मुई बोरोक: त्रिपुरा की मिट्टी का ऐसा स्वाद जो एक बार चखने के बाद कभी भुला नहीं सकते आप!
मुई बोरोक क्या है और इसकी बुनियादी पहचान?
पूर्वोत्तर भारत की रसोइयों में हर राज्य की अपनी एक खास पहचान है, लेकिन त्रिपुरा की बात आते ही सबसे पहले जो नाम सामने आता है, वह है मुई बोरोक Mui Borok। यह एक भोजन शैली नहीं, त्रिपुरी जीवन, संस्कृति और पारंपरिक खानपान का पूरा खाका है। मुई बोरोक शब्द को अगर आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है हमारा खाना या हमारी रसोई। इसमें वे सभी व्यंजन शामिल होते हैं जो सदियों से त्रिपुरा की मिट्टी, जंगलों, नदियों और पहाड़ियों से मिले प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित हैं। त्रिपुरी समाज शुरू से ही प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने में यक़ीन रखता है इसलिए उनका खाना भी बेहद सरल, पौष्टिक और ज़मीन से जुड़ा हुआ होता है।

मुई बोरोक की सबसे खास बात यह है कि इसमें तेल बहुत कम, मसाले बेहद हल्के और पकाने का तरीका लगभग पूरी तरह स्टीमिंग, बॉइलिंग और फर्मेंटिंग पर आधारित है। परिणाम ऐसा खाना जो शरीर को भारी भी नहीं करता और सेहत के लिहाज़ से बेहद फायदेमंद भी है।(पूर्वोत्तर भारत की रसोइयों में हर राज्य की अपनी एक खास पहचान है)
मुई बोरोक का इतिहास और प्रकृति से इसका रिश्ता
मुई बोरोक का इतिहास त्रिपुरा के आदिवासी समुदायों खासकर त्रिपुरी, जमातिया,रियांग और चकमा की जीवन शैली से गहराई से जुड़ा हुआ है। सदियों पहले जब इन समुदायों का जीवन जंगलों के इर्द-गिर्द घूमता था, तब भोजन की जरूरतें पूरी करने के लिए जंगल की पत्तियां, जड़ें,जंगली सब्ज़ियां, नदी-नाले की मछलियां औरबांस उनकी सबसे बड़ी संपत्ति थी। धीरे-धीरे यही चीज़ें उनके व्यंजन की रीढ़ बन गईं। त्रिपुरा में तेल और तीखे मसालों का इस्तेमाल सदियों से बहुत कम होता रहा, क्योंकि क्षेत्रीय लोगों के लिए खाने का उद्देश्य स्वाद के साथ-साथ शरीर को हल्का और ऊर्जा-पूर्ण रखना था।

इसलिए मुई बोरोक का हर व्यंजन प्रकृति से सीधे जुड़ा हुआ महसूस होता है। मुई बोरोक को समझने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि यह किसी राजा-महाराजा की रसोई से पैदा नहीं हुआ यह जंगलों, पहाड़ियों और आम लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से आया है। यही वजह है कि इसमें बांस की कोपलेंBamboo Shoots फर्मेंटेड फिश, कोकुम जैसे स्थानीय खट्टे पदार्थ, जंगली साग,यम, जड़ वाली सब्ज़ियां सबका इस्तेमाल खूब होता है। त्रिपुरा में खाने की पहचान वहां के मौसम और भूगोल से तय होती है और मुई बोरोक उसका सबसे बड़ा प्रमाण है।

बेरमा Berma मुई बोरोक की धड़कन
अगर मुई बोरोक को शरीर मानें तो उसकी धड़कन है बेरमा। बेरमा सूखी, बिना तेल में तली हुई, हल्की नमकीन फर्मेंटेड मछली होती है, जिसे त्रिपुरा में भोजन की आत्मा कहा जाता है। इसे Shidal भी कहा जाता है और यह मछली न केवल स्वाद देती है बल्कि प्रोटीन, खनिज और उच्च पोषण मूल्य से भरपूर होती है। बेरमा के बिना मुई बोरोक की कल्पना अधूरी है। त्रिपुरा में बेरमा का इस्तेमाल कई तरह के व्यंजनों में होता है जैसे, बेरमा चोख, बेरमा और सब्ज़ी की हल्की करी, और मशहूर त्रिपुरी बैम्बू शूट डिश। इसकी खास बात यह है कि यह किसी भी सब्ज़ी में बहुत ही हल्का, मिट्टी जैसा देसी स्वाद जोड़ता है।
इस मछली को लंबे समय तक फर्मेंट किया जाता है, जिसके कारण यह बिना फ्रिज के भी महीनों सुरक्षित रहती है जो पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वालों के लिए बहुत उपयोगी था। बेरमा का उपयोग तेल में तला नहीं जाता, बल्कि उबालकर और धीमी आंच पर पकाकर इस्तेमाल किया जाता है। यही कारण है कि यह पूरी तरह से नॉन-ग्रीसी, हाई-प्रोटीन और डाइजेस्टिव भोजन का हिस्सा बनता है। पूर्वोत्तर भारत में फर्मेंटेड फूड शरीर को गर्म रखने, पाचन सुधारने और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाने के लिए जाना जाता है और बेरमा इस परंपरा का मुकम्मल नमूना है।

