Destination Madhya pradesh Travel

सास-बहू मंदिर, ग्वालियर: जितना खूबसूरत है उतने ही खूबसूरत हैं इसके किस्सें

क्या आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है जिसका असली नाम तो कुछ और हो, लेकिन लोगों ने अपनी बोलचाल की आसानी के लिए उसका छोटा और अलग नाम रख दिया हो? बिल्कुल ऐसा ही हुआ ग्वालियर के मशहूर सास-बहू मंदिर के साथ। दरअसल, इसका नाम सास-बहू नहीं, बल्कि सहस्त्रबाहु है, जिसका मतलब होता है हज़ार भुजाओं वाले भगवान विष्णु का रूप। सुनने में थोड़ा अलग लगता है ना? लेकिन यही इसकी खासियत है। ग्वालियर किले के अंदर बना यह मंदिर अपने नाम की तरह ही रहस्यमयी और दिलचस्प इतिहास छिपाए हुए है। इस मंदिर को देखने पर ऐसा लगता है जैसे इसकी हर पत्थर की दीवारें सदियों पुरानी कहानियाँ खुद ब खुद रही हों। सास-बहू मंदिर ग्वालियर किले के अंदर है, जिसे लोग प्यार से “किलों का गहना” भी कहते हैं। यह किला एक ऊँची पहाड़ी पर बना है और इसके अंदर कई पुराने, खूबसूरत और ऐतिहासिक स्थल हैं, जो भारत के बीते समय की यादों को आज भी सुरक्षित रखे हुए हैं।

 कैसे बन गया सहस्त्रबाहु – सास बहू का मंदिर?

सास-बहू मंदिर की कहानी 11वीं शताब्दी से शुरू होती है, जब कच्छपघाट राजवंश के राजा महिपाल ने 1090 से 1093 ई. के बीच इस मंदिर का निर्माण करवाया। असल में इस मंदिर का नाम सहस्त्रबाहु था, जिसका मतलब है हज़ार भुजाओं वाले भगवान विष्णु का रूप। कहा जाता है कि राजा ने अपनी रानी, जो विष्णु की भक्त थीं, उनके लिए बड़ा मंदिर बनवाया, जिसे आज सास मंदिर कहा जाता है। बाद में राजा के बेटे की पत्नी, जो शिव की भक्त थीं, उनके लिए पास में छोटा मंदिर बनाया गया जिसे बहू मंदिर कहा गया। दो मंदिर, दो अलग-अलग आस्थाएँ, लेकिन एक ही जगह पर होने के कारण लोगों ने प्यार से इसका नाम “सास-बहू मंदिर” रख दिया। यह कहानी उस समय की धार्मिक विविधता और आपसी प्रेम को भी बहुत खूबसूरती से दिखाती है


सास-बहू मंदिर, ग्वालियर: जितना खूबसूरत है उतने ही खूबसूरत हैं इसके किस्सें

 जहाँ पत्थरों में छिपी है सदियों की कारीगरी

सास-बहू मंदिर की बनावट इतनी खूबसूरत है कि इसे देखकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं। यह मंदिर उत्तरी भारत की मशहूर नागर शैली में बना हुआ है, जो अपनी सीधी रेखाओं, ऊँचे शिखरों और बारीक नक्काशी के लिए जानी जाती है। आज भले ही लोहे-सीमेंट की बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हों, लेकिन पत्थरों पर की गई उस समय की यह कला दिल छू लेती है। यह मंदिर एक बड़े से पत्थर के मंच पर बनाया गया है, जिसकी लंबाई करीब 100 फीट और चौड़ाई 63 फीट है।

सास वाला मंदिर कभी तीन मंजिला हुआ करता था मध्यकालीन इंजीनियरिंग का ऐसा कमाल जो आज भी सोचने पर मजबूर कर देता है। समय और बार-बार हुए आक्रमणों के कारण इसका शिखर अब गिर चुका है, लेकिन माना जाता है कि यह लगभग 30 मीटर ऊँचा रहा होगा। मंदिर में तीन दिशाओं से प्रवेश द्वार हैं, और चार विशाल स्तंभ इसके मंडप को एक शाही अंदाज़ देते हैं। प्रवेश द्वार के ऊपर बनी नक्काशी में गरुड़, ब्रह्मा, विष्णु, हाथियों और शिव की आकृतियाँ आज भी साफ दिखाई देती हैं। स्तंभों पर कमल-आकृति वाली ‘रुचक घटपल्लव’ नक्काशी न सिर्फ सुंदर है, बल्कि भार ढोने का पुराना और अनोखा तरीका भी दिखाती है। बहू मंदिर छोटा जरूर है, लेकिन अपने 12 स्तंभों वाले चौकोर मंडप के लिए काफी मशहूर है। दीवारों पर पौराणिक कथाएँ, संगीतकारों की आकृतियाँ, फूल-पत्तों के डिज़ाइन और काल्पनिक जीवों की नक्काशी—यह सब इसे एक जीवंत कला-गैलरी जैसा रूप देते हैं। दोनों मंदिर आज भले कुछ टूटे-फूटे हों, लेकिन उनकी बची हुई कारीगरी अभी भी लाजवाब है।

