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1000 साल पुराना ये मंदिर अपनी बारीक कारीगरी से आज भी कर देता है हैरान!

तमिलनाडु के कुंभकोणम के पास दरासुरम में बना Airavatesvara Temple उन जगहों में से है, जहां दूर से देखने पर भले ही यह एक साधारण सा प्राचीन मंदिर लगे, लेकिन जैसे ही आप इसके करीब जाते हैं, इसकी असली खूबसूरती सामने आने लगती है। पत्थरों पर की गई इतनी बारीक नक्काशी और डिजाइन देखने के बाद यही लगता है कि इसे बनाने में कितनी मेहनत और समय लगा होगा। हर दीवार, हर खंभा और हर कोना कुछ न कुछ अलग दिखाता है, जो इसे बाकी मंदिरों से अलग बना देता है।

चोल काल में बनी यह धरोहर आज भी जिंदा है

इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में चोल राजा राजराजा द्वितीय ने करवाया था। उस समय चोल साम्राज्य अपनी कला, मंदिर निर्माण और प्रशासन के लिए काफी आगे माना जाता था। एयरावतेश्वर मंदिर उसी दौर की सोच को दिखाता है, जहां सिर्फ बड़े मंदिर बनाना ही मकसद नहीं था, बल्कि उसे खूबसूरत और खास बनाना भी उतना ही जरूरी था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका नाम ‘एयरावत’ हाथी से जुड़ा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने यहां पूजा की थी।

पत्थरों पर उकेरी गई कहानियां आज भी साफ नजर आती हैं

इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी नक्काशी है, जिसे देखकर लोग रुककर ध्यान से देखने लगते हैं। यहां पत्थरों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां, नृत्य करती हुई आकृतियां, जानवरों के डिजाइन और रोज़मर्रा की जिंदगी के दृश्य तक उकेरे गए हैं। खास बात यह है कि ये सब इतने साफ और डिटेल में बनाए गए हैं कि आज भी उनमें भाव नजर आते हैं। ऐसा लगता है जैसे पत्थर नहीं, बल्कि कोई कहानी चल रही हो

सीढ़ियों से निकलती है अलग-अलग ध्वनि

एयरावतेश्वर मंदिर की एक और अनोखी बात इसकी सीढ़ियां हैं। कहा जाता है कि मंदिर की कुछ सीढ़ियों पर पैर रखने से अलग-अलग तरह की आवाजें सुनाई देती हैं, जो संगीत जैसी लगती हैं। हालांकि अब इन सीढ़ियों को सुरक्षित रखने के लिए आम लोगों को सीधे इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है, लेकिन यह खासियत आज भी इस मंदिर को लेकर लोगों में जिज्ञासा बनाए रखती है।

रथ जैसा बना मंडप सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है

मंदिर का मुख्य मंडप रथ यानी पत्थर के बने एक बड़े चariot की तरह डिजाइन किया गया है। इसमें पहिए, घोड़े और बाकी हिस्से इतने डिटेल में बनाए गए हैं कि पहली नजर में यह किसी असली रथ जैसा लगता है। यह डिजाइन उस समय के कारीगरों की सोच को दिखाता है कि वे सिर्फ मंदिर नहीं बना रहे थे, बल्कि उसे देखने वालों के लिए खास अनुभव भी तैयार कर रहे थे।

छोटे-छोटे डिटेल्स ही इस मंदिर को बनाते हैं खास

इस मंदिर की असली खूबसूरती उसके छोटे-छोटे डिटेल्स में छिपी है। खंभों पर बने डिजाइन, दीवारों पर उकेरी गई लाइनें, और मूर्तियों की बारीकी — हर चीज को बहुत ध्यान से बनाया गया है। कई जगह ऐसे पैटर्न नजर आते हैं, जिन्हें बनाने में महीनों या सालों का समय लगा होगा। यही वजह है कि यह मंदिर बड़े मंदिरों जितना विशाल नहीं होते हुए भी उतना ही खास माना जाता है।

यूनेस्को की सूची में शामिल है यह मंदिर

एयरावतेश्वर मंदिर को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल किया गया है और यह “Great Living Chola Temples” का हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि यह मंदिर सिर्फ इतिहास की चीज नहीं है, बल्कि आज भी यहां पूजा होती है और लोग इसे उसी तरह इस्तेमाल करते हैं जैसे पहले किया जाता था।

समय का असर दिखता है, लेकिन पहचान अब भी वही है

करीब 1000 साल पुराने इस मंदिर पर समय का असर कुछ जगहों पर जरूर दिखता है। कुछ हिस्से थोड़े टूटे या घिसे हुए नजर आते हैं, लेकिन फिर भी इसकी असली बनावट और खूबसूरती आज भी बरकरार है। यह इस बात का सबूत है कि उस समय की इंजीनियरिंग कितनी मजबूत थी।

पर्यटकों के लिए क्यों बन रहा है खास आकर्षण

आज के समय में यह मंदिर सिर्फ धार्मिक जगह नहीं, बल्कि एक बड़ा टूरिस्ट स्पॉट बन चुका है। यहां आने वाले लोग सिर्फ दर्शन ही नहीं करते, बल्कि इस कारीगरी को समझने की कोशिश भी करते हैं। खासकर जो लोग इतिहास, आर्किटेक्चर या आर्ट में दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए यह जगह काफी खास बन जाती है।

एयरावतेश्वर मंदिर यह दिखाता है कि पुराने समय में लोग सिर्फ बड़ा बनाने पर नहीं, बल्कि सही और खूबसूरत बनाने पर ध्यान देते थे। यहां हर पत्थर पर मेहनत दिखती है और हर डिजाइन में सोच नजर आती है। यही वजह है कि यह मंदिर आज भी लोगों को अपनी तरफ खींचता है और देखने के बाद लंबे समय तक याद रहता है।

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