मुई बोरोक के प्रमुख व्यंजन चोखो, वंग पुई और बैम्बू शूट
मुई बोरोक की खूबसूरती सिर्फ उसके अतीत या फर्मेंटेड मछली तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यंजन इतने विविध और स्वाद से भरपूर हैं कि खाने वाला बार-बार इन्हें याद करता है। इनमें से सबसे लोकप्रिय है चोखो यह एक हल्का, उबाला हुआ, बिना तेल का व्यंजन है जो कद्दू, बैंगन, पपीता, जंगली साग या यम जैसे देसी सब्ज़ियों से बनाया जाता है। चोखो की खासियत है कम मसाले, ज्यादा प्राकृतिक स्वाद। इसके अलावा वंग पुई एक मसालेदार लेकिन हेल्दी डिश है जिसमें हल्दी, हरी मिर्च और जड़ी-बूटियों का हल्का स्वाद मिलता है।
बैम्बू शूटबांस की कोपल मुई बोरोक का अगला प्रमुख आधार है, जिसे अलग-अलग तरीकों से पकाया जाता है कभी बेरमा के साथ, कभी सिर्फ मसालों के साथ उबालकर। त्रिपुरा का एक और मशहूर व्यंजन है मुई ठाक, जो एक पारंपरिक फेस्टिव डिश है। इसके साथ-साथ चावल का भी बहुत महत्व है, खासकर गोरबाती चावल, जो त्रिपुरा में विशेष त्योहारों पर पकाया जाता है। इतना ही नहीं, यहां की जड़ी-बूटियों, स्थानीय सागों, कंद-मूलोंऔर जंगल की पत्तियों का उपयोग भी हर व्यंजन में दिखता है जो इसे बेहद पौष्टिक बनाता है।

क्यों माना जाता है इसे नेचर-हेल्थ सेट?
मुई बोरोक को सिर्फ स्वाद या परंपरा की वजह से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज़ से भी आदर्श भोजन माना जाता है। इसका मुख्य कारण यह है कि इसमें तेल कम,फाइबर ज्यादा, प्रोटीन भरपूर और मसाले बेहद हल्के होते हैं। खाने का तरीका इतना संतुलित कि पाचन तंत्र पर ज़रा भी दबाव नहीं पड़ता। यह खानपान ग्लूटेन-फ्री भी माना जाता है क्योंकि मुख्य रूप से इसमें चावल, सब्ज़ियां, मछली और जंगली पौधे शामिल होते हैं। बिरमा जैसी फर्मेंटेड फिश शरीर में अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाती है और इम्यूनिटी को सपोर्ट करती है।
बांस की कोपलें एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर होती हैं, जो शरीर से टॉक्सिन्स निकालने में मदद करती हैं। मुई बोरोक में फाइबर की मात्रा इतनी ज्यादा होती है कि इसे नेचर-हेल्थ सेट भी कहा जाता है यानी प्रकृति की ओर से बना एक संतुलित भोजन। पकाने के तरीक़े उबालना, भाप में पकाना, धीमी आंच पर पकाना इनसे भोजन की मूल पौष्टिकता कायम रहती है। यही वजह है कि यह भोजन डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, पाचन संबंधी समस्याओं और मोटापे को नियंत्रित रखने में मददगार माना जाता है।

टूरिज़्म, संस्कृति और नए बदलाव
पहले मुई बोरोक सिर्फ त्रिपुरी घरों तक सीमित था लेकिन आज यह पूरे भारत और विदेशों में भी चर्चा का विषय बन चुका है। त्रिपुरा में पर्यटन बढ़ने के साथ-साथ लोग स्थानीय भोजन को जानने और चखने के लिए उत्साहित रहते हैं। राजधानी अगरतला के कई रेस्टोरेंट अब ऑथेंटिक मुई बोरोक थाली परोसते हैं जिसमें चोखो, बेरमा, बैम्बू शूट, मछली, दाल और पारंपरिक चावल शामिल होते हैं। युवा पीढ़ी भी आज अपने पारंपरिक खानपान से फिर जुड़ रही है और अब कई शेफ इस भोजन को नए रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे फ्यूज़न चोखो, बैम्बू शूट सलाद, शिडाल पास्ता, बेरमासूप आदि।
मुई बोरोक कैसे बनाया जाता है?
मुई बोरोक बनाने का तरीका बेहद सरल और प्राकृतिक होता है। इसमें ज़्यादातर खाना उबालकर या भाप में पकाया जाता है। सबसे पहले स्थानीय सब्ज़ियां कद्दू, बैंगन, यम, पपीता या जंगली साग हल्दी और नमक के साथ उबाले जाते हैं। इसके बाद बेरमा फर्मेंटेड फिश का छोटा टुकड़ा स्वाद के लिए डाला जाता है। कभी-कभी बांस की कोपलें बैम्बू शूट भी मिलाई जाती हैं। तेल लगभग न के बराबर होता है। सब कुछ धीमी आंच पर पकता है ताकि प्राकृतिक स्वाद बना रहे। नतीजा हल्का, पौष्टिक और मिट्टी की खुशबू से भरा त्रिपुरी पारंपरिक भोजन।