सास-बहू मंदिर, ग्वालियर: जितना खूबसूरत है उतने ही खूबसूरत हैं इसके किस्सें

 जब पुराने मंदिर को मिली नई कलात्मक पहचान

सास-बहू मंदिर सिर्फ पुरानी इमारत नहीं है, बल्कि आज भी कलाकारों और रिसर्च करने वालों के लिए प्रेरणा का बड़ा स्रोत है। अभी हाल ही में एक अध्ययन में यहाँ की मूर्तियों और गोंड आदिवासी कला के बीच एक दिलचस्प कनेक्शन खोजने की कोशिश की गई। मंदिर से जो आठ अधूरी या टूटी हुई मूर्तियाँ मिलीं जिनमें विष्णु, लक्ष्मी, पद्मावती, ब्रह्मा, शिव, गणेश, गरुड़ और कीचक शामिल हैं उनकी पहचान की गई। फिर इन मूर्तियों के डिज़ाइनों को गोंड कलाकार सुनील सिंह श्याम की खास शैली, जैसे—खत की लाइनें, मछली जैसी शल्क वाली बनावट, और टूटती बिखरती रेखाओं का इस्तेमाल करके नए आधुनिक चित्रों में बदल दिया गया। इस तरह मंदिर की पुरानी विरासत और आज की आधुनिक कला के बीच एक बहुत ही खूबसूरत सा पुल बन गया।

सास-बहू मंदिर, ग्वालियर: जितना खूबसूरत है उतने ही खूबसूरत हैं इसके किस्सें

 फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की ओर से पांच सुझाव

1. मौसम का सही चुनाव करें: मंदिर घूमने के लिए अक्टूबर से मार्च का समय सबसे अच्छा है क्योंकि इस समय मौसम ठंडा रहता है जिससे आप इस समय आराम से घूम सकते हैं।

2. पूरा किला एक दिन में देखें: सास-बहू मंदिर के साथ-साथ तेली का मंदिर, मान सिंह महल और गुजरी महल संग्रहालय भी पास में हैं। एक ही दिन में पूरा ग्वालियर किला आराम से देख सकते हैं।

3. इतिहास और वास्तुकला का मज़ा लें: अगर आपको शांति, पुरानी इमारतें और पत्थरों की नक्काशी पसंद है, तो यह जगह आपके लिए परफेक्ट है। यहाँ का माहौल बेहद शांत और खूबसूरत लगता है।

4. ASI द्वारा संरक्षित स्थल है: यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है, इसलिए सफाई, सुरक्षा और संरचना का अच्छा ध्यान रखा गया है तो आप यहा बेझिझक घूम सकते हैं।

5. इस मंदिर की ‘सास-बहू’ वाली सीख याद रखें जैसे परिवार की पुरानी विरासत समय के साथ बदलती है पर अपनी खूबसूरती नहीं खोती, वैसे ही यह मंदिर भी दो पीढ़ियों—सास और बहू—की तरह एक साथ खड़ी कला, संस्कृति और रिश्तों की कहानी कहता है।

admin

admin

About Author

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

Culture Himachal Pradesh Travel

Chail- Amazing places to visit in Chail

चंडीगढ़ से महज 110 किमी की दूरी पर है खूबसूरत चैल हिल स्टेशन by Pardeep Kumar मैं प्रदीप कुमार फाइव
Culture Destination Lifestyle Uttar Pradesh

Garh Mukteshwar

Garh Mukteshwar – गढ़मुक्तेश्वर: जहाँ कौरवों और पांडवों का पिंडदान हुआ था By Pardeep Kumar नमस्कार, आदाब, सत श्री अकाल