजूबे से कम नहीं है। यहां कोई कंक्रीट या पत्थरों का बड़ा मंदिर नहीं है, बल्कि नदी के बहते पानी के बीचों-बीच एक ‘स्वयंभू शिवलिंग’ स्थापित है।
वैशाख महोत्सव: पूरे साल यह शिवलिंग जलमग्न रहता है, लेकिन हिंदू कैलेंडर के अनुसार ‘वैशाख महोत्सव’ के दौरान केवल 21 दिनों के लिए यहां विशेष पूजा-अर्चना की अनुमति होती है।
पूरी तरह इको-फ्रेंडली व्यवस्था: आज के समय में जहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना यात्रा (Eco-Tourism) करने पर जोर दिया जा रहा है, वहीं यह मंदिर सदियों से इसका पालन कर रहा है। यहां पूजा की सभी सामग्रियां, अस्थाई झोपड़ियां और बर्तन पूरी तरह से प्राकृतिक और ‘इको-फ्रेंडली’ चीजों से ही तैयार किए जाते हैं।
ट्रेवल गाइड: कन्नूर के कोट्टियूर मंदिर कैसे पहुंचें?
अगर आप भी इस अद्भुत 21 दिवसीय उत्सव का गवाह बनना चाहते हैं, तो यहां पहुंचने का रास्ता बेहद आसान है।
हवाई मार्ग द्वारा: सबसे नजदीकी एयरपोर्ट कन्नूर इंटरनेशनल एयरपोर्ट (CNN) है, जो मंदिर से लगभग 45 से 50 किलोमीटर की दूरी पर है। एयरपोर्ट से आपको कोट्टियूर के लिए सीधी टैक्सियां मिल जाएंगी।
रेल मार्ग द्वारा: सबसे पास का मुख्य रेलवे स्टेशन थलस्सेरी (Thalassery) और कन्नूर जंक्शन है। यहां से आप लोकल बसों या प्राइवेट कैब के जरिए घने जंगलों के बीच बसे इस मंदिर तक पहुंच सकते हैं।
ट्रेवलर टिप: चूंकि यह मंदिर साल में सिर्फ 21 दिन के लिए ही खुलता है और नदी के बीच में स्थित है, इसलिए यहां जाते समय अपने साथ आरामदायक और वाटरप्रूफ फुटवियर (जूते-चप्पल) जरूर रखें। साथ ही, यहां की प्राकृतिक शांति और सफाई का पूरा ध्यान रखें।